हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

कश्मीर-मणिपुर के बलात्कारों पर चुप क्यों रहते हैं आप: अरुंधति रॉय

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/22/2012 05:33:00 PM

मैं नहीं मानती कि दिल्ली रेप कैपिटल है. ये रेप तो वर्षों से चला आ रहा है. ये मानसिकता में समाया हुआ है. गुजरात में मुसलमानों के साथ हुआ, कश्मीर में सुरक्षा बल करते हैं बलात्कार, मणिपुर में भी ऐसा होता है लेकिन तब तो कोई आवाज़ नहीं उठाता है.

खैरलांजी में दलित महिला और उसकी बेटी का रेप कर के उन्हें जला दिया गया था. तब तो ऐसी आवाज़ नहीं उठी थी.

एक सामंती मानसिकता है लोगों की जो तभी आवाज़ उठाती है जब बड़ी जाति के, प्रभुत्व वाले लोगों के साथ दिल्ली में कुछ होता है.

आवाज़ उठनी चाहिए. जो हुआ है दिल्ली में उसके लिए हल्ला तो मचना चाहिए लेकिन ये हल्ला सिर्फ मिडिल क्लास लोगों को बचाने के लिए नहीं होना चाहिए.

छत्तीसगढ़ में आदिवासी महिला सोनी सोरी के साथ भी कुछ हुआ था आपको याद होगा तो. उनके जननांगो में पत्थर डाले गए थे.पुलिस ने ऐसा किया लेकिन तब तो किसी ने आवाज़ नहीं उठाई थी. उस पुलिस अधिकारी को तो साहस का अवार्ड मिला.

कश्मीर में जब सुरक्षा बल गरीब कश्मीरियों का रेप करते हैं तब सुरक्षा बलों के खिलाफ़ कोई फांसी की मांग नहीं करता.

जब कोई ऊंची जाति का आदमी दलित का रेप करता है तब तो कोई ऐसी मांग नहीं करता.

इस बार जब सौ सौ लोग इकट्ठा हुए थे दिल्ली में जब लड़की को नंगा फेका गया था बस से बाहर तो लोग खड़े थे. किसी ने अपना कपड़ा दिया उसको. सब लोग खड़े रहे.

दिल्ली में अमीर-गरीब के बीच भेद तो पहले भी था. अब भी है लेकिन अब वो भी निशाना बन रहे हैं. रेप मुद्दा नहीं है. जब देश का विभाजन हुआ था तब कितने रेप हुए थे अंदाज़ा भी नहीं लगा सकते हम.

एक सामंती मानसिकता है हम लोगों के अंदर.

बलात्कार एक भयंकर अपराध है लेकिन लोग क्या करते हैं. जिस लड़की का रेप होता है उसे कोई स्वीकार क्यों नहीं करता. कैसे समाज में रहते हैं हम. कई मामलों में जिसका बलात्कार होता है उसी को परिवार के लोग घर से निकाल देते हैं.

मेरे पास कोई जवाब नहीं है कि ये सब कैसे ठीक होगा लेकिन मानसिकता की एक बड़ी समस्या है. समाज में बहुत अधिक हिंसा है.

विरोध होना चाहिए लेकिन चुन चुन के विरोध नहीं होना चाहिए. हर औरत के रेप का विरोध होना चाहिए. ये दोहरी मानसिकता है कि आप दिल्ली के रेप के लिए आवाज़ उठाएंगे लेकिन मणिपुर की औरतों के लिए, कश्मीर की औरतों के लिए और खैरलांजी की दलितों के लिए आप आवाज़ क्यों नहीं उठाते हैं.

रेप का विरोध कीजिए इस आधार पर नहीं कि वो दिल्ली में हुआ है या मणिपुर में या किसी और जगह. मैं बस यही कह सकती हूं.  (बीबीसी हिंदी से साभार)

धरती के अभागो, उठो: फ्रांज फैनन

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/06/2012 10:25:00 PM


आप इसमें मार्क्स को सुन सुकते हैं. इन पंक्तियों में लेनिन बोल रहे हैं और माओ त्से तुंग और हो ची मिन्ह. ये आंबेडकर की आवाज भी है और अमिल्कर काबराल की भी. इसे लिखा है फ्रांज फैनन ने और किताब का नाम है द रेचेड ऑफ द अर्थ. ये इस किताब का आखिरी अध्याय है, जिसे निष्कर्ष के नाम से जाना जाता है.

