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अकोट में सांप्रदायिक हिंसाः एक पूर्व नियोजित साजिश

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/11/2013 01:24:00 AM


छह जनवरी को महाराष्ट्र के धुले (धूलिया) में सांप्रदायिक फासीवाद और पुलिस के संयुक्त हमले में मुस्लिम समुदाय के छह लोगों की मौत की पृष्ठभूमि में इस जांच रिपोर्ट को पढ़िए. महाराष्ट्र के ही अकोला जिले के अकोट ताल्लुके में अक्तूबर, 2012 में हुए सांप्रदायिक हमले के बारे में यह रिपोर्ट बताती है कि कैसे प्रशासन और हिंदू फासीवादी ताकतें मुस्लिम अल्पसंख्यकों के खिलाफ हर जगह एक ही तरीके से हमला करती हैं. यह रिपोर्ट एक बार फिर यह साफ करती है कि सांप्रदायिक फासीवाद से चुनावी राजनीति के जरिए नहीं लड़ा जा सकता, क्योंकि खुद चुनावी राजनीति भी इस सांप्रदायिक आधार पर टिकी हुई है. इस देश में सांप्रदायिक फासीवाद जब भी और जहां भी ताकतवर हुआ है, संसद, विधानसभाओं और कथित लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की मदद से ही हुआ है. प्रस्तुति: शरद जायसवाल. जांच दल के सदस्य: अमीर अली अजानी, श्रीकांत पांडेय, नीलेश झालटे, मोनीश कौशल, शरद जायसवाल


23 नवंबर, वर्धा से गये एक जांच दल ने, जिसमें महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के अध्यापक, छात्र, वर्धा के सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार सम्मिलित थे, अकोट (जिला अकोला) का दौरा किया। पिछले 23 अक्टूबर को अकोट ताल्लुका में सांप्रदायिक हिंसा की घटना हुई थी जिसमें चार लोग मारे गये थे एवं कई लोग घायल हुए थे। मुस्लिम समुदाय के 22 घरों को आग के हवाले कर दिया गया था और लगभग 25 दुकानों को जलाया गया था। मरने वालों में सभी निम्न मध्यवर्गीय पृष्ठभूमि से थे।

सांप्रदायिक हिंसा की पृष्ठभूमि

सांप्रदायिक हिंसा की पृष्ठभूमि 19 अक्टूबर को तैयार की जाती है। पूरे अकोट ताल्लुके में 65 मंडल देवी के लगाये गये थे। प्रत्येक मंडल का संबंध किसी न किसी जातीय समाज से रहता है। मसलन माली समाज, कुनबी समाज, धोबी समाज आदि। धोबी और भोई समाज के एक मंडल, जिसके कर्ताधर्ता बजरंग दल, शिवसेना, विश्व हिंदू परिषद के लोग थे, के पास से निकलते हुए एक मुस्लिम बच्चे ने गलती से वहां पर थूक दिया। उसके साथ उसका हमउम्र दोस्त भी था। उसकी थूक ने देवी की प्रतिमा को छुआ तक नहीं लेकिन पर्दे पर उसके कुछ छींटे जरूर पड़े।

