हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

खुफिया एजेंसियां, साम्राज्यवाद, संघ परिवार और अन्ना आंदोलन

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/29/2012 01:21:00 AM

यह खबर इंडियन एक्‍सप्रेस में 20 अगस्त 2012 को मुख्य पृष्ठ पर छपी थी। इस खबर को उस समय छापा गया जब अन्ना की विदाई खुद अन्ना ने ही तय कर दी और रामदेव पीछे-पीछे घिसटते हुए इस आंदोलन के जीवित रहने का संकेत दे रहे थे। सच्चाई सबको मालूम थी कि रामलीला मैदान में चल रही उठापटक कब का खत्म हो चुकी है। 2014 की तैयारी में इस उठापटक की ज़रूरत ही नहीं रह गई थी। यह जो हुआ, सिर्फ धींगामुश्ती नहीं थी। यह देश की सत्ता पर काबिज होने के खूनी खेल के प्रयोग की एक नई पृष्‍ठभूमि थी। यह 1990 के बाद उभरकर आए नौकरशाहों और नव-जमींदारों का फासीवादी प्रयोग था जिसका पाठ आए दिनों में और भी अधिक खूनी तथा राजनीतिक तौर पर और अधिक जनद्रोही होगा। यह देश के प्रशासनिक, न्यायिक और राजनीतिक संरचना के पुनर्गठन के एक प्रस्ताव का देशव्यापी प्रयोग था जिससे ‘देश के प्रगतिशील दिमाग’ को और अधिक चौड़ा कर फासीवादी घोड़े को पूरी रफ्तार से दौड़ाया जा सके।

इस खबर में जिस विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन का जिक्र है उसने नेपाल के वर्तमान प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टराई की भारत यात्रा का 2010 में खर्च वहन किया था। इस काम को संगठित कराने में कश्मीर से लेकर माओवाद पर अपनी पकड़ बनाने का दावा करने वाले एक वामपंथी पत्रकार ने सक्रिय भूमिका का निर्वाह किया, इस बात की चर्चा उस समय हुई थी। साथ ही एक अन्य वामपंथी पत्रकार ने इस मुद्दे पर बाबूराम को चेताया भी था। उस यात्रा में वामपंथी मंचों से अपनी साम्राज्यवाद परस्त लाइन को खूब रखा। प्रचंड व बाबूराम के नेतृत्व में सीपीएन-माओवादी ने नेपाल में राजशाही के खिलाफ चल रहे जनयुद्ध के समय 2002 में ‘अंतर्राष्ट्रीय पटल पर हो रही बेइज्जती’ को ठीक करने के लिए यूरोप व अमेरिका से अपील की थी। यह पत्र भारत के लिए भी था। खुला भी और हाथों हाथ पहुंचाने का भी जिसका एस.डी. मुनी ने अभी हाल ही में खुलासा किया। बहरहाल, प्रो. एस.डी. मुनी के माध्यम से उस समय भारत की केंद्र में बैठी भाजपा सरकार के साथ संपर्क साध कर अपने बारे में बनी धारणा को ठीक करने का आग्रह किया गया था। यह पिछले दिनों अखबार की सुर्खियों में बना रहा। शायद इस कारण भी कि इस आग्रह व संपर्क के बाद सीपीएन-माओवादी के नेतृत्व का भारत सरकार के अंदरूनी हिस्सों से रिश्ता मजबूत बनता गया और बाद में एक दूसरे पर रॉ का एजेंट होने का आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी चला। यहां यह बताने की जरूरत नहीं कि सबसे अधिक इस तरह के आरोप बाबूराम भट्टाराई पर ही लगे। यह एकीकृत सीपीएन-माओवादी पार्टी में विवाद और आलोचना-आत्मालोचना का एक महत्वपूर्ण मुद्दा भी बना। बहरहाल, आइए, इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर का अनुवाद पढ़ें. -अंजनी कुमार


सी जी मनोज, नई दिल्ली, 19 अगस्त:
नई दिल्ली की कूटनीति का हृदयस्थल माने जाने वाले इलाके चाणक्‍यपुरी में एक आला दर्जे का संस्थान जो थिंकटैंक भी है, स्थित है। इसके लिए जमीन नरसिंहराव की सरकार ने मुहैया करवाई। इस पर भूतपूर्व गुप्तचर अधिकारी और आरएसएस के प्रसिद्ध स्वयंसेवकों के एक समूह की पकड़ है। ये हाल में देश में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन, खासकर बाबा रामदेव के नेतृत्व वाले आंदोलन के पीछे काम करने वाली गुपचुप ताकतें हैं।

वास्तव में यह विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन ही था जहां बाबा रामदेव के नेतृत्व में भ्रष्टाचार विरोधी मोर्चा बनाने का निर्णय लिया गया। यह अन्ना हजारे के पहले भूख हड़ताल पर बैठने के एक दिन पहले की बात है। इस फाउंडेशन के निदेशक अजीत डोभाल हैं। ये इंटेलिजेंस ब्‍यूरो के भूतपूर्व निदेशक हैं। यह फाउंडेशन ही था जिसने रामदेव और टीम अन्ना के सदस्यों को एक साथ लाने का पहली बार गंभीर प्रयास किया।


विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन का उद्घाटन 2009 में हुआ। यह 1970 के शुरुआती दिनों में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के भूतपूर्व महासचिव एकनाथ रानाडे और इसी के प्रचारक पी. परमेश्वरन की अध्यक्ष्यता में स्थापित एक परियोजना है।

पिछले साल के अप्रैल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चिंतक के एन गोविंदाचार्य के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन और फाउंडेशन ने मिलकर भ्रष्टाचार व ब्लैक मनी पर सेमिनार किया। इसमें रामदेव व टीम अन्ना के सदस्य अरविंद केजरीवाल व किरण बेदी ने हिस्सा लिया।

1 व 2 अप्रैल को दो दिवसीय इस सेमिनार के अंत में ‘भ्रष्टाचार विरोधी मोर्चा’ बनाया गया। इसके संरक्षक बने रामदेव और गोविंदाचार्य बने संयोजक। इसमें डोभाल के साथ अन्य सदस्य थे: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एस गुरुमुर्ति, एनडीए सरकार में भारत के राजदूत का प्रभार संभालने वाले भीष्म अग्निहोत्री, प्रोफेसर आर. वैद्यनाथन, जो इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ बेंगलोर में हैं और भाजपा के ब्लैक मनी पर बने टास्क फोर्स के अजीत डोभाल व वेद प्रताप वैदिक।

इस दो दिवसीय सेमिनार के अंत में जारी किये गए पत्र में यह बताया गया कि रामदेव ने ‘भ्रष्टाचार के खिलाफ चौतरफा युद्ध करने का फैसला लिया है और लोगों का ध्यान खींचने वाले एक्शन कार्यक्रम व समानधर्मा भ्रष्टाचार विरोधी संगठन, संस्थान और व्यक्तियों तक पहुंचने के कार्यक्रम के लिए तत्काल ही इस मोर्चे की घोषणा की गई।
इस सेमिनार के तुरंत बाद ही हजारे की भूख हड़ताल शुरु हो गई और अप्रैल के अंत में रामदेव ने रामलीला मैदान में 4 जून से विरोध कार्यक्रम की घोषणा कर दी। यह यूपीए सरकार के खिलाफ पहला सार्वजनिक प्रदर्शन था।

