हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

जगनमोहन रेड्डी यानी भारत में मीडिया सिर्फ कॉरपोरेट का नहीं है (भाग- 2)

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/31/2012 08:20:00 PM


पार्टी मुखपत्र का ज़माना लद गया
-दिलीप खान

इससे पहले इन दोनों लिंक पर घूम आए

वाईएसआरकी छवि के बाद जगन के पास राजनीतिक तौर पर शक्तिशाली बनने के लिए जो सबसे अहम हथियारहै, वो है साक्षी। यह जगन भी जानते हैं और विरोधी पार्टियां भी। इसलिए बाकी पार्टियांजगन से ज़्यादा उसके मीडिया समूह पर निशाना साध रहे हैं और जगन अपने मीडिया समूह केबचाव को खुद का बचाव समझते हुए लगभग अभियान चलाए हुए हैं। आंध्र प्रदेश में यदि साक्षी-जगनमोहनके रिश्तों की पड़ताल होती है तो इसके साथ-साथ इनाडु और टीडीपी के रिश्तों की भी होनीचाहिए, क्योंकि जगन का हमेशा ये तर्क रहा है कि उन्होंने इनाडु-रिलायंस-टीडीपी की दुरभिसंधिको ध्वस्त करने के लिए ही अपना अख़बार शुरू किया। मुख्यमंत्री किरण रेड्डी उस समय बेहदपरेशान थे जब मुख्यमंत्री के दौर में चलने वाले हर उम्मीदवार पर साक्षी चोट कर रहाथा। चाहे किरण रेड्डी हो, चाहे रोसैया। किरण रेड्डी के पास ऐसा कोई मीडिया नहीं हैजो खुलकर उनकी सलामी बजाए। टीडीपी के पास है, वाईएसआर कांग्रेस के पास है। असल मेंआंध्र में कांग्रेस पार्टी के भीतर ही कई गुट हैं। इसलिए एक आम राय किसी ख़ास नेताके बारे में मीडिया में नहीं उभर पाती। हां, किरण के पास मुश्किल ही सही लेकिन रास्तेहैं। इन्हीं रास्तों का इस्तेमाल उन्होंने अभी जगन के ख़िलाफ़ किया। सीबीआई की छापेमारीको सीधे-सीधे किरण की बाजी न भी कहें तो साक्षी में दिए जाने वाले सरकारी विज्ञापनोंपर पाबंदी कुछ ऐसा ही कदम है। लेकिन इसका मतलब ये नहीं निकाला जाना चाहिए कि आंध्रमें कांग्रेस पार्टी मीडियाविहीन है। कांग्रेस सांसद टी सुब्बीरामी रेड्डी के भतीजेटी वेंकटरामी रेड्डी का दक्कन क्रॉनिकल होल्डिंग्स कंपनी में 21 फ़ीसदी शेयर है। इसतरह दक्कन क्रॉनिकल, एशियन एज, फाइनेंसियल क्रॉनिकल और आंध्र भूमि में उनकी बड़ी हिस्सेदारीहै। साक्षी प्रकरण में इन अख़बारों की सरकारी भूमिका और पक्षधरता इस बात को पुख्ताकर रही थी कि कम से कम आंध्र प्रदेश में मीडिया अब राजनीतिक तौर पर टुकड़ों में बंटचुका है।
प. बंगाल में कुछ अखबारों पर लगी पाबंदी को बयान करता कार्टून 
असलमें पार्टी मुखपत्र का जमाना अब लद गया। राजनीतिक दल यह जानने लगे हैं कि मुखपत्र कोया तो पार्टी कैडर पढ़ते हैं या फिर आलोचना के वास्ते विरोधी पार्टियां। हद से हद किसीविषय पर पार्टी का पक्ष जानने के लिए मीडिया उससे गुजरता है। लेकिन मीडिया की मौजूदागति मुखपत्र की बजाए रोजमर्रा के स्रोतों से ख़बर जमा करने की वजह से ही कायम हुई है।इस लिहाज से मुखपत्र उनके एजेंडे में उपयुक्त नहीं बैठता। लेकिन राजनीतिक पार्टी केनजरिए से सोचें तो यदि मीडिया मुखपत्र को पढ़ता भी है तो इससे पार्टी को कितना लाभहोगा? कोई ज़रूरी नहीं है कि उसी राजनीतिक नजरिए से मीडिया पार्टी की बात को जनता केबीच रखे। इसलिए बरास्ते मीडिया अपनी बात रखने-रखवाने में राजनीतिक दलों और नेताओं कोएक अवरोध तो दिखता ही है। ज़्यादा मुफीद यह होगा कि मुखपत्र के जरिए मीडिया तक बातपहुंचाने की बजाए सीधे मीडिया के जरिए अपनी बात लोगों तक पहुंचाए। नेताओं ने इस योजनापर बीते वर्षों में तेजी से काम किया है और अब वो सीधे-सीधे मीडिया के मालिक बन रहेहैं। भारतीय राजनीति में ये हाल के बदलाव हैं, लेकिन बड़े बदलाव हैं। अपनी राजनीति,अपनी ख़बर, अपना मीडिया।
दक्षिणभारत में सघन दिखने वाला मीडिया-राजनीति का यह रूप धीरे-धीरे पूरे देश में फैल रहाहै। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हाल ही में घोषणा की कि वो पार्टीकी तरफ़ से नया अख़बार और टीवी चैनल लॉन्च करेंगी। नाम तक उन्होंने जाहिर कर दिया।दैनिक पश्चिमबंग और पश्चिमबंग टीवी। इस नामकरण और घोषणा को एक ख़ास पृष्ठभूमि में ममताने पेश किया। उन्होंने पहले राज्य के सरकारी पुस्तकालयों में अंग्रेज़ी अख़बार सहितकुछ बड़े बांग्ला अख़बारों पर यह कहकर पाबंदी लगा दी कि वो राजनीतिक तौर पर पूर्वाग्रहीसमाचारपत्र हैं। फिर उन्होंने सार्वजनिक तौर पर कहा कि तृणमूल कांग्रेस के काम-काजोंको चूंकि ये अख़बार ठीक से जनता के बीच पेश नहीं कर पाते, इसलिए जनता तक बात पहुंचानेके लिहाज से वो मीडिया में हाथ आजमा रही हैं। जबकि पश्चिम बंगाल में ऐसे कई मीडियासमूह हैं जिनपर तृणमूल कांग्रेस की अच्छी पकड़ है। आरपी ग्रुप के चैनल कोलकाता टीवीको तृणमूल कांग्रेस ने बेल-आउट के लिए संपर्क किया था। तृणमूल कांग्रेस की तरफ़ सेराज्यसभा सांसद स्वपन सदन बोस यानी टुटू बोस संबाद प्रतिदिन नाम से अख़बार चलाते हैं।प्रतिदिन प्रकाशन के वो मालिक हैं। बंगाल मीडिया प्राइवेट लिमिटेड जो चैलन-10 चलातीहै वो तृणमूल कांग्रेस के पक्ष में हमेशा ख़बर चलाता है। इसके मालिक शांतनु घोष औरश्रीमति सुदेशना घोष तृणमूल के प्रति वफ़ादार हैं। इस वफ़ादारी की कहानी काफी पुरानीहै। सीपीएम के कब्जे में भी मीडिया है। आकाश बांग्ला और ज़ी न्यूज़ के साझा उपक्रमज़ी आकाश में बड़ी हिस्सेदारी रखने वाले अवीक दत्ता सीपीएम कार्यकर्ता हैं। वो सीपीएमके पत्र गणशक्ति के सहायक संपादक हैं और सीपीएम के छात्र नेता रह चुके हैं। अवीक दत्तान सिर्फ़ आकाश बांग्ला चलाते हैं बल्कि एक और टीवी चैनल 24 घंटा भी चलाते हैं।
अबतकरीबन हर राज्य में राजनीतिक पार्टियों के बीच मीडिया का बंटवारा हो रहा है। या तोखुद राजनेता ही मीडिया कारोबार में उतर जा रहे हैं या फिर संपादकों को राज्यसभा जानेकी उम्मीद जगाकर अपने पक्ष में कर ले रहे हैं। बहुत दिन नहीं हुए जब बिहार के मीडियापर प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष मार्कंडेय काट्जू ने टिप्पणी की थी कि वहां का मीडियाआज़ाद नहीं है। जाहिर है जवाब सरकार को देना चाहिए, लेकिन झारखंड के एक बड़े अख़बार,जोकि बीते कुछ सालों से बिहार के बाज़ार में भी संभावना तलाश रहा है, ने काट्जू केबयान के विरोध में दो पेज का लेख छापा। अख़बार के प्रधान संपादक ने उसे लिखा था, जिनकेबारे में आजकल चर्चा गरम है कि वो जनता दल (यूनाइटेड) की तरफ़ से राज्यसभा आने की हरसंभवकोशिश में लगे हैं। झारखंड में मीडिया, राजनेता और कॉरपोरेट की भूमिका पर यहां चर्चाकरना बहुत मुफ़ीद नहीं है, लेकिन संक्षेप में यह बता दिया जाए कि झारखंड और बिहार सेनिकलने वाले प्रभात ख़बर की फादर कंपनी ऊषा मार्टिन खनन कारोबार में भी संलग्न है।जाहिर है राजनेताओं के साथ गठजोड़ उनकी ज़रूरत है। उसी राज्य से अनाधिकारिक तौर परयह ख़बर भी मिल रही है कि देश में सबसे ज़्यादा पढ़े जाने वाले हिंदी अख़बारों मेंसे एक ने जिंदल ग्रुप के साथ यह समझौता किया है कि वो जिंदल के पक्ष में अगले पांचसाल तक स्टोरी करेगा। बिहार के मीडिया में प्रकाश झा के पैसों की बहुत चर्चा है औरलोग जानते हैं कि प्रकाश झा का जनता दल (यू) के साथ क्या संबंध है।
वापसआंध्र प्रदेश चलते हैं। वहां जनाधार को विस्तार देने की खातिर हर बड़ी पार्टी ने अपना-अपनामीडिया खोल रखा है या यूं कहें कि हर मीडिया वाली राजनीतिक पार्टी बड़ी पार्टी बन गईहै। तेलंगाना राष्ट्र समिति के अध्यक्ष के चंद्रशेखर राव टी-न्यूज़ नाम से चैनल चलातेहैं। चंद्रशेखर राव तेलंगाना ब्रॉडकास्टिंग प्राइवेट लिमिटेड नाम की कंपनी के मालिकहैं और यही कंपनी टी-न्यूज़ चैनल की फादर कंपनी है। अलग तेलंगाना के मुद्दे को लेकरसबसे बड़े नेता के तौर पर चंद्रशेखर राव के उभार में उनकी पृथक पार्टी के साथ-साथ इसचैनल का भी बड़ा योगदान है। इस तरह साक्षी कोई अपवाद नहीं बल्कि वहां की राजनीति केलिए नियम है।
मुकेश अम्बानी और नीमेश कम्पानी: मीडिया खेल के बाजीगर 
मीडियाबाज़ार की गुपचुप शैली में यह पता लगाना काफ़ी मुश्किल है कि किस कंपनी के साथ किसकाहित नत्थी है। साक्षी ने शुरुआत से ही लगातार यह इल्जाम लगाया कि इनाडु, रिलायंस औरटीडीपी के चंद्रबाबू नायडू के बीच गठजोड़ है। इसी बीच इनाडु ने यह आधिकारिक घोषणा कीकि उषोदया इंटरप्राइजेज में 40 प्रतिशत शेयर ख़रीदने के साथ ही ईटीवी के 10 चैनलोंके सौ फ़ीसदी शेयर का मालिक रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड हो गया है। सिर्फ तेलुगू ईटीवीऔर ईटीवी-2 पर रामोजी राव की पकड़ कायम रही, जहां वो 51 फ़ीसदी और रिलायंस 49 फ़ीसदीशेयर के मालिक हैं। इस तरह साक्षी के आरोप को बल मिला। साक्षी ने यह भी कहा कि नीमेशकंपानी के मार्फत रिलायंस ने उषोदया इंटरप्राइजेज में जो निवेश किया है वो इसलिए हैताकि केजी बेसिन मामले में रिलायंस को चंद्रबाबू नायडू का लाभ मिल सके। उस समय साक्षीने यह दावा किया कि खरीद-बिक्री का ये पूरा मामला फर्जीवाड़े पर आधारित है और अगर कोर्टमें मामला साबित हो गया तो रामोजी राव पर 7700 करोड़ रुपए का जुर्माना भी लग सकता है।
लेकिनजानकारी, सूचना और आरोप-प्रत्यारोप का यह अद्भुत दौर है। इनाडु-रिलायंस के जिन रिश्तोंको जोड़-शोर से साक्षी ने उठाया उसका दूसरा सिरा पकड़ते हुए टीडीपी नेता रेवंत रेड्डीने दिसंबर 2011 में एक नया रहस्योद्घाटन किया। उनका आरोप है कि नीमेश कंपानी ने जगनमोहनरेड्डी के साक्षी मीडिया समूह में भी निवेश किया है। रेवंत का कहना है कि जेएम फाइनेंसिल्स,लैटिट्यूड और मर्केंटाइल प्राइवेट लिमिटेड के अध्यक्ष नीमेश कंपानी ने 27.65 करोड़रुपए मेटाफर रियल एस्टेट एंड प्रोजेक्ट्स लिमिटेड में निवेश किया जोकि पटलूरी वाराप्रसाद की कंपनी है। रियल एस्टेट का धंधा करने वाले प्रसाद को वाईएस राजशेखर रेड्डीपरिवार का करीबी माना जाता है। तो कहानी यह है कि प्रसाद की कंपनी में 27.65 करोड़लगाने के एवज में नीमेश कंपानी ने प्रसाद को इस बात के लिए तैयार किया कि वो जगति प्रकाशनमें कुछ निवेश करे और डील के मुताबिक प्रसाद ने बाद के दिनों में जगनमोहन रेड्डी केजगति प्रकाशन में 10 करोड़ रुपए का निवेश किया।
मीडियाअध्ययन में मीडियाटाइजेशन का सिद्धांत है जिसमें यह बताया गया है कि किस तरह मीडियाआज की राजनीति को संचालित करता है। एजेंडा सेटिंग जैसे सिद्धांत से यह महत्वपूर्ण अर्थमें भिन्न है। एजेंडा सेटिंग सिर्फ यह बताता है कि मीडिया किसी देश में एक कम महत्वपूर्णमुद्दे को भी सबसे बड़े मुद्दे के तौर पर स्थापित करने की शक्ति रखता है, लेकिन मीडियाटाइजेशनयह कहता है कि असल में राजनीति की दिशा और दशा दोनों को मोड़ने में आज का मीडिया बेहदमहत्वपूर्ण हो गया है। इस तरह अगर किसी राजनेता या पार्टी के पास मीडिया है तो वह विरोधीपार्टी से एक हाथ ऊपर है। इसमें राज्य मायने नहीं रखता। आंध्र प्रदेश हो चाहे तमिलनाडुया फिर पंजाब, मीडिया अपने असर के मामले में स्थान निरपेक्ष है। शिरोमणि अकाली दल केसुखबीर सिंह बादल सिर्फ पार्टी में मालिकाना भाव नहीं रखते बल्कि वो पंजाब के लोकप्रियटीवी चैनल पीटीसी और पीटीसी न्यूज़ के भी मालिक हैं। जी-नेक्स्ट मीडिया प्राइवेट लिमिटेडनाम की उनकी मीडिया कंपनी है। बीते दिनों संपन्न हुए पंजाब विधानसभा चुनाव में जब राजनीतिकप्रचार अभियान चल रहा था तो कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी सहित अन्य कई नेताओं ने बादलपरिवार पर यह आरोप लगाया कि उन्होंने अपने चैनल को पार्टी के प्रचार का मंच बना रखाहै। पंजाब के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ जब एक ही पार्टी ने दुबारा सत्ता में वापसीकी। शिरोमणि अकाली दल को बड़ी जीत हासिल हुई। कुछ-न-कुछ राहुल गांधी के आरोप में तोवजन होगा, कुछ-न-कुछ पीटीसी न्यूज़ का तो असर होगा!

जगनमोहन रेड्डी यानी भारत में मीडिया सिर्फ कॉरपोरेट का नहीं है.