1961 में आज के दिन ही फैनन का निधन हुआ था. फैनन ने अश्वेतों समेत पूरी दुनिया के वंचित मेहनतकशों, आदिवासियों, उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं की अनेक पीढ़ियों को लड़ना सिखाया, उनको लड़ने की ऊर्जा, जरूरत, औचित्य और विचारधारा दी. वे पीड़ा और व्यथा के बुद्धिजीवी नहीं थे. उन्होंने धरती के अभागों की व्यथाओं को क्रांतिकारी व्यवहार की रोशनी में समझा, उनकी गलतियों को भी और उनकी कमजोरियों को भी. और फिर लड़ने की एक क्रुद्ध, गंभीर और सचेत की विचारधारा दी जिसे और हिंसक संघर्ष से कोई परहेज नहीं है. माओ की तरह ही वे भी जटिल और अबूझ शब्दावलियों से बचते हैं और सीधे अपनी जनता को संबोधित करते हैं. उनकी किताबें द रेचेड ऑफ द अर्थ, ब्लैक स्किन व्हाइट मास्क्स, टुवर्ड्स द अफ्रीकन रिवॉल्यूशन और अ डाइंग कोलोनियलिज्म हर तरह के उपनिवेशवाद के खिलाफ जनता के हाथ में मौजूद सबसे धारदार हथियारों में से हैं और उनको भारत की दलित और आदिवासी जनता की स्थिति और उनकी मुक्ति के संघर्षों की रोशनी में जरूर ही पढ़ा जाना चाहिए.

पेशे से मनोचिकित्सक रहे फैनन ने अपना अधिकतर लेखन अल्जीरियाई मुक्ति आंदोलन की हिमायत में लिखा. और अल्जीरिया की क्रांतिकारी पार्टी एफएलएन (नेशनल लिबरेशन फ्रंट) के साथ मिल कर काम भी किया. पार्टियों की सदस्यता को अपनी व्यक्तिगत ख्याति की राह में बाधा समझने वाले बुद्धिजीवियों के बरअक्स फैनन एक शानदार मिसाल थे, जिन्होंने अपना जीवन अल्जीरियाई जनता की मुक्ति के कठिन संघर्ष को सौंप दिया और फ्रंट के साथ मिलकर उसकी क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लेते रहे. वे पार्टी और संगठन से नफरत करने वाले बुद्धिजीवी नहीं थे. उन्होंने फ्रंट पर होनेवाले हमलों के जवाब दिए, अल्जीरियाई मुसलिम जनता पर लगाए जानेवाले ‘पिछड़ेपन’ और ‘मजहबपरस्ती’ के आरोपों को बेमानी बताते हुए औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ संघर्ष में इस ‘पिछड़ेपन’ और ‘मजहबपरस्ती’ की हिमायत की, फ्रंट को एक मजबूत वैचारिक आधार दिया. वे 1954 में फ्रंट से जुड़े और 1956 में इसके अखबार अल मुजाहिद के संपादक बने. चार साल बाद जब अल्जीरिया में एक बागी क्रांतिकारियों ने प्रोविजनल सरकार बनाई तो फैनन को उन्होंने घाना में अपना राजदूत बना कर भेजा. अपने आखिरी दिनों में बीमार फैनन ने मृत्यु शय्या पर बोल कर अपनी प्रख्यात कृति द रेचेड ऑफ द अर्थ लिखवाई थी, जो अपने प्रकाशन के बाद से दुनिया भर की उत्पीड़ित जनता को राह दिखा रही है.