इस सच्चाई के बावजूद कि यह संस्थान सरकार द्वारा दी गई जमीन पर है, इस फाउंडेशन के सलाहकार बोर्ड में गुप्तचर विभाग के भूतपूर्व अधिकारी, रिटायर प्रशासक, कूटनीतिज्ञ और सेवानिवृत्त सेना के लोग बैठते हैं। इसमें रॉ के भूतपूर्व मुखिया ए.के. वर्मा, भूतपूर्व सेना प्रमुख विजय सिंह शेखावत, भूतपूर्व वायुसेना प्रमुख एस. कृष्णास्वामी व एस.पी. त्यागी, भूतपूर्व सीमा सेना बल के प्रमुख प्रकाश सिंह, भूतपूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल, भूतपूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा उपसलाहकार सतीश चंद्रा और भूतपूर्व गृह सचिव अनिल बैजल शामिल हैं।

उक्त सेमिनार के बारे में पूछने पर डोभाल ने बताया कि यह मुद्दा राष्ट्रीय महत्व का है और इसमें बहुत से लोगों के साथ सुब्रमण्‍यम स्वामी, न्यायमूर्ति एम.एन. वेंकटचलैया, न्यायमूर्ति जे.एस. वर्मा, लोक सभा के भूतपूर्व मुख्य सचिव सुभाष कश्यप और भूतपूर्व मुख्य चुनाव आयुक्‍त एन. गोपालस्वामी भी शामिल हुए थे।

यद्यपि डोभाल ने इन बातों के साथ कि वह भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों को समर्थन देते हैं, यह भी कहा कि विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन की इन विरोध प्रदर्शनों में कोई भूमिका नहीं है। उनके अनुसार- ‘हम इस बात को शिद्दत से महसूस करते हैं कि यह समय है जब मजबूत, स्थिर, सुरक्षित और विकासमान भारत दुनिया के मामले में तय हुए चुकी नियति में अपनी भूमिका का निर्वाह करे और राष्ट्रों के सौहार्द में अपने आकांक्षित स्थान को हासिल करे। भ्रष्टाचार और ब्लैक मनी भारत को बर्बाद कर रहे हैं। हम लोगों को इस मुद्दे पर आत्मरक्षात्मक होने की जरूरत नहीं है।’

रामदेव और अन्ना के अलावा एक और शख्स थे जिन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मोर्चा गठित करने का एलान किया। वह थे सुब्रमण्‍यम स्वामी जिन्होंने भारत में भ्रष्टाचार विरोधी एक्शन कमेटी बनाई। हालांकि इस कमेटी की पहली बैठक में मुख्य अतिथि थे रामदेव और गोविंदाचार्य, गुरुमुर्ति, डोभाल और बैद्यनाथन भी यहां उपस्थित थे।

गोविंदाचार्य से फाउंडेशन के रिश्ते के बारे में पूछने पर गोविंदाचार्य ने यह बताया कि वह ‘बहुधा आते ही रहने वालों’ में हैं। ''रामदेव और मैं अगस्त 2010 से लगातार एक दूसरे से संपर्क में हैं (रामदेव दिसंबर 2010 में गुलबर्ग गए थे और गोविंदाचार्य के भारत विकास संगम में हिस्सा लिया था)। वह अक्सर विवेकानंद फाउंडेशन में आते हैं। उनके लिए दिल्ली में ऐसे तो कुछ जगहें हैं पर फाउंडेशन आना उनके लिए सबसे आसान है और दूसरों के लिए भी यहां एक दूसरे से मिलना आसान है।’’

गोविंदाचार्य ने यह भी स्वीकार किया कि सेमिनार रामदेव और अन्ना कैंप को साथ लाने में ‘कुछ हद तक नजदीकी संचालन का काम’ करेगा, यह भी उम्मीद की गई थी।
संघ चिंतक ने इस सूत्रबद्धता को किसी भी तरह से नकारा नहीं। यह पूछने पर कि इससे तो यह बात बनना तय है कि विवेकानंद केंद्र और फाउंडेशन आरएसएस से जुड़े हुए हैं, उन्होंने कहा, ‘कोई इस हद तक पहुंच सकता है... सांगठनिक तौर पर आरएसएस इसमें शामिल नहीं होता है। स्वयंसेवक ही पहलकदमी लेते हैं।’
हालांकि डोभाल के अनुसार फाउंडेशन स्वतंत्र है और इसका आरएसएस से कोई संबंध नहीं है। ‘हमारी उनके (रामदेव) के आंदोलन में कोई भूमिका नहीं है। हम में से वहां कोई गया भी नहीं। यह स्वतंत्र और पंजीकृत इकाई है। हम लोग सरकारी फंड नहीं लेते हैं।’

मुकुल कनितकर जो पहले इस फाउंडेशन से जुड़े हुए थे, उन्‍होंने बताया कि फाउंडेशन द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर आयोजित सेमिनारों में प्रशासकीय अधिकारी व साथ ही प्रधानमंत्री कार्यालय के अधिकारी भी भागीदारी करते रहते हैं। सच्चाई तो यह है कि इसी हफ्ते फाउंडेशन में केंद्रीय संस्कृति मंत्री कुमारी शैलजा ‘द हिस्टॉरिसिटी ऑफ वैदिक एंड रामायण एरा: साइंटिफिक एविडेंस फ्रॉम द डेप्थ ऑफ ओशियन टू द हाइट ऑफ स्काई’ नामक पुस्तक का विमोचन करने वाली हैं।

रामदेव के अभियान के साथ अपने जुड़ाव के बावजूद गोविंदाचार्य यह महसूस करते हैं यह आंदोलन अब खत्म हो चुका है। उन्होंने कहा कि ‘दोनों (अन्ना और रामदेव) का आंदोलन सत्ता और पार्टी राजनीति के ब्लैक होल में घुस कर खत्म हो गया... रामदेव अब भाजपा के एजेंडे को आगे बढ़ाने वाले या उसका हिस्सेदार बन गए हैं।’

देशभक्ति का स्वांग बंद करो, जनद्रोही क़ानून रद्द करो

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/11/2012 04:23:00 PM

दख़ल, लखनऊ की पहल पर 9 अगस्त से 15 अगस्त 2012 तक लखनऊ में विभिन्न संगठनों द्वारा जनद्रोही क़ानूनों और राज्य दमन के ख़िलाफ़ सात दिवसीय साझा दस्तक का आयोजन किया जा रहा है। जन संवाद के इस कार्यक्रम में जनपक्षधर कलाकार और क़लमकार अपनी रचनाओं के साथ हिस्सेदारी बंटायेंगे। लखनऊ में आयोजित प्रेस वार्ता में जारी इस साझे आयोजन का परचा पेश है.