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/29/2012 06:33:00 PM

मेरी राजनीति, मेरा मीडिया
-दिलीप खान
साक्षी मीडिया समूह को स्थापित करने के दौरान की गई कथित वित्तीय अनियमितता के आरोप में 27 मई को सीबीआई ने अंतत: कडप्पा के सांसद जगनमोहन रेड्डी को गिरफ़्तार कर लिया। जगन की गिरफ़्तारी का यह फांस बीते एक महीने से सीबीआई तैयार कर रही थी। जांच-पड़ताल अभी जारी है और सीबीआई ने जिन 75 लोगों की सूची तैयार की है उनमें से कुछेक को जगन से पहले ही हिरासत में ले लिया गया है। 8 मई को सीबीआई ने चार बैंको को यह आदेश दिया था कि साक्षी अख़बार चलाने वाले जगति प्रकाशनसाक्षी टीवी चलाने वाली इंदिरा टीवी और जननी इंफ्रा के खातों को सील कर दिया जाए। सीबीआई के इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ जगन ने आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय में अपील याचिका दायर की और 23 मई को न्यायाधीश बी चंद्र कुमार ने फैसला सुनाया कि एसबीआईआईओबी और ओबीसी बैंक खातों पर सीबीआई द्वारा लगाई गई रोक ख़त्म की जाए। इस अदालती फैसले का आनंद उठाने के लिए अभी भरपूर समय भी नहीं मिला था कि जगन को हिरासत में जाना पड़ा। सीबीआई द्वारा खाता सील करने के फ़ैसले के बाद जो दूसरी घटना घटी वह मीडिया के संबंध में महत्वपूर्ण है। आंध्र प्रदेश सरकार ने सीबीआई कार्रवाई के बिनाह पर यह फैसला किया कि चूंकि जगन के कारोबार में लगे पैसों को लेकर जांच चल रही है इसलिए जनहित’ में यही होगा कि साक्षी अख़बार और साक्षी टीवी के सारे सरकारी विज्ञापन रद्द किए जाए। और इस तरह साक्षी को मिलने वाले विज्ञापन बंद हो गए। एक ऐसे अख़बार और टीवी को मिलने वाले विज्ञापन बंद हुए जिनके लिए सारे नियम-कायदों को ताक पर रखते हुए आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री और जगनमोहन रेड्डी के पिता वाईएस राजशेखर रेड्डी ने ज़्यादा ऊंचे मूल्य पर लगातार विज्ञापन मुहैया करवाया और जिनको लेकर विरोधी मीडिया समूह लगातार यह आवाज़ उठाते रहे कि मुख्यमंत्री पिता का नाजायज फायदा उठाने की वजह से ही साक्षी का साम्राज्य खड़ा हुआ है। इस लेख में साक्षी के उदय से लेकर इस समय तक के सफर में आंध्र के मीडिया में मची खींचतान और मीडिया में राजनीतिक पार्टियों व राजनेताओं के निवेश और गठजोड़ की पड़ताल की जाएगी। पूरा लेख लगभग 6000 शब्द का है, इसलिए तीन खंड में इसे ब्लॉग पर प्रकाशित किया जाएगा। 


पहला भाग
सीबीआई जांच शुरू होने के समय से ही जगन रेड्डी का पलटवार रहा है कि 12 जून को आंध्र प्रदेश की 18 विधानसभा और गुंटूर लोकसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव को प्रभावित करने के उद्देश्य से वाईएसआर कांग्रेस के ख़िलाफ सत्ताधारी कांग्रेस और तेलुगूदेशम पार्टी मिली-जुली रणनीति पर काम कर रही है। जगन जब भी राजनीतिक बयान देते हैं तो कांग्रेस और तेलुगूदेशम पार्टी को एक पांत में रख देते हैं। इसकी वजह है। वजह यह है कि चूंकि कांग्रेस से बागी होकर ही जगन निकले हैं और कांग्रेस अभी सत्ता में है तो राज्य द्वारा लिए जाने वाले फ़ैसलों पर सवाल उठाने के लिए कांग्रेस को घेरना ज़रूरी हैलेकिन टीडीपी को घेरने में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के साथ-साथ व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा को भी वे मिला देते हैं। इसलिए टीडीपी का जिक्र करते ही इनाडु मीडिया समूह का नाम लेना वो नहीं भूलते। टीडीपी और इनाडु का एकसाथ नाम लिया जाना एक तरह से जगन के लिए नैतिक बचाव का मामला बनता है। जगन यह साबित करना चाहते हैं कि यदि वाईएसआर कांग्रेस के पास साक्षी मीडिया समूह है तो बाकी राजनीतिक दल भी किसी न किसी मीडिया के कंधे पर सवार हैं। आंध्र की राजनीति में मीडिया की भूमिका को परखने पर कई दिलचस्प तथ्य नज़र आते हैं।
वाई एस राजशेखर रेड्डी के दूसरे कार्यकाल के शपथग्रहण के समय से ही रेड्डी गुट का आरोप था कि इनाडु समूह कांग्रेस सरकार (उस समय जगन और राजशेखर रेड्डी कांग्रेस में ही थे) के ख़िलाफ़ गलतबयानी कर रहा है और इसलिए पारिवारिक सहमति के बाद इनाडु के प्रचार को काटने के लिए वाईएसआर ने अपने बेटे जगनमोहन रेड्डी के हाथ में ये ज़िम्मेदारी सौंपी कि वो मीडिया का एक ऐसा समूह विकसित करे जो रेड्डी के ख़िलाफ़ होने वाले प्रचार का काउंटर पेश करे और साथ में रेड्डी की शख्सियत और काम-काज को भी जनता के बीच चमकाए। इसके लिए उन्होंने आंध्र के बीसेक शहरों में औने-पौने दाम पर जगन को ज़मीन मुहैया करायानए-नवेले अख़बार को स्थापित अख़बारों के मुकाबले ज्यादा कीमत पर विज्ञापन दिया और जिस भी तरह से संभव हुआ साक्षी के पोषण में जगन का हर कदम पर साथ दिया। अगर 2 सितंबर 2009 को वाईएसआर की हेलिकॉप्टर दुर्घटना में मौत नहीं हुई होती तो साक्षी कहीं ज़्यादा बड़ा समूह होता और जगन कहीं ज़्यादा शक्तिशाली।
23 मार्च 2008 को साक्षी अख़बार की पहली प्रति छपी और पहली बार 1 मार्च 2009 को साक्षी टीवी का प्रसारण हुआ। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक प्रिंट मीडिया के वास्ते 2008-2011 के लिए राज्य सरकार के कुल 200 करोड़ रुपए के विज्ञपान बजट में से 101.63 करोड़ रुपए साक्षी के झोले में आया। यानी आधे से ज़्यादा। इसी तरह उक्त अवधि के लिए कुल 40 करोड़ रुपए के टीवी बजट में से साक्षी टीवी को 17 करोड़ रुपए हासिल हुए। सूचना और जनसंपर्क विभाग द्वारा जारी किए विज्ञापनों के अतिरिक्त साक्षी अख़बार और टीवी को राज्य के अलग-अलग एजेंसियों द्वारा भी विज्ञापन मिले। मिसाल के तौर पर एपीएसआरटीसीएपी ट्रांसकोएपी जेंकोसिंगरैनी कोलियरीज आदि। इन एजेंसियों से मिला विज्ञापन 300 करोड़ रुपए से भी ज़्यादा का था। विज्ञापन के इस वितरण पर इनाडु और आंध्र ज्योति ने तीखे सवाल उठाए और राज्य भर में यह प्रचार किया कि राजशेखर रेड्डी ने परिवारिक उद्योग खड़ा करने के लिए सरकारी ओहदे का बेजा इस्तेमाल किया है।

साक्षी पर सीबीआई की छापेमारी और विज्ञापन बंद करने के सरकारी फ़ैसले के ख़िलाफ़ प्रदर्शन
करते पत्रकार और वाईएसआर कांग्रेस कार्यकर्ता
दैनिक संबंद बनाम त्रिपुरा राज्य के फैसले में अदालत का मानना था कि एक ही श्रेणी के अलग-अलग अख़बारों को अगर राज्य सरकार विज्ञापन देने में भेद-भाव बरतती है तो एक तरह से सरकार के इस कदम को संविधान की धारा 14 और 19 का उल्लंघन माना जाएगा। इस लिहाज से देखें तो वाईएसआर ने साक्षी को जमाने में मीडिया में एक धड़े को दबा दिया और अदालत ने अभिव्यक्ति की आज़ादी (मीडिया के संबंध में) की जो व्याख्या पेश कीउससे दूर खड़े होकर उन्होंने जगन का साथ दिया। वाईएसआर ने न सिर्फ़ साक्षी की मदद की बल्कि अपने सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी इनाडु पर लगाम कसना भी चालू किया और यही वह दौर है जब ब्लैकस्टोन ने इनाडु से अपना शेयर वापस खींचा था।
लेकिन कार्रवाई के तौर पर राज्य सरकार द्वारा इस समय साक्षी के विज्ञापन निरस्त किए जाने को बदले की भावना के तौर पर देखा जा रहा है। इसके दो पहलू हैं। पहलाबीते साल-दो साल से साक्षी ने कांग्रेस पर इनाडु और आंध्र ज्योति से भी ज़्यादा तीखे सवाल उठाने शुरू कर दिए थे। जगन की कांग्रेस हाईकमान से इस बात को लेकर नाराजगी थी कि मुख्यमंत्री के तौर पर उन्हें क्यों नहीं चुना जा रहा। कांग्रेस द्वारा दरकिनार किए जाने के बाद जगन ने वाईएसआर कांग्रेस नाम की नई पार्टी बना ली और कांग्रेस पार्टी पर हमला जारी रखा। इस वजह से सरकार की नज़र में साक्षी चुभ रहा था। दूसराअगर साक्षी को ज़्यादा विज्ञापन देना अदालती फैसले के मुताबिक इनाडु और आंध्र ज्योति के साथ नाइंसाफ़ी है तो साक्षी का विज्ञापन बंद किया जाना भी उसी फैसले के मुताबिक साक्षी के साथ नाइंसाफ़ी है।
ऐसा नहीं है कि इनाडु का रिकॉर्ड बहुत पाक-साफ़ है। लेकिन आंध्र के भीतर और बाहर साक्षी को लेकर पत्रकार बिरादरी में एक उफ की भावना शुरू से थीलोगों ने देखा कि किस तरह साक्षी का साम्राज्य खड़ा हुआ है। इसलिए साक्षी के विज्ञापन बंद किए जाने के मसले पर साक्षी समूह के नौकरीपेशा पत्रकारों के अलावा गिने-चुने पत्रकार ही उसके पक्ष में उतरेजबकि जिस समय आरबीआई एक्ट के तहत इनाडु की सिस्टर कंपनी मार्गदर्शी फाइनेंसियर्स एंड मार्गदर्शी चिट फंड जांच के दायरे में आई थी तो एन राम और कुलदीप नैयर जैसे संपादकों ने इसे मीडिया पर हमला करार देते हुए पूरे घटनाक्रम की पुरजोर निंदा की थी और अपने-अपने अख़बारों के बाहर एडिटर्स गिल्ड तक में अभियान चलाया था। ध्यान देने वाली बात यह है कि आरबीआई एक्ट के तहत इनाडु अख़बार या किसी भी तरह मीडिया पर सीधे-सीधे हाथ नहीं रखा गया था। चिट फंड कंपनी की जांच हो रही थीलेकिन संपादकों ने इसे मीडिया पर हमला करार दिया। बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने यह फ़ैसला सुनाया कि रामोजी राव के बैंक खातों को सील किया जाना उचित नहीं है। साक्षी के खातों को जब सील किया गया तो इसके सामने मार्गदर्शी की नजीर थी। इसलिए उसे उम्मीद थी कि खातों पर लगी पाबंदी हट जाएगी। हांसाक्षी के बचाव में बड़ी संख्या में पत्रकार सामने नहीं आए। आंध्र में जो-कुछ प्रदर्शन हुआ वो सिर्फ साक्षी में ही छप कर रह गया। हालांकि हैदराबाद उच्च न्यायालय ने जगति प्रकाशनइंदिरा टीवी और जननी इंफ्रा के खातों पर लगे प्रतिबंध को वापस लेने का फैसला सुनाया। साक्षी को राहत तो मिलीलेकिन जनसमर्थन नहीं मिला। साक्षी का अतीत ही साक्षी की बेचारगी का प्रमुख कारण है। जगनमोहन ने खुले तौर पर अपने अख़बार को मुखपत्र’ में तब्दील कर दिया और अख़बार के भीतर राजनीतिक विचारधारा के स्तर पर जो न्यूनतम विविधता होनी चाहिए उसे लगभग ख़त्म कर दिया।
साक्षी जब आंध्र के 23 शहरों में उतरा तो वाईएसआर उसके सबसे बड़े हीरो थे। अख़बार की नज़र में सुपरमैन। इसी तरह चंद्र बाबू नायडू राज्य के वास्ते सबसे ग़लत इंसान। इसके ठीक उलट इनाडु की नज़र में चंद्रबाबू नायडू राज्य के तारणहार थे तो वाईएसआर प्रगति में अवरोधक। जाहिर है सबका अपना-अपना मीडिया था और अपनी-अपनी ख़बर। 2009 के आम चुनाव में साक्षी टीवी ने एनटी रामाराव की एक वीडियो फुटेज को बार-बार दिखाया जिसमें वो अपने दामाद चंद्र बाबू नायडू की आलोचना कर रहे थे। साक्षी अख़बार और टीवी ने पूरे चुनाव के दौरान वाईएसआर के मुखपत्र के तौर पर काम किया और इसी वजह से साक्षी को चुनाव आयोग की तरफ़ से नोटिस भी भेजा गयाजिसमें कांग्रेस और वाईएसआर की कुछ कवरेज को पेड न्यूज़ की श्रेणी में रखते हुए साक्षी से सवाल किया था। विरोधी पार्टियों ने चुनाव आयोग से इस बाबत कार्रवाई करने की अपील की थी। टीडीपी ने प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष को चिट्ठी भी लिखी कि साक्षी का रवैया नायडू और उनकी पार्टी को लेकर भेदभाव का रहता है और इस तरह मीडिया में मिली अभिव्यक्ति की आज़ादी का इस्तेमाल किसी व्यक्ति विशेष पर निशाना साधने में हो रहा है।
लेकिन शिकायत सिर्फ़ एक पक्ष से नहीं हो रही थी। जगन मोहन की पार्टी ने भी चुनाव आयोग से शिकायत की कि आंध्र प्रदेश में इनाडुटीवी9एबीएन (आंध्र ज्योति का टीवी चैनल) और स्टूडियो एन (चंद्रबाबू नायडू के परिवार द्वारा संचालित) पेड न्यूज़ में मशगूल हैं। जगन ने आरोप लगाया कि ये सभी मीडिया समूह सिर्फ़ टीडीपी उम्मीदवारों के जुलूस को ही प्रमुखता से उभार रहे हैंइसलिए जो ख़बरें छपती हैं या प्रसारित होती हैं उनके ख़र्चे को टीडीपी उम्मीदवारों की खर्च सूची में जोड़ा जाना चाहिए। इस तरह जगन और रामोजी राव (इनाडु के मालिक) के बीच का हिसाब बराबर हो गया। आंध्र प्रदेश में पेड न्यूज़ की चर्चा बीते 5 साल से बेहद गरम है। कई रूपों में और कई शहरों में। आंध्र के कुछ मीडिया समीक्षकों का ये मानना है कि संयोगजगन का भाग्य या फिर पूर्व निर्धारित योजना में से जो भी हो लेकिन पिछले चुनाव में अख़बारों और टीवी चैनलों पर पंखे के विज्ञापन में बेतहाशा वृद्धि देखी गई। ओरिएंटखेतान जैसी नामी कंपनियों अलावा कई गुमनाम और लोकल टाइप की पंखा कंपनियों के विज्ञापन से साक्षी सहित वो सारे अख़बार पटे हुए थेजिनपर जगन का आरोप होता है कि वो उनके ख़िलाफ़ खड़े हैं। इस तरह गर्मी में चुनाव होने से जगनमोहन रेड्डी का चुनाव चिह्न पंखा लोगों की नज़रों में हर अख़बार और टीवी के जरिए छाया रहा। कडप्पा में पंखे ही पंखे दिख रहे थे। सड़क परहोर्डिंग्स मेंपर्चों मेंजगन के विज्ञापन में और पंखा कंपनियों की विज्ञापन में। क्या साक्षीक्या इनाडु पंखा के मामले में सब एक थे।

रंग काला - वर्ण काला

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/24/2012 05:51:00 PM

सोमनाथ उराँव राँची के निकट मांडर प्रखंड के महुआजाड़ी गाँव के आदिवासी युवा हैं. इन्होंने मांडर कॉलेज से बी.ए. एवं राँची विश्वविद्यालय के जनजातीय-क्षेत्रीय भाषा विभाग से कुड़ुख भाषा में एम.ए. किया है । इन दिनों राँची में रहते हैं और एक छोटी नौकरी करते हैं। वे कविता लिखते रहे हैं और यह कविता रणेन्द्र ने हमें मुहैया कराई है.

