खुदरा बाजार में एफडीआई और दलित उद्यमी

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/17/2013 12:13:00 PM

कुछ चिंतक, बुद्धिजीवी, लेखक, पत्रकार और कार्यकर्ताओं की तरफ से ऐसी दलीलें लगातार आती रहती हैं कि वैश्वीकरण दलित और दूसरी वंचित जातियों और तबकों के लिए फायदेमंद है. कि वैश्वीकरण ने वंचित तबकों के लिए तरक्की के रास्ते खोले हैं और अगर इन नीतियों को इसी तरह लागू किया जाता रहा तो इसकी मदद से उभरी दलित उद्यमिता के जरिए दलितों (और इसी तरह दूसरी वंचित जातियों) की तरक्की मुमकिन होगी और उन्हें उनकी वंचित स्थितियों से मुक्ति दिलाई जा सकेगी. वे यह बात आसानी से नजरअंदाज कर देते हैं कि ठीक यही साम्राज्यवादी वैश्वीकरण देश की दलित, स्त्री, आदिवासी और अल्पसंख्यक आबादियों के लिए तबाही को तेज करनेवाले एक विनाशकारी अभियान के रूप में काम कर रहा है. इसने सांप्रदायिक कत्लेआम, लूट, लैंगिक और जातीय उत्पीड़नों तथा युद्धों को तेज किया है. लेकिन इन्हें फिलहाल जाने भी दें, अभी यह देखना दिलचस्प होगा कि दलित उद्यमिता का वास्तव में वैश्वीकरण से कितना और कैसा रिश्ता है. यह भी कि दलितों का उद्यमिता से रिश्ता क्या है और आधुनिकीकरण का भारत के जातीय यथार्थ से क्या रिश्ता है, जिसके बारे में (पिछले डेढ़ सौ बरसों से अधिक समय से) उम्मीद की जा रही है कि यह भारत के जातीय दुर्गों को ध्वस्त कर देगी. उस आधुनिकता का चेहरा क्या है और जातीय दुर्गों की हालत क्या है. लेखक और कार्यकर्ता आनंद तेलतुंबड़े का यह बेहतरीन आकलन. अनुवाद: रेयाज उल हक

 आरक्षण को छोड़ दें तो दलितों की राजनीतिक संस्कृति में आर्थिक मुद्दों की गिनती नहीं की जाती. अगर मायावती की बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के सांसद मल्टी-ब्रांड खुदरा बाजार में 51 फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) पर वोटिंग के दौरान संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन का समर्थन करने के एकमात्र मकसद के साथ लोकसभा से अनुपस्थित रहते हैं और राज्यभा में इसके पक्ष में वोट करते हैं तो उन्होंने ऐसा इसलिए नहीं किया कि इस मामले का एक वास्तविक आर्थिक पहलू था, बल्कि ऐसा ‘सांप्रदायिक ताकतों’ को बाहर रखने के लिए किया गया.

आर्थिक मुद्दों के प्रति दलितों की उदासीनता की जड़ें शुरुआती कम्युनिस्टों के साथ उनके विवाद तक जाती हैं, जिन्होंने बाबासाहेब आंबेडकर के संघर्षों समेत सभी गैर-आर्थिक संघर्षों का मजाक उड़ाने के लिए आधार और ऊपरी संरचना के मार्क्सवादी प्रतीकों को एक जड़ सिद्धांत बना दिया था. इसकी वजह से दलित आंदोलन न केवल वाम आंदोलनों से दूर हो गए बल्कि वे आम तौर से अर्थशास्त्र से भी दूर हो गए. ऐसी स्थिति में द टाइम्स ऑफ इंडिया (5 दिसंबर, 2012) में एक लेख को देख कर सुखद आश्चर्य हुआ- ‘टू एंपावर दलित्स, डू अवे विथ इंडियाज एंटीक्वेटेड रीटेल ट्रेडिंग सिस्टम’. इसके लेखक चंद्रभान प्रसाद और मिलिंद कांबले थे. ये दोनों दलित पूंजीवाद के प्रचारक हैं और ये मल्टी-ब्रांड खुदरा बाजार में 51 फीसदी एफडीआई की इजाजत देने के सरकारी फैसले की तारीफ कर रहे थे, जिसने वाल-मार्ट और टेक्सको जैसी बड़ी वैश्विक खुदरा श्रृंखलाओं के लिए रास्ता खोल दिया है.

