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बीजापुर जनसंहार पर सीडीआरओ की रिपोर्ट

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/31/2012 01:12:00 AM

सीडीआरओ  द्वारा तथ्यों की जाँच-पड़ताल


कोऑर्डिनेशन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स आर्गेनाइजेशन (सीडीआरओ) से जुड़े अधिकार कार्यकर्ताओं की एक अखिल भारतीय टीम ने छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले के उस क्षेत्र का दौरा किया, जहाँ 28 जून, 2012 की रात में सीआरपीएफ के जवानों द्वारा गोली चलाने के कारण 17 आदिवासियों की मौत हो गई थी। इस टीम ने 6 और 7 जुलाई को सिरकेगुडम, कोटागुडेम तथा राजुपेंटा गाँवों का दौरा किया और घटना के बारे में जानकारी हासिल की। आगे टीम द्वारा की गई जाँच की संक्षिप्त रिपोर्ट दी गई है।

तीनों ही गाँव बासागुड़ा पुलिस स्टेशन के अंतर्गत आते हैं। ये तीनों गाँव बहुत ही छोटे हैं और एक-दूसरे के आस-पास बसे हैं। इन गाँवों से पुलिस स्टेशन की दूरी तकरीबन एक किलोमीटर है। इन तीनों गाँवों से तकरीबन तीन किलोमीटर की दूरी पर एक सीआरपीएफ कैंप स्थित है। सिरकेगुडम में कुल 25 और राजुपेंटा में 12 घर हैं। ये दोनों कोरसागुदेम पंचायत के अंतर्गत आते हैं। कोटागुडा में 30 घर हैं और यह चीपुरूपट्टी पंचायत के अंतर्गत आता है। इन तीनों गाँवों के अधिकांश लोग दोरला कोया जनजाति से संबंधित हैं।
28 जून की रात में तकरीबन 8 बजे इन तीनों गाँवों से तकरीबन 60 आदिवासी सिरकेगुडम और कोटागुडेम के बीच के खुले क्षेत्र में इकट्ठे हुए थे। चूंकि आदिवासी दिन में काम में व्यस्त रहते हैं, इसलिए अमूमन रात में सामूहिक फैसले करने के लिए इस तरह की बैठकें होती रहती हैं। दरसअल, बुआई का मौसम आने वाला था, इसलिए यह बैठक खेती से जुड़े विभिन्न मसलों से   संबंधित थी। इसमें बीज बोने के पारंपरिक त्योहार की तारीख भी तय करनी थी, जिसे बीजा पोंडम के नाम से जाना जाता है (यह काम कुछ हफ्ते पहले ही होना था, लेकिन इसमें देरी हो गई क्योंकि इसे करवाने वाले पुजारी की मौत हो गई थी)। इसके अलावा, इस बैठक में दूसरे कई मुद्दों पर भी चर्चा की जानी थी, मसलन जुताई के लिए जमीन का वितरण, बगैर जानवर वाले परिवारों की मदद, नए आए ट्रैक्टर के उपयोग के लिए किराए की राशि और मछली के उत्पादन को बढ़ाने की तरकीब। आदिवासियों को पिछले दो सालों में तेंदु पत्ता इकट्ठा करने का पैसा नहीं मिला था। उन्हें अब जाकर 10,000 हजार की बकाया राशि मिली थी। इस बैठक में वे इस बात की भी चर्चा करने वाले थे कि इस पैसे को कैसे खर्च किया जाए। इस रात आकाश में बहुत ज्यादा बादल थे और बहुत कम दिखाई दे रहा था। इस बैठक में सिर्फ इन तीन गाँवों के ही लोग थे और उनके पास कोई हथियार नहीं था।

जब मीटिंग चल रही थी, उसी दौरान सीआरपीएफ और कोबरा (कमांडो बटालियन फॉर रेसोल्यूट एक्शन, जो कि सीआरपीएफ की एक खास नक्सल विरोधी गुरिल्ला यूनिट है) कमांडो की एक बड़ी टुकड़ी ने पूरे क्षेत्र को घेर लिया। इसमें 100 से ज्यादा लोग थे। गाँववालों के अनुसार तकरीबन दस बजे इन लोगों ने कोई चेतावनी दिए बगैर फायरिंग शुरू कर दी। पहली बार पश्चिमी दिशा से फायरिंग हुई। इसमें तीन आदिवासियों को गोली लगी और तुरंत ही उनकी मौत हो गई। इसके तुरंत बाद तीन और दिशाओं से गोलियाँ चलने लगीं। भयभीत गाँववाले चिल्लाने लगे और उन्होंने भागना शुरू कर दिया। अधिकांश लोग अपने-अपने गाँवों की ओर भागे। कुछ लोगों ने घास रखने के लिए बने स्थान की ओट में छिपकर जान बचाने की कोशिश की। जो लोग अपनी जान बचाकर भाग रहे थे, उन पर भी गोलियाँ चलाई गईं। तकरीबन 30 मिनट तक गोलीबारी चलती रही। इसके बाद मानो मृतकों का सर्वे करने के लिए सीआरपीएफ के जवानों ने दो आग जलाने वाली बंदूकों से फायर किया जिससे इस क्षेत्र में रोशनी हो गई। सीआरपीएफ जवान इसी क्षेत्र में रुके रहे।
टीम द्वारा की गई तथ्यों की जाँच से यह बात स्पष्ट है कि आदिवासी शांतिपूर्ण तरीके से बैठक कर रहे थे। इस बैठक में मौजूद किसी भी व्यक्ति के पास आग्नेयास्त्र नहीं था। सीआरपीएफ के जवानों ने इन्हें घेर लिया और बिना किसी चेतावनी के अंधाधुंध गोलियाँ चलाईं। इस गोलीबारी के कारण 16 आदिवासी मारे गए। 15 लोगों की उसी रात मौत हो गई और 15 साल के इरपा सुरो ने अगले दिन बीजापुर के अस्पताल में दम तोड़ दिया। मारे गए लोगों में से छह लोग नाबालिग थे। नाबालिग लोगों में के. रामा की 12 साल की बेटी काका सरस्वती भी शामिल थी। जब वह भागकर कोटागुडेम के अपने घर में जा रही थी तो उसे गोली मार दी गई। बाकी पाँच नाबालिग लोगों में से दो काका राहुल (16) और मडकाम रामविलास (16) बासागुडा के स्कूल में दसवीं क्लास में पढ़ते थे। वे दोनों बासागुडा में होस्टल में रहते थे और गर्मियों की छुट्टी में घर आए थे।

यह बिल्कुल साफ है कि उस रात सिरकेगुडम में लोगों की बेरहमी से हत्या की गई। गाँववालों के अनुसार जो लोग गोलियों से नहीं मरे, उन्हें पुलिस ने गाँव से ली गई कुल्हाड़ियों से मार डाला। गाँव के बाहर के बहुत सारे प्रत्यक्षदर्शियों ने यह बताया कि कुछ लोगों के सीने और ललाट पर कुल्हाड़ी से मारे जाने के निशान थे। इस तरह की जानकारी देने वालों में मीडिया के वे लोग भी शामिल थे जिन्होंने लाशों को दफनाए जाने से पहले देखा था।

इस क्रूर हत्या का सत्रहवाँ शिकार इपरा रमेश था। वह आई लचमी का पति और तीन बच्चों का पिता था। गोलीबारी शुरू होने के बाद वह भागकर सुरक्षित अपने घर में चला गया। पाँच बजे सुबह हालात का जायजा लेने के लिए अपने घर से बाहर निकला। सीआरपीएफ के लोगों ने उनका पीछा किया और उसके परिवार के सदस्यों के सामने ईंट से मार-मारकर उसकी हत्या कर दी। रमेश के पिता इरपा राजू के अनुसार, सीआरपीएफ के लोगों ने उनके घर से 5,000 रुपए भी ले लिए। इसी रात पुलिस ने राजुपेंटा में इरपा नारायणा के घर से 3000 हजार और मडकाम रमेश के घर से 2,000 रुपए ले लिए।

मारे गए लोगों की सूची

कोटागुडेम के लोगः

1. काका सरस्वती (12), के. रामा की बेटी।
2. काका सम्माय्या (32), किसान, के. नेगी का पति।
3. काका राहुल (16), बासागुडा में दसवीं क्लास का छात्र, के. नारायणा का बेटा।
4. मडकाम रामविलास (16), बासागुडा में दसवीं क्लास का छात्र, काका राहुल का सहपाठी और एम. बुचैया का बेटा।
5. मडकाम दीलिप (17) पामेड में आठवीं तक की पढ़ाई करने के बाद अपने पिता एम. मुतैया की खेती में मदद करता था।
6. इरपा रमेश (30) किसान, आई. लचमी का पति और तीन बच्चों का पिता।
7. इरपा दिनेश (25) किसान, आई. जानकी के पिता, चार बच्चों के पिता, इरपा रमेश के छोटे भाई।
8. मडकाम नागेश (35), पहले एक पेशेवर ढोलक बजाने वाले थे, जो त्योहारों के दौरान ढोलक बजाते थे, एम. सामी के पति, दो बच्चों के पिता। इनकी पत्नी के गर्भ में इनका तीसरा बच्चा है।
9. मडकाम सुरेश (30), किसान, एम. सामी के पति एवं दो बच्चों के पिता और मडकाम नागेश के छोटे भाई।
10. इरपा नारायणा (45), किसान, आई. नारसी के पति और चार बच्चों के पिता।

राजुपेंटा के लोगः

11. इरपा रमैया (40), किसान, आई. भीमी का पति, पाँच बच्चों का पिता।
12. इरपा सुरेश (15), पाँचवी क्लास तक पढ़ा, आई. चंद्रैया का बेटा, 29 जून को बीजापुर अस्पताल में इसकी मौत हो गई।

सिरकेगुडम के लोगः


13. सरके रमन्ना (25), किसान, एस. सोमलु के पति, तीन बच्चों के पिता।
14. अपका मैतू (16), ए. सुखराम का बेटा, खेती में अपने पिता की मदद करता था।
15. कोरसा बीचेम (22), ए. गुट्टा का बेटा, पहले हैदराबाद के बोरवेल फर्म में काम करता था, एक महीने पहले अपने पिता की खेती में मदद करने वापस आया था।
16. कुंजम मल्ला (25), किसान, के. लखमाडू का बेटा।
17. माडवी अएतू (40), किसान, एम. कामली का पति और चार बच्चों का पिता।

गोलीबारी में 6 आदिवासी घायल हुए। इनमें से चार काका रमेश (11) और काका पार्वथी (10), इरपा चिन्नक्का (40) और एबका चोटू (16) को बीजापुर और जगदलपुर के अस्पतालों में दाखिल कराया गया था।। अब ये लोग इलाज के बाद घर लौट आए हैं। मडकाम सोमैया (30) और काका स्नेती (19) को रायपुर के अस्पताल में ले जाया गया था। अभी भी इनका इलाज चल रहा है, लेकिन ये खतरे से बाहर हैं। घायल लोगों में से काका रमेश (13) और उसकी छोटी बहन काका पार्वथी (11) बाल-बाल बचे हैं। गोलीबारी शुरू होने के बाद वे कोटागुडेम में अपने घर की ओर भागे और उनके बाईं बाँह पर गोली लगी। इरपा मुन्ना (26) और सरका पुल्लाइया (20) भी घायल हुए थे, लेकिन सीआरपीएफ के लोग इन्हें अस्पताल लेकर नहीं गए। सरकेगुडा और कोटागुडेम  में आदिवासियों द्वारा पारंपरिक दवाइयों की मदद से इनका इलाज किया जा रहा है। गोलीबारी में कुछ जानवर भी मारे गए।

उस रात सीआरपीएफ के लोग मैदान में ही जमे रहे और रात में ही वे 15 लाशों को बासागुडा ले गए और वे इरपा रमेश को सुबह ले गए। घायल लोगों के अलावा वे 25 गाँव वालों को भी अपने साथ ले गए, जिन्हें शाम में छोड़ दिया गया। आदिवासी उसी दिन बासागुडा गए और उन्होंने माँग की कि मृतकों के शव उन्हें सौंपे जाए। शाम में पुलिस ने उन्हें शव वापस कर दिया और अगले दिन गाँव के लोगों ने उनका अंतिम संस्कार कर दिया। कुछ लोगों का शव जलाया गया, तो कुछ लोगों को दफना दिया गया। इरपा दिनेश का शव अभी तक गाँव में वापस नहीं आया था, क्योंकि पुलिस के अनुसार वह एक माओवादी था। उसके शव को बासागुडा पुलिस स्टेशन के नजदीक दफना दिया गया।  

मानक नियमों का उल्लंघन करते हुए सीआरपीएफ के लोग न सिर्फ लाशों को अपने साथ ले गए, बल्कि उन्होंने लाशों के नीचे की जमीन में लगे खून के धब्बों को हटाने के लिए उस मिट्टी को भी निकालकर ले गए। बीजापुर के सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस ने ‘ऑन रेकार्ड’ यह कहा है कि ‘बासागुडा थाना में डॉक्टरों की एक टीम के द्वारा समुचित पोस्टमार्टम किया गया और उसकी रिपोर्ट तैयार की जा रही है।’ पोस्टमार्टम थाना में नहीं, बल्कि ऐसे अस्पताल में होना चाहिए जहाँ सभी आवश्यक साधन मौजूद हों। यह बात भी गौर करने लायक है कि गाँव के लोग इस बात पर एकमत थे कि पोस्टमार्टम नहीं हुआ है। बहुत सारे रिपोर्टरों ने भी इस बात का समर्थन किया। इन रिपोर्टरों को किसी भी शव पर ऐसा कोई निशान नहीं दिखा था, जो पोस्टमार्टम के बाद शरीर पर बन जाता है। 
    
जांच-पड़ताल दल के सदस्यों से गांववालों ने यह भी बताया की 29 जून की सुबह को सीआरपीएफ के जवान दो महिलाओं को घसीटते हुए मैदान में लेकर गए और उनके कपड़ों को फाड़ डाला। साथ ही तीन अन्य महिलाओं को भी गालियां दीं, पीटा और बलात्कार रेप करने की धमकी दी।

यह तथ्य साफ बताते हैं कि पुलिस प्रतिष्ठान, एस.पी. बीजापुर से लेकर सीआरपीएफ के उच्च अधिकारी तक आदिवासी नागरिकों के हत्याकांड को माओवादियों के साथ हुई जवाबी गोलीबारी में हुई हत्या के तौर पर प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके लिए वह सीआरपीएफ और कोबरा कमांडो के छह घायल सैनिकों का बार-बार जिक्र कर रहे हैं। इस पूरे झूठ को राजनीतिक वर्ग के केंद्रीय गृहमंत्री द्वारा और विस्तारित किया गया। वृहत रूप में, यह ‘ऑपरेशन सिल्गर’ के तहत कई सप्ताह पहले ही सीआरपीएफ और कोबरा कमांडो की तीन टीमों ने इस इलाके के लिए प्लान बनाया था, जिसमें इनके पास खुफिया जानकारी थी कि यहां बड़ी संख्या में माओवादी एकत्रित होने वाले हैं। इस ऑपरेशन के आई.जी. के अनुसार सीआरपीएफ के जवान सिरकेगुडम में होने वाली सभा तक पहुंचते और जाकर विषय का पता लगाते, उससे पहले ही इनके ऊपर फायरिंग होने लगी जिसके बाद आत्म-सुरक्षा में सीआरपीएफ के जवानों को फायरिंग करनी पड़ी। सीआरपीएफ के पंकज कुमार सिंह का कहना है कि ‘यहां पूर्ण रूप से तैयार माओवादी कैंप चलाया जा रहा था, उनकी तैयारियां इस प्रकार से थीं की यदि कोई हमला होता है, उस स्थिति में वह 10 मिनट में भाग सकते थे। हमने वहां से आई.ई.डी., बहुत सारा साहित्य, पॉलिथिन टेंट और सोलर लाईट तथा नली भरी हुई बंदूकें बरामद की हैं।’

यह व्याख्या इस भयानक अपराध को बेशर्मी से झुठलाने वाली है। आत्म-सुरक्षा के नाम पर एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल किलिंग को सही बताने का पुलिस एवं अर्धसैनिक बलों का यह एक पसंदीदा उपाय है। जांच दल के सदस्यों का यह मानना है कि उस रात को कोई भी क्रॉस फायरिंग नहीं हुई। फायरिंग पूरी तरह से एकतरफा थी, वह भी विशेष सुरक्षा बलों की ओर से अकारण एवं अचानक। उस रात को घायल हुए सीआरपीएफ और कोबरा के छह जवानों के बारे जिस प्रकार सीआरपीएफ के अधिकारी बता रहे हैं, वह केवल अपनी फायरिंग को जायज ठहराने के लिए ऐसा कर रहे हैं। जांच दल ने देखा कि जहां आदिवासी एकत्रित हुए थे उसके आस-पास के दर्जनों भर पेड़ों पर गोलियों के निशान थे। गोलियों के निशान कुछ घरों पर भी देखने को मिले, जिससे यह पता चलता है कि इकट्ठा हुए आदिवासियों पर चारों तरफ से गोली चलाई गई है। यह संभव है कि छह जवान अपने ही साथियों द्वारा दूसरी ओर से की जा रही गोलीबारी में घायल हुए हों। गांववालों का यह मत है कि सीआरपीएफ और कोबरा के छह जवान अपनी ही क्रॉस फायरिंग में घायल हुए हैं। गांव के सभी आदिवासियों से जांच दल ने बात की। उनका यह कहना है कि मीटिंग में कोई भी माओवादी नही था तथा जो भी लोग मीटिंग में एकत्रित हुए थे, उनमें से किसी के पास भी हथियार नही थे।