घने जंगल के
अँधेर-काले कोने से
शुरू की थी यात्रा

हजारो वनस्पतियों के
सत्त से बनी खेत की काली मिट्टी ने
हमे गढ़ा

धूप और भूख ने
सिंझाया - पकाया
पठारी के काले चट्टानों ने
दी छाती को चैड़ाई
सरना के भूरे-काले साखू ने
मन आकाश को ऊँचाई

अखड़ा-मान्दर-गीत-नृत्य ने
लय दिया, गति दी प्राण दिये

हमारा काला रंग
हथीदह के
अथाह जल की गहराई
जंगल का अछोर विस्तार
जल बून्दों के भार से
बोझिल काला बादर - घन श्याम
बरसने - झूमने को आतुर

इसी काले तन के पसीने की बून्दों से
सींचते हैं खेत पकता है अनाज
जीवन पाती रही है मानवता
फैलती रही है खुशी, हँसी, किलकारी

धरती - प्रकृति के सारे रंगो को
निचोड़ने वाला, निगल - पचाने वाला
सफेद रंग
रंग चरका, कुष्ठ खिला
आँखें नीली, नासिका ऊँची
भूरे बाल, गोरा रंग
राजा रंग, यह चरका रंग


नीली आँखों की सुनहरी निगाहों में
हम अँधेरा, हम सन्देह
हम अज्ञान, हम भय
हम ही गुलाम, दास हमी

हम अपढ़, हम गँवार
चोर हम ही, हम ही चुहाड़
गरीबी के बेटे, दुख के प्रेमी
हम ही दागी हम महुआ लोभी
टुच्चे हम, लुच्चे हम, हम कुली हम रेजा
समय कुसमय हम से सजाएँ वे अपनी सेजा

नस्ल से अपराधी हम
जनम - जनम के बागी हम
हम नक्सली हम खूनी-लूटेरा
हर मन के अँधेरे कोने में
हम कालों का डेरा

फेंक रहे दान भीख के रूपये हजार-हजार
पर बन्दूक की एक गोली पर हमरा नाम उधार

गर्व करें कि खुश हों
कलपें कि रोये
कि सच यही कि हम काले
हमारा रंग काला - वर्ण काला

कैसे लड़ें पूंजीवादी व्यवस्था-तंत्रों से

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/24/2012 10:00:00 AM

कुछ तो मौजूदा आर्थिक संकट और कुछ ‘कल्याणकारी’ राज्यों द्वारा खर्चों में कटौती की वजह से अनेक देशों में व्यस्था विरोधी आंदोलनों की एक लहर पिछले साल से देखी जा रही है. इन आंदोलनों में अधिकतर स्वत:स्फूर्त हैं, बिना किसी स्पष्ट राजनीतिक विचारधारा के साथ चलाए जा रहे हैं और अधिकतर में किसी राजनीतिक संगठन का नेतृत्व भी नहीं है. लेकिन इन आंदोलनों में जो दिखता है वह दरअसल जनता का गुस्सा और आक्रोश है, भले ही उसे किसी राजनीतिक संगठन या विचारधारा का नेतृत्व नहीं हासिल है. जेएनयू में लातिन अमेरिकी साहित्य के शोध छात्र पी. कुमार मंगलम ने अपने इस लेख में स्पेन में चले ऐसे ही एक आंदोलन की भारत के अन्ना हजारे आंदोलन से तुलना करने की कोशिश की है और दिखाया है कि अन्ना के नेतृत्ववाले प्रतिक्रियावादी आंदोलन का जनता के वास्तविक सवालों से कोई लेना-देना नहीं है.


राह दिखाता स्पेन का 'लुटे-पिटे' लोगों का आन्दोलन
भारत के 'अन्ना' आन्दोलन के सन्दर्भ में

तो अब यह सबको मालूम हो चुका है कि यू. पी. सहित पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में टीम अन्ना ने किसी एक पार्टी के खिलाफ़ चुनाव प्रचार नहीं किया. मुंबई में अपने तुरत-फुरत खत्म कर दिये गये अनशन के बाद स्वास्थ्य लाभ ले रहे अन्ना ने खुद ही कांग्रेस के खिलाफ प्रचार न करने की बात की थी. हालांकि इसी टीम के अन्य सदस्य कभी ‘ईमानदार’ उम्मीदवारों के पक्ष में और दूसरी तरफ केन्द्र सरकार यानी कांग्रेस के खिलाफ़ मुहिम चलाने की बात भी करते रहे हैं. इससे उनकी समझ और ईमानदारी तथा उससे भी बढ़कर राजनीतिक पक्षधरता उलझी और ठीक-ठीक कहें तो सन्देहास्पद ही मालूम पड़ती है. उलझन और सन्देह बनाने-बढ़ाने वाले इन ‘टीम अन्नाई’ दांवपेचों से कुछ  सबक निकलते हैं जो जनवादी कारवाईयों के लिए अत्यधिक प्रासंगिक हैं. ये सबक आर्थिक-राजनीतिक वस्तुस्थिति  और उससे संबद्ध सत्ता की विभिन्न अभिव्यक्तियों की समझ के आधार पर विविध रणनीतियां और कार्यक्रम बनाने की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं. साथ ही, इनके आधार पर ‘जन लोकपाल’ आन्दोलन, जो निश्चित रूप से अन्ना और उसमें भी ‘टीम अन्ना’ का होकर रह गया, तथा बदलाव और बेहतरी के दावों पर चल रहे या चलाए जाने वाले आंदोलनों की असफलता और सीमा को भी समझा जा सकता है.

स्पेन में हाल-हाल (दिसंबर,2011) तक सत्ता में रहे दल ‘पार्तिदो सोसियालिस्ता ओब्रेरो एस्पान्योल’(स्पेन की समाजवादी कामगार पार्टी) की यूरोपीय आर्थिक मंदी का हवाला देते हुए लागू  की गई आर्थिक नीतियों के खिलाफ़ राजधानी माद्रिद और अन्य छोटे-बड़े शहरों में लोग सड़क पर हैं. पिछली 15 मई से जारी इस आंदोलन के साथियों ने खुद को ’लौस इन्दिग्नादोस’ या ‘लुटा-पिटा’ घोषित कर रखा है . इसे संयुक्त राज्य अमेरिका में चल रहे ‘Occupy Wall Street’ के आन्दोलन्कारियों द्वारा खुद को 99% कहे जाने से जोड़ें तो दुनिया भर में पूंजीवादी व्यवस्था की संकल्पना पर उठ रहे सवाल स्पष्टतः देखे जा सकते हैं.

यह लेख स्पेन के ‘लुटे-पिटे’ लोगों के आंदोलन, जिसे M-15 आंदोलन भी कहा जा रहा है, के द्वारा उठाये जा रहे मुद्दों को भारत में जन आंदोलनो के लिए उपयोगी मानते हुए सामने लाने का प्रयास है. यह प्रयास ‘जन लोकपाल’ आंदोलन के अनुभवों के परिप्रेक्ष्य में और भी जरूरी हो गया है.

‘अन्ना' आन्दोलन का टूटा तिलिस्म

भ्रष्टाचार मिटाने के लिए ‘जन लोकपाल’ का नारा देकर चले आंदोलन में अवधारणाओं और उन्हें सामने लाती व आगे बढ़ाती मांगों के सतहीपन से वर्तमान व्यवस्था को मजबूती ही मिली है. इसे भ्रष्टाचार की परिभाषा और ‘जन लोकपाल’ सहित बदलाव के लिए ‘टीम अन्ना’ के दूसरे सुझावों के स्तर पर समझा जा सकता है. भ्रष्टाचार को धन के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष लेन-देन या दूसरे शब्दों में कहें तो व्यवस्था की कार्यप्रणाली के स्तर पर ही देखा गया. इसमें व्यवस्था की संकल्पना या वर्तमान व्यवस्था की जरूरत पर ही सवाल खड़ा करने की बात सामने नहीं आई. पूरी पारदर्शिता के साथ संसद में बैठे दक्षिणपंथी से लेकर संसदीय वामपंथी दलों की सहमति से पारित कानूनों जैसे कि ‘सेज़ ऐक्ट-2005’ से व्यवस्था के जनविरोधी चरित्र में ‘सुधार’ या ‘परिवर्तन’ की सीमा जाहिर होती है. वर्षों से कश्मीर और उत्तर-पूर्व में देश की ‘सुरक्षा’ और ‘अखंडता’ के नाम पर जायज ठहराये जाते रहे कानून ‘आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर ऐक्ट (आफ्स्पा)’ पर संसद के सभी दलों के साथ-साथ ‘टीम अन्ना’ की भी चुप्पी भी यही जाहिर करती है.

जब इस आंदोलन के मंच से ‘वंदे मातरम’ और ‘भारत माता की जय’ जैसे नारों और ‘भ्रष्टाचारियों को फांसी पर लटका देने’ जैसे दावे होते हैं तब अपने मूल में प्रतिगामी और पौरूषवादी ‘राष्ट्रवाद’ को ही स्वीकार्यता दी जाती है. ‘टीम अन्ना’ भले ही जानबूझकर या भीड़ देखकर इस पहलू को नजरअंदाज करे यह खतरा कम नहीं होता. यहां यह बताना भी जरूरी है कि ऐसे दावे और नारे लोगों को बारीकियों  में जाकर व्यवस्था पर सवाल खड़ा करने की उनकी उदासीनता व अनिच्छा से छूट दिलाकर ‘लड़ने’ और ‘परिवर्तन’ लाने की सुविधा देते है. यह स्थिति तो व्यवस्था के लिए मुफ़ीद ही नहीं बल्कि संजीवनी की तरह है. ‘राष्ट्रवाद’ की ऐसी ही पौरूषवादी और विभेदकारी धारणाओं से समर्थित, पोषित और साथ ही इन्हीं धारणाओं को स्थापित करती और आगे बढ़ाती है यह व्यवस्था. ऐसे में यह कोई आश्चर्य नहीं कि इस आंदोलन से अपने स्थायित्व और वैचारिक वर्चस्व को मिलने वाली किसी भी चुनौती को लेकर निश्चिंत राजसत्ता ‘टीम अन्ना’ को ‘अनशन’ के लिए सभी सुविधाएं देती है. अतिशयोक्ति भले ही लगे लेकिन 16 अगस्त,2011 से शुरू हुए अनशन से पहले अन्ना की गिरफ़्तारी और तमाम सरकारी हेकड़ी दरअसल इस आंदोलन के लिए जरूरी परिस्थितियां ही बना और जुटा रहे थे. देश के कई हिस्सों में चल रहे जीवन के संघर्षों की कानोंकान खबर लगने से पहले ही उन्हें कुचल डालने वाला यह निज़ाम इस आंदोलन के लिए मैदान मुहैया कराने के लिए पूरा सरकारी अमला यूं ही नहीं झोंक देता.

ऐसे में, कांग्रेस, भाजपा,जनता दल (यू), बसपा, इत्यादि लगभग सभी पार्टियां भ्रष्टाचार मिटा देने और लोकपाल कानून पास करने तथा अपने द्वारा शासित राज्यों में लोकायुक्त बनाने की बातें  बड़े जोर-शोर से कर रही हैं. अपने यथास्थितिवादी और शोषक चरित्र को बिना छुपाए ही पाक-साफ़ दिखने का इससे अच्छा मौका क्या ही हो सकता है. तभी तो यह संभव हो पाता है कि उत्तर प्रदेश में चुनाव के ठीक पहले भ्रष्ट बताकर निकाले गये बसपाई को हाथों-हाथ लेने को आतुर भाजपा उत्तराखंड में लोकायुक्त कानून पास कराकर अन्ना और उनके साथियों की वाहवाही बटोर लेती है. यह भी कि चुनाव के दौर में "हम किसी दल के साथ नहीं हैं" कहने वाली ‘टीम अन्ना’ उत्तराखंड में घूम-घूमकर भाजपा सरकार को प्रशस्ति पत्र बांट तथा उसके लिए  वोट बटोर रही थी .यह समझना भी कोई मुश्किल नहीं है कि आंदोलन के मंच से भूमि सुधार और किसानों की समस्याएं दूर करने के तमाम दावे क्यों सिर्फ़ अपने वाजिब सरोकारों के लिए आंदोलन का समर्थन कर रहे लोगों, जो समर्थन में आए जनसमुदाय का बड़ा हिस्सा थे, को भुलावे में रखने के लिए ही थे. यह अनायास नहीं कि कई राज्यों में खुदकुशी कर रहे किसानों की बात हो, औपनिवेशिक भूमि अधिग्रहण कानून से दर-बदर किये गये छोटे-मंझोले किसानों का दर्द हो या खुदरा व्यापार में कभी भी थोप दिये जाने वाले प्रत्यक्ष विदेशी निवेशी से आशंकित करोड़ो लोगों की बात हो ‘टीम अन्ना’ रह-रहकर इनकी दुहाई देकर चुप्पी साध लेती है.

स्पेन के 'लुटे-पिटों' का आन्दोलन

"बस बहुत हो चुका"

"रोटी के बिना शांति नहीं"

"कहा तो जाता है, लेकिन यह लोकतंत्र नहीं है "

न जाने कितनी ओर से आ रहे नारों में यही आवाजें छाई हुई थीं. दिन था 15 मई, साल 2011 और जगह स्पेन की राजधानी माद्रिद की ‘पुएर्ता देल सोल’. वहां ‘प्लाज़ा’ कही जाने वाली यह जगह, जिसे हम अपने यहां सार्वजनिक मैदान जैसा समझ सकते हैं, माद्रिद का सबसे बड़ा प्लाज़ा है.

14 मई की रात से ही जुट रहे लोग, जो अगले दिन अनगिनत हो चुके थे, तब की ‘समाजवादी’ सरकार से ये सारे सवाल पूछ रहे थे. खोसे लुईस रोद्रिगेज़ जापातेरो की सरकार ने 12 मई को आर्थिक मंदी का हवाला देते हुए कई कटौती प्रस्तावों की घोषणा की थी. इनमें से प्रमुख थे-

1.सभी कर्मियों के वेतन में 5% और सरकारी कर्मचारियों के वेतन में 15% की कटौती.

2. उनके पेंशन पर रोक.

3. बच्चों के जन्म पर हर मां को दी जाने वाली 2,500 यूरो (1 यूरो=लगभग 68 रूपये)  की मदद पर रोक.

इन कटौतियों के साथ सरकार 15,000(1 मिलियन=10 लाख) मिलियन यूरो की बचत के फ़ायदे गिना रही थी. बजटीय खर्चों में कटौतियों के जो फ़ायदे सरकार गिना रही थी उसके तर्कों को समझना बेहतर होगा. 2007-08 से पहले संयुक्त राज्य अमेरिका और फिर यूरोप के देशों में उधार और वायदे के कारोबारी बैंकों और संस्थाओं के दिवालिएपन की भरपाई सरकारें करती आ रही थीं. ‘बेल आउट’ कही गई यह कार्रवाई दर असल बड़ी पूंजी के संकट को जनता की कमाई से उबारने की प्रक्रिया है. और तो और, इस अनियोजित खर्चे से पैदा बजट असंतुलन को पाटने के लिए सरकारों ने कर्ज़ लेने से भी गुरेज़ नहीं किया जो उन्हें वैश्विक और क्षेत्रीय स्तर की कर्जदाता संस्थाओं से उंचे ब्याज दर सहित इन्हीं संस्थाओं की अन्य शर्तों पर मिला.

कर्ज चुकाने के लिए और कर्ज लेने से हालत यह होती गई कि यूरोप के देशों में कर्ज उनके सकल राष्ट्रीय उत्पाद से भी ज्यादा हो गया. कुछ देशों में तो यह खतरनाक स्तर पर पंहुच गया जैसे यूनान में यह सकल घरेलु उत्पाद का 166%, इटली में 121% तथा स्पेन में 67% . कर्ज लौटा देने की इनकी कमजोर होती क्षमता के कारण एक तरफ तो इन्हें नये कर्ज नहीं मिल रहे थे और जो मिले वो भी असामान्य उंची ब्याज दरों पर. ब्याज चुकाने के लिए सरकारों ने राजस्व बढ़ाने के लिए बड़ी पूंजी पर करभार बढ़ाने के बजाय खर्चे और खासकर सामाजिक खर्चों में कटौती का ही रास्ता अख़्तियार किया. इन कटौतियों से होने वाली ‘अतिरिक्त आय’ के नुस्खे के साथ ही वित्तीय संस्थायें कर्ज देने को तैयार हुईं. इसी आर्थिक व्यवस्था से बंधे और इसके तर्कों से संचालित हो रही ‘संप्रभु’ देशों की सरकारों ने यह नुस्खा आजमाने में पूरी भक्ति दिखाई. जो थोड़ा-बहुत हिचके,पीछे रहे या अपनी जनता के राय के साथ चलने की कोशिश कर रहे थे उन्हें बदल दिया गया. पुर्तगाल में पापांदेराउ और इटली में सिल्वियो बर्लुस्कोनी की जगह पर सीधे कारोबारी जगत के ‘विशेषज्ञों’ को बिठा दिया गया.