बाबा साहेब का निधन उनसे बस चार साल पहले हुआ. दुनिया के सबसे दबे और कुचले लोगों के रहनुमाओं में से एक बाबा साहेब ने जाति व्यवस्था के उन्मूलन के एजेंडे को समाज के बदलाव की अगली कतार में स्थापित किया. आज जिस तरह कुछ दलितवादी बुद्धिजीवियों और आंदोलनों ने जाति उन्मूलन के एजेंडे को दरकिनार कर दिया है वह बाबा साहेब के सपनों और दलित-पिछड़े तबके की आकांक्षाओं के साथ गद्दारी है.

और आज ही के दिन बीस साल पहले बाबरी मस्जिद गिरा दी गई. पेश है, 6 दिसंबर की, संयोगों और दुर्योगों से भरी इस तारीख के नाम, फैनन की, दिलों में आग लगा देने वाली यह रचना.
इसका अनुवाद मनीष शांडिल्य ने किया है.

निष्कर्ष



इसलिए कामरेडों आओ; एक झटके से हमें अपनी राह बदलनी होगी और ऐसा करना बेहतर भी होगा. हमें उस घोर उदासी को पीछे छोड़ कर आगे बढ़ना चाहिए जिसमें हम डूबे हुए हैं. जो नई सुबह आ चुकी है, उसकी नजरों में हम अटल, विवेकी और कृतसंकल्प रहें.

हमें अपने सपनों को पीछे छोड़ देना चाहिए और पुरानी मान्यताओं एवं जीवन के प्रारंभ के पहले के समय से अपनी मित्रता का परित्याग कर देना चाहिए. आइए लितानीज (ईसाइयों में एक साधारण प्रार्थना की रीति) और घृणास्पद नकल को बांझ बनाने में बिल्कुल भी समय न गंवाएं. आइए उस यूरोप को अलविदा कह दें जहां वे कभी इंसान को इंसान नहीं समझते हैं, लेकिन वे जहां भी इंसानों को पाते हैं उनकी हत्या करते हैं. ऐसा वे अपनी गलियों में आने वाले हरेक के साथ करते हैं और दुनिया के सभी हिस्सों में भी. सदियों से इन्होंने लगभग पूरी दुनिया को तथाकथित आध्यात्मिक अनुभवों के नाम पर दबाया हुआ है. आज देखें इनको, ये परमाणु और आध्यात्मिक विघटन के बीच झूल रहे हैं.

और, इसके बावजूद यह कहा जा सकता है कि यूरोप बहुत हद तक अपने हरेक प्रयास में सफल रहा हैं.

यूरोप जोश, सनक और हिंसा के जरिए दुनिया का रहनुमा बना. देखिए कैसे उसके महलों की काली छाया लगातार लंबी होती जा रही है! उसका हर एक कदम समय और सोच के विस्तार की राह में अचानक आ कर खड़ा हो जाता है. यूरोप ने मानवता और विनम्रता को न सिर्फ पूरी तरह से अस्वीकार किया है; बल्कि उसने हरेक तरह की चिंता और करूणा से भी मुख मोड़ लिया है.

वह मानवता के प्रति कंजूस रही है; उसने सिर्फ इंसानों की हत्या ही की है और उन्हें निगला है.

इसलिए, मेरे भाइयों, हमें क्यों यह समझ नहीं आता कि यूरोप का अनुसरण करने के अलावा भी हमारे पास दूसरा बेहतर रास्ता है?

यूरोप, जहां कभी इंसान की बात नहीं की जाती थी और जो कभी इसका ढिंढोरा पीटने से भी नहीं चूका कि सिर्फ वही इंसान की भलाई के लिए चिंतित है. लेकिन आज हम जानते हैं कि उनके विचारों की हर एक जीत की क्या कीमत मानवता ने चुकाई है.

इसलिए कामरेड्स आओ; यूरोप का खेल अंततः खत्म हो चुका है. हमें कुछ नया तलाशना चाहिए. हम हर मंजिल पा सकते हैं, अगर हम यूरोप की नकल न करें, अगर हम यूरोप की बराबरी करने के लिए पागल नहीं हैं.

आज यूरोप ने अपनी उन्मत्त और लापरवाह विकास के कारण हर तरह के नेतृत्व और बहस से पीछा छुड़ा लिया है और वह बड़ी तेजी से रसातल में जा रहा है. हमें पूरी मुस्तैदी से इससे बचना होगा.