उस बच्चे को मंडल के लोगों ने पकड़ लिया और उसकी पिटाई करने के बाद वहीं पर बैठा लिया। इतनी देर में जब कुछ शोर-शराबा हुआ तो लोगों की भीड़ वहां पर एकत्र हुई और मामले को समझने के लिए शोएब नाम का व्यक्ति भी वहां पर पहुंचा और उसने कुछ हस्तक्षेप भी किया और मंडल के लोगों को समझाने की भी कोशिश की। उसने बच्चे की उम्र का भी हवाला दिया। बच्चे की उम्र 7-8 साल की थी। मंडल के लोगों की तरफ से यह भी कहा गया कि आज ये देवी की प्रतिमा पर थूक रहे हैं कल हमारे मुंह पर थूकेंगे। बहरहाल शोएब ने किसी तरह से मामले को शांत कराया और बच्चे को मंडल के लोगों से मुक्त कराया। इस घटना की चर्चा लगभग आधे घंटे के बाद आसपास के इलाके में फैल चुकी थी। एजाज नामक टेलर जिसकी घटना स्थल से कुछ दूर पर ही दुकान थी मंडल के लोगों के पास आया और उसने जानना चाहा कि मामला क्या है और उसके बाद वह भी लौटकर अपनी दुकान पर वापस आ गया। लगभग आधे घंटे के अंदर पुलिस एजाज की दुकान पर पहुंचती है और बच्चे के बारे में पूछती है कि वो कौन है, कहां से है आदि। एजाज को घटना की जानकारी थी लेकिन बच्चा कौन है इसकी जानकारी नहीं थी और इस वजह से उसने पुलिस के सामने बच्चों के नाम और पते के बारे में अपनी असमर्थता जाहिर कर दी और पुलिस वहां से चली गयी। आधे घंटे के बाद पुलिस फिर से वहां पर आती है और एजाज से पूछताछ करती है। इस बार भी एजाज के द्वारा बच्चों के नाम और पते पर असमर्थता जाहिर करने पर पुलिस उसे थाना अकोट ले जाती है। इस बीच अकोट से आमदार (विधायक) संजय गावंडे (शिवसेना) थाने के बाहर दल-बल के साथ पहुंच जाते हैं। उनके समर्थकों में बजंरग दल, विश्व हिंदू परिषद, छावा संगठन के लगभग 250 से 300 लोग थाने में जुटते हैं और नारेबाजी शुरू हो जाती है। उनकी स्थानीय पुलिस अधिकारियों से कापफी तू-तू मैं-मैं थाने में होती है। आमदार और उनके समर्थकों के दबाव के चलते कि ‘बच्चों को हाजिर किया जाये’, पुलिस के द्वारा एजाज की पिटाई की जाती है। लगातार बढ़ते दबाव के चलते पुलिस थाने में शोएब को हाजिर करती है और शोएब बच्चों का नाम एवं पता पुलिस के सामने जाहिर कर देता है। पुलिस तुरत ही बच्चों को उनके वालिद के साथ थाने में हाजिर कर देती है।

बच्चों के थाने में आते ही उनकी उम्र देखकर वहां मौजूद पुलिस के आला-अधिकारी ये कहते हैं ये बच्चे तो खुद ही भगवान का रूप हैं और इन्होंने जानबूझ कर नहीं बल्कि गलती से ही थूका है। आमदार महोदय भी बच्चों को देखकर ढीले पड़ जाते हैं और तुरंत एक नया पैंतरा खेलते हैं कि बच्चे तो मासूम हैं लेकिन सूत्रधार कोई और है और आप लोग जल्दी से जल्दी उस मुख्य अभियुक्त को पकड़िये जिन्होंने देवी का अपमान करवाया है और यह कहकर दल-बल के साथ वापस चले जाते हैं। पुलिस रातभर थाने में शोएब और एजाज को रखती है और उन पर धारा 107 लगायी जाती है।

अगले दिन वे दोनों जमानत पर रिहा होते हैं। शोएब का गुनाह यह था कि उसने मामले को शांत कराया था एवं एजाज घटना स्थल पर मामले को समझने के लिए पहुंचा था। शिवसेना के विधायक और हिंदू सांप्रदायिक संगठनों के लोगों की ‘भावनाओं’ को संतुष्ट करने के लिए दो बिलकुल निर्दोष लोगों को बलि का बकरा बनाया गया। बहरहाल यह 19 अक्टूबर का घटना क्रम था और इसके बाद मामला शांत हो गया था लेकिन इस शांति के बावजूद मुस्लिम समाज में कापफी दहशत व्याप्त हो गयी थी।