ये सब इसलिए भी हो रहा है कि यूरोपीय यूनियन की आर्थिक कार्यप्रणाली में निर्णायक भूमिका यूरोपीय केंद्रीय बैंक (E.C.B) की है जो ईकाई राष्ट्रों की सरकारों के प्रति न तो जवाबदेह है और न ही इन सरकारों का इसके कामकाज या नीति-निर्धारण की प्रक्रिया में कोई दखल है. इसके अलावा, पूरे यूनियन के लिए एक मुद्रा की व्यवस्था से छोटे देशों के लिए अपने बजट असंतुलन को अपनी जरूरत के मुताबिक स्थानीय  मुद्रा छापकर पाटने का विकल्प भी खतम हो गया है. यूनियन के पहले से ही आर्थिक रूप से मजबूत रहे देशों जैसे कि जर्मनी, फ्रांस इत्यादि इन संस्थाओं की मनमर्जी खतम करने की दिशा में कोई कदम उठाना तो दूर इनके फरमानों को लागू किये जाने की नसीहतें (पढ़ें दबाव) देते रहते हैं. कम-से-कम पिछले दस सालों में इन देशों में काबिज रही उदारीकरण की घोर समर्थक दक्षिणपंथी सरकारों के दौर में अत्यधिक केंद्रिक्रित और गैर बराबरी बढ़ाने वाली आर्थिक व्यवस्था, जिसकी अनिवार्य परिणती राजनीतिक स्तर पर भी होती है, ही हावी है. इस निजाम को आगे बढाते हुए बड़े और संपन्न देशों से इतर अन्य छोटे मुल्कों में भी दक्षिणपंथी उभार, जैसे कि स्पेन और इटली की वर्तमान सरकारें, तथा कई देशों में रंगभेद और घोर मुस्लिम विरोध की सवारी करती और उसे आगे बढ़ाती सरकारे बनने से गरीबी और बेकारी से पैदा हो रहा अनिश्चय तथा गुस्सा और गहराता जा रहा है. इस पूरी प्रक्रिया में 1930 के दशक की महामंदी के बाद कीन्स के नुस्खों पर खड़े ‘कल्याणकारी राज्य’ और इसके राजनीतिक चेहरे के बतौर लगभग पूरे यूरोप में कायम रही ‘सोशल डेमोक्रेटिक’ दलीय परंपरा या तो खत्म की जा रही है या पूर्व में खुद को ‘समाजवादी’ घोषित करते रहे दलों के द्वारा नव उदारवादी एजेंडे को पूरी तरह अंगीकार किया जा रहा है . स्पेन में दिसंबर, 2011 तक सत्तासीन रहा ‘समाजवादी’ दल भी इसी कड़ी का हिस्सा है.

15 मई, 2011 से माद्रिद के पुएर्ता देल सोल से बारबार सुनाई दे रहे नारे "पूरी व्यवस्था ही समस्या है", "लोकतंत्र हो या तानाशाही दमन हमेशा ही चलता रहता है", "नेता और बैंकरों को शिक्षा की जरूरत है " घोषित और अघोषित दक्षिणपंथी दलों व सिर्फ़ अपने गवर्निंग बौडी को जवाबदेह बैंकों की मिलीभगत से चल रही पूंजीवादी व्यवस्था के जनविरोधी मूल चरित्र से ही सवाल कर रहे थे. ऐसे  कई अन्य सवाल और वर्तमान व्यवस्था से उपजे संकट के विभिन्न पक्षों को वहां जुटे लोग सामने ला रहे थे. हिस्सेदारी करने आए ख्वान आगीर्रे उस समय तक बेरोजगार हो चुके 50 लाख लोगों की तरफ से सभी सांवैधानिक और मौलिक अधिकारों को सुनियोजित ढ़ंग से खतम करने वाली व्यवस्था की परतें खोल रहे थे तो फ्रांसीसी सेना की ओर से नाज़ियों के खिलाफ़ लड़ चुके, 1948 के अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार  पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले अंतिम जीवित व्यक्ति तथा "इन्दिगनादोस" पुस्तक के लेखक स्टिफाने हेसेल इस जनाक्रोश को द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूरोप में लागू रहे सामाजिक सुरक्षा के विविध उपायों के खत्म किये जाने से जोड़ रहे थे .

यहां से उठ रहे नारे तथा सवाल किसी एक निश्चित दलिय एजेंडे के तहत नहीं रखे जा सकते हैं और न ही पहले से तय और घोषित कार्यक्रम या मांगपत्रों से निर्धारित हो रहे हैं. वर्ग संघर्ष की स्पष्ट व्याख्याओं व क्रांति के अगुआ दस्ते के रूप में किसान, मजदूरों सहित पूरे सवर्हारा वर्ग की अनिवार्य उपस्थिती पर केंद्रित पारंपरिक वामपंथी आंदोलनों से जितना यह अपने नारों में विविधता और सिर्फ़ वर्ग संघर्ष की बात न करने की वजह से अलग है, उतना ही लोगों के जुटने तथा निर्णय लेने की प्रक्रिया के स्तर पर भी है. मसलन, 14 मई की रात से पुएर्ता देल सोल पर जुटने या स्पेन के अन्य शहरों, जैसे 26 जून से कादिज़ और 25 जून से बार्सीलोना से आनेवालों जत्थों का 23 जुलाई,2011 को माद्रिद में मिलना किसी एक दल या संगठन ने तय नहीं किया था . और न ही जुटे हुए सारे लोग कुछ पूर्वनिर्धारित कार्यक्रमों को लागू कर रहे थे. यहां जमा अनगिनत लोग अलग-अलग चिंताओं तथा मांगों के साथ विभिन्न संगठनों से आए थे. हालांकि व्यापक स्तर पर व्यवस्था से क्षुब्ध ये लोग सभी महत्वपूर्ण निर्णय एक-दूसरे से बातचीत, बहस, प्रस्तावों के समर्थन, विरोध और अस्वीकृति के जरिये  ही ले रहे थे. हर रविवार को यहां लगने वाली आम सभा ऐसी ही व्यापक सहमतियों की गवाह बनती है. यहां सुनाई देने वाले तमाम अलग-अलग नारों से जमा हुए ‘लुटे-पिटे लोगों’ की अलग-अलग चिंताए सामने आ रहीं थी. ऐसे कुछ नारे थे:

"राज्य=पूंजी, ये सब बर्बाद करते हैं और हमें कीमत चुकानी पड़ती है "

"अनिश्चितताओं से भरे इस लोकतंत्र का सबसे बड़ा फ़रेब चुनावी तामझाम है "

"यहां जुटी जनता चुनावी संस्था को अवैध घोषित करती है "

"जब बात कानून और न्याय की आएगी तो हम न्याय चुनेंगे "

"हम नहीं चाहते कि कोई दल इस आंदोलन से जुड़े. हम चाहते हैं कि कुछ बदले "

"दक्षिण और वामपंथ के बीच की बहस का कोई मतलब नहीं है "

अराजक लगने की हद तक विविधता लिए सवाल तथा राजनीतिक सोच प्रस्तुत करते ये आह्वान वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था की तमाम अभिव्यक्तियों पर ही हमला बोलते हैं. यहां ध्यान देने वाली बात है की ये सब किसी एक नेता या मसीहा मान लिए गये व्यक्ति अथवा टीम के मार्फ़त न आकर व्यक्तियों या समूहों से आ रही हैं. अब इसे भारत में ‘जन लोकपाल’ आंदोलन की दशा-दिशा तय करते बयानों का स्त्रोत सिर्फ़ अन्ना या उनकी टीम तक सीमित रह जाने के बरक्स रखें तो दोनों आंदोलनों के आंतरिक लोकतंत्र के साथ-साथ समाज के इनके द्वारा पेश मॉडल में विभिन्न मतों के सामंज्स्य बनाने की क्षमता का अंतर भी पता चलता है. यह बात कि अनगिनत लोग एक नियत दिन को बैठ-विचारकर रणनीति बनाते हैं और यह जरूरी काम कुछ चुनिंदा लोगों पर नहीं छोड़ते इसी अंतर की ओर इशारा करती है.

स्पेन के पुएर्ता देल सोल से उठ रही विभिन्न मांगों के जरिये लोग व्यवस्था की विभिन्न संस्थाओं पर सवाल खड़े कर रहे थे. यह सब देखकर यह भ्रम हो सकता है कि उनका सारा गुस्सा राजसत्ता के दिखने वाले हिस्से की ओर लक्षित है. इससे व्यवस्था की संकल्पना के स्तर पर उनकी समझ सतही भी मालूम पड़ सकती है. लेकिन तमाम नारों के बीच और उन्हें जोड़ती हुई कुछ ऐसी बातें भी आ रहीं थी जिससे इस आंदोलन की कुछ और ही तस्वीर उभरती है.

"और पढ़ो, समझो "

"सिर्फ़ हुक्म मानना हमारा अधिकार नहीं है "

"इस लड़ाई को रोज़-रोज़ लड़ने की जरूरत है "

"हर एक का दिल धड़कती हुई क्रांति है "

इनमें सबसे पहला नारा बड़ा ही दिलचस्प और इस आंदोलन के वैचारिक स्तर को समझने के लिए महत्वपूर्ण है. पढ़ने और चीजों को समझने की बात से व्यवस्था क्या है तथा कैसे काम करती है के जटिल लेकिन रोजमर्रा की जिंदगी में गहरे तक मौजूद रहकर ‘सामान्य’ दिख पड़ने वाले तंत्रों की थाह लेने की इच्छाशक्ति जाहिर होती है. इससे भले ही व्यवस्था को बदल डालने का काम पूरा होता न दिखता हो लेकिन उसकी विविध अभिव्यक्तियों से भिड़ने का उत्साह तो बनता ही है जो बदलाव के लिए एक अहम शर्त है जिसकी बानगी बाकी नारे प्रस्तुत करते हैं. यहीं आकर यह आंदोलन भारत में ‘जन लोकपाल’ के लिए चले अभियान से राजनीतिक समझ की दृष्टि से अधिक परिपक्व और व्यवस्था के तमाम तंत्रों को समझकर लड़ाई लड़ने के मोर्चे पर ज्यादा बेहतर तैयारी में दिखता है. इसी वजह से वहां की सत्ता को इससे मिलने वाली चुनौती भी कहीं ज्यादा प्रखर है जिसको भांपते हुए शुरूआत से ही अलग-अलग तरीकों से आंदोलन को निपटा देने की तैयारियां कहीं कम तो कहीं ज्यादा दिखती रही हैं.

सबसे पहले 20 मई को, जब आंदोलन शुरू हुए पांच दिन ही हुए थे, स्थानीय निकायों के 22 मई को तय चुनावों का हवाला देते हुए वहां के चुनाव आयोग ने सभी तरह की सभाओं पर रोक लगा दी. जाहिर है, पुएर्ता देल सोल में खड़े हो रहे आंदोलन को इसका निशाना बनना ही था. इसी आदेश पर ‘त्वरित’ कार्रवाई करते हुए बार्सिलोना शहर के ‘प्लाज़ा देल कातालुन्या’ में टेंट-कनात सहित डेरा डाले प्रदर्शनकारियों को हटा दिया गया. बहाना यह बना कि उस जगह की सफ़ाई करनी है और दिन-रात चहल-पहल के जीवंत माहौल की गवाह रही सभी निशानियां खतम कर दी गईं. तभी तो वहां मौजूद एक सहभागी ने कहा "यह साफ़ करना नहीं, उजाड़ना है ". लेकिन, सत्ता के तमाम रूपों की परतें खोलकर लड़ने के लिए जमा लोग इस सबके लिए तैयार थे. आगे बढ़ते रहने और आंदोलन जारी रखने का उत्साह "न हम कहीं जाएंगे और न चुप रहेंगे, यूं ही आवाज़ उठाते रहेंगे " के नारों तथा आसपास की विज्ञापनों  से सजे बोर्डों और इश्तहारों को ढ़ंकती, आंदोलनकारीयों के गुस्से को कलात्मक अभिव्यक्ति देती इबारतों से जाहिर हो रहा था. ऐसी ही एक इबारत कह रही थी "बदलाव की लड़ाई चलते रहने वाली है"

यही नहीं, अपने जुटान और सामुहिक लड़ाई से वे लोग मानवीय रिश्तों को आंकड़ों तथा आगे रहने की होड़ में बदल देने वाली व्यवस्था को शक्ल और आधार देती अवधारणाओं के बरक्स सहयोग और सहभागिता के मूल्यों को भी स्थपित कर रहे थे. "सम्मान", " प्रेम और क्रांति हमराह हैं" तथा ऐसे ही कई और नारों में यह साफ़-साफ़ दिख रहा था. आंदोलन के समर्थन में वहां मौजूद अभी के दौर के जाने-माने लातिन अमेरिकी लेखक एदुआर्दो गालेआनो भी इन उम्मीदों को आवाज़ देते हुए कह रहे थे "दूसरी दुनिया संभव है."

इन मायनों में M-15 आंदोलन और ‘टीम अन्ना’ के आंदोलन में फ़र्क देखा जा सकता है. याद करिए किस तरह से अन्ना की स्वास्थ्य चिंताओं तथा उनकी टीम के बिना व्यापक जनसहमति के लिए गये राजनीतिक निर्णयों और दिये गये बयानों के बीच मौजूदा व्यवस्था से इतर एक बेहतर दुनिया की आस लिए आंदोलन में भागीदारी करने वाले लोगों की आशाएं कैसे कमजोर पड़ गईं थी. वर्तमान व्यवस्था में ही कुछ जोड़कर या मामूली बदलाव करते हुए इसे ‘ठीक’ कर देने तक सीमित रहे और स्थापित आर्थिक-राजनीतिक तंत्र को नकारते हुए बराबरी और न्याय की उम्मीद न देने और निर्णय प्रक्रिया को कुछ लोगों पर छोड़ देने की स्वाभाविक परिणति थी यह.

अब क्या: कुछ निष्कर्ष

M-15 आंदोलन की तात्कालिक वजह बने 12 मई, 2011 को लागू कटौती-प्रस्तावों को आगे बढाते हुए ज़ापातेरो की सरकार ने मुख्य विपक्षी दल ‘पार्तिदो पोपुलार’ के साथ मिलकर बजट घाटा को जी.डी.पी के 0.4% तक सीमित करने वाला संविधान-संशोधन प्रस्ताव पारित कराया . 1975 में तानाशाह फ्रांको के फ़ासीवादी राज के खात्मे के बाद के राजनीतिक परिदृश्य में ‘समाजवादी’ और घोषित रूप से धार्मिक कट्टरवाद, अंधराष्ट्रवाद एवं स्वच्छंद बाजारवाद के झंडाबरदार दल के बीच किसी भी तरह का यह पहला समझौता था. 2004-11 के अपने कार्यकाल में ज़ापातेरो की सरकार द्वारा लागू किये कये कई प्रगतिशील कानूनों-प्रस्तावों जैसे कि पहले 14 हफ्तों तक गर्भपात कराने का अधिकार (कुछ शर्तों के साथ 16-17 आयुवर्ग की लड़कियों के लिए भी), आप्रवासियों  के लिए 60 दिन तक बिना किसी दस्तावेजी अनिवार्यता के रहने की छूट, बड़ी पूंजी के उद्दमों पर टैक्स में बढ़ोतरी , इत्यादि की वजह से इसी ‘पार्तिदो पोपुलार’ की तीखी आलोचना झेल रही सरकार का यह समर्पण दुःखद तो था लेकिन अप्रत्याशित नहीं. वस्तुतः निजी पूंजी के संकट को पहले अमेरिका और बाद में यूरोप में आर्थिक मंदी करार दिये जाने के साथ-साथ उससे निपटने के सभी उपाय सरकारों की आर्थिक-राजनीतिक संप्रभुता को ही खतम कर रहे थे. ऐसे में, 2009 से ही ज़ापातेरो की सरकार जनहित के कई प्रस्तावों से पीछे हट रही थी. मुख्य विपक्षी दल सरकारी कटौतियों को नाकाफ़ी बताते हुए आये दिन बजट व्यय खासकर सामाजिक खर्चे में भारी कमी और बाजार को कामगारों की भरती और छंटनी के मुद्दे पर और ज्यादा छूट दिये जाने की मांग कर रहा था. महत्वपूर्ण आर्थिक मुद्दों पर दक्षिणपंथी दलों तथा संसद के अंदर और बाहर मजबूती से जम चुकी मुक्त बाजार के समर्थक संस्थाओं और अवधारणाओं से सरकार के संचालित होने की परिणती थी यह समझौता. इसके अलावा इससे राजनीतिक दलों के वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ़ होने के भ्रम दूर हुआ. साथ ही, कमोबेश सभी दलों के बीच आर्थिक मोर्चे पर कायम सहमति, अपनी राजनीतिक तथा अन्य सभी अभिव्यक्तियों के साथ, जाहिर हुई. इस अद्भुत विचार साम्य से उभर रही विकल्पहीनता के वास्तविक संकट को M-15 के "सच्चा लोकतंत्र तुरंत बहाल करो " के आह्वान में स्पष्ट देखा जा सकता है. आंदोलन के समर्थन में आए प्रसिद्ध स्पेनी संगीतकार लुईस एदुआर्दो की "यह आंदोलन पार्टीशाही के खिलाफ़ है " बात इसी की ओर इशारा कर रही थी.

अगर बात भारत की करें तो इसी विकल्पहीनता का आलम है. 1991 के बाद लागू हुए आर्थिक ’उदारीकरण’ के विभिन्न पहलुओं को लेकर थोड़े-बहुत मौकापरस्त विरोध के पीछे लगभग सभी दलों की सहमति हमारे दौर की सच्चाई है. ऐसे में, अन्ना के आंदोलन की शुरूआत में सरकार को भ्रष्टाचार के मुद्दे पर घेरने को व्यवस्था के लिए चुनौती समझकर समर्थन में आए लोग ‘टीम अन्ना’ के व्यक्तिगत ईमानदारी और कुछ दलों के दिखावे के शोशेबाजियों के उत्सव से खुद को जुड़ा नहीं महसूस कर पा रहे थे. यहां पर इस आंदोलन तथा M-15 के ‘लुटे-पिटे’ लोगों के आंदोलन के अंतर को विकल्प प्रस्तुत करने की बुनियादी कसौटी पर समझा जा सकता है. इसके साथ यह जोड़ना भी जरूरी है कि स्पेन के आंदोलनकारियों द्वारा भी किसी एक खास मॉडल की बात नहीं कही जा रही थी. उनके बीच से आ रही बातों से आगे की रणनीतियों और कार्यक्रमों की कोई साफ़ तस्वीर नहीं उभर रही थी. एक प्रदर्शनकारी आल्बेर्तो का मानना था कि "आंदोलन को अन्य शहरों और कस्बों तक फैलना चाहिये ". वहीं समर्थन में आए कातालुन्या विश्वविद्यालय के अध्यापक इस्माएल पेन्या कह रहे थे "मेरा मानना है कि प्रस्तावों को ठोस रूप देना जरूरी है ताकि व्यवस्था में बदलाव के अभियान को एक मुकम्मल शक्ल दी जा सके जिसके अभाव में यह आंदोलन भी असफल हो जाएगा".