साथ ही यह भी सच है कि हमें एक मॉडल की जरूरत है और हमें योजना और आदर्श चाहिए. हम में से बहुतों को यूरोपीय मॉडल आकर्षित नहीं करता है. पिछले पन्नों में हमने देखा है कि नकल के कारण हमें कैसे शर्मनाक झटके लगे हैं. यूरोपीय उपलब्धियां, यूरोपीय तकनीक और यूरोपीय शैली के प्रति अब हमें आकर्षित नहीं होना चाहिए और ऐसा करना हमें डगमगा देगा.

मैं जब यूरोप की तकनीक और शैली में ढले इंसानों की खोज करता हूं तो सिर्फ झूठे इंसानों की पीढ़ी और सफेदपोश हत्यारों को ही पाता हूं.

इंसानों के हालात, मानव जाति की योजनाएं और मानवता के संपूर्ण उत्थान को अंजाम देने वाले कार्यों में इंसानों के बीच सहयोग जैसी नई चुनौतियां हैं, जो नए तदबीरों की मांग करती हैं.

आइए यूरोप की नकल न करने का फैसला करें; आइए अपने श्रम और सोच को एक नई दिशा में लगाएं. आइए ऐसे संपूर्ण मानव का निर्माण करने की कोशिश करें जिसमें यूरोप सफलता का जश्न मनाने का भाव पैदा करने में नाकामयाब रहा था.

दो सदी पहले, यूरोप के एक पुराने उपनिवेश ने यूरोप की बराबरी करने का फैसला किया. वह इतना ‘सफल’ रहा कि संयुक्त राज्य अमेरिका एक ऐसा दैत्य बन गया और उसमें यूरोप के कलंक, रोग और क्रूरता को भयावह विस्तार मिला है.

कामरेडों, क्या हमारे पास तीसरा यूरोप बनाने के अलावे और कोई दूसरा काम नहीं है? पश्चिम खुद को आध्यात्मिक अभियानी के रूप में देखता है. विचारधारा के नाम पर, यूरोप की विचारधारा के नाम पर ही यूरोप ने अतिक्रमण किए हैं, उसने अपने अपराधों को उचित ठहराया है और उस गुलामी को वैधता प्रदान किया है जिसमें उसमें अस्सी प्रतिशत मानवता को कैद कर रखा है.

हां, यूरोपीय विचारधारा की जड़ें विचित्र जगहों पर धंसी हुई हैं. सभी यूरोपीय विचारों ने ऐसे जगहों पर आकार लिया जो बहुत ही उजाड़ थे और संकटों से बुरी तरह घिरे हुए थे. और इस तरह रीति-रिवाज ऐसी जगहों पर फूले-फले जहां इंसानों की आवाजाही बहुत कम थी.

खुद से निरंतर संवाद और बहुत ही अश्लील अहंकार किसी अर्द्ध उन्मादी राज्य के लिए तैयार किए जाने वाले रास्ते में रोड़ा नहीं बनता है, जहां बौद्धिक काम पीड़ा बन जाता है और वास्तविकता वैसी नहीं होती जैसी एक जीवित मनुष्य, उसके कार्य और सृजन की होनी चाहिए, बल्कि इसके उलट वास्तविकता शब्दों, शब्दों के विभिन्न संसर्गों और शब्दों में छिपे अर्थ से फूटने वाले विस्तार में अभिव्यक्त होती है. इसके बावजूद यूरोप के कुछ लोगों ने यूरोपीय श्रमिकों को इसके लिए प्रेरित किया कि वे इस अहंकार को तोड़ें और इस काल्पनिकता से पीछा छुड़ाएं.

लेकिन आम तौर पर, यूरोप के श्रमिकों ने उन आवाजों को अनसुना कर दिया. श्रमिकों की भी मान्यता है कि वे भी यूरोपीय विचारधारा के भयंकर अभियानों का हिस्सा रहे हैं.