तत्कालीन राजनीतिक घटनाक्रम

21 अक्टूबर को अकोट ताल्लुका में नगर पालिका की एक सीट के लिये उपचुनाव था। अकोट ताल्लुका में कुल 31 सीटें हैं जिसमें दिसंबर, 2011 को मतदान हुआ था। विजयी प्रत्याशियों में 2 सीटें शिवसेना एवं 2 सीटें भाजपा के खाते में गयी थीं जिसमें 1 सीट वार्ड क्रमांक 5 में मनोज रघुवंशी की पत्नी ज्योति मनोज रघुवंशी शिवसेना से चुन कर आयी थीं। कांग्रेस से मुस्लिम महिला उम्मीदवार ने, जो चुनाव हार गयी थी, मनोज रघुवंशी की पत्नी की जीत के खिलाफ न्यायालय में चुनौती दी थी। कांग्रेस की प्रत्याशी के पास आधार यह था कि मनोज रघुवंशी के दो से ज्यादा बच्चे हैं (महाराष्ट्र में यह नियम है कि जिनके 2001 के बाद से 2 से ज्यादा बच्चे हैं वे किसी भी तरह का चुनाव नही लड़ सकते हैं।) कांग्रेस की प्रत्याशी की चुनौती वाजिब थी और जब जांच हुई तब यह पाया गया कि उनके दो से ज्यादा बच्चे हैं और उनकी जीत को निरस्त कर दिया गया। इस बार उस सीट पर चुनाव के लिये मनोज रघुवंशी के परिवार से शिवसेना प्रत्याशी मनीषा राहुल रघुवंशी और कांग्रेस से सलमा निशात प्रत्याशी थीं। चुनाव का परिणाम घोषित होने पर शिवसेना को वह सीट गंवानी पड़ी और कांग्रेस की प्रत्याशी उस सीट पर चुनाव जीत गयी। 1989 से संपन्न हुए अभी तक विधानसभा के पांच चुनावों में चार बार शिवसेना प्रत्याशी ही विजयी हुए हैं और 2014 में लोकसभा तथा महाराष्ट्र के विधानसभा के चुनाव भी होने हैं। शिवसेना से वर्तमान विधायक संजय गावंडे तीन साल के अपने कार्यकाल के दौरान अकोट की जनता के बीच में कापफी अलोकप्रिय साबित हो चुके हैं, जिसकी परिणति पिछले साल संपन्न हुए नगर पालिका के चुनाव में भी देखने को मिली और केवल दो सीटें ही शिवसेना को मिलीं। हालिया नगर पालिका के उपचुनाव में संजय गावंडे की अलोकप्रियता के चलते ही वह सीट शिवसेना को गंवानी पड़ी।

23 अक्टूबर का घटनाक्रम

19 अक्टूबर की घटना के बाद से ही पूरे नगर में यह अफवाह थी कि देवी विसर्जन के कार्यक्रम के दौरान जो यात्रा निकलेगी उसमें मुस्लिम समुदाय के लोग कुछ न कुछ गड़बड़ी करेंगे। मसलन यह भी अफवाह थी कि मुसलमानों ने ढेर सारे पत्थर इकट्ठा कर के रखे हैं जो विसर्जन के कार्यक्रम के दौरान देवी पर चलाये जाएंगे। इस अफवाह को फैलाने में सांप्रदायिक संगठनों के साथ-साथ स्थानीय दुकानदारों, छोटे व्यापारियों की भी बड़ी भूमिका थी। 23 अक्टूबर को देवी विसर्जन का कार्यक्रम था।

देवी विसर्जन के कार्यक्रम के लिए यात्रा निकलनी थी जिसमें नगर के सैकड़ों लोगों को शामिल होना था। प्रशासन ने सख्त इंतजाम किये थे। मसलन हर वो इलाका जहां से यात्रा को निकलना था और यदि वहां पर कोई मस्जिद है या मुस्लिम बस्ती है तो ‘बेरिकेडिंग’ का भी इंतजाम किया गया था और भारी मात्र में पुलिस बल तैनात किया गया था। देवी विसर्जन के कार्यक्रम के लिये लोग जुलूस में जा रहे थे। अचानक ठीक उसी जगह के पास जहां पर बच्चे के थूकने की घटना हुई थी एक मंडल के लोगों ने यह कहना शुरू कर दिया कि पत्थर आया और हमको पत्थर आकर लगा। पुलिस ने तुरंत आस-पास देखा लेकिन कहीं से कोई पत्थर नहीं आया था और फिर से जुलूस को आगे बढ़ाया गया। पत्थर आने की सूचना आग की तरह पफैली और कुछ भगदड़ भी मची लेकिन पुलिस ने स्थिति पर पूरी तरह से नियंत्रण कर लिया। (पुलिस के आला अधिकारियों से जांच दल ने मिलकर यह जानने की कोशिश भी की थी कि क्या कोई पत्थर आया था अथवा पत्थर से हमला हुआ था तो उन्होंने कहा कि कोई पत्थर नहीं आया यह केवल अफवाह थी)।