वैसे M-15 का आंदोलन नारों और संगठन के स्तर पर जितना विविध और विकेंद्रित रहा है उससे जन आंदोलनों को पार्टी कार्यक्रम तथा संगठन के चश्मे से देखने वाले इसकी सार्थकता और सफलता पर संदेह करेंगे. लेकिन Occupy Wall Street के जन उभार से लेकर Arab Spring तक तथा थोड़ा पीछे जाकर लातिन अमेरिका के Pink Tide के प्रगतिशील सरकारों की बात हो, कम-से-कम शुरुआत में ये सभी विभिन्न स्तरों पर इसी तरह की विविधता और  विकेंद्रीकरण की बुनियाद पर आगे बढ़े. Arab Spring को आगे चलकर कुछ संगठनों-दलों द्वारा हथिया लिया जाना और बाद में मिस्र तथा ट्युनीशिया के चुनावों में इस्लामिक दलों का राजनीतिक दबदबा तो दिखता है वहीं दूसरी तरफ़ Occupy आंदोलन आज भी किसी एक पार्टी के झंडे के बगैर चल रहा है. लातिन अमेरिका में चाहे वह इक्वादोर की राफाएल कोर्रेआ की सरकार हो या वोलिबियाई इवो मारालेस की, इनकी शुरुआत वहां के मूल निवासियों के अधिकारों के लिए संघर्षरत अनेकों संगठनों के साथ आकर लड़ने से हुई थी. यह परिघटना वर्तमान समय में सभी जगह हावी पूंजीवादी आर्थिक-राजनीतिक व्यवस्था और उससे संबद्ध सामाजिक तथा सांस्कृतिक विद्रूपताओं से समाज के विभिन्न स्तरों पर पनप रहे असंतोष तथा विखंडन की अलग-अलग रूपों में हो रही अभिव्यक्ति के बतौर देखी-समझी जा सकती है. सीधे-सीधे दिख जाने वाले दो वर्गों की स्थापना के आधार पर कार्यक्रम बनाना तथा उसमें व्यापक जनभागीदारी सुनिश्चित करते हुए किसी आंदोलन को आगे बढ़ाना अगर असंभव या मुश्किल नहीं तो कम-से-कम एकमात्र विकल्प नहीं रह गया है. यह कहा जा सकता है कि अभी के अनिश्चित हालातों में उभर रही असहमति की तमाम आवाजों को ऐसे ही आंदोलनों में सुना जा सकेगा जो अपने अनुभवों से सीखते, आगे बढ़ते, हारते तथा बदलती हुई परिस्थितियों में रास्ता बनाते अपनी जरूरतों-मागों के हिसाब से बेहतर दुनिया गढ़ेंगे. कुछ ऐसा ही स्पेन में हो रहा है जहां पिछले साल 20 नवंबर को हुए आम चुनावों में फ्रांको की तानाशाही (1939-75) की  वैचारिक उत्तराधिकारी दल ‘पार्तिदो पोपुलार’ प्रचंड बहुमत से सत्ता में आई और मारियानो राखोई नए प्रधानमंत्री चुने गए. चुनाव पूर्व के ‘स्पेन को बदल डालने’ के ‘साहस’ का प्रदर्शन करते हुए सत्ताधारी दल का उठाया गया सबसे पहला कदम सामान्य आय वर्ग और मजदूरों के खिलाफ़ था. साप्ताहिक कार्य घंटों को 35 से बढ़ाकर 37.5 कर दिया गया . बीमारी की हालत में मिलने वाली आर्थिक मदद को खतम कर दी गई और अब बीमारी के चौथे से बीसवें दिन तक उन्हें  वेतन का 60% ही मिला करेगा . राजधानी माद्रिद में सरकार की प्रतिनिधि एस्पेरांजा आगीर्रे ज्यादा काम लेने, वेतन बढ़ोतरी पर रोक, सामाजिक व्यय में भारी कटौती सहित अन्य उपायों से सरकारी खर्चे में 40,000 मिलियन यूरो की बचत का जश्न मनाते हुए बता रहीं थी कि "अब बिना मजदूरों की संख्या बढ़ाए ज्यादा उत्पादन हो सकेगा ". वहीं सरकार की न्यायिक सलाहकार रेखिना प्लान्योल कामगारों से "राष्ट्रहित" में ये "कुर्बानी" देने की अपील कर रहीं थी. सिर्फ़ आर्थिक ही नहीं अन्य मोर्चों पर भी इस सरकार ने ‘सुधार' के अपने प्रतिगामी मूल्यों को थोपना शुरू किया. मसलन काफ़ी हद तक संप्रभु रहे इकाई राज्यों के बजट प्रस्तावों के लिए केंद्र से अनुमति मिलना अनिवार्य कर दिया गया. महिलाओं और किशोरियों के गर्भपात के अधिकार को भी ख़तम कर 1985  तक लागू रहे क़ानून को वापस लाने की बात की जा रही है जो यह अधिकार सिर्फ़ अभिभावकों और समाज की मर्जी पर छोड़ता था. 

कटौती तथा और कटौती के नित नए फरमानों तथा पारिवारिक मूल्यों और ‘संस्कृति' के नाम पर पितृसत्ता और सामंती मूल्यों की मजबूती के दौर में M -15  आन्दोलन की जरूरत पहले से कहीं ज्यादा है और वह जारी भी है. तभी तो जब वहाँ के वित्त मंत्री लुईस दे गिन्दोस यूरोपियन यूनियन को पिछली सरकार से ज्यादा कटौती एवं  बचत हासिल करने का भरोसा दे रहे थे और मीडिया ‘जनमत संग्रहों' में तमाम सरकारी फैसलों पर लोकप्रिय समर्थन का दावा कर रहा था तब इस सबके बीच 7 फरवरी, 2012 को कटौती प्रस्तावों के खिलाफ़ हुए व्यापक प्रदर्शनों में लग रहे नारे M-15 आन्दोलन से ही निकले थे. ऐसा ही एक नारा था "समस्या आर्थिक मंदी नहीं, यह व्यवस्था है."

भारत में अदूरदर्शी राजनितिक दृष्टि की शिकार और अब निष्प्राण हो चुके आन्दोलन के एकमात्र बच रहे प्रतीक ‘टीम अन्ना' की यदा- कदा ही सुनाई पड़ने वाली घोषणाएं पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में नक्कारखाने में तूती की आवाज़ बनकर रह गई. इसके इस हश्र को देखते हुए, उम्मीद अब उन अनगिनत तथा देश के कई हिस्सों में बिखरे पड़े छोटे-बड़े जनउभारों से है जो स्थानीय स्तर पर जीवन अधिकारों से जुड़े स्थानीय मुद्दों को उठाते हुए,  इस प्रक्रिया में वृहद सरोकार बनाते हुए ऐसे ही अन्य जनांदोलनों  के साथ मिलते-लड़ते, व्यवस्था के बड़े और विस्तृत तंत्र के व्याकरण को अपनी जिजीविषा से खारिज कर रहे हैं.

(रामशरण जोशी के लिए जिन्होंने हिंदी में लिखने को उत्साहित किया) 

इस लेख के साथ एक सन्दर्भ सूची भी थी, जिसे ब्लॉगर पर पोस्ट करने में मुश्किल आने की वजह से हटा दिया गया है. संदर्भ सूची के साथ लेख यहां क्लिक करके हासिल किया जा सकता है. 

मुझे प्रतिबंधित किया जाना अहमियत नहीं रखता: यान मिर्डल

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/23/2012 03:13:00 PM

स्वीडिश पत्रकार, फिल्मकार और लेखक यान मिर्डल पर भारत सरकार नजर रखे हुए है और ऐसे संकेत भी दिए गए हैं कि उनकी भारत यात्राओं पर प्रतिबंध लगा दिया जाएगा. नोबेल पुरस्कार प्राप्त अर्थशास्त्रियों अल्वा और गुन्नार मिर्डल के बेटे यान 2010 और 2012 में भारत दौरे पर आए थे. 2010 में वे छत्तीसगढ़ के दौरे पर गए थे और भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेताओं से मिले थे. इस दौरे के अनुभवों को लेकर उन्होंने एक किताब लिखी- रेड स्टार ओवर इंडिया, जिसका विमोचन उन्होंने इस साल फरवरी की अपनी यात्रा में किया. इसके अलावा उन्होंने कई व्याख्यान भी दिए. भारत सरकार उनकी किताब और उनके बयानों से आदिवासी सवाल और उनके संघर्षों को मिल रहे अंतरराष्ट्रीय समर्थन पर चिंतित दिख रही है. इस संदर्भ में यान ने अपने देश के विदेश मंत्री को एक पत्र लिखा है, जिसे हम यहां पोस्ट कर रहे हैं. यहां इस बात का उल्लेख किया जाना भी जरूरी है कि लेखकों की अभिव्यक्ति और अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर प्रतिक्रियावादी लेखकों और कलाकारों की हिमायत में उतरे लेखक, पत्रकार, बुद्धिजीवी इस मुद्दे पर चुप हैं. उनकी इस आपराधिक चुप्पी को दर्ज किया जाना जरूरी है. यान मिर्डल के इस पत्र का अनुवाद अभिषेक श्रीवास्तव ने किया है.

श्री कार्ल बिल्ट, विदेश मंत्री

मेरा यह पत्र आपको निजी नहीं है बल्कि आपके स्वीडन का विदेश मंत्री होने के नाते है। ऐसे पत्र ''सूचना की स्वातंत्रता के कानून'' के दायरे में नहीं आते। चूंकि इस पत्र में वही सूचना मौजूद है जो सार्वजनिक दायरे में है, या होनी चाहिए, इसलिए मैं इसे भारत में भी प्रकाशित होने दूंगा। मैं ऐसे मामलों में वही करता हूं जो गुन्नार मिर्डल किया करते थे और बिल्कुल सीधी भाषा में लिखता हूं।

मुझे अपेक्षा है कि दिल्ली में हमारे दूतावास को उच्च  सदन में गृह राज्यं मंत्री जितेंद्र सिंह द्वारा मेरे बारे में दिए गए भाषण की प्रति प्राप्ति हो गई होगी। मुझे उसकी एक प्रति चाहिए जिससे मैं सिर्फ अखबारी आलेखों के भरोसे न रह जाऊं। मैं उम्मीद करता हूं कि दूतावास मुझे यह भेज सकता है। इसके अलावा, अखबारी रिपोर्ट के आखिरी वाक्य में जितेंद्र सिंह के हवाले से कहा गया है, ''सरकार करीब से हालात पर नज़र रखे हुए है। ऐसे मसले नियमित तौर पर संबद्ध देशों के साथ कूटनीतिक स्तार पर उठाए जाते हैं।'' क्या इसका मतलब यह हुआ कि भारत सरकार मेरे बारे में स्वीडन के दूतावास से पूछताछ कर चुकी है?

मैंने अपनी नई किताब (रेड स्टार ओवर इंडिया) के भारत में लोकार्पण के लिए कॉन्फ्रेंस वीज़ा के लिए आवेदन किया था और यह मुझे मिल भी गया (जो काफी महंगा था)। वीज़ा आवेदन के साथ मेरे स्वीडिश प्रकाशक (स्टॉंकहोम में लियोपर्ड) की ओर से लिखित में एक आर्थिक गारंटी तथा कोलकाता के मेरे प्रकाशक (सेतु प्रकाशन) व कोलकाता पुस्तक मेले की ओर से आमंत्रण भी नत्थी था। कोलकाता में मेरे आगमन के बाद मेरे प्रकाशक से कहा गया कि वह मेरे रहने की जगह और भारत में सार्वजनिक उपस्थिति की जगहों की सूचना प्रशासन को देता रहे। उसने वैसा ही किया। 

किताब का लोकार्पण कोलकाता, हैदराबाद, लुधियाना और दिल्ली में विभिन्न  संगठनों ने अलग-अलग बैठकों में किया। मैंने जो कुछ कहा, वह छपा और/या नेट पर आया।

आप देख सकते हैं कि गृह राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने राज्य सभा में मेरे बारे में जो कुछ कहा और 20 मई 2012 को जी न्यूज़ के मुताबिक गृह मंत्रालय की प्रवक्ता इरा जोशी ने जनवरी/फरवरी 2012 के मेरे भारत दौरे के बारे में बताया, वह तथ्यात्मक रूप से गलत है। दूसरे शब्दों में कहें तो जो है ही नहीं, उसे वे ''राजनीतिक वजहों'' से कह रहे हैं।

तो आखिर इसकी राजनीतिक वजहें क्या हैं? इन्हें समझने के लिए कोलकाता से छपने वाले टेलीग्राफ का 18 मई का अंक पढ़ा जाना चाहिए जिसमें निम्न छपा है:
"Maoist spam in PC mailbox
NISHIT DHOLABHAI
New Delhi, May 17: When faxes don’t work, blitz the home minister’s email from abroad.
P. Chidambaram’s email ID has been bombarded with messages from the West, calling for the release of an activist and an alleged Maoist sympathiser, provoking curiosity about the foreign appeal for something so 'local'."

ज़ाहिर है, भारत सरकार भारतीय मामलों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ रही जानकारी और दिलचस्पी से बहुत परेशान है। 

पिछले साल 12 जून को मैंने और अरुंधति रॉय ने लंदन में भारतीय जनता के समर्थन में अंतरराष्ट्रीय एकजुटता की ज़रूरत पर बात की थी। हम दोनों ने भारत में खबरों को अजीबोगरीब तरीके से दबाए जाने पर बात रखी। भारत में जो बहस-मुबाहिसे चल रहे हैं, वे हमारे पश्चिमी मीडिया में नहीं आ पाते। ऐसा नहीं कि यह भारत में किसी सरकारी सेंसरशिप के चलते है (जैसा द्वितीय विश्व  युद्ध के दौरान ब्रिटिश ने किया था)। यह हमारे मीडिया के संपादकीय ''चौकीदारों'' की सेंसरशिप के कारण है (और भारत में हमारे पत्रकारों की खुद पर लगाई सेंसरशिप के कारण भी)।

इसमें कुछ भी नया नहीं है। हाल ही में स्वीडन में ''ओरिएंटल सोसायटी'' के एनिवर्सरी अंक में मैंने लिखा था कि कैसे तटस्थ स्वीडन के भीतर भारत से जुड़ी खबरें (यहां तक कि ''भारत छोड़ो आंदोलन'', बंगाल का नरसंहारक अकाल और ''इंडियन नेशनल आर्मी'' की खबरें भी) दबा दी गई थीं। ये आपके पैदा होने से पहले की बातें हैं, इसलिए मैंने आगामी अंक में जो लिखा है वो आपको पढ़ना चाहिए। (मैंने एडम वॉन ट्रॉट ज़ू सोल्ज़थ के बारे में भी लिखा है जब वे मेरे पिता से मिलने जून 1944 में हमारे घर आए थे, तो दरवाज़ा मैंने खोला था। वह 20 जुलाई की योजना के बारे में मेरे पिता की मदद से स्वीडन में मौजूद अमेरिकी और सोवियत सुरक्षा प्रतिनिधियों को सूचित करना चाहते थे। ये सब आपके विदेश विभाग की फाइलों में दर्ज है, आप जान सकते हैं उनसे कि मित्र राष्ट्रों ने मदद करने से इनकार क्यों कर दिया। आपने हालांकि ये नहीं सोचा होगा कि आखिर ब्रिटिश एमआइ6 ने एडम की ''सुपारी'' क्यों ली थी- ठीक वैसे ही जैसे उसने सुभाष चंद्र बोस के साथ किया जब वे भारत से भाग गए थे।

सभी देशों में भारत की जनता के साथ बढ़ती एकजुटता के आंदोलन ने वहां के बारे में सूचनाओं के प्रवाह को तेज़ किया है। मैं सलाह दूंगा कि आप, या कम से कम दूतावास ही सही, नेट पर indiensolidaritet.org को फॉलो करे। इस पर भारत के बारे में खबरों की व्या़पक और निष्पक्ष कवरेज होती है (और व्यापक व बहुपक्षीय नज़रिये की अंतरराष्ट्रीय ज़रूरत पर विभिन्ना सदस्यों के बीच ठोस मुक्त( बहस भी)। इसे देख कर आपको पचास साल पहले वियतनाम के लिए एकजुटता आंदोलन की याद ताज़ा हो आएगी कि कैसे उसने पचास के दशक के अमेरिकापरस्त  प्रभुत्ववादी मीडिया को बीस साल बाद ज्यादा मुक्त और उदार नीति वाले मीडिया में तब्दील करने का काम किया। (याद करें कैसे बड़े अखबारों जैसे Dagens Nyheter में बदलाव आए- और ध्यान रहे कि जिस तरीके से यह सूचना तंत्र नीचे से काम करता है-  सरकारी शराब के ठेकों के बाहर बुलेटिन बेचने जैसे काम इत्यादि- इसने आखिरकार स्वीडन की विदेश नीति तक को बदल डाला)।

