हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

कब तक हमारी बहनें/बेटियाँ अपनी देह शर्म की तरह ओढ़ती रहेंगी?

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/07/2013 01:08:00 PM

कवि, कथाकार और उपन्यासकार रणेन्द्र ने यह लेख दिल्ली में बलात्कार की घटना के बाद लोगों में दिखे आक्रोश की पृष्ठभूमि में लिखा है. इसमें कई जरूरी सवाल हैं, समाधानों के संकेत हैं और एक आह्वान है. इंसाफ और बराबरी पर आधारित समाज के निर्माण की चाहतें इन सवालों की न तो अनदेखी कर सकती हैं और न इस आह्वान को अनसुना.


जेंडर, पितृसत्ता, जाति व्यवस्था और उपभोक्तावादी पूँजीवाद: असली अपराधी


सबसे पहले इस गुस्से को सलाम करता हूँ। सड़क पर उतरे सचेतन प्रतिकार के लिए तनी मुट्ठियों को, लाठी-वाटर कैनन को बर्दाश्त कर आगे बढ़ने के जज्बे को सलाम, अभिनन्दन। हर उस स्त्री-पुरुष, युवा-अधेड़ का अभिनन्दन जो अपनी और अपनी बेटियों-बहनों के वर्तमान और भविष्य के सवाल को लेकर घर से बाहर निकले।

किन्तु बलात्कार को केवल सामान्य अपराध मानना और अपराधी को कठोरतम सजा की मांग तक सीमित रहना ‘गुस्से और तात्कालिकता’ के दवाब से निकला समाधान है, जो व्यवस्था को भी अनुकूल-उपयुक्त लग रहा है।

दरअसल स्त्री के खिलाफ हिंसा एक ऐसी काली चट्टान है जो बहुत गहरे धँसी है। कई-कई परतें हैं इसकी, सबको भेदने की जरूरत है। हमारी निगाहें अभी कालिख के इस दलदल के ऊपरी सतह से ही लौट जा रही है।

अगर नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो का आंकड़ा यह बता रहा है कि 1953 से 2011 के बीच बलात्कार की दर में 873 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है तो यह कुछ गम्भीर विश्लेषण को इंगित कर रहा है। अतएव इस समस्या की बहुस्तरीयता को समझने की आवश्यकता है।

आखिर किन अवधारणाओं और परिघटनाओं ने स्त्री को बराबरी के दर्जे से, सचेतन-विवेकशील व्यक्ति के गरिमापूर्ण अस्तित्व से नीचे की ओर धकेला? क्यों उसके श्रम और उसकी यौनिकता को नियंत्रित करने के लिए तरह-तरह के आडम्बर रचे गए?

माग्रेट मीड की कृति सेक्स एण्ड टेम्परामेंट इन थ्री प्रिमिटीव सोसाईटीज यह स्पष्ट करती है कि जैविक भिन्नता नहीं बल्कि समाज और संस्कृति, पुरुषों और स्त्रियों के लिए भिन्न-भिन्न मानदंड तय करती है। उस मानक के हिसाब से समाजीकरण की प्रक्रिया द्वारा उनका अनुकूलन करती है। यह जैविक भिन्नता नहीं समाज और संस्कृति तय करती है कि किसके जन्म लेने पर काँसे की थाली बजेगी और किसके जन्म लेने पर उदासी की भाँय-भाँय गूँजेगी या किसे जन्म लेने से पहले गर्भ में ही नष्ट कर देना है।

बेटा थोड़ा सा आक्रमक, प्रतिस्पर्धी, बहादुर ही अच्छा किन्तु बेटी, सहनशील, एडजस्ट करने वाली और सुन्दर होनी चाहिए। यह जेंडर की अवधारणा जन्म से मृत्यु तक भेदभाव ही सिखलाती है। बेटे घर से बाहर दौड़ते-धूपते अच्छे और बेटी घर में माँ के पास, रसोई में अच्छी। यह तस्वीर अवचेतन में बसी जीवन भर हमारा नजरिया तय करती है। घर से बाहर लड़की, वह भी रात में, वह तो अच्छी हो ही नहीं सकती। दुश्चरित्रा- कुलटा ही होगी।

