हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

कविता में व्याधि या कविता की व्याधि

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/30/2012 11:57:00 PM

एक विषय. दो कवि. दो अलग अलग तरह की कविताएं. लेकिन संवेदना की जमीन पर दोनों कैसे एक ही जगह पहुंचती हैं जहां वे समान रूप से अमानवीय और स्त्रीविरोधी हैं, जबकि एक कविता एक महिला द्वारा लिखी गई है और दूसरी एक पुरुष द्वारा. अपनी अब तक चर्चित हो चुकी इस आलोचना में शालिनी माथुर एक तरह से दोनों कविताओं का और उनके रचनाकारों के अंतर्मन का, उनकी वास्तविक राजनीति का उत्खनन करती हैं और दिखाती हैं कि कैसे खुद के नारीवादी होने का दावा करने वाली कविता या कवि-रचनाकार भी भीतर से कितने स्त्रीविरोधी, पितृसत्तात्मक हैं. घोषित रूप से स्त्रियों के पक्ष में लिखी गई इन कविताओं की यह आलोचना इसे भी दिखाती है कि किस तरह ये दोनों रचनाकार पूंजीवादी बाजारपरस्ती के नमूने के बतौर सामने आते हैं, जो अपने बुनियादी चरित्र में ही स्त्रीविरोधी और पितृसत्तात्मक है. शालिनी ने यहां आलोचना के नए तौर तरीके और मानक गढ़ने की भी कोशिश की है और इस रचना ने इसे भी साबित किया है आलोचना पर अकादमियों और हिंदी विभागों का एकाधिकार नहीं है बल्कि बेहतर, जन पक्षधर और सार्थक रचना तथा आलोचना इनसे बाहर, रोज बरोज के संघर्षों के बीच से, जनता के बीच से निकलती है. यह आलेख कथादेश के जून (2012) अंक में प्रकाशित हुआ है और यहां थोड़े संपादन के साथ पोस्ट किया जा रहा है. 

साहित्य का कोई प्रयोजन तो होता ही होगा, लोकसंग्रह, आत्माभिव्यक्ति, संस्कृति को समृद्ध करना या फिर हिन्दी की फ़िल्म डर्टी पिक्चर  की भांति एन्टरटेन्मेन्ट, एन्टरटेन्मेन्ट एंड एन्टरटेन्मेन्ट। कविता करने वालों को कहानीकारों, नाटककारों, और निबन्धकारों की अपेक्षा अधिक स्वतंत्रता है। कविता भाव प्रधान हो सकती है, भावना प्रधान हो सकती है, अर्थवान भी और निरर्थक भी । कविता एब्सर्ड भी होती है पर कविता को कुछ न कुछ तो निरूपित करना होगा चाहे वह निरर्थकता या एब्सर्डिटी ही क्यों न हो। कविता ने शिल्प के अनुशासन से तो स्वयं को मुक्त कर लिया है- न छंद, न लय, न अलंकार, न छवियाँ, न बिम्ब। कविता अब गाई भी नहीं जाती, पढ़ ली जाती है। तो क्या पढ़ कर समझी भी न जाए? पाठक कविता से क्या अपेक्षा करे? खास कर जब कवि कवयित्री स्वयं को नारीवाद जैसे मानवीय विषय का प्रवक्ता बताते हुए अमानवीय रचनाएँ करें, निरन्तर करते रहें और  करते ही चले जाएँ। वे व्याधि पर कविता करें, इस चेतना के बग़ैर कि व्याधि से जूझ रहे मानव समाज को कैसा लगता होगा?

बीमारी एक खास किस्म का रूपक बनाती है- अंधता, हैज़ा, कुष्ठ, प्लेग, टी.बी., कैंसर और अब एड्स। अबे अंधा है क्या, कोढ़ की तरह सड़ना, प्लेग की तरह फैलना, टी.बी. या राजरोग से गलना, कैंसर की तरह जड़ जमाना यह सारे शब्द और मुहावरे मनुष्य की हृदयहीनता प्रदर्शित करते है। बातचीत और बतकहियों में रोग को मुहावरे की तरह इस्तेमाल करना एक प्रकार की क्रूरता है जिसे लोग बिना विचारे करते रहते हैं। सूसन सॉन्टैग जो स्वयं कैंसर से पीड़ित होकर इलाज से ठीक हुई थीं अपनी पुस्तक `इलनेस एज़ मेटाफ़ोर' में कहती है कि ऐसे प्रयोगों से रोग ही नहीं रोगी भी कलंकित होता है। वह निरूत्साहित हो जाता है, चुप्पी साध लेता है और शर्मिन्दा हो कर इलाज कराने से झिझकने लगता है। व्याधि को रूपक बनाते ही हम व्याधि को ख़तरनाक और असाध्य बना देते हैं। इससे रोगियों का एक अलग वर्ग तैयार हो जाता है- आइसोलेटेड - अलग-थलग अपने कर्मों का फल भोगते हुए, अपने अंत की प्रतीक्षा करते हुए।

सूसन सॉन्टैग  का लेख `इलनेस एज़ मेटाफ़ोर'  1978 में छपा और बहुत चर्चित हुआ। स्वयं कैंसर का इलाज करवाते समय उन्होंने पाया कि किस प्रकार बीमारी को रूपकों और मिथकों से जोड़ने से उत्पन्न मानसिक दबाव अनेक मरीजों की मौत का कारण बनता है। वे कहती हैं कैंसर केवल एक बीमारी है- (जस्ट अ डिज़ीज) अभिशाप नहीं, सज़ा नहीं, शर्मिन्दगी नहीं। इसका इलाज हो जाए तो यह ठीक हो जाता है।

साहित्य में क्या स्त्री दृष्टि और पुरुष दृष्टि अलग-अलग होती होगी ? यह प्रश्न अक्सर हमारे सामने आ खड़ा होता है। आज स्तन के कैंसर पर लिखी गई पवन करण की कविता ’स्तन’ और अनामिका की कविता ‘ब्रेस्ट कैंसर’ की समीक्षा करते समय उत्तर ढूंढ़ने का प्रयास कर लेते हैं। क्या अनामिका की दृष्टि पवन करण की दृष्टि से अलग है? क्या अनामिका की दृष्टि पवन करण की दृष्टि से इसलिए अलग होनी चाहिए, क्योंकि अनामिका स्त्री हैं ? क्या पुरुष के पास पुरुष दृष्टि और स्त्री के पास स्त्री दृष्टि होती है? या कवि चाहे स्त्री हो चाहे पुरुष हो, दृष्टियाँ दो प्रकार की होती हैं मर्दवादी और नारीवादी, या फिर मानवीय और अमानवीय।
स्त्री का वक्षस्थल पुरुष कवियों का प्रिय विषय रहा है। उसका वर्णन सामान्यतः सौन्दर्य वर्णन के लिए  शृंगारिक भाव से किया जाता रहा है। स्त्री शरीर के उतार-चढ़ावों को निरूपित करने के लिए अनेक उपमाएँ दी जाती रहीं हैं। क्या किसी पुरुष ने अपने किसी अंग के बारे में इस प्रकार का वर्णन या निरूपण किया है? शायद नहीं। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि कुछ ही वर्ष पूर्व तक कविता लेखन पूरी तरह पुरुष वर्चस्व के अधीन था पर आज हमारे सामने जो कविताएँ हैं वे इसी सदी में लिखी गई हैं। ये कविताएँ उन समयों में लिखी गई हैं जिन समयों में जॉन स्टुअर्ट मिल और मैरी वोल्टसन क्राफ्ट स्वतंत्रता तथा स्त्री-पुरुष समकक्षता के सिद्धान्त प्रतिपादित कर चुके थे। ये कविताएँ घोषित रूप से स्वयं को स्त्री का पक्षधर कहने वाले नारीवादी कवियों की हैं। ये स़्त्री के ‘ब्रेस्ट कैंसर’ पर लिखी गई कविताएँ हैं।

इस विषय पर द ब्यूटी मिथ में नाओमी वुल्फ़ ने गम्भीर चर्चा की है। वे बताती हैं कि किस प्रकार पुरुष के शरीर के नग्न निरूपण को अश्लील समझा जाता है और उस पर प्रतिबन्ध लगा दिया जाता है चाहे वह एड्स जैसी बीमारियों के विषय में जागरूकता हेतु ही क्यों न किया गया हो, और किस प्रकार स्त्री के वक्षस्थल का सार्वजनिक स्थल पर प्रदर्शन के लिए प्रयोग होता रहा है, कभी विज्ञापन के रूप में, कभी फिल्म के रूप में, कभी गीतों के रूप में । इस प्रकार पुरुष का शरीर बेहद सम्भ्रान्त तरीक़े से ढका रहता है जिससे वह शालीन बना रहता है,  और स्त्री का शरीर और उसकी चोली विज्ञापन और पर्दे पर थिरकती रहती है , जिससे उसका शरीर बाज़ारू बनता है। जो संस्कृतियाँ स्त्रियों को सामान्यतः नग्न निरूपित करती हैं और पुरुष को नहीं, वे लगातार धीरे-धीरे असमानता सिखाती हैं।

भारत में भी राई नर्तकियाँ, बेड़िनें और नौटंकी में नाचने वाली ग़रीब औरतें भी अपने चेहरे पर घूँघट ढककर और छाती खोलकर दो पैसों की ख़ातिर नाचती रही हैं और बेशऊर मर्द उन पर चवन्नियाँ लुटाते रहे हैं। नौटंकी देखने औरतें नहीं आतीं-नौटंकी  मर्दां का तमाशा है। इन बेचेहरा औरतों की कोई पहचान नहीं। वे औरत ज़ात हैं, उनका वक्षस्थल ही उनकी पहचान है। चवन्नी उसी पर न्योछावर की जाती है।
पवन करण ने भी इसी विषय पर कविता लिखी है, कविता का शीर्षक  है स्तन

"इच्छा होती तब वह धंसा लेता उनके बीच अपना सिर ... /और तब तक उन पर आंखें गड़ाये रखता,  जब तक वह उठ कर भाग नहीं जाती सामने से /...या लजा कर अपने हाथों से छुपा नहीं लेती उन्हें... अंतरंग क्षणों में उन दोनों को हाथों में थाम कर उससे कहता/ यह दोनों तुम्हारे पास अमानत है मेरी / मेरी खुशियॉ/ इन्हें संभाल कर रखना/ वह इन दोनों को कभी शहद के छत्ते/तो कभी दशहरी आमों की जोड़ी कहता/“ ... ” वह भी जब कभी खड़ी होकर आगे आईने के / इन्हें देखती अपलक तो झूम उठती “....“मगर रोग ऐसा घुसा उसके भीतर/ कि उनमें से एक को ले कर  ही हटा देह से। कोई उपाय भी न था सिवा इसके/ उपचार ने उदास होते हुए समझाया/... अब वह इस बचे हुए एक के बारे में/ कुछ नहीं कहता उससे, / वह उसकी तरफ देखता है।/ और रह जाता है कसमसा कर। /.... मगर उसे हर समय महसूस होता है।/ उसकी देह पर घूमते उसके हाथ।/ क्या ढूंढ रहे है कि उस वक्त वे/ उसके मन से भी अधिक मायूस हैं।” ...."उस खो चुके एक के बारे में भले ही एक दूसरे से न कहते हों वह कुछ, मगर वह विवश जानती है/उसकी देह से उस एक के हट जाने से/ कितना कुछ हट गया उनके बीच से।"

कवि पवन करण उक्त गद्यात्मक पंक्तियों को स्तन शीर्षक वाली कविता के रूप में ’स्त्री मेरे भीतर’ नामक संग्रह में संग्रहीत करते हैं।

पवन करण की कविता में स्त्री शरीर पुरुष शरीर का खिलौना है, पुरुष के रमण के लिए, देखें वह स्त्री देह के लिए किस प्रकार के उपमान प्रयोग करते हैं-  "वह इन दोनों को कभी शहद के छत्ते/ तो कभी दशहरी आमों की जोड़ी कहता"। पवन करण की कविता स्त्री देह को गोश्त  के टुकड़े के रूप में निरूपित करती है जिसे पुरुष लालची निगाहों से देखता है "और तब तक उन पर आँखें गड़ाये रखता, जब तक वह उठ कर भाग नहीं जाती सामने से"।  पवन करण की कविता की स्त्री भी स्वयं को  गोश्त का टुकड़ा ही समझती है "वह भी जब कभी खड़ी होकर आगे आईने के /  इन्हें देखती अपलक तो झूम उठती"।
पोर्नोग्राफर शरीर को मनविहीन, हृदयविहीन वस्तु के रूप में निरूपित करता है आत्मीयता (इंटिमेसी) और सम्बन्ध (कनेक्शन) रहित।
-सूसन ग्रिफिन

पवन करण की एक यही कविता नहीं अधिकांश कविताएँ पोर्नाग्राफी की श्रेणी में आती है क्योंकि उनमें शरीर (बाडी) को मन(माइंड) से अलग करके देखा गया है तथा स्त्री शरीर को पुरुष के अधिपत्य की भूमि माना गया है। पवन करण के पुरुष के हाथों में स्त्री शरीर ही नहीं उसके अलग-अलग अंग एक खिलौना हैं।

कविता में निरूपित पुरुष स्त्री को केवल देह के रूप में ही नहीं देह के केवल रमणीय अंगों के रूप में देख सका।  देह भी ऐसी जो कैंसर से ग्रस्त है, कैंसर  भी ऐसा जिससे शरीर का पूरा एक अंग काट कर निकालना पड़ा। दुःखद तो यह है कि कविता का समर्पण नाम लेकर किया गया, "संगीता रंजन के लिए जिसे छाती के कैंसर के कारण अपना एक स्तन गंवाना पड़ा।"  सभ्य समाज में एक आँखवाले, एक टाँगवाले, एक हाथवाले व्यक्ति की विकलांगता को द्योतित करने वाले शब्द कहना उचित नहीं समझा जाता, वहाँ स्त्री के एक ब्रेस्ट को कैंसर के कारण काट दिये जाने पर ऐसी कविता लिखी गई और नाम लेकर व्याधिग्रस्त स्त्री को समर्पित की गई ।
स्त्री पुरुष से हीनतर है, वह पुरुष के अधीन है, इस बात को पोर्नोग्राफ़र इतनी बार कहता है कि लोग इस बात पर यकीन करने लगते हैं।
-सूसन ग्रिफ़िन