एफडीआई और दलित उद्यमी

प्रसाद और कांबले ने यह स्थापित करने की कोशिश की कि खुदरा बाजार में एफडीआई का ‘भारत में दलित उद्यमियों के उभरते वर्ग पर’ सकारात्मक असर होगा. उनकी दलीलों का मुख्य आधार ये है कि पारंपरिक, जातिबद्ध खुदरा क्षेत्र दलित उद्यमियों के लिए अवसर मुहैया नहीं कराता है. एफडीआई आधुनिक और जाति निरपेक्ष है, इसलिए दलित उद्यमियों के लिए फायदेमंद है. इस दलील के पक्ष में लेखकों ने दो अध्ययनों को उद्धृत किया है. पहला यूनिवर्सिटी ऑफ पेन्सिलवेनिया के सेंटर फॉर एडवांस्ड स्टडी ऑफ इंडिया (सीएएसआई) द्वारा दलित उद्यमों पर किया गया अध्ययन है, जिसमें पाया गया है कि जितने दलित उद्यमियों का सर्वेक्षण किया गया, उन्होंने पहली बार उद्यम किए थे और उन्होंने 1991 के बाद कारोबार शुरू किया था, जब उदारीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई थी. इससे यह मतलब निकाला गया कि नवउदारवादी सुधार आम तौर से दलितों के लिए और खास तौर से दलित उद्यमियों के लिए फायदेमंद हैं. सीएएसआई के शोधकर्ताओं ने पाया कि ‘विभिन्न प्रकार के दलित उद्यमी डेवी ड्यूटी क्रेनें बनाने, सुरंगें बनाने, पुल बनाने और मशीनें बनाने में लगे हुए थे.’ पहले के पूरक के रूप में दूसरा अध्ययन दिल्ली की आजादपुर फल और सब्जी मंडी में दलित आढ़तियों की तलाश से जुड़ा हुआ है. यह अध्ययन दलित इंडियन चेंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (डिक्की) के सदस्यों ने किया और जाहिर है कि उन्हें कोई दलित आढ़ती नहीं मिला.

प्रसाद और कांबले ने 1991 के बाद दलित उद्यमियों की परिघटना का श्रेय वैश्विक होड़ द्वारा आउटसोर्सिंग और सहायक उद्योगों को दिए गए प्रोत्साहन को दिया है. इसमें उद्यमिता का एक विस्फोट हुआ, जिसमें दलितों को भी जगह मिली. यह दलील पूरे मामले को घटाते हुए इसे स्थापित करती है कि आधुनिकता के उपकरण भारत की तेज तरक्की में मदद करेंगे और ऐसा ही एक उपकरण होने के नाते एफडीआई यकीनन दलितों को फायदा पहुंचाएगा. बेशक, दलित जनता और दलित उद्यमियों के हित समान मान लिए गए हैं. टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित लेख के लेखकों ने आगे यह भी दावा किया है कि एफडीआई द्वारा चालित संगठित खुदरा बाजार हजारों खाद्य तकनीशियनों, एमबीए, सीए के लिए रोजगार के मौके मुहैया कराएगा. इससे भी अधिक, रेफ्रीजेरेटेड खाद्य पदार्थ ले जाने वाले वैनों और रेफ्रीजेरेटरों के निर्माता भी अधिक रोजगार पैदा कर सकेंगे.

यह घोषणा नई नहीं है कि पूंजीवादी आधुनिकीकरण खुद ब खुद जाति, संप्रदाय और नस्ल जैसी सामाजिक पहचानों के महत्व को और आर्थिक नतीजों को प्रभावित करने की उनकी भूमिका को खत्म कर देगा. कोई भी इस बात पर सहज ही सहमत हो सकता है कि सामाजिक पहचान (अस्मिताएं) बाजार की होड़ को सीमित करती हैं, सांस्थानिक बदलावों को रोकती हैं, आदान-प्रदान की लागत को बढ़ाती हैं और बाजार को गैर-प्रतिस्पर्धी बनाती हैं. इस पर भी सहमत हुआ जा सकता है कि बाजार-चालित अर्थव्यवस्थाएं आरोपित सामाजिक अस्मिताओं को कमजोर करेंगी. न्यूयॉर्क डेली ट्रिब्यून (5 अगस्त, 1852) में लिखते हुए मार्क्स ने कहा था:
भारत में रेल-व्यवस्था सचमुच में आधुनिक उद्योगों का अग्रदूत होगी...रेल व्यवस्था के नतीजे में पैदा हुआ आधुनिक उद्योग श्रम के वंशानुगत विभाजन को मिटा देगा, जिस पर भारतीय जातियां टिकी हुई हैं और जो भारतीय प्रगति और भारतीय शक्ति की निर्णायक रुकावट हैं.

भारत दुनिया के चौथे सबसे बड़े रेलवे नेटवर्क, जो बस अमेरिका, रूस और चीन के पीछे है, और एक बड़े औद्योगिक आधार वाला देश बना, जहां अनेक वैश्विक कंपनियां हैं, लेकिन जाति व्यवस्था ध्वस्त होने के बजाए भयावह रूप से जीवित है और आघात पहुंचा रही है.