इतिहास के पन्ने गवाह हैं कि निजी सम्पत्ति की अवधारणा ने मातृसत्ता के हाथों से नेतृत्व की बागडोर छीन ली। अब स्त्रियाँ स्वयं भी सम्पत्ति के रुप में दर्ज की जाने लगीं। पुरुष अब स्वामी था, मालिक। राजा में देवत्व तो पति भी ‘घर’ का राजा इसीलिए वह भी देवता अतः ‘पतिदेव’। कन्या अगर ‘दान’ में दी जा रही है तो बराबरी की हकदार कैसे हो सकती है? पितृसत्ता अपने चरित्र और सुविधा के अनुरुप परम्परा को परिभाषित करती रही है। उसे बेटी-बहुएँ सती-सावित्री तो चाहिए किन्तु सावित्री और सती के तरह अपने वर के चयन का अधिकार कैसे दिया जा सकता है? आई.पी.एस. बेटी भी अपने जीवन संगी का चयन स्वयं कर ले तो खाप पंचायतें उसके खिलाफ फतवे जारी कर रही हैं। सारी संस्थाएँ चाहे वह परिवार हो, शिक्षा संस्थान हो, धर्म या राज्य हो इनका स्वरूप पितृसत्तात्मक है। पति/पिता रोटी-कपड़ा-संरक्षण के बदले हाथ-पैर चला सकता है यह तो न्यायपालिका भी कई बार समझा चुकी है। बदले में ‘करवा चौथ’ और ‘तीज’ पर उनकी पूजा भी कीजिए, देवता जो ठहरे। भारतीय पितृसत्ता का विशिष्ट स्वरूप ब्राह्मणवादी है जहाँ पितृसत्ता, जातिव्यवस्था का समर्थन करती है और जातिव्यवस्था, पितृसत्ता की। इसीलिए ‘बेटी और वोट’ तो जाति को ही जायेगी।

पहले राज्य स्त्री को मतदान का अधिकार देने को तैयार नहीं था अब कानून बनाने में बराबर की हिस्सेदारी देने को तैयार नहीं है। 1789 ई की फ्रांसीसी क्रांति में स्त्री -पुरूष दोनों ने बराबर की भूमिका निभाई लेकिन क्रांति की सफलता के बाद स्थापित गणतंत्र ने ‘पुरुषों और नागरिकों के लिए घोषणापत्र’ जारी किया। जिसमें स्त्रियाँ सारे अधिकारों से वंचित थीं। ‘ओलम्पी द त्राउज ’ एक लेखिका-एक्टिविस्ट ने बराबरी, मतदान के अधिकार, संसद में हिस्सेदारी की माँग की तो उसे गुलेटिन पर चढ़ा सर धड़ से अलग कर दिया गया। 1789 ई में बराबरी, आजादी, और भाईचारे  के नारे के साथ यूरोप का नेतृत्व करने वाले फ्रान्स ने अपनी ही स्त्रियों को 1944 ई तक मतदान के अधिकार से वंचित रखा। अमेरिका की संसद 52 वर्षों तक यह बहस करती रही कि स्त्रियों को मतदान का अधिकार दिया जाए या नहीं। बहस में यह महान विचार भी आये कि कैसे मतदान के अधिकार देने से स्त्रियों की मोहकता नष्ट हो जायेगी, परिवार बिखर जायेगा और राष्ट्र विखण्डित हो जायेगा। आज भी लोकतांत्रिक ढांचे वाले 96 देशों के विधानमण्डलों में सिर्फ 10 प्रतिशत स्त्रियाँ हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रशासन तंत्र में महिलाओं की भागीदारी सिर्फ 15 प्रतिशत है। हमारे यहाँ ‘राष्ट्रपति’ से ‘प्रखंड विकास पदाधिकारी’ तक सारे पदनाम पुरुष वाचक संज्ञा में हैं। शायद राज्य ने सोचा हो कि कोई स्त्री इन पदों पर कैसे आसीन हो सकती है?