पवन करण की स्त्री भी अपने शरीर को पुरुष की दृष्टि से देखती है। वह आब्जेक्टिफ़ाइड है (वस्तुकृत), कंट्रोल्ड (विवश) और ह्यूमिलिएटेड (अपमानित) कि उसे कैंसर से मरने से बचने के लिए स्तन गंवाना पड़ा। "उस खो चुके एक के बारे में भले ही/ एक दूसरे से न कहते हो वह कुछ/ मगर वह विवश जानती है/ उसकी देह से उस एक के हट जाने से/ कितना कुछ हट गया उनके बीच से "। स्त्री विवश है, पोर्नाग्राफी की क्लासिकल स्त्री छवि।

पवन करण के पुरुष को इस बात का संतोष नहीं कि सर्जरी से उसकी सहचरी को जीवन के कई नए वर्ष मिल गए। मगर उसे हर समय महसूस होता है। उसकी देह पर घूमते उसके हाथ/क्या ढूँढ़ रहे है कि उस वक्त वे/ उसके मन से भी अधिक मायूस हैं।” पवन करण को संदेह का लाभ दें तब भी पाएँगे कि कवि की सहानुभूति स्त्री के नहीं पुरुष के प्रति है जिसका खिलौना शल्य चिकित्सा से कट गया। पुरुष  के पास शरीर भी है और मन भी क्योंकि खिलौना टूट जाने से उसका मन मायूस है और हाथ भी। पवन करण कहते हैं कि शरीर के विरूपित हो जाने से स्त्री को हानि हो न हो पुरुष को होती है क्यों कि वह स्त्री शरीर से उस तरह से नहीं खेल सकता जिस तरह खेलना चाहता है और पुरुष यदि स्त्री में रुचि लेना बंद कर दे तो स्त्री का जीवन निरर्थक है क्यों कि स्त्री की प्रसन्नता इसी में है कि पुरुष का हाथ उसकी देह से खेले।
पोर्नोग्राफर स्त्री की हीनता ( इन्फीरियोरिटी ) में पूरा यकीन रखता है। वह इस बात में इतना गहरा विश्वास  रखता है कि वह इसे सिद्धान्त ( डॉक्ट्रिन ) के रूप में नहीं कहता। वह इसे एक सच्चे तथ्य (फैक्ट) के रूप में कहता है। वह यह नहीं कहता कि मुझे यह कहना है कि स्त्री हीन होती है। स्त्री कमतर है, सामान्यतः इस बात को वह इतनी  बार कहता जाता है- इशारों से, और वाक्यों से, कि इस प्रश्न पर बहस की कोई गुंजायश ही नहीं रह जाती।
-सूसन ग्रिफिन

उक्त परिभाषा पर पवन करण शत प्रतिशत सही उतरते हैं।

पवन करण अपवाद को नियम के रूप में स्थापित करते हैं। उनकी कविता दुःख क्षोभ या खेद से नहीं लिखी गई है, न ही ऐसा सोचने वाले पुरुष के प्रति हिकारत से। वह कविता यकीन के साथ लिखी गई है। पाठक देख सकते है कि पवन करण यह नहीं मानते कि स्त्री को इस रूप में देखना गलत है, उन्हें यकीन है कि स्त्री शरीर की यही उपयोगिता है। संभव है डेविल्ज़ एडवोकेट बन कर कोई कहे कि कुछ पुरुषों  की यही धारणा होती होगी,  परन्तु यूँ तो कुछ पुरुष  पेडोफ़ैलिक भी होते हैं। क्या हम उन मानसिक व्याधिग्रस्त पुरुषों को छोटे बच्चों का यौनिक और कामुकतापूर्ण नखशिख वर्णन करने की अनुमति देंगे और पुरस्कृत करेंगे?
पोर्नोग्राफर डिटर्मिनिस्टिक होते हैं, वे सोचते हैं, ठीक है, लोग ऐसे ही होते हैं, और हम उन्हें वह ही दे रहे हैं जो वे चाहते हैं पर यह सच नहीं है। सच यह है कि संस्कृति का निर्माण हम स्वयं करते है।
-सूसन ग्रिफ़िन

पवन करण के पात्र कीचड़ से सने हैं और यह कीचड़ भी उन्होंने खुद ही तैयार किया है। शल्य क्रिया के बाद एक स्तन वाली स्त्री पवन करण के पुरुष का प्रेम नहीं पा सकती। पवन करण की स्त्री पुरुष के हाथों विवश है और अपमानित, उस पुरूष  के हाथों, जो उसके शरीर का मालिक था। पोर्नोग्राफी का मकसद है- दूसरे के शरीर पर कब्ज़ा (मास्ट्री ऑफ़ दीज़ अदर्स) ।

पवन करण की इस कविता को वीभत्स कहना भी वीभत्स रस का अपमान करना है क्योंकि वीभत्स भी एक रस है जो सामान्यीकृत हो कर पाठकों तक पहुँचता है। पोर्नोग्राफी में नग्नता और पीड़ा पहुँचाना शामिल हो यह ज़रूरी नहीं। उनकी कविता हृदयहीन और अमानवीय है, जिसमें स्त्री  विवश, वस्तुकृत और अपमानित है। यह पोर्नोग्राफी की शास्त्रीय रचना है- हैवानियत से भरी। (मैं पाशविकता की जगह हैवानियत शब्द का प्रयोग कर रही हूँ, चूंकि पशु जगत में ऐसी नृशंसता अकल्पनीय है।) 

इसी वर्ष 2012 में प्रतिष्ठित साहित्यकार और नारीवादी चिंतक एड्रियन रिच का निधन हो गया। 1880 में लिखे अपने लेख ’’ कम्पलसरी हेट्रोसेक्सुअलिटी एंड लेस्बियन एक्ज़िस्टेंस’’ में वे पितृसत्ता  को पुरुष द्वारा स्त्री के शरीर, पैसे और भावना पर आधिपत्य (मेल राइट ऑफ फ़िज़िकल, इकोनामिक एंड इमोशनल एक्सेस टु वुमन) स्थापित करने का एक हिंसक राजनीतिक उपकरण सिद्ध करती हैं । पवन करण कहते हैं  "उन दोनों को हाथों में थामकर उससे कहता / ये दोनों तुम्हारे पास अमानत है मेरी / मेरी खुशियाँ / इन्हें संभाल कर रखना।’’  स्त्री का वक्षस्थल स्त्री के अंग है या पुरुष की अमानत और आधिपत्य क्षेत्र?  एड्रियन रिच ने विस्तार से विचार किया है कि किस प्रकार मर्दवादी विवरणों और छवियों के कारण स्त्रियाँ स्वयं अपने ही शरीर को अपनी दृष्टि से देख पाने में असमर्थ रहती हैं।

उधर पत्रिका पाखी के फरवरी 2012 के स्त्री लेखन विशेषांक  में ‘‘हिन्दी की समकालीन कवयित्रियों  में  शीर्ष  पर विराजमान ’’ कवयित्री अनामिका की कविता प्रकाशित हुई है, ब्रेस्ट कैंसर। वे कहती हैं-

‘दुनिया की सारी स्मृतियों को / दूध पिलाया मैंने, / हाँ, बहा दीं दूध की नदियाँ!, तब जाकर / मेरे इन उन्नत पहाड़ों की / गहरी गुफाओं में  / जाले लगे! कहते हैं महावैद्य / खा रहे हैं मुझको ये जाले / और मौत की चुहिया / मेरे पहाड़ों में / इस तरह छिप कर बैठी है कि यह निकलेगी तभी जब पहाड़ खोदेगा कोई! निकलेगी चुहिया तो देखूँगी मैं भी, सर्जरी की प्लेट में रखे खुदे-फुदे नन्हें पहाड़ों से हँस कर कहूँगी - हलो कहो कैसी रही ? अंततः मैंने तुमसे पा ही ली छुट्टी! दस बरस की उम्र से तुम मेरे पीछे पड़े थे, /  अंग संग मेरे लगे ऐसे, दूभर हुआ सड़क पर चलना ! बुलबुले अच्छा हुआ फूटे! कर दिया मैंने तुम्हें अपने सिस्टम से बाहर! / मेरे ब्लाउज़ में छिपे मेरी तकलीफों के हीरे, हलो / कहो कैसे हो?"

“जैसे निर्मूल आशंका  के सताए / एक कोख के जाए / तोड़ लेते हैं सम्बन्ध / और दूध का रिश्ता पानी हो जाता है! / जाने दो जो होता है सो होता है, मेरे किए जो हो सकता था - मैंने किया, /  दुनिया की सारी स्मृतियों को दूध पिलाया मैने! / , हाँ,  बहा दीं दूध की नदियाँ! / तब जाकर / जाले लगे मेरे इन उन्नत  पहाड़ों की / गहरी गुफाओं में  ! / लगे तो लगे उससे क्या ! / दूधों नहाएँ और पूतों फलें मेरी स्मृतियाँ ”
 

कवयित्री ने यह कविता उत्तमपुरुष (फर्स्ट पर्सन) यानी "मैं’’ इस्तेमाल करते हुए लिखी है, यद्यपि कविता किसी अन्य स्त्री की व्याधि पर लिखी गई है और उन्हीं वनिता टोपो को निवेदित की  है।

ब्रेस्ट कैंसर शीर्षकवाली कविता में ब्रेस्ट के लिए "उन्नत पहाड़ों की गहरी गुफाओं’’ वाला उपमान कितना उपयुक्त है? पहाड़ों और गुफाओं का दूध से तो दूर-दूर तक कोई सम्बन्ध है ही नहीं पर क्या व्याधिग्रस्त अंगों के लिए सौन्दर्य वर्णन के लिए प्रयोग किए जाने वाले उपमानों का प्रयोग उचित प्रतीत हो रहा है? उत्तम पुरुष में लिखी इस कविता में, मेरे उन्नत पहाड़ों की गहरी गुफाओं का प्रयोग स्त्री द्वारा स्वयं अपना नखशिख वर्णन करने के लिए किया गया है। हिन्दी की इस कविता में स्त्री स्वयं अपनी देह के सौन्दर्य का वर्णन करके अपनी देह को स्वयं ही अनावृत्त कर रही है। यहाँ प्रश्न अनावरण का नहीं निरूपण का है।

अश्लीलता निर्वस्त्रता में नहीं होती। सड़क पर पत्थर फोड़ती हुई स्त्री जब बच्चे को सार्वजनिक स्थान पर दूध पिलाती है, कभी-कभी मध्य तथा उच्च आय वर्ग की स्त्री भी बस या ट्रेन में ऐसा करती देखी जा सकती हैं, तब अश्लीलता का अहसास नहीं होता पर जब कोई स्त्री बेध्यानी का अभिनय करती हुई जान-बूझकर सबके सामने पल्ला सरकाती है, और ध्यान से चारों ओर देखती है कि सबने उसे ध्यान से देखा या नहीं तब वह अश्लील हरकत कर रही होती है। लम्पट पुरुष  इस हरकत पर मस्त हो सकते हैं पर ऐसा करते समय वह उन स्त्रियों को भी निर्वस्त्र कर रही होती है जो निर्वस्त्र नहीं होना चाहतीं। ठीक उसी तरह जिस तरह पोस्टर पर बनी नग्न और अपमानित स्त्री की छवि वहाँ से गुज़रने वाली हर स्त्री को नग्न अनुभव कराती है। इसमें पूरी स्त्री जाति के वे सदस्य भी नग्न हो जाते हैं जो नग्न नहीं होना चाहते ।

कवयित्री ‘‘संसार की स्मृतियों को दूध पिलाया’’, ‘‘बहा दीं दूध की नदियाँ’’, पदों का प्रयोग करती हैं। संसार की स्मृतियों का ब्रेस्ट कैंसर नामक व्याधि से क्या लेना देना? `इलनेस एज़ मेटाफ़ोर' नामक पुस्तक में इस विषय पर गहन चिन्तन है। चिकित्सक इस निष्कर्ष पर पहुँच चुके हैं कि इस व्याधि का इंसान के व्यक्तित्व से कोई ताल्लुक नहीं है, न स्वभाव से न स्मृति से । यह व्याधि नवजात शिशुओं तक को हो जाती है। यदि स्मृतियों का कोई अर्थ लगाना भी चाहें तो कह सकते हैं कि स्मृतियों  को वक्षस्थल में सहेजा जा सकता है, पर तब वक्षस्थल का अर्थ मन होता है। यहाँ पर कवयित्री मन नहीं स्तन के बारे में बात कर रही हैं।

इसके बाद का पद है "तब जाकर’’। हम लोग हिन्दी भाषा  में कहते हैं, "हमने कटरा से तेरह किलोमीटर चढ़ाई की तब जाकर वैष्णों  देवी के दर्शन  हुए’’, "पार्वती ने पर्वत पर वर्षों तप किया तब जाकर शिव जैसा पति पाया’’, "सिद्धार्थ ने वर्षों तक साधना की तब जाकर ज्ञान प्राप्त हुआ और वे बुद्ध कहलाए ’’, या "मैं रिज़र्वेशन कराने के लिए `वृद्धों विकलांगों तथा महिलाओं ’ वाली टिकट खिड़की के सामने एक घंटा पंक्ति में खड़ी रही तब जाकर रेल का टिकट मिला’’। स्पष्ट है ' तब जाकर ’ पद का प्रयोग तब किया जाता है जब हम किसी वस्तु या अवस्था को प्राप्त करना चाहें और उसके लिए कठिन प्रयास करें `तब जाकर’ वह वस्तु या अवस्था प्राप्त हो। अनामिका अपनी कविता की प्रारम्भिक पंक्तियों में कहती हैं, "बहा दीं दूध की नदियाँ तब जाकर मेरे उन्नत पहाड़ों की गहरी गुफाओं में जाले लगे" और यही रूपक आरम्भ से अन्त तक चलता रहता है।

वे फैले हुए कैंसर के लिए जाले लगने का रूपक इस्तेमाल करती हैं। क्या वे जाले लगवाना चाहती थीं ? क्या वे जाले लगवाने के लिए प्रयासरत थीं ‘‘मेरे किए जो हो सकता था - मैंने किया,’’ ? दृष्टव्य  है वे किसी छोटी-मोटी बीमारी या दुःख-दर्द की बात नहीं कर रहीं, वे कैंसर की बात कर रहीं हैं, वैसा कैंसर जो इतना फैल चुका हो कि पूरा अंग काटकर शरीर से अलग करना पडे़। व्याधि यथार्थ होती है रूपक नहीं।