मैं दिल्ली  के दूतावास में किसी को नहीं जानता। मैं अब हालांकि उनके दादा की उम्र का भी तो हो चला हूं। लेकिन मुझे आशंका है कि वे स्वीडिश पत्रकारों के आग्रहों-दुराग्रहों को साझा करते हैं। हमारे देश के लिए यह बेहतर होगा यदि वे कहीं ज्यादा व्यापक और दीर्घकालिक नज़रिया अपनाते। भारत में सूचनाएं मौजूद हैं। यह देश तानाशाही दौर वाले चिली या सोवियत संघ जैसा नहीं है।

मेरे खिलाफ भारत सरकार की मौजूदा प्रतिक्रिया सामान्य लेकिन अतार्किक है- यह वैसी ही प्रतिक्रिया है जैसी अन्य  देश करते हैं जब उनके खिलाफ सही सूचाओं पर आधारित अंतरराष्ट्रीय राय पैदा होती है। हालांकि भारत सरकार के इस सनक भरे व्यबवहार की एक और वजह है। मुझे उम्मीद है कि दूतावास इस पर निश्चित ही ध्यान दे रहा होगा। यदि आप तीस साल पहले मेरे लिखे को देखें तो पाएंगे कि उसके मुकाबले हालात अब बदल रहे हैं। उस वक्त  नक्सलबाड़ी से प्रेरित राजनीतिक आंदोलन, वाम, तेलंगाना के संघर्ष और अन्य जनप्रिय उभार आपस में गहरे बंटे हुए थे और बाद में इन आंदोलनों में और बंटवारे हुए। (इसकी ठोस वजहें थीं, मैंने इस पर लिखा भी है) आज हालात जुदा हैं। मुख्य माओवादी पार्टी और समूहों ने मिल कर अखिल भारतीय पार्टी सीपीआई(माओवादी) बना ली है। इतना ही नहीं, विभिन्न विचारधारात्मक अंतर्विरोधों के बावजूद अन्य समूह भी आज भारतीय जनता के समक्ष खड़े बड़े सवालों पर सहमत हो रहे हैं। सामाजिक अंतर्विरोध भी ऐसे हैं कि छात्रों का एक बड़ा तबका और ''मध्यूवर्ग'' लोकतांत्रिक व सामाजिक बदलाव चाह रहा है। 

एक ठोस उदाहरण लें। हैदराबाद में मैं 1980 के दौर के अपने कुछ पुराने दोस्तों  से मिला। उस दौर में जब हम भूमिगत होकर आंध्र प्रदेश में सशस्त्र  दलों से मिलने गए थे, तो ''प्रतिबंधित इलाकों'' में स्थित उनके घरों में रुके थे। अब वे प्रतिबंधित नहीं, कानूनी हैं। वे चुनाव में हिस्सा लेते हैं। इस तरह उनके और सीपीआई(माओवादी) के बीच काफी गहरे विचारधारात्मक और राजनीतिक मतभेद हैं। उनमें गर्म बहसें होती हैं, लेकिन वे दुश्मन नहीं हैं। जनरल सेक्रेटरी गणपति के साथ साक्षात्कार में आप देख सकते हैं कि उन्होंने कैसे इन सब चीज़ों पर बात की (ये बात, कि मैंने अपने भारतीय मित्रों को इस बारे में कुछ ''सुझाव'' दिए, इतनी मूर्खतापूर्ण है कि उस पर हंसी भी नहीं आएगी)।

(यही तस्वीर आपको सीपीआई के भी बड़े हिस्से' में देखने को मिलेगी। यह अनायास नहीं है कि भारत पर मेरे काम और मेरी पुस्तक के बारे में सबसे ज्यादा यदि यूरोप के किसी अखबार ने लिखा है तो वो है "Neues Deutschland", आखिर क्यों ? सोवियत संघ के आखिरी वर्षों में मैं उस अखबार से जुड़ा हुआ था। अब यूरोप की तस्वीर बदल चुकी है और फिलहाल जर्मनी के "Linke" के- जो कि "Neues Deutschland" के काफी करीब है- सीपीआई के साथ पार्टीगत रिश्ते हैं।)

भारत सरकार ने मुझे ''प्रतिबंधित'' कर दिया है, यह बहुत अहमियत नहीं रखता। पहले भी मुझे कई सरकारों ने प्रतिबंधित किया है (याद करिए मॉस्को मुझे किस नाम से पुकारता था)। मेरी फाइलों को देखिएगा तो पता चलेगा कि 1944 (मैंने वाईसीएल की कांग्रेस पर बोला था जिसके बाद मुझे प्रवेश नहीं करने दिया गया था) के बाद से अमेरिका ने बार-बार मुझे प्रतिबंधित किया है और बाद में खुद आधिकारिक स्तर पर न्योता भी दिया। अब मैं 85 का हो चुका हूं, लिहाज़ा ऐसा देखने के लिए मेरे पास उम्र बची नहीं, हालांकि यह बात कोई बहुत मायने नहीं रखती। 

ज़रूरी बात यह है कि स्वीडन के राष्ट्रीय हित में आपको यह सुनिश्चित करना है कि दक्षिण एशिया के विदेश कार्यालयों में काम कर रहे आपके अफसर स्वीडिश मीडिया की मौजूदा तंग सोच को छोड़ कर एक व्यापक नज़रिया अपनाएं।

आपका
यान मिर्डल
20 मई, 2012

शांति के ठेकेदार देश हथियारों के सबसे बड़े उत्पादक भी हैं

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/22/2012 07:17:00 PM


एदुआर्दो गालेआनो से यह बातचीत द प्रोग्रेसिव के लिए आल्टरनेटिव रेडियो के डेविड बार्सामियन ने की है. यह बातचीत 13 जुलाई 2003 को की गई थी और बाद में साक्षात्कारों की किताब लाउडर दैन बॉम्ब्स में प्रकाशित हुई थी. नीचे का परिचयात्मक नोट (संपादित) भी बार्सामियन का लिखा हुआ है. अनुवाद: रेयाज़ उल हक़
एदुआर्दो गालेआनो लातिन अमेरिका के सबसे असाधारण लेखकों, किस्सागो, पत्रकारों और इतिहासकारों में से एक हैं. ओपेन वेन्स ऑफ लातिन अमेरिका: फाइव सेंचुरीज ऑफ द पिलेज ऑफ अ कॉन्टीनेंट उनकी क्लासिक रचना है. उनकी दूसरी किताबों में बुक ऑफ एम्ब्रेसेज, वी से नो: क्रॉनिकल्स 1963-1991 और तीन खंडों में पुरस्कृत रचना मेमोरी ऑफ फायर शामिल हैं. इसके अलावा मिरर, वाकिंग वर्ड्स, सॉकर इन सन एंड शैडो, अपसाइड डाउन, डेज एंड नाइट्स ऑफ लव एंड वार, वायसेज ऑफ टाइम उनकी अन्य चर्चित किताबें हैं.

गालेआनो के उरुग्वाई नरम, सुस्त लहजे में कही गई बातों में धारदार बौद्धिकता के साथ-साथ काव्यात्मक संवेदना, काटती हुई चुटकियां और सामाजिक न्याय की प्रतिबद्धता मिली हुई है.

1940 में मोंतेविदेओ में जन्मे गालेआनो एक अद्भुत रचनाकार हैं. 13 साल की उम्र में वे एक स्थानीय समाजवादी साप्ताहिक में राजनीतिक टिप्पणियां और कार्टून प्रस्तुत करने लगे थे. बाद में वे विभिन्न पत्रिकाओं और अखबारों के संपादक बने जिनमें एपोका दैनिक भी शामिल है. 1973 में वे अर्जेंटीना में निर्वासन में चले गए जहां उन्होंने क्राइसिस पत्रिका की स्थापना की और उसका संपादन किया. वे 1976 से 1984 तक स्पेन में रहे और उसके बाद उरुग्वे लौटे.

मीडिया और उपभोक्तावाद के प्रखर आलोचन गालेआनो अपनी किताब वी से नो में लिखते हैं: ‘मास मीडिया हकीकत को उजागर नहीं करता. वह उसे छुपाता है. वह बदलाव लाने में मदद नहीं करता, वह बदलावों से बचने में मदद करता है. यह जनवादी भागीदारी को बढ़ावा नहीं देता. यह निष्क्रियता, चीजों को बरदाश्त करने और मतलबपरस्ती को बढ़ावा देता है. यह रचनात्मकता पैदा नहीं करता, यह उपभोक्ताओं को पैदा करता है.’

अपनी किताब डेज एंड नाइट्स ऑफ लव एंड वार में वे इसकी व्याख्या करते हैं कि वे क्यों लिखते हैं और क्या लिखते हैं: ‘कोई भी आदमी दूसरों तक अपनी बात पहुंचाने और उनसे जुड़ने के लिए लिखता है, वह दर्द पहुंचाने वाली चीजों को नकारने के लिए लिखता है और खुशी देने वाली चीजों को बांटने के लिए लिखता है. लोग अपने अकेलेपन के खिलाफ और दूसरों के अकेलेपन के खिलाफ लिखते हैं...चेतना को जगाने के लिए, पहचान को उजागर करने के लिए लिखते हैं- क्या साहित्य इस वक्त में बेहतर काम करने का दावा कर सकता है?’

गालेआनो अपने पाठकों को लातिन अमेरिका के दौरे पर ले चलते हैं, जो इसाबेल आयेंदे के मुताबिक ‘नक्शे पर एक बीमार दिल की शक्ल में उभरने वाला महाद्वीप है.’ उनकी कल्पनाशील लेखन शैली पूरे गोलार्ध में बीमारों को ऑक्सीजन मुहैया कराती है. मेमोरी ऑफ फायर के दूसरे खंड फेसेड एंड मास्क्स की शुरुआत इस मिथकीय तरीके से होती है:

‘नीला बाघ दुनिया को कुचल देगा. बिना शैतान और बिना मौत वाली दूसरी दुनिया इस दुनिया के विनाश से पैदा होगी. यह दुनिया यही चाहती है. यह पुरानी और नाखुश दुनिया मर जाना चाहती है, यह जन्म लेना चाहती है. बंद आंखों के पीछे रोते रहने से थक चुकी और अंधी हो चुकी यह दुनिया. मरने के करीब पहुंच चुकी यह दुनिया जल्दी-जल्दी दिनों को पार करती है, वक्त के अंबार को और रात को पीछे छोड़ते हुए. इसे सितारों की हमदर्दी हासिल है. जल्दी ही आदि पिता सुनेंगे कि दुनिया कुछ दूसरा होना चाहती है और तब निजात मिलेगी, अपने झूले में सो रहा नीला बाघ कूदेगा.’

सवाल: ओपेन वेन्स ऑफ लैटिन अमेरिका की दस लाख से ज्यादा प्रतियां बिकी हैं. इसका अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ है. इसे आपने तीन महीनों में लिखा था, जो कि असाधारण रूप से बहुत छोटी अवधि है. ऊर्जा के इस विस्फोट का स्रोत क्या था?

गालेआनो:  कॉफी. इस किताब का असली लेखक कॉफी है. मैंने समुद्ग के बराबर कॉफी पी, क्योंकि तब 1970 में सुबह के समय मैं मोंतेविदेओ में विश्वविद्यालय में काम करता था. मैं विश्वविद्यालय प्रकाशनों का संपादक था. दोपहर में मैं बतौर संपादक एक निजी प्रकाशक के यहां काम करता था जहां मुझे हर तरह की किताबों को फिर से लिखना और सुधारना पड़ता था. आप जितनी तरह की किताबों की कल्पना कर सकते हैं, उतनी तरह की किताबें, जैसे कि मच्छरों का यौन जीवन. तब शाम के सात या आठ बजे से लेकर सुबह के पांच या छह बजे तक मैं ओपेन वेन्स लिखता था. मैं तीन महीनों तक सोया नहीं. लेकिन यह तो कॉफी के गुणों का प्रचार था. इसलिए अगर आप वामपंथी नहीं बनना चाहते कॉफी से सतर्क रहें.

सवाल: लेकिन किताब के इतने लंबे समय तक लोकप्रिय बने की वजह क्या है?

गालेआनो: शायद अपनी ही पीड़ा से मजे लेने की प्रवृत्ति. मैं इसे समझ नहीं सकता. किताब उन पाठकों को खूब सारी ऐतिहासिक सूचनाएं मुहैया कराती है जो विशेषज्ञ नहीं हैं. मैंने ओपेन वेन्स में तथ्यों की खोज नहीं की है. मैंने इतिहास को फिर से ऐसी भाषा में लिखने की कोशिश की है जिसे कोई भी समझ सके. शायद इसीलिए किताब इतनी कामयाब हुई होगी. शुरुआत में तो यह बिल्कुल कामयाब नहीं थी. लेकिन बाद में इसने अपनी राह बनाई और चल निकली. यह आज भी चल रही है.

शायद किताब का केंद्रीय विचार ही इसके लिए संबल बन गया हो कि आप किसी बौने को गलती से बच्चा नहीं समझ सकते. उनका कद एक होता है लेकिन फिर भी वे पूरी तरह अलग होते हैं. इसलिए जब आप वह सब बातें सुनते हैं जो टेक्नोक्रेट विकासशील देशों के बारे में कहते हैं तो मानो वे बताना चाहते हैं कि हम पूंजीवाद के बचपन के दौर से गुजर रहे हैं, जो कि बिल्कुल ही सही नहीं है. लातिन अमेरिका विकास के रास्ते पर नहीं जा रहा है. यह विकास का नतीजा है, पिछली पांच सदियों के इतिहास का नतीजा है.

सवाल: पत्रिकाओं में लिखते हुए या विश्वविद्यालयों में पढ़ाते हुए आपका एक आरामदेह जीवन हो सकता था, लेकिन अरसा हुआ जब आपने बेआवाज लोगों की तरफ से मेहनत करने का फैसला किया.

गालेआनो: मुझे नहीं लगता कि ऐसा कोई है जो बेआवाज हो. हरेक आदमी के पास कहने के लिए कुछ होता है, कुछ ऐसा जो दूसरों द्वारा सुने जाने की काबिलियत रखता है. इसलिए मैं बेआवाजों की आवाज बनने के इस नजरिए से इत्तेफाक नहीं रखता. मसला यह है कि थोड़े से लोग हैं जिनको यह विशेष अधिकार हासिल है, कि उनको सुना जाता है. मैं एक शहीद नहीं हूं और न ही हीरो हूं.

हम सबको जानने का और अपनी बात कह पाने का अधिकार है, जो आजकल बहुत मुश्किल है. जब तक हम एक छुपी हुई तानाशाही के आदेशों को मानते रहेंगे, ऐसा ही रहेगा. यह एक शब्द, एक तसवीर, एक सुर की तानाशाही है और शायद यह दूसरी तानाशाहियों से अधिक खतरनाक है क्योंकि यह पूरी दुनिया के स्तर पर काम करती है. यह ताकत की अंतरराष्ट्रीय संरचना है जो उन सार्वभौम मूल्यों को थोपती है जो उपभोक्तावाद और हिंसा पर आधारित हैं. इसका मतलब यह है कि आप वो हैं जिसके आप मालिक हैं. अगर आपके पास कुछ नहीं है तो आप कुछ भी नहीं हैं. आपका अधिकार चीजों को खरीदने की आपकी क्षमता पर निर्भर करता है. आप उन चीजों द्वारा परिभाषित किए जाते हैं जिनको आपने खरीदा है. यह ऐसा है मानो आपको आपकी कार चला रही हो. आपको आपके सुपरमार्केट ने खरीद रखा हो. आप अपने टीवी के पर्दे द्वारा देखे जाते हों. आपका कंप्यूटर आपकी प्रोग्रामिंग करता हो. हम सब अपने औजारों के औजार हो गए हैं.

सवाल: इस चक्र का कोई अंत है?

गालेआनो: उपभोक्ता समाज अगर अपने मूल्यों को पूरी दुनिया पर थोप दे तो धरती का अंत हो जाए. हम इसे कबूल नहीं कर सकते. इस विनाश की कीमत चुकाने के लिए हमारे पास काफी हवा, धरती, या पानी नहीं है.
पूरे लातिन अमेरिका पर जो मॉडल थोप दिया गया है वह एम्सटर्डम या फ्लोरेंस या बोलोग्ना नहीं है. इन शहरों में कारें सड़कों की मालिक नहीं हैं. इन शहरों में बाइकें हैं, सार्वजनिक यातायात है और पैदल चलनेवाले लोग हैं. ये ऐसे शहर हैं, जिनको लोग अपना महसूस करते हैं. ये शहर एक साझी जगह मुहैया कराते हैं. ये ऐसे शहर हैं जिनका जन्म आदमी की मिलने की जरूरत से हुआ है. ‘मैं अपने दोस्त से मिलना चाहता हूं. मैं बाकी लोगों से मिलना चाहता हूं’ के नतीजे में इन शहरों की पैदाइश हुई है. आज शहर ऐसी जगहें हैं जहां मशीनें मशीनों से मिलती हैं. हम मनुष्य घुसपैठिए या बाहरी हो गए हैं.