राष्ट्रीय मीडिया में ऐसी रिपोर्टें आने के बाद कि बड़ी संख्या में नागरिकों की हत्या की गई है, जिसमें कम उम्र के बच्चे (नाबालिग) भी हैं, सरकारी रुख थोड़ा कमजोर हुआ। लेकिन ये लोग अपने मुख्य तर्क पर टिके हुए हैं कि मीटिंग में हथियारबंद माओवादी उपस्थित थे और यह एनकाउंटर बिल्कुल सही है। सीआरपीएफ का अब यह कहना है कि मारे गए लोगों में से सात - मडकाम सुरेश, मडकाम नागेश, माडवी अयातू, काका सम्मैया, कोरसा बीजी, मडकाम दिलीप और इरपा नारायण माओवादी हैं। इनके विरुद्ध छत्तीसगढ़ राज्य के विभिन्न पुलिस स्टेशनों में गंभीर प्रकष्ति के कई सारे केस दर्ज हैं। मारे गए आदिवासी नागरिकों के बारे में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री का कहना है कि माओवादियों ने आदिवासियों को मानव सुरक्षा कवच के रूप में प्रयोग किया, जो नागरिकों की हत्या का कारण बना।

सुरक्षा प्रतिश्ठानों के अत्यधिक बौद्धिक समूह ने अब एक नया डिस्कोर्स चलाया है जिसके तहत इस घटना को ‘दुर्भाग्यपूर्ण समानांतर नुकसान (कोलेटरल डैमेज)’ कहना शुरू किया है। साथ में यह भी कहा जाता है कि भविष्य में यह कैसे कम हो इसका ध्यान रखा जाएगा। उस बादल भरी रात में एकत्रित हुए लोगों के बीच हथियारबंद लोग उपस्थिति हैं, इसका पता लगा सकना सीआरपीएफ और कोबरा के जवानों के लिए बिल्कुल संभव नहीं था, वह भी तब जब वह उस स्थान से 100 मीटर दूर थे। उन्होंने एक जगह जमा हुए गांव वालों को घेर कर तब तक फायरिंग की जब तक वो मर नहीं गए। यदि यह सही भी मान लिया जाए कि सीआरपीएफ ने गोलीबारी जवाबी फायरिंग में की, तब भी इस बात को औचित्यपूर्ण व सही नहीं ठहराया जा सकता कि गांव के एकत्रित समूह पर गोलीबारी की जाए।

पिछले कई वर्षों में इन इलाकों ने ऐसी ही दर्दनाक व भयानक हिंसा को देखा है। विशेष रूप से 2005 से दक्षिण बस्तर में पुलिस और आपराधिक सलवा जुडूम के हत्यारे गिरोह साथ मिलकर आदिवासियों को प्रताड़ित कर रहे हैं। इन छह वर्षों के लंबे भय के दौरान, इन तीन गांवों में रहने वाले लोगों पर सलवा जुडूम के द्वारा कई सारे हमले किए गए, घरों को लूटा व जलाया गया। इसके कारण कई सारे लोग गांव छोड़ कर चले गए। इनमें से बहुत सारे पड़ोसी राज्य आंध्र प्रदेश के खम्मम जिले में चले गए। दो आदिवासी, सिरकेगुडम गांव के मडकम बिला और कोरसा भीमा भी पुलिस द्वारा मारे गए। तीन वर्ष पहले यह आदिवासी अपने गांव वापस आकर अपने जीवन को दोबारा से खड़ा करने की प्रक्रिया में थे तभी यहां 28 जून को सामूहिक हत्याकांड हुआ।

कोरसेगुडा और चिपुरूपट्टी पंचायतों के कई सारे गांवों में पुलिस के द्वारा जारी प्रताड़ना की घटनाएं पाई गईं। जबकि पहले दौर में राज्य के द्वारा आदिवासियों पर की गई बर्बरता के बारे एक समान शब्द सुनने को मिलता था कि यह सलवा जुडूम ने किया है। परंतु आज के समय में लोगों का कहना है कि (अर्धसैनिक) बल यहां बड़ी समस्या पैदा कर रहे हैं, इसमें सीआरपीएफ के साथ-साथ पिछले दो सालों में इस इलाके में काफी बड़ी संख्या में लाए गए पैरामिलिट्री और स्पेशल पुलिस शामिल हैं। गांववालों का कहना है कि फोर्सेस रात को गांव के नजदीक आकर हवा में फायरिंग करते हैं और यह देखते हैं कि यदि कोई बाहर आकर भागता है तो उसकी गोली मारकर हत्या कर दी जाती है। कोरसेगुडा, चिपुरूपट्टी और अन्य पंचायतों के लोग बासागुडा जा कर अपना राशन खरीदते हैं और अपने कुछ उत्पादों को बेचते भी हैं। लेकिन केवल महिलाएं ही जाती हैं, क्योंकि पुरुषों को बासागुडा पुलिस द्वारा कभी भी उठा लिया जाता है, उनसे सवाल किया जाता है, मारा जाता है, गाली दी जाती है और कई बार तो एक सप्ताह तक हवालात में बंद रखा जाता है। झूठे मुकदमों में कुछ लागों को बंद करने के बाद गांव के पुरुष दूर ही रहने लगे।

जांच दल जब इन तीन गांवों की तरफ जा रहा था, तब उसने देखा की सीआरपीएफ के कई सारे हथियारबंद समूह जंगल में उपस्थित थे। उन्होंने हमें शक की नजरों से देखा परंतु किसी प्रकार की दखलंदाजी नहीं की। वो लोग उस तब भी थे, जब जांच दल कई घंटों के बाद वहां से वापस लौटा। सप्ताह भर पहले हुए खूनखराबे जिम्मेदार होने के बावजूद उनकी उपस्थित गांव वालों को सामान्य एवं भय मुक्त जीवन जीने की दोबारा कोशिषों के विरुद्ध साबित हो रही है। घटना की जांच हाई कोर्ट के वर्तमान न्यायाधीश से कराने की छत्तीसगढ़ सरकार की घोषणा पर आदिवासियों का कहना है कि जांच केवल तभी अर्थपूर्ण होगी यदि यह गांव में की जाए।

इस अमानवीयता के बीच में, इस बात के साक्ष्य हैं कि आदिवासियों के भीतर ललकार से भरी हुई अवज्ञा (डिफायंस) घर कर गई है। यह शुरुआती दौर में सलवा जुडूम के दौरान के जघन्य कृत्यों से भिन्न है, क्योंकि आदिवासी  अब और अपने गांवों को छोड़ कर जाने के बारे में नहीं सोच रहे हैं। उनके बीच में मजबूती से यह बात पैठ चुकी है कि उनके साथ अन्याय हुआ है, जिसका वह निबटारा चाहते हैं। जांच दल के सदस्य इस बात के गवाह हैं कि सरकार द्वारा भेजी गई सहायता को किस प्रकार से गांव वालों ने सिरे से नकार दिया। भोपालपट्टनम के एस.डी.एम., आर. के. कुरूवंशी कई गाड़ियों के साथ वहां पहुंचे थे जिनमें चावल, दाल, कपड़े तथा कुछ बर्तन थे जो देने के लिए लाए गए थे। गांव वाले गुस्से में अधिकारियों पर चिल्लाये और कहा कि तुमने पहले हमारे बच्चों की हत्या की और अब मदद करना चाहते हो? क्यों, हम लोग तो माओवादी हैं ना? क्या तुम माओवादियों को यह राशन देने के लिए आए हो?

जांच दल का यह मानना है कि 28 जून को 17 आदिवासियों की हत्या सरकार की माओवादियों के विरुद्ध लड़ाई की मौजूदा काउंटर-इनर्सजेंसी रणनीति का नतीजा है। छत्तीसगढ़ में बार-बार यह मान लिया जाता है कि आदिवासी लोगों का माओवादियों को समर्थन है और जानबूझ कर उन्हें क्रूर हिंसा का लक्ष्य बनाया जाता है। यह लोगों के जीवन जीने की स्वतंत्रता के अधिकारों का उल्लघंन है, जिसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। केंद्र एवं राज्य सरकार की विभिन्न संस्थाओं ने कई बार यह बताया है कि माओवाद केवल कानून व्यवस्था की समस्या नहीं है, बल्कि इसका एक मजबूत सामाजिक-आर्थिक आधार भी है। हालांकि, व्यवहार में माओवाद को केवल एक आपराधिक प्रादुर्भाव (उपज) के रूप में माना जाता है जिसका समाधन केवल हत्यारी सुरक्षा सेना की तैनाती के रूप में देखा गया है। क्रूर दमन की यह नीति खत्म होनी चाहिए। हमारा यह कहना नहीं है कि माओवादियों की हिंसा पर पुलिस आंखें बंद कर ले।  पुलिस  को निवारण और अपराध की छानबीन करनी चाहिए, साथ ही लोगों के अधिकारों को भी पूरा सम्मान देना चाहिए और पुलिस को अपना यह काम पूर्ण रूप से कानून के अंतर्गत रह कर करना चाहिए। सरकार को चाहिए कि वह से उन नीतियों को गंभीरता से लागू करे जो सामाजिक और आर्थिक अभावों को दूर करती हों। इन इलाकों में कानून एवं संविधान की अवमानना को तुरंत बंद किया जाना चाहिए। सरकार को माओवादियों के विरुद्ध सालों से चल रही हिंसात्मक दमन की नीति के स्थान पर राजनीतिक तरीकों को अपनाना चाहिए।

मांगें:

1. 28 जून की रात को सिरकेगुडम गांव के पास हुए ऑपरेशन में शमिल सभी सीआरपीएफ और कोबरा बटालियन के कर्मियों पर आईपीसी की धारा 302 के तहत हत्या का केस दर्ज हो, साथ ही अन्य प्रभावी दंड संहिता के अंतर्गत कार्रवाई हो। इसके अलावा इन पर एससी एंड एसटी (प्रिवेंनशन ऑफ एट्रोसिटीज) एक्ट के तहत भी केस चलाया जाए।

2.28 जून की रात को सिरकेगुडम गांव के पास हुए ऑपरेशन में शामिल सभी सीआरपीएफ और कोबरा बटालियन के कर्मियों पर महिलाओं के साथ किए गए उत्पीड़न, लूट, संपति को नश्ट करने के लिए केस दर्ज किया जाए। इन सब पर आईपीसी की उपयुक्त धाराओं के तहत कार्रवाई की जाए।

3.केंद्र और राज्य सरकारें माओवादियों को क्रूर एवं दमनात्मक तरीके से दबाने की चल रही नीति को बंद कर आंदोलन को राजनीतिक तरीके से संबोधित करें।

4.सरकार संविधान की पांचवी अनुसूची तथा इस क्षेत्र के जंगल, जमीन एवं अन्य प्राकृतिक संसाधनों पर यहां के आदिवासी लोगों के अधिकारों का सम्मान करे। आदिवासियों के लिए बनाए गए संरक्षात्मक विधानों का दृढ़तापूर्वक पालन किया जाए।

जांच-दल के सदस्यः

 1.प्रीतिपाल सिंह, एसोसिएशन  फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स (एएफडीआर), पंजाब।

2. प्रशांत हाल्दार, सचिव, एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स, (एपीडीआर), पश्चिम बंगाल।

3.आशीष गुप्ता, पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स (पीयूडीआर), दिल्ली। और संयोजक, कोर्डिनेशन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स आर्गेनाजेशंस (सीडीआरओ), दिल्ली।

4.आर. शिवाशंकर, नल्लौर जिला सचिव, आर्गेनाइजेशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स, (ओपीडीआर) और बी.राम रेड्डी, ओपीडीआर वारंगल जिला संयोजक।

5.सी. चन्द्रशेखर, स्टेट जनरल सेक्रेटरी, आंध्र प्रदेश सिविल लिबर्टीज कमेटी (एपीसीएलसी), वी. चिट्टिबाबू और डी.सुरेश कुमार, स्टेट वाईस प्रसिडेंट, एन. श्रीमानारायणा, वी.रघुनाथ और आर.राजूनंदन, स्टेट ज्वाइंट सेक्रेटरी, गुंटी रवि, स्टेट कमेटी सदस्य और बालाकृष्णा और मुरलीकृष्णा, सदस्य कुरनूल जिला, (एपीसीएलसी)।

6.वी.एस. कृष्णा, स्टेट जनरल सेक्रेटरी ऑफ हृयूमन राइटस फोरम (एचआरएफ), एस. के. खादर बाबू और डी. अदिनारायणा, एचआरएफ प्रसिडेन्ट और जनरल सेक्रेटरी, खम्मम जिला।

(एफडीआर, एपीडीआर, पीयूडीआर, ओपीडीआर, एपीसीएलसी और एचआरएफ सीडीआरओ के सदस्य हैं)

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Posted by Reyaz-ul-haque on 7/30/2012 10:00:00 PM

  • दिलीप ख़ान
बंबई में 1918 में जब आम हड़ताल हुई थी तो उसमें 1,20,000 से ज़्यादा मज़दूरों ने हिस्सा लिया था और हड़ताल को कुचलने के लिए अंग्रेज़ों ने लगभग 200 मज़दूरों को पुलिसिया गोली से उड़ा दिया। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के किसी भी नेता ने उस समय तक मज़दूरों के मामले पर गंभीरता से काम करना शुरू नहीं किया था। मज़दूरों की गोलबंदी स्थानीय स्तर पर स्थानीय नेताओं द्वारा शुरू हुई और देश में लगातार फैलती गई। बंबई से लेकर असम के चाय बगान तक और मद्रास से लेकर कानपुर के चमड़ा उद्योग तक। अप्रैल-जून 1921 तक अकेले बंबई 33 हड़तालों का गवाह बना और इसमें लगभग ढाई लाख मज़दूरों ने हिस्सा लिया। इसी आस-पास कानपुर में चमड़ा और सूती वस्त्र उद्योग के मज़दूरों ने हड़ताल की और प्रबंधन से मज़दूरी दर बढ़ाने, काम के तौर-तरीकों को बेहतर बनाने तथा मुनाफ़े में हिस्सेदारी की मांग की। कानपुर में आज से लगभग 90 साल पहले, जब मज़दूर आंदोलन और औद्योगिक समाज के भीतर भारत में मज़दूर चेतना आकार ही ले रही थी, उत्पादन में हिस्सेदारी की मांग के साथ मज़दूर सड़क पर उतर गए थे। कांग्रेस सहित कई अन्य पार्टियों ने उस वक्त इस मांग को ठीक बताया था। आज अगर मुनाफ़े में हिस्सेदारी की मांग मज़दूरों की तरफ़ से उठे तो कॉरपोरेट घरानों के अलावा समूचा भारतीय मध्यवर्ग और सरकारी मशीनरी मज़दूरों पर पिल पड़ेंगे। मानेसर में जब बीते साल मारुति सुज़ुकी के कामगारों ने प्रबंधन प्रायोजित यूनियन की बजाए वास्तविक यूनियन बनाने सहित काम-काज की स्थितियों को दुरुस्त करने और वेतन कटौती के त्रासद नियमों (1 मिनट देरी से आने पर आधे दिन का वेतन और तीन दिन काम पर नहीं आने पर आधे महीने के वेतन में कटौती) में परिवर्तन लाने की मांग की तो प्रबंधन को इसमें ‘विकास-विरोधी नज़रिया’ दिखा था और कांग्रेसी मुख्यमंत्री भूपिंदर हुड्डा मज़दूरों का पक्ष सुनने के बदले सुज़ुकी कंपनी का भरोसा जीतने टोक्यो पहुंच गए थे। कंपनी में तालाबंदी थी और प्रबंधन इस बात को लेकर मज़दूरों पर लगातार दबाव बना रहा था कि ‘गुड कंडक्ट फॉर्म’ भरने वाले मज़दूर ही कारखाने के अंदर जा सकते हैं। ‘गुड कंडक्ट फॉर्म’ का मतलब था- मज़दूरों की बुनियादी मांग की हत्या।

बीते साल तीन बार हड़ताल हुई, काम से निकाले गए कई मज़दूरों को वापस लेने के वायदे से प्रबंधन मुकर गया और हड़ताल की अगुवाई करने वाले दोनों नेता खुद को कंपनी से अलग कर लिए। लेकिन, लंबी मशक्कत के बाद मारुति सुज़की इंपल्वाइज यूनियन को मान्यता मिल गई। प्लांट के भीतर उन्हीं सवालों पर संघर्ष अब भी जारी था जो बीते साल उठ रहे थे। इस पूरे वाकये को दौरान मारुति सुज़ुकी कंपनी को गुजरात सरकार लगातार यह प्रलोभन देती रही कि वो उसे हरियाणा से ज़्यादा ‘फ्रेंडली’ माहौल दे सकती है। नरेंद्र मोदी और सुज़ुकी की बातचीत जारी थी और सुज़ुकी महोदय भी बीच-बीच में मीडिया के जरिए यह बात उछाल रहे थे कि वो प्लांट को उठाकर गुजरात ले जाएंगे। मानेसर के मज़दूरों में उस समय एक जुमला प्रचलित था कि प्लांट कोई लोटा-थाली नहीं है कि जब मन करे कहीं भी उठा ले चलेंगे! सुज़ुकी के इसी फैसले को टालने के लिए भूपेंदर हुड्डा जापान गए थे ताकि सरकार की तरफ़ से कंपनियों को अब तक मिले प्रोत्साहन में बट्टा न लगे। इस तरह मारुति-सुज़ुकी के पास दो अलग-अलग राज्यों की अलग-अलग पार्टियों के मुख्यमंत्री मनुहार लगा रहे थे। कंपनी प्रबंधन के पास मज़दूरों की मांग नहीं मानने के लिए ज़रूरी आत्मविश्वास बरास्ते सरकार जमा हो रहा था। इसके बाद हड़ताल, प्रदर्शन और किसी भी तरह के जमावड़े को रोकने के लिए प्रबंधन ने बड़ी संख्या में बाउंसरों की भर्ती की। मतलब खाए-पिए-अघाए लोग ‘फ्रेश’ होने के लिए जब डांस क्लब में जाते हैं, तो छेड़खानी या फिर हंगामा वगैरह को नियंत्रित करने के लिए जिन बाउंसरों का इस्तेमाल होता है उन्हीं बाउंसरों को बुनियादी मांग उठा रहे मज़दूरों के सामने खड़ा कर दिया गया। कंपनी में काम-काज बाउंसरों की पृष्ठभूमि में होने लगा। अगजनी या फिर प्रबंधक की मौत निश्चित तौर पर एक दुखद चित्र हमारे सामने पेश करता है लेकिन ज़्यादा महत्वपूर्ण होगा इसके कारणों का पता लगाना। जातिसूचक गाली देने वाले व्यक्ति की पिटाई एक तरह से जातिगत वर्चस्व की संरचना को तोड़ता है और इस वजह से मैं इसे सकारात्मक ही मानूंगा। मध्यवर्गीय समाज हिंसा-अहिंसा की बहस को सुविधानुसार समय में उठाता है। किसान-मज़दूरों का प्रदर्शन जब कभी उग्र हो जाए तो सरकार से लेकर मीडिया तक के दिमाग में औचक विचार आता है कि ये तो हिंसा का रास्ता है और इसलिए ग़ैर-संवैधानिक है! पिछले साल हुड्डा के जापान से लौटने के बाद जब मज़दूरों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर पुलिस ने लाठी भांजी तो उस समय संवैधानिक और ग़ैर-संवैधानिक वाली बहस नहीं उठी। संविधान के दायरे में मिले अधिकारों को तो कॉरपोरेट के साथ मिलकर खुद सरकार मटियामेट कर रही है। नौकरी की ठेका प्रथा पर अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन और देश के संविधान में जो बातें कही गई हैं क्या उसे भारत के किसी भी कोने में सरकार लागू करवा रही है?