वे निर्मूल आशंका पद का प्रयोग करती हैं, जैसे दो भाई निर्मूल आशंका से पुराना सम्बन्ध तोड़ लेते है वैसे ही स्त्री ने अपने स्तनों से सम्बन्ध तोड़ लिया। कैंसर के पूरी तरह फैल जाने के बाद ही ऐसी सर्जरी होती है। डाक्टर किसी भी अंग का रिमूवल तभी करता है जब और कोई उपाय नहीं रहता। ऐसी सर्जरी निर्मूल आशंका से नहीं होती।

प्रसिद्ध कहानीकार मार्क ट्वेन का कथन है कि शब्द के सही प्रयोग (करेक्ट यूज़) और लगभग सही प्रयोग (आलमोस्ट करेक्ट यूज़) के बीच उतना ही बड़ा अन्तर है जितना आसमान में कड़कने वाली बिजली और जुगनू में। उन्नत पहाड़, नन्हें पहाड़, तकलीफों के हीरे, मौत की चुहिया, बुलबुले, शरीर के एक ही अंग के लिये इतने सारे परस्पर विरोधाभासी उपमान? “स्मृतियों को दूध पिलाया,’’ ‘‘तब जाकर जाले लगे’’, ‘‘लगे तो लगे’’ ‘‘दूधों नहाए पूतों फलें मेरी स्मृतियाँ’’ यह सब पदों और शब्दों का सही प्रयोग है या लगभग सही प्रयोग? ’’

कवयित्री को इस व्याधि के ख़तरे का पूरा ज्ञान है परन्तु कवयित्री को मुहावरे इस्तेमाल करने का इतना शौक है कि खोदा पहाड़ निकली चुहिया की तर्ज़ पर वे कैंसर को मौत की चुहिया बताती हैं, जिसे महावैद्य ने बाहर निकाला। वे यह भूल जाती कि महावैद्य ने जिन्हें बाहर निकाला वह चुहिया नहीं थी पूरे पहाड़ ही थे जिनमें जाले लग गये थे। वे यह भी भूल गर्इं कि जिन्हें वे उन्नत पहाड़ बता रही थीं, उन्हें वे सर्जरी की प्लेट में रखे नन्हें पहाड़ कहने लगीं जबकि सामान्य व्यक्ति भी जानता है कि शरीर से बाहर निकाल दिए जाने पर शरीर के अंग कई गुना बड़े दिखाई देते हैं क्योंकि वातावरण के प्रभाव से वे फूल जाते हैं।

मेरा उद्देश्य चीरफाड़ पर लिखी गई कविता की चीरफाड़ करना नहीं है,  मेरा उद्देश्य इस ओर संकेत करना है कि अपने समय की सबसे ख़तरनाक बीमारी पर इतनी निर्दयता, क्रूरता और संवेदनहीनता से खिलवाड़ करती हुई कविता लिखते हुए एक कवयित्री को ज़रा भी संकोच का अनुभव नहीं हुआ ।

अंग्रेज़ी के प्रख्यात कवि कीट्स की टी.बी. के कारण हुई मौत इतनी रोमांटिक मानी गई, कि अनेक लोग जवानी में वैसी मौत पाने की चाहत करने लगे। पच्चीस वर्ष की आयु में वास्तविक जीवन में व्याधि और मौत दर्दनाक होती है। तब टी.बी. असाध्य रोग था। दर्द की असहनीयता के कारण कीट्स अफी़म खाते थे। मरने से कुछ पहले तो उन्होंने अफ़ीम की पूरी बोतल मंगा ली थी और उनके मित्र को भय लगने लगा था कि दर्द से छुटकारा पाने के लिए वे कहीं पूरी बोतल खा कर खुदखुशी न कर लें। कीट्स को अपने जीवन की क्षण भंगुरता का दुःख था, उन्हें अपनी बीमारी से तकलीफ़ थी। उन्होंने अपनी समाधि के पत्थर पर लिखे जाने वाले हर्फ़ खुद ही लिखे थे, "यहाँ सो रहा है वह व्यक्ति, जिसका नाम पानी पर लिखा था’’ (हियर लाइज़ ही हूज़ नेम वाज़ रिट इन वाटर्स)। आज उमड़ने और कल मिट जाने का उन्हें दुःख था। व्याधियाँ यथार्थ होती हैं रूपक नहीं। जवानी में बीमार होकर तपेदिक से मर जाना तमाशबीनों के लिए रूमानी हो सकता बीमार के लिए नहीं। मौत चुहिया नहीं होती ।

हम अनामिका की इस कविता का सहानुभूति पूर्ण पाठ करें और उन्हें इस बात का श्रेय देना भी चाहें तो नहीं दे सकते कि वे यह यह कह रही हैं कि हिंसक दृष्टिवाले पुरुषों से दस वर्ष की बच्ची भी त्रस्त है और स्त्री को अपने वक्षस्थल के कारण अपमानित और जोखिम ग्रस्त (वल्नरेबल) होना पड़ता है, इसलिए बेहतर है कि वह अंग हो ही न परन्तु वे यह नहीं कह रहीं। वे प्रारम्भ से अन्त तक वक्षस्थल का वर्णन सौन्दर्य बोधक उपमानों के साथ करती हैं और अन्त में उल्लास से भर उठती हैं ‘‘बुलबुले अच्छा हुआ फूटे’’, कि अंग काट दिए गए तो अच्छा हुआ। शरीर के अंग का कटना दारूण दुःख होता है। क्या कोई भी स्त्री या पुरुष  अपने शरीर को कटवाना चाह सकता है, और कटवा डालना भी व्याधि से ग्रस्त होकर जिसे पाने के लिए स्त्री ने दूध की नदियाँ बहा दीं, और व्याधि भी ऐसी जो जाले की तरह फैल गई और अंग काटकर ही ठीक हो सकी क्योंकि यदि नहीं काटा जाता तो व्यक्ति की मृत्यु हो हो सकती थी। अन्तिम हृदयहीन पंक्तियाँ हैं  - "लगे तो लगे उससे क्या ! / दूधों नहाएँ और पूतों फलें मेरी स्मृतियाँ ”। मुहावरे इस्तेमाल करने को उतावली कवयित्री यह बताना भूल गईं कि ऐसी कौन सी स्मृतियाँ है जो मन का नहीं स्तन का दूध पीती हैं । अनामिका की कविता रोगी का मनोबल बढ़ाने का केवल नाटक करती है। दरअसल अनामिका भी स्त्री शरीर को पोर्नोग्राफ़र की दृष्टि से ही देखती हैं।
पोर्नोग्राफर शरीर और मन का द्वैत स्थापित करता है। पोर्नोग्राफ़र असामान्य होता है, वह स्त्री को अपने शरीर से नफ़रत करना सिखाता है।
-सूसन ग्रिफ़िन

क्या कोई भी सामान्य बुद्धि वाला स्त्री पुरुष  या बच्ची-बच्चा अपने शरीर को कटवा डालने पर खुश हो सकता है? अनामिका की कविता में स्त्री बहुत खुश है, वह सर्जरी की प्लेट में रखे अपने कटे हुए अंगों से हँसकर बातें कर रही है - हलो कहो कैसी रही? पवन करण का पुरुष  स्त्री को पोर्नोग्राफ़र की दृष्टि से निरूपित कर रहा है और अनामिका की स्त्री पोर्नोग्राफ़र की दृष्टि से निरूपित हो रही है।

सूसन ग्रिफिन का कहना है कि पोर्नोग्राफी सैडिज्म है। 

"एक औरत जब ऐसी सड़क या मुहल्ले में प्रवेश करती है जहाँ स्त्री शरीर की पोर्नोग्राफ़िक छवियाँ प्रर्दशित की गई हों, वह तुरन्त शर्मिन्दा हो जाती है। पोर्नोग्राफिक छवियों की वीथि में प्रवेश करते ही वह स्वयं ही उनमें से एक छवि हो जाती है कि वह उसका शरीर है जो सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए लगाया गया है। यदि वह स्वयं भी पोर्नोग्राफी में रूचि रखती है तो वह पोर्नोग्राफिक स्पेक्युलेशन का विषय बनती है। यदि वह दहशत में आ जाती है और ऐसी छवि के प्रति घृणा से विमुख हो जाती है, तो वह पोर्नोग्राफी की शिकार (विक्टिम) बन जाती है। इस प्रकार बिना अपमानित हुए वह पोर्नोग्राफी से बच नहीं सकती। इस तरह पोर्नोग्राफी सारी महिलाओं के प्रति सेडिज्म का उपकरण बनती है।’’

नाओमी वुल्फ़ भी पोर्नोग्राफी की पत्रिकाओं के सार्वजनिक पोस्टरों में पीटी जाती हुई, खून से सराबोर, हाथ-पाँव बंधी हुई स्त्री की छवियों का उदाहरण देती हैं। अनामिका की स्त्री पोर्नोग्राफी की विक्टिम है।

पवन करण और अनामिका ने व्याधि पर ही कविता नहीं लिखी हैं उन्होंने  स्तन की व्याधि पर कविता लिखी है। स्तन एग्ज़ॉटिक है। क्या वे किसी अन्य अंग के रिमूवल पर ऐसी कविता लिखते? क्या वे एम्प्यूटेशन से काटी गई टाँगों से पूछतीं कहो कैसी हो प्यारी बहनों, अच्छा हुआ कट गर्इं। क्या वे किसी बीमारी से निकाली गई आँखों की पुतलियों से पूछतीं, कैसी हो प्यारी कौड़ियों, अच्छा हुआ निकाल दी गर्इं, बहुत दुखती थीं, चश्मा पहनना पड़ता था। इन दोनों में से एक कवि की कविताएँ कदाचित् बी.ए. के पाठ्यक्रम में चलती हैं, और दूसरी कवयित्री शायद बी. ए. को पढ़ाती हैं।

एक विशेषता यह है कि पवन करण और अनामिका इन दोनों ने नाम लेकर उन स्त्रियों पर कविता लिखी है, जिनको ब्रेस्ट कैंसर हुआ। बिग बॉस नामक सबसे घटिया टी.वी. सीरियल में ब्रिटेन की जेड गुडी आई थीं, जिन्होंने  भारतीय प्रतिभागी शिल्पा शेट्टी को डॉग (कुत्ता) कह कर तमाशा खड़ा किया था। जेड गुडी की भी कैंसर से ही मृत्यु हुई थी। उन्होंने अपनी मौत को टी.वी. पर प्रर्दशित करने के अधिकार बेचे थे। इन दोनों कवियों ने भी शायद इन स्त्रियों से अधिकार खरीदे होंगे। बाजा़र में बेचने के लिए बीमारी और मौत भी बहुत बड़ा तमाशा है।

इन कवियों ने भले ही कैंसर पीड़ित स्त्रियों से अनुमति ले ली होगी पर हजारों लाखों लोग ऐसे हैं जो इस व्याधि से जूझ रहे हैं। व्याधि लाइलाज नहीं, पर इलाज कष्टसाध्य है। इसके कारण का पता नहीं है, इसलिए इसके साथ रहस्यमयता और दहशत जुड़ी हुई है। व्याधि पर ऐसी कविता पढ़ कर हजारों पीड़ितों का मन दहशत से भर जाता है।

सिल्विया प्लाथ नामक एक महान नारीवादी कवयित्री हुई हैं। उन्होंने एक कवि से विवाह किया। उनकी दो संताने हुई। सिल्विया प्लाथ की कविताओं को उनके जीवन काल में ही बड़ी सराहना मिली थी। बत्तीस साल की उम्र में अवसाद ग्रस्त होकर सिल्विया प्लाथ ने ओवन में अपना सिर डालकर आत्महत्या कर ली थी। जब उन पर फिल्म बनाने की पेशकश हुई, सिल्विया प्लाथ  की पुत्री इस पर बहुत व्यथित हुई और उन्होंने अपनी मृत माँ की अस्वाभाविक असामयिक मृत्यु पर फिल्म बनाने को मूँगफली चबाती हुई जनता को एक परिवार की त्रासदी पर गुदगुदाने  का गिरावट भरा प्रयास बताया। सिल्विया प्लाथ की मृत्यु के समय उनकी पुत्री फ्रीडा ह्यूज़ चार वर्ष की थी,बड़ी होकर वे कवयित्री बनीं। फ्रीडा ह्यूज़ की कविता है-

‘‘और अब,
वे एक फिल्म बनाना चाहते हैं,
जिस-तिस के लिए ,
जिसमें इतनी भी क्षमता नहीं,
कि स्वयं कल्पना कर सकें उस शरीर की
जिसका सिर तंदूर में पड़ा हो,
वह शरीर जो अपने बच्चों को अनाथ छोड़ कर जा रहा हो।
वे सोचते हैं, मैं उन्हें अपने माँ के शब्द दे दूँ,
जिन्हें वे अपने बनाए हुए हैवान पुतले के मुँह में ठूँस सकें-
उनकी सिल्विया- आत्मघाती कठपुतली।’’


सिल्विया प्लाथ की बेटी की कविता उन “मानवभक्षी लोगों पर प्रहार करती है जिन्हें जानने की उत्सुकता और लालसा है कि ओवन में पड़े सिरवाला" मानव कैसा लगता है- वे आत्महत्या को चित्रित करने को लालायित हैं। खतरनाक बीमारी को रूपक के रूप में प्रयोग करते हुए अंग-भंग के मरीज़ पर कविता लिखना और नाम लेकर समर्पित करना वैसा ही है।

यह आलेख नग्नता के खिलाफ नहीं है। यह आलेख स्त्री शरीर के पोर्नाग्राफिक निरूपण के खिलाफ है और व्याधि के हृदयहीन क्रूर निरूपण के खिलाफ भी। ऐसी कविताएँ पोर्नोग्राफी के उपभोक्ताओं के लिए लिखी जाती है। ऐसी कविताओं से पोर्नोग्राफी के नए-नए उपभोक्ता भी बनते हैं। यह एक फायदेमंद व्यवसाय है।

पवन करण की कविताओं से मेरा परिचय भले ही पहली बार पिछले ही वर्ष हुआ जब मैंने उनकी पुस्तक ‘‘स्त्री मेरे भीतर’’ पढ़ी, परन्तु पुस्तक में उल्लेख है कि उन्हें अनेक पुरस्कार मिल चुके हैं। ‘‘स्त्री मेरे भीतर" में संग्रहीत पवन करण की एक यही कविता नहीं, अनेक अन्य कविताएँ भी पोर्नोग्राफी की शास्त्रीय रचनाएँ  है जिनमें स्त्री विवश, वस्तूकृत और अपमानित है।