इक़बालिया बयान

पूरे होशो-हवास में और बिना किसी दबाव के हम एलान करते हैं कि हां, हम भी देशद्रोही हैं और हमें इस पर गर्व है। सरकार चाहे तो हमें गिरफ़्तार करे, जेल में ठूंसें, मुक़दमा ठोंके और जज साहेबान बामशक़्क़्त उम्र क़ैद की सज़ा सुनायें।

साथियों,

हम सफ़ाई नहीं देना चाहते। जिरह करना चाहते हैं कि यह देश आख़िर किसका है? कारपोरेट घरानों का, बिल्डरों का, थैलीशाहों का, सेज़ के शहंशाहों का, मुनाफ़े के लुटेरों का, माफ़िया और बिचौलियों का, संसद और विधानसभाओं में कांव-कांव करनेवालों का, नक़ली मुद्दों पर आग लगानेवालों का... अपराध, उद्योग और राजनीति के नापाक गठबंधन का, बाज़ार की दादागिरी का? या कि देश के आम नागरिकों का जिनके सामने जीने का संकट दिनोंदिन गहराता जा रहा है? शर्म की बात है कि आज़ादी के 64 बरस गुज़र गये लेकिन देश की मेहनतकश जनता को दुख-मुसीबतों और अभावों की गठरी से आज़ादी नहीं मिल सकी। नाइनसाफ़ी का पहाड़ और ऊंचा हो गया, ग़ैर बराबरी की खाई और चौड़ी हो गयी।

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में इतना अधिक विकास हुआ कि मछलियां बूंद-बूंद को तरसें और मगरमच्छ भरा समुंदर पी जायें, कि बस्ती-बस्ती आफ़त बरसे और महलों की रौनक़ बढ़ जाये। यह निजीकरण, उदारीकरण उर्फ़ लूट के खगोलीकरण का नतीज़ा है- लोकतंत्र और मानवता की हत्या है, अधर्म और महापाप है।

ग़ुलाम भारत में बिरसा मुंडा और भगत सिंह सरीखे क्रांतिवीरों को, कला और क़लम के निर्भीक सिपाहियों को और यहां तक कि गांधीजी जैसे अहिंसा के पुजारियों को भी देशद्रोही होने का तमग़ा मिला था। आज़ाद हिंदुस्तान में भी यह सिलसिला बदस्तूर जारी है। जो जनता पर निशाना साध रही नीतियों और योजनाओं की मक्कारियों को नंगा करे, सच बोले, इनसाफ़ की तरफ़दारी करे, देश की इज़्ज़त-आबरू को लुटने से बचाने की क़सम खाये- राजद्रोही उर्फ़ देशद्रोही कहलाये। जो विकास के देवताओं पर अपनी धरती, नदी, पहाड़ और जंगल को, क़ुदरत के बेशक़ीमती ख़ज़ाने को, अपनी आजीविका, आत्मनिर्भरता, परिवेश, संस्कृति और स्वाभिमान को न्यौछावर करने से इनकार करे- विकास का दुश्मन उर्फ़ माओवादी कहलाये, देश की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा ख़तरा हो जाये।

मशहूर कवि रघुवीर सहाय की पंक्तियां हैं ‘राष्ट्रहान में भला कौन वह भारत भाग्य विधाता है? डरा हुआ मन बेमन जिसका बाजा रोज़ बजाता है।‘ भारत भाग्य विधाता कई भेस में है- हिंदुस्तान के बाहर भी है, अमरीका और इज़रायल में भी है। वह विकास का मसीहा है, इतना बड़ा देशभक्त है कि हर क़ीमत पर हिंदुस्तान को महाबली देशों की जमात में शामिल कराने पर आमादा है। वह आतंकवाद का शोर मचा कर, सभ्यताओं के संघर्ष का बिगुल बजा कर लूट का अश्वमेघ यज्ञ कराता है। उसे सरहदों की हिफ़ाज़त की चिंता है, देशवासियों के जीवन की नहीं।

सीमा आज़ाद और उनके पति विश्वविजय का यह संगीन जुर्म था कि उन्होंने इस बदसूरत, फूहड़ और अश्लील तसवीर को बदलने की ठानी। क़लम थामी और संघर्ष की राह चुनी। हज़ारों लोगों को उजाड़नेवाली गंगा एक्सप्रेस वे जैसी परियोजनाओं और अपनी ही जनता के ख़िलाफ़ युद्ध का मोर्चा खोलने जैसे सरकारी धतकरमों को कटघरे में खड़ा करने की ज़ुर्रत की। यह ख़तरनाक़ काम उनके माओवादी होने का पक्का सबूत बना। ढाई साल पहले दोनों क़ानून के हत्थे चढ़े, सीधे जेल पहुंचे और गुज़री 8 जून को निचली अदालत ने उन्हें उम्र क़ैद की सज़ा सुना दी। राहत की बात है कि इसी 6 अगस्त को ज़मानत पर उनकी रिहाई हो चुकी है लेकिन याद रहे कि अभी जोकरी इल्ज़ामों से रिहाई बाक़ी है। यह अकेला मामला नहीं है। आज हिंदुस्तान की जेलें ऐसे हज़ारों क़ैदियों से आबाद हैं जिन्होंने ज़ुबान खोलने का गुनाह किया। अपना भारत महान- जय हे, जय हे, भारत भाग्य विधाता...

तो गिरफ़्तारी, मुक़दमा, जेल उन सिरफिरों को सबक़ सिखाने के लिए है जो झूठी आज़ादी से देश और देश के लोगों की रिहाई चाहते हैं। समझदारी की अलख जगाते हैं कि घुट-घुट कर मरने से तो अच्छी है लड़ाई... सबके साथ, सबके भले के लिए। यह लड़ाई आसान नहीं- शिक़ायत और सुनवाई के तमाम संवैधानिक रास्तों की नाकेबंदी है। फ़रमान है कि उफ़ न करो, नज़र झुका के चलो, हदों में रहो। वरना भुगतो, क़ानून का बेरहम डंडा झेलो। यह शर्मनाक है कि विलायती हुक़ूमत की यह ज़ालिमाना विरासत आज़ाद हिंदुस्तान में भी बाअदब जारी है बल्कि और ज़हरीली हो गयी है। अदालतें बेचारी क्या करें? क़ानून तो शहंशाहों का चलता है।

आज़ादी और जम्हूरियत को घायल करनेवाले, सच को सज़ा और झूठ को बाइज़्ज़त बरी करनेवाले, इनसाफ़ की आवाज़ों को बेड़ियों में जकड़ने और गिद्ध इरादों को पूरा आसमान सौंप देनेवाले ऐसे बेहया, भ्रष्ट और शातिर क़ानूनों पर हमारी हज़ार बार आक्थू-आक्थू... ।

यह समय की मांग है कि हम बेहतर भविष्य का साझा सपना बुनें, चुप्पी तोड़ें और गर्व से कहें कि सच की पैरवी करना, दुखियारों के साथ खड़े होना, इनसानी हैसियत में और अपनी हंसी-ख़ुशी से जीने का अधिकार मांगना अगर देशद्रोह है तो बेशक़, हम भी देशद्रोही हैं। सच्चे हिंदुस्तानी का यही धर्म है- देश के ज़िम्मेदार नागरिक होने का यही तक़ाज़ा है, बदहालियों को अंगूठा दिखाने का यही रास्ता है, अंधेरा मिटाने का यही अचूक मंत्र है।