मानेसर में मारुति-सुज़ुकी का यह प्लांट लगभग 3000 एकड़ में फैला है। 2002 में चौटाला सरकार ने 2.25 लाख रुपए प्रति एकड़ की दर से स्थानीय लोगों से ज़मीन ली थी। उस वक्त राज्य सरकार ने वादा किया था था कि ज़मीन देने वाले हरेक घर से एक व्यक्ति को नौकरी दी जाएगी। काम शुरू होने के बाद कंपनी ने नौकरी देने से इनकार कर दिया। जो लोग नौकरी की आस लगाए बैठे थे उन लोगों ने चाय की भट्टी और छोले-भटूरे की दुकान खोल ली। कुछ लोग रिक्शा और टैम्पो चलाने लगे। उनकी कमाई का जरिया मारुति-सुज़ुकी का यह प्लांट ही है। यहां काम करने वाले लोग ही उनके ग्राहक हैं। इसलिए उनका संकट ये है कि अगर प्लांट मानेसर से कहीं और शिफ्ट होता है तो उनमें से ज़्यादातर लोग बेरोज़गार हो जाएंगे। प्रबंधन, सरकार और मीडिया से जिस तरह की बातें छन कर उन लोगों तक पहुंची उसका अर्थ यही था कि प्लांट के मज़दूर नहीं चाहते कि प्लांट चले! इस भाव को अगल-बगल के गांव के सरपंचों (हरियाणा के सरपंच को आप किस रूप में जानते हैं? संदर्भ- खाप) ने और स्थाई बना दिया। सरपंचों ने मिलकर ‘महापंचायत’ बैठाई और फैसला किया कि ‘लाल झंडे’ वालों को सबक सिखाने में वो दूसरे पक्ष का साथ देंगे। समाज का जिस तरह से (अ)राजनीतिकरण हो रहा है उसमें तत्कालिक आवेश ज़्यादा अहम हो चला है। दुनिया के किसी भी कारखाने में काम करने वाला कोई भी मज़दूर यह कभी नहीं चाहेगा कि वह कारखाना ठप्प हो जाए और यह बेहद सामान्य-सी बात है। हां, अपने अधिकार के लिए वो लड़ेगा ज़रूर। अगर प्लांट के चारों तरफ के गांव वाले इस बात को नहीं समझ पा रहे हैं तो जाहिर है कंपनी के प्रोपेगैंडा के बीच यह पक्ष उन तक नहीं पहुंच रहा है। जिस बेरोज़गारी के डर से गांव वाले पंचायत बैठा रहे हैं उस आधार पर तो वो मज़दूरों के ज़्यादा करीब है। प्लांट बंद होने पर उनकी तरह मज़दूर भी बेरोजगार हो जाएंगे। अधिकारों के लिए लड़ रहे मज़दूरों को कंपनी धोखा दे रही है और गांव वालों को नौकरी नहीं देकर वो पहले ही धोखा दे चुकी है। सवाल ये है कि बीते साल हड़ताल को अंदरुनी मामला बताने वाला ‘तटस्थ समाज’ आखिरकार कंपनी के पक्ष में अचानक कैसे चला जाता है? क्या तटस्थता का पूरा मामला अंतत: शक्तिशाली के पांत में ही खड़ा होना है? दिल्ली से लेकर बंबई तक के कॉलेज में पढ़ रहे फंकी युवाओं की हमदर्दी कंपनी के साथ क्यों रहती है? ‘उदारीकृत’ आर्थिक व्यवस्था में समाज में निरपेक्ष दिखने वाले तबके का राजनीतिकरण किस दिशा में हो रहा है। यह व्यवस्था की चौहद्दी में हुई मानसिक बुनावट है या फिर पक्षधरता तय कर ली है समाज ने?

25 जुलाई 2005 को होंडा मोटरसाइकिल के कामगारों पर लाठी चार्ज हुआ था। उस वक्त लगभग 800 मज़दूर होंडा सिटी के कारखाने में जमा होकर यूनियन बनाने और निकाले गए मज़दूरों की पुनर्बहाली को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे। प्रबंधन उनकी यूनियन को मान्यता नहीं दे रहा था और मज़दूरों को बहाल करने में आना-कानी बरत रहा था। 2005 में होंडा कंपनी से लेकर 2011-12 में मारुति-सुज़ुकी तक जो लकीर खिंची है उसमें बहुत फ़र्क़ कहां है? मारुति में भी शुरुआती आंदोलन इन्हीं दो सवालों से पैदा हुआ था। यह संयोग है कि 25 जुलाई को उस घटना की सालगिरह थी और इसी दिन प्रणब मुखर्जी ने देश के नए राष्ट्रपति के तौर पर शपथ ली और अन्ना हज़ारे एंड कंपनी ने जंतर-मंतर पर मोर्चा खोला। 2005 के बाद से हर साल मानेसर और गुड़गांव की ऑटोमोबाइल कंपनियों के मज़दूर इस दिन लाठी चार्ज के विरोध में प्रदर्शन करते हैं। इनमें मारुति सुज़ुकी, हीरो मोटोकॉर्प, रिको, सोना कोया, एफसीसी रिको, सुज़ुकी पावरट्रेन, सुज़ुकी मोटरसाइकिल और मार्क एक्झॉस्ट के मज़दूर अमूमन हर साल शामिल होते रहे हैं, लेकिन इस बार 24 जुलाई को गुड़गांव पुलिस ने यह घोषणा की कि 25 तारीख़ को मानेसर में धारा 144 लागू कर दी गई है और पांच से ज़्यादा व्यक्ति एक साथ इकट्ठा नहीं हो सकते। मज़दूरों के मार्च को रोक दिया गया। फिर भी कंपनी के भीतर लगभग 8,000 मज़दूर जमा हुए। जो मीडिया सौ लोगों की महापंचायत को दिखा रहा था उसने आठ हज़ार मज़दूरों के प्रदर्शन को नहीं दिखाया।

इस बीच मीडिया में इस तरह की ख़बरें लगातार आती रही कि मानेसर बंद होने से कौन सी कार बाज़ार में आउट-ऑफ-स्टॉक हो जाएगी, डीज़ल कार की क़ीमत पर इससे क्या असर होगा और मारुति-सुज़ुकी को इस तालाबंदी से कितना घाटा होने वाला है! वगैरह, वगैरह। मारुति सुज़ुकी के सीओओ मयंक पारीख ने 25 जुलाई को ही घोषणा की कि उनका दो सबसे ज़्यादा बिकने वाला मॉडल स्विफ्ट और डिज़ायर आउट ऑफ स्टॉक हो गया है। अगले दिन इस मुद्दे पर कुछ चैनलों ने लोगों की रायशुमारी ली जिसमें मध्यवर्ग छाती कूटता दिख रहा था। यह चर्चा लगातार ज़ोर पकड़ने लगी कि मारुति-सुज़ुकी में हुई हिंसा से ‘भारत की छवि’ धूमिल हुई है। सार्क चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के अध्यक्ष विक्रमजीत सिंह साहनी ने देश की छवि पर पड़ने वाले असर पर भारी चिंता जताई। बंगाल चैम्बर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के अध्यक्ष हर्ष झा ने कहा कि मानेसर के दोषियों पर आपराधिक क़ानून के तहत मुकदमा चलना चाहिए और इसे औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत नहीं देखा जाना चाहिए। झा ने दावा किया कि पूरा मामला पूर्वनियोजित मालूम पड़ता है! औद्योगिक घराना उस वक़्त आपराधिक क़ानून का जुमला नहीं उछालता जब सेज़ के लिए ज़मीन अधिग्रहण के वास्ते फ़ौजी बंदूक का सहारा लेकर गांव वालों को वो खदेड़ता है। उस समय उन्हें निजी कंपनियों की सुरक्षाकर्मी की तरह चाक-चौबंद होकर गांव खाली कराने वाली सरकार चाहिए।

कंपनी के अध्यक्ष आर सी भार्गव ने यह बार-बार जताया है कि कंपनी मानेसर में ही रहेगी लेकिन तालाबंदी के बाद मौका ताड़कर इस बार सुज़ुकी से मिलने के लिए नरेंद्र मोदी ने जापान का रास्ता नापा। वे अपनी तईं पूरा ज़ोर लगा रहे हैं कि गुजरात विधानसभा चुनाव से पहले मारुति-सुज़ुकी को अपने राज्य में खींचकर ले जाने में वो सफल हो पाएं। आख़िरकार वो कौन-सी शर्तें होंगी जिनके बिना पर मारुति-सुज़ुकी गुजरात जाने का फैसला करेगी। मज़दूरों की हड़ताल के अलावा मारुति-सुज़ुकी को अब तक मानेसर में कोई दिक्कत पेश नहीं आई है। तो क्या हड़ताल को क्रश करने का भरोसा दिलाने मोदी जापान पहुंचे? ‘विकसित राज्य’ तक पहुंचने का रास्ता इन्हीं वायदों से होकर गुजरता है। मध्यवर्ग को सिर्फ़ इससे मतलब है कि उनके घर के सामने स्विफ्ट और डिज़ायर पहुंचने में देर नहीं होनी चाहिए। उनके लिए कंपनी कार की जननी है और मज़दूर अड़ंगा डालने वाला प्राणी। यही मध्यवर्ग गाल पर तिरंगा छापकर अन्ना हज़ारे के साथ भ्रष्टाचार पर आवाज़ बुलंद करने पहुंचता है। इनका मुद्दा सिर्फ़ वहीं तक सीमित है जो सीधे-सीधे इनसे टकराता हो। मज़दूरों के मामले से इनको कोई लेना-देना नहीं है, अल्पसंख्यक-दलित-आदिवासियों का मामला इनको आउटसाइडर जैसा मालूम पड़ता है। सरकार इनको साफ़ सुथरी चाहिए, कोई भ्रष्टाचार नहीं चाहिए और सुज़ुकी के साथ गलबहियां डालने वाले नेता को उनके जनसंहार के लिए क्लीन चिट देते हुए यह पूरा वर्ग उसमें विकास के अक्स ढूंढता है।

झोंपड़पट्टी: जेल में लिखा एक गीत, कबीर कला मंच

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/29/2012 10:12:00 AM

कबीर कला मंच उस जनता का सांस्कृतिक चेहरा है जिससे भाषा छीन ली गई, संस्कृति से बेदखल कर दिया गया, जमीन और आजीविका के साधन छीन लिए गए और सदियों की गुलामी में धकेल दिया गया. इसीलिए जब इस दलित, पिछड़े, अल्पसंख्यक तबके के लोग अपने अधिकारों की आवाज को बुलंद करते हैं तो उनको फर्जी मुठभेड़ों में मार दिया जाता है, गिरफ्तार कर वे जेल में डाल दिए जाते हैं. उनके गीतों को भी खामोश करने की कोशिश की जाती है. लेकिन वे गीत हैं कि जेल की दीवारों को पार कर दुनिया में बज उठते हैं. पुलिस के दमन की वजह से भूमिगत हुई दलित कलाकारों की सांस्कृतिक संस्था कबीर कला मंच के गिरफ्तार किए गए सदस्यों में से एक दीपक डेंगले ने इस गीत को जेल में लिखा है और इसे गाया है सागर गोरखे ने. हमारे बीच में इस गीत को पहुंचाया है कबीर कला मंच बचाव समिति ने.



झोंपड़ पट्टी रे - 2
हे अँगरेज़ आया मशीन लाया
मिल बनाया -- झोंपड़ पट्टी
चमार, बुनकर, लोहार, मेहतर
सब समाया -- झोंपड़ पट्टी
सारी दुनिया को ऊंचा उठा के
मजदूर रह लिया -- झोंपड़ पट्टी

झोंपड़ पट्टी रे - 2
बंबू, चटाई, पतरा, लकड़ी, ऊपर प्लास्टिक
बन गयी झोंपड़ी
रेलवे लाइन, बाजू में वाइन
कैसे भी तो ढंक गयी खोपड़ी
अपनी भाषा, कल्चर बनाईके
बढ़ती चल रही -- झोपड़ पट्टी
झोंपड़ पट्टी रे - 2

सब हैं दादा, सब हैं भाई
लफड़ा, झगड़ा, ये मार पिटाई
दारू, गांजा, पनी मास्टर
भूखे बच्चे, रोती लुगाई
घर-घर मान्य देसी शहर में
डूबती चल रही -- झोंपड़ पट्टी
झोंपड़ पट्टी रे - 2

कामगार और किसानों के दम पर
आज़ादी के उड़े कबूतर
गोरा जा के आया काला
टूटा वोह सपनों का मंज़र
साठ सालों में चुना लगा गए
देखती रह गयी -- झोंपड़ पट्टी

झोंपड़ पट्टी रे - 2

बीजापुर जनसंहार: निर्दोष होने का मतलब

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/28/2012 06:08:00 PM



साझे मकसद की इस लड़ाई में सबको शामिल होना होगा. कोई इससे बाहर नहीं रहेगा. कोई निर्दोष नहीं होगा और न कोई तमाशबीन होगा. हम सबके हाथ सने हुए हैं...इस सबसे बाहर खड़े तमाशा देखने देखने वाले या तो कायर हैं या गद्दार.
-फ्रांज फैनन, द रेचेड ऑफ द अर्थ

बासागुड़ा के लोग न तो कायर थे और न गद्दार. वे ठीक उस संघर्ष के बीच में मौजूद थे, जो उनकी जिंदगियों को बराबरी और इंसाफ की तरफ ले जा रहा है. इज्जत और सम्मान की जिंदगी. गरीबी और अपमान से दूर, एक ऐसी जिंदगी की तरफ जो उनकी मेहनत और रचनात्मकता पर भरोसा करती थी, न कि सटोरियों और सूदखोरों की पूंजी पर.

और इसीलिए वे मार दिए गए. लेकिन उनकी शहादत को बेमानी बनाने की कोशिशें कम नहीं हुई हैं. पिछले एक महीने में उनको जनता के मौजूदा संघर्षों में गद्दार और कायर के रूप में पेश करनेवालों ने अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी है. वे तमाशबीन नहीं थे, लेकिन असली तमाशबीनों ने उनको तमाशबीन के रूप में पूरी दुनिया के सामने रखा है. और इसीलिए उनकी शहादत को उसके सही संदर्भ में रखा जाना जरूरी है और यह भी जरूरी है कि उनको एक निर्दोष और महज एक तटस्थ तमाशबीन बताए जाने की असली राजनीति को सामने लाया जाए. 

एक महीना बीत गया, जब बीजापुर जिले के राजुपेंटा, सिरकेगुडम और कोत्तागुड़ा गांवों के आदिवासी इस मौसम में फसल की बुवाई को लेकर बैठक कर रहे थे. मानसून देर से आया था, कम बारिश हो रही थी और उनकी चिंता के केंद्र में फसल और आजीविका थी, जिसके लिए उनको मिल कर काम करना था. उनके पास बराबरी के आधार पर बांटे गए खेत थे, अपने बीज थे, सिंचाई के अपने बनाए गए साधन थे.

...और उनको मार दिया गया. बीच बैठक में एक किलोमीटर दूर से आई सीआरपीएफ की एक टुकड़ी ने तीनों ओर से उनको घेर कर गोलियां चलाईं. फिर कई आदिवासियों को पकड़ कर निर्ममता से पीटा गया और गांवों से धारदार हथियार खोज कर उनके गले काटे गए. फिर लाशों और जख्मियों को ट्रैक्टर में भर कर थाने पर ले जाया गया. इस दौरान हत्यारे सीआरपीएफ के जवान गांव में पहरा डाले रहे और अगले दिन तक गांव में हत्याएं करते रहे.