यह समय कुछ ज़रूरी सवाल उठाने का है। स्त्री के शरीर के पोर्नोग्राफिक निरूपण और व्याधि पर अनुत्तरदायित्वपूर्ण अमानवीय और क्रूर कविता के विषय में औचित्य का प्रश्न उठाना मैं ज़रूरी समझती हूँ । अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता क्या केवल कवियों के पास ही है? पाठकों के पास भी तो कोई अधिकार होंगे? मैं पाठकों के अधिकार का प्रयोग करते हुए यह प्रश्न उठा रही हूँ।

शेयर मार्केट में एक फिनॉमिना होता है, इसमें कुछ दलाल मिलकर एक समूह बना लेते हैं जिसको कार्टेल कहते हैं। वे लोग मिलकर किसी भी बेहद घटिया कम्पनी के शेयर खरीदते जाते हैं जिससे उसका मूल्य अस्वाभाविक रूप से बढ़ जाता है। इससे घटिया कम्पनी को लाभ होता है। वे ही लोग मिलकर कम्पनियों के शेयरों के दाम अस्वाभाविक रूप से घटाते-बढ़ाते रहते हैं। कार्टेल बनाना हमारे देश में आर्थिक अपराध माना जाता है। आपको याद होगा कि केतन पारेख आदि दलाल एक बार इसी अपराध में जेल भी गए थे। कार्टेल को इस सब से भले ही लाभ होता हो पर इससे देश की अर्थव्यवस्था  नष्ट हो जाती है।

हिन्दी के कवियों के कार्टेल ने पवन करण पर दाँव खेला है। कार्टेल के लाभ- हानि के बारे में नहीं कह सकती, पर इससे साहित्य की हानि तो हुई ही है। साहित्य में इस अपराध की कोई सज़ा नहीं। यह एक खुला खेल है। इस बाजा़र में स्त्री शरीर सबसे ज्यादा बिकाऊ चीज़ है। पर क्या व्याधियाँ भी इसमें बेची जाएँगीं ? मेरे प्रश्न स्त्री शरीर के बारे में ही नहीं व्याधि के बारे में भी हैं। ये व्याधि पर लिखी कविताएँ हैं या ये व्याधि ग्रस्त कविताएँ हैं, उन कवियों द्वारा लिखी हुई हृदयहीन कविताएँ जिन्हें कविताएँ लिखते चले जाने की व्याधि है ?

हिन्दी साहित्य में स्त्री की इस दशा का ज़िम्मेदार कौन है?
इस  प्रश्न के उत्तर में हमारे कवियों का कार्टेल मौन है।
(कवि धूमिल की कविता पर आधारित)


व्याधियाँ यथार्थ होती हैं रूपक नहीं। बीमारी की गम्भीरता, बीमारी के साथ जुड़ी तकलीफ़, असहनीय दर्द, दुर्बलता, जीर्ण होते हुए शरीर, बिस्तर पर पड़े रहने की मजबूरी, अंगों के कट जाने, शरीर के विरूपित हो जाने और अपने परिवारजनों और हमदर्दो की आँखों से बरसती सहानुभूति और उनके चेहरों पर लिखे ख़ौफ से आँकी जाती है। बीमारी को इतनी बेदर्दी बेरहमी और गै़रजिम्मेदारी से निरूपित करने वाले हिन्दी के शीर्षस्थ माने जाने वाले ये कवि कवयित्री नृशंसता की हद तक संवेदनहीन हैं।

अंग्रेज़ी में वश्यावृत्ति करवाने को फ़्लेश ट्रेड कहते हैं जिसमें स्त्री एक व्यक्ति न हो कर गोश्त होती है केवल गोश्त। पवन करण और अनामिका दोनों स्त्री शरीर के लिए ऐसे उपमानों और रूपक का प्रयोग करते है कि वे स्त्री को व्यक्ति की जगह फ़्लेश बना देते है। अनामिका की कविता शरीर के प्रति अनसेल्फ़कांशस बनानेवाली कविता नहीं है यह शरीर के प्रति अतिरिक्त सजगता मिटानेवाली कविता भी नहीं है। अनामिका की कविता की स्त्री भी स्वयं को  गोश्त का टुकड़ा ही समझती है अन्तर यह है कि पवन करण की कविता की ‘‘वह विवश जानती है / उसकी देह से उस एक के हट जाने से / कितना कुछ हट गया उनके बीच से।’’ और अनामिका की कविता की स्त्री ‘‘सर्जरी की प्लेट में रखे खुदे फुदे नन्हें पहाड़ों से हँस कर कहती है...अंततः मैंने तुमसे पा ही ली छुट्टी! ’’ गोश्त का टुकड़ा हट जाने से वह उल्लास से भर जाती है। उल्लास का अन्दाज़ आप इसी बात से लगा सकते हैं कि अनेक कहावतों और मुहावरों से युक्त इस कविता में बारह विस्मयादिबोधक चिह्न हैं।

आज से सौ वर्ष पहले जन्मे लेखक मंटो ने एक कहानी लिखी थी ‘ठंडा गोश्त’। चर्चित होने की लालसा से प्रेरित हो कर पोर्नोग्राफिक माइंड से लिखनेवाले अनेक अन्य रचनाकार अपने घटियापन को न्यायसंगत ठहराने के लिए आजकल यह कहते पाए जाते हैं कि अश्लीलता का आरोप तो मंटो पर भी लगाया गया था। ऐसे लोगों को यह अहसास ही नहीं, कि मंटो की उस मार्मिक कहानी का ध्वन्यार्थ था कि मानव शरीर को गोश्त समझकर व्यवहार करनेवाला व्यक्ति निर्वीर्य हो जाता है। उस कहानी में यह ध्वनि इतनी प्रखर थी कि पाठक उस ध्वनि को आज भी नहीं भूले। (स्तन तथा ब्रेस्ट कैंसर इन दोनों गृहणीय कविताओं के साथ मंटो की उस हृदय स्पर्शी रचना का उल्लेख मात्र करने का भी मुझे खेद है।) मैं यहाँ यह भी स्पष्ट कर दूँ कि यह टिप्पणी स्तन और ब्रेस्ट कैंसर इन दो कविताओं पर है, इन कवियों के सम्पूर्ण व्यक्तित्व तथा कृतित्व पर नहीं।

बचपन में अध्यापिकाएँ हमसे कहती थीं- गाय पर निबन्ध लिखो। बच्चे लिखते थे- गाय के दो सींग होते हैं, चार टाँगें होती है, एक पूँछ होती है, चार थन होते हैं। गाय हमें दूध देती है। गाय हमारी माता है। कुछ बडे़ हो गए तो हमने एक चुटकुला सुना। अध्यापिका ने बच्चों से गाय पर निबन्ध लिखने को कहा। सब बच्चे लिखने लगे। दो बच्चे कक्षा से बाहर चले गए। थोड़ी देर में वे कक्षा में लौटे। उनके साथ एक गाय थी । वे गाय के शरीर के ऊपर कलम और स्याही से निबन्ध लिखकर गाय को कक्षा में हाँक लाये थे। अध्यापक के पूछने पर उन्होंने ढिठाई से कहा आप ही ने तो कहा था कि गाय पर निबन्ध लिखो। चुटकुला सुनकर हम हँस पड़ते थे।

आज कहा जा रहा है, स्त्री को चर्चा से केन्द्र में लाओ। स्त्री पर कुछ लिखो। स्त्री के शरीर पर लिखी कविताएँ हैं  -  "स्त्री के दो स्तन होते हैं /  वे पर्वत के समान होते हैं / वे दशहरी आम के समान होते हैं/ उनमें से दूध की नदियाँ बहती हैं / उनसे पुरुष  खेल सकता है / यदि उनमें से एक कट जाए तो पुरुष  के हाथ मायूस हो जाते हैं /  यदि दोनों ही कट जाएँ तो स्त्री उल्लास से भर जाती है / " आदि।

पवन करण और अनामिका ने व्याधि से ग्रस्त , दर्द से दुखते हुए, मृत्यु के भय से आक्रान्त, शल्य चिकित्सा के कारण विरूपीकृत स्त्री के शरीर पर नश्तर से कविताएँ उकेर दीं और स्त्री के रक्त स्नात अनावृत शरीर को हम सब के बीच ला खड़ा किया मगर इस बार इन दोनों कवियों के इस क्रूर, हिंसक, बर्बर और निहायत ग़लीज़ मजाक़ पर हँस पाना भी हमारे लिए मुमकिन नहीं।

दबेगी कब तलक आवाजे आदम हम भी देखेंगे.

Posted by चन्द्रिका on 6/15/2012 09:01:00 PM

लेखक-पत्रकार सीमा आजाद जेल में हैं और हम उनकी आवाज से रू ब रू हैं. ये उन दिनों के गाए गीत हैं, जब सीमा इलाहाबाद में छात्र राजनीति में सक्रिय थीं. शहर की किसी छत पर दोस्तों के बीच गाए गए इन गीतों के जरिए नाइंसाफियों के खिलाफ और जनता के संघर्षों के पक्ष में बोलती हुई सीमा. इस दौर में जब सीमा और उनके साथी विश्व विजय को बेइंसाफियों की मुहाफिज इस व्यवस्था की एक अदालत ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई है, इस आवाज को एक युद्धबंदी की आवाज की तरह नहीं, जनता से जबरन अलग कर दिए गए एक योद्धा की तरह सुना जाना चाहिए. और सुधीर ढवले, कबीर कला मंच के साथियो, जीतन मरांडी और उत्पल समेत उन सारे संघर्षरत कलाकारों-लेखकों-पत्रकारों के पक्ष में एकजुट हुआ जाना चाहिए, जिनको चुप कराने में व्यवस्था का शोर और व्यवस्थापरस्त लेखकों-पत्रकारों की चुप्पी लगी हुई है.

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...तो फिर आप लिखते ही क्यों हैं?

Posted by चन्द्रिका on 6/06/2012 05:39:00 PM

एदुआर्दो गालेआनो का यह लेख सीमा आजाद और विश्व विजय को आजीवन कारावास, कबीर कला मंच पर राजकीय दमन, सुधीर ढवले, अभिज्ञान सरकार, जीतन मरांडी और उत्पल की गिरफ्तारियों और यान मिर्डल को भारत में प्रतिबंधित किए जाने की पृष्ठभूमि में पढ़ें तो शायद इसे ज्यादा अच्छी तरह समझा जा सकेगा. 1940 में उरूग्वे में जन्मे गालेआनो ने शुरूआत प्रगतिशील पत्र-पत्रिकाओं में लिखने से की और इसी वजह से देश में आई सैन्य तानाशाही के दमन का शिकार बनकर देश छोड़ने को मज़बूर होना पड़ा. 1971 में आई “Las Venas Abiertas de América Latina” ( अंगरेजी में Open Veins of Latin America) उनकी अब तक की सबसे चर्चित किताब है. यह आज़ादी के बाद लातिन अमेरिकी देशों में पूंजीवादी शक्तियों जैसे शुरू-शुरू में इंग्लैंड और अन्य यूरोपीय तथा बाद में बेधड़क चले अमेरिकी आर्थिक और कई मौकों पर सीधे-सीधे सैन्य हस्तक्षेप का जीवंत दस्तावेज है. बाद के आई किताबों में " Días y Noches de Amor y Guerra (Days and Nights of Love and War) , “Patas Arriba: La Escuela del Mundo al Revés” (World Upside Down) प्रमुख हैं. अपने लेखन और सक्रिय भागीदारी से इन्होंने सामाजिक बदलाव के संघर्षों अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराई है और आज के दौर के महत्वपूर्ण लातिन अमेरिकी लेखकों में शुमार किये जाते हैं. उनके लेख का सीधे स्पेनी भाषा से हिंदी अनुवाद पी.कुमार मंगलम ने किया है जो जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में लातिन अमेरीकी साहित्य के शोध छात्र हैं.

जब भी कोई लिखता है तो वह औरों के साथ कुछ बांटने की जरूरत ही पूरी कर रहा होता है. यह लिखना अत्याचार के खिलाफ़ और अन्याय पर जीत के सुखद अहसास को साझा करने के लिए ही होता है. यह अपने और दूसरों के अकेले पड़ जाने के अहसास को खत्म करने के लिए होता है. यह माना जाता है कि साहित्य ज्ञान और समझ को फैलाने का जरिया है और यह पढ़ने वालों की भाषा और आचरण पर असर डालता है. लेकिन ‘बाकी लोगों’ और ‘दूसरों’ जैसे शब्द बड़े ही भ्रामक हैं, खासकर संकट के समय जब सही और गलत की पहचान जरूरी हो जाती है तब तो ऐसे भ्रामक शब्द झूठे भी हो सकते हैं. दरअसल, लिखा उन्ही के लिए जाता है जिनके नसीब या बदनसीबी के साथ जुड़ाव महसूस किया जाता है. ये वो लोग हैं जो न ढंग का खा सकते हैं न सो सकते हैं, वे इस दुनिया के सबसे दबे-कुचले, अपमानित और इसलिए सबसे भयंकर विद्रोही लोग हैं.

इनमें से ज्यादातर पढ़ना नहीं जानते हैं. थोड़े से पढ़े-लिखे लोगों में से कितनों के पास इतना पैसा है कि वो किताबें खरीद सके? तब कोई भी क्या सिर्फ़ यह कह कर कि वो ‘आम लोगों’ (जो अभी के दौर में एक भ्रामक लेकिन बहुत प्रचलित रहने वाला शब्द है) के लिए लिख रहा है, इस भयंकर सच्चाई से मुंह मोड़ सकता है ?

हम किसी चांद पर नहीं रहते और न ही हमारी दुनिया इस दुनिया से बाहर की कोई जगह है. ये शायद हमारी खुशनसीबी और बदनसीबी दोनों ही है कि हम दुनिया के सबसे ज्यादा उथल-पुथल से भरे क्षेत्र लातिन अमेरिका में रह रहे हैं और वो भी इतिहास के सबसे कठिन दौर में. वर्गों में बांट दिये गये समाज की विसंगतियां धनी और औद्योगिक देशों के मुकबले यहां कहीं ज्यादा तीखी हैं. यह पूरी व्यवस्था ही ऐसी है जहां आबादी का सिर्फ़ छह फीसदी हिस्सा पूरी दुनिया की कमाई का आधा हिस्सा यों ही गटक जाता है. इस हिस्से की अमीरी की कीमत बाकी दुनिया भयानक गरीबी में जीकर चुकाती है. चन्द अमीरों और बाकी सारे गरीब बना दिये गये लोगों के बीच की खाई लातिन अमेरिकी देशों में लगातार बढ़ ही रही है और इसे बनाने और बरकरार रखने के सबसे बर्बर उपाय भी यहीं अपनाये जा रहे हैं.