हिंसा का दौर

देवी विसर्जन का कार्यक्रम चल रहा था कि लगभग 7-8 बजे नगर के बिल्कुल बाहरी इलाके और एक तरह से मलिनबस्ती बरडे प्लॉट में जहां पर ज्यादातर मुस्लिम समाज और बारी समाज के लोग रहते हैं, दंगाइयों ने हमला कर दिया। दंगाइयों ने मुसलमानों के 22 घरों को जलाया और दो लोगों की हत्या कर दी। हाजी मुहम्मद यासीन (उम्र लगभग 80 साल) जो कि फालिज के शिकार थे और भाग नहीं पाये, दंगाइयों ने उन्हें मार दिया। उनको बचाने के लिये उनकी पत्नी जुलेखा बी (उम्र लगभग 75 साल) के पैर पर दंगाइयों ने धारदार हथियार से हमला किया और उनको मारने के लिये लोहे की रॅाड का इस्तेमाल किया गया, जिसके चलते वो बुरी तरह जख्मी हुईं और बेहोशी की हालात में ही उनको अकोला के सरकारी अस्पताल में भर्ती किया गया। 16 साल का एक लड़का मोहम्मद जफरुद्दीन जो थोड़ी देर पहले ही काम पर से लौटा था दंगाइयों ने उसकी भी हत्या कर दी। जांच दल जब पीड़ित व्यक्तियों से मिला तो उन्होंने बताया कि दंगाइयों के पास मशाल, लोहे के पाइप, तलवारें, मिट्टी का तेल मौजूद था। जांच दल को मुस्लिम समुदाय के जले हुए घरों से छोटी-छोटी शीशियां मिली जिसमें केमिकल भर कर हर घर में फेंका गया था और जिसकी तैयारी पहले से ही दंगाइयों ने की थी।

घटना के कुछ देर के बाद पुलिस भी वहां पर पहुंचती है और चीजों को नियंत्रित करने की कोशिश करती है जिसके जवाब में हिन्दू सांप्रदायिक तत्वों की तरफ से पुलिस पर भी हमला होता है और पुलिस के जवानों को भी चोट आती है। सांप्रदायिक तत्व फायर बिग्रेड की गाड़ी को भी उस इलाके में जाने से रोकते हैं, जहां पर दंगाइयों ने मुसलमानों के घरों में आग लगाई थी। पुलिस के मुताबिक हमलावरों में से एक व्यक्ति योगेश महादेवराव रेखाते (उम्र 23 साल) जो मुस्लिम बस्ती में कापफी अंदर तक आ गया था मारा जाता है।

मुस्लिम समुदाय की तरफ से जवाबी कार्रवाई में 24 अक्टूबर की सुबह मनोहर राव बुधे (कासार समाज से उम्र 82 साल) की हत्या कर दी जाती है। 24 अक्टूबर शाम छह बजे कर्फ्यू के दरम्यान मुसलमानों की आठ दुकानें एवं एक हिन्दू की भंगार (कबाड़) की दुकान में आग लगाई जाती है एवं सब्जी मंडी में 8 दुकानें मुस्लिम समुदाय की तथा 9 दुकानें हिंदू समुदाय की आग के हवाले कर दी जाती हैं। (पुलिस की तरफ से अभी तक दोनों समाज के लोगों में से लगभग 50-50 लोगों को छोटी तथा बड़ी धाराओं के अंतर्गत पकड़ा गया है।)