इसी कड़ी में दख़ल, लखनऊ की पहल पर भारत छोड़ो आंदोलन की 70वीं सालगिरह, 9 अगस्त से 65वें स्वाधीनता दिवस, 15 अगस्त 2012 तक लखनऊ में सात दिवसीय साझा दस्तक का आयोजन किया जा रहा है। कार्यक्रम का समापन पड़ाव धरना स्थल होगा- शाम 3 से 5 बजे तक। आपसे अपील है कि कार्यक्रम के हमसफ़र बनें, इस परचे को जन-जन तक पहुंचायें और मिल कर आवाज़ उठायें कि-

देशभक्ति का स्वांग बंद करो, जनद्रोही क़ानून रद्द करो

पिंजरा खोलो, जनता को आज़ादी दो

साझीदार:

काला क़ानून एवं दमन विरोधी मंच, सीमा-विश्वविजय रिहाई मंच, अमुक आर्टिस्ट ग्रुप, भारतीय जन संसद, इंडियन वर्कर्स कौंसिल, इनसानी बिरादरी, जन संस्कृति मंच, क्रांतिकारी सांस्कृतिक मंच, मज़दूर परिषद

दख़ल, लखनऊ द्वारा जारी


संपर्क: 9453682439 , 9335556115 , 9335223922 , 9415011487 dakhalgroup@gmail.com

खुफिया एजेंसियां और उत्पीड़क व्यवस्था

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/04/2012 03:40:00 PM


राजीव यादव का लेख

फसीह महमूद? खुद एक सवाल बनकर रह गया है। सरकार के तमाम ओहदेदारों ने पहले तो फसीह के बारे में कोई जानकारी न होने की बात कही। फसीह की पत्नी निकहत परवीन ने जब 24 मई को सुप्रिम कोर्ट में हैबियस कार्पस दाखिल किया तो उसके बाद 28 मई को फसीह के खिलाफ वारंट और 31 मई को रेड कार्नर नोटिस जारी किया गया। ऐसे दौर में जब सरकार कुछ न बता पाने की स्थिति में हो और खुफिया एजेंसियों के दबाव में रेड कार्नर नोटिस जारी की जा रही हो तो इस बात को समझना चाहिए कि सरकार के समानान्तर खुफिया द्वारा संचालित एक व्यवस्था है जिसकी सरकार के प्रति कोई जवाबदेही नहीं है।

सवाल यह है कि 17 मई को ही निकहत ने विदेश मंत्रालय को ईमेल द्वारा सूचित किया था कि उनके पति को 13 मई को सउदी के अल जुबैल से उठाया गया और भारत ले आने की बात कही गई। जिस पर विदेश मंत्रालय के जिम्मेदार ने कहा कि उन्हें नहीं मालूम की फसीह महमूद कौन है और भारत की कोई भी एजेंसी फसीह को किसी भी आरोप में नहीं ढूंढ़ रही है।

यहां सवाल उठता है कि किसी नागरिक के लापता होने पर यलो कार्नर नोटिस जारी की जाती है, तो ऐसे में फसीह के लापता होने पर यलो कार्नर नोटिस क्यों नहीं जारी की गई? आखिर किस आधार पर रेड कार्नर नोटिस जारी करके कह दिया गया कि उसकी तलाश 2010 से थी? अगर 2010 से फसीह महमूद की तलाश थी तो क्यों निकहत परवीन के सवाल पर देश के गृह मंत्री पी चिदंबरम और विदेश मंत्री झूठ बोल रहे थे। सुशासन वाली नीतीश सरकार ने भी आज तक निकहत के सवालों का जवाब नहीं दिया। ऐसे बहुत से सवाल पिछले दो महीने से गायब फसीह महमूद को लेकर हैं। निकहत के सवाल और फसीह के गायब होने की दास्तान कुछ इस तरह है।

13 मई को खुफिया एजेंसियों के लोग फसीह महमूद के सउदी स्थित आवास पर आए और कहा कि भारतीय विदेश मंत्रालय के निवेदन पर फसीह को तात्कालिक रुप से भारत ले जाना है। पूछने पर बताया कि फसीह को किसी आरोप में भारत भेजा जा रहा है। निकहत बताती हैं कि इसके बाद उन्होंने सउदी के भारतीय दूतावास से सम्पर्क किया तो उन्होंने मुझे कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

16 मई की सुबह निकहत भी भारत आ गईं पर उन्हें अपने पति की कोई खबर नहीं मिली। इस दरम्यान उन्हें द हिंदू समाचार पत्र की एक रिपोर्ट से मालूम चला कि भारत के गृह मंत्री, विदेश मंत्री ने यह कहा कि उनके पास फसीह के बारे में कोई सूचना नहीं है। सीबीआई कमिश्नर, एनआईए और दिल्ली पुलिस का भी यह बयान था कि फसीह पर कोई चार्ज नहीं है।

निकहत ने समाचार पढ़ कर अपने पति की जानकारी के लिए विदेश मंत्रालय के संयुक्त सचिव को 17 मई को ईमेल किया। 18 मई को ईमेल द्वारा उन्हें सूचना दी गई कि उनके मेल को खाड़ी सेक्सन में भेज दिया गया है और जानकारी मिलते ही उन्हें सूचित किया जाएगा। निकहत आगे कहती हैं कि खाड़ी सेक्सन का जो नम्बर और ईमेल आईडी उन्हें मिली उस पर उन्होंने मेल और बात की, पर उन्होंने कहा कि उनके पास फसीह के बारे में कोई सूचना नहीं है, दो दिन बाद बताएंगे। फिर मैंने विदेश मंत्रालय, गृह मंत्रालय, एनआईए, सीबीआई कमीश्नर, दिल्ली, कर्नाटक, बिहार, आंध्र प्रदेश और मुंबई सरकार, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री बिहार बहुतों को मेल और फैक्स किया। सब ने यही कहा कि कोई चार्ज नहीं है।

निकहत बताती हैं कि विदेश मंत्री से जब एक पत्रकार ने फसीह के बारे में पूछा तो उन्होंने ये कहा कि क्या फसीह ‘डिप्लोमेट’ है? बहरहाल, विदेश मंत्रालय के अंडर सेक्रेटरी श्री रेड्डी ने कहा कि वे लोग नहीं जानते कि फसीह महमूद कौन है और भारत की कोई भी एजेंसी फसीह को किसी भी आरोप में नहीं ढूंढ़ रही है। हम इसलिए फसीह को ढूंढ रहे हैं, क्योंकि उनकी पत्नी ने हमें पत्र लिखा है।

निकहत का सवाल लाजिमी है कि मेरे पति भारतीय हैं, इसलिए उनका फर्ज था कि वे सउदी सरकार से पूछें कि हमारे देश का यह नागरिक कहां है। सरकार अगर नहीं जानती थी तो उसे गुमशुदा व्यक्ति की तलाश के लिए यलो कार्नर नोटिस जारी करनी चाहिए थी?