खेती और खनिज पर आधारित समाज की तमाम बुराइयों और समस्याओं को दूर किये बिना ही यहां बहुत ही सीमित क्षमता वाले और हमेंशा विदेशी सहायता पर निर्भर उद्योग खड़े कर दिये गये हैं जिससे ये समस्याएं कम होने के बजाए बढ़ी ही हैं. जनता को अपने वादों से लुभाने और भरमाने में कुशल पारंपरिक नेता भी इस कड़वी सच्चाई को नहीं छिपा पा रहे हैं. जनता के नाम पर कुछ भी करने की दुहाई देने वाला पुराना राजनीतिक खेल भी लगातार बढ़ रही सामाजिक असमानता को ढकने-छुपाने के बजाए उसे बढ़ाए ही दे रहा है. हमारी सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था में प्रभुता संपन्न वर्ग और देश अपनी धमक शोषण और ताकत से ही कायम रखते हैं वरना लगातार एक यातना शिविर की तरह लगने वाली यह सामाजिक व्यवस्था कैसे टिकी रह सकती थी ? व्यवस्था के शिकार बने अनगिनत ‘बेकार’ और सम्भावित विद्रोही (और इसलिए खतरनाक) लोगों को काबू में रखने का और उपाय भी क्या है सत्ता के पास? वैसे भी हर जगह कटीले बाड़ लगाना सम्भव नहीं रह गया है. बेरोजगारी, गरीबी और इससे पैदा हो रहे सामाजिक और राजनीतिक तनावों वाले दौर में ‘सभ्य जीवन जीने’ और ‘अच्छा व्यवहार’ करने की खुशफ़हमी भी खत्म होती जा रही है. आज की व्यवस्था का असली चेहरा अपने क्रूरतम रूप में दुनिया के गरीब और पिछ्ड़े बना दिये गये इलाको में ही दिखता है.

लातिन अमेरिका के ज्यादातर देशो में काम कर रही तानाशाहियां (यहां तानाशाही से मतलब सैन्य सरकारों के साथ-साथ जनतन्त्र और चुनाव का नारा देकर जनता को लूटने-ठगने वाली सरकारों से भी है-अनुवादक) जनता का शोषण बड़ी ही सफ़ाई और पेशेवर चालाकी से करती हैं. संकट के इस दौर में बड़े पुंजीपतियों के लिए व्यापार की छूट असल में बाकी गरीब जनता के लिए जेल की राह है.

लातिन अमेरिकी देशों के वैज्ञानिक दूसरे देशों में काम कर रहे हैं, यहां की प्रयोगशालाओं और विश्वविद्यालयों के पास पैसा नहीं है और तकनीकी ज्ञान हमेंशा ही बाहर से महंगे दामों पर लिया जाता रहा है. इस सबके बीच डर और आतंक पैदा करने के सभी उपायों में महारत हासिल कर ली गयी है. आज का लातिन अमेरिका दुनिया भर में सजा देने, लोगों और विचारों की हत्या करने, उन्हें खामोश, डरपोक और कायर बना देने की नित नई तकनीकों का गुरु बन बैठा है. ( यह बात 70-80 के दशक की है जब लातिन अमेरिका के ज्यादातर देशों में सैन्य तानाशाहियां थी. वैसे भारत के सन्दर्भ में, जहां 60 से भी अधिक सालों से ’लोकतन्त्र’ और ’चुनाव’ कायम रखने की सारी कवायदों के बीच आफ़्स्पा (AFSPA), उआपा (UAPA) और ‘ग्रीन हंट’ के सरकारी खौफ का दायरा बढता ही जा रहा है, यह बात बहुत मौजूं है- अनुवादक)

सवाल यह है कि हम जैसे लोग जो बेआवाज़ लोगों की आवाज बनना चाहते हैं वे इस भयानक माहौल में कैसे काम करें? जब डंडे और बाजार के जोर से सबको गूंगा-बहरा बनाया जा रहा है तब क्या हम अपनी बात सुना सकते हैं? आज के हमारे लोकतन्त्र दरअसल चुप्पी और डर पैदा करने वाले लोकतन्त्र हैं. ऐसे में लेखकों के लिए जो भी थोड़ी सी जगह बची है क्या वह इनके व्यवस्था के आगे समर्पण और इसलिए इनकी हार का सबूत नहीं है? हमारी लेखकीय आज़ादी की सीमा क्या है और हम इससे किन लोगों को फायदा पहुंचा रहें हैं?

न्याय और आज़ादी के लिए और भूख तथा खुले और प्रत्यक्ष-परोक्ष दमन करने वाली व्यवस्था के खिलाफ़ बात करना और लिखना है तो बहुत अच्छा लेकिन सत्ता हमें यह छूट किस हद तक और कब तक देती है? ऐसे और भी कई सवाल हैं.

व्यवस्था के लिए सवाल खड़े करने वाले समाचारपत्रों और पत्रिकाओं पर पाबन्दी, लेखकों और पत्रकारों को देश-निकाला, जेल और मौत दिये जाने में सीधे-सीधे दिखने वाले दमन की बात तो बहुत होती है. लेकिन दमन के और भी कई रास्ते हैं जो परोक्ष होने की वजह से ज्यादा घातक साबित होते हैं. वैसे तो इनकी बात बहुत कम की जाती है लेकिन हकीकत में लातिन अमेरिका के ज्यादातर देशों में हावी बर्बर और गैरबराबरी बढ़ाने वाली व्यवस्था की यही पहचान बन चुकी है. तो यह न दिखने वाला दमन काम कैसे करता है? दरअसल, ऐसी स्थिति ही नहीं आने दी जाती है कि कोई व्यवस्था के अन्याय को जाने और उसका विरोध करे. मिसाल के लिए, अगर लातिन अमेरिका की आबादी का सिर्फ़ पांच फ़ीसदी हिस्सा ही फ़्रिज़ खरीद सकता है. ऐसे में, किताबें खरीदने, उन्हें पढ़ने, उनकी जरूरत महसूस करने और उनसे प्रभावित हो सकने वाले लोग कितने होंगे?

लातिन अमेरिकी लेखक एक संस्कृति उद्योग के दिहाड़ी मजदूर हैं जो भद्र अभिजात वर्ग की उपभोक्तावादी जरूरतों को पूरा करते हैं, वे खुद इसी तबके से आते हैं और इसी के लिए लिखते हैं. यही लेखकों की नियति है कि उनका लिखना ले-देकर सामाजिक गैरबराबरी कायम रखने वाली विचारधारा द्वारा तय सीमा के भीतर ही होता है. साथ ही, हम जैसे लेखक जो इन हदों को तोड़ना चाहते हैं उनका भी यही हाल है.

हम जैसे समाज में रह रहे हैं वहां आबादी के बड़े हिस्से की रचनात्मक क्षमताओं और संभवनाओं को लगातार खत्म किया जा रहा है. कुछ नया रचने-गढ़ने का काम जो जीने के दर्द को साझा करने और मौत से लड़ने के लिए जरूरी है अब चन्द पेशेवर ‘विशेषज्ञों’ या ‘बुद्धिजीवियों’ के भरोसे छोड़ दिया गया है. हम जैसे कितने ऐसे ‘ बुद्धिजीवी’ लातिन अमेरिका में हैं? हम लिखते किनके लिए हैं और किनकी बात करते हैं? हमारा लिखा किन लोगों की आवाज़ बननी चाहिए? तालियों की गड़गड़ाहट और पुरस्कारों के सपने से आगे बढ़कर हमें ये सवाल खुद से पूछने होंगे. क्योंकि कभी-कभी हमारी तारीफ सबसे ज्यादा वही करते हैं जिन्हे हमारे लिखने से कोई खतरा नहीं महसूस होता.

दरअसल, लिखना कुछ-कुछ मौत से लड़ने जैसा है. यह लड़ाई है हमारे अंदर और बाहर फैली मुर्दा उदासी और बेरुखी के खिलाफ. लेकिन यह आने वाली पीढ़ियों के काम तभी आ सकता है जब यह अपनी पहचान के लिए संघर्षरत समुदाय की जरूरतों से खुद को जोड़ लेता है.

मेरी समझ में एक लेखक का मौत की तरह तारी होती उदासी से खुद को बचाना और अपने लिखे की ताकत पहचानना ही बाकियों को उनकी पहचान देता है. इस तरह, इन्सानियत की इस लड़ाई में कला और साहित्य हथियार लेकर चलने वाले अगुआ पंक्ति के सिपाही की तरह है, किसी राजा के आरामगाह की चीज नहीं. लेकिन, लातिन अमेरिका की एक बड़ी आबादी कला और संस्कृति पर अपनी हिस्सेदारी से वंचित रखी गयी है. हथियार के बल पर थोपी गयी बाहरी संस्कृति के हाथों अपनी पहचान हारने और अपने पसीने, खून और सपने की कीमत पर पूंजी और मुनाफ़ा बनाती-बांटती व्यवस्था को ज़िंदा रखने वाले ऐसे ही लोगों के लिए ‘मास कल्चर’ का झुनझुना तैयार किया गया है. यह और कुछ नहीं बल्कि ‘मास’ के लिए ‘कल्चर’ के नाम पर लोगों के बोलने, विचारने, कुछ कहने और करने की भावनाओं को नियंत्रित करना ही है. जनता के लिए पेश यह ‘मास कल्चर’ सच देख सकने की हमारी क्षमता को ही कुंद करता है और बदले में हमें कुछ करने, बनाने और नया रचने का झूठा अहसास भर देता है.

यह जाहिर है कि यह लुभावना ‘मास कल्चर’ हमें अपनी अस्मिता को पाने की दशा में आगे नहीं बढ़ाता, उल्टे अलग-अलग तरीके से हमें एक खास ढंग से जीने को बाध्य करता और खरीददार बनाता यह ‘मास कल्चर’ हमें इस लड़ाई से ही अनजान और उदासीन बना देता है. शासक वर्ग द्वारा विकसित देशों से सीधे-सीधे आयातित और ‘वैश्वीकरण’ और ‘विश्व-सभ्यता’ करार दिये गये बेचने-खरीदने और मुनाफ़ा कमाने की संस्कृति को ‘राष्ट्रीय संस्कृति’ का नाम दे दिया गया है. हमारे दौर की यह तथाकथित ‘विश्व सभ्यता’ बाजार और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की खुली छूट और टी.वी. तथा अन्य संचार माध्यमों के फैलते जाल से चुनिंदा विकसित देशों के हित साधने वाली वैश्विक अर्थव्यवस्था के शिकंजे का पूरी दुनिया पर कसते जाने का ही दूसरा नाम है. यही चुनिंदा और दुनिया के मालिक बने बैठे देश लातिन अमेरिका को मशीनें, पेटेंट, और साथ ही इस पूरी व्यवस्था को चलाने के लिए कुछ मंत्र भी बेचते हैं जिसे वो ‘विचारधारा’ का नाम देते हैं.

अगर लातिन अमेरिका की हालत यह है कि सिर्फ़ कुछ ही लोग सुख-सुविधाओं के पहाड़ पर बैठे हैं तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि बाकी सारे लोग नीचे रहकर उन्हें देखें और किसी दिन ऊपर पहुंच जाने का सपना देखते रहें. यहां गरीबों को अमीरी, गुलामों को आज़ादी, हारे हुओं को जीतने और जिनकी हड्डियां तक चूस ली गई हैं उन्हें दुनिया पर राज करने के सपने बेचे जाते हैं. गैरबराबरी पैदा करने वाली व्यवस्था को बनाये रखने की जरूरत का अहसास टी.वी, रेडियो और फिल्में कराती हैं जो दिन-रात सबके समझ में आ सकने वाले अंदाज में व्यवस्था का संदेश फैलाती रहती हैं. हर एक मिनट में बीमारी और भूख से एक बच्चे की हत्या करने वाली यह व्यवस्था हमें अपने हिसाब से ढाल लेने और इस अन्याय का हिस्सा बनाने के सभी उपाय करती है. हमें यह सिखाया जाता है कि दुनिया हमेंशा से ऐसी ही रही है और सबकुछ ठीक चल रहा है. शासन करने वाला दल ही देश हो जाता है और विरोध की आवाज़ उठाने वालों को बड़ी ही आसानी से गद्दार या विदेशी जासूस करार दिया जाता है. ‘जंगल के कानून’ को ‘कानून का राज’ घोषित कर दिया जाता है ताकि लोग सबकुछ किस्मत का खेल मानकर चुपचाप बैठे और सहते रहें. सरकारी खिदमत करता तोड़ा-मरोड़ा हुआ इतिहास हमें यह नहीं बताता कि लातिन अमेरिका के पिछड़ेपन की असली वजहें क्या हैं जिसकी गरीबी ने हमेंशा दूसरे देशों की तिजोरी भरने का ही काम किया है. रोज जब टी.वी और सिनेमा के पर्दे पर हारने वाले ‘कमजोर’ और हराने वाले ‘मजबूत’ बताये जाते हैं तब यह इतिहास में दर्ज कुछ देशों द्वारा दूसरे देशों को खोखला कर कमजोर बना देने के अनेकों ‘बहादुर’ और ‘मजबूत’ कारनामों को जायज़ ठहराने के लिए ही होता है. पैसे की बर्बादी, भद्दा प्रदर्शन और अच्छे-बुरे का खयाल न करते हुए सिर्फ़ अपना मतलब निकालना अब कोई बुरी बात नहीं बल्कि ‘कामयाब’ इन्सान की पहचान मानी जाती है. यहां सबकुछ खरीदा, बेचा, किराये पर लिया और खाया-पचाया जा सकता है. यहां तक की आत्मा भी. आजकल सिगरेट, गाड़ी, शराब की बोतल या घड़ी इन्सान को कुछ और होने तथा किसी और दुनिया में ही होने का जादुई अहसास देती हैं. इनके पास होने से ही इंसान को इंसान तथा जिंदगी को सुखी और सफल माना जाता है. विदेशी नायकों की भरमार धनी देशों से आए ब्रांडो और फैशन के लिए हमारी सनक का ही नतीजा है. टी.वी.और सिनेमा के पर्दे देशों की सामाजिक समस्याओं और जमीनी राजनितिक हालातों से कोसों दूर बनावटीपन और अश्लीलता की एक अलग ही दुनिया रचते हैं. पश्चिमी देशों से लाए गए टी.वी. कार्यक्रम यूरोप और अमेरिका छाप लोकतंत्र का पाठ पढाते हैं और वो भी बंदूक और फास्ट फूड की जय-जयकार के साथ.

