हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

एदुआर्दो गालेआनो: आज की भाषा की उलटबांसियां

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/29/2012 06:11:00 PM


लातिन अमेरिकी पत्रकार और लेखक एदुआर्दो गालेआनो ने सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक जीवन के विभिन्न पहलुओं की असंगतियों, विडंबनाओं और विद्रूपों को अपनी चर्चित किताब वर्ल्ड अपसाइड डाउन में दिए गए बॉक्सों में सूत्रबद्ध करने की कोशिश की है. जेएनयू में स्पेनी भाषा से शोध कर रहे पी. कुमार मंगलम इस किताब का अनुवाद कर रहे हैं और इसे उन्होंने नाम दिया है: उलटबांसियां: उल्टी दुनिया की पाठशाला. पेश है इसी किताब का एक अंश जिसमें भाषा की मदद से हमारी दुनिया में किए गए उलटफेरों का जिक्र किया गया है. इसी किताब का एक और अंश यहां पढ़ा जा सकता है.

आज की भाषा


इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया के राज में किसी जवान लड़की के सामने अपनी पैंट दिखाना सख्त मना था। आजकल भी कुछ बातें ऐसी हैं जिन्हें खुले रूप में कहना और पेश करना अच्छा नहीं समझा जाता है।

पूंजीवाद को बाजार का लुभावना चेहरा और नाम दिया जाता है।

उपनिवेशवाद को ग्लोबलाइजेशन (वैश्वीकरण) कहा जाता है।

विकसित देशों का उपनिवेशवाद झेलते देशों को विकासशील कहा जाता है। यह वैसे ही है जैसे कि बौने रह गए लोगों को बच्चा कहा जाए।

सिर्फ़ अपने बारे में सोचने को अवसरवाद नहीं बल्कि व्यावहारिकता कहा जाता है। धोखेबाजी को समय का तकाजा बताया जाता है।

गरीबों को कम  आय वर्ग के लोग कहा जाता है।

गैरबराबरी बढ़ाने वाली शिक्षा व्यवस्था जब गरीब बच्चों को  शिक्षा से बेदखल करती है तो इसे उनका पढ़ाई-लिखाई छोड़ना बता दिया जाता है।

मजदूरों को बिना किसी कारण और मुआवजे के काम से बेदखल किये जाने को श्रम बाजार का उदारीकरण बताया जाता है।

सरकारी दस्तावेजों की भाषा औरतों के अधिकार को अल्पसंख्यक अधिकारों में गिनती है  मानो  पुरुषों का आधा हिस्सा ही सबकुछ हो।

तानाशाही को अखबारों में सामान्य उठापटक की तरह पेश किया जाता है।

व्यवस्था जब लोगों को यातनाएं देती है तो इसे पुलिसिया प्रक्रिया की गलती या शारीरिक-मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की कोशिश बता दिया जाता है।

जब धनी परिवार का कोई चोर पकड़ा जाता है तो इसे चोरी नहीं बल्कि एक बुरी लत बताया जाता है।

भ्रष्ट नेता जब जनता का पैसा हड़प जाते हैं तो इसे उनकी अवैध कमाई बताया जाता है।

मोटरकारों से सड़क पर बरसती मौत को दुर्घटना कहा जाता है।

नेत्रहीनों को दृष्टिहीन कहा जाता है। काले लोगों को अश्वेत कहा जाता है।

कैंसर और एड्स न कहकर लंबी और कष्टदायी बीमारी कहा जाता है। हृदयाघात को अचानक जोर से पैदा होने वाला दर्द बताया जाता है।

कभी भी लोगों का मार दिया जाना नहीं बताया जाता, वे तो गायब बताए जाते हैं। मरने वाले उन इंसानों को भी नहीं गिना जाता जिनकी हत्या सेना की  कार्यवार्ईयों में होती है।

युद्ध में मारे गए लोग युद्ध से हुए नुकसान में गिन लिए जाते हैं। जो आम जनता इन युद्धों का शिकार होती है, वह तो महज टाली जा सकने वाली मौतें होती है।

1995 में फ्रांस ने दक्षिणी प्रशांत महासागर में परमाणु विस्फोट किये। तब न्यूजीलैंड में फ्रांस के राजदूत ने आलोचनाओं को खारिज करते हुए कहा ‘‘मुझे यह बम शब्द अच्छा नहीं लगता, ये फटने वाले कुछ उपकरण ही तो हैं।’’

कोलंबिया में सुरक्षा के नाम पर लोगों की हत्या करने वाले सैन्य बलों का नाम ‘सहअस्तित्व’ था।

चिली की तानाशाह सरकार द्वारा चलाए गए यातना शिविरों में से एक का नाम ‘सम्मान’ था। उरुग्वे में तानाशाही की सबसे बड़ी जेल को ‘स्वतंत्रता’ का नाम दिया गया था।

मेक्सिको के चियापास क्षेत्र के आक्तेआल में प्रार्थना कर रहे 45 किसानों, ज्यादातर महिलाएं और बच्चे, की हत्या करने वाले अर्धसैन्य बल का नाम ‘शांति और न्याय’ था। उन सभी को पीठ में गोली मारी गई थी।

अच्छे लोगों का मिथक

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/09/2012 01:33:00 PM

 
इन दिनों आईआईटी, खड़गपुर में पढ़ा रहे आनंद तेलतुंबड़े यहां अरविंद केजरीवाल के अपने विश्लेषण के जरिए भारतीय व्यवस्था, इसके क्रांतिकारी विरोध और नव उदारवादी अर्थव्यवस्था में भ्रष्टाचार की जगह पर रोशनी डाल रहे हैं. तेलतुंबड़े अपने ब्राह्मणवाद और साम्राज्यवाद विरोधी क्रांतिकारी लेखन और अपनी राजनीतिक-सामाजिक सक्रियता के लिए जाने जाते हैं. खैरलांजी पर उनकी किताब को देश और दुनिया में बेहद सराहना मिली है. मूल अंग्रेजी लेख हार्डन्यूज में प्रकाशित. हाशिया पर साभार. अनुवाद: रेयाज
 
आप बस अरविंद केजरीवाल की तारीफ कर सकते हैं. जिस उत्साह के साथ उन्होंने भ्रष्टाचार के मुद्दे के आगे सारे मुद्दों को फीका कर दिया है, जिस रणनीति के तहत उन्होंने लोगों को जुटाने के लिए अन्ना हजारे के नैतिक प्रभुत्व का इस्तेमाल किया, जिस कौशल से वो हजारे और उनकी टीम के साथ तकरार से निबटे, जिस खूबी के साथ वो राजनीति में दाखिल हुए, जिस फुर्ती के साथ उन्होंने जाहिर विरोधाभासों को छुपाया, और जिस अनथक उत्साह के साथ वो अपने आप को आगे बढ़ा रहे हैं, ऐसी कोई दूसरी मिसाल आसानी से नहीं मिलती. इन दिनों किसी सार्वजनिक हित के मुद्दे का इस्तेमाल करते हुए, नवउदारवादी चक्कियों में पिसते हुए, बिखर रहे अलग-अलग व्यक्तियों को आकर्षित करना आसान नहीं है, और इसे एक साल से ज्यादा वक्त तक बरकरार रखना एक औसत उपलब्धि नहीं है. भले उनसे सहमत हों या नहीं, उन्होंने इस देश के राजनीतिक क्षितिज पर एक निशान छोड़ दिया है और व्यवस्था के इस अहम पहलू को उजागर किया है कि यह जनवादविहीन है.

ऐसा उन्होंने कैसे किया? वो जिस राजनीति में कूद पड़े हैं, क्या वो उसे आगे बढ़ा पाने में कामयाब हो पाएंगे? ये कुछ सवाल हैं जो इस संदर्भ में प्रासंगिक रूप से उठ खड़े हुए हैं.