मीडिया में आ रही रिपोर्टों से निकहत को यह अंदाजा हो गया था कि उनके पति को किसी गंभीर साजिश में फंसाने की कोशिश हो रही है। अरब न्यूज ने 19 मई को उनकी कम्पनी के मैनेजर को कोड करते हुए लिखा कि अल जुबैल पुलिस और भारतीय दूतावास के कुछ अधिकारियों ने बताया है कि महमूद की तलाश भारत में कुछ असामाजिक गतिविधियों में है, इसलिए उसे तत्काल पुलिस को सौंप दिया जाय। इस खबर में यह भी लिखा है कि महमूद को सउदी पुलिस को सौंपने के बाद सउदी के आंतरिक मंत्रालय ने भारतीय दूतावास के अधिकारियों को महमूद के भेजे जाने व फ्लाइट का विवरण बता दिया। जहां पर पहुंचने पर उसे पकड़ लिया गया। (http://www.arabnews.com/ksa-deports-%E2%80%98bangalore-blast-suspect%E2%80%99s-aide%E2%80%99) सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हैबियस कार्पस में भी इस खबर की कापी संलग्न है।

सवाल दर सवाल से उलझती निकहत ने सुप्रिम कोर्ट में 24 मई को हैबियस कार्पस दाखिल किया और विदेश मंत्रालय, गृह मंत्रालय, एनआईए, दिल्ली, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, मुंबई और बिहार सरकार को पक्षकार बनाया। 30 को सुप्रिम कोर्ट ने नोटिस जारी की।

पहली जून को कोर्ट की सुनवाई में एक तरफ सरकार दूसरी तरफ निकहत। सरकार अब संविधान द्वारा दिए गए मूल अधिकारों को अपने गैरकानूरी दांव-पेंचों से कतरने की कोशिश करने लगी थी। सुनवाई से एक दिन पहले 31 मई को ही रेड कार्नर नोटिस जारी कर दिया कि आतंकवाद, हथियार और विस्फोटकों के मामले में महमूद की तलाश है। निकहत कहती हैं कि रेड कार्नर नोटिस अपराधियों के लिए होता है। मगर जैसा कि यह लोग जानकारी न होने की बात कह रहे थे, उन्हें यलो कार्नर नोटिस जारी करनी चाहिए थी, वारंट भी 28 मई को निकाला गया लेकिन हमें कोई भी आधिकारिक दस्तावेज या जानकारी नहीं दी गई। सरकार पर आरोप लगाते हुए कहती हैं कि 13 मई को जो उठाया गया वो गैरकानूनी था, इसलिए ये लोग अपनी गलती छुपाने के लिए यह सब कर रहे थे।

यहां सवाल यह उठता है कि जब लापता होने पर यलो कार्नर नोटिस जारी की जाती है तो सरकार ने बार-बार सवाल उठने पर भी क्यों नहीं जारी किया? इसका साफ मतलब है कि सरकार जानती थी कि फसीह कहां हैं और जब वह खुद के गैरकानूनी जाल में फसती नजर आई तो उसने आनन-फानन में 28 मई को वारंट और 31 मई को रेड कार्नर नोटिस जारी किया।

यहां सवाल न्यायालय पर भी हैं कि स्वतः सज्ञान लेने वाले न्यायालय के सामने सरकार द्वारा मूल अधिकारों को गला घोंटा जा रहा था। यह पूरी परिघटना बताती है कि किस तरह हमारे देश की खुफिया एजेंसियां न्यायालयों और सरकारों पर हाबी हो गई हैं और उनकी हर काली करतूत को छुपाने के लिए मूल अधिकार क्या संविधान का भी हनन किया जा सकता है। जैसा कि फसीह मामले में हुआ।

पहली जून की सुनवाई में विदेश मंत्रालय, गृह मंत्रालय और दिल्ली पुलिस की तरफ से अपर महाधिवक्ता आए थे, मगर कर्नाटक और किसी अन्य पक्षकार की तरफ से कोई नहीं आया। जब न्यायाधीश महोदय ने पूछा कि फसीह कहां है और उस पर क्या आरोप हैं तो वे समाचार रिपोर्ट पढ़ने लगे। तब न्यायालय ने उनको न्यूज क्लीप पढ़ने से मना करते हुए कहा कि इतना संवेदनशील मामला है और आप न्यूज क्लीप पढ़ रहे हैं, जो बार-बार बदलती रहती हैं, आप बताएं कि फसीह पर आरोप क्या है और क्यों उठाया है? इस पर पक्षकारोंने कहा कि वे तैयारी में नहीं हैं।

निकहत कहती हैं कि मुझे यह समझ में नहीं आ रहा है कि अगर कोई रेड कार्नर नोटिस जारी करता है, तो इसका मतलब उसे मालूम नहीं कि सन्दिग्ध कहां छुपा है? जबकि एजेंसीज को मालूम था। मगर कोर्ट में उन्होंने आरोप बताने के लिए वक्त लिया। इसका मतलब है कि उन्हें आरोप फर्जी तरीके से गढ़ने थे। 6 जून को सुप्रिम कोर्ट के समक्ष गृह मंत्रालय और विदेश मंत्रालय ने संयुक्त रुप से कहा कि फसीह उनकी हिरासत में नहीं है, और न ही अल जुबैल, उनके आवास से 13 मई को उठाने में उनकी कोई भूमिका है। (http://www.firstpost.com/india/saudi-press-says-govt-deported-missing-indian-engineer-335298.html) इस बात का भी खंडन किया कि उन्हें भारत लाया गया है। उन्होंने 10 दिन का वक्त मांगा। अगली सुनवाई की तारीख 9 जुलाई को थी।

गृह मंत्री पी चिदम्बरम ने उन मीडिया रिपोर्ट को खारिज किया जिसमें महमूद के बारे में बताया गया था कि भारतीय अधिकारियों द्वारा 2010 के चिन्नास्वामी स्टेडियम मामले में उन्हें पकड़ा गया है। आरोपों और तथ्यों को बेबुनियाद बताया। (http://www.firstpost.com/india/missing-engineers-wife-seeks-answers-from-govt-333956.html)

दरअसल गौर से देखा जाय तो यह एक बड़ी खतरनाक स्थिति हैं। एक तरफ गृह मंत्री कह रहे हैं कि उन्हें मालूम नहीं दूसरी तरफ उस आदमी पर आतंकवाद के नाम पर रेड कार्नर नोटिस जारी की जाती है। दरअसल सरकार के समानान्तर एक व्यवस्था खुफिया एजेंसियों द्वारा संचालित की जा रही है। जिसकी सरकार के प्रति कोई जवाबदेही नहीं है। यह एक महत्वपूर्ण चिंता और जांच का विषय है। क्योंकि एक तरह से देखा जाय तो यह खुफिया द्वारा सरकार टेक ओवर है।