ऊपर दिए गए तथ्य क्या बताते हैं? जबकि एक समुदाय के रूप में किसानों के जीवन को लगभग पूरे देश में तहस-नहस किए जाने की प्रक्रिया तेज होती जा रही है, खेती-किसानी को एक व्यक्तिगत कार्रवाई में बदला जा रहा है, अलग-अलग किसानों और अलग-अलग गांवों के बीच एक अमानवीय होड़ को बढ़ावा दिया जा रहा है, जो सिंचाई और दूसरे संसाधनों के उपयोग के मामलों में खून-खराबे तक पहुंच जाता है, यहां इन सबके उलट पानी की कमी और मौसम के प्रतिकूल होने की स्थिति में किसान आपस में बैठ कर फैसले कर रहे थे कि उनको अपने खेतों में क्या करना है. वे यह फैसले कर रहे थे कि उनके पास मौजूद बीजों में से कौन कहां बोए जाएंगे, कौन किसके खेत में काम करेगा और सिंचाई के लिए क्या व्यवस्था की जाएगी. यह ठीक उस सामाजिक ढांचे और राजनीतिक नीतियों को चुनौती थी, जो पूरे देश पर भूमिहीन दलित, अल्पसंख्यक, आदिवासी किसानों पर थोप दी गई है. जिसमें हर किसान को, हर भूमिहीन दलित को, आदिवासी को, मुसलमान को, स्त्री को, बच्चे को दूसरे से काट दिया गया है. अलग कर दिया गया है. उनकी सामुदायिकता को नष्ट कर दिया गया है.

चुनौती कुछ दूसरे मायनों में भी थी. जिस इलाके में वे रह रहे थे और खेती कर रहे थे, उस पूरे इलाके की जमीन को बहुराष्ट्रीय कंपनियों को दे दिया गया है, जिसमें से कुछ जमीन का उपयोग भारत की सेना को करना था, जिसका मकसद वहां कंपनियों द्वारा संसाधनों की लूट की हिफाजत करना और जनसंघर्षों को कुचलना है. आदिवासियों ने इलाका खाली करने से मना कर दिया तो उनके गांवों को जला कर, लोगों की हत्याएं करके, महिलाओं का शारीरिक उत्पीड़न करके उनको गांव छोड़ने पर मजबूर किया गया. यह सलवा जुडूम का दौर था. पूरे छत्तीसगढ़ में 644 गांव जलाए गए, जिसमें इस गांव के 35 घर भी शामिल हैं. यह 2006 की गर्मियों की बात है. गांव के लोग आंध्र प्रदेश चले गए. लेकिन तीन साल बाद, जिन दिनों छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने यह घोषणा की कि सलवा जुडूम के राहत शिविरों में रहने के बजाए गांवों में रह रहे सारे लोग माओवादी हैं और उनके साथ वैसा ही सुलूक किया जाएगा, तो इन तीनों गांवों के आदिवासियों ने मानो अपना पक्ष चुन लिया और अपने गांव लौट आए. जिन दिनों वे अपने गांव लौटे, निर्मम हत्याओं के लिए प्रशिक्षित भारतीय गणतंत्र के अर्धसैनिक बल उन इलाकों में तैनाती के लिए अपनी बैरकों से चल चुके थे. यह तब की बात है जब सलवा जुडूम को आदिवासियों के हथियारबंद प्रतिरोध ने हराए दिया था और हताश राजसत्ता ऑपरेशन ग्रीन हंट शुरू करनेवाली थी.

लौट आने के बाद आजीविका का सवाल सामने था. खेती अब इन इलाकों में थोड़ी मुश्किल हो गई थी. सलवा जुडूम ने जानवरों को बड़ी संख्या में मारा था और जुताई के लिए बैलों की भारी कमी थी. लेकिन जब लोग लौटे तो इलाके में उनके पास जितने भी बैल थे, उन्होंने मिल-बांट कर उन्हीं से जुताई करने का फैसला लिया. तीन साल से यही तरीका अपनाया जा रहा था और 28 जून की रात को जिन बातों को तय किया जाना था, उनमें से एक यह बात भी थी.

वे किसान थे, लेकिन उन्होंने अपनी दुनिया के लिए सूदखोरों का दरवाजा बंद कर दिया था. उन्होंने बीजों और खाद के लिए सरकारी खैरात की याचना नहीं की थी. कर्ज के लिए न वे किसी जमींदार के पास दौड़े और न बैंकों के पास. उन्होंने रियायतें नहीं मांगीं, सहायता नहीं मांगी. गणतंत्र जब पूरे देश में जोतने वालों को जमीन देने, सिंचाई की व्यवस्था करने, अच्छे बीजों को मुहैया कराने और दूसरी सुविधाएं देने की जिम्मेदारी निभाने से इनकार कर चुका है और खेती से जुड़ी कॉरपोरेट कंपनियों के एक एजेंट के रूप में काम कर रहा है तो बीजापुर और बस्तर के आदिवासी किसानों ने अपने हित में एक नए और जनवादी गणतंत्र की स्थापना की. यह गणतंत्र, जिसे वहां जनताना सरकार या जनता की सरकार कहते हैं, दूसरे अनेक मामलों के साथ खेती के मामलों का इंतजाम भी करता है. जमीन और बीज बांटने से लेकर खेत की तैयारी, फसल बुवाई, सिंचाई, खाद, कटाई और अनाज निकालने तथा उसके वितरण, भंडारण और बाजार में ले जाने तक के मामले देखता है. यह सरकार विश्व व्यापार संगठन या अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा जनता पर थोपी हुई सरकार नहीं है, और न ही यह विश्व बैंक के कर्ज पर पलनेवाली सरकार है.

राजुपेंटा, सिरकेगुडम और कोत्तागुड़ा गांव इस सरकार की इकाइयां हैं. और इसीलिए यह हत्याकांड एक राजनीतिक हत्याकांड है, यह एक सरकार को बेदखल करने की साजिश का हिस्सा है. यह वो साजिश है, जिसमें अमेरिकी और इस्राइली सेना से लेकर कॉरपोरेट दुनिया और भारतीय फौज लगी हुई है. इस साजिश में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, कांग्रेस, भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) से लेकर अनेक राजनीतिक दल, एनजीओ, कई शहरी बुद्धिजीवी और मीडिया प्रतिष्ठान शामिल हैं.

और उनके मुकाबले, उनकी मुखालिफत में, अपना राजनीतिक पक्ष चुन चुके राजुपेंटा, सिरकेगुडम और कोत्तागुड़ा जैसे सैकड़ों गांवों के आदिवासी हैं. दलित हैं. जो लोग इस हिंसक राजनीतिक यथार्थ को मानने से इनकार कर सकते हैं, वही यह दावा कर सकते हैं कि मार दिए गए आदिवासी निर्दोष थे.

यह झूठ है और बेईमानी भी. क्योंकि निर्दोषिता भी, वर्गों में बंटे हुए समाज में वर्गीय आधारों पर ही काम करती है. एक वर्ग समाज में निर्दोष होने का मतलब है मौजूदा सत्ता के पक्ष में होना, मौजूदा मूल्यों और परंपराओं के पूरे तानेबाने को बिना किसी सवाल के अपना लेना. निर्दोष होना सीधे-सीधे राजनीतिक रूप से निष्क्रिय होने से जुड़ा हुआ है. आप उत्पीड़न और शोषण पर, नाइंसाफी और अपमान पर टिकी इस दुनिया को ज्यों का त्यों कबूल कर लेते हैं तो आप निर्दोष हैं. अगर आपने इस बदसूरत निजाम के खिलाफ सोचने, बोलने और उठ खड़े होने से मना कर दिया है, तो आप बेशक निर्दोष हैं. लेकिन तब यह निर्दोषिता या तो कायरता पर टिकी हुई होगी या जनता से गद्दारी पर. यह एक हिंसक निर्दोषिता होगी, अन्याय और जुल्म पर आधारित निर्दोषिता.

राजुपेंटा, सिरकेगुडम और कोत्तागुड़ा के लोगों ने इनमें से कुछ भी तो नहीं किया. उनकी एक-एक कार्रवाई जुल्म और नाइंसाफी पर टिके मौजूदा निजाम के खिलाफ एक अवज्ञा थी, एक चुनौती थी. उन्होंने झुकने से भी इनकार किया और टूट जाने से भी. इसीलिए वे सलवा जुडूम का निशाना बने. इसीलिए वे सरकारी हत्यारी सैनिक टुकड़ियों के फायरिंग दस्ते की गोलियों का निशाना बने. सीआरपीएफ ने उनकी शारीरिक हत्या की. उनकी राजनीतिक पक्षधरता को देखने और स्वीकार करने से मना करते हुए उनको निर्दोष बताया जाना उनकी राजनीतिक हत्या होगी. और यह हो रही है. हमारी आंखों के सामने. और हम इसे कबूल कर रहे हैं, क्यों?

क्योंकि निर्दोष बताए जाने के अपने राजनीतिक मायने हैं. यह लोगों को एक संदेश दिए जाने जैसा है कि हालात जितने गंभीर होते जा रहे हैं, उनमें निष्क्रिय बने रहना, राजनीतिक पक्षधरता से खुद को अलग रखना, कार्रवाइयों और आंदोलनों से दूरी बना लेना समझदारी है, सामूहिक हत्याकांडों से बचने का तरीका है. निर्दोष बने रहने का तरीका है. चुप्पी चाहिए इस निजाम को. घर में बैठ जाना और किसी सपने का होना. यह जनता को बदलाव की राजनीतिक कार्रवाइयों से काट देने की एक राजनीतिक कार्रवाई है, और इसे समझे जाने की जरूरत है. यह उत्पीड़नकारी यथास्थिति के पक्ष में गद्दारी और चालाकी से भरी हुई दलील है, जिसे खारिज किए जाने की जरूरत है.

क्रांति और प्रतिक्रांति के बीच यह उत्पीड़ित दलित-आदिवासी जनता द्वारा अपना राजनीतिक पक्ष खुद चुनने के अधिकार पर हमला है. उनके संघर्षों से बाहर के लोग जब यह तय करने लगते हैं कि उनकी कौन सी कार्रवाई निर्दोष है और कौन सी दोषपूर्ण तब वे वास्तव में उनके राजनीतिक अधिकारों को खारिज कर रहे होते हैं. जब वे यह तय कर रहे होते हैं कि भूमिहीन दलित, मुसलिम और आदिवासी कौन सी राजनीति मानें और कौन सी नहीं, या फिर वे राजनीति को मानें ही नहीं तो वे यह बता रहे होते हैं कि अपने आप में ये समुदाय राजनीति के काबिल नहीं है. यह ब्राह्मणवादी तौर तरीका है, जिसमें राजनीति का जिम्मा भी समाज पर हावी, ताकतवर और संपन्न समुदाय के जिम्मे छोड़ दिया जाना चाहिए और मेहनत करने वाली सारी आबादी को सिर्फ मेहनत करना चाहिए.

यह इतिहास के बनने में वर्ग संघर्ष की भूमिका से भी इनकार है. वह वर्ग संघर्ष, जिसमें वंचित और शोषित जनता शोषणकारी समृद्धों और अत्याचारी ताकतवरों का तख्तापलट देती है और इतिहास को आगे की दिशा देती है. मौजूदा समय में जब वर्ग संघर्ष देश के एक विशाल इलाके पर अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा है और सत्ता की बुनियाद तक इसकी धमक पहुंचने लगी है, तो इस संघर्ष को आगे बढ़ाने वाले दलित, मुसलिम और आदिवासी समुदायों से यह अपेक्षा की जा रही है कि वे निर्दोष बने रहें. यथास्थिति के पक्ष में आज्ञाकारिता और निर्दोषिता की इस दलील में कितनी हिंसा है, इसे आप पूरे देश की 80 प्रतिशत से अधिक की आबादी की बदतर स्थितियों, भुखमरी, कंगाली, निर्धनता, कर्ज के दलदल, इलाज के अभाव में मौतों, जनसंहारों, विस्थापन और किसानों की आत्महत्याओं को याद करके लगा सकते हैं.

अगर हम अब भी नहीं समझ पाए हैं कि जमीन और बीज का बांटा जाना, अपने बूते सिंचाई करना और फसलें उगाना वास्तव में एक निर्दोष कार्रवाई नहीं है, तो शायद हमारे समझने तक बहुत देर हो चुकी होगी. एक तरफ जब खेती में सामंती जकड़न वित्त पूंजी के प्रवाह के साथ कायम है और कॉरपोरेटों के साथ मिल कर सूदखोर भू-स्वामी यह तय कर रहे हैं, किसानों का जमा हो कर आपस में बुवाई के बारे में सामुदायिक रूप से तय करना ठीक-ठीक एक राजनीतिक कार्रवाई है. यह जमीन की लूट और कॉरपोरेट कब्जे के खिलाफ सबसे गंभीर राजनीतिक कार्रवाई है. जो लोग यह नहीं समझ पाते, दरअसल ये ही वे लोग हैं, जो क्रांतिकारी आंदोलनों को महज उसकी हिंसात्मक कार्रवाइयों से जानते हैं और उसकी राजनीतिक गतिविधियों को देख और समझ पाने से इनकार करते हैं.

जाहिर है कि ज्यों-ज्यों अंतरराष्ट्रीय वित्त पूंजी का संकट गहराता जा रहा है, त्यों-त्यों संसाधनों की गलाकाट मांग बढ़ती जा रही है. पूरी दुनिया में कुल मिला कर उत्पादन घट रहा है, पूंजी के लिए उत्पादक गतिविधियों में निवेश के मौके घट रहे हैं और आवारा पूंजी अधिक मुनाफे की तलाश में सस्ते कच्चे माल और सस्ते श्रम की तलाश में पूरी दुनिया की खाक छान रही है. ऐसे में भारत एक अहम देश है, जहां अपने भविष्य को लेकर साम्राज्यवाद की उम्मीदें टिकी हुई हैं. हम एक ऐसी जमीन पर और एक ऐसे समय में रह रहे हैं, जहां साम्राज्यवाद का बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ है और हमारी अपनी जनता और उसके सपनों का भी. इतिहास के इस नाजुक मोड़ पर भूमिहीन दलित, अल्पसंख्यक और आदिवासी आज्ञाकारी, निर्दोष, निष्क्रिय और अराजनीतिक होने का खतरा नहीं उठा सकते. वे बस इसे अफोर्ड नहीं कर सकते.

इसलिए संघर्षरत जनता डरेगी नहीं, वह मध्यवर्गीय शहरी बुद्धिजीवियों और व्यवस्था का हिस्सा बन चुकी राजनीतिक पार्टियों की उम्मीदों पर खरी नहीं उतरेगी, वह निर्दोष नहीं बनी रहेगी. वह लड़ेगी और जीतेगी. ऐसी सामूहिक हत्याएं जनता को डरा नहीं सकतीं. उसकी चेतना को कुंद नहीं कर सकतीं. फैनन के शब्दों में, ‘दमन राष्ट्रीय चेतना को आगे बढ़ने से रोकना तो दूर इसके हौसले बढ़ाता है. उपनिवेशों में चेतना के शुरुआती विकास की एक तयशुदा मंजिल में होने वाली सामूहिक हत्याएं इस चेतना को और उन्नत ही करती हैं, क्योंकि ये कुरबानियां इसकी संकेत होती हैं कि उत्पीड़कों और उत्पीड़ितों के बीच सारी चीजें बलपूर्वक ही तय की जा सकती हैं.’

-रेयाज 

शब्द चित्र : बदलाव वाया बेलाउर, बथानी और बाथे

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/28/2012 05:52:00 PM

तसवीर द हिंदू की
रणवीर सेना के मुखिया ब्रह्मेश्वर सिंह की हत्या के बाद बेलाउर, बथानी टोला और बाथे गांवों से यह पहली रिपोर्ट है. प्रभात खबर और हिंदुस्तान में बतौर संपादक काम कर चुके अजय कुमार इन गांवों की यात्रा के दौरान लोगों के मन के भीतर उतरते है और यह थाह लेने की कोशिश करते हैं लोग पिछले दो दशकों में चीजों को बदलने को किस तरह देखते हैं और अब कहां खड़े हैं. 

हम आरा के बाहरी हिस्से में थे। शहर का अंतिम छोर। एक दशक पहले तक दिन में भी लोगों को इधर आने की जरूरत नहीं पड़ती थी। अब जमीन की कीमत 15 लाख रुपये कट्ठा हो गयी है। नये-नये घर बन रहे हैं। शहर का विस्तार तेजी से हो रहा है और जीरो माइल शहर के गर्भ में समा गया है। सीमाओं का विस्तार समय कर देता है। निशब्द नहीं है समय। धारा पर सवार धार है उसके पास। उसे पीछे लौटना नहीं आता। लगातार उसे आगे निकलना है।

पब्लिक स्कूल जीरो माइल से भी तीन-चार किलोमीटर दूर खुल गये हैं। बसें बच्चों को वहां ले जाती हैं। ऐसे नजारे पहले पटना में ही दिखते थे। रात के नौ-दस बजे तक इस इलाके में भीड़-भाड़ बनी रहती है।

हम आगे बढ़़े। तेतरिया मोड से बायें घूम गये। मोड़ पर बैठे एक ग्रामीण ने बताया- जी...इहे रस्ता बेलाउर चल जाई। हम इत्मीनान हुए। लंबे अंतराल के बाद हम बेलाउर जा रहे थे। इसके पहले रिपोर्टिंग के सिलसिले में तीन बार गया था जब हिंसा-प्रतिहिंसा से भोजपुर जिले का यह दक्षिणी इलाका तप रहा था। सड़क की बाईं ओर बोर्ड लगा है। उससे बेलाउर गांव जाने में किसी अनजान को सुभीता होता है।
गांव में जाने के दो रास्ते हैं। एक नंबर और दो नंबर। रोड नंबर दो से होते हुए हम रणवीर ‘बाबा’ की प्रतिमा के सामने थे। शिव मंदिर के ठीक सामने यह प्रतिमा है। घोड़े पर सवार और हाथ में तलवार लिये। सामने कुएं पर गांव के ही बुजुर्ग बैठे हैं और शिव मंदिर के चबूतरे पर एक सज्जन। बाद में पता चला कि वे टीचर हैं। दो-तीन किशोर वय की युवतियां महादेव पर फूल चढ़ाती हैं। घंटा बजता है-टन्न...टन्न...टन्न...