भारत अनेक गंभीर समस्याओं से ग्रस्त है जैसे कि गरीबी, तेजी से बढ़ती असमानता, कुपोषण, अल्पपोषण, नवजात मृत्यु दर, बीमारियां, साफ-सफाई, पेयजल, भोजन, शिक्षा, किसानों की आत्महत्याएं, बढ़ती आपराधिकता और इसी तरह की समस्याएं. सीधे-सीधे आबादी के पांच में से चार हिस्से इससे पीड़ित हैं. हालांकि संभवत: इनमें से एक भी समस्या केजरीवाल के लोगों को नहीं सूझी होती. असल में एक समस्या के बतौर भ्रष्टाचार को और उसके समाधान के बतौर जन लोकपाल को चुनना एक गहरी चाल थी.

ऐसा इसलिए नहीं कि भ्रष्टाचार कम आमदनी वाले तबकों को सबसे ज्यादा परेशान करने वाली व्यापक समस्या है. बल्कि इसलिए क्योंकि भ्रष्टाचार राजनीतिक वर्ग और राज्य की संरचना के साथ जुड़ा हुआ है, जिनसे नव उदारवाद के दौर का बाजार-प्रेमी मध्यवर्ग खास तौर से नफरत करता है. अगर इस मुद्दे को महज भ्रष्टाचार तक छोड़ दिया जाता तो यह उतना आकर्षक नहीं रहा होता. इसलिए इसमें संतुलन लाने के लिए जन लोकपाल के रूप में एक एकांगी समाधान भी पेश किया गया.


नवउदारवाद की खासियत है कि उसके पास किसी भी समस्या का फौरी समाधान
मौजूद होता है. यह हर चीज को अलग-थलग संबंधों में देखता है और उन्हें इसके व्यवस्थागत संबंधों से अलग कर देता है. विभिन्न संस्थाएं जिस जटिल तानेबाने का हिस्सा होती हैं, उसे इसकी वजह से  स्वाभाविक रूप से नजरअंदाज कर दिया जाता है. जब मार्ग्रेट थैचर ने कहा था कि समाज जैसी कोई चीज नहीं होती, कि सिर्फ व्यक्ति और उनकी समस्याएं होती हैं, तो वो मूल रूप से नवउदारवादी विचारधारा की ही व्याख्या कर रही थीं. एक अलग-थलग व्यक्ति की किसी समस्या की वजह उसके भीतर प्रतिस्पर्धात्मकता की कमी बता दी जाती है, इसका समाधान ये है कि वो ज्यादा कड़ी कोशिश कर सकता है.

जन लोकपाल का समाधान मौजूदा ढांचे के भीतर भ्रष्टाचार का एक फौरी समाधान है. इस तरह केजरीवाल के पास दोनों हैं, समस्या भी और समाधान भी. और दोनों ही फलते-फूलते नवउदारवादी मध्य वर्ग को सीधे-सीधे आकर्षित करते हैं.

भ्रष्टाचार की समस्या के प्रति आकर्षण का दूसरा पहलू ये है कि इसे बाजार के तर्क की एक विकृति के रूप में देखा गया है. यह वैश्विक बाजार में ‘ब्रांड इंडिया’ पर एक कलंक है और भारत के एक ‘महाशक्ति’ बनने की राह में एक गंभीर बाधा है. पहले के चार दशकों के दौरान अपमानजनक हिंदू वृद्धि दरों से परे जीडीपी वृद्धि में बढोतरी ने भारत में इन लोगों को उत्साह से भर दिया है. वो भ्रष्टाचार को अपनी संभावनाओं को नुकसान पहुंचाते देखने से नफरत करेंगे. जो भी हो, एक वर्ग के बतौर उनके अपने हित तो इसके उभार से ही जुड़े हैं. मौजूदा ढांचे के भीतर ही समस्या और समाधान की इस समझ ने, जिसने उनकी अपनी दुनिया पर ही तबाही का खतरा पैदा कर दिया है, शहरी मध्यम वर्गों का ध्यान इसकी तरफ खींचा है और उनको केजरीवाल के आसपास जमा होने को मजबूर किया है. उनको भरोसा है कि एक बार जन लोकपाल लागू हो जाए, फिर भ्रष्टाचार की ज्यादातर समस्या हल हो जाएगी.

उनकी लामबंदी में सबसे पहले तो हजारे के मसीहाई शुभंकर ने उत्प्रेरक की भूमिका निभाई. भ्रष्टाचार के मुद्दों पर महाराष्ट्र में ताकतवर नेताओं से भिड़ने के साहस, कठोर अनुशासित जीवन और सीधी बातों ने पहले ही नैतिक रूप से उनका कद बढ़ा दिया था. हजारे गांधी नहीं है लेकिन लोगों को आकर्षित करने के गांधी के करिश्मे की याद दिलाते हैं. सरकार को अपेक्षा थी कि मध्यवर्ग का सब्र चुक जाएगा और इसने एक नपी-तुली प्रतिक्रिया जताई, शुरू में तो उसने नजरअंदाज किया, फिर इसे भाजपा की बी टीम का कह कर उसकी निंदा की और फिर उससे बातचीत में मशगूल हुई.

भ्रष्टाचार से नफरत करनेवाले नवउदारवादी मध्यम वर्गों और बाजार के लेन-देन के लिए भ्रष्टाचार को एक स्नेहक या लुब्रिकेंट के रूप में लेने वाले नवउदारवादी शासकीय वर्गों के नजरिए में टकराव पैदा हुआ. बहसें बीच में रुक गईं. सरकार ने शर्मिंदगी छुपाने के लिए संसदीय शुद्धता का अपना वही पुराना राग अलापा और टीम अन्ना को जनादेश हासिल करने की चुनौती दी. राजनीति की गंदगी को सरेआम भला-बुरा करने के बाद टीम अन्ना के लिए इसके जरिए जनादेश हासिल करने के विकल्प का तो सवाल ही नहीं पैदा होता था.

कुछ विराम के बाद जब आंदोलन को फिर से शुरू किया गया तो बिखराव और थकान के विभिन्न संकेत दिखे. बेसब्र मध्य वर्ग एक समाधान न दिखने से निराश था. केजरीवाल ने इसे महसूस किया और चुनावी राजनीति में शामिल होने का एलान करके अपने समर्थकों की जमात को नए उत्साह से भरा. हजारे हिचके और फिर नाराज हो गए.

केजरीवाल सम्मानजनक तरीके से उनसे अलग हुए और रॉबर्ट वाड्रा, सलमान खुर्शीद और नितिन गडकरी जैसे नामचीन लोगों के भ्रष्टाचार को उजागर करते हुए हरकत में आए. गडकरी को शायद उन्होंने भाजपा के प्रति नरम पड़ने के आरोपों का खंडन करने के लिए शामिल किया. उन्होंने यह पेशकश रखी कि उनकी पार्टी ‘जनता’ को केंद्रीय रंगमंच पर लाएगी और विस्तार से ये बताया कि उम्मीदवार खुद जनता द्वारा ही तय किए जाएंगे. हजारे तक ने कहा कि वो उनका समर्थन करेंगे.

इस पेशकश के तौर-तरीकों संबंधी अव्यावहारिकता के बावजूद कोई पूछ सकता है कि केजरीवाल को उम्मीदवारों के लिए अच्छे आदमी कहां से मिलेंगे? क्या चीज यह सुनिश्चित करेगी कि सत्ता मिल जाने के बाद भी वो अच्छे बने रहेंगे? हो सकता है कि उनके चुनाव लड़ने का पैसा खुद मतदाताओं से ही आने से इस क्षेत्र में भ्रष्टाचार का सांस्थानिक आधार, कम से कम उसूली तौर पर, गायब हो जाए, लेकिन अनगिनत दूसरे मुद्दे गायब नहीं होंगे.

कोई पूछ सकता है अगर इस देश की तीन चौथाई आबादी 20 रुपए रोज से कम पर गुजर कर रही है तो क्या वो सचमुच केजरीवाल की चुनावी मशीन का खर्च उठा सकने के काबिल होगी?