सरकार की भूमिका पर वे कहती हैं कि विदेश मंत्रालय या गृह मंत्रालय को पता करना होता तो उनका एक फोन ही काफी था। बाद में उनका यह बयान अखबारों में आने लगा कि फसीह सउदी में छुपा हुआ है। जबकि जो पहले ही उठा लिया गया हो, वो छुपा कैसे हो सकता है? 9 की सुनवाई में सरकार ने कहा कि सउदी सरकार से बात हुई है और उन्होंने 26 जून को यह बताया है कि फसीह वहां है, मगर इसमें उनका कोई हाथ नहीं है।

भारत सरकार ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए अब तक नहीं बताया है कि फसीह को सउदी में कब उठाया गया। यहां सवाल यह है कि एक भारतीय नागरिक जिसका पूरा परिवार और समाज पिछले दो महीनों से परेशान है उसको यह बताना कहां से सुरक्षा की दृष्टि से  खतरनाक है? खतरनाक तो पिछले दो महीनों से उसका गायब होना हैं। क्या सुरक्षा का हवाला देने वाली सरकार अपने नागरिक का अपहरण करने वाली खुफिया एजेंसियों के खिलाफ कार्यवाई करने की जहमत उठाएगी।

निकहत का सवाल है कि जब फसीह को 13 मई को उठाया तो उसके खिलाफ रेड कार्नर नोटिस भी जारी नहीं था, तो आखिर सउदी सरकार को कैसे पता चला कि फसीह को उठाना है? भारत में किस आरोप के कारण उसे डिपोर्ट करना है? या तो भारतीय सरकार ने वहां के आंतरिक मत्रालय से बात की और फसीह को उठवाया या फिर सउदी ने पहले ही भविष्यवाणी कर ली थी? फसीह को उठाने की बात जैसा कि सरकार ने अंतिम सुनवाई में बताया तो फिर यह कैसे हो सकता है कि वो कहे कि उठाने में उनका कोई हाथ नहीं है? दोनों सरकारों के सलाह-मशवरे के बगैर फसीह को उठाया तो नहीं जा सकता था? प्रत्यर्पण संधि के कुछ नियम कायदे होते है और उनके तहत ही यह सब हुआ होगा, सउदी सरकार किसी भारतीय मामले में बिना भारत सरकार की किसी सूचना या बातचीत के ऐसा नहीं कर सकती है?

आश्चर्य से निकहत कहती है कि जो रेड कार्नर नोटिस जारी हुआ है, उसमें बताया गया है कि फसीह 2010 से गायब है। जबकि फसीह 2010 में भी भारत आए हैं, और 2011 में जो हमारी शादी हुई उसमें भी वो आए हैं और हमेशा दिल्ली हवाई अड्डे से ही आए और गए भी हैं। निकहत सवालिया जवाब देते हुए कहती हैं कि तो क्या इन एजेंसियों ने जानते हुए रेड कार्नर नोटिस में उनके भागे होने की बात कही है, ताकी वो केस बना सकें? 11 जून को कर्नाटक ने काउंटर एफीडेविड कोर्ट में दाखिल की। उसमें उन्होंने फसीह का पूरा कैरियर डिटेल डाला। जिसमें सउदी में उन्होंने अब तक कहां और किस-किस पोजेक्ट पर काम किया है, पूरे तथ्यों और कम्पनी के नाम के साथ। फिर निकहत का सवाल कि अगर उनसे कोई पूछताछ नहीं की गई तो ये सारी बातें कर्नाटक पुलिस को कैसे पता चलीं?

खुफिया एजेंसियों द्वारा फसीह महमूद के अपहरण और उन पर आतंकवाद के फर्जी आरोपों को चस्पा करने के कुछ सवालों का जवाब भारत सरकार को देना ही होगा और उन सवालों के भी जवाब देने होंगे जिनके उसने नहीं दिए। क्योंकि इन सवालों ने पिछले दो महीने से निकहत परवीन और उनके पूरे परिवार के होश उड़ा दिए हैं। देश के गृह मंत्री पी चिदंबरम को भी अपने गैर जिम्मेदाराना आपराधिक रवैए पर जवाब देना ही होगा। सुशासन वाले नितीश जी निकहत को न जानते हों तो आपको जानना चाहिए क्योंकि निकहत का सवाल इस लोकतंत्र का सवाल हैं कि क्या वो अपने देश के नागरिकों को जीने का अधिकार भी अब नहीं देना चाहता?

निकहत बहुत दिलेरी से कहती हैं कि अब वो वक्त गया कि झूठे आरोपों में दस-दस साल तक लोग जेलों में सड़ते थे। हमारे सवालों का जवाब सरकार को देना ही होगा?

देखते हैं निकहत दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतत्र में कब तक अपने सवालों का जवाब खुद ब खुद ढूढंती हैं? और उस दिन का इंतजार कब पूरा होगा जब सरकार उनके सवालों का जवाब देते हुए उनके पति को उनकी आखों के सामने लाती है?

असम हिंसा: खतरे की घंटी

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/04/2012 03:22:00 PM



हाशिया की राम पुनियानी के इस लेख के कई बिंदुओं से असहमति है, लेकिन असम में मौजूदा हालात और ब्राह्मणवादी सांप्रदायिक ताकतों के दुष्प्रचार को देखते हुए इस लेख को पोस्ट किया जाना जरूरी लग रहा है. 

असम के बोडो क्षेत्रीय स्वायत्तशासी जिलों कोकराझार और चिरांग में हुई व्यापक हिंसा (जुलाई 2012) ने देश की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया है। प्रधानमंत्री स्वयं हिंसाग्रस्त क्षेत्र में पहुंचे और वहां के घटनाक्रम को देश के लिए कलंक बताया। उन्होंने हिंसा पर नियंत्रण करने में असफल रहने पर अपनी ही पार्टी के मुख्यमंत्री की जमकर खिंचाई भी की। क्षेत्र में सेना की तैनाती में अक्षम्य देरी हुई, जिससे हालात बिगड़ते चले गए। असम में जो कुछ घटा, उसमें बड़ी संख्या में लोगों की जानें तो गईं हीं, इससे भी अधिक त्रासद था लाखों लोगों का अपने घर-बार छोड़कर भागने पर मजबूर हो जाना। विशेषकर तब जबकि बुआई का मौसम शुरू ही हुआ था। इन लोगों को जिन राहत शिविरों में रखा गया है वहां सुविधाओं का भीषण अभाव है और इन शिविरों की संख्या भी जरूरत से बहुत कम है। एक अन्य दुःखद पहलू यह है कि इस हिंसा को बोडो और “अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों“, जिनमें से अधिकांश मुसलमान हैं, के बीच संघर्ष के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।