‘का जी केकरा के खोजअतानी सभे?’ चबूतरे पर बैठे यह बूढ़े बाबा की आवाज थी। हम उनकी ओर घूमे। बताया-बाबा हम पत्रकार हैं। पटना से आये हैं। कुछ जानने-समझने। गांव का क्या समाचार है?

समाचार छुपल बा? वे कहते हैं। वहीं कुछ और लोग आ गये। बच्चे जुट गये। हमारी बात गौर से सुनने लगे। गांव का एक नौजवान हमारे सवाल पर कहता है - मुखिया जी हमारे लिए शांति दूत थे। जब हम पर हमला हो रहा था तो उन्होंने हमें संगठित किया।

हमला? किसका हमला?

एक दूसरा नौजवान कहता है- उहे। माले के लोग। किसानों के खेत पर नाकेबंदी कर दी गयी थी। रोज-रोज हड़ताल। हमारा जीना दूभर हो गया था। हम क्या करते?

हम टोकते हैं- अब क्या माहौल है?

अब कौनो दिक्कत ना है। उनलोगों ने अपना पार्टी बांध लिया है। हमलोगों का अपना है। अपनी मर्जी के दोनों मालिक हैं। हां, लेकिन कुछ खुर-खार होगा तो हम भी चुप नहीं बैठेंगे। जवाब देने में एक मिनट भी देर न होगा।... एक युवक तैश में आता है। दूसरे लोग हंसते हैं। मतलब साफ है कि गांव की भीड़ युवक की बातों को तवज्जो नहीं देती। बेलाउर में आये इस बदलाव को साफ महसूस किया जा सकता है। ‘छोटे’ लोगों को पार्टी बांधने की आजादी पहले नहीं थी। अब बड़े लोगों ने इसे स्वीकार कर लिया है। यह बहुत बड़ा परिवर्तन है। मजदूरी से भी बढ़कर।

बेलाउर बड़ा और समृद्ध गांव है। दस हजार के आसपास वोटर हैं। गांव का शायद ही कोई परिवार हो जो आरा में अपने बच्चों को तालीम नहीं दिला रहा हो, वहां किराये का मकान लेकर। रत्नेश सिंह कहते हैं- फिलहाल किसी बात को लेकर दिक्कत नहीं है। मजूर-किसान शांति चाहते हैं। गांव में एक ही बात की कमी है। यहां बिजली नहीं है। बिजली कटे जमाना हो गया। रत्नेश की पढ़ाई-लिखाई पतरातू में हुई है। परिवार के सभी लोग बाहर ही रहते हैं। एक बहन विदेश में है। रत्नेश घर पर ही खाद का कारोबार करते हैं।

खेतों में मोबाइल के टावर खड़े हो गये हैं। दो-तीन-चार। अलग-अलग टावर कुछ दूरी पर दिख जायेंगे। लोग मोबाइल पर बात तो करते ही हैं, उससे गाना भी सुनते हैं।

***

बेलाउर के बाद हम बथानी टोला पहुंचे। यहीं 11 जुलाई, 1996 को रणवीर सेना के हमले में 21 लोग मारे गये थे। उनमें अधिकतर बच्चे और महिलाएं थीं। घटना के समय एकाध मिट्टी के घर चंवर में बने थे। दरअसल, यह बड़का खडांव गांव का बाहरी हिस्सा हुआ करता था, जहां गाय-गोरू बांधे जाते थे। इसे बोलचाल में बथान कहा जाता है। खड़ांव से जब दलित-पिछड़े बाहर आकर यहां बसने लगे तो यह बथानी टोला हो गया। जनसंहार के बाद इस टोले में जाने के लिए सोलिंग की सड़क बन गयी है। चंवर की जमीन का पट्टा उन परिवारों को मिल गया है जिनके सदस्य मारे गये थे। सोलर लाइट भी लग गयी है। पर वह कभी-कभार ही जलती है। सोलर लगाने में पैसों का खूब खेल हो रहा है, ऐसा गांव के लोग मानते हैं।

हीरालाल चौधरी हैं तो मछुआरे पर मछली मारने में फायदा नहीं है। सोन में मछली अब उतनी नहीं आती। सोंस भी नहीं आते। जब से रिहंद में बांध बन गया तब से यह हालत है। हीरा अब मजदूरी करते हैं। हम उनके दालान पर पहुंचते थे। दरवाजे की उंचाई पांच फुट। अंदर पहुंचे। दो बकरियां सुस्ता रही हैं। हीरा खाट लाते हैं। कहते हैं- बुन्नी-बरसात में तनी परेसानी होईबे करेला। रउरा तनी हेन्ने खिसक जाईं, पानी टपकता।

हम पूछते हैं- खेती करते हैं?

हं, हम मजूरी करते हैं।

कितना मिलता है?

सत्तर रोपेया।

मनरेगा में भी काम मिलता है? हीरा कहते हैं- मोसकिल से दस-पंद्रह दिन। सवा सौ मिलता है।

हम इस दालान से बाहर निकलते हैं। बाहर सकुंती मोसमात खड़ी हैं। सफेद बाल। चेहरे पर झुर्रियां। उदासी के साथ बताती हैं- हमें कुछ नहीं मिला। बासगीत जमीन का पर्चा भी नहीं। वे आरजू करती हैं- सरकार से हमरो के तनी दियाव लोग।

सकुंती मोसमात के परिवार से कोई नहीं मारा गया था। उस दिन कहां थीं आप? एहिजे चंवर में। दुपरिया रहे। तीन बगल से हल्ला भईल। मरद लोग भाग गईलन। मेहरारू लोग एक गो घर में लुका गईल रही। आके काट देलन स। हम जान बचाके खेत में भाग गइनी। पुलिस के पलटन तीनों तरफ रहे। लेकिन उहो कुछ ना कइलन स।

हम उसी सड़क पर पैदल आगे बढ़ते हैं खडांव गांव जाने के लिए। दलित टोला से आगे पिच की सड़क है। दोपहर का वक्त। चारों ओर सन्नाटा। कुछ दूर से पक्का का एक घर दिखता है। हम नजदीक पहुंचते हैं। सीढ़ियां चढ़ कर बरामदे तक जाते हैं। ऊपर पत्थर पर कुछ लिखा है, जिसे सिर उठा कर देखना पड़ता है - राधाकृष्ण सिंह। हम बरामदे में दाखिल होते हैं। एक सज्जन कुर्सी पर बैठे हैं। कई चौकियां बिछी हैं। कुछ लोग उस पर लेटे हैं। समझते देर नहीं लगी कि ये पुलिस के जवान हैं।

जी नमस्ते। हम अखबार वाले हैं। यह सुनते ही हट्ठे-कट्ठे लोग हमें घेर लेते हैं। तो साहब हमारे बारे में लिखिए न। देखिए यहां एक बाथरूम भी नहीं है। रोजे सांप निकलता है। कल्हे रात में एक पांच फुट का सांप निकला था। छत चू रहा है, देखिए न। वहां। इधर भी।

आप बाहर के हैं क्या? जी, हां। हम उत्तराखंड के रहने वाले हैं। फौज में थे। सैप की वेकेंसी निकली थी। हम यहां आ गये। कितनी तनख्वाह है? यही बारह हजार। उनकी बगल में लेटे एक जवान अपना जनेऊ ठीक करते हुए हमारे करीब आते हैं। कहते हैं- एतना कम पइसा में कईसे काम चलेगा सर। हमरा पइसवा कईसे बढ़ेगा?

हम सामने खड़ी बोलेरो के बारे में पूछते हैं. जवान बताते हैं- यह मकान मालिक की है। हमारे पास कोई गाड़ी-छकड़ा नहीं है।

बथानी टोला जनसंहार में खडांव गांव के अधिकांश लोग अभियुक्त थे। अजय सिंह को निचली अदालत ने फांसी की सजा दी थी। हम अजय सिंह की तलाश करते हैं। गांव वालों की मदद से उन्हें बुलाया जाता है। हमारे सामने आते हैं। आंखों में भय साफ समाया हुआ है। वे कहते भी हैं- अब हमें छोड़ दीजिए। इस पचड़े से हम आजाद होना चाहते हैं। बथानी टोला जनसंहार के वक्त अजय की उम्र कोई 15-17 साल होगी। आरा में रहकर पढ़ते थे। खून-खराबे के बाद पुलिस ने आरा से पकड़ा था। सब कुछ तहस-नहस हो गया।

अजय कहते हैं- हाईकोर्ट का फैसला हमारे लिए नया जीवन लेकर आया। हमारा घर-परिवार उजड़ गया। भविष्य खराब हो गया। अब हमारा दिन कौन लौटाएगा? अजय के सवालों का जवाब किसी के पास है?  वहीं मिलते हैं- कन्हैया सिंह। आजीवन कारावास की सजा लोअर कोर्ट ने दी थी। हम उनसे बात करने उनके घर पहुंचते हैं। दरवाजे पर गोबर। भूसे की बोरियां। हम एक अंधेरे कमरे में दाखिल होते हैं। मुश्किल से पांच बाई पांच का कमरा। पुरानी बातों को याद करते हुए कन्हैया की आवाज में तल्खी को अलग से पहचान सकते हैं.

उसी रास्ते हम वापस होते हैं। निषाद टोला के पास गड्ढे में पानी भर गया है। छोटे-छोटे बच्चे-बच्चियां उसमें डुबकी लगाते हैं। गड्ढे के बाहर खड़ी एक महिला आवाज लगाती है- अरे रिनवा। निकलबे रे। घंटा भर से तोरा नेहइले ना भईल? अरे निकलबे कि तोर बाप के बोलाईं? पानी में नहा रहा एक बच्चा किसी दूसरे को निर्विकार भाव से गरिया रहा है। मां-बाप के नाम पर। शायद उसे इन गालियों का मतलब नहीं मालूम।

***

बथानी के लोगों से हम बाथे के बारे में जानना चाहते हैं। पहले से हमने तय किया था कि बथानी टोला से हम आरा पहुंचेंगे। वहां से बिहटा होते हुए अरवल और तब बथानी टोला। यानी नब्बे किलोमीटर की दूरी। लेकिन यह क्या? बथानी टोला के लोगों ने बताया कि सोन पार करिए और बाथे पहुंच जाईये। बथानी के कई लोगों की रिश्तेदारी बाथे में है। हम जहां खड़े थे वहां से बाथे गांव का बाहरी हिस्सा दिखाई दे रहा था। बीच में सोन। सोन के इस किनारे खड़े होकर नाव आने का इंतजार कर रहे हैं। वहां छोटा-सा मचान है। बंसवाड़ी के पास दो-तीन लोग काम कर रहे हैं। वे जाल बुन रहे हैं। मछुआरे हैं। हम उनसे बात करते हैं।

कितना भाड़ा है उस पार जाने का? एही बीस रोपेया। ई घाट के ठेका मछुआरा लोग लेले बा। उ घाट के ठेका अरवल के एगो भूमिहार लेले बाड़न। बातचीत के क्रम में नाव किनारे पहुंचने को होती है। हम वहां तक जाने के लिए रेत में उतरते हैं। आधा किलोमीटर चलने के बाद नाव पर सवार होते हैं। नाव के किनारा छोड़ते ही नाविक पैसे मांगता है। बारी-बारी से। एक बुजुर्ग को वह टोकता भी नहीं। आधे घंटे की सवारी के बाद हम दूसरे किनारे पर होते हैं। पानी से बाहर आते ही मन में उठ रहे सवाल का जवाब मिलता है- उ देखिए, सफेद रंग का बिल्डिंग दिख रहा है न, वही बाथे का सामुदायिक भवन है। वहां जाने में आधा-पौन घंटा आसानी से लग जाएगा। खैर मनाईए कि बर्सा हो गयी। रेत थोड़ा चलने लायक हो गया। नहीं तो डेढ़-दो घंटा तो लग ही जाता। यह भी पता चलता है कि जिस बुजुर्ग से भाड़ा नहीं मांगा गया था, वे खडांव गांव के हैं।

दोपहर के दो बज रहे थे। ठीक-ठाक वर्षा के बाद सूरज निकल गया था। हमने हिम्मत बांधी। चलना शुरू किया। राह बताने को हमने हीरा लाल चैधरी को ले लिया था। राह काटने के इरादे से हमने 50-60 की उम्र वाले हीरा से पुराने दिनों के बारे में कुछ बताने को कहा। वे कहते हैं- बड़ी दुर्दशा था। बहुते दब के रहे हैं हमलोग। डर के मारे कोई कुछ बोलता भी नहीं था। मर-मजुरी कुछ भी तय नहीं था। एक बार की बात है। हमलोगों का मजुरी को लेकर बिबाद हो गया था। दोनों पक्षों को चैरी थाने पर बुलाया गया। हम वहां पहुंचे। आरा से कलक्टर भी आये थे। मीटिंग शुरू हुई। हमलोगों ने अपनी मांग रखी तो बबुआन लोग गरम हो गये। कहने लगे कि मजूरों की बात सुनी जाएगी कि जोतदारों की? हम देखते हैं कि मजूरी कईसे बढ़ेगी? इसी बात पर मनोज कुमार श्रीवास्तव उखड़ गये। डपट कर उनलोगों को चुप कराया था। हीरा को आज भी मनोज श्रीवास्तव याद हैं। कहते हैं-गरीबों के लिए उन्होंने बहुत किया था।

हीरा के पांव जहां बिना थके डग भर रहे थे, हम थकान से निढाल हुए जा रहे थे। हमारी हालत देख हीरा ने कहा-अब तो आ गये हमलोग। थोड़ी ही देर में हम बाथे गांव में दाखिल हुए। बड़ा-सा बरगद का पेड़़। महिलाओं की चौपाल बैठी है। कोई ढील निकाल रही है तो कोई गपिया रही हैं। बच्चे भी चुहल कर रहे हैं। हम आगे बढ़ते हैं। एक दालान में दो लोग सो रहे हैं। उनके पास जाते हैं। उनमें से एक टीचर हैं और दूसरे गृहस्थ। एक दिसंबर, 1997 को सोन पार कर आये हमलावर बाथे को रक्तरंजित कर गये थे। रास्ते में पांच मछुआरों को मार दिया था उनलोगों ने। रात नौ बजे अचानक गोलियों की तड़तड़ाहट शुरू हो गयी थी। विनोद कहते हैं- ऐसा धांय-धांय तो हमने दीवाली पर भी नहीं सुना था।

विनोद पासवान बाथे कांड के सूचक हैं। सबसे अधिक नौ लोग इनके ही परिवार से मारे गये थे। सरकार ने उन्हें नौकरी दे दी है और मुआवजा भी। पर उनकी सुरक्षा हटा ली गयी है। विनोद अपने बच्चों को गांव में नहीं रखते। डर है कि फिर कुछ न हो जाये। उनके घर के बाहर ही पत्थर का एक स्मारक लगा है। बाथे में मारे गये 58 लोगों के नाम हैं। उसकी ठीक बगल में लोहे का चदरा गड़ा हुआ है। उस पर लिखे नाम लगभग मिट गये हैं और चदरे को जंग खा गया है। पत्थर वाला स्मारक माले ने लगवाया है लोहा वाला संग्रामी परिषद ने।

बाथे के इस दलित टोले में पक्का के मकान बन गये हैं। मुआवजे के पैसे से। झोपड़ियां उनके हिस्से रह गयी हैं जिनका कोई नहीं मारा गया था। एक दलित नौजवान हमें अपने आंगन में ले जाता है। बताता है कि उस रात हमला हुआ तो उसके परिवार के सभी 11 लोग एक मिट्टी के घर में छुप गये थे। उसका दरवाजा बंद नहीं था। हमलावरों ने समझा कि इनका काम तमाम हो गया है, तभी तो दरवाजा खुला है। आपके चारों बगल पक्का मकान बन गये हैं। आपने क्यों नहीं बनवाया? वे कहते हैं- हमारे सभी लोग बच गये थे। मुआवजा हमें कइसे मिलता?

दलित बस्ती में इसी पीपल पेड़ के नीचे कौन नहीं आया? अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर लालू प्रसाद तक। सबकी बातें यहां के लोगों को याद हैं। नौजवान प्रकाश आज 15-16 साल का हो गया है। घटना के समय वह अपनी मां की गोद में था। होश संभालने पर घर-परिवार के लोगों से हमले के बारे में सुना। उसके मन में गुस्सा है। कहता है- आखिर हमारे मां-बाप का कसूर क्या था?