हिंदू सांप्रदायिक ताकतों की दंगे में भूमिका

जांच दल के लोगों ने जब पीड़ित व्यक्तियों से मुलाकात की और हमलावरों की पहचान के बारे में जानना चाहा तो मालूम पड़ा कि हमलावरों में ज्यादातर बारी समुदाय (हिंदू, ओ.बी.सी.) और बाहर के लोग थे। पूरे अकोला जिले में पान का जो भी उत्पादन होता है वह बारी समाज के लोगों के द्वारा ही होता है। बारी समाज का बड़ा हिस्सा आज भी निम्न मध्यवर्गीय पृष्ठभूमि से आता है और बारी समाज में शिक्षा का अभाव भी व्यापक स्तर पर है। बारी समाज के प्रभावशाली नेता महादेवराव बोड़के जो दिवंगत हो चुके हैं, आरएसएस के थे। गजानन माकोड़े (बारी) बजरंग दल के नगर अध्यक्ष, अनंत मेषाण, शिवसेना नगर अध्यक्ष एवं अन्य सांप्रदायिक संगठनों के प्रमुख पदों पर बारी समाज के लोग हैं। बारी समाज परंपरागत रूप से शिवसेना के साथ है। अकोट में जिस इलाके से दंगे की शुरुआत हुई वहां पर मुस्लिम और बारी दोनों समाज के लोग बिलकुल आसपास रहते हैं और दोनों की बस्तियां आपस में बिलकुल सटी हुई हैं। 1999 में एक सांप्रदायिक तनाव की घटना अकोट में हुई थी और बीचोबीच बाजार में भगदड़ मची थी, जिसमें भगदड़ के कारण बारी समाज का एक बुजर्ग 80-85 साल का मारा गया था। इस घटना को सांप्रदायिक संगठनों ने एक राजनीतिक रूप दे दिया था। इस घटना ने पूरे बारी समुदाय को सांप्रदायिक चेतना से लैस करने में बड़ी मदद की और इस बार के दंगे में भी सांप्रदायिक एजेंडा को पूरा करने के लिए बारी समुदाय को मुसलमानों के खिलाफ ‘टूल’ के रूप में इस्तेमाल किया गया। जांच दल ने हिंदू समुदाय के लोगों से मिल कर घटना के कारणों को जानने की तथा दंगे के दरम्यान उनकी मानसिकता को समझने की कोशिश की तो यह मालूम पड़ा कि किसी भी व्यक्ति को कोई ठोस औार यथार्थपरक जानकारी नहीं है बल्कि अफवाहों के चलते पूरा समुदाय घटना के लिये मुस्लिम समुदाय को ही जिम्मेदार मानता है। मसलन जानबूझ कर देवी की प्रतिमा को अशुद्ध किया गया, देवी पर पत्थर फेंके गये एवं पहले हमला मुसलमानों की तरफ से हुआ इत्यादि। लोगों से बातचीत के क्रम मे ही जांच दल को यह भी मालूम पड़ा कि अकोला और अकोट दोनों ही जगह से मुस्लिम युवकों की सिमी के नाम पर गिरफ्तारियां हुई थीं लेकिन उनमें से ज्यादातर बाइज्जत बरी हो चुके हैं। लेकिन आतंकवाद और सिमी से जुड़े होने के चलते कुछ युवकों की हुई गिरफ्तारी ने हिंदू जनमानस में इस अफवाह को फैलाने में बड़ी मदद की कि जो दंगा हुआ उसमें भी सिमी के लोगों का हाथ है। कुल मिलाकर सिमी से जुड़ी परिघटना को हिंदू सांप्रदायिक तत्वों ने इस दंगे में खूब इस्तेमाल किया और समाज का सांप्रदायिक ध्रुवीकरण किया गया। ज्यादातर हिंदू लोग मुसलमानों को लेकर वही परंपरागत धारणा बनाये हुए थे जिसका प्रतिनिधित्व राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ करता है।

बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद से सांप्रदायिक तनाव की जो स्थिति यहां पैदा हुई तमाम सारे हिंदू सांप्रदायिक संगठन मिल कर उस तनाव को और बढ़ाने की कोशिश में जी जान से लगे हुए हैं और सांप्रदायिक संगठनों ने यहां पर अपने जनाधार का कापफी विस्तार किया है। केवल अकोट ताल्लुका में ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के 400 कैडर, विहिप के 150, बजरंग दल के 200, छावा संगठन के 100, मराठा महासंघ के 150 कैडर प्रमुख रूप से सांप्रदायिक एजेंडे को गैर संसदीय तरीके से आगे बढ़ाने में सक्रिय हैं। इसके अलावा चुनावी राजनीति के तहत सक्रिय संगठनों में शिवसेना, भाजपा, नव निर्माण सेना का भी पर्याप्त जनाधार है।