विभिन्न काल खंडों में, मानवता की जटिल समस्याओं के समाधान के सभी तत्व यूरोपीय विचारधारा में मौजूद रहे हैं. लेकिन यूरोप के लोगों की कार्रवाइयों ने उन लक्ष्यों को पूरा नहीं किया जो उनकी जिम्मेवारी थी और जिसमें इन तत्वों को लागू करने के लिए हिंसक तरीके से अपना पूरा जोर लगाना, उनके बनावट और प्रक्रिया को रूपांतरित करना, उनको बदलना और अंततः मानव जाति के समस्याओं को बहुद हद तक ऊंचे स्तर पर ले जाना शामिल था.

आज हम यूरोप की जड़ता के बीच उपस्थित हैं. कामरेडों, आइए उस गतिहीन आंदोलन से बचें जिसमें धीरे-धीरे तर्कशास्त्र संतुलन के तर्क में तब्दील होता जा रहा है. आइए मानव जाति के प्रश्नों पर फिर से विचार करें. आइए दिमागी वास्तविकताओं और मानवता के सभी चिंतनशील समूहों, जिनके बीच संबंधों को मजबूत करना, जिनके रास्तों को रंग-बिरंगा करना और जिनके संदेशों को फिर से मानवीय बनाना जरूरी है, के प्रश्नों पर फिर से विचार करें.

साथियों आओ, चंदावल या रीयरगार्ड (लौटती फौज की अंतिम पंक्ति की रक्षा हेतु भेजी गयी सेना) की भूमिका निभाने के लिए हमें अभी बहुत कुछ करना है. यूरोप ने वही किया है जिसका बीड़ा उसने उठाया था और कुल मिलाकर उसने अपने काम को अच्छे से अंजाम दिया है. आइए उसे कोसना बंद करें. लेकिन साथ ही उसे दृढ़तापूर्वक यह भी बता दें कि वह अपने कृत्यों को महिमा-मंडित न करे. अब हमें कोई डर नहीं है, इसलिए आइए उससे ईष्र्या करना बंद करें.

तीसरी दुनिया आज उस विशाल जनसमूह की तरह यूरोप का सामना कर रही है, जिसका मकसद उन समस्याओं को हल ढूंढना है यूरोप जिन सवालों के उत्तर ढूंढने में विफल रहा था.

लेकिन यह साफ कर लेना जरूरी है कि प्रयास के परिणाम, तीव्रता और लय के बारे में चर्चा बंद करना भी महत्त्व रखता है.

नहीं, प्रकृति की ओर वापस लौटने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता है. इंसानों को विकृति की ओर नहीं घसीटने, तेजी से दिलो-दिमाग से स्मृतियों को मिटाने वाले और मस्तिष्क को विनष्ट करने वाले विचारों को न थोपने का सवाल बहुत ही महत्त्वपूर्ण है. बराबरी के बहाने इंसानों पर धौंस जमाने या उन्हें उनके वजूद या उनकी निजता से दूर करने की कोशिश नहीं की जानी चाहिए. न ही इस बहाने उन्हें वश में करना चाहिए और न ही उनकी हत्या की जानी चाहिए.

नहीं, हम किसी की बराबरी नहीं करना चाहते हैं. हम हमेशा, रात और दिन, आगे बढ़ना चाहते हैं. इंसानों के साथ और सभी इंसानों को साथ लेकर. कारवां इतना लंबा भी नहीं होना चाहिए कि हरेक पंक्ति मुश्किल से यह देख सकें कि उसके आगे कौन है और अपरिचित लोग आपस में कम-से-कम मिलें और बातें करें.