यह पहली बार नहीं है कि असम को जातीय हिंसा ने अपनी चपेट में लिया हो। परंतु हालिया हिंसा का व्यापक और दूरगामी प्रभाव पड़ने का अंदेशा है। इस क्षेत्र में स्थानीय जनजातीय समूहों और मुस्लिम अल्पसंख्यक, जिन्हें “बांग्लादेशी घुसपैठिए“ कहा जाता है, के बीच कई दशकों से शत्रुतापूर्ण रिश्ते रहे हैं। सभी स्थानीय समस्याओं के लिए तथाकथित बांग्लादेशी घुसपैठियों को दोषी बताया जाता रहा है। ऐसा प्रचार किया जाता रहा है कि असम एक ज्वालामुखी के मुहाने पर बैठा है। “असम असमियों के लिए है“, यह नारा भी उछाला जाता रहा है। यह नारा ठीक उसी तरह का है जैसा कि शिवसेना महाराष्ट्र में उछालती रही है। शिवसेना का भी कहना है कि महाराष्ट्र केवल मराठियों के लिए है। असम में व्याप्त इस गंभीर सामाजिक टकराव को केन्द्र व राज्य, दोनों ही सरकारें नजरअंदाज करती रही हैं।

इस आंतरिक टकराव का प्रकटीकरण पहली बार तब हुआ जब आल असम स्टूडेन्टस यूनियन ने मतदाता सूचियों में से “बांग्लादेशी घुसपैठियों“ के नाम हटाने की मांग को लेकर आंदोलन शुरू किया। इस आंदोलन को भाजपा का पूरा समर्थन प्राप्त था। इसी दौरान अल्पसंख्यकों के खिलाफ भयावह हिंसा हुई। नेल्ली जनसंहार में कुछ ही घंटों के भीतर तीन हजार से ज्यादा मुसलमानों को मौत के घाट उतार दिया गया। इस आंदोलन और जनसंहार के बाद हुए चुनाव आल असम स्टूडेन्टस यूनियन जो अब असम गणपरिषद के नाम से जानी जाती है, असम में सत्ता में आ गई। नेल्ली जनसंहार की जांच के लिए त्रिभुवनदास तिवारी आयोग की नियुक्ति की गई। असम गणपरिषद ने सत्ता में आने के बाद नेल्ली जनसंहार के दोषियों के खिलाफ सारे आरोप वापस ले लिए और तिवारी आयोग की रिपोर्ट को कभी सार्वजनिक नहीं किया गया।

इसके एक दशक बाद, हिंसा का एक और दौर हुआ जिसके शिकार आज भी राहत शिविरों में नारकीय जीवन बिता रहे हैं। पिछले दशक के शुरूआती वर्षों में बोडो जनजातीय नेताओं के साथ एक समझौता किया गया जिसके अंतर्गत बोडो क्षेत्रीय स्वायत्तशासी परिषद का गठन हुआ। इस परिषद के अंतर्गत चार जिले-कोकराझार, चिरांग, बक्सा व उदलगिरी रखे गए। समझौते के अंतर्गत, बोडो अतिवादियों को अपने हथियार डालने थे जो उन्होंने नहीं किया और इन हथियारों का उपयोग अन्य स्थानीय निवासियों को आतंकित करने के लिए किया जाता रहा। अलग-अलग अनुमानों के अनुसार, इन जिलों में बोडो आबादी का प्रतिशत 22 से 29 के बीच है। उनके अलावा, वहां संथाल, राजबंगी, अन्य आदिवासी और मुसलमान भी रहते हैं। बोडो इन जिलों में अल्पसंख्यक हैं। इस क्षेत्र में अल्पसंख्यक होने के बावजूद, बोडो समुदाय ने शासन के अपने अधिकार का दुरूपयोग करते हुए ऐसी नीतियां लागू कीं जिससे गैर-बोडो निवासियों के सामाजिक-आर्थिक हालात बिगड़ते गए। इस क्षेत्र के गैर-बोडो निवासी बदहाली में जी रहे हैं और वे बोडो क्षेत्रीय स्वायत्तशासी परिषद के गठन के खिलाफ थे और हैं। हालिया हिंसा के पहले ऐसी अफवाहें फैलाई गईं कि बांग्लादेश से बड़ी संख्या में हथियारबंद लोग इस क्षेत्र में घुस आए हैं। इसके बाद हिंसा शुरू हो गई।

असम के मुख्यमंत्री ने हिंसा के पीछे “विदेशी हाथ“ होने से इंकार किया है। इस क्षेत्र में असली समस्या यह है कि समय के साथ आबादी बढ़ गई है और खेती की जमीन व अन्य आर्थिक संसाधनों पर भारी दबाव पड़ रहा है। इस दबाव से जनित समस्याओं को सुलझाने की बजाए क्षेत्र की आर्थिक बदहाली और वहां रोजगार की कमी के लिए बांग्लादेशी घुसपैठियों को दोषी ठहराया जा रहा है। “बांग्लादेशी घुसपैठिए“ शब्द पूरे देश व विशेषकर असम में बहुत लोकप्रिय हो गया है। मुंबई में जब बेरोजगारी का संकट बढ़ने लगा तो इसका दोष गैर-मराठी प्रवासियों के सिर मढ़ दिया गया। सच यह है कि बढ़ती आबादी और घटते संसाधनों के कारण सारे देश में बेरोजगारी और गरीबी बढ़ रही है और इसके लिए किसी समूह विशेष को दोषी ठहराना व्यर्थ है। असम में समस्या और गंभीर इसलिए है क्योंकि जिन लोगों को समस्या के लिए दोशी ठहराया जा रहा है, वे विदेशी बताए जाते हैं। क्या यह सच है?

असम में बांग्लाभाषियों की बड़ी आबादी है। उनमें से अधिकांश मुसलमान हैं। क्या ये लोग हाल में यहां आकर बसे हैं? क्या उनकी घुसपैठ के पीछे कोई राजनैतिक लक्ष्य है? क्या वे केवल पिछले कुछ दशकों से ही यहां आते रहे हैं?

बांग्लादेशी घुसपैठियों के मिथक का इस्तेमाल लम्बे समय से पूरे देश के साम्प्रदायिक तत्वों द्वारा अपने हित साधन के लिए किया जाता रहा है। यहां तक कि पूरे देश में इस मिथक ने जड़ें पकड़ ली हैं। बांग्लादेशी घुसपैठियों के मसले को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया जा रहा है। बंगाली प्रवासियों का असम में आने का सिलसिला 1875 के आसपास शुरू हुआ परंतु इसे गति दी अंग्रेजों ने 20वीं सदी के पहले दशक में। उस समय पड़ोसी बंगाल की आबादी बहुत ज्यादा हो गई थी और वहां राजनैतिक चेतना भी फैल रही थी। बंगाल में जनसंख्या घनत्व बहुत अधिक हो जाने के कारण वहां बार-बार अकाल पड़ रहे थे। इसके विपरीत, असम में आबादी बहुत कम थी और वहां से ब्रिटिश सरकार को अपेक्षित राजस्व प्राप्त नहीं हो रहा था। इस समस्या के सुलझाव के लिए ब्रिटिश सरकार ने “मानवरोपण’’ कार्यक्रम शुरू किया, जिसके अंतर्गत बंगाल के लोगों को असम में बसने के लिए प्रेरित किया गया और उन्हें इसके बदले बहुत-से लाभ भी दिए गए। ब्रिटिश शासकों ने अपनी “फूट डालो और राज करो“ की नीति के अंतर्गत लाईन सिस्टम लागू किया जिसके अंतर्गत प्रवासियों और स्थानीय निवासियों को अलग-अलग क्षेत्रों में बसाया जाता था। बांग्लाभाषी मुसलमानों का असम में बसने का यह सिलसिला लंबे समय तक चला और सन 1930 के आसपास, बांग्लाभाषी मुसलमानों का असम की आबादी में अच्छा-खासा  हिस्सा हो गया था। आजाद भारत में असम में मुस्लिम आबादी की दशकीय वृद्धि दर उतनी ही रही है जितनी कि अन्य राज्यों की मुस्लिम आबादी की (स्त्रोतः मुस्लिम्स इन इंडियाः एस. यू. अहमदः जनगणना आंकड़ों के विश्लेषण पर आधारित)।