घटना के बारे में बात छेड़ते ही रामकिशुन की आंखें भर आती हैं। अपनों को खोने का गम दिल से बाहर जाने में कितने साल लगेंगे? वे कहते हैं- गांव के लोग हमें काटने में शामिल थे। इन्हीं लोगों ने उस पार से लोगों को बुलाया था। बथानी में हमारे भाइयों को न्याय मिल गया। यहां क्या होगा? बाथे जनसंहार में लोअर कोर्ट ने 16 को फांसी और दस को आजीवन कारावास की सजा दी है। इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी गयी है। पटना लौट कर सरकार से कहिएगा कि हम दलितों को बोरा में बांध कर गंगा जी में फेंकवा दे। बगल से गुजर रहे सोन का वह जिक्र नहीं करते। नाम गंगा का लेते हैं।

***

हम उसी रास्ते वापस होते हैं। रास्ते में उदवंतनगर का खुरमा लेकर आरा पहुंचते हैं। शहर की सड़कें अब भी उबड़-खाबड़ हैं। स्टेशन से गोपाली चैक वाली मुख्य सड़क की किस्मत कितने साल में बदलेगी? उसी सड़क से होते हुए हम कतिरा पहुंचते हैं। ब्रह्मेश्वर मुखिया के घर। उनकी पत्नी से भेंट होती हैं। बीमार हैं। पति को शांति का अवतार बताती हैं। कहती हैं-वे गोली-बंदूक से दूर ही रहे। घर के अहाते में सुरक्षा गार्ड तैनात है।

वहां से निकलकर हम अनुसूचित जाति के छात्रों लिए बने छात्रावास में पहुंचते हैं। पारंपरिक छवि से एकदम अलग है छात्रावास। अच्छा भवन। खेलने का मैदान। पर गेट पर करीब दर्जन भर जली साइकिलें बताती हैं कि आधुनिकता के साथ-साथ दलित हमारे चिंतन में अब भी सम्मान के हकदार नहीं हैं। बथानी और बाथे तो ठेठ गांव हैं, आरा के दलित छात्रावास को निशाना बनाने के पीछे हमारी कौन सी मानसिकता काम कर रही है? बहरहाल, हम जैसे अनजान को देख कमरों से लड़के निकलने लगते हैं। उन्हें जब पता चलता है कि हम पत्रकार हैं, वे हमलों के निशान दिखाने लगते हैं। एक-एक कमरा। जले टेबुल। किताबें। वायरिंग। बिखरे अनाज। उन लड़कों की शिकायत आम है कि इतने दिनों बाद भी उनके बीच कोई नहीं आया। वे भेदभाव पर अफसोस जताते हैं। छात्रावास पर हमले की वजह? एक छात्र कहता है- बहुत सारे लोगों को लगता है कि दलित होकर इतना बढ़िया कैंपस में रहेगा?

मारूति उद्योग, मानेसर: मजदूर विरोधी नीति का त्रासद मध्यांतर

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/26/2012 11:48:00 PM


गुड़गांव के मजदूर आंदोलनों पर करीब से नजर रखने वाले स्वतंत्र पत्रकार अंजनी कुमार की यह रिपोर्ट मारूति-सुजुकी कारखाने में घटी घटना के बारे में फैलाए जा रहे झूठों की तह में से सच्चाई को सामने लाती है.

देश की अर्थव्यवस्था जिस राह पर चल निकली है वहां ऐसी त्रासदी कोई नई बात नहीं है। यह सचमुच त्रासदी है। यह मजदूर विरोधी नीति पर चलने की त्रासदी है। मारूति के मानेसर प्लांट में 18 जुलाई को फैक्टरी के भीतर हुई झड़प व आगजानी में महाप्रबंधक अवनीश कुमार देव की जलकर मर जाने की घटना उस नीति का त्रासद परिणाम है जिसके तहत मजदूरों को हर हाल में पूंजीपति वर्ग कुचल देने के लिए आमादा था। ऐसी त्रासद घटना दिल्ली व आसपास में होती रही हैं। और हर इस तरह की घटना में बड़े पैमाने पर मजदूरों की गिरफ्तारी, फैक्टरी पर तालाबंदी होती रही है। लगभग 90 मजदूरों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। बहरहाल इस फैक्टरी के चेयरमैन आर. सी. भार्गव ने भी इसी तरह की नीति का एलान 21 जुलाई को प्रेस वार्ता में किया। शांति व उत्पादन का माहौल बनने व सरकार द्वारा ऐसी घटना को रोकने की नीति बनने तक फैक्टरी उत्पादन बंद करने का यह एलान मजदूरों के हक पूरी तरह कुचल देने की दुर्दम्य इच्छा ही है, जिससे श्रम की खुली लूट चलती रहे। यह त्रासदी पूंजीपति वर्ग के लिए सुनहरा मौका में तब्दील हो गया है जिसका मौका उठाकर मजदूरों के हक को कुचला जा सके।

चेयरमैन एसी भार्गव ने फैक्टरी की तालाबंदी की घोषणा के पीछे अपने कर्मचारियों की सुरक्षा एक मुख्य कारण की तरह पेश किया है। और सारा दोष मजदूरों के कंधों पर डाल दिया है। मारूति के प्रबंधकों ने यह बताने की जहमत से मुकर गया कि 18 जुलाई को उसने मजदूरों को हिंसात्मक तरीके से निपटने के लिए बाउंसरों को फैक्टरी के भीतर तैनात कर रखा था। साथ ही पुलिस का इंतजाम भी कर लिया था। वह यह बताने से मुकर गया कि 16-17 जुलाई को फैक्टरी के भीतर एक सुपरवाइजर द्वारा दलित मजदूर को जाति सूचक गाली दी गई और निलंबित कर दिया गया। जब मजदूरों ने इसका प्रतिवाद किया अगली शिफ्ट में आने वाले मजदूरों के साथ मिलकर गेट पर प्रदर्शन करना तय किया तो प्रबंधक मजदूरों से निपटने के लिए खुद प्रबंधक समुदाय, बाउंसरों व पुलिस के बल पर हमला करना तय कर लिया। लगभग शाम 5 बजे जब दो शिफ्टों के मजदूर मिलकर इकठ्ठा होना शुरू हुए उस समय इन्होंने मजदूरों पर हमला बोल दिया।

प्रबंधक और चेयरमैन अपनी आपराधिक कार्यवाई को स्वीकार करने से मुकर गया। वह इस बात से भी मुकर गया कि लगभग साल भर पहले जब मजदूरों ने वेतनवृ़द्धि की मांग की तो उन्हें कुचल देने के लिए खुलेआम बाउंसरों का प्रयोग किया गया और मजदूर घायल हुए। जब उन्होंने यूनियन बनाने के अधिकार और मजदूरों को नियमित करने की मांग को रखा तो मजदूरों की मांग को स्वीकार करने के बजाय उन्हें लॉकआउट और फिर उन्हें सबसे लंबे हड़ताल पर जाने को मजबूर किया। जब गुड़गांव में मारूति से जुड़े सभी उद्योग संस्थानों ने हड़ताल पर जाने का निर्णय लिया तब मजदूरों की ओर से वार्ता कर रहे मजदूर प्रतिनीधियों को लाखों रूपए -कुछ लोगों के अनुसार चंद प्रतिनिधियों को करोड़ों रूपए, घूस खिलाकर ‘वीआरएस’ दे दिया गया। इसके बाद भी मजदूरों ने हार मानने से इनकार कर यूनियन बनाने के अधिकार को अंततः जीत लिया और फैक्टरी गेट पर यूनियन के झंडे को लहराया गया। मजदूरों की यह मौलिक जीत मारूति के प्रबंधकों को कभी रास नहीं आई। मजदूरों के अपने हक और इज्जत से काम करने के न्यूनतम अधिकार को भी प्रबंधक कभी भी स्वीकार करने को तैयार नहीं हुए। वेतनवृद्धि की मांग को वे लगातार एक खतरा की तरह देखते रहे। और, मजदूरों पर हमला बोलते रहे। यह हमला अभी भी जारी है।

खुद हरियाणा और केंद्र की सरकार व श्रम विभाग का इस मुद्दे पर जो रवैया रहा, वह भी प्रबंधकों की नीति से पूरी तरह नत्थी रहा। जब भी प्रबंधकों को मजदूरों के खिलाफ पुलिए या अर्धसैनिक बल की तैनाती की जरूरत हुई, इनका प्रयोग सरकार ने तुरंत किया। श्रम विभाग ने उत्पादन के माहौल को बनाए रखने के लिए मजदूरों को फैक्टरी परिसर छोड़ने का आदेश जब-तब देती रही। यहां तक कि सारे श्रम कानूनों की धज्जी उड़ाने वाले ‘कोड ऑफ कंडक्ट’ को मान्यता दे दिया। ज्ञात हो कि इस मसले पर संसद में श्रम मामलों के मंत्री ने इसे ‘अवैध’ बताया। लेकिन न तो फैक्टरी के प्रबंधकों के खिलाफ इस मुद्दे पर कार्रवाई की गई और न ही श्रम मंत्रालय ने अपनी गलती सुधारते हुए इस कंडक्ट के शिकार मजदूरों को न्याय दिया गया। यह अराजकता या आम भूल गलती नहीं है। यह सरकार की सोची-समझी नीति है, जिसमें मारूति के प्रबंधकों व मालिकों को लूट की खुली छूट जारी रह सके और ‘निवेश’ का माहौल बना रह सके। यह वैसी ही लौह तानाशाही है जैसी गुजरात में देखने को मिल रहा है और जिस पर अमेरिका लट्टू हुआ जा रहा है। सरकार पूंजीपतियों के लूट को लेकर उनको हर हाल में समर्थन देने की साफ नीति पर चल रही है। आज मारूति ही नहीं पूरा गुड़गांव श्रम दासता का एक नमूना बनकर उभरा है जहां एक एक फैक्टरी में हजारों मजदूर दसियों साल से कम करते हुए भी न तो नियमित हैं और न ही उन्हें यूनियन बनाने का अधिकार है।

सरकार व मारूति प्रबंधक इस बात को छुपा ले जाने के लिए बेचैन हैं जिसमें उन्होंने मजदूरों के खिलाफ एक आपराधिक गोलबंदी किए हुए हैं। पिछले एक साल में मारूति के मानेसर प्लांट में जो घटना घटी हैं उसका सिलेसिलेवार जायजा लिया जाए उससे एक-एक बात खुलकर सामने आ जाएगाप। एक प्रबंधक की रहस्यमय मौत एक त्रासद मध्यांतर की तरह सामने आयी है। यहां से सरकार व प्रबंधक मिलकर पूरे मामले को अपने पक्ष कर लेने को तैयार हो गए हैं। हत्या की सारी नैतिक जिम्मेदारी मजदूरों के कंधों पर डालकर खुद को देश का जिम्मेदार कर्णधार साबित करने में लग गए हैं। अर्थव्यवस्था की नाक तक डूबे संकट को उबारने के लिए जब अमेरिकी शासक वर्ग फासिस्ट हत्यारे मोदी को सिर पर चढ़ाने के लिए तैयार है और यहां का पूंजीपति उसकी सरपरस्ती में जाने के लिए तैयार है तब निश्चय ही स्थिति नैतिक रूप से साफ सुथरा होने की जरूरत भी खत्म हो गयी है। अब तो सरपरस्ती पाने की होड़ की शुरुआत हो चुकी है।

मारूति के मजदूरों पर हमला और उनकी गिरफ्तारी एक ऐसी नंगई की शुरूआत है जिसकी मिसाल पिछले कुछ सालों से दिखने लगा है। हीरो होंडा और रिको कंपनी में मजदूरों के खिलाफ पुलिस बाउंसरों का प्रयोग जो शुरू हुआ उसके नतीजे भी उतने ही खतरनाक रूप से सामने आए। इन कंपनियों में भी यूनियन बनाने, वेतनवृद्धि और प्रबंधक की ओर से उचित व्यवहार की मांग से आंदोलन शुरू हुआ। इसमें मजदूरों की बुरी तरह से पिटाई की गई और कुछ मजदूरों को जान से मार डाला गया। जिसके विरोध में ऐतिहासिक उद्योग बंदी हुई। ग्रेटर नोएडा में ग्रेजियानों के मजदूर व प्रबंधक की झड़प में महाप्रबंधक की हत्या हुई। इस घटना में 80 से उपर मजदूरों को जेल में डाल दिया गया। सालों ये मजदूर जेल में पड़े रहे। आज भी यह केस चल रहा है। इस घटना में भी प्रबंधकों ने बाउंसरों का इस्तेमाल किया गया। ग्रेजियानों के मजदूर वेतनवृद्धि और यूनियन बनाने के अधिकार की लड़ाई लगभग एक साल से लड़ रहे थे। इस मामले में प्रबंधक समूह के एक व्यक्ति पर न केवल मजदूरों ने बल्कि मारे गए महाप्रबंधक की पत्नी ने भी अपना संदेह प्रकट किया लेकिन इस मसले को दबाकर मजदूरों को ही दोषी मान लिया गया। पुलिस व श्रम मंत्रालय ने इस पूरे मसले पर श्रम विरोधी रवैया अपनाए रखा। इसके बाद साहिबाबाद में निप्पो कंपनी के प्रबंधक की हत्या ठीक ऐसी ही परिस्थितियों में की गई। बाउंसरों का प्रयोग, प्रबंधकों के बीच की आपसी होड़, सम्मान पूर्ण व्यवहार की मांग, वेतनवृद्धि की मांग व यूनियन बनाने का अधिकार ही वह धुरी थी जिसके इर्द-गिर्द प्रबंधक की हत्या हुई और इसके आरोप में मजदूरों को गिरफ्तार किया गया। बाद में मुंबई और कोयटंबूर में ऐसी ही घटना घटी। पेदुचेरी में मजदूरों ने शिरामिक कंपनी के प्रबंधक को ऐसी ही झड़प में मार डाला। गुड़गांव में पिछले एक साल में ठेकेदार व प्रबंधकों के खिलाफ मजदूरों की झड़प की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। कंस्ट्रक्शन मजदूरों ने अपने साथी की मौत पर पुलिस और प्रबंधक पर हमला बोला। इसके तुरंत बाद ओरिएंट लाँगमैन में मजदूरों ने प्रबंधक द्वारा एक मजदूर पर कातिलाना हमला करने के खिलाफ प्रबंधक के खिलाफ हमला किया। चंद महीनों बाद मारूति में हुई यह घटना उस हालात का ही नतीजा है जिसे इस देश में विकास के नाम पर बना दिया गया है।

मारूति मानेसर प्लांट में हुई घटना किसी अराजकता का परिणाम नहीं है। यह एक सोची-समझी नीति का परिणाम है। यह श्रम की अंतहीन लूट को और मजदूरों को उजरती दास के अस्तित्व तक सीमित कर देने की नीति का परिणाम है। यह उनके संगठित होने से रोकने और उन्हें एक नागरिक जीवन तक न जीने देने की नीति का परिणाम है। यह मजदूरों को भ्रष्ट कर देने की चाल का नतीजा है। यह मजदूर वर्ग को ‘हेडलेस चिकेन’ बना देने की नीति का परिणाम है। यह उनके संकट का परिणाम है जो चारों ओर से उन्हें दबोचे हुए है। यह उनकी अपनी ही षड्यंत्रपूर्ण कार्रवाइयों का नतीजा है। यह एक नए समाज का सपना देखने की ललक से भर उठे मजदूरों से डर जाने का परिणाम है। यह पूंजीपति वर्ग के अपने ही मौत के डर से उपजी हुई उस हताशा का परिणाम है जिसमें वह अपनी कब्र खोदने में जुट जाता है।

बहरहाल मजदूरों को रिहा करना चाहिए और सरकार और प्रबंधन को अपनी नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए। बाउंसरों के बेजा प्रयोग के जिम्मेदार प्रबंधकों पर मुकदमा चलना चाहिए और प्रबंधन में बैठे उन दोषियों को जेल होना चाहिए जिन्होंने इस माहौल को पैदा किया है।

मारूति सुजुकी तथा गुड़गांव के मजदूरों के संघर्षों के बारे में यहां पढ़ें

आटो क्षेत्र में वर्तमान असंतोष की लहर की वजह

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/24/2012 04:34:00 PM

यह लेख भारत के राजनीतिक अर्थशास्त्र के अध्ययन की जानीमानी और प्रतिष्ठित पत्रिका अस्पेक्ट्स ऑफ इंडियन इकोनॉमी के ताजा जून, 2012 अंक में छपा है. ऑटो निर्माण के क्षेत्र में काम करनेवाले मजदूरों के बीच बढ़ते असंतोष और उथल-पुथल की बुनियादी वजहों और मजदूरों के शोषण के बारे में गंभीर जानकारियां मुहैया करानेवाले इस लेख का अनुवाद नागरिक ने किया है और हाशिया पर इसे थोड़े सुधार के साथ प्रस्तुत किया जा रहा है.

गुड़गांव-मानेसर ऑटो क्षेत्र में वेतन समझौते के संबंध में 6 अप्रैल, 2012 के बिजनेस स्टैंडर्ड में ‘मोटाउन ब्रेसेस फॉर वेज रिवीजंस आफ्टर थ्री ईयर्स’ (तीन साल बाद वेतन बढ़ोतरी के लिए तैयार मोटाउन) शीर्षक से एक लेख छपा। इसी अखबार में दो बड़ी ऑटो पार्ट सप्लायर फैक्टरियों में हड़ताल की रिपोर्टिग करते हुए ‘हरिद्वार फैक्टरीज ब्रिउ मानेसर लाइक लेबर सिचुएशन’ (हरिद्वार की फैक्टरियों में पैदा हुईं मानेसर जैसी श्रम स्थितियां) जैसे चेतावनीपूर्ण शीर्षक के साथ एक और खबर प्रकाशित हुई। भारतीय रिजर्व बैंक ने अपनी हालिया रिपोर्ट ‘‘मॉनेटरी एंड मैक्रोइकोनॉमिक डेवलपमेंट्स’’ में  ‘वेतन खर्चों में नियमित वृद्धि से चौतरफा महंगाई के दबाव’ की चेतावनी दी है।

औद्योगिक वेतन स्तरों में क्या हो रहा है? क्या वास्तव में ही समृद्धि, जिसकी सरकारी संस्थाएं बात कर रही हैं, ‘रिसते हुए’ (‘ट्रिकल डाउन’) मजदूरों तक पहुंच रही हैं? क्या अब मजदूर मजबूत स्थिति में हैं और क्या वे मूल्य निर्माण का ज्यादा बढ़ा हिस्सा हासिल कर पा रहे हैं?