हालांकि केजरीवाल ने एक सामाजिक आंदोलन खड़ा करके एक घाघ रणनीतिकार के बतौर अपना कौशल साबित किया है, लेकिन वो चुनावी राजनीति की जटिलताओं को समझने में अपना बचकानापन भी जाहिर कर चुके हैं. वो नहीं महसूस कर पाए कि वो विरोधी द्वारा बिछाए गए फंदे में फंस चुके हैं, जो उनके आगे अपने में मिला लिए जाने या फिर कूड़े की तरह फेंक दिए जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं छोड़ेगा. हो सकता है कि भ्रष्ट लोगों के मामलों को उजागर करने का मौजूदा दौर, धरना या नारेबाजियों का शोर लोगों को तब तक रोमांचित करे जब तक वो अनोखे बने रहें, टीवी के पर्दों पर उन्हें जगह मिलती रहे, लेकिन जल्दी ही वो यह अनोखापन खोने लगेंगे. वो राजनीतिक वर्ग को परेशान कर सकते हैं, उसे सचमुच सजा नहीं दे सकते.

क्या कोई वाड्रा या खुर्शीद या गडकरी के जेल जाने की कल्पना कर सकता है? केजरीवाल को यह समझना होगा कि वो इस व्यवस्था की उपज हैं, जो ताकत के बल पर उनकी हिफाजत करेगी. जिन लोगों पर केजरीवाल ने उम्मीदें टिका रखी हैं, उनकी इस व्यवस्था में कोई जगह नहीं है. वो यहां इस जारी लूट की प्रक्रिया को जायज बनाने के लिए हैं. चुनावों के आते ही उन्हें यह समझ में आ जाएगा कि उनका सारा भंडाफोड़ और उनका विरोध धनबल और बाहुबल की घिनौनी दलीलों से पार पाने में नाकाम होंगे. इसके परे यह व्यवस्था की दलील है जो आपको अपने भीतर खींच लेती है या फिर आपको हाशिए पर फेंक देती है.

क्या केजरीवाल इतने भोले हैं कि वो यह सब समझ नहीं सकते? जो व्यक्ति आईआईटी, खड़गपुर से पढ़ा हुआ हो, जिसने भारतीय राजस्व सेवा में बरसों अपनी सेवा दी हो, और जिसका बरसों तक एक कार्यकर्ता के बतौर भी लोगों से खासा जुड़ाव रहा हो, यकीनन उससे इतने भोले होने की उम्मीद नहीं की जा सकती. चाहे बात भ्रष्टाचार की प्रक्रियाओं के बारे में हो या चुनावी राजनीति की गतिकी की. मिसाल के लिए, जब वो भ्रष्टाचार पर ध्यान केंद्रित करते हैं तो क्या वो ये नहीं जान रहे होते हैं कि यह महज एक लक्षण है, बीमारी नहीं?

ऐसा हो सकता है कि हमारे राजनीति वर्ग की सड़न को एक ऐसी बात के रूप में लिया जाए जो अपने आप में ही सिद्ध हो. लेकिन तब हमारी प्रातिनिधिक लोकतंत्र की संस्थागत संरचना इसकी जड़ में है. और उस कॉरपोरेट भ्रष्टाचार के बारे में क्या, जो इस संरचना को कायम रखे हुए है?

तथ्य ये है कि 1991 के बाद का ‘खुले दरवाजे वाला’ भारत वैश्विक पूंजी के विशाल नेटवर्क का एक सिरा है, जिसे भ्रष्टाचार से कोई नैतिक परहेज नहीं है. केवल भारत में ही नहीं पूरी दुनिया में पिछले दो दशकों में भ्रष्टाचार की तेजी से बढ़ती हुई दर इस तथ्य की पुष्टि करती है. क्या केजरीवाल की लफ्फाजी इस दैत्य को रोक सकती है? जिस हद तक उनका अभियान नव उदारवादी उसूलों का पूरक रहा है, उसे देखते हुए उसे इस दैत्य का पालन-पोषण करनेवाले के रूप में ही देखा जा सकता है.

राजनीतिक केजरीवाल का नया आदर्श वाक्य है ‘मैं आम आदमी हूं’ (विडंबना यह है कि यह नवउदारवादी मनमोहन सिंह और कांग्रेस पार्टी का शगूफा है) जो टीम अन्ना में टूट के बाद सामने आया है. यह ‘मैं अन्ना हूं’ से बेहतर है जो कुछ कुछ 1970 के दशक के शुरुआती बरसों में कोलकाता की दीवारों पर ‘चीन का चेयरमैन हमारा चेयरमैन’ जैसा लगता था. टूट ने लोगों को असमंजस में डाल दिया, जिन्हें अन्ना की बातों और रामदेव की लफ्फाजियों में एक भगवा धमक सुनाई देती थी. क्या केजरीवाल ने उनसे खुद को अलग कर लिया है?

शायद, हां. वैसे भगवा ताकतों द्वारा अपनी पकड़ में सभी संभावित विकल्पों के निर्माण की रणनीति को नजर में रखें तो कोई बहुत यकीन से कुछ नहीं कह सकता. यकीनन एक चीज जो जाहिर तौर पर दोनों में समान है वो है देश पर शासन करने के लिए ‘अच्छे लोगों’ को हासिल करने पर उनका जोर: एक लोकपाल बनने के लिए एक अच्छा आदमी, चुनाव लड़ने के लिए अच्छे उम्मीदवार, नौकरशाही के लिए अच्छे आदमी और इसी तरह. कोई पूछ सकता है कि एक सड़ी हुई व्यवस्था में अच्छा आदमी कहां खोजा जाए?

इस सवाल का तर्कसंगत जवाब सिर्फ भारतीय जेलें हो सकती हैं, क्योंकि यही वो जगह है जहां वे लोग रखे जाते हैं जो मौजूदा व्यवस्था के लिए अस्वीकार्य साबित हुए हैं. असल में उन लोगों का देशद्रोह के आरोपो में भारतीय जेलों में दिन गुजारना इस बात का संकेत है कि उन्होंने इस व्यवस्था से नफरत किया था और इसे पूरे तौर पर बदलना चाहते थे. सिर्फ यही लोग भारत में बचे रह गए अच्छे लोग हो सकते हैं.

क्या केजरीवाल और उनके ‘लोग’ उनके बारे में सोचेंगे?

भारत एक हिंदू फासीवादी राज्य है

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/02/2012 01:42:00 PM

छात्र संगठन डेमोक्रेटिक स्टूडेंट्स यूनियन (डीएसयू) ने जेएनयू में कल रात में 'Anti-National', 'Seditionist', 'Terrorist', 'Separatist', Maoist: Branding, Persecution and witch-hunt of political voices of the oppressed by the fascist Indian state विषय पर एक पब्लिक मीटिंग आयोजित की. इसमें दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर शम्सुल इस्लाम, वकील और जनवादी अधिकार कार्यकर्ता बोज्जा तारकम और जानेमाने पत्रकार मोहम्मद अहमद काजमी ने बातें रखीं. वक्ताओं ने हिंदू फासीवादी भारतीय राज्य के सांप्रदायिक, फासीवादी, जन विरोधी, दलित-मुस्लिम-पिछड़ा-स्त्री-आदिवासी विरोधी चरित्र के विभिन्न पहलुओं पर अपनी बात रखी. प्रो इस्लाम ने आरएसएस और भारतीय राज्य के गहरे और नजदीकी संबंधों पर रोशनी डालते हुए भारतीय राज्य के हिंदू फासीवादी चरित्र को उजागर किया. बोज्जा तारकम ने कहा कि इस जन विरोधी, ब्राह्मणवादी, फासीवादी राज्य से मुक्ति पाने का उपाय यही है कि दलित, पिछड़े, मुसलिम और आदिवासी अपने जुझारू संघर्षों के जरिए राजनीतिक सत्ता पर कब्जा कर लें.

कार्यक्रम में मुख्य वक्ता मो. अहमद काजमी थे, जिनको अपनी बेबाक रिपोर्टों और विश्लेषणों की कीमत इस रूप में चुकानी पड़ी है कि उन्हें आतंकवादियों से संबंधों के झूठे आरोप में सात महीनों तक जेल में गुजारने पड़े. वे हाल ही में जमानत पर रिहा हुए हैं. उन्होंने अपने कुछ अनुभव रखे और देश-दुनिया के हालात पर टिप्पणी की. प्रस्तुत है काजमी के भाषण की रिकॉर्डिंग. इसके शुरुआती कुछ सेकेंड रिकॉर्ड नहीं हो पाए हैं.