लातिन अमेरिकी देशों की आबादी का बड़ा हिस्सा काम की तलाश में भटक रहे नौजवानों का है जिनके गुस्से के किसी दिन फूट पड़ने का डर सरकार चला रहे लोगों की नींद उड़ाए हुए है. यहीं से इस संभावित आक्रोश को कुंद करने की सारी साजिशें शुरू हो जाती हैं. नशे की लत लगाकर युवाओं को उनके समाज से ही काट देना और कुछ कर गुजरने की इच्छा शक्ति खत्म कर देना लगातार किए जा रहे ऐसे कई उपायो में से एक है. इसलिए बेतहाशा बढ़ रही आबादी रोकने की बजाए यहां लोगों के सोचने-समझने की क्षमता ज्यादा कारगर तरीके से नियंत्रित की जाती है. इसके लिए व्यवस्था का सबसे पसंदीदा तरीका है ऐसा माहौल बना देना जहां कोइ कुछ सोच ही न सके. ध्यान से देखें तो लातिन अमेरिकी देशों की नई पीढी जिस तथाकथित ‘प्रतिरोध की संस्कृति’ को अपना रही है वो भी जाने-अनजाने व्यवस्था का ही मतलब साधती है.  

पुरानी, बदलाव की घोर विरोधी और पुलिसिया दमन पर टिकी सरकारों वाले देशों में नई पीढ़ी का व्यवस्था में कोई दखल ही नहीं है. यही वो देश हैं जहां सिर्फ़ पैसे को पूजने वाली और रुढ़ियों का दिखावटी विरोध करने वाली बाहरी सोच ने खुद को ‘प्रतिरोध की संस्कृति’ घोषित कर रखा है.
 
सत्तर के दशक में यूरोप और अमेरिका की ठहरी और पुरानी पड़ चुकी व्यवस्थाओं के खिलाफ हुए युवा संघर्षों के नारे, उनके प्रतीक, उनका मिज़ाज और सपने अब बाजार के कब्जे में हैं. नया संसार उभारने वाली छवियां अब ‘आज़ादी’ के नारे के साथ बेची और खरीदी जाती हैं. इसी तरह, उनका संगीत, उनके पोस्टर, बाल बनाने और कपड़े पहनने का उनका खास अंदाज अब नशे की लत में सपने ढूंढ़ने वाली पीढ़ी और ‘तीसरी दुनिया’ में ऐसे ही सामानों के फैल रहे कारोबार के काम आ रहे हैं. भयंकर गरीबी और बेकारी में जीने के रोज़ाना अपमान से जुझ रहे यहां के नौजवानों को ऐसे सीधे-सादे रंग,प्रतीक और नारे दूर कहीं एक अच्छी दुनिया होने की आस देते हैं. नौजवानों को इतिहास के सभी सबक भुलाकर ऐसी लुभावनी दुनिया का सपना देनेवाली ‘प्रतिरोध की संस्कृति’ का न्योता दिया जाता है. यह ‘प्रतिरोध की संस्कृति’ दरअसल नशे की संस्कृति है जिसका हिस्सा बनकर लातिन अमेरिका का नौजवान धनी देशों के युवकों की तरह जीने की अपनी हसरत ही पूरी करता है. उद्योग प्रधान समाज के द्वारा राजनितिक-आर्थिक सच्चाइयों से पूरी तरह काट दिये गये तबके की दबी-छुपी बेचैनियों से जन्मी इस भ्रामक ‘प्रतिरोध की संस्कृति’ का हमारी अस्मिता और अधिकारों की लड़ाई से कोई लेना-देना नहीं है. यह तो अधिक-से-अधिक लोगों को कुछ कर दिखाने का भ्रम ही देती है. साथ ही, इस बात के लिए भी तैयार करती है कि ये दुनिया तो ऐसी ही चल रही है और सबकुछ यूं ही चलता रहेगा, कि हर आदमी अपना मालिक खुद है. यह सभी सामाजिक बंधनों और जिम्मेदारियों को नकार कर हमें आस-पास की सच्चाइयों से दूर कर देती है और होता यह है कि सबकुछ यूं ही चलता रहता है और हम अपनी ही रची इस नकली दुनिया के खयालों में खोए रह जाते हैं जो हमें बिना लड़े और तकलीफ झेले सबकुछ पाने की खुशफ़हमी से बांधे रखता है. सबसे अहम बात यह है कि इस नकली ‘प्रतिरोध की संस्कृति’ ने एक बेहतर और नयी दुनिया गढ़ने की हमारी भावनाओं और उससे निकले प्रतीकों को टी.वी. की कृपा से लगातार फैल रहे ‘सुपर मार्केट’ में खरीदे-बेचे जाने की चीज बना दिया है. और तो और यदि कुछ न करने की और कुछ न होने की हताशा और खीझ फ्रिज और गाड़ियों से नहीं खत्म हो रही हो तो दबे-छुपे लेकिन लगातार चलने वाले नशे के बाजार तो हैं ही जो दिन- रात खुशियां और आशाएं बेचते हैं.

तो लोगों को झकझोरकर जगा देने और उन्हें आस-पास की सच्चाई से रू-ब-रू करने का काम कैसे किया जाए? जब दुनिया इस दौर के कठिन हालातों से रू-ब-रू है तो क्या साहित्य हमारे काम आ सकता है? संस्कृति का जो रूप सरकारें लेकर आती हैं वह तो सत्ता में बैठे चंद लोगों के लिए ही है. यह सरकारी संस्कृति बर्बर व्यवस्था को ‘विकास’ और ‘मानवता’ का चेहरा देकर लोगों को गुमराह करती और व्यवस्था का गुलाम बना देती है. ऐसे में अपनी कलम से नई दुनिया का राह बनाने वाला लेखक ‘सब ठीक है’ जैसे झूठे दावों पर टिकी व्यवस्था से कैसे लड़े? ऐसे समय में जब हम अपनी अलग-अलग इच्छाओं और सपनों के साथ एक-दूसरे को सिर्फ़ फायदे और नुकसान के नजरिये से देख-समझ और परख पा रहे हैं तब सबको साथ लेकर चलने और दुनिया की तस्वीर बदलने का ख्वाब संजोने वाले साहित्य की क्या भूमिका हो? हमारे आस-पास के हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि लिखना और कुछ नहीं बल्कि एक के बाद दूसरी समस्याओं की बात करना और उनसे भिड़ना हो गया है. तब हमारा लिखना किन लोगों के खिलाफ़ और किनके लिए हो? लातिन अमेरिका में हम जैसे लेखकों की किस्मत और सफ़र बहुत हद तक बड़े सामाजिक बदलावों की जरूरत से सीधे-सीधे जुड़ा है. लिखना इस बदलाव के लिए लड़ना ही है क्योंकि यह तो तय है कि जब तक गरीबी, अशिक्षा और टी.वी तथा बाकी संचार माध्यमों के फैलते जाल पर बैठी सत्ता का राज कायम रहेगा तब तक हमारी सबसे जुड़ने और साथ लड़ने की सभी कोशिशें बेकार ही रहने वाली हैं.

जब किसानों-मजदूरों सहित आबादी के बड़े हिस्से की आज़ादी खत्म की जा रही है तब सिर्फ़ लेखकों के लिए कुछ रियायतों या सुविधाओं की बात से मैं सहमत नहीं हूं. व्यवस्था में बड़े बदलावों से ही हमारी आवाज़ एलीट महफ़िलों से निकल कर खुले और छिपे सभी प्रतिबंधों को भेद कर उस जनता तक पहुंचेगी जिसे हमारी जरूरत है और जिसकी लड़ाई का हिस्सा हमें बनना है. अभी के दौर में तो साहित्य को इस गुलाम समाज की आज़ादी की लड़ाई की उम्मीद ही बनना है.
इसी तरह, यह सोचना भी गलत होगा कि जीने के रोज़ के संघर्षों से जुझ रही बदहाल जनता सिर्फ़ साहित्य और कला के माध्यम से अपनी छिनी जा चुकी सृजन-क्षमता को दुबारा पा सकेगी. जीवन की कड़वी सच्चाइयों के मारे कितने ही प्रतिभाशाली लोग कुछ करने से पहले ही समय के अंधेरे में खो जाते है. कितने ही लेखकों और कलाकारों को तो अपने अंदर छिपी नयी दुनिया रचने-गढ़ने की ताकत का अहसास ही नहीं हो पाता.
 
दूसरी तरफ, जिन देशों की सरकारें अपने राजनितिक-आर्थिक अस्तित्व के लिए विदेशी मालिकों पर निर्भर हैं वहां क्या सचमुच जमीनी हालातों से निकली किसी ‘राष्ट्रीय संस्कृति’ की संभावना है? अगर ऐसा नहीं है तो फिर लिखना क्यूं और किसके लिए हो क्योंकि जिस तरह अभी तक का इतिहास अपने पीछे की तमाम सारी राजनितिक-आर्थिक प्रक्रियाओं को समेटे होता है उसी तरह संस्कृति भी जमीनी हालातों की बुनियाद पर ही बनती और बदलती रहती है. अगर हम यह मानते हैं कि सामाजिक विकास के अलग-अलग दौर में बनते-बदलते राजनितिक-आर्थिक हालातों में कुछ नये बंधन आते हैं और कुछ पुराने पड़ चुके बंधन टूटतें हैं ( जैसाकि सामंतवाद से पूंजीवाद के दौर के इंसानी सफ़र में सामाजिक संबंधों के बदलते रुपों में देखने को मिलता है) तब इंसानी अस्मिता दुबारा जीतने का संघर्ष छेड़ने और बढ़ाने की जरूरत का अहसास कराने में साहित्य की क्रांतिकारी भुमिका स्वीकार करनी होगी. सरकार में बैठे लोग हाशिये पर खड़ी जनता को टी.वी. और सरकारी फाइलों द्वारा परोसी जा रही सपनीली और लुभावनी दुनिया का धोखा ही परोसते हैं. ऐसे कभी न पूरे होने वाले सपने के जाल में फंसी और अपने आस-पास की सच्चाइयों से अनजान जनता आखिर बदलाव लाए भी तो कैसे? यह उम्मीद करना तो बेमानी ही होगा कि यह जनता अपने अधिकारों के लिए संघर्ष की जरूरत खुद ही समझ जायेगी. तो क्या ऐसे में लोगों को लड़ने की जरूरते का अहसास –चाहे प्रत्य्क्ष या परोक्ष-  साहित्य नहीं करा सकता? मेरी समझ से यह बहुत कुछ इस बात से भी तय होता है कि लेखक अपने लोगों की पहचान, उनके कामकाज और उनकी किस्मत को बनाने-बदलने वाले हालातों के साथ कितनी गहराई से जुडे हैं. साथ ही, साहित्य की यह भुमिका व्यवस्था द्वारा थोपी गई ‘राष्ट्रीय संस्कृति’ के खिलाफ जनता के संघर्षों और अरमानों को आवाज़ देती सच्ची ‘प्रतिरोध की संस्कृति’ को पहचानने और उभारने की लेखकों की क्षमता पर भी निर्भर है. क्योंकि होता यह है कि ज्यादातर मौकों पर सरकारी संस्कृति के खिलाफ आकार ले रही प्रतिरोध की संस्कृति को अपसंस्कृति बताकर खारिज कर दिया जाता है क्योंकि न तो इसके पास बाजार और टी.वी. की ताकत है और न ही ये सबको सपनीली दुनिया के वादे करती है. इसे अक्सर ‘एलीट’ तबके द्वारा भोगी और व्यवस्था द्वारा थोपी जा रही संस्कृति का ही बिगड़ा रूप बताया जाता है. लेकिन, कभी-कभी आम लोगों की यादों में बसा इतिहास किसी पेशेवर लेखक के उपन्यास से कहीं ज्यादा सच बयान करता है और जिंदगी की असली सुगंध भाषा के सभी ‘नियमों’ पर खरी होने का दावा करने वाली कविताओं से ज्यादा कुछ बेनामी लोकगीतों में आबाद होती है. इसी तरह, दुख-दर्द और उम्मीदों के हजारों रंग समेटे लोगों की आपबीती ‘जनता’ के नाम पर लिखी गई किसी भी किताब से ज्यादा असरदार होती है.

हमारी असली पहचान इतिहास से जन्मती और आकार लेती है जो पत्थर पर पड़े और सुरक्षित हो चुके पैरों के निशान की तरह समय के अलग-अलग पड़ावो से होकर गुजरे हमारे सफ़र का गवाह बना रहा है. लेकिन, इतिहास से यह जुड़ाव पुरानी चीजों और यादों से चिपका रहना नहीं है जो बड़ी आसानी से कट्टरता का भी रूप ले सकता है. इसी तरह, यह भी तय है कि अभी तक दबी हुई पहचान कुछ खास तरह के कपड़ों, रीति-रिवाजों और चीजों से हमारे दिखावटी मोह से भी जाहिर नहीं होती. ये सब तो विकास के दौड़ में हरा और पछाड़ दिये गये देशों के बाजारों में विदेशी पर्यटकों को लुभाने के काम ही आते हैं. हम वही हैं जो हम करते हैं, खासकर हम जो हैं उसे बदलने के लिए जो कुछ करते हैं. हमारी पहचान हमारे इन्ही कामों और हमारे संघर्षों से बनती है. इसलिए पहचान की यह लड़ाई व्यवस्था के उन सभी रूपों से लोहा लेना है जो हमें सिर्फ़ एक आज्ञाकारी कामगार और खरीददार बनाती है. तब लेखक होने का मतलब इस चुनौती और प्रतिरोध की आवाज़ बनना ही है.

अपने दौर के तमाम संकटों और बदलाव की चाह को समेटे तथा सभी तरह के खतरों से भिड़ने वाला साहित्य ही नयी और बेहतर दुनिया की तस्वीर दिखा सकता है और ख्वाब देखने की हिम्म्त और हुनर वाले लेखकों के जरिये वो इस दुनिया को हासिल करने का रास्ता भी दिखा सकता है. जाहिर है, अमेरिकी महाद्विपों में फैले अन्याय और उदासी के माहौल में साहित्य का अपना एक अलग महत्व है.