वास्तव में पिछले कुछ वर्षों में खासकर ऑटो व ऑटो पार्ट क्षेत्र में श्रमिक असंतोष में उभार आया है। इनमें कुछ प्रमुख घटनाएं निम्न हैं – महिंद्रा (नासिक), मई 2009 और मार्च 2009; सनबीम ऑटो (गुड़गांव), मई 2009; बॉश चेसिस) पुणे, जुलाई 2009; होंडा मोटरसाइकिल (मानेसर) अगस्त 2009; रिको ऑटो (गुड़गांव), अगस्त 2009, इसमें गुड़गांव में पूरे ऑटो उद्योग में हुई आम हड़ताल भी शामिल है; प्रिकोल (कोयंबटूर), सितंबर 2009; वाल्वो (होसकोटे, कर्नाटक), अगस्त 2010; एम.आर.एफ. टायर्स(चेन्नई), अक्टूर 2010 और जून 2011; जनरल मोटर्स (हलोल, गुजरात), मार्च 2011; मारूति सुजुकी (मानेसर), जून-अक्टूबर 2011; बॉश(बेंगलुरू), सितंबर 2011; डनलप (हुगली), अक्टूबर 2011; कपारो (श्रीपेरुंबदूर, तमिलनाडु), दिसंबर 2011; डनलप (अंबत्तूर, तमिलनाडू), फरवरी 2012; हुंडई(चेन्नई), अप्रैल व दिसंबर 2011-जनवरी 2012 इत्यादि।

असंतोष केवल ऑटो उद्योग तक सीमित नहीं है, लेकिन वह वहां ज्यादा केंद्रित है। पिछले कुछ वर्षों में ऑटो उद्योग काफी तेजी से बढ़ा है। 2004-05 में 85 लाख वाहनों (दोपहिया, तिपहिया, सवारी गाड़ियों व व्यावसायिक वाहनों को मिलाकर) के मुकाबले 2011-12 में उत्पादन 2 करोड़ 4 लाख वाहनों तक पहुंच गया। कारों का उत्पादन 2004-05 में 12 लाख से बढ़कर 2010-11 में 30 लाख तक पहुंच गया। (और संभवतः 2011-12 में और बढ़ा हो) ऑटो उद्योग की पिछले एक दशक में तीव्र वृद्धि की सुविज्ञात सफलता गाथा है विशाल राजकीय सब्सिडी के दम पर सरकार भारत को ऑटोमोबाइल क्षेत्र के लिए वैश्विक मैन्यूफैक्चरिंग केंद्र(हब) बनाने के लिए कृतसंकल्प है। [1]

दूसरी ओर, यह एक अच्छे ढंग से छुपा रहस्य है कि ऑटो क्षेत्र में वास्तविक मजदूरी (मुद्रास्फीति की गलत गणना को छोड़ते हुए भी) 2000-01 से 2009-10 की अवधि में निरंतर गिरी है। (उद्योगों के वार्षिक सर्वे, एएसआई, से उपलब्ध सबसे नए आंकडे़ 2009-10 के ही हैं।) यह सच है कि मोटर वाहन उद्योग में वार्षिक वेतन 2000-01 के 79,446 रुपये से 2004-05 में 88,671 रूपये और 2009-10 में 1,09,575 रुपये तक नाममात्र के लिए बढ़ा है। 

हालांकि औद्योगिक मजदूरों के लिए उपभोक्ता दाम सूचकांक (सीपीआई-आईडब्ल्यू) नियमित रूप से मजदूरी की तुलना में कहीं तेजी से बढ़ा है।  इस तरह ऑटो उद्योग में 2000-01 और 2009-10 के बीच वास्तविक मजदूरी 18.9 प्रतिशत गिरी है. (चार्ट-1 देखें)



दूसरी तरफ अर्थव्यवस्था में मंदी के वर्षों की गिरावट को छोड़कर ऑटो उद्योग में प्रति मजदूर द्वारा कुल मूल्य वृद्धि [2] में भी बढ़ोत्तरी होती रही है। 2000-01 में प्रत्येक मजदूर ने 2.9 लाख रूपये का मूल्य जोड़ा था। यह आंकड़ा 2009-10 में बढ़कर 7.9 लाख रुपये तक पहुंच गया (चार्ट-2 देखें)।



स्वभावतः, जैसा कि चार्ट-3 में देखा जा सकता है, जोड़े गये मूल्य के अनुपात में मजदूरी भी निरंतर गिर रही है। 2000-01 में मजदूरों का वेतन जोड़े गये मूल्य का 27.4 प्रतिशत था। 2009-10 में यह अनुपात 15.4 प्रतिशत तक गिर गया।



मार्क्सवादी संदर्भों में बात करते हुए आइए काम के दिन के दो हिस्सों में बंटवारे के हिसाब से विचार करते हैं। पहले हिस्से में मजदूर अपनी आजीविका के लिए काम करता है (और अपने परिवार की आजीविका के लिए भी, ताकि भविष्य में मजदूरों की उपलब्धता भी सुनिश्चित हो सके)। उस समय में मजदूर आगत (इनपुट) में जो मूल्य जोड़ता है, वह उसे मिलने वाली मजदूरी के बराबर होता है। [3] लेकिन मजदूर केवल इतने समय बाद काम बंद नहीं कर सकता। पूंजीपति ने उसकी काम करने की सामर्थ्य (श्रम शक्ति) को पूरे दिन के लिए खरीदा है। (उत्पादन के साधनों से विहीन होने के कारण मजदूर के सामने जिंदा रहने के लिए अपनी श्रम शक्ति बेचने के अलावा कोई चारा नहीं है) वह बाकी के पूरे दिन भी श्रम करना जारी रखता है, फिर चाहे काम का दिन 8,10,12, या 16 घंटे का ही क्यों न हो। अतिरिक्त घंटे अतिरिक्त श्रम काल होता है। इसकी भी गणना हम पैसे में कर सकते हैं। निश्चित तौर पर संभव है कि पूंजीपति इस अतिरिक्त में से बैंकों को ब्याज, भूस्वामी को किराया, प्रबंधकों को वेतन और इसी तरह अन्य भुगतान करता हो, लेकिन यह सभी दूसरे लोग पूंजीपति द्वारा इसी अतिरिक्त में से हिस्सा बांटते हैं।

इन अर्थों में, हम कह सकते हैं कि 2000-01 में एक ऑटो मजदूर 8 घंटे की पाली में 2 घंटे, 12 मिनट अपने [4] और अपने परिवार की आजीविका के लिए खर्च करता था। उसने बाकी बचे 5 घंटे, 48 मिनट का अधिकांश पूंजीपति (और बैंकों, भूस्वामियों, प्रबंधकों और अन्य) के लिए अतिरिक्त पैदा करने में खर्च किया।

2009-10 में यह अनुपात और नीचे गिर गया। एक ऑटो कामगार अब अपने और अपने परिवार की आजीविका के लिए केवल 1 घंटा, 12 मिनट खर्च करता है और बचे 6 घंटे, 48 मिनट का अधिकांश पूंजीपति के लिए काम करता है।[5]

यह गिरावट कैसे आई? यह महज श्रम उत्पादकता में वृद्धि, नई तकनीक की मदद से एक घंटे में पहली की तुलना में ज्यादा पैदा करने की कहानी नहीं है। जैसा कि हमने पहले देखा, मजदूरों की मजदूरी वास्तविक अर्थों में लगभग पांचवें हिस्से तक गिर गयी। मालिकों द्वारा मजदूरों के विरुद्ध सक्रिय वर्ग संघर्ष छेड़ दिया गया था।

इस वर्ग-संघर्ष का अहम मोर्चा ऑटो उद्योग में स्वतंत्र ट्रेड यूनियनों के गठन के खिलाफ अलिखित कानून के रूप में मौजूद है। शायद हाल के आंदोलनों में मजदूरों की एकमात्र अति महत्वपूर्ण मांग उनकी खुद की ट्रेड यूनियन गठन करने का अधिकार पाने की थी। अधिकांश मामलों में मजदूर अभी तक भी ऐसा कर पाने में सफल नहीं हो पाये हैं। नियोक्ताओं द्वारा अपनाये जाने वाले तौर तरीकों में छंटनी करना, आपराधिक मुकदमों में फंसाना, मारपीट करना और यहां तक कि हत्या तक करवाना शामिल है। जर्मन ऑटो पार्ट निर्माता बॉश ने सफलतापूर्वक यूनियन गठन के तीन प्रयासों का विरोध किया। हुंडई, हीरो होंड़ा, वॉनजिन, मारुति-सुजुकी, ग्रेजियानो, रिको ऑटो सभी जगह कहानी एक जैसी है। जब हीरो होंडा के धारूहेडा प्लांट के 1800  कैजुएल मजदूरों ने अपनी पसंद की यूनियन में शामिल होने का प्रयास किया तो नेताओं के विरुद्ध आर्म्स एक्ट और भारतीय दंड संहिता की धारा-307 (हत्या का प्रयास) के अंतर्गत मुकदमे दर्ज कर दिये गये। [6] रिको ऑटो, गुड़गांव में 2009 मे मजदूरों पर गुंडों द्वारा हमला करवाया गया। इसमें एक मजदूर की मौत हो गयी। 2011 में मारूति आंदोलन में हरियाणा का श्रम विभाग (वास्तव में पूरी हरियाणा सरकार) ने प्रबंधन की एक शाखा (विंग) की तरह काम किया। ऑटो कंपनियां अपने कामों को गुजरात स्थानांतरित कर रही हैं। स्पष्ट उद्दंडता से यह घोषित करते हुए कि वे अपने उत्पादन को ‘यूनियन-प्रूफ’ करने के लिए ऐसा कर रहे हैं (अर्थात वे उम्मीद करते हैं कि श्रीमान मोदी उपद्रवियों से निपट लेंगे।)

ठेके, ‘ट्रेनी’ और ‘अप्रेटिंस’ के आधार पर मजदूरों को (स्थायी मजदूरों के वेतन के एक हिस्से भर में) रखना वेतन घटाने का एक और समान महत्व का और पूरक तरीका है। समाचार रिपोर्टों के अनुसार दिल्ली के बाहर गुड़गांव-मानेसर-बावल जोन में, जो कि भारत के ऑटो उत्पादन के लगभग 60 प्रतिशत के लिए जिम्मेदार है, 10 लाख मजदूरों में से 80 प्रतिशत ठेके पर रखे जाते हैं। [7] मारुति-सुजुकी के मानेसर प्लांट में 970 स्थायी, 400-500 ‘ट्रेनी’, 1,100  ठेका मजदूर और 200-300 ‘अप्रेंटिस’ मजदूर हैं। [8] भारत के दूसरे किसी हिस्से में स्थिति इससे कोई भिन्न नहीं है। पश्चिम बंगाल और गुजरात के मजदूरों के ऊपर हुए आर्थिक वृद्धि संस्थान के एक सर्वे में पाया गया कि विनिर्माण क्षेत्र में 60-70 प्रतिशत मजदूर ठेका मजदूर हैं। यह आंकड़ा इन राज्यों कि औद्योगिक वार्षिक सर्वेक्षण (एएसआई) से तीन-तीन गुना ज्यादा है। (एएसआई के आंकड़े स्वयं कंपनियों द्वारा बतायी जानकारी के आधार पर तैयार किए जाते हैं।) [9] पिछले दो दशकों में औद्योगिक श्रम शक्ति में ठेका श्रमिकों के हिस्से में बेतहाशा वृद्धि देखी गयी है। इसके बावजूद कि कुल श्रमशक्ति इस दौरान नगण्य दर से बढ़ी है।

महंगाई की मार सबसे ज्यादा ठेका मजदूरों (कॉन्ट्रेक्ट वर्करों) पर पड़ी है। हालांकि उनके वेतनों को सूचीबद्ध नहीं किया गया है। इनके वास्तविक वेतनों में सीधी गिरावट हुई है। वे अपनी बर्दाश्त की सीमा पर पहुंच गये हैं और अब पलटकर लड़ाई कर रहे हैं। पिछले दशक खासकर पिछले कुछ वर्षों के दौरान यह अपनी वास्तविक मजदूरी के नुकसान के एक हिस्से की क्षतिपूर्ति का प्रयास है या कम से कम और गिरावट को रोकने का प्रयास है। उनकी हालिया बढ़ी हुई उग्रता का यही कारण है।

निश्चित तौर पर ऑटो मजदूर एक आम प्रवृत्ति के केवल शानदार उदाहरण भर है। जैसा कि चार्ट- 4 व 5 में देखा जा सकता है कि 2000-01 के मुकाबले 2009-10 में कारखाना क्षेत्र में समग्रता में वास्तविक मजदूरी कम है। हालांकि गिरावट उतनी तेज नहीं है, जितनी कि ऑटो क्षेत्र में है और इस पूरे काल में मूल्य योग के अनुपात में भी मजदूरी करखाना क्षेत्र में लगातार गिरी है।



उभरती घटनाओं के पीछे की यह पूरी पृष्ठभूमि है जिसे मीडिया हिंसा कहता है- अर्थात प्रबंधकों की नियमित हिंसा नहीं, बल्कि मजदूरों का प्रतिरोध है। दो हालिया उदाहरणों को लीजिए: येनम (पुद्दुचेरी के अंतर्गत आने वाला काकीनाडा, आंध्रप्रदेश के निकट का एक छोटा सा इलाका) में जनवरी, 2012 में स्थायी किये जाने तथा वेतन वृद्धि की मांग के लिए रिजेन्सी सिरेमिक्स के 8 सौ मजदूर हड़ताल पर थे। 27 जनवरी को उनके धरने पर हमलाकर पुलिस ने उनके यूनियन अध्यक्ष को मार दिया और कुछ अन्य लोगों को घायल कर दिया। गुस्साये मजदूरों ने बदला लेने के लिए कंपनी के अध्यक्ष पर हमला कर दिया (जिससे बाद में उसकी मौत हो गयी) और मालिकों की बहुत सी सम्पत्ति को तोड़-फोड़ दिया और आग लगा दी। 19 मार्च 2012 को गुडगांव में ओरिएन्ट क्राफ्ट (टोमी हिलाफिगर, डीकेएनवाई तथा गैप की अंतरराष्ट्रीय रिटेल श्रृंखलाओं को वस्त्र निर्यातक) के ठेका मजदूरों द्वारा रविवार की छुट्टी करने के एवज में दो दिन का वेतन काट लेने का प्रतिरोध कर रहे थे। बदले में एक ठेकेदार ने कैंची से एक मजदूर पर हमला कर दिया। हजारों मजदूरों ने बदला लेने के लिए कंपनी का एक वाहन और पुलिस कार जला दी। कोर्ट ने ठेकेदार को जमानत पर रिहा कर दिया और गिरफ्तार मजदूरों को जेल भेज दिया।


श्रम ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार वास्तविक मजदूरी में गिरावट केवल औद्योगिक श्रमिकों तक सीमित नहीं है। उल्लेखनीय रूप से मनरेगा के बावजूद 2004-05 से 2008-09 के बीच में ग्रामीण क्षेत्रों में भी वास्तविक मजदूरी गिरी है।[10] यह सस्ते जन उपभोक्ता माल पैदा करने वाले उद्योगों के लिए बुरी खबर हो सकती है, लेकिन वे कारपोरेट क्षेत्र के छोटे से भी छोटे हिस्सा बनते हैं। संपूर्णता में निम्न ग्रामीण मजदूरी और निम्न ग्रामीण आय दूसरे अर्थ में कारपोरेट क्षेत्र के लिए अच्छी खबर है। यह औद्योगिक मजदूरों की मजदूरी को और गिराने में सहायक है क्योंकि गांव में विकल्प बहुत क्षीण हो जाते हैं।

संदर्भ सूची


[1] देखें Aspects of India’s Economy no. 45

[2] मशीनों के अवमूल्यन को घटाकर भौतिक आगतों के मूल्य और निर्गतों के मूल्य के बीच का अंतर.

[3] उदाहरण को सरल बनाने के लिए हम खराब हो चुकी मशीनों के स्थानापन्नों की आवश्यकता तथा उत्पादन की अन्य परिस्थितियों को नजरअंदाज कर दे रहे हैं।

[4] लगभग सभी ऑटो मजदूर पुरुष होते हैं.

[5] यह एक मजदूर और एक पूंजीपति के बीच के हिस्से हैं। लेकिन निश्चित तौर पर पूंजीपति अपने व फैक्टरी के सभी मजदूरों द्वारा पैदा अतिरिक्त मूल्य को पाता है। इस प्रकार हजार मजदूरों वाली एक फैक्टरी में पूंजीपति प्रतिदिन 6,800 घंटे अतिरिक्त श्रम के रूप में पाता है।

[6] “MNCs can’t wish unions away”, हिना खान, हिंदू बिजनेस लाइन (22/9/2011).

[7] “Maruti workers-management talks to resume today”, बिजनेस स्टैंडर्ड (6/6/2011).

[8] “Workers’ struggle in Maruti-Suzuki”, प्रसेनजित बोस और सुरिंद्र घोष, द हिंदू  (28/9/2011).

[9] “60-70 per cent of industrial workers in Bengal, Gujarat are contract labour”, हिंदू बिजनेस लाइन (22/7/2009).