बिहार में लैंगिक उत्पीड़न और प्रतिरोध

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/02/2012 11:40:00 AM


पिछले दिनों हरियाणा, आंध्र प्रदेश से लेकर बिहार तक में जिस तरह महिलाओं के खिलाफ हिंसा और लैंगिक उत्पीड़न की घटनाओं में तेजी आई है, वह किस चीज की ओर संकेत करता है. इसके तार कैसे भारतीय राज्य के सामाजिक चरित्र से जुड़ते हैं. क्या इसका मौजूदा शासक वर्ग के संकट से भी कुछ लेना-देना है. इन घटनाओं  पर अक्सर सामने आने वाली प्रतिक्रियाओं का वर्गीय चरित्र क्या होता है? जनवादी और प्रगतिशील ताकतों के लिए रास्ते क्या हैं? सुष्मिता ने अपने इस आलेख में इन्हीं सबको तलाशने की कोशिश की है. हालांकि यह लेख बिहार के विशेष संदर्भ में लिखा गया है, लेकिन यह विभिन्न राज्यों मे महिलाओं के खिलाफ उत्पीड़न में वृद्धि को समझने का एक साफ नजरिया भी देता है. साथ ही, उससे मुक्ति पाने के रास्ते की बात भी करता है.

लैंगिक उत्पीड़न के नए-नए सिद्धांत गढ़े जा रहे हैं. हरियाणा की खाप पंचायतों का कहना है कि इसके लिए चाउमिन जवाबदेह है. चाउमिन खाने से लोगों के हारमोन में असंतुलन हो रहा है. ममता बनर्जी का मानना है कि लड़के-लड़कियों का ज्यादा खुले रूप से मिलना इसके लिए जवाबदेह है. लड़कियों के पहनावे को तो बहुत पहले से ही जिम्मेदार ठहराया जाता रहा है. इन तमाम तर्कों में पहनावे वाले तर्क ने तो एक हद तक जगह भी बना ली है और इसको आधार बनाकर ड्रेस कोड की प्रक्रिया शुरू हुई है. इस तरह जो बातें की जा रही हैं, कुल मिलाकर उनका सार यह निकलता है कि पुरुष बलात्कार करने को बाध्य हो जाते हैं और ऐसे में बलात्कार की घटनाएं बढ़ रही हैं.

हाल के दिनों में पूरे देश में लैंगिक उत्पीड़न के मामलों में काफी वृद्धि हुई है. यदि क्राइम ब्यूरो के आँकड़ों पर नजर डालें तो 2011 में बलात्कार के मामलों में 2010 की तुलना में 9.2 फीसदी की वृद्धि हुई और कुल 24,206 मामले सामने आए. 2010 में 2009 की तुलना में मामलों में 3.6 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई थी. 2011 में सामने आए मामलों में 934 मामले बिहार के थे. 2010 में बिहार में 795 मामले सामने आए थे. बिहार में 2010 की तुलना में 2011 में आए मामले 17.84 फीसदी अधिक थे, जो अखिल भारतीय स्तर से करीब 8.2 फीसदी अधिक है. 2012 के आँकड़े तो और भी डरावने हैं. 2012 के महज 8 महीनों में यानी अगस्त तक ऐसे 645 मामले सामने आए हैं. इस तरह इन सरकारी आँकड़ों पर ही विश्वास किया जाए तो पता चलता है कि हाल में बलात्कार के मामलों में तेज वृद्धि हुई है. हालांकि दलितों के मामलों में स्थिति और वीभत्स है. दलित महिलाओं के साथ बलात्कार के मामले देष में 2010 में 1,349 से बढ़कर 2011 में 1,557 हो गए. ये 2010 के मुकाबले 15.4 फीसदी अधिक है. बलात्कार के सामान्य मामलों में जहाँ वृद्धि दर 9.2 फीसदी है, वहीं दलितों के मामलों में यह 15.4 फीसदी है. इसका मतलब है कि हाल के दिनों में दलित महिलाओं के उत्पीड़न में भारी वृद्धि हुई है. यहीं इस बात को याद रखा जाना जरूरी है कि दलित उत्पीड़न के तहत उन्हीं मामलों को दर्ज किया जाता है जिनमें उत्पीड़न का आधार जाति होता है. हालांकि हम यह भी जानते हैं कि दलित समुदाय के जातीय आधार पर बलात्कार के अधिकतर मामलों को भी सामान्य आईपीसी के तहत दर्ज किया जाता है या फिर कई मामले दर्ज ही नहीं किए जाते. यानी यदि आईपीसी के तहत दर्ज मामलों में से भी दलित उत्पीड़न के मामलों को अलग से देखा जाए तो दलित महिलाओं के साथ उत्पीड़न के मामले इससे कहीं ज्यादा निकलेंगे.

बिहार तो पहले से ही महिला उत्पीड़न और सामंती उत्पीड़न के मामले में कुख्यात रहा है. 1980 में कल्याण मुखर्जी द्वारा भोजपुर के नक्सलवादी आंदोलन पर लिखी किताब की शुरूआत ही एक दलित महिला लाखो द्वारा शारीरिक संबंध बनाने से इनकार करने पर उसकी हत्या कर दिए जाने की घटना से होती है. 1973 के मई महीने में सहार प्रखंड के चबरी गांव में जब लालमोहर की पत्नी के साथ जमींदार के बेटे ने खेत में काम करते हुए छेड़खानी की तो गांव की महिलाओं ने जमींदार के खेत में काम करने से मना कर दिया और लालमोहर ने हथियार उठा लिया. बिहार में जनसंहारों के दौरान महिलाओं के साथ बलात्कार के मामले जगजाहिर हैं. इतना ही नहीं जनसंहारों के दौरान गर्भवती महिलाओं के पेट से बच्चा निकालने की क्रूर घटनाएं भी किसी से छिपी हुई नहीं है. दलित महिलाओं को तो सामंत अपनी निजी संपति समझते रहे हैं. अभी हाल में फिर से महिला उत्पीड़न और उसमें भी दलित महिलाओं के उत्पीड़न में तेज वृद्धि हुई है.

पिछले 19 मई को मुजफ्फरपुर के धनौर गाँव की स्वयं सहायता समूह की संचालिका मीरा सहनी के बलात्कार के बाद उनकी हत्या स्थानीय दबंगों ने कर दी. यहाँ तक कि पीएमसीएच लाने के बाद डॉक्टरों ने कोई प्राथमिकी भी दर्ज नहीं करवाई. फिर काफी हंगामे और एक रिटायर्ड अधिकारी के हस्तक्षेप के बाद ही प्राथमिकी दर्ज की गई. कुछ ही दिनों बाद इसी गांव के बगल के ही कोपी गाँव की नौंवी की छात्रा खुशबू की बलात्कार के बाद हत्या कर दी गई. 7 जुलाई को वैशाली के सराय थाने के प्रबोधिचक रोशन गाँव की छात्रा कविता की बलात्कार के बाद हत्या कर दी गई. सीतामढ़ी जेल में एक महिला को माओवादी बताकर उसके साथ बलात्कार किया गया. इस तरह उत्तर बिहार में दलित महिलाओं पर दबंगों और सामंतों के अत्याचार बढ़ गया है. यह बलात्कार तो है ही, सामंती ताकतों द्वारा दलितों के मनोबल और संघर्ष को तोड़ने के औजार के बतौर भी इसका इस्तेमाल किया जा रहा है.

आँकड़ों और घटनाओं को देखकर लगता है कि उत्पीड़न में अचानक उछाल आ गया है. अब कुछ लोग कानून व्यवस्था की दुहाई देकर सारा दोष सरकार के ऊपर मढ़ रहे हैं तो कुछ लोग बाजार द्वारा रचे गए एक नए आवरण को जवाबदेह ठहरा रहे हैं. कुछ लोग इसे केवल पितृसत्ता का मामला बताकर कुछ प्रतीकात्मक कार्यक्रमों को संपन्न कर अपनी भूमिका की इतिश्री कर रहे हैं. लेकिन क्या मामला बस इतना भर ही है?