यह तीसरी दुनिया के नए इतिहास की शुरूआत से जुड़ा सवाल है. यह इतिहास उन अजीब शोधों का भी सम्मान करेगा जो कभी यूरोप द्वारा प्रस्तुत किए गए थे, लेकिन यह यूरोप के अपराधों को नहीं भूलेगा. इन अपराधों में सबसे भयावह वे हैं जिसे लोगों ने मानसिक स्तर पर अंजाम दिया है. साथ ही ये अपराध यूरोपीय कृत्यों के तर्कहीन आलोचना और उनकी एकता के ढह कर बिखरने का नतीजा थे. और जहां सामूहिकता के दायरे में सामाजिक विभेदन और स्तरण था एवं वर्गों के बीच खूनी तनाव था. इतना ही नहीं मानवता के विशाल पैमाने पर नस्लीय घृणा, गुलामी, शोषण था और इन सबसे ऊपर वह रक्तहीन नरसंहार था जिसमें करोड़ों लोगों को उपेक्षित छोड़ दिया गया था.

इसलिए कामरेड्स, ऐसे राज्यों, संस्थानों और समाजों का निर्माण कर यूरोप को श्रद्धांजलि अर्पित न करें जो उससे ही प्रेरणा ग्रहण करते हैं.

ऐसे अनुकरण, जो कि बहुत हद तक घृणित भोंडा नकल होगा, से इतर मानवता को हमसे कुछ और अपेक्षित है.

अगर हम अफ्रीका और अमेरिका को नए यूरोप में तब्दील करना चाहते हैं तो बेहतर होगा कि आइए अपना भविष्य यूरोपीय देशों के भरोसे ही छोड़ दें. हममें से सबसे योग्य व्यक्ति के मकाबले वे इस काम को ज्यादा बेहतर तरीके से अंजाम देंगे.

लेकिन अगर हम चाहते हैं कि मानवता एक कदम आगे बढ़े, अगर हम यूरोप के मुकाबले मानवता को एक नई ऊंचाई पर ले जाना चाहते हैं तो हमें आविष्कार और नए खोज करने चाहिए.

अगर हमारा सपना यह है कि हम अपने लोगों की अपेक्षाओं पर खरे उतरें, तो हमें निश्चय ही यूरोप से इतर दूसरी जगह जवाब तलाशने होंगे.

इसके अलावा, अगर हम यूरोप के लोगों की अपेक्षाओं पर भी खरा उतरना चाहते हैं तो कहीं से भी उनके समाज के विचारों, आदर्श विचारों को भी, और उनकी सोच जिससे समय-समय पर वे बहुत हद तक ग्रसित रहे हैं, को वापस थोपना श्रेयस्कर नहीं है.

यूरोप के लिए, खुद अपने लिए और मानवता के लिए, कॉमरेडों, आइए हम एक नया इतिहास लिखें, हम नये विचारों की खोज करें और नये लोगों को सक्रिय करें.

बाबरी का पुनर्निर्माण इंसाफ का तकाजा है

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/06/2012 01:33:00 AM



बनोज्योत्स्ना की अंग्रेजी कविता का हिंदी अनुवाद. यह उस वादे की याददिहानी के रूप में कि जालिम सल्तनतों ने जनता का अब तक जो कुछ भी तबाह किया है, उसे दलित, आदिवासी, मुस्लिम जनता की नई जनवादी क्रांति फिर से बनाएगी. बाबरी मस्जिद भी उनमें से एक है...तो बूनो की यह कविता. मूल अंग्रेजी कविता यहां पढ़ सकते हैं.


बीस साल
धूल में मिला दिए जाने के बीस साल
मगर अपनी सांसें रोक लो और देखो
यह अब भी वहीं है...
उसकी गुंबदों को धूप अब भी चूमती है

खामोशी को भेदते हुए अजान
उठता है अब भी

बीस साल
लेकिन मुंबई की सड़कों पर
खून के निशान अब भी ताजा हैं

कहते हैं कि वक्त भर देता है घावों को
पर हर गुजरते साल के साथ
हर कत्लेआम के साथ
हर पाखंड
और हर तमाशे के साथ
इंसाफ के चेहरे पर जख्म गहरे होते जाते हैं...
खून की बू तेज होती जाती है

लेकिन अपनी ये मुट्ठियां
बदले और प्रतिरोध की जिद में कसे हुए
हम लड़ेंगे कॉमरेड
क्योंकि इसको छोड़ कोई दूसरा रास्ता नहीं है
और हम लड़ेंगे
आसमान की चादर को बाबरी की गुंबदों से फिर से सजाने के लिए
सफेद कबूतरों की परवाज को बाबरी का आंगन लौटाने के लिए

और इन्कलाब
बनाएगा फिर से
इंसानियत के हर उस टुकड़े को
उन सारी चीजों को
जिन्हें तोड़ दिया गया है

तुम कैसे कैद रह सकती हो दयामनी दी

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/02/2012 08:51:00 PM

रणेन्द्र की ये कविताएं संघर्षरत आदिवासियों की आवाज नहीं हैं, उस संघर्ष का हिस्सा हैं.