[10] देखें Yoshifumi Usami, “A Note on Recent Trends in Wage Rates”, Review of Agrarian Studies, Vol. I, no. 1, January-June 2011. उसामी लिखते हैं: “मजदूरी में नाममात्र की वृद्धि तेजी से होती है, लेकिन औद्योगिक श्रम के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक और ग्रामीण श्रम के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक जैसे वे कारक को मुद्रास्फीति के प्रभाव को कम करने के लिए बनाए गए हैं इससे भी अधिक तेजी से बढ़ते हैं.” 2009-10 के कुछ आंकड़ों के लिए यहां देखें.

जो राज्य जितना फ्रेंडली माहौल देगा, वो उतना दमनकारी होगा

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/23/2012 07:52:00 PM

दिलीप खान

जब मानेसर में मज़दूरों ने शांति से हड़ताल की, एक बार नहीं, दो बार नहीं तीन बार, तो टीवी मीडिया वाले उधर फटके तक नहीं थे. हज़ारों की संख्या में गुड़गांव में मज़दूरों ने प्रदर्शन किया था. कई कारखानों और संगठनों के मज़दूर उसमें शामिल थे. एनसीआर में इतना बड़ा मज़दूर-प्रदर्शन मुझे कोई और याद नहीं आता. सारे मीडिया वाले जान रहे थे, मानेसर में क्या चल रहा है, सिर्फ कवर नहीं कर रहे थे. चर्चा भी चलती थी कि आगे कोई ‘बड़ा हादसा’ हो सकता है. अब हुआ तो लपके पड़े हैं. मीडिया को ‘हादसे’ का इंतज़ार रहता है. हादसा करो, तो ख़बर बनेगी.

मारुति को लेकर जितनी ख़बरें चली हैं उनमें पिछले एक साल से चल रही घटनाओं को अंतिम में बस रैप-अप किया गया. अख़बार वाले नॉस्टैल्जिक होकर लिखते रहे कि –संजय गांधी के सपनों की मारुति. जो अख़बार मानेसर में संजय गांधी को देख रहा था, और इस दौरान 30-40 साल पीछे गोता लगा रहा था, उसे साल भर पहले ‘गुड कंडक्ट फॉर्म’ की याद नहीं आ रही थी. नॉस्टैल्जिया हमेशा गांधियों के पक्ष में ही क्यों रहता है?

सुनिए ज़रा श्यामबीर से


पिछले साल मज़दूरों की मांग को सुनने की बजाए भूपेंद्र सिंह हुड्डा जापान गए थे, ताकि ओसामा सुज़ुकी का भरोसा जीत सके. उनके जापान से लौटते ही दर्ज़न भर मज़दूरों को पुलिस ने पीटा था. सुज़ुकी धमकी दे रहे थे कि प्लांट को उठाकर वो गुजरात ले जाएंगे. मोदी उनको फ्रेंडली माहौल का भरोसा दे रहे थे. मानेसर में उस समय भी कुछ दिनों के लिए तालाबंदी थी. अब फिर तालाबंदी है, लेकिन इस बार हुड्डा नहीं बल्कि मोदी जापान गए हैं भरोसा जीतने. भरोसा जीतने की क़ीमत हम जानते हैं मोदी जी!

 कॉरपोरेट्स को नरेंद्र मोदी पसंद हैं. जाहिर है वो कॉरपोरेट को खुश रखते हैं. अब हवा में तो कोई खुश रहेगा नहीं, जाहिर है बदले में वो तब-तब समर्थन चाहेगा जब-जब किसी ‘दूसरे’ के साथ उनका हित टकराए. सरकार से हित टकराना नहीं है, सरकार तो मोदी ही है. तो, जिनसे हित वगैरह टकराएगा वो मज़दूर-टाइप ही कोई होगा न? यही भरोसा जीतने के लिए जापान जाना पड़ता है बॉस. यह आप भी जानते हैं और हम भी.

दिलीप के कुछ फेसबुक स्टेटसों को जोड़कर यह पोस्ट बनाई गई है.

मारुति में हत्या और आगजनी के लिए प्रबंधन जवाबदेह

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/23/2012 06:08:00 PM


मारुति एक बार फिर से चर्चा में है. पिछले साल तीन दौरों में चली हड़ताल के बाद मजदूरों पर एक बार फिर प्रबंधन, शासन-प्रशासन एवं श्रम विभाग की मिलीभगत से दमन जारी है और मजदूरों के वाजिब व जायज़ मांगों के लिए चलाए जा रहे लंबे संघर्ष को एक दुर्घटना की आड़ में हड़पने की साजिश भी जारी है. मजदूर पत्रिका का बयान.

गुड़गांव को नई अर्थनीति का शानदार मिसाल माना जाता था. दुनिया भर के पूंजीपति अपने इस आशियाना में पूंजी लगाना चाहते थे क्योंकि सभी चीजें उनके मन के मुताबिक थीं. यहां ऐसा प्रशासन भी है जो उन्हें हर सुविधा मुहैया करनेवाला है - सस्ती जमीन, कम टैक्स और सबसे बड़ी चीज सस्ते श्रम का भण्डार. और हां यह सस्ता श्रम पूंजीविरोधी परम्पराओं से भी दूर था -- यानी ‘औद्योगिक शांति’ का वादा. इस आशियाने में पूंजी को मजदूरों का निर्बाध शोषण करने की छूट रही है और इस तरह उन्हें अपार मुनाफा कमाने की सम्भावना रहती है. गुड़गांव ‘शाइनिंग इण्डिया’ की मिसाल बन गया. यहां के चमचमाते आलीशान भवन समृद्धि का एलान करते हैं और यहां का विशाल औद्योगिक क्षेत्र भारत के आर्थिक विकास का नमूना बन गया.

लेकिन यह दुनिया भी अब चरमरा रही है. आखिर यह परस्पर विरोधी चीजों से बनी हुई है. एक इस दुनिया के मालिक हैं जो इस नए वैभव का उपभोग कर रहे हैं और दूसरी ओर है इसे अपने श्रम से निर्माण करने वालों की दुनिया जो हर चीज से वंचित है. श्रम करने वालों के जिम्मे है केवल कमरतोड़ मेहनत. इन श्रमिकों के सस्ते श्रम से यह पूरी सुंदर दुनिया बन रही है और वे नारकीय स्थिति में गुजर-बसर करने को मजबूर हैं. मजदूरों द्वारा जीते गए श्रम कानून मानों इस क्षेत्र में वर्जित हैं. और नव-उदारवादी पूंजीवाद के लिए यह तो ‘शो पीस’ ही बन गया था. राज्य है, लेकिन वह बस यहां पूंजी के लिए हर चीज को सुगम बनाने के लिए है - चाहे वह जमीन अधिग्रहण हो, टैक्सों में कटौती हो या फिर बिजली. और सबसे अव्वल बात तो है यहां श्रम कानूनों का लागू न होना. पर एक समय ऐसा आया कि श्रम करने वालों ने अपना हक मांगना शुरू कर दिया.

2005 में होण्डा मोटरसाइकल एण्ड स्कूटर्स इण्डिया लिमिटेड में जबरदस्त हड़ताल हुई और उसे बर्बर पुलिस दमन व गुण्डावाहिनी के हमले से जूझना पड़ा. फिर भी मजदूरों ने दिखा दिया कि वे भी मानव हैं और एक मानवोचित जिन्दगी के लिए वे उठ खड़े हुए हैं. इनके इस कदम को क्षेत्र की बाकी फैक्ट्रियों के मजदूरों से समर्थन मिला और इस एकता के सामने प्रबंधन को वार्ता पर आना पड़ा. यह हड़ताल दुनिया भर में मजदूर संघर्षों से प्राप्त यूनियन बनाने के अधिकार के लिए था. अपनी मांगों को लागू करवाने के लिए संगठन बनाने का अधिकार ये मजदूर फिर एक बार लड़कर ले रहे थे और इस प्रकार श्रम कानूनों के विरोधी नव-उदारवाद को भी चुनौती दे रहे थे.

तब से लेकर अब तक इस प्राथमिक जनवादी अधिकार के लिए गुड़गांव भर के मजदूरों को लड़ना पड़ रहा है. अपने ऊपर होने वाले शोषण-अत्याचार के खिलाफ संगठित प्रतिरोध के लिए यूनियन बनाना जरूरी है और मजदूरों की इस तरह की एकता को नहीं बनने देने के लिए प्रबंधन कृतसंकल्प रहता है. वह तो मजदूरों को नारकीय परिस्थितियों में रखकर, उनसे जानवर जैसा बर्ताव कर सस्ते श्रम का शोषण करना चाहता है और मजदूर अगर किसी तरह सिर उठाए तो उसे कुचल देने के लिए वह प्रशासन, पुलिस के साथ मिलकर हर हथकण्डा अपनाता है.

विगत 18 जुलाई को फिर एक बार मजदूरों में अशांति फैल गई. अत्याचार करने वाले शोषकों के अपमान के विरुद्ध एक मजदूर ने अपना विरोध प्रदर्शित किया. ऐसे में प्रबंधन ने मजदूरों को उनकी जगह दिखाने के लिए ऐसी दरिंदगी का परिचय दिया कि दिल दहल उठता है. कार निर्माता मारुति सुजु़की के कारखाने में जो घटना घटी उसका ब्योरेवार तथ्य इस प्रकार हैः

एक सुपरवाइजर ने एक मजदूर को जातिसूचक गाली देकर अपमानित किया तो उसने विरोध किया. ऐसे में प्रबंधन ने उस मजदूर को अभद्रता के आरोप में निलंबित कर दिया. इस पर मारुति के यूनियन ने मांग की कि दोषी सुपरवाइजर के खिलाफ कार्यवाही की जाए तथा अपमानित मजदूर का नाजायज निलंबन रोका जाए. इसके बाद यूनियन ने लगातार यह प्रयास भी जारी रखा कि प्रबंधन इस घटना की निष्पक्ष जांच करवाए. इस घटना की नाजुकता को देखते हुए काम से छूटे शिफ्ट के मजदूर वहीं बने रहे लेकिन B शिफ्ट के मजदूरों ने उत्पादन कार्य जारी रखा. इससे पता चलता है कि मजूदर मामले का समाधन चाहते थे. वे उचित कार्रवाई की मांग कर रहे थे. लेकिन प्रबंधन अपनी जिद पर बना रहा. ज्ञात हो कि विगत महीने में दो यूनियन लीडरों को प्रबंधन ने झूठे आरोपों में फंसा कर निलंबित कर दिया था लेकिन मजूदरों के प्रतिरोध के बाद उसी दिन वापस ले लिया था. इसके साथ यह भी महत्वपूर्ण बात है कि वार्ता के दौरान श्रम विभाग ने खुलकर प्रबंधन का साथ दिया और प्रबंधन की भाषा बोलता रहा. इस तरह की घटनाओं से मजदूर गुस्से में थे.

18 जुलाई की शाम को प्रबंधन ने वार्ता तोड़ दी और पूर्वनियोजित ढंग से अपने बौंसरों (गुण्डों) को बुला लिया. ऐसी स्थिति में उकसावेबाजों (agent provocateurs) का काम करते हुए इन्होंने मजदूरों को  आक्रोशित कर दिया और प्रबंधन के साथ झड़प शुरू हो गई. फिर आगजनी हुई और एक व्यक्ति की दुखद मृत्यु हो गई. इस तरह प्रबंधन, श्रम विभाग व प्रशासन ने मिलकर घटना को शांतिपूर्ण ढंग से हल न कर इसे ऐसा मोड़ दिया कि दोष मजदूरों पर मढ़ा जा सके. लेकिन इनकी नापाक मिलीभगत आज बहुत दिनों से लोगों के सामने है.

मारुति सुजु़की में एकदम जायज, कानूनी व मौलिक हक यानी संगठन (यूनियन) बनाने के हक से मजदूरों को वंचित रखा गया. यह है पूंजी के सामने नतमस्तक भारतीय जनतंत्र का हाल. मजदूरों को उनके मौलिक अधिकारों से वंचित कर उनसे पशुवत व्यवहार किया जाता है. पूरे प्रकरण के लिए वही लोग जिम्मेवार हैं जो मजदूरों के साथ ऐसा करते हैं. जैसा कि अकसर हमारे जनतंत्र में देखा जाता है कि जब मजदूर अपने हकों के लिए, अपनी गरिमा के लिए उठ खड़े होते हैं तो उनको कुचल दिया जाता है. यहां भी ऐसा ही हुआ और 100 से अधिक मजदूरों को गिरफ्तार कर लिया गया. मजदूरों पर दमन ढाया जाने लगा. लेकिन जुर्म करने वालों को तो विरोध का सामना करना ही पड़ता है. इतिहास इस बात का साक्षी है और आगे भी ऐसा ही होगा.

देशी-विदेशी कारपोरेट घरानों की चरागाह बनी यह एनसीआर अब उबाल पर है. चाहे नोएडा हो या गुड़गांव, मजदूर अब अपनी गुलामी को बर्दाश्त नहीं करने वाले. लगातार विरोध के द्वारा वे अपने शोषण-दमन के खिलाफ लड़ाई जारी रखे हुए हैं. पूंजी के अबाध राज के लिए सरकार ने एनसीआर को चिह्नित किया था जहां श्रम कानून कारगर नहीं होंगे, जहां सस्ता श्रम होगा और जहां पूंजीपतियों को बिना मोल के हर सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी. लेकिन यह आशियाना कब तक? आखिर मजदूर उठ खड़े हुए. उन्हें अपनी जानवरों जैसी स्थिति का बोध हुआ और वे विरोध करने लगे. सरकार व प्रबंधन को यह नागवार गुजरा. वे क्रूर दमन चलाने में लग गए. मारुति में हुई घटना इसी की एक कड़ी है.

सवालों के घेरे में हैं प्रशासन व प्रबंधन. क्यों यूनियन बनाने के अधिकार के लिए मजदूरों को बार-बार हड़ताल पर जाना पड़ता है? इसके लिए कौन जिम्मेवार है? कौन कानून की अवहेलना कर रहा है? बेशक प्रबंधन. क्या इसके लिए उसे कोई सजा है? क्यों नहीं? कौन काम की जगह पर अत्याचार करता है? क्या हाथापाई करना, पगड़ी उतार देना, जातिसूचक गाली देना किसी जनतांत्रिक समाज को स्वीकार्य होगा? लेकिन यह इस क्षेत्र की फैक्ट्रियों में आम बात है. गुण्डों के सहारे मजदूरों की गतिविधियों पर रोक लगाना किस कानून में स्वीकृत है? किस ठेका मजदूरी कानून के तहत वहां अत्यंत कम मजदूरी पर काम लिया जाता है? लेकिन पूंजी के लिए तो कानून उसका खिलौना है और मजदूर इस बात को खूब महसूस कर रहे हैं. उनकी लड़ाई जायज है और इसे बदनाम करने की हर कोशिश के सामने ये सवाल सामने आएंगे.

18 जुलाई की घटना की फैक्टशीट हमने पेश कर दी. और पीछे जाएं तो पूछा जाएगा कि एक ही मांग जो कानूनसम्मत है यानी यूनियन बनाने की मांग को लेकर मारुति के मजदूरों को क्यों बार-बार हड़ताल पर जाना पड़ता है? अपने न्यायोचित मांगों को लेकर लड़ने वाले इन मजदूरों पर दमन करने वालों को किस न्यायबोध के तहत सही ठहराए जा सकता है? बातें साफ हैं - एक तरफ वे शोषक हैं जो सस्ती दर पर मानव श्रम की लूट करना चाहते हैं और दूसरी तरफ वे जिनको अपने इनसानी वजूद को बनाए रखने के लिए हर कदम पर जूझना पड़ता है. मारुति का संघर्ष उस पूरी नव-उदारपंथी दुनिया के खिलाफ एक संघर्ष है जो श्रम की दुनिया पर हमला कर उसके हर हक को कूड़ेदान में डाल देना चाहती है और इसके लिए लगातार अभियान चलाए रहती है.

आज मीडिया मारुति में हुई आगजनी और एक प्रबंधक की मृत्यु को दिखाकर मजदूरों के संघर्ष को बदनाम करना चाह रहा है. उस दिन वह कहां था जब मजदूर अपने कानूनी हकों को भी लागू करने के लिए संघर्ष कर रहे थे और पुलिस, प्रशासन व गुण्डों का सामना कर रहे थे? आखिर मीडिया भी तो कारपोरेट घरानों का है. इन घटनाओं से यह कहा जा रहा है कि भारत का विकास रुकेगा क्योंकि निवेश का वातावरण प्रभावित होगा. वाह रे वाह! अमेरिका में मंदी कौन सी हड़ताल के चलते आया और वहां क्यों पूंजी निवेश रुकने लगा? टाटा मोटर्स में आज रह-रहकर काम बंदी क्या हड़ताल के चलते है? नहीं. यह पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया का संकट है जिसके चलते ऐसा हो रहा है. और इसे मजदूरों की हड़तालों पर मढ़ना सरासर गलत प्रचार है. इस बहाने पूंजी के तुष्टिकरण के लिए गुहार लगाया जाता है और सस्ते श्रम व प्राकृतिक संसाधनों को उसके हवाले कर देने के लिए तर्क बनाए जाते हैं. लेकिन सच्चाई कुछ और है. मजदूरों की हकमारी हो रही है और सुनियोजित ढंग से, नीतिगत रूप में हो रही है यह बात स्पष्ट है. इसीलिए मारुति के मजदूरों की लड़ाई इस नव-उदारपंथी दुनिया को बेनकाब करते हुए इसके खिलाफ एक जुझारू आह्वान है. यह इस अन्यायी पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया पर प्रश्न चिह्न खड़े करती है. तमाम तथ्य व तर्क यही मांग करते हैं कि न्यायपसंद लोग इन मजदूरों के संघर्ष के समर्थन में आगे आएं और आवाज बुलंद करें.

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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