पूरे महाराष्ट्र में शिवसेना का सामाजिक आधार अन्य पिछड़ा वर्ग में है। कांग्रेस में शुरू से मराठा समाज के लोगों का वर्चस्व रहा है। पूरे महाराष्ट्र के अंदर भी मराठाओं का वर्चस्व रहा है। समाज के पिछड़े वर्गों को आजादी के बाद कांग्रेस की नीतियों के चलते कोई ‘स्पेस’ नहीं मिला। शिवसेना ने ही सबसे पहले अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों को राजनीति में स्पेस दिया। छगन भुजबल, जो पहले शिवसेना में थे और अब कांग्रेस में हैं और माली समाज से आते हैं, उन्होंने यह सार्वजनिक रूप से कहा कि ‘आज मैं जो कुछ भी हूं बाल ठाकरे की वजह से हूं।’

जांच दल को अकोट के डिग्री कॉलेज के प्राध्यापक ने बताया कि इस पूरे क्षेत्र में जहां पर भी मुस्लिम आबादी का अनुपात ठीकठाक है वहां पर सांप्रदायिक संगठनों ने अपने जनाधार को काफी मजबूत कर लिया है और सुनियोजित तरीकों से बार-बार सांप्रदायिक तनाव की स्थिति पैदा की जाती है। सांप्रदायिक संगठन इस बात को हिंदू समुदाय में ले जाते हैं कि यदि हिंदू एकजुट नहीं होगा तो मुस्लिम हम पर भारी पड़ेंगे। यह परिघटना पूरे देश के पैमाने पर भी देखने में सामने आती है कि जहां-जहां मुस्लिम आबादी का प्रतिशत ठीक-ठाक होता है वहां पर अक्सर हिंदू सांप्रदायिक संगठनों की ओर से सुनियोजित तरीके से सांप्रदायिक तनाव की स्थिति पैदा की जाती है।

सांप्रदायिक हिंसा का मुस्लिम समाज पर प्रभाव

जांच दल ने मुस्लिम समुदाय, उनके नेताओं, पीड़ित व्यक्तियों तथा सामान्य मुस्लिम नागरिकों से भी बातचीत की। बातचीत के क्रम में ही यह तथ्य सामने आया कि मुस्लिम समुदाय कापफी दहशत में है। शिवसेना से विधायक संजय गावंडे एवं उनके समर्थकों पर पुलिस ने थाने का घेराव करने के कारण कुछ हल्की-फुल्की धारायें लगायी हैं, लेकिन दंगे की पूर्वपीठिका को तैयार करने में जो भूमिका उनकी और उनके समर्थकों की रही है उसके लिए न तो सरकार ने और न ही पुलिस ने कोई कड़ा कदम उठाया है।