समझिए साहब


कैसे समझाए साहब
ये खतियान में दर्ज
जमीन के टुकड़े भर नहीं हैं,
हमारे खेत
हमारी भूख का विस्तार हैं
हमारे होने के सबूत।

यहाँ की हवा में
हमारे पूर्वजों की साँसें धुली हैं,
उनकी देह का ताप शेष है
इस पीली धूप में अब भी ।

सब जानते हैं साहब
विश्वविजयी हैं
आपके यज्ञ के अश्व,
आपकी चतुरंगिणी सेना,
अरज बस इतनी
यहाँ आहिस्ता धरिएगा पाँव,
यह मिट्टी,
हमारे पूर्वजों की राख से बनी है,
उनके पसीने की नमकीन गंध
और हमारे बच्चों की किलकारियाँ
उठंग कर सोई हैं वहीं ।

हरीतिमा की गहरी जड़ों से
जुड़ी हैं हमारी सभ्यता की जड़ें
पहाड़, नदी, पेड़ों में
हमारे देवताओं का वास है ।

और इस साखू का क्या करेंगे
जिसकी जड़ें मरती ही नहीं
हर चट्टान फोड़ कर फुनगती हैं ।

हर गरजन पर भारी हैं
महुआ के टपकने
गुलईंची के खिलने
और धान में दूध भरने की ध्वनियाँ
और आपको
कैसे समझाए साहब?



आज्ञा


1
आज्ञाकारी सेवक
आज्ञाकारी शिष्य
आज्ञाकारी पुत्र
आज्ञाकारी भाई
आज्ञाकारिणी पत्नी
आज्ञाकारिणी जनता
आज्ञाकारी होना
सुखी होना है
बिना सुख को जाने

2
आज्ञाएँ
ऊँची जगहों से बरसती हैं
पालन करवाने के आवेश,
आवृत हिंसा के आवेग से भरी
आज्ञाकारी होना
अपना सम्मान बचाना है
बिना सम्मान के भाव को जाने

3
आज्ञा देने वालों की
गरदने तनी होती हैं
शीश पर मुकुट का आभास
आज्ञाकारी की गरदन झुकी
पीठ पर कोड़ों का अहसास
आज्ञाकारी होना
दंडधारियों से बच निकलना है
आजादी और बराबरी से नजरें चुराये


दयामनी दी कैद में


1
जंगल पहाड़ की बेटी की राह में
वे पहाड़ खड़ा करना चाहते हैं
और घना जंगल भरना
उनकी इस सादगी पर
वह ठठा कर हँस रही है

2
भूख से मजबूत
कोई जंजीर नहीं
गरीबी से बढ़कर
नहीं कोई ऊँची दीवार
वे जेल की दीवार ऊँची कर रहे
इस मासूमियत पर
वह मुस्कुरा रही है।

3
वनों की हरीतिमा
तुम्हारी निगाहों में,
छोटानागपुर का पठार
तुम्हारे कांधे का विस्तार,
साँसों में सारंडा-नेतरहाट की हवा,
धमनियों में
स्वर्णरेखा, शंख, कोयल, दामोदर की धारा,
जैसे
क्षिति, जल, पावक, गगन, समीर के अंशों से
बनी तुम, तुम्हारी देह
वैसे ही
तुम्हारे भी अंश उन पाँच तत्वो में
अब वनों की हरीतिमा
जल की शीतलता
मिट्टी की कोख
धूप की ताप को
कैसे कैद कर सकता है कोई
तुम कैसे कैद रह सकती हो
दयामनी दी।

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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