पितृसत्ता और उत्पीड़न

दुनिया की सारी निजी संपत्तियों में महिला सबसे ज्यादा निजी संपति रही है. अतिरिक्त उत्पादन और फिर उस पर मालिकाने की प्रक्रिया में महिला की आजादी पुरुषों के अधीन हुई और महिलाओं का काम इस निजी संपति के लिए उत्तराधिकारी पैदा करना रह गया. इस दौर में लैंगिक आधार पर श्रम विभाजन की प्रक्रिया भी शुरू हुई और महिलाओं को सामाजिक उत्पादन प्रक्रिया से बेदखल करके उन्हें घरेलू उत्पादन प्रक्रिया में बंधक बनाया गया. इस तरह से घरेलू उत्पादन तक बंधे रहने की प्रक्रिया ने उनकी गुलामी को और मजबूत किया. भारत में तो महिलाओं की स्थिति को मनुस्मृति के आधार पर निर्धारित किया गया. यहाँ महिलाओं को न केवल पुरुषों की निजी संपत्ति माना गया बल्कि उन्हें उनके शरीर तक ही सीमित कर दिया गया. इतना ही नहीं पुरूषों के इतर महिलाओं का कोई वजूद ब्राह्मणवाद ने स्वीकार ही नहीं किया. इसलिए हिंदू धर्म में तमाम व्रत अनुष्ठान महिलाएं पुरुषों के लिए या फिर एक बढि़या गृहस्थ जीवन के लिए करती है. इसका मतलब यह है कि धर्म, संस्कृति को भी एक ऐसे बंधन के रूप में तब्दील कर दिया गया जो महिलाओं को घरेलू जीवन के दायरे में ही बांध कर रखता है. महिलाएं पुरुषों की यौन तुष्टि और उत्तराधिकारी जनने का जरिया भर बना दी गईं हैं. निजी संपति को दूसरों के हवाले जाने से बचाने के लिए विधवा महिलाओं को सती करने, उनके बाल मुंड देने या फिर उन पर विभिन्न पाबंदियां थोपकर पुनर्विवाह की संभावनाओं को समाप्त कर दिया जाता है. घरेलू और छोटे स्तर का उत्पादन समाज में महिलाओं की इस स्थिति को बरकरार रखता है. इस तरह एक महिला का खुद अपने शरीर पर भी अपना हक नहीं होता. इतना ही नहीं जो महिलाएं निजी संपति के लिए उत्तराधिकारी पैदा करने में विफल रहीं उन्हें तो इंसान भी नहीं समझा जाता. भाषा में भी महिलाओं को हमेशा नीचा ही समझा गया. मसलन बाँझ, बदचलन, कुलटा जैसे तमाम शब्द महिलाओं को गाली देने के लिए गढ़े गए. इस तरह उत्पादन प्रक्रिया से लेकर धर्म, संस्कृति और भाषा तमाम स्तर पर महिलाओं को गुलाम बनाकर रखा गया. यह सामाजिक उपरिरचना महिलाओं को उत्पादन और उसके साधनों के मालिकाने से महरूम करती है और उनकी दयनीय स्थिति को बरकरार रखती है. यह उत्पीड़न तो तमाम महिलाओं को झेलना पड़ता है लेकिन भारत में ब्राह्मणवाद इस उत्पीड़न में भी वर्गीकरण का आधार तैयार करता है. इसमें ऊँची जाति की महिलाओं को जहाँ महज पितृसत्ता का शिकार होना पड़ता है वहीं दलित महिलाओं को वीभत्स जातीय उत्पीड़न का भी शिकार होना पड़ता है. इस तरह दलित महिलाओं की जिंदगी और भी जलालत भरी होती है. वह जहाँ घरेलू जीवन में उत्पीड़न का शिकार होती है वहीं वह सामंतों और दबंगों की भी निजी संपत्ति बन जाती है.

इस तरह दलित महिलाओं के जीवन को सामंती समाज और दूभर बना देता है. सामंती ताकतें इनको नीचा दिखाने के लिए बलात्कार को एक औजार के रूप में इस्तेमाल करती हैं. ठीक वैसे ही जैसे शासक वर्ग द्वारा बगावत विरोधी तरीके के रूप में बलात्कार को मजबूत औजार के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है. जाति आधारित समाज दलित महिलाओं के लिए समाज में सबसे नीचे के स्थान की गारंटी करता है. दलित महिलाएं ग्रामीण इलाकों में यौन उत्पीड़न के सबसे भद्दे रूप बलात्कार का सबसे ज्यादा शिकार होती हैं. दलित महिलाओं की बहुसंख्या संपत्तिहीन है और मूलतः दूसरे के जमीन पर काम करती हैं. ऐसे में एक ब्राह्मणवादी अर्धसामंती समाज में लैंगिक उत्पीड़न का खतरा उनके लिए काफी ज्यादा होता है. दबंगों की यौन कुंठा का सबसे अधिक शिकार भी इन्हें ही होना पड़ता है. इसकी बड़ी वजह यह है कि नौकरशाही में मौजूद सामंती प्रभुत्व दलित महिलाओं के साथ किए गए उत्पीड़न के मामलों को आसानी से रफा-दफा से कराने में सहायक होता है.

यह लगातार देखने में आया है कि मजबूत जातियाँ दलितों के प्रतिरोध के मनोबल को तोड़ने के लिए बलात्कार का इस्तेमाल करती है. बिहार में विभिन्न निजी सेनाओं द्वारा महिलाओं के खिलाफ अत्याचारों की घटनाओं से हम इसे समझ सकते हैं. सामान्य महिलाओं की बनिस्बत दलित महिलाएं इस अत्याचार का सबसे आसान शिकार बनती हैं. इस तरह भारतीय समाज में महिलाओं के एक बड़े हिस्से पर जारी अत्याचार महज पितृसत्तात्मक नहीं है बल्कि वह पितृसत्ता के साथ-साथ ब्राह्मणवाद से बंधा हुआ अर्धसामंती उत्पीड़न भी है.

लैंगिक उत्पीड़न और प्रतिरोध

भारतीय समाज में महिला मेहनतकशों के उत्पीड़न की एक बड़ी वजह जातीय आधारित अर्धसामंती उत्पीड़न है. इसलिए इस उत्पीड़न से राहत के लिए अर्धसामंती ताकतों के खिलाफ संघर्ष भी एक प्रमुख मुद्दा है. भारतीय समाज में दलित दासों की तरह जीने को अभिशप्त रहे हैं. ऐसे में कानून व्यवस्था और सरकार, सब दबंगों और मजबूत वर्गों के साथ खड़े होते हैं. इसकी बड़ी वजह यह भी है कि राजसत्ता पर अर्धसामंती प्रभुत्व इन्हें उत्पीड़न से मुक्ति दिलाने की किसी भी कोशिश को विफल करता है. देश में दलितों और महिलाओं की रक्षा के नाम पर अनगिनत कानून बने लेकिन इसका कोई भी परिणाम नहीं निकला बल्कि अत्याचार लगातार बढ़ते गए.