उपभोक्तावादी पूँजीवाद ने हमारी वासनाएँ-ऐषणाएँ धधका दी हैं। उपभोक्ता को हर हाल में बाजार तक खींच कर ले आना उसकी मजबूरी है। क्रय-विक्रय ही उसकी प्राण शक्ति है। विज्ञापन वह हथियार है जो हमारे अवचेतन को अपने कब्जे में कर खरीद के लिए उत्प्रेरित करता है। विज्ञापन हमारा ध्यान सर्वाधिक जिस माध्यम से खींचता है वह है स्त्री की त्वचा। वाइल्ड डियोडोरेंट के विज्ञापन में लडकियाँ जिस तरह फतिंगे की तरह गिरती हुई दिखाई जाती हैं उससे ज्यादा अश्लील और क्या हो सकता है? ब्लेड से लेकर बाइक्स तक हर विज्ञापन में स्त्री की त्वचा यौनिकता को उत्तेजित करने के लिए टी.वी. स्क्रीन पर हर पाँच मिनट पर उपलब्ध है। पोर्नोग्राफी में डूबे हम तीसरे सबसे बड़े देश हैं। अब तो ब्लू फिल्म की सीडी के लिए दौड़ धूप भी नहीं करनी है। इन्टरनेट पर, माउस के एक क्लिक पर ‘पंचिंग बैग’ जैसी स्त्री देह, एक माँगो तो दस मिलेगी की दर पर, मौजूद है। सामन्ती समाज ने उन उसे गर्भ में तब्दील किया था, ‘आधुनिक’ समाज ने उसे त्वचा में तब्दील कर दिया है। सामंतवाद के आधारों पर टिकी, बाजार पोषित पितृसत्ता को मुकम्मल स्त्री का वजूद, एक सुन्दर मस्तिष्क की धनी, विवेकशील स्त्री अस्तित्व स्वीकार्य नहीं है।

अगर हिंसा और सेक्स को केन्द्र में रख की बनाई गई फिल्में 100-100 करोड़  कमा रही हैं तो वे कौन लोग हैं जो इन फिल्मों को हिट कर रहे हैं। ‘खटिया सरकाने से लेकर ‘मिस कॉल से लड़की पटाने’ के गीतों पर झूम रहे हैं। वे कौन हैं जो ‘शीला की जवानी’, ‘मुन्नी की परेशानी’ और ‘जलेबी बाई की नादानी’ पर ठुमके लगा रहे हैं और घरों- दफ्तरों, बसों-ऑटो-ट्राम-ट्रेन में हर स्त्री के कपड़े के अन्दर मल्लिका शेहरावत, मलइका या करीना के जिस्म को ढूँढ रहे हैं? वे कौन हैं इसका जवाब तो आईना ही दे सकता है।

मूलतः हम दोहरे चरित्र के लोग हैं प्रचंड पाखंडी। हम दशहरा, दीवाली, बसंत पंचमी आदि त्यौहारों पर दुर्गा, काली, लक्ष्मी, सरस्वती के रूप में मिट्टी की मूरत स्त्री की तो पूजा करते हैं किन्तु घर में सदेह स्त्री के खिलाफ ‘हिंसा’ (भाषिक, भावनात्मक, आर्थिक, लैंगिक शारीरिक हिंसा) करने में हमें कोई संकोच नहीं होता। उसी प्रकार हमें जेंडर जनित भेदभाव, पितृसत्ता का स्त्री विरोधी चरित्र, अश्लील विज्ञापनों-फिल्मों-पोर्नों से कोई शिकायत भी नहीं है और हम कैंडिल मार्च में भी शामिल हैं।