किसी किताब ने लोगों को किस हद तक प्रभावित किया है यह सिर्फ़ उसके छपने और बिकने की संख्या से तय नहीं होता. कई बार सीधे-सीधे दिखने के साथ-साथ यह असर बहुत व्यापक स्तर पर देखा और समझा जा सकता है. ऐसे मौकों पर इन किताबों में दर्ज बातें अपने समय के सवालों और जरूरतों को आवाज़ दे सकती हैं बशर्ते लिखने वालों ने खुद के अंदर भी इन्ही सवालों और अनिश्चितताओं को महसूस किया हो. साहित्य अपने आस-पास की सच्चाइयों से रू-ब-रू किसी लेखक के अंदर आकार लेता और फिर सबके सामने आता है. इस तरह रचने-गढ़ने का यह काम सबको साथ में लेकर किया जाना है और जरूरी नहीं है कि कोई लेखक अपने जीवनकाल में इस सामूहिक यात्रा का सफर पूरा होते देख ही पाए.

आबादी का बड़ा हिस्सा जब जीने के संघर्षों में लगा है तब कुछ लेखक ‘विशिष्ट’ होने का दावा करते हुए अपने लिए सुविधाओं की मांग कर रहे हैं. कुछ ऐसे भी लेखक हैं जो सरकारी दमन की स्थिति में साहित्य को ही कोसते हुए सत्ता के साथ हो लेते हैं. मैं इन दोनों ही बातों के बिल्कुल खिलाफ हूं. लेखक न तो कोई भगवान होता है और न ही व्यवस्था की मर्जी का गुलाम. यह सही है कि हम आसपास की घटनाओं से प्रेरणा लेकर अपना साहित्य बुनते हैं लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं कि हम अपने को सिर्फ़ यहीं तक सीमित रखें. देखा जाए तो लिखना एक गतिविधि ही है, यह अपने-आप में कोई जादुई चीज नहीं है, लेकिन जब एक लेखक हमें इस दुनिया का असली रंग देखने और बेहतर दुनिया बसाने का हौसला देने वाले लोगों और अनुभवों के साथ ला खड़ा करता है तब उसके लिखे का असर किसी जादू से कम भी नहीं होता. साथ ही, अगर उसका लिखा लोगों को विद्रोही और सत्ता के लिए ‘अपराधी’ बनाने के साथ-साथ उनकी सोच बदलता या उसे नये आयाम देता है तब वह बदलाव की लड़ाई का हिस्सा जरूर बन सकता है. संघर्षों से ऐसे सहज रूप से जुड़े लेखक अभिमान और खुद को अच्छा साबित करते रहने की होड़ में नहीं रहते क्योंकि वे जानते हैं कि उनका सफ़र औरों से अलग और ज्यादा कठिन है.

मेरे ख्याल से सिर्फ़ अपनी सोच और अंतहीन उलझनों को जाहिर करने के लिए शब्दों की बाज़ीगरी करने वालों को लिखना छोड़ देना चाहिए. शब्द तो अपने पूरे अर्थ के साथ अन्याय के ऊपर जिंदगी का जश्न मनाने वालों के लिखे में ही आकार लेते हैं. हमें पास बैठ कर बात करने वाले चाहिए, दूर बैठ तमाशा देखने वाले नहीं. हम बातचीत और मेलजोल बढाने के लिए हैं सिर्फ़ तालियां पाकर, बाकी सबकुछ अपनी जगह छोडकर, खुश होने को मजबूर तमाशा दिखाने वाले नहीं. लिखना लोगों से मिलने की हमारी जरूरतें पूरी करता है, कुछ इस तरह से कि हमें पढ़ने वाले हमसे अपने जज़्बात शब्दों के जरिये साझा करें जिन्हें हम उम्मीदों और सपनों की शक्ल देकर वापस उनतक पहुंचाएं.
 
साहित्य अपने-आप सबकुछ ठीक कर देगा यह मानना खामख्याली ही होगी. लेकिन बदलाव की लड़ाई में साहित्य की भागीदारी को सिरे से खारिज करना भी सरासर बेवकूफी होगी. लिखते समय हम इस व्यवस्था से तय होती हमारी सीमाओं से अच्छी तरह वाकिफ होते हैं. सच कहें तो यही सीमायें समाज की सच्चाइयों को हमारे सामने खोलती भी हैं. हम अपनी इन्हीं सीमाओं के साथ हताशा और निराशा से भरे इस दौर में व्यवस्था से भिड़ते हुए अंततः इन सीमाओं को भी ध्वस्त कर सकते हैं. ऐसे में, पढ़े-लिखे और बदलाव की जरूरत समझने वालों को ‘क्रांति’ का पाठ पढ़ाने वाला साहित्य परिवर्तन-विरोधी और ‘जो है अच्छा है’ दोहराते रहने वाले साहित्य की तरह ही कोई खास मकसद पूरा नहो करता. कुछ लोगों के लिखे में ज्यादा से ज्यादा ‘रैडिकल’ दिखने और ‘सब जला- मिटा देने’ की बातें कभी खत्म नहीं होती. उनका साहित्य एक ऐसे तबके के लिए होता है जो बदलाव के लिए पहले से ही तैयार है. खुद को बढ़-चढ़कर क्रांतिकारी बताने वाले और अपनी ही तरह सोचने- महसूस करने वाले और दिन-रात ऐसे नारों-वादों से घिरे रहने वाले गिनती के कुछ लोगों के लिए लिखने वाले क्या जोखिम उठा रहे हैं? यह तो है कि उनके लिखे की मांग कभी कम नहीं होगी और वे सुर्खियों में बने रहेंगे. लेकिन सिर्फ़ इतने से ही बदलाव की लड़ाई नहीं जीती जा सकती. अगर व्यवस्था द्वारा हमारे सोचने-समझने की आज़ादी पर लगी बंदिशें ही न खत्म कर पाए तो फिर लिखना कैसा? हमारे लिखने की सार्थकता तभी है जब हम अपनी बात बिना डरे, पक्के इरादे के साथ और बेबाकी से रख पाएं और एक बेहतर दुनिया का सपना देकर लोगों को लड़ने का हौसला दे पाएं. हमारी ख्वाहिश वो भाषा गढ़ने की है जो जनसंघर्षों से डरी और पराजित हो रही व्यवस्था की चाकरी करने वाले लेखकों की वाह-वाह और जय-जयकार के उलट कहीं ज्यादा बेखौफ़ और खूबसूरत हो.
 
लेकिन सवाल सिर्फ़ भाषा का ही नहीं है. सवाल यह भी है कि हम अपनी बात रखते कैसे हैं. प्रतिरोध की संस्कृति को अपनी बात रखने के लिए सभी मौजूद तरीके काम में लाने होंगे और संवाद के किसी भी माध्यम या अवसर को छोटा समझने की ‘एलीट’ सोच से बचना होगा. हमारे पास समय कम है, लड़ाई मुश्किल और करने को बहुत कुछ है. सामाजिक बदलाव के लिए लड़ रहे लोगों के लिए लिखना इस लड़ाई के बहुत सारे मोर्चों में से एक है. हम यह नहीं मानते कि साहित्य सिर्फ़ बुर्जुआ वर्ग के घरों मे शेल्फों में सजाकर रखी जाने वाली कोई चीज भर है. अखबारों में छपने वाली खबरें, लेख, विचार और फिल्में तथा रेडियो और टी.वी. के कार्यक्रमों के जरिये अनगिनत लोगों के दिलों को छू लेने वाले संवाद हमेंशा ही सिर्फ़ गरीब और अनपढ़ जनता के समय काटने की चीजें नहीं हैं जैसाकि संवाद के इन सहज अवसरों को ‘तुच्छ’ कहकर खारिज करने वाले साहित्य जगत के मठाधीश समझते आए हैं. लोगों को सुपर मार्केट और हवाई जिंदगी की मदहोशी देकर सच से बेखबर बना देने वाले संचार माध्यमों के फैलते-कसते जाल से लड़ती-भिड़ती अपनी आवाज़ बुलंद करती जनवादी पत्रकारिता एक बेहतर दुनिया का सपना और हौसला देने वाली कितनी ही आवाज़ों के बलिदान की गवाह बनी है. अपनी रचनात्मकता और प्रभाव में यह किसी भी ‘महान’ और ‘बेस्टसेलर’ करार दिये गये उपन्यासों या कहानियों से कम नहीं हैं.

मुझे विश्वास है अपने काम पर और शब्द के अपने हथियार पर. मैं यह कभी नहीं समझ पाया कि भुखमरी और बेकारी के इस दौर में साहित्य की सीमाओं की दुहाई देने वाले लोग फिर लिखते ही क्यों हैं? या फिर यह भी कि क्यों लोग शब्दों का इस्तेमाल सिर्फ़ अपनी भड़ास निकालने या चंद नारों या पार्टी दस्तावेजों के लिए अपनी भक्ति दिखाने के लिए करते हैं? शब्द तो एक हथियार की तरह हैं. यह हम पर निर्भर करता है कि हम चाहें तो इससे व्यवस्था को उलट देने का हौसला दे दें या ‘सबकुछ अच्छा चल रहा है’ मानकर प्रकृति और इश्वर का गुणगान करते रहें.

सच कहूं तो अभी के लातिन अमेरिकी साहित्य के लिए सबसे बड़ा काम बेहतर दुनिया की हमारी साझी समझ के खिलाफ बेधड़क और खुलेआम चल रहे सरकारीकरण और बाजारीकरण से शब्दों को बचाना है. क्योंकि आजकल ‘आज़ादी’ मेरे देश की एक जेल का नाम है और तानाशाह सरकारों ने खुद को ‘लोकतंत्र’ घोषित कर रखा है. अब ‘प्यार’ इंसान का अपनी गाड़ी से लगाव और ‘क्रांति’ बाजार में आए किसी नए ब्रांड के धमाकेदार प्रचार के काम आ रहे हैं. अब हमें खास और महंगे ब्रांड का साबुन रगड़ने पर ‘गर्व’ और फास्ट-फूड खाने पर ‘खुशी’ का अहसास होता है. ‘शांत देश’ दरअसल बेनाम कब्रों की लगातार बढते जाने वाली कतार है औ ‘स्वस्थ’ इंसान वह है जो सबकुछ देखता है और चुप रहता है.

घोषित-अघोषित राज्य दमन और पुलिसिया आतंक के बावजूद हम लिखते हुए अपने समय और लोगों को नई पहचान और आवाज़ दे सकते हैं. आज के दौर में लिखना यह कहना भी है कि हम यहां हैं और यहीं के हैं, हम ऐसे हैं और ऐसे ही रहे हैं.

धीरे-धीरे लातिन अमेरिका में एक नए तरह का साहित्य आकार ले रहा है. ऐसा साहित्य जो लोगों को सबकुछ खत्म हो चुकने की उदासी नहीं बल्कि कुछ नया करने की ताकत दे रहा है. यह मार दिये गये हमारे लोगों को इतिहास में दफ़न नहीं करता बल्कि उन्हें हमारे सामने ला खड़ा करता है, यह सबकुछ भुल जाना नहीं बल्कि इतिहास के पन्नों से बदलाव की हमारी साझा लड़ाई की वजहें और जरूरतें ढूंढ़ना सिखाता है. यही साहित्य लड़ने की हमारी परंपरा और उसकी गवाह रहे अनगिनत लोकगीतों और कहानियों में गूंज रहे शब्दों का सच्चा साथी और पहरूआ है. अगर हम यह मानते हैं कि इतिहास सिर्फ़ यादें खरोंचने से कहीं ज्यादा उम्मीद जगाने की कोई चीज है तो यह उभरता हुआ साहित्य उन तमाम सारे लोगों को हाथ दे सकेगा जो आज नहीं तो कल किसी भी तरह से उलटबांसियों से भरे हमारे इतिहास को बदल देने वाले हैं.

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Posted by चन्द्रिका on 6/01/2012 06:35:00 PM