नक्सलवादी आंदोलन ने देश में सबसे पहले ब्राह्मणवाद से जुड़े हुए इस अर्धसामंती चरित्र को ठीक से समझा और इसे अपने आंदोलन का पहला निशाना बनाया. ग्रामीण इलाकों में अर्धसामंती प्रभुत्व के खिलाफ एक मजबूत संघर्ष शुरू हो गया. इस संघर्ष ने दलितों को शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न से तात्कालिक राहत दी और इन लोगों ने खुली हवा में सांस लेने का साहस किया. ऐसे में यह संघर्ष ग्रामीण इलाके में सामंती ताकतों के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया. इस संघर्ष ने समाज में दोहरा काम किया. एक तरफ इसने तात्कालिक राहत दी तो दूसरी तरफ दलितों के अंदर इज्जत के साथ जीने की एक नई चेतना का विस्तार भी किया. सामंती दबंग ग्रामीण इलाकों से भाग खड़े होने के लिए मजबूर हुए. अब दलित महिलाएं केवल पीडि़त नहीं रह गई थीं बल्कि उन्होंने प्रतिरोध करना सीख लिया था और वे अब योद्धा के रूप में तब्दील हो गई थीं. मध्य बिहार और भोजपुर में सामंतवाद विरोधी संघर्ष में महिलाओं का काफी उल्लेखनीय योगदान रहा है और उन्होंने सामंती उत्पीड़न के खिलाफ अपनी लड़ाई को पित्तृसत्ता के खिलाफ विस्तारित किया और शराबबंदी के लिए आंदोलन एक प्रमुख आंदोलन के रूप में तब्दील हुआ. इस तरह संघर्ष के इलाकों में महिलाओं को तात्कालिक राहत हासिल हुई

लेकिन कई इलाकों में संघर्षरत ताकतों के शासक वर्ग के साथ समझौते एवं उनके द्वारा तमाम आंदोलनों को बस कानूनी दायरों में समेटने तथा कई इलाकों में शासक वर्ग द्वारा इन आंदोलनों को कुचलने के लिए बर्बर संगठित दमन चलाए जाने से सामंतवाद विरोधी जनता की संगठित शक्ति कमजोर हुई. अब सामंती प्रभुत्व और जनशक्ति के बीच संतुलन थोड़ा कमजोर हुआ. मेहनतकश महिलाओं की व्यापक बदहाली के लिए जवाबदेह यह अर्धसामंती उत्पादन व्यवस्था है जो ब्राह्मणवाद से जुड़ी हुई है. इसलिए बगैर इसके खात्मे के महिलाओं की मुक्ति असंभव है. ऐसे में जनता की शक्ति के कमजोर होने से सामंती प्रभुत्व को फिर से मौका मिला है और ग्रामीण इलाकों में इन्होंने फिर से अपनी गुंडागर्दी शुरू कर दी है. ऐसे में फिर से महिलाओं खासकर दलित महिलाओं के खिलाफ उत्पीड़न में तेज वृद्धि हुई है.

इसके अलावा बिहार में नीतीश सरकार ने विकास के नाम पर विश्व बैंक की नीतियों को बेरोक-टोक लागू किया है. विश्व बैंक और एशिया विकास बैंक के भारी कर्जों के जरिए सड़क, पुल इत्यादि क्षेत्रों में भारी मात्रा में निवेश हुआ है. इस सरकारी पैसे ने ठेकेदारों और नौकरशाही की आमदनी में भारी इजाफा कर दिया. अब कुल मिलाकर विकास के नाम पर गैर उत्पादक क्षेत्रों में भारी निवेश ने रोजगार के क्षेत्र में तो कुछ खास नहीं किया लेकिन संभ्रांत किस्म की उपभोक्ता सामग्री के लिए बिहार एक ट्रेडिंग सेंटर जरूर बन गया. अब इस निवेश और तथाकथित विकास दर को बरकरार रखने तथा कर्जों का सूद चुकाने के लिए सरकार के लिए राजस्व बढ़ाना एक बड़ा काम था इसलिए हरेक पंचायत में शराब के ठेके आवंटित किए गए. अब शराब सरकार के राजस्व का सबसे प्रधान स्रोत हो गई. इस तरह अब ग्रामीण इलाकों में गुंडागर्दी के लिए शराब को कानूनी बना दिया गया है. जहाँ सामंती समाज या फिर दास समाज में महिलाओं की भूमिका उत्पादन के एक औजार के रूप मंे थी, चाहे स्वरूप जो भी हो, वहीं बाजार महिलाओं को एक उपभोग की इकाई बना देता है. इस तरह अब महिला केवल महिला नहीं रह जाती, बल्कि ‘माल’ बन जाती है. अब बिहार में एक तरफ सामंती-अर्धसामंती उत्पीड़न तो दूसरी तरफ महिलाओं के वस्तुकरण ने महिलाओं के लिए एक घिनौना माहौल तैयार किया है. उपभोग की एक इकाई के रूप में तब्दील करने के क्रम में महिलाओं को घर से निकालना बाजार के लिए एक प्रमुख काम है. इस क्रम में वह महिलाओं के सस्ते श्रम का दोहन भी करता है. वह महिलाओं के सशक्तीकरण के नाम पर उनके पुराने कुछ बंधन तोड़ता जरूर है लेकिन वह फिर एक नया बंधन बनाता है और इस तरह पित्तृसत्ता को तोड़ने के बजाए और मजबूत करता है. इसके आलावा चूंकि सामंतों को तोड़ने के बजाए बाजार उनके साथ गठजोड़ बनाता है इसलिए वो सामंती उत्पीड़न झेल रही महिलाओं के लिए शोषण के एक नए आयाम को जन्म देता है. टीवी चैनल फिल्में, महिलाओं के लिए मॉडलिंग के गुर के साथ-साथ अच्छी बहू और पत्नी बनने के गुर भी दिखाते हैं. हमारे देश में महिलाओं को इसी ‘मॉडलिंग के गुर’ और ‘अच्छी बहू बनने के गुर’ की चक्की के बीच पिसना पड़ रहा है. इसलिए शासक वर्ग एक तरफ लड़कियों के लिए सशक्तीकरण की बात करता है ठीक वहीं उनके लिए ‘ड्रेस कोड’ भी तय करता है. आज बाजार का यह अंतर्द्वंद्व बिहार में भी तेजी से बढ़ा है. एक तरफ इसने महिलाओं को चारदीवारी से निकलने की चेतना तो दी है लेकिन दूसरी तरफ पुरुष मानसिकता का लोकतंत्रीकरण नहीं हुआ है. बाजार भी इस विकृत मानसिकता को अपने लिए इस्तेमाल करता है. इसके अलावा वह यौन बाजार और कामुकता का एक नया बाजार बनाता है. ऐसे में पहले से ही यौन जीवन के इर्द-गिर्द बांध दी गई महिलाओं के व्यक्तिगत जीवन को यह और भी यौन केंद्रित कर देता है. पहले पुरुष समाज अपनी सामाजिक स्थिति की बदौलत खुद के मन मुताबिक रहने के लिए उसे बाध्य करता था. बाजार इसका इस्तेमाल कर एक ऐसा माहौल तैयार करता है जिसमें महिलाएं अब खुद को वैसा ही बनाती हैं जैसा पुरुष समाज उन्हें देखना चाहता है. ऐसे में बाजार घर से निकली महिलाओं को बाहर और कार्यस्थलों पर उत्पीड़न के लिए और असुरक्षित बना देता है. अब वह और अधिक लैंगिक उत्पीड़न की शिकार होती हैं. इसलिए हाल के दिनों में आम महिलाओं के बलात्कार में भी भारी इजाफा हुआ है. अर्धसामंती समाज में ब्राह्मणवादी ऊपरी रचना के साथ-साथ अर्धसामंती उत्पादन पद्धति और पुरुषसत्ता, तमाम चीजें बरकरार रहती हैं और यह अधिक ज्यादा प्रतिगामी हो जाती हैं. ऐसे में पुरुष मानसिकता के लोकतंत्रीकरण की कोई भी बात बेमानी है.

ऐसे में महिला उत्पीड़न के खिलाफ संघर्षों को भी दोहरे स्तर से गुजरना होता है. इसमें जहाँ अर्धसामंती समाज के जनवादी लोकतंत्रीकरण का संघर्ष जहाँ प्रधान है वहीं पित्तृसत्ता के खिलाफ संघर्ष भी साथ-साथ चलता है. जहाँ पहला संघर्ष दो दुश्मन वर्गों के बीच संपन्न होता है वहीं दूसरे संघर्ष को दोस्ताना संघर्ष के जरिए हल होना है. लेकिन पहले संघर्ष के बिना दूसरे लक्ष्य को हासिल करना नामुमकिन है. ऐसे में जो भी लोग संघर्ष को बस पितृसत्ता के दायरे में समेट रहे हैं असल में वे महिला मुक्ति के संघर्ष के बजाए महिलाओं को बाजार में आजादी के साथ महज खड़े होने के अधिकार की ही बात कर रहे हैं. असल में ये नारीवादी ताकतें महिलाओं को अपने शरीर तक सीमित रखकर पुरुष सत्ता को कमजोर करने के बजाए मजबूत ही करती हैं.