मुस्लिम समुदाय पहले से और भी ज्यादा अपने में सीमित हुआ है। ऐसे समय में जो भूमिका सेकुलर राजनीति को अख्तियार करनी चाहिए थी उसका पूरे महाराष्ट्र में अभाव दिखता है। प्रदेश में कांग्रेस ने सांप्रदायिक ताकतों को काउंटर करने के लिए हनुमान सेना का गठन किया है। दैनिक भास्कर में 24 अक्टूबर, 2012 को ‘हनुमान सेना को लेकर राजनीतिक हलचल’ के शीर्षक से एक खबर प्रकाशित हुई है- ‘बजरंग दल के समानांतर कांग्रेस की हनुमान सेना भाजपा के लिए सिरदर्द बन सकती है। शिवसेना के साथ भाजपा के संबंधों में मिठास का पैमाना घटता जा रहा है। ऐसे में माना जा रहा है कि हनुमान सेना को हथियार बना कर शिवसेना भाजपा को कुछ मामलों में नुकसान पहुंचा सकती है।... बजरंग दल कार्यकर्ताओं के पाला बदलने की संभावना को देखते हुए पैनी नजर रखी जा रही है।... दो दिन पहले पूर्व नागपुर में हनुमान सेना की घोषणा की गई। वित्त व ऊर्जा राज्यमंत्री राजेंद्र मुलक व शिवसेना के जिला प्रमुख शेखर सावरबांध की उपस्थिति में पूर्व मंत्री सतीश चतुर्वेदी ने कहा कि कांग्रेस की हनुमान सेना जन विकास के मुद्दों पर आक्रामक भूमिका में रहेगी।... लेकिन हनुमान सेना को लेकर कहा जा रहा है कि वह कांग्रेस के लिए ऐसा विकल्प बनाने के उद्देश्य के साथ गठित की गई है, जिसमें बजरंगियों के अलावा शिवसैनिकों का समायोजन किया जा सके।... अब तक ये संगठन भाजपा के लिए मददगार बने हुए हैं, लेकिन पिछले कुछ समय से दोनों संगठन असंतोष के दौर से गुजर रहे हैं।... बजरंगियों की शिकायत रहती है कि उन्हें अनुशासन के नाम पर सक्रिय कार्य करने से रोका जा रहा है। भाजपा में पूछ-परख कम हो रही है। चर्चा है कि कुछ असंतुष्ट कार्यकर्ताओं ने ही मोबाइल संदेश भेजकर बजरंग दल कार्यकर्ताओं से हनुमान सेना में शामिल होने का निवेदन किया।’

ऐसे में ज्यादातर राहत का कार्य या जिनकी गिरफ्तारियां हुई हैं उनके मुकदमे लड़ने के लिये वकील उपलब्ध कराने से लेकर आर्थिक मदद करने का काम धार्मिक संगठनों की तरफ से ही हो रहा है, जिसके चलते तमाम तरह के इस्लामिक धार्मिक संगठन मसलन जमात-ए-इस्लामी, अहले हदीस, अहले सुन्नातुल जमात, तब्लीग जमात जो इस्लाम का प्रचार-प्रसार करने का काम करते हैं, उनके लिये अवसर बढ़ रहा है। मुस्लिम समाज का अपने में सीमित हो जाने के चलते सबसे ज्यादा बुरा प्रभाव महिलाओं पर पड़ रहा है। मसलन केवल उन्हीं मुस्लिम परिवारों की महिलायें घर से बाहर निकल पाती हैं जिनके घर में कोई मर्द नहीं है। शिक्षा के अवसर भी मुस्लिम महिलाओं के लिये काफी सीमित हो गये हैं। जांच दल को मुस्लिम समुदाय के लोगों से यह जानकारी मिली कि लगभग 20 साल पहले तक अकोट में मुस्लिम महिलाएं भी सिनेमा देखने जाया करती थीं। लेकिन जब से दंगे का दौर शुरू हुआ तब से महिलायें सिनेमा देखने नहीं जाती हैं। कुल मिलाकर मुस्लिम महिलाओं के आवागमन को 90 के दशक से ही काफी सीमित कर दिया गया है।

दंगे का नवउदारवादी आर्थिक पक्ष

अकोट में हुए दंगे में अफवाहों को फैलाने में छोटे-छोटे दुकानदारों से लेकर व्यापारियों की एक बड़ी भूमिका रही है। नई आर्थिक नीतियों के तहत खुदरा बाजार में जो प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आ रहा है, जिससे देश भर का खुदरा व्यापार से जुड़ा व्यापारियों और दुकानदारों का तबका खुद को काफी असुरक्षित महसूस कर रहा है। अकोट में सांप्रदायिक संगठनों ने छोटे-छोटे दुकानदारों और व्यापारियों के अंदर व्याप्त इस असुरक्षाबोध का फायदा इस रूप में उठाया कि केवल बीजेपी, शिवसेना या नवनिर्माण सेना जैसी राजनैतिक शक्तियां ही उनके हितों की रक्षा कर सकती हैं और इसी के साथ वे इन तबकों के बीच अपने सांप्रदायिक एजेंडे को ले गये। जहां कांग्रेस केंद्र और राज्य स्तर पर उसको लागू करने के लिये उतावली है तो वहीं दूसरी तरफ बीजेपी केंद्र में और राज्य में भी विपक्ष में होने के चलते खुदरा बाजार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के विरोध में हैं जबकि शिवसेना और नवनिर्माण सेना खुदरा बाजार में निवेश के समर्थन में है लेकिन इस शर्त के साथ कि वालमार्ट जैसी कंपनियों में केवल मराठा मानुष को ही जगह अथवा रोजगार मिले।