मार्क्स के गलत साबित होते देख कर खुश होनेवाले लोगों के विलापों के बावजूद पूंजीवाद ने जाति व्यवस्था को प्रभावित किया और दलितों के एक तबके को फायदा भी पहुंचाया. असल में, दलित आंदोलन के निर्माण की प्रक्रिया की जड़ें भारत में पूंजीवादी विकास में तलाशी जा सकती हैं. लेकिन यह भी सही है कि पूंजीवादी विकास ने पारंपरिक रूप से प्रभावशाली जातियों को मजबूत किया और दलितों और गैर दलितों के बीच के सत्ता-असंतुलन को सशक्त बनाया. गुणात्मक और परिमाणात्मक रूप से जातीय उत्पीड़नों में वृद्धि इस जटिल गतिकी का एक सबूत है.

बेशक वैश्वीकरण लोगों को, दलितों समेत, फायदा पहुंचाता है, लेकिन सिर्फ मुट्ठी भर लोगों को. बहुसंख्यक, जो ‘अप्रतिस्पर्धात्मक’ हैं, जीवन की असुरक्षा और अस्तित्व संबंधी अनिश्चितता को भुगतने के लिए मजबूर कर दिए जाते हैं. सैद्धांतिक रूप से, वैश्वीकरण के हिमायतियों का रुझान चरम व्यक्तिवाद, डार्विनवादी सामाजिक प्रतिस्पर्धा और मुक्त बाजार में आस्था की ओर होता है, जिसे वे सामाजिक गतिशीलता की सभी समस्याओं के अचूक समाधान के रूप में देखते हैं. ऐसी सारी बातें कि गरीब लोग ‘रिस कर नीचे आने’ के सिद्धांत के साथ चैन से जी रहे हैं, सैद्धांतिक रूप से आधारहीन और व्यावहारिक रूप से झूठी हैं. पिछले तीन दशकों में वैश्वीकरण ने खतरनाक स्तर की असमानता को, दुनिया के गरीबों की बेहतरी के लिए संकट को, मूल अस्मितावादी उभारों को और लोकतंत्र के विनाश को जन्म दिया है. असल में इसने धरती को विनाश के कगार पर ला खड़ा किया है. कुछ लोगों के हाथों में धन के चरम संकेंद्रण का जश्न केवल तभी मनाया जा सकता है जब कोई जानबूझ कर इसकी तरफ से आंखें मूंद ले कि  आपार संख्या में लोगों को हाशिए पर धकेला जा रहा है.

पद्धति के नजरिए से देखें तो, सीएएसआई का अध्ययन दोषों से भरा हुआ है और उसमें से प्रायोजित प्रचार की बू आती है. उद्यमिता दलितों की बहुसंख्यक उप जातियों (मिसाल के लिए महारों, चमारों, मालाओं और परयों) का अभिन्न हिस्सा रही है. इन उपजातियों ने अपने सामने आए हर अवसर का इस्तेमाल किया. हालांकि वे भारी संख्या में खेतों में काम करने वाले मजदूर रहे हैं, लेकिन उनके बीच बुनकर, बिसाती, दुकानदार, महाजन, ठेकेदार आदि भी होते रहे हैं. ऐसी उद्यमिता के जरिए ही दलितों के एक हिस्से ने धन जमा किया.

1990 से दशकों पहले देश के हर हिस्से में खूब धनी दलितों को आसानी से खोजा जा सकता था. असल में, ठीक इन उद्यमियों ने ही आंबेडकर के नेतृत्व में दलित आंदोलन का आधार निर्मित किया था. इसलिए दलित उद्यमों या उनकी सफलता का श्रेय वैश्वीकरण को देना पूरी तरह से प्रायोजित है. अगर दलित युवक उद्यमिता की तरफ धकेले भी गए तो इसकी वजह सार्वजनिक क्षेत्र में रोजगारों के मौकों की कमी आना था. 1997 में, सार्वजनिक क्षेत्र में रोजगार 197 लाख थे, जो सबसे ज्यादा था और इसके बाद इसमें लगातार गिरावट आई और यह 2007 में 180 लाख पर आ गया. इसी के साथ आरक्षण का एक तरह से वास्तविक अंत भी हो गया. जबकि ऊंची जातियों में उद्यमिता जोखिम उठाने से जुड़ी हो सकती है, दलितों में इसका उल्टा लक्षण देखने को मिलता है- वह है अपने अस्तित्व के लिए जोखिम उठाना. ऐसे में जबकि रोजगार नहीं हैं, दलित युवक खुद अपने बूते कुछ करने की ठानते हैं और तथा-कथित उद्यमी बन जाते हैं. 1990, 1998 और 2005 के द इकोनॉमिक सेंसस इन प्रायोजित और अनौपचारिक अध्ययनों की तुलना में एक अधिक सच्ची तस्वीर पेश करते हैं, चूंकि सेंसस के पास कोई अवधारणा (हाइपोथिसिस) नहीं होती जिसको उसे साबित या खारिज करना हो. 1990, 1998 और 2005 के लिए उद्यमिता के मालिकाने संबंधी जातिवार आंकड़े उपलब्ध हैं और 2011 हार्वर्ड बिजनेस स्कूल के अध्ययन की तालिका 1 में उनका सार पेश किया गया है.