और हम किस तरह का होना चाहते हैं? लॉस एंजेल्स की तरह, जहां कारों के पास आदमियों से ज्यादा जगह है. यह तो नामुमकिन सपना है. हम उनकी तरह नहीं हो सकते. अगर दुनिया भर में संयुक्त राज्य अमेरिका जितनी कारें हो जाएं कि हरेक आदमी के पास एक कार हो तो दुनिया खत्म हो जाएगी. हमने हवा में जहर घोल दिया है, धरती को जहरीला बना दिया है, पानी को जहरीला बना दिया है, आदमी की रूह में जहर भर दी है. हर चीज जहरीली हो गई है.

जब एक लातिन अमेरिकी राष्ट्रपति अपने भाषण में कहते हैं, ‘हम पहली दुनिया का हिस्सा बन रहे हैं,’ तो पहली बात तो यह है कि वे झूठ बोल रहे हैं. दूसरी, यह व्यावहारिक रूप से नामुमकिन है. और तीसरी बात यह है कि उनको जेल में होना चाहिए क्योंकि यह अपराध के लिए उकसाना है. अगर आप कहते हैं, ‘मैं चाहता हूं कि मोंतेविदेओ लॉस एंजेल्स बन जाए,’ तो आप दरअसल मोंतेविदेओ के विनाश को बुलावा दे रहे हैं.

सवाल: संयुक्त राज्य में काफी सारे लोग जब लातिन अमेरिका के बारे में सोचते हैं तो दूर दूर तक फैले एक समुद्रतट (बीच), एक खेल के मैदान, कानकुन और आकापुल्को से लेकर कोपाकाबाना और मार देल प्लाता को देखते हैं. या फिर वे एक खतरनाक और डरावने चेहरे को देखते हैं: नशीली दवाओं के तस्कर, वामपंथी गुरिल्ला, झुग्गी और झोपड़ियां. लातिन अमेरिका को लेकर संयुक्त राज्य के इस रवैए के बारे में आपका क्या कहना है?

गालेआनो: मैं जब भी संयुक्त राज्य आता हूं, मैं यहां की आबादी के एक बहुत बड़े हिस्से की अज्ञानता को देख कर हैरान रह जाता हूं. उनको लातिन अमेरिका के बारे में या दुनिया के बारे में लगभग कुछ पता नहीं है. संयुक्त राज्य की सीमाओं के बाहर होने वाली चीजों से वे बिल्कुल ही अंधे-बहरे हैं.

मैं कई बरस पहले स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय में प्रोफेसर था. एक बार मैं एक बुजुर्ग प्रोफेसर के साथ टहल रहा था, जो एक अहम और सभ्य आदमी थे. अचानक उन्होंने मुझसे पूछा, ‘आप कहां से आए हैं?’

मैंने कहा, ‘उरुग्वे.’

उन्होंने कहा, ‘उरुग्वे?’

जैसे ही मैंने जाना कि कोई नहीं जानता कि उरुग्वे कहां है, मैंने जल्दी से बात का विषय बदलने की कोशिश की और किसी और चीज पर बात करने लगा.

लेकिन वे इतने भले थे कि उन्होंने कहा, ‘खैर, हम वहां बहुत भयानक काम कर रहे हैं.’

अचानक मुझे समझ में आया कि वे ग्वातेमाला के बारे में बोल रहे थे, क्योंकि द न्यू यार्क टाइम्स ने हाल ही में ग्वातेमाला में सीआईए की गतिविधियों के बारे में कुछ लेख प्रकाशित किए थे.

मैंने कहा, ‘नहीं, यह तो ग्वातेमाला है.’

‘ओह, ग्वातेमाला.’

‘हां, ग्वातेमाला.’

संयुक्त राज्य के बाहर होनेवाली घटनाओं के बारे में यह अज्ञानता भारी सुरक्षा के भाव से जुड़ी है. फौजी ताकत जो कुछ चाहती है वह इसलिए कर सकती है क्योंकि लोग नहीं जानते कि कोसोवो कहां है या इराक या ग्वातेमाला या एल साल्वादोर कहां हैं. और मिसाल के लिए उन्हें नहीं पता कि न्यू यार्क की स्थापना के सदियों पहले बगदाद में दस लाख लोग रहते थे और दुनिया की महानतम संस्कृतियों में से एक वहां बसती थी.

यही बात ‘हमारे’ अमेरिका के लिए सही है. दूसरा अमेरिका, हम मास्टर्स वाइस की अनुगूंज नहीं हैं.

सवाल: या फिर उसके शरीर की परछाईं.

गालेआनो: लातिन अमेरिका के शासक वर्ग भी परछाईं और अनुगूंज बनने के सपने देखते हैं. मैं हमेशा कहता हूं कि लातिन अमेरिका का सबसे बदतर गुनाह बेवकूफी का गुनाह है, क्योंकि हम अपनी ही हास्यास्पद तसवीर देख कर मजे लेते हैं. मिसाल के लिए, जब मैं यहां संयुक्त राज्य अमेरिका में लातिन अमेरिकियों से मिलता हूं तो वे कहते हैं, ‘अब मैं अमेरिका में हूं.’ आह, अब आप अमेरिका में हैं, क्योंकि आप संयुक्त राज्य में हैं. इसके पहले आप कहां थे? ग्रीनलैंड में? एशिया में? जापान में? हमने एक ऐसा आइना देख रहे हैं जो हमारा अपमान करता है और हमसे नफरत करता है और उसे देखते हुए हमने अपने बारे में विकृत नजरिए को ही अपना लिया है.

सवाल: आपने गरीबी की नाइंसाफी के बारे में लिखा है.

गालेआनो: इस दुनिया में नाइंसाफी इतने बड़े पैमाने पर है. भौतिक अर्थों में अमीरों और गरीब लोगों के बीच का फर्क, दूरी इन तीस सालों में कई गुना बढ़ गई है, जब से मैंने ओपेन वेन्स लिखी है.

आखिरी संयुक्त राष्ट्र रिपोर्ट बताती है कि 1999 में 225 की संपत्ति पूरी मानवता की कुल आमदनी का आधा है. यह रोटियों और मछलियों का नाइंसाफी भरा बंटवारा है.

लेकिन इसी समय दुनिया में एक समान आदतें थोपी जा रही हैं. हम वैश्विक एकीकरण को कबूल कर लेने को मजबूर किए गए हैं, जो कि एक तरह से पूरी दुनिया का मैक्डोनॉल्डीकरण है. इस दुनिया में जितनी तरह की दुनियाएं बसती हैं, उनके खिलाफ यह एक प्रकार की हिंसा है. अमूमन मैं कहता हूं कि मैं दो संभावनाओं में से चुनने की मजबूरी के विचार को खारिज करता हूं: या तो आप भूख से मरते हैं या उदासी से. हम इसे रोज ब रोज व्यवहार में लाते हैं- और हम इस पर गौर नहीं करते क्योंकि यह अदृश्य है, यह छुपी हुई है- यह अलग-अलग तरह का होने की क्षमताओं, जीवन जीने, जश्न मनाने, नाचने, सपने देखने, पीने, सोचने और महसूस करने के इतने सारे तरीकों की सामूहिक हत्या है. यह एक वर्जित इंद्रधनुष है. अब हम एक ही रास्ता अपनाए जाने के लिए अधिक से अधिक बाध्य किए जा रहे हैं. और यह अकेला रास्ता मुख्यत: संयुक्त राज्य के कारखानों में उत्पादित होता है.

सवाल: आपने अपनी शुरुआती उम्र में ही रेडिकल राजनीति अपना ली थी. क्या यह परिवार के असर की वजह से था?

गालेआनो: नहीं, यह मेरे कलेजे की वजह से था. शायद मैं अभी भी नाराजगी को संगठित करने की कोशिश कर रहा हूं. मेरा दिमाग, जो कि बहुत तेज नहीं है, कई बार मुझे अपनी भावनाओं को संगठित करने में उपयोगी साबित होता है. उनसे मायने निकालता है, लेकिन इस प्रक्रिया में मैं भावनाओं से विचारों की तरफ जाता हूं. मैं इसका उलटा रास्ता नहीं अपनाता.

हरेक चीज की तरह राजनीति में जो मैं सोचता हूं और जो मैं महसूस करता हूं उसके बीच हमेशा एक नामुमकिन लेकिन इच्छित जुड़ाव की तलाश करता हूं. इसका मकसद एक ऐसी भाषा को विकसित करना, उसे जीतना, उसे हासिल करना और खोजना है जो एक ही साथ भावनाओं और विचारों को अभिव्यक्त करने में सक्षम हो. एक ऐसी भाषा, जिसे कैरिबियाई तट के छोटे से शहर के कोलंबियाई ‘फील-थिंकिग लैंग्वेज’ (सोचने को महसूस करने वाली भाषा) कहते हैं. यह ऐसी भाषा है जो उन सारी चीजों को फिर से एक कर सकने में सक्षम है जिसे प्रभुत्वशाली संस्कृति ने अलग कर दिया है. यह प्रभुत्वशाली संस्कृति हमेशा जिस चीज को छूती है उसे टुकड़ों में तोड़ देती है. आपके विचारों के लिए अलग भाषा है और भावनाओं के लिए अलग. दिल और दिमाग अलग कर दिए गए हैं. इसी तरह सार्वजनिक भाषण और निजी जीवन भी. इतिहास और वर्तमान भी अलग कर दिए गए हैं.

सवाल: आपका कहना है कि इतिहास किसी संग्रहालय में रखी परीकथा नहीं है.

गालेआनो: आधिकारिक इतिहास तो संग्रहालय में रखी एक परीकथा ही है, कभी-कभी तो एक दानवकथा भी है. लेकिन मैं यादों में यकीन रखता हूं, इसलिए नहीं कि यह ऐसी जगह हैं जहां हमें पहुंचना है, बल्कि ये वो जगह है जहां से हमें अपने सफर की शुरुआत करनी है. यह वो गुलेल है जो आपको वर्तमान में फेंकती है, आपको भविष्य के बारे में कल्पना करने में सक्षम बनाती है न कि उसे ज्यों का त्यों कबूल करने पर मजबूर करती है. अगर इतिहास महज मरे हुए लोगों, मरे हुए नामों, मरे हुए तथ्यों का जमघट होता तो मेरे लिए तो यह पूरी तरह नामुमकिन होता कि मैं इतिहास से कोई रिश्ता बना पाता. इसीलिए मैंने मेमोरी ऑफ फायर वर्तमान काल का उपयोग करते हुए लिखी, जिसमें मैंने हर घटना को सजीव रूप में रखने की कोशिश की है ताकि पाठक जब उसे पढ़े तो वे घटनाएं फिर से घटें और वह उन घटानाओं को जी सके.

सवाल: आपकी मेमोरी ऑफ फायर त्रयी परंपरागत इतिहास से एक नाटकीय प्रस्थान है. आपने कविता, खबरों और विद्वत्ता का मिश्रण पेश किया है. ऐसा करने की आपको प्रेरणा कहां से मिली?

गालेआनो: मैंने आत्माओं की सरहदों को कभी कबूल नहीं किया, न ही मैंने लिखने की कला की सरहदों को स्वीकार किया. जब मैं बच्चा था तो मेरी पढ़ाई कैथोलिक तरीके से हुई थी. मुझे यह मान लेना सिखाया गया था कि शरीर और आत्मा आपस में दुश्मन होती हैं. कि ‘ब्यूटी एंड द बीस्ट’ की कहानी की तरह शरीर पाप, अपराध, आनंद, और आत्मा के संक्रमण स्रोत था.

मेरे लिए इस विचार को, इस अलगाव को अपने भीतर उतारना बहुत मुश्किल था. मैंने अपने भीतर वास्तव में जो महसूस किया और एक खुली हुई सच्चाई के रूप में ईश्वर की तरफ से जो मेरे सामने आता रहा था, उसके बीच के अंतर्विरोध पर मैंने हमेशा गौर किया. तब मैं ईश्वर में यकीन करता था और मानता था कि वो मुझमें यकीन रखता है. और इसलिए इस अंतर्विरोध के साथ जीना आसान नहीं था.

जब मैं दस या ग्यारह साल का था, मेरे सामने एक भयानक संकट आया. मैंने अपने शरीर को लेकर एक अपराधबोध के आतंक को महसूस किया, जो मेरे ख्याल से इस तथ्य के साथ जुड़ी थी कि मेरी यौनिकता विकसित हो रही थी. मेरा शरीर मेरे लिए नरक का स्रोत था, मुझे नर्क में ले जा रहा था. अब मैं इसे कबूल करता हूं. मैं अब इसे अच्छी तरह से जानता हूं कि मैं नर्क में जानेवाला हूं, और गर्म उष्णकटिबंधीय देशों ने मुझे नर्क की लपटों को बरदाश्त करने के लिए तपाया है. अब यह उतना भयावह नहीं होगा.

जब मैंने लिखना शुरू किया, मैंने महसूस किया कि मुझे लेख और कथेतर लेखन को कविता या कहानियों या उपन्यासों जैसी दूसरी विधाओं से अलग करने वाली सीमा का सम्मान करना था.

मुझे इसे तरह के श्रेणीकरण से नफरत है. इस दुनिया में वर्गीकरण की एक सनक है. हम सबके साथ कीड़ों की तरह व्यवहार होता है. हमारे चेहरों पर एक लेबल होना चाहिए. अनेक पत्रकार कहते हैं, ‘आप एक राजनीतिक लेखक हैं, ठीक?’ मुझे बस मानव इतिहास से एक ऐसे लेखक का नाम बता दीजिए जो राजनीतिक नहीं था. हम सब राजनीतिक हैं, यहां तक कि हम नहीं जानते कि हम राजनीतिक हैं.

मैं महसूस करता हूं कि मैं सीमाओं का उल्लंघन कर रहा हूं, और मैं हर बार खुशी महसूस करता हूं कि मैं ऐसा कर सकता हूं. मैं कल्पना करता हूं कि मुझे लेखक के बजाए तस्कर होना चाहिए था, सीमाओं के ऐसे उल्लंघन के मजे की वजह से, असल में अपने भीतर के तस्कर और पापी को उजागर करने की वजह से.

सवाल: हाल ही में आपने लान्नान फाउंडेशन की तरफ से पुरस्कार हासिल किया है, जिसे इंटरनेशनल टेलीफोन एंड टेलीग्राफ (आइटीटी) के एक पूर्व निदेशक के फंड से स्थापित किया गया था. आईटीटी एक बहुराष्ट्रीय निगम है जिसकी आपने अपने लेखन में बहुत आलोचना की है और जिसकी चिले में सल्वादोर आयेंदे के तख्तापलट में प्रमुख भूमिका रही थी.

गालेआनो: मैंने आईटीटी से पुरस्कार नहीं लिया है. मुझे पुरस्कार लान्नान फाउंडेशन से मिला है.

सवाल: लेकिन इसका पैसा तो वहीं से आता है.

गालेआनो: यह नर्क से स्वर्ग का एक अच्छा सफर है.

सवाल: आपको क्यों लगता है कि संयुक्त राज्य इतना हिंसक समाज है?

गालेआनो: मैं नहीं कहूंगा कि संयुक्त राज्य एक हिंसक समाज है. यहां सुंदरता और लोकतंत्र की उर्जा भी है. मैं यह कहते हुए अपने ही जाल में नहीं फंसूंगा कि ‘दुनिया की सबसे बुरी चीज संयुक्त राज्य है.’ यह कहना तो बहुत आसान होगा. असलियत कहीं अधिक जटिल है.

यहां हिंसा की संस्कृति है, सारी चीजों में गहरे तक पैठती हुई फौजी संस्कृति जो सब पर अपने निशान छोड़ रही है. यह जिसको छूती है उसको संक्रमित करती हुई फैल रही है. मिसाल के लिए आपका मनोरंजन उद्योग है जिसमें हिंसा भरी हुई है. टीवी और बड़े परदों पर खून का समुद्र ठांठें मार रहा है. हर चीज हर समय धमाके करती रहती है- कारें, लोग. यह एक तरह की सारी चीजों की लगातार जारी बमबारी है. मनोरंजन उद्योग कहता है, ‘हम इसके दोषी नहीं हैं. हिंसक यथार्थ ही फिल्मों और टीवी के आइने में दिख रहा है. हम हिंसा का आविष्कार नहीं कर रहे हैं. हिंसा सड़कों से आ रही हं.’ लेकिन इस चक्र में मीडिया का भी प्रभाव पड़ता है.

इसलिए शायद युगोस्लाविया और लिटलटन, कोलोरादो के बीच कोई संबंध है. दोनों ही हिंसा की समान संस्कृति की अभिव्यक्तियां हैं. शांति के नाम पर युद्ध लड़े जा रहे हैं और फौजी कार्रवाइयों को मानवतावादी अभियान कहा जा रहा है. हम खबरों, फिल्मों और सड़कों पर रोज ब रोज हिंसा देखते हैं.