आजादी के तुरंत बाद के सालों में असम की कुल आबादी और उसमें मुसलमानों के प्रतिशत संबंधी आंकड़े एकदम स्पष्ट हैं। हां, जिस समय पाकिस्तानी सेना पूर्वी पाकिस्तान के निवासियों का दमन कर रही थी उस समय कुछ बांग्लादेशी अवश्य भाग कर असम आएं होंगे। उसके बाद भी आर्थिक कारणों से असम में गरीब बांग्लादेशियों के बसने का सिलसिला जारी रहा होगा, जैसा कि दुनिया के सभी हिस्सों में होता है। प्रश्न यह है कि हम इस आप्रवासन को किस दृष्टि से देखें। उदाहरणार्थ, भारत में बहुत बड़ी संख्या में नेपाली रहते हैं परंतु उन्हें न तो नीची निगाहों से देखा जाता है और न ही उनका दानवीकरण किया जाता है। यहां तक कि बांग्लादेश से आने वाले हिन्दुओं के साथ प्रवासी के रूप में व्यवहार किया जाता है जबकि वहीं से आने वाले मुसलमानों को घुसपैठिया, भारत की सुरक्षा के लिए खतरा और न जाने क्या क्या बताया जाता है। यहां यह उल्लेखनीय है कि उत्तर-पूर्वी राज्यों में व्यापार-व्यवसाय पर मुख्यतः राजस्थान के मारवाड़ियों का कब्जा है। असम में बिहारी भी बड़ी संख्या में रहते हैं।

भाजपा और उसके सहयोगी संगठनों के “घुसपैठियो’’ के बारे में दुष्प्रचार के पीछे राजनैतिक निहित स्वार्थ हैं। जहां देश के दूसरे हिस्सों में मध्यकालीन इतिहास का इस्तेमाल मुसलमानों को दानव-रूप में प्रस्तुत करने के लिए किया जाता है वहीं उत्तर-पूर्व में उन्हें घुसपैठिया बताकर राजनैतिक लक्ष्य साधे जाते हैं। यह अत्यंत दुःखद है कि नेशनल काउंसिल ऑफ चर्चेस इन इंडिया भी इस दुष्प्रचार के झांसे में आ गया और उसके प्रवक्ता ने फरमाया कि बांग्लादेशी घुसपैठियों ने असम में दस हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर कब्जा कर लिया है! सच यह है कि भारत के विभाजन के समय भी असम में मुसलमानों की अच्छी-खासी आबादी थी। इसके बाद, आर्थिक कारणों से कुछ बांग्लादेशी असम में आ बसे होंगें। असम को विभाजित कर 6 नए राज्य बना देने के बाद मुसलमान मुख्यतः उस इलाके में बच रहे जिसे अब असम कहा जाता है, और शायद इसलिए प्रतिशत के लिहाज से उनकी आबादी कुछ ज्यादा प्रतीत होती है।

साम्प्रदायिक ताकतों द्वारा बांग्लादेशीयों की कथित घुसपैठ के बारे में दुष्प्रचार और तीखा होता जा रहा है। यहां तक कि कई आमजन इसे सही मानने लगे हैं। असम में इस मसले पर कई आंदोलन होने से भी इस मिथक को बल मिला है। असम में मुख्य समस्या आर्थिक विकास का अभाव है न कि स्थानीय रहवासियों को ‘घुसपैठियों’ द्वारा उनकी जमीनों से बेदखल किया जाना। असम का मसला मुंबई की शिवसेना-ब्रांड राजनीति और “साम्प्रदायिक विदेशी“ के मिथक का काकटेल है। इसके अलावा, इसमें नस्लीय मसलों को भी शामिल कर दिया गया है। नेल्ली से लेकर हालिया हिंसा तक लगातार एक समुदाय विशेष को उनके घरों और गांवों से खदेड़ने का क्रम चल रहा है। पहले घुसपैठ के नाम पर दुष्प्रचार किया जाता है और फिर प्रायोजित हिंसा होती है।

असम में सबसे पहली ज़रूरत है सभी समूहों का निशस्त्रीकरण। इसके बाद यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि विस्थापित लोग फिर से अपने गांवों में वापिस जा सकें और बुआई का मौसम खत्म होने के पहले खेती का काम शुरू कर सकें। अगर ऐसा नहीं किया गया तो बहुत बड़ी संख्या में गरीब लोगों के पास खाने के लिए अन्न का एक दाना भी नहीं बचेगा। पिछले सौ वर्षों के जनसंख्या संबंधी आंकड़ों का निष्पक्ष अध्ययन और विश्लेषण कर बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को “घुसपैठ“ का सच जनता के सामने लाना चाहिए। “बांग्लादेशी घुसपैठियो’’ के नाम पर साम्प्रदायिक ताकतों द्वारा खेली जा रही राजनीति का पर्दाफाश होना चाहिए। जो लोग हिंसा के शिकार हुए हैं उनके घावों पर मरहम लगाने का काम भी प्राथमिकता के आधार पर किया जाना चाहिए। उनके साथ सार्थक संवाद स्थापित करके और उन्हें न्याय दिलाकर ही इस समस्या का समाधान किया जा सकता है।

(मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण: अमरीश हरदेनिया)

ऐ भगत सिंह तू जिंदा है हर एक लहू के कतरे में

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/01/2012 12:18:00 AM


फिर से कबीर कला मंच का एक गीत. यह गीत सुनेंगे तो शायद समझ में आए कि निजाम में बैठे लोगों के लिए डफली बजा कर गीत गाने वाला यह सांस्कृतिक संगठन इतना खतरनाक क्यों लगने लगा था. कबीर कला मंच ने बाबा साहेब आंबेडकर के विचारों को देश के क्रांतिकारी कम्युनिस्ट आंदोलन के संदर्भ में देखने का एक रचनात्मक नजरिया पेश किया. वे दलितों की मुक्ति का रास्ता तलाशने में लगे हुए थे कि पिछले साल पुलिस ने उनके कलाकारों के खिलाफ दमन अभियान शुरू किया. तब मंच को भूमिगत हो जाना पड़ा. इसके अधिकतर कलाकार अभी जेल में हैं और फिल्मकारों, कलाकारों, संस्कृतिकर्मियों का एक समूह कबीर कला मंच बचाव समिति के तहत उनकी रिहाई की मांग कर रहा है. 

यह गीत लिखा और गाया है शीतल साठे ने.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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