दरअसल जेंडर और पितृसत्ता के भेदभावकारी और उत्पीड़क चरित्र को ‘जातिव्यवस्था’ और ‘बाजारवादी अर्थव्यवस्था’ ने नये आयाम दिये, उसे ज्यादा मारक बनाया। समाज का पिरामिडीय ढाँचा जाति व्यवस्था के शीर्ष पर बैठे पुरूषों को यह हक प्रदान करता रहा है कि वे दलित-आदिवासी और पिछड़ी जातियों की श्रमिक स्त्रियों की देह को अपनी अघोषित सम्पत्ति माने। सी.बी.आई. यह स्वीकार कर रही है कि देश में तीस लाख स्त्रियाँ वेश्यावृत्ति में लगाई गई हैं। वेश्यावृत्ति में लगी इन स्त्रियों का बहुलांश उन्हीं दलित-पिछड़े आदिवासी तबके से आता है, जिन्हें अपनी देह के खिलाफ हिंसा सहने की आदत होश संभालते सिखला दी जाती है। मध्य बिहार ने दशकों इस उत्पीड़न के खिलाफ एक लम्बी लड़ाई लड़ी। समाजवादी-वामपंथी दलों ने संघर्ष में वर्षों लगाये। शहादते दीं। सत्तर के दशक में इस लड़ाई का नेतृत्व विभिन्न मार्क्सवादी-लेनिनवादी संगठनों ने संभाला और बहुत हद तक सफलता भी पाई। आज इस इलाके का सामन्ती-पुरुष, दलित-पिछड़ी स्त्रियों को हाथ लगाने के पहले सौ बार सोचता है। लेकिन हरियाणा, उ.प्र. की स्थिति दूसरी है। एक तो यहाँ इस प्रकार का कोई आन्दोलन दिखता नहीं। दूसरी ओर रियल एस्टेट के दलालों के हाथों अपनी जमीन बेच करोड़पति बनी भूस्वामी जातियाँ बौरा गई हैं। पिछले पाँच-दस सालों में खाप पंचायतें ज्यादा आक्रमक, ज्यादा हिंसक हुई हैं। साथ ही इन इलाकों में दलित स्त्री के देह के साथ उत्पीड़न भी तेजी से बढ़ा है। अगर वाइब्रेंट गुजरात में 18 से 25 वर्ष के आयुवर्ग के पुरूष-स्त्री का अनुपात घटकर छह सौ के आसपास आ गया हो, चंडीगढ़ जैसे सुन्दर-सुसभ्य शहर में यह अनुपात सात सौ के आसपास हो या पंजाब-हरियाणा में यह आठ सौ के आसपास हो तो यह निष्कर्ष क्यों नहीं निकाला जाना चाहिए कि ऐसी शिक्षा और समृद्धि हमें स्त्री के खिलाफ ज्यादा हिंसक बना रही है? हम बढ़ती ट्रेफिकिंग और इस अर्थनीति के बीच सम्बन्ध क्यों नहीं ढूँढें? ट्रेफिकिंग के माध्यम से ही इन इलाकों का वर्चस्वशाली समुदाय का बड़ा तबका स्त्रियों की खरीद कर रहा है और अधिकांश मामलों में उनका इस्तेमाल ‘फैमली वाईफ’ की तरह किया जा रहा है। इस ‘फैमली वाईफ’ को पाँच-सात साल इस्तेमाल करने के बाद या तो वेश्यालयों में बेच दीजिए या मार दीजिए। फिर एक नई ‘फैमली वाईफ’ ले आईए। अगर पिछले 20 वर्षों में 1 करोड़ स्त्रियाँ गायब हुई हों, अगर झारखण्ड जैसे राज्यों से कमाने गई दस लड़कियों में से आठ या सात लड़की ही घर लौट कर वापस आती है तो हमें इस कथित उदारवादी अर्थनीति और स्त्रियों के खिलाफ बढ़ती हिंसा के बीच सम्बन्धों की तलाश क्यों नहीं करनी चाहिए? अजब दुर्योग है कि पुरातन ‘जाति व्यवस्था’ एवं आधुनिकतम ‘उपभोक्तावादी पूँजीवाद’ दोनों ही स्त्रियों के खिलाफ अपने-अपने तरीकों से हिंसा-उत्पीड़न के शातिर हथियार बने हुए हैं।

मध्यवर्गीय स्त्रियों को यह खुशफहमी रहती है कि पुरूष थोड़ा उदार हुआ है। वह घर से निकलने, नौकरी करने की अनुमति दे रहा है। लेकिन अधिकांश मामलों में यह उपभोक्तावादी दबाब है, यह बाजार के प्रोडक्ट्स से घर भरने और ‘क्वालिटी लाईफ’ जीने की ऐषणा है, वही उदार हुई है। पुरुष उदार नहीं हुआ है। वह उदार होता तो साथ-साथ किचेन में भी दिखता। लेकिन घर की दहलीज पर पहुँचते उसे अपने सिर के ऊपर अदृश्य मुकुट का आभास होने लगता है। टी.वी. सेट के सामने का सोफा उसका राजसिंहासन है और रिमोट उसका राजदंड जो या तो पति के हाथों मे रहता है या पुत्र के (राजत्व के उत्तराधिकार का सिद्धांत रिमोट के मामले में भी काम करता है।) भले आप ऑफिस से साथ-साथ काम से लौटी हों, चाय तो आपको ही बनानी है। डिनर भी आपको ही तैयार करना है। अपनी कमाई से कॉस्मेटिक, कपड़े खरीदने पर तो ‘वह’ नहीं टोकेंगे। किन्तु बिना ‘उनसे’ पूछे अपनी बीमार माँ के लिए अपनी कमाई के रुपए भेज कर देखिए। पता लग जायेगा आपको कि अपनी ही कमाई पर आपका कितना हक है? इसीलिए पुरुष उदार हो कर मुक्त नहीं कर रहा। थोड़ी बहुत मुक्ति आई भी है तो वह विज्ञान और तकनीक के कारण आई है। मुक्त किया है गैस के चुल्हे, कुकर, मिक्सी, ओवेन, वाशिंग मशीन, स्कूटी, कन्ट्रासेप्टिव और मोबाईल ने। पितृसत्ता ने अभी आपकी मुक्ति के बारे में विचार नहीं किया है। 