अपवाद नहीं, नियम हैं साक्षी 
-दिलीप खान
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 पिक्चर फिल्म के
गाने  से पहले से बाज़ार में है और लोकप्रिय है
इधर बीच नज़र दौड़ाए तो पत्रकारों को राज्यसभा भेजने का प्रचलन लगातार बढ़ा है। बीते कुछ सालों में बड़े कॉरपोरेट और पत्रकारों की चहलकदमी राज्यसभा के गलियारों में तेज हुई है। चाहे वो सीएमवाईके प्रिंटेक लिमिटेड के मालिक चंदन मित्रा हो चाहे लोकमत न्यूज़ प्राइवेट लिमिटेड के अध्यक्ष विजय दर्डा। पार्टी और विचारधारा अलग-अलग हो सकती है लेकिन प्रचलन एक है। चंदन मित्रा पायनियर के मालिक हैं, जो अंग्रेज़ी और हिंदी में अख़बार निकालने के अलावा पत्रकारिता का एक संस्थान भी चलाते हैं। विजय दर्डा का लोकमत समूह मराठी में लोकमत, हिंदी में लोकमत समाचार और अंग्रेज़ी में लोकमत टाइम्स निकालने के साथ-साथ टीवी-18 समूह के साथ साझा उपक्रम में आईबीएन-लोकमत नाम से मराठी न्यूज़ चैनल भी चलाता है। व्यवसाय, राजनीति और मुनाफे के शुद्ध मिश्रण के तले नेता मीडिया मंडी में उतर रहे हैं। कांग्रेस के रसूखदार नेता राजीव शुक्ला अपनी पत्नी अनुराधा प्रसाद के साथ ब्रॉडकास्ट इंडिया लिमिटेड के तहत न्यूज़ 24 टीवी चैनल चलाने के साथ-साथ एक स्वतंत्र प्रोडक्शन हाउस भी चलाते हैं। बीएजी फिल्म्स एंड मीडिया लिमिटेड नाम का यह प्रोडक्शन हाउस टीवी धारावाहिक की दुनिया में काफ़ी मशहूर है। इसके अलावा आपनो 24, ई 24 नाम के चैनल और रेडियो धमाल भी राजीव शुक्ला और अनुराधा प्रसाद की ही मिल्कियत है। इंटरनेशनल स्कूल ऑफ मीडिया एंड इंटरटेनमेंट इंस्टीट्यूट के बैनर तले वो मीडिया कर्मियों को प्रशिक्षण भी देते हैं। अतिरिक्त सूचना यह है कि अनुराधा प्रसाद रिश्ते में बीजेपी नेता रविशंकर प्रसाद की बहन है। राजीव शुक्ला टीवी में हाथ आजमाने के साथ ही बेशुमार पैसा वाले धंधा क्रिकेट में भी खासा रुचि रखते हैं। बीसीसीआई में कई महत्वपूर्ण ओहदा संभावलने के अतिरिक्त अभी-अभी संपन्न आईपीएल के वो कमीश्नर (अध्यक्ष) थे। कमीश्नर यानी ललित मोदी वाला पद।  पीवी नरसिंहा राव की सरकार में मंत्री रह चुके हरियाणा के कांग्रेस नेता विनोद शर्मा इनफॉरमेशन टीवी प्राइवेट लिमिटेड नाम की कंपनी के बड़े शेयरधारक हैं। यही कंपनी हमारे बीच इंडिया न्यूज़ नाम का टीवी चैनल और आज समाज नाम का अख़बार लेकर आती है।
राजनेताओं के साथ मीडिया के गठजोड़ की जब भी चर्चा उठती है लोग दक्षिण भारत का नाम ले लेते हैं। यह ज़रूर है कि दक्षिण भारत में यह प्रचलन ज़्यादा वृहद और पुराना है लेकिन कमोबेस यह प्रैक्टिस भारत के हर कोने में समान है। पता नहीं द डर्टी पिक्चर में लिखा गया गाना ऊ ला ला...किससे प्रेरित है, लेकिन इसी नाम का एफ एम चैनल गुवाहाटी में काफ़ी लोकप्रिय है जिसके मालिक कभी कांग्रेस पार्टी की तरफ़ से मंत्री रह चुके, कभी पार्टी ने निष्कासित हो चुके और फिर वापसी कर चुके मतांग सिंह हैं। पॉजिटिव रेडियो प्राइवेट लिमिटेड नाम की उनकी कंपनी रेडियो ऊ लाला चलाती है और पॉजिटिव टेलीविजन प्राइवेट लिमिटेड नामक कंपनी के बैनर तले मतंग सिंह एन.ई. टीवी, फोकस टीवी, एनई बांग्ला, एनई हाई फाई, हमार और एचवाई टीवी चलाते हैं। कांग्रेस पार्टी की तरफ़ से असम में मंत्री पद पर रहने वाले हेमंत बिश्व शर्मा की पत्नी रिंकी भुयन शर्मा प्राइड ईस्ट इंटरटेनमेंट प्राइवेट लिमिटेड की मालकिन हैं और न्यूज़ लाइव तथा रंग नाम का चैनल चलाती हैं। दशरूपा इंजीनियरिंग एंड पब्लिकेशंस प्राइवेट लिमिटेड के मालिक अंजन दत्ता अजीर दैनिक नाम का अख़बार चलाते हैं और लोग उन्हें कांग्रेस विधायक के तौर पर भी जानते हैं। असम में ही जनसाधारण प्रिटिंग्स एंड पब्लिशर्स प्राइवेट लिमिटेड नामक कंपनी जनसाधारण अख़बार निकालती है और इसके मालिक रोकिबुल हुसैन हैं जो राज्य में कई बार मंत्री रह चुके हैं। ऐसा नहीं है कि असम में सिर्फ़ कांग्रेस के ही नेता मीडिया में हाथ आजमा रहे हैं बल्कि असम यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के बदरुद्दीन अजमन की कंपनी यूनिटी मीडिया एंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड गणाधिकार नामक अख़बार निकालती है। अजमल एयूडीएफ के अलावा दारुल उलूम देवबंद से भी संबंधित हैं और असम के बड़े कारोबारी हैं।
इसलिए मेरी नज़र में मीडिया में नेताओं के निवेश को दक्षिण की परिघटना कहने वाले लोग बड़ी भूल कर रहे हैं। पंजाब दक्षिण में नहीं है और न ही असम, हरियाणा भी दक्षिण का राज्य नहीं है और नागालैंड तो कतई नहीं। नागालैंड के मुख्यमंत्री नीफ्यू रियो नागालैंड फ्री प्रेस नामक कंपनी के भी मालिक हैं जोकि ईस्टर्न मिरर नामक अख़बार निकालती है। जगनमोहन रेड्डी के साक्षी को इसलिए नेता-मीडिया गठजोड़ के बड़े मिसाल के तौर जाना जाता है क्योंकि पांच साल के भीतर ही साक्षी देश के शीर्ष 10 दैनिकों में शुमार हो गया। लेकिन वाईएसआर के गुजरने के बाद साक्षी के रुतबे और बैंक खाते पर भी असर पड़ा। और वित्तीय तौर पर पछाड़ खाने के बाद जब दिसंबर 2011 में साक्षी ने अपनी कीमत 2.50 रुपए से बढ़ाकर 3 रुपए किया तो जगनमोहन रेड्डी ने अख़बार में लिखे गए खत में यह बताने की कोशिश की कि असल में यह पूरा मामला पीले ब्रिगेड की साजिश का नतीजा है। पीला तेलुगुदेशम पार्टी का रंग है और पीले ब्रगेड से यहां आशय टीडीपी के साथ-साथ इनाडु और आंध्र ज्योति अख़बार से है। इससे पहले जून 2009 में साक्षी ने अपनी कीमत 2 से बढ़ाकर 2.5 रुपए किया था। अपनी शुरुआत के वक्त साक्षी की क़ीमत 2 रुपए थी और उस समय जगन रेड्डी विरोधी अख़बारों को लेकर लगातार फिकरे कसते रहते थे कि अगर साक्षी से मुकाबला करना है तो क्यों नहीं वे भी अपनी क़ीमत 2 रुपए कर देते हैं। जगन के इस बात से नाराज होकर आंध्र ज्योति के संपादक राधाकृष्णा ने लिखा था, अगर मैं किसी मुख्यमंत्री का बेटा होता और मेरे पास अनअकाउंटेड धन होता तो मैं मुफ्त में अख़बार बांटता।
कलानिधि मारन: देश में सार्वाधिक वेतन प्राप्त व्यक्ति
मीडिया को लेकर यह प्रतिस्पर्धा आंध्र के कोने-कोने में देखी जा सकती है। लेकिन तमिलनाडु में यह स्थापित सत्य की तरह हो गया है कि हर अख़बार और टीवी चैनल का किसी न किसी पार्टी के साथ गठजोड़ है। बड़े नाम से शुरू करें तो एआईडीएमके की मुखिया और तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता मैविस सैटकॉम लिमिटेड कंपनी की मालकिन हैं और उनकी यह कंपनी अलग-अलग ब्रांड नेम से तमिलनाडु में कई टीवी चैनल चलाती है। जया टीवी, जया मैक्स, जया प्लस और जे मूवीज इनमें प्रमुख हैं। लेकिन जयललिता का मीडिया साम्राज्य कलानिधि मारन के सामने बेहद छोटा है। क्या आपको मालूम है कि भारत में सबसे ज़्यादा वेतन पाने वाला व्यक्ति कौन हैं? अगर आपका उत्तर मुकेश अंबानी है तो आप सामान्य बोध के आधार पर ग़लत दिशा में भटक रहे हैं। सही उत्तर है- कलानिधि मारन।  
कलानिधि मारन देश के सबसे बड़े टीवी समूहों में से एक सन टीवी नेटवर्क लिमिटेड के मालिक हैं। कल रेडियो लिमिटेड, साउद एशिया एफएम लिमिटेड और कल पब्लिकेशंस प्राइवेट लिमिटेड भी कलानिधि मारन की ही मिल्कियत हैं। अपनी पत्नी सहित वो इन कंपनियों के 77 फ़ीसदी शेयर पर कब्जा रखते हैं। लगभग दर्जन भर से ज्यादा टीवी चैनल उनके नाम हैं। सन टीवी, सन न्यूज़, केटीवी, सन म्यूजिक, चुट्टी टीवी, सुमंगली केबल, आदित्य टीवी, चिंटू टीवी, किरण टीवी, खुशी टीवी, उदय कॉमेडी, उदय म्यूजिक, जैमिनी टीवी, जैमिनी कॉमेडी और जैमिनी मूवीज जैसे टीवी चैनलों के अलावा सूर्या एफएम और रेड एफएम उनका ही है। रेड एफएम, बजाते रहो! तमिल का बड़ा अख़बार दिनाकरण भी कलानिधि मारन ही निकालते हैं। कलानिधि मारन से अगर संक्षेप में आपका परिचय कराएं तो हम कह सकते हैं कि वो डीएमके के वरिष्ठ नेता और पूर्व कैबिनेट मंत्री मुरासोली मारन के बेटे और दयानिधि मारन के भाई हैं। इसके साथ-साथ तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री और डीएमके प्रमुख एम करुणानिधि की बहन के वो पोते हैं। लेकिन कलानिधि मारन के मीडिया समूह से एम करुणानिधि पूरी तरह संतुष्ट नहीं थे, इसलिए उन्होंने कलाइगनार टीवी प्राइवेट लिमिटेड की शुरुआत की और कलाइगनार टीवी के मालिक बन गए। डीएमके के करीबी व्यवसायी एम राजेंद्रन राज टीवी नेटवर्क लिमिटेड में 11 फीसदी शेयरधारक हैं। इस तरह राज टीवी और राज डिजिटल प्लस नामक चैनल भी डीएमके के कब्जे में हैं।
अंबुमनी रामदॉस के पिता और पीएमके प्रमुख एस रामदॉस मक्काल टीवी चलाते हैं और मक्काल थोलई थोडारपु कुझुमम लिमिटेड के वो सबसे बड़े शेयरधारक हैं। कांग्रेस नेता एच. वसंतकुमार भी न्यूज़ मीडिया में सक्रिय हैं। वो तमिलनाडु में वसंत टीवी चलाते हैं। कांग्रेस के ही सांसद और पूर्व मंत्री केवी थंगबालू मेगा टीवी के मालिक हैं। उनकी कंपनी का नाम हैं, सिल्वरस्टार कम्यूनिकेशंस लिमिटेड। कर्नाटक और केरल में भी नेताओं का मीडिया से अच्छी दोस्ती है। कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री एच डी कुमारस्वामी की पत्नी अनीता कुमारस्वामी कन्नड़ कस्तूरी टीवी चैनल की मालिकन हैं। लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट के नेता मुरली (जिनका 2009 में निधन हो गया) केरल में कैराइल टीवी और पीपुल टीवी चलाते थे। मुस्लिम लीग से संबद्ध एम के मुनीर इंडियाविजन नामक टीवी चैनल के मालिक हैं। इसी चैनल की फादर कंपनी इंडियाविजन सैटेलाइट कम्यूनिकेशंस लिमिटेड में केरल प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने 20 करोड़ रुपए का निवेश किया है।
बीजू जनता दल के सांसद बैजंत जे पांडा की पत्नी जगी मंगत पांडा ओडिसा टेलीविजन लिमिटेड के तहत चलने वाले ओटीवी की मालकिन हैं। ओटीवी ओडिसा का सबसे लोकप्रिय क्षेत्रीय टीवी चैनल है। पूर्व मुख्यमंत्री जेबी पटनायक के दामाद और उद्योग मंत्री रहे निरंजन पटनायक के भाई सौम्या रंजन पटनायक ओडिसा से निकलने वाले दैनिक अख़बार संबाद, कनक टीवी और रेडियो चॉकलेट के मालिक हैं। ईस्टर्न मीडिया प्राइवेट लिमिटेड नाम की कंपनी के वो मालिक हैं।
तो जाहिर है कि पूरब-पश्चमि-उत्तर-दक्षिण में मीडिया-राजनेता के बीच के संबंध लगातार गहरे होते जा रहे हैं। जगन रेड्डी के साक्षी पर सीबीआई के कसे गए शिकंजे से इस प्रचलन में कोई कमी आएगी, ऐसा नहीं है। हां, यह ज़रूर है कि मीडिया को विस्तार देने में अब ज़्यादा सावधानी बरती जाएगी। जगन पर कई गंभीर आरोप हैं। कहा जा रहा है कि उन्होंने साक्षी शुरू करने के लिए कई फ़र्ज़ी कंपनियों का सहारा लिया और उन कंपनियों से बरास्ते मॉरिशस आने वाले पैसों को जगति प्रकाशन में झोंका। मॉरिशस टैक्स हैवन कंट्री है, जहां से निवेश करने में भारत सरकार कई करों में छूट देती है और यही वजह है कि ज़्यादातर यूरोपीय और अमेरिकी कंपनियां भारत में निवेश करने से पहले मॉरिशस में एक ठौर ढूंढ़ती है और फिर इधर का रुख करती है। आंध्र ज्योति और इनाडु ने जगन के ख़िलाफ़ शुरू किए गए अभियान में यह भी दिखाया कि किस तरह एपीआईआईसी (आंध्र प्रदेश इंफ्रास्ट्रक्चर एंड इंडस्ट्रीयल कॉरपोरेशन) के पैसों को जगति प्रकाशन में लगाया गया।

मीडिया एक ऐसा धंधा है जिसके बारे में कई जानकार बताते हैं कि काले धन को सफ़ेद करने में इस कारोबार से बेहतर कोई दूसरा काम नहीं है। 2004 में जगनमोहन रेड्डी जब कडप्पा से चुनाव लड़ रहे थे तो चुनाव अधिकारी को सौंपे गए ब्यौरे में उन्होंने अपनी आमदनी 10 लाख रुपए बताई थी। अगस्त 2011 में जगन ने घोषणा की कि उनके पास 365 करोड़ रुपए की चल-अचल संपत्ति है। इसके अलावा 41.33 करोड़ रुपए की संपत्ति उनकी पत्नी के नाम अलग से थी। जगन की संपत्ति में वृद्धि दर को अंकगणित के प्रश्न के तौर पर विद्यार्थियों से प्रतियोगिता परीक्षा में पूछा जाना चाहिए। 2004 में 9.18 लाख रुपए से बढ़कर यह 2009 में 77 करोड़ हुई, फिर 2011 में बढ़कर 365 करोड़ हुई। परीक्षार्थी कुल वृद्धि दर की गणना करें! सही उत्तर: 3 लाख 90 हज़ार फीसदी से ज़्यादा। इस दौरान जगन अगर भारत के किसी भी बैंक में वो पैसा जमा किए होते तो हद-से-हद 20 लाख रुपए तक पहुंच पाते। इससे साबित होता है कि बैंक में पैसा रखना प्रगति की राह में रोड़ा है। प्रगति अगर कहीं है तो मीडिया में है

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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