लैंगिक उत्पीड़न और इसके खिलाफ प्रतिक्रिया

हाल के दिनों में बढ़े लैंगिक उत्पीड़न पर कई तरह की प्रतिक्रियाएँ सामने आ रही हैं. इसमें सबसे प्रमुख माँग है कानून व्यवस्था को ठीक करने की माँग. कुछ लोग पितृसत्ता को जिम्मेवार बताकर अपने काम की इतिश्री कर ले रहे हैं. हाल में शहरों में छात्राओं के साथ बलात्कार में भारी वृद्धि हुई है. इसमें भी ‘गैंग रेप’ जैसी काफी घटनाएं सामने आई हैं. रेप के बाद हत्या कर देना या फिर उसे मार देने की कोशिश करने की घटनाओं में भी तेजी से वृद्धि हुई है. लेकिन ग्रामीण इलाकों में तो इसने और वीभत्स रूप ले लिया है. बिहार में इन घटनाओं पर बिहार के तथाकथित सभ्य समाज और प्रगतिशील तबकों से अलग-अलग प्रतिक्रिया हो रही है. जब लैंगिक उत्पीड़न समाज के एक तबके को दबाकर रखने और उत्पीडि़त करने का एक औजार बन जाए तो उस समाज को समझे बगैर उस समाज में किसी भी उत्पीड़न के खिलाफ होनेवाली प्रतिक्रियाओं को समझना मुश्किल है. ऐसे समाज में किसी भी उत्पीड़न के खिलाफ होनेवाली प्रतिक्रिया भी उस समाज के विभिन्न अंतर्विरोधों से तय होती है और यह प्रतिक्रिया हमेशा समान घटनाओं में समान नहीं होती. चूँकि ऐसे समाज में एक वर्ग या जाति (बिहार में) का प्रभुत्व होता है ऐसे में संभ्रांत लोगों के साथ होने वाली घटनाएं तो व्यापक रूप से सामने आती हैं और उसपर प्रतिक्रिया व्यक्त की जाती है लेकिन वहीं दलितों और कमजोर वर्गों की महिलाओं के साथ होने वाले अत्याचार को  स्वाभाविक मान लिया जाता है. या यह कहना मुनासिब होगा कि शासक वर्ग हमेशा समान मामलों में भी जाति और वर्ग के आधार पर ही अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करता है.

वैशाली में 7 जुलाई को एक दलित छात्रा के साथ एक स्थानीय दबंग ने बलात्कार कर उसकी हत्या कर दी. डेढ़ महीने तक इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं हुई बल्कि दबंगों ने पीड़िता के परिवार पर मुकदमा वापस करने का लगातार दबाव डाला. जाहिर तौर पर इन दबंगों को सत्ता का संरक्षण हासिल था. करीब सवा महीने बाद 16 अगस्त को लोगों ने सराय में मामले में कार्रवाई के लिए सड़क जाम किया. स्थानीय मुखिया के नेतृत्व में उन पर पुलिस ने हमला किया और फिर फायरिंग की. पुलिस फायरिंग में एक व्यक्ति की हत्या से आक्रोशित लोगों ने स्थानीय थाना जला दिया. सीतामढ़ी जेल में एक महिला को माओवादी बताकर जिला प्रशासन के लोगों ने उसके साथ बलात्कार किया. उत्तर बिहार में दलित और कमजोर वर्गों की महिलाओं पर कहर जारी है. शराबबंदी के लिए आंदोलन कर रही महिलाओं पर मुजफ्फरपुर मंे सरकारी कार्यालय में दबंगों और माफियाओं ने बर्बर हमला किया. लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी है कि वैशाली, मुजफ्फरपुर, मोतिहारी के इन इलाकों में इस उत्पीड़न के खिलाफ एक मजबूत जन संघर्ष का निर्माण भी हुआ है. मुजफ्फरपुर में शराबबंदी को लेकर बढ़ता आंदोलन भी इसका एक उदाहरण है. इन्हीं आंदोलनों के दौरान एक महिला नेता भारती की बुरी तरह पिटाई और गिरफ्तारी की खबरें भी अखबारों में आई. इन आंदोलनों पर सरकार और दबंगों का हमला भी तेज हुआ है. पटना जिले के मनेर थाना में दलित परिवार से आनेवाली, नौवीं और दसवीं में पढ़ रही दो बहनों के शादी से इनकार करने पर उनके चेहरों को तेजाब फेंककर जला दिया गया. यह घटना 21 अक्टूबर को शहर से मात्र 20-25 किमी की दूरी पर हुई है. लेकिन उत्तर बिहार में दमन और प्रतिरोध तथा अन्य इलाकों में दलितों पर होने वाले अत्याचारों के खिलाफ बिहार के इस तथाकथित सभ्य समाज ने कोई प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त की. सराय से लेकर मोतिहारी तक मेहनतकश महिलाएं हरेक दमन का प्रतिरोध करती रहीं लेकिन उनके पक्ष में कोई भी खड़ा नहीं होने आया. खुद को प्रगतिशील कहने वाले लोग महिला उत्पीड़न के खिलाफ बोलते रहे लेकिन उत्तर बिहार में महिला उत्पीड़न के खिलाफ होने वाले प्रतिरोध पर बर्बर दमन पर सबने चुप्पी साध ली. इन महिला आंदोलनों को नेतृत्व देने वाली महिला भारती की अमानवीय पिटाई और गिरफ्तारी पर भी सबने चुप्पी साध ली. इस तरह शहरों में घटनेवाली घटनाएं तो चर्चा में आईं लेकिन ग्रामीण इलाकों में होने वाले बलात्कार कभी मुद्दा भी नहीं बन पाए.

वहीं दूसरी तरफ मधुबनी में एक सिरकटी लाश (उसे जिस व्यक्ति की लाश होने का दावा किया जा रहा था, बाद में वह जिंदा निकला) को हासिल करने के लिए हुए बवाल पर पुलिस फायरिंग के खिलाफ वामपंथी से लेकर दक्षिणपंथी तक एकजुट हो गए. इस बार राज्य में विरोध की एक संगठित अभिव्यक्ति सामने आई. यहाँ दो उदाहरणों को सामने रखने का मतलब यह कहना नहीं है कि मधुबनी गोलीकांड के खिलाफ कोई प्रतिरोध नहीं होना चाहिए बल्कि यह कहना है कि तथाकथित सभ्य समाज और वामपंथी ताकतें यह दोहरा मानदंड कैसे अपना सकती है? क्या यह महज संयोग है कि यह तथाकथित जनाक्रोश ब्रह्मेश्वर मुखिया की हत्या या फिर मधुबनी में एक गुमनाम लाश को हासिल करने के लिए सामने आता है? क्या यह भी महज संयोग है कि ग्रामीण इलाकों में दलित महिलाओं के साथ घटने वाली इससे भी वीभत्स घटनाओं से किसी का दिल नहीं दुखता? जवाब बिल्कुल साफ है कि आज भी शासक वर्ग पर सामंती प्रभुत्व मजबूत है. ऐसे में जाति आधारित समाज में शासक वर्ग की प्रतिक्रिया भी इस जातीय मानसिकता अलग नहीं होती. एक तरफ कमजोर वर्ग और दलितों के प्रतिरोध को एकदम शुरू से दमन का शिकार बनाया जाता है वहीं दबंगों और सामंती ताकतों के तथाकथित जनाक्रोश को निकलने की खुली छूट दी जाती है. अब जाहिर तौर पर समाज में आगे बढ़े हुए तबके से एक स्वतः स्फूर्त अभिव्यक्ति सामने आती है. संसदीय राजनीति में इस तथाकथित जनाक्रोश का इस्तेमाल करने के लिए तमाम शासक वर्गीय पार्टियों से लेकर वामपंथी पार्टियां तक इसके पीछे दौड़ पड़ती हैं. क्या कविता पासवान, मीरा सहनी और खुशबू जैसी महिलाओं की माँओं का दर्द यह सभ्य समाज कभी नहीं समझेगा जिस तरह इसने मधुबनी में प्रशांत की माँ के दर्द को समझा था? शायद तब तक नहीं जब तक इस सामंती प्रभुत्व को चकनाचूर नहीं कर दिया जाता.