विदर्भ देश का वह हिस्सा है जहां पर सर्वाधिक किसानों ने आत्महत्याएं की हैं। नवउदारवादी नीतियों के चलते पूरे विदर्भ में कृषि संकट और गहराया है। विदर्भ का एक बड़ा हिस्सा 90 के बाद से ही सांप्रदायिक तनाव को किसी न किसी रूप में देख रहा है। अकोला, बुलढाणा (खामगांव) अमरावती के कुछ हिस्से तथा यवतमाल इन जिलों में सांप्रदायिक ताकतों ने अपने जनाधार को कापफी मजबूत कर लिया है और इस पूरे इलाके में किसी तरह का कोई भी औद्योगिक विकास न के बराबर है। पूरे महाराष्ट्र में मुंबई, नासिक, औरंगाबाद, पुणे, ठाणे को अगर छोड़ दिया जाए तो अधिकांश जिलों की अर्थव्यवस्था में कृषि की प्रधान भूमिका है। जैसे ही हमें या इस प्रदेश के बाहर के किसी व्यक्ति को यह सूचना मिलती है कि महाराष्ट्र के किसी इलाके में दंगा हुआ तो अमूमन लोग इस भ्रम का शिकार हो जाते है कि यह एक औद्योगिक रूप से विकसित प्रदेश है। लेकिन प्रदेश का अधिकांश हिस्सा आज भी प्राक-औद्योगिक अवस्था से ही गुजर रहा है। विदर्भ में कपास की खेती के व्यापक पैमाने पर होने के चलते ही यहां अकोला के साथ-साथ लगभग हर जिले में टेक्सटाइल मिलो लगाई गयी थीं जो अब पूरी तरह से बंद हो चुकी हैं।

विदर्भ के कुछ इलाकों जैसे नागपुर, वर्धा, चंद्रपुर में पानी और कोयला की उपलब्धता प्रचुर मात्र में होने के चलते ही बिजली के उत्पादन के लिये पावर प्लांट जरूर लगाये जा रहे है जिनसे और ज्यादा बिजली प्रदेश के उन इलाकों में भेजी जा सके जहां पर औद्योगिक उत्पादन बड़े पैमाने पर हो रहा है।

जांच दल को रंजन कावंडे (प्राध्यापक) एवं अयूब मियां देशमुख ने बताया कि अकोट में एक मंदिर है जिसकी देखरेख के लिए हैदराबाद के शासक निजाम की तरफ से आर्थिक मदद दी गई थी। केवल अकोट में ही नहीं बल्कि अमरावती में श्री शिवाजी एजूकेशन सोसाइटी की स्थापना में जो पहली मदद की गयी वो निजाम के द्वारा दी गयी थी। इसी तरह निजाम ने नांदेड़ में एक गुरुद्वारा की स्थापना के लिए भी आर्थिक सहयोग दिया था। मंदिरों, गुरुद्वारा और हिंदुओं द्वारा संचालित एक शैक्षणिक संस्था को एक मुस्लिम शासक के द्वारा दी गई आर्थिक मदद सांप्रदायिक सद्भाव के लिये एक बेहतरीन नमूना बन सकती थी लेकिन 90 के दशक से, जब नई आर्थिक नीतियों की शुरुआत की जाती है और यह कहा जाता है कि बाजार अपनी शर्तों के मुताबिक काम करेगा एवं राज्य बाजार में कोई हस्तक्षेप नहीं करेगा वहीं दूसरी तरफ लगातार राज्य का अथवा राजनीति का धर्म (सांप्रदायिकता) के साथ एक गठजोड़ भी बनता है, जिसकी परिणति अकोट एवं देश के दूसरे तमाम इलाकों में सांप्रदायिक हिंसा के रूप में सामने आती है।

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


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“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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