कार्यालय-कार्यस्थल भी जेंडर जनित भेदभाव और पितृसत्तात्मक वर्चस्व से मुक्त नहीं हैं। ‘विशाखा निर्णय’ तो है किन्तु ‘कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न विरोधी बिल’ राज्यसभा में अटका है। कॉरपोरेट कार्यालय तो ऐसे लफड़े में फँसना ही नहीं चाहते उन्हें शिकायत करने वाली महिलाकर्मी को ’फायर’ करना ही सरल समाधान लगता है।

कठोर कानून एक साधन मात्र हैं। वे साध्य नहीं हो सकते। जहाँ सामाजिक-आर्थिक ढाँचे पिरामीडीय स्वरूप के हों वहाँ कानून का लाभ भी कौन उठा पाता है हमें पता है। दहेज के खिलाफ कानून 1961 ई. में बना। 1984 ई. में भारतीय दण्ड संहिता में धारा 304 बी को जोड़कर बहू की संदिग्ध मृत्यु पर न्यूनतम सात साल से अधिकतम आजीवन कारवास तक की सजा, दहेज विरोधी कानून में सम्मिलित कर दी गई। लेकिन इन सबका प्रभाव क्या हुआ हम परिचित है। देहज बढ़ा है या घटा है, हमे पता है।

सीडा (Convention on Elimination of all types of discrimination against women) 1979 एवं इन्दिरा राज सिंह, फ्लेविया एग्निश जैसी महिला विधि विशेषज्ञों के दवाब में घरेलू हिंसा विरोधी कानून 2006 में तो बन गया। किन्तु उसे लागू करने में हमे कितनी रुचि है इसे जानने के लिए इकोनॉमिक एंड पोलिटकल वीकली अगस्त 2011  का लेख ‘द मिसिंग लिंक इन द डोमेस्टिक वायलेन्स ऐक्ट’ पर एक नजर डालिए। हकीकत समझ में आ जायेगी कि कानून बनाना और उसे लागू करने में आसमान-जमीन का फर्क है।

कठोरतम कानून का समाधान सबको भा रहा है। यही वह चोर रास्ता है जिससे सामंती समाज व्यवस्था, पितृसत्ता और उपभोक्तावादी पूँजीवाद बच निकलना चाहता है। वह समस्या की गहरी पड़ताल नहीं चाहता। लेकिन हम क्या चाहते हैं? हम अपनी बेटियों-बहनों के लिए डरे हुए लोग हैं। इसीलिए गुस्से में हैं। मेरी बेटी भी ऑटो में बैठकर कोचिंग के लिए जाती है तो मन घबराता रहता है। यह हम रोज पढ़ते हैं, देखते हैं, महसूसते हैं, इसीलिए उसके घर लौटने तक बेचैन रहते हैं। आखिर कब तक हमारी बेटियाँ अपनी देह को शर्म की तरह ओढ़ती रहेंगी? आंकड़े बता रहे हैं, कि हर 52 मिनट पर एक स्त्री मारी जा रही है और हर 40 मिनट पर उसका बलात्कार हो रहा है। अब हम और कितनी प्रतीक्षा करना चाहते हैं? बदलना होगा। हमें, परिवार की संरचना को, समाज के पिरामिडीय ढाँचे को, राज्य की प्रकृति को, सब को। हम बेटी के जन्म पर काँसे की थाली बजायेंगे, कन्या दान और दहेज को ना कहेंगे, रसोईघर में पत्नी के साथ खड़े होंगे, बेटियों को पोशाक, कैरियर और जीवनसंगी चयन करने की आजादी देंगे, दलित-आदिवासी स्त्रियों के लिए भी इतना ही आक्रोशित होंगे तभी संसद 50 प्रतिशत स्त्रियों के लिए अपने दरवाजे खोलेगी। छोटे-छोटे बदलाव के रास्ते सामंतवाद और उपभोक्तावादी पूँजीवाद के गठजोड़ के खिलाफ बड़ी और गहरी लड़ाई की तैयारी शुरू होगी। लेकिन शुरुआत तो जेंडर, पित्तृसत्ता और जाति व्यवस्था पर की गई चोट से ही होनी है। इसीलिए साथियों अभी सड़कों पर ही रहिए, अभी छोटी-बड़ी कई-कई लड़ाइयाँ साथ- साथ लड़नी है। रात अभी बाकी है साथियों।

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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