महिला आंदोलन की दिशा

बिहार में हाल में बढ़ी घटनाओं पर अलग-अलग महिला संगठनों ने राय जाहिर की है और कानून व्यवस्था सुधारने की माँग की है. कुछ संगठनों ने पितृसत्ता की मुखालिफत की बात की है. लेकिन यहीं यह सवाल बनता है कि अबतक के कानूनों ने महिलाओं और दलितों की कितनी मदद की है? बल्कि सच तो यह है कि दलित उत्पीड़न के तहत दर्ज किए गए अधिकतर मामलों को फर्जी करार दिया जाता है. ऐसे में इन उत्पीड़नों के खिलाफ संघर्ष का रास्ता क्या हो?

हमारे समाज में लैंगिक उत्पीड़न की जड़ समाज की ब्राह्मणवादी जातीय व्यवस्था और अर्धसामंती उत्पादन प्रक्रिया में निहित है. इसलिए इसका खात्मा भी इस आधार के खात्मे के साथ ही होगा. इस आर्थिक आधार को बदले बगैर और जातीय उन्मूलन के लिए संघर्ष के बगैर इस उत्पीड़न का खात्मा भी संभव नहीं है. कई महिला संगठन महिला आरक्षण को लैंगिक उत्पीड़न के खात्मे के एक महत्वपूर्ण औजार के रूप में प्रचारित कर रहे हैं. ऐसे में उन्हें इस बात का भी जबाव देना चाहिए कि बिहार में पंचायतों में 50 फीसदी महिला आरक्षण ने महिला उत्पीड़न को कम करने में कितनी और कैसी भूमिका अदा की है.

बिहार में अलग-अलग संगठन अलग-अलग तरीकों से इस उत्पीड़न के खिलाफ दिशा अपना रहे हैं. कुछ महिला संगठन इसमें सरकार से हस्तक्षेप की बात कर रही हैं. एक महिला संगठन की राष्ट्रीय महासचिव ने राजधानी में घोषित कर दिया कि उत्पीड़न के खिलाफ इस संघर्ष में रूपम पाठक उनके लिए प्रेरणा स्रोत हैं. मालूम हो कि रूपम पाठक ने एक विधायक की हत्या कर दी थी और कहा था कि उक्त विधायक लंबे समय से उसका यौन शोषण कर रहा था और उसकी नजर उसकी बेटी पर था. क्या सच में रूपम पाठक बिहार में महिलाओं के संघर्ष के लिए प्रेरणा स्रोत हो सकती है? शायद हो सकती है लेकिन उनके लिए जिनका जनता और उसके संघर्षों से विष्वास खत्म हो गया हो. इसके अलावा बात यह भी है कि रुपम पाठक का आवरण कुछ लोगों के लिए ज्यादा सुविधाजनक है.

इन संगठनों की दिशा के साथ मूल दिक्कत यह है कि वे जमीनी स्तर से उत्पीड़न के खिलाफ संघर्ष के निर्माण की अनदेखी करते हैं और तमाम संघर्ष को महज प्रतीकात्मक प्रतिरोध तक सीमित करके इसे सरकार विरोधी संसदीय और कानूनी दायरों तक सीमित रखते हैं. बिहार में परिवर्तनकामी महिला आंदोलन की मजबूत परंपरा रही है. सैकड़ों दलित और मेहनतकश महिलाओं ने तमाम तरह के दमन और उत्पीड़न के बावजूद आंदोलनों को नेतृत्व दिया है. उन्होंने कुर्बानियों की मिसालें कायम की हैं. इतिहास भी गवाह है कि महिला उत्पीड़न के खिलाफ समानता के अधिकार के लिए संघर्ष का नेतृत्व भी मेहनतकश महिलाओं ने ही किया. मेहनतकश महिलाओं के संघर्ष ने ही अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के लिए रास्ता प्रशस्त किया. भले ही उदारवादी और बुर्जुआ नारीवादी ताकतों ने इस अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस को मेहनतकशों के संघर्षों से जुदा करके इसे एक महज एक सेलिब्रेशन दिवस में बदल दिया. आज के हालात में बाजार की ताकतों और काॅरपोरेट घरानांे के लिए यह फायदेमंद भी था.

लेकिन महिलाओं का संघर्ष इन सबके बावजूद जारी है. बिहार में भी महिला आंदोलन की सुगबुगाहट दिख रही है. उत्तर बिहार में लैंगिक सामंती उत्पीड़न के खिलाफ मेहनतकश महिलाएं लगातार संघर्षरत हैं. महज सामंती उत्पीड़न ही नहीं बल्कि शराबबंदी के लिए आंदोलन का निर्माण भी मुजफ्फरपुर के इलाके में हो रहा है. इसकी नेतृत्वकारी महिलाओं पर भारी राजकीय दमन जारी है, इसके बावजूद आंदोलन आगे बढ़ रहा है और शराबबंदी के लिए आंदोलन तो एक अभियान के रूप में तब्दील हो चुका है. इस आंदोलन ने बिहार में महिलाओं के लैंगिक उत्पीड़न के खिलाफ एक आशा की किरण जगाई है. आज जरूरत है कि नारी आंदोलन में इन तमाम बुर्जुआ नारीवादी और उदारवादियों को खारिज किया जाए जो समूचे महिला आंदोलन को देह और पितृसत्ता के दायरे में केंद्रित करती है. लेनिन ने महिला आंदोलन की दिशा पर बात करते हुए कहा था, ‘‘मेहनतकश औरतों के आंदोलन का मुख्य उद्देश्य औरतों के केवल औपचारिक समता के लिए नहीं, बल्कि आर्थिक और राजनीतिक समता के लिए लड़ना है. मुख्य काम औरतों को उत्पादक सामाजिक श्रम में खींचना है, उन्हें घरेलू गुलामी से निकालना है, रसोईदारी और धायगीरी के चिंतन तथा एकांतिक वातावरण की हतबुद्धिकर और अपमानजनक गुलामी से मुक्त करना है. यह एक लंबा संघर्ष है जिसके लिए सामाजिक तकनीक तथा रिवाज दोनों का ही आमूल पुनर्निमाण आवश्यक है.’’ (मेहनतकश औरतों के अंतर्राष्ट्रीय दिवस के उपलक्ष्य में, 4 मार्च, 1920). यानी राजनीतिक-आर्थिक परिवर्तन के लिए संघर्ष के साथ कदमताल करके ही लैंगिक उत्पीड़न का खात्मा हो सकता है और जाहिर तौर पर इस लड़ाई का नेतृत्व देह की सिद्धांत की व्याख्या करने वाली बुर्जुआ नारीवादी नहीं बल्कि मेहनतकश महिलाएं ही करेंगी.

रास्ता जटिल और दुर्गम है, लेकिन हम जानते हैं कि मेहनतकशों ने ही जटिल और दुर्गम रास्ते को सुगम बनाया है. आइए, हम मेहनतकश महिलाओं की अगुवाई में खड़े होने वाले सामंतवाद विरोधी आंदोलन के साथ एकजुटता जाहिर करें और उनको सलाम करें. यही वह रास्ता है जो इन तमाम दबंगों और उत्पीड़कों से मुक्ति दिलाकर पितृसत्ता को ध्वस्त करेगा. अब वक्त है अपने कंधे पर उठाए आधे आसमान पर कब्जे के लिए आगे बढ़ने की और इसका रास्ता सामंतवाद विरोधी संघर्षों के निर्माण और फिर परिवर्तन से ही संभव है न कि संसदीय दायरों तक सीमित होने वाले सुधारवादी और कानूनी आंदोलनों से.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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