2005 के लिए प्रति उद्यम औसत रोजगार 2.3 था जो इसके संकेत देता है कि ज्यादातर फर्में एक व्यक्ति का उद्यम हैं. ऐसे मामले अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति श्रेणियों में कहीं अधिक थे. दलितों के संदर्भ में, उद्यम सड़क के किनारे काम करने वाले मोची से लेकर डिक्की के सदस्य करोड़पतियों तक फैले हुए थे. जैसा कि ये आंकड़े (तालिका 1) साफ तौर से दिखाते हैं, वैश्वीकरण के दौर में उद्यमों में दलितों का मालिकाना कमोबेश समान बना रहा, जो इस दावे को झुठलाता है कि वैश्वीकरण ने दलित उद्यमिता को बढ़ावा दिया है. यहां तक कि ऊपर उद्धृत किए गए हार्वर्ड बिजनेस स्कूल के अध्ययन में अनुमान लगाया गया है कि डिक्की द्वारा दलित करोड़पतियों के दावे एससी/एसटी उद्यमिता के व्यापक समूह का प्रतिनिधित्व नहीं करते.

जबकि सहायक उद्योगों या आउटसोर्सिंग का विकास निश्चित तौर से वैश्वीकरण के द्वारा बढ़ा है, यह मान लेना दुस्साहस है कि दलित उद्यमी प्रतिस्पर्धा में दूसरों को मात देकर आउटसोर्स की गई प्रक्रियाओं या उत्पादों में एक हिस्सा हासिल कर लेंगे. मौजूदा बुनियादी सामाजिक अवरोधों की स्थिति में, जिनसे वे पीड़ित हैं, वे ऐसा केवल तभी कर सकते हैं जब वे अपने कर्मचारियों का अति-शोषण करें और उन्हें जातीय पहचान के आधार पर बहकाएं. प्रसाद और कांबले की दलीलें अवधारणाओं का एक जाल बुनती हैं. मिसाल के लिए, वे दावा करते हैं कि दलित उद्यमी आधुनिक क्षेत्रों में सफल रहे हैं- ये कारोबारी पुल, सुरंगें, मशीनें आदि बना रहे हैं. वास्तव में दलित उद्यम पारंपरिक (ईंट-गारा) क्षेत्र में पड़ता है, जिसमें वे युगों से काम करते आ रहे हैं. आधुनिक क्षेत्र ज्ञान आधारित उद्यमों से बनता है, जिसमें दलितों का अब भी अस्तित्व नहीं है. ईंट-गारा उद्योग में दलितों की सफलता शायद इसका संकेत देती है कि गैर-दलित अब मूल्य-शृंखला में ऊपर की तरफ चले गए हैं और निचले सिरे को दलितों के लिए छोड़ दिया है. अगली बात, यह गलत समझदारी है कि आधुनिकीकरण जाति व्यवस्था को खोखला बना रही है. यह असल में सांस्कृतिक संकरण का प्रतिनिधित्व करती और परंपराओं के साथ सह-अस्तित्व में बनी हुई है. पूंजीवादी आधुनिकता जाति व्यवस्था के साथ सह-अस्तित्व में है, लेकिन वैश्वीकरण के साथ जातीय चेतना गहरा गई है. ऐसा संकरण सहज रूप में उन वैवाहिक विज्ञापनों में देखा जा सकता है जिनमें ऊंची शिक्षा पाए और अग्रणी उद्योगों में काम करनेवाले भारतीय अमेरिकी अपने लिए अपनी उप जाति की दुल्हनें तलाशते हैं.

अगर वैश्वीकरण दलित उद्यमों का ऐसा हिमायती रहा होता, तो क्यों डिक्की को अपने लिए ‘आरक्षण’ जैसी गैर बाजार रियायत (डोल) की जरूरत पड़ती?
(ईपीडब्ल्यू के 19 जनवरी, 2013 अंक में प्रकाशित)

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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