दुनिया एक हिंसक जगह है. और अगर एक गरीब आदमी कुछ चुरा लेता है या अपहरण करता है या मार देता है तो इसकी निंदा करना बहुत आसान है. लेकिन इसकी जड़ों की तलाश करना और उस व्यवस्था की निंदा करना इतना आसान नहीं है जो अपराधों और नशीली दवाओं के इस्तेमाल की वजह है. हरेक दिन हरेक आदमी बहुत सारा आक्रोश और गुस्सा पी रहा है.

सवाल: पेंटागन की भूमिका के बारे में क्या कहेंगे?

गालेआनो: संयुक्त राज्य का फौजी बजट बेतुका है. आखिर दुश्मन कौन है? यह पश्चिमी फिल्म की तरह है. आपको एक खलनायक चाहिए होता है. अगर वह नहीं हो तो आप उसका आविष्कार कर लेते हैं. संयुक्त राज्य में आपको नए-नए खलनायकों की जरूरत होती है. सुबह में सद्दाम हुसैन तो दोपहर में मिलोसेविक. लेकिन आपको एक बुरा आदमी चाहिए ही. अगर लड़ने के लिए शैतान नहीं हो तो बेचारे ईश्वर का क्या होगा!

इस सिर के बल खड़ी दुनिया की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक यह है कि जिन पांच देशों ने शांति कायम करने का ठेका ले रखा है वही दुनिया में हथियारों के पांच सबसे बड़े उत्पादक देश भी हैं. दुनिया के हथियारों में लगभग आधे संयुक्त राज्य में बनते हैं, जिसके बाद ग्रेट ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और चीन का नंबर है. ये वे देश हैं जिनको संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वीटो की ताकत भी मिली हुई है. संयुक्त राष्ट्र का जन्म दुनिया में शांति लाने के लिए हुआ था लेकिन शांति के पवित्र, सुंदर और काव्यात्मक मकसद वाले पांचों देश युद्ध का कारोबार चलाने वाले देश भी हैं.

उरुग्वे संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में है. यह सभा पूरी तरह प्रतीकात्मक है. आम सभा सुझाव दे सकती है, लेकिन फैसले इन पांच देशों द्वारा लिए जाते हैं, जिनका दुनिया पर कब्जा है और जो उसे नियंत्रित करते हैं.

बीसवीं सदी युद्धों की सदी थी- करीब 10 करोड़ लोग मारे गए. यह लोगों की बहुत बड़ी संख्या है- बहुत बड़ी संख्या. हर बार जब मैं युगोस्लाविया, इराक, अफ्रीका और कहीं किसी और जगह युद्ध के बारे में सुनता हूं, हमेशा मैं एक ही सवाल पूछता हूं, जिसका जवाब मुझे कभी नहीं मिला: ‘हथियार कौन बेच रहा है? इस मानवीय त्रासदी से मुनाफा कौन कमा रहा है?’ मुझे मीडिया में कभी इसका जवाब नहीं मिला और यही वह मुख्य सवाल है, जिसे आपको तब पूछना चाहिए जब आप युद्ध के बारे में सुनते हैं. हथियार कौन बेच रहा है? वही पांच प्रभुत्वशाली देश जिन्होंने शांति का ठेका ले रखा है. यह भयावह है, लेकिन यही हकीकत है.

सवाल: हम आदिवासी लोगों से क्या सीख सकते हैं?

गालेआनो: बहुत कुछ. सीखने लायक पहली बात है प्रकृति के साथ बेफिक्री. वरना आप पर्यावरण का बागबानी के साथ घालमेल कर देंगे. आप भू-दृश्य को प्रकृति समझने लगेंगे. प्रकृति का मतलब है आप, मैं. हम प्रकृति का हिस्सा हैं, इसलिए प्रकृति के खिलाफ किया गया कोई भी अपराध मानवता के खिलाफ किया गया अपराध है. लेकिन मैं इस नजरिए से सहमत नहीं हूं कि हम खुदकुशी कर रहे हैं, क्योंकि मैं खुदकुशी नहीं कर रहा हूं. इनसानी आबादी का महज 20 प्रतिशत हिस्सा प्राकृतिक संसाधनों को बरबाद कर रहा है और धरती को जहरीला बना रहा है, 80 प्रतिशत लोग इसके नतीजे भुगत रहे हैं.

कभी-कभी जब राजनीतिक नेता दिल पर हाथ रख कर कहते हैं, ‘हम खुदकुशी कर रहे हैं,’ तो वे दुनिया के सबसे मुनाफा देने वाले उद्योगों द्वारा किए गए अपराधों का हवाला दे रहे होते हं. जो जितना ज्यादा नुकसान पहुंचाता है वह उतना ज्यादा मुनाफा कमाता है. और वे सब ग्रीन (पर्यावरण के संरक्षक) हैं. जब मैं नौजवान था, वादियां हरी थीं, मजाक हरे थे और लड़कियों की चाहत लिए बूढ़े हरे थे. अब हर कोई ग्रीन है. विश्व बैंक ग्रीन है. अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष ग्रीन है. रसायन उद्योग ग्रीन है. ऑटोमोबाइल उद्योग ग्रीन है. यहां तक कि सैन्य उद्योग भी ग्रीन है. हर कोई ग्रीन है.

यह दिलचस्प है क्योंकि सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दियों में जब यूरोप ने अमेरिका को जीता, बहुत सारे इंडियेन लोगों को इसलिए सजा दी गई थी या जिंदा जला दिया गया था कि वे मूर्तिपूजा का गुनाह कर रहे थे. वे प्रकृति से प्यार कर रहे थे.

आज ताकतवर व्यवस्था प्रकृति को ऐसी बाधा नहीं मानती कि मुनाफा हासिल करने के लिए जिस पर काबू पाना चाहिए. प्रकृति पर विजय हासिल करना, प्रकृति को पराजित किए जाने योग्य मानना- यह पुरानी भाषा थी. अब नई भाषा प्रकृति को संरक्षित करने के बारे में है. लेकिन दोनों ही मामलों में भाषा अलगाव को उजागर करती है. हम, इनसान और प्रकृति, भिन्न हैं.

इंडियन संस्कृति से हमें जुड़ाव का गहरा बोध सीखने की जरूरत है. यह ऐसी चीज है, जिसे ईश्वर को टेन कमांडमेंट्स में शामिल करना चाहिए. यह ग्यारहवां कमांडमेंट होता: ‘तुम्हें प्रकृति से प्यार करना चाहिए, तुम जिससे जुड़े हुए हो.’

सवाल: सोवियत संघ के ध्वंस पर आपकी प्रतिक्रिया क्या थी?

गालेआनो: मैंने कभी भी खुद को सोवियत संघ के कथित समाजवाद से जुड़ा हुआ महसूस नहीं किया. मुझे हमेशा महसूस हुआ कि यह बिल्कुल भी समाजवाद था ही नहीं. वहां नौकरशाही काम करती थी, जिसका जनता से कोई संबंध नहीं था. वे जनता के नाम पर काम करते थे, लेकिन उन्होंने जनता को तिरस्कृत कर दिया था. वे अपने सभी भाषणों में और सारी आधिकारिक भाषा में जनता को सम्मान देते थे, लेकिन वे जनता से अल्पसंख्यक के बतौर या बच्चों या भेड़ों के बतौर पेश आते थे.

इसलिए सोवियत संघ के ढह जाने पर मुझे नहीं लगा कि समाजवाद मर गया है. इसका ढह जाना इतनी आसानी से हुआ कि यह देखने लायक था: लगभग कोई खून-खराबा नहीं हुआ, कोई आंसू नहीं, कुछ भी नहीं. लेकिन समाजवाद नहीं मरा था क्योंकि इसका जन्म ही नहीं हुआ था. यह ऐसी चीज है, जिसके बारे में मैं उम्मीद करता हूं कि शायद मानवता उसे खोज लेगी.

गरीब देशों के नजरिए से, दुनिया की परिधि पर मौजूद देशों के नजरिए से देखें तो मौजूदा हालात पहले से बदतर हैं क्योंकि सोवियत संघ था तो कम से कम एक निश्चित शक्ति संतुलन था. अब यह शक्ति संतुलन गायब हो गया है और हमारे पास विकल्प नहीं हैं. आजादी के साथ काम करने की संभावनाएं घटी हैं.

सवाल: क्या उम्मीद के कुछ ऐसे संकेत हैं, जिनकी तरफ आप इशारा कर सकते हैं?

गालेआनो: अमेरिका और मैक्सिको के भीतर उम्मीद के बहुत सारे संकेत हैं, दूसरे देशों के भीतर भी. बहुत सारे आंदोलन हैं, लेकिन मीडिया में उनके बारे में कोई खोज-खबर नहीं है. वे कमोबेश खुफिया हैं क्योंकि वे स्थानीय स्तर पर काम करते हैं. कभी-कभी तो वे बहुत छोटे होते हैं. लेकिन वे जवाब लिये हुए होते हैं, वे एक भिन्न दुनिया की तलाश में हैं और मौजूदा दुनिया को अपनी नियति के रूप में कबूल नहीं करते हुए वे इसे एक चुनौती के बतौर जी रहे हैं. बहुत सारे छोटे-छोटे आंदोलन हैं जो हर कहीं मानवाधिकारों के लिए, लैंगिक भेदभाव के खिलाफ, नाइंसाफी के खिलाफ, बच्चों के उत्पीड़न के खिलाफ और खेती के गैर नुकसानदेह तरीकों को बचाए रखने और उन्हें विकसित करने के लिए चल रहे हैं.

मैक्सिको में एल बारसोन नाम का एक लोकप्रिय आंदोलन है. मैक्सिको के बाहर इसे कोई भी नहीं जानता, लेकिन यह बहुत महत्वपूर्ण है. यह एक स्वत:स्फूर्त आंदोलन है जो मैक्सिको के बैंकों के दबाव का प्रतिरोध करने की जरूरत से जन्मा है. शुरुआत में यह सौ-एक लोगों से बड़ा आंदोलन नहीं था, जो लालची वित्तीय ताकतों से अपनी चीजें बचा रहे थे- अपने घर, अपना बिजनेस, अपने खेत. लेकिन यह बड़ा और बड़ा होता गया और अब इसमें दस लाख से अधिक लोग हैं. वे अब इतने अहम हो गए हैं कि जब एल बारसोन का एक प्रतिनिधिमंडल वाशिंगटन गया तो उसका स्वागत अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष के उपाध्यक्ष ने किया. मेरा अंदाजा है कि ऐसे महत्वपूर्ण आदमी ने जो अपनी बीवी से भी बात नहीं करता, एल बारसोन का स्वागत किया.

ढेर सारे आंदोलन हैं जो हमसे कह रहे हैं कि उम्मीद मुमकिन है. आनेवाला कल आज का ही एक दूसरा नाम नहीं होगा.

सवाल: आपने उपकार (चैरिटी) और एकता (सोलिडेरिटी) में फर्क दिखाया है.

गालेआनो: मैं उपकार में यकीन नहीं करता. मुझे एकता में यकीन है. उपकार सिर पर खड़ा होता है, इसलिए यह अपमानजनक है. यह ऊपर से नीचे आता है. एकता बराबरी के स्तर पर होती है. यह दूसरों का सम्मान करती है और दूसरों से सीखती है. मैंने दूसरे लोगों से बहुत कुछ सीखा है. हर दिन मैं सीख रहा हूं. मैं एक जिज्ञासु इनसान हूं, हमेशा दूसरे लोगों को पढ़ता रहता हूं, उनकी आवाजें, उनके रहस्य, उनकी कहानियां, उनके रंग. मैं उनके शब्द चुराता हूं, शायद मुझे गिरफ्तार किया जाना चाहिए.

सवाल: आप ‘आब्रिगार एस्पेरांसास’ (abrigar esperanzas) के बारे में समझाएंगे?

गालेआनो: आब्रिगार एस्पेरांसास उम्मीद कायम रखने की एक खूबसूरत स्पेनी अभिव्यक्ति है. उम्मीद को बचाए रखने की जरूरत होती है.

सवाल: इसलिए कि यह कमजोर होती है?

गालेआनो: वो कमजोर होती है और थोड़ी नाजुक. लेकिन वह जिंदा होती है. मेरा एक दोस्त है जो कहता है, ‘मैं पूरी तरह नाउम्मीद हूं, मुझे किसी चीज में यकीन नहीं है.’ लेकिन आप जीते रहते हैं. ऐसा कैसे होता है? मैं उम्मीद करता हूं कि मैं कभी उम्मीद नहीं खोऊंगा, लेकिन अगर वह दिन आता है जब मुझे यकीन है कि अपेक्षा करने के लिए, भरोसा करने के लिए मेरे पास कुछ नहीं होगा, और इनसानी हालात मूर्खता और अपराध को अभिशप्त होंगे, तब मैं उम्मीद करता हूं कि मैं इतना ईमानदार होऊंगा कि मैं खुद को मार सकूं. बेशक, मैं जानता हूं कि इनसानी हालात ऐसी चीज है जो एक ही साथ भयावह भी है और शानदार भी. हमारी बनावट बहुत बुरी है लेकिन हम खत्म नहीं हुए हैं.

गोमांस उत्सव और खान-पान की आदतों की राजनीति

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/21/2012 05:28:00 PM

राम पुनियानी ने अपने इस लेख में खान-पान की आदतों के राजनीतिक पहलुओं पर विचार करते हुए उन सांप्रदायिक ब्राह्मणवादी हमलों की निंदा की है, जो भारतीय समाज में मौजूदा उत्पीड़नकारी जातिवादी संबंधों की हिफाजत करते हैं और अल्पसंख्यकों, दलितों, आदिवासियों के जनवादी अधिकारों का उल्लंघन करते हैं. खाने-पीने की आदतों के चयन का अधिकार भी इन्हीं जनवादी अधिकारों में आता है. साथ में वे यह भी दिखाते हैं कि किस तरह गाय की पवित्रता का पूरा पाखंड वास्तव में ब्राह्मणवाद को चुनौती देने वाली विचारधाराओं और समुदायों को बदनाम करने और उन पर हमले करने के लिए रचा गया है. हमारा मानना है कि खानपान की आजादी का सवाल देश के उत्पीड़क तबके (दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों, पिछड़ों, स्त्रियों) की मुक्ति के सवाल से जुड़ा हुआ है और इस मामले के समाधान की तरफ बढ़ते हुए इस व्यापक संघर्ष को अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए.

खान-पान की आदतों की राजनीति

पिछले माह (अप्रैल, 2012) के मध्य में हैदराबाद के उस्मानिया विश्वविद्यालय में गौमांस भक्षण के मुद्दे पर अनापेक्षित हिंसा हुई। विश्वविद्यालय के दलित छात्रों का एक तबका लंबे समय से मांग कर रहा था कि होस्टलों के मेन्यू में गौमांस शामिल होना चाहिए। उन्होंने एक “गौमांस उत्सव“ का आयोजन भी किया जिसमें बड़ी संख्या में विद्यार्थियों ने गौमांस बिरयानी का सेवन किया। यह उत्सव ज्यादा देर न चल सका। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की छात्र शाखा) के कार्यकर्ताओं ने तूफान मचा दिया। एक छात्र पर चाकू से हमला किया गया, एक बस में आग लगा दी गई और विश्वविद्यालय में अफरातफरी और हिंसा का माहौल बना दिया गया। गौभक्तों के आक्रामक तेवरों के आगे उस्मानिया विश्वविद्यालय के कुलपति ने घुटने टेक दिए। उन्होंने घोषणा की कि होस्टलें के मेन्यू में गौमांस को शामिल नहीं किया जाएगा।

इसके लगभग एक माह पूर्व, हैदराबाद के करमागुड़ा इलाके में एक हिन्दू साम्प्रदायिक संगठन से जुड़े युवाओं ने एक हनुमान मंदिर में गौमांस के लोथड़े फेंक दिए। इसके बाद यह अफवाह उड़ा दी गई कि यह मुसलमानों की कारगुजारी है। असहाय मुसलमानों को हिंसा का जमकर निशाना बनाया गया। कुछ बसों को आग के हवाले कर दिया गया। बाद में असली दोषियों का पता लगा और वे गिरफ्तार भी हुए। कुछ महीनों पहले, मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार ने एक नया कानून बनाकर राज्य में गौमांस भक्षण पर प्रतिबंध लगा दिया। कई अन्य भाजपा-शासित प्रदेशों में गौहत्या पर पहले से ही प्रतिबंध है और कुछ राज्यों में ऐसा प्रतिबंध लगाने की तैयारी चल रही है।

गुजरात, जहां नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में हजारों मुसलमानों को बेरहमी से कत्ल कर दिया गया था, में एक कदम और बढ़कर गौमाताओं के मोतियाबिन्द और दांतों की सर्जरी की व्यवस्था की गई है। गुजरात के हिन्दू राष्ट्र की सरकार का इरादा राज्य में जगह-जगह मोतियाबिन्द और दांत संबंधी समस्याओं से ग्रस्त गौमाताओं के इलाज के लिए केन्द्र स्थापित करने का है। सरकार ने घोषणा की है कि गौमाता को इन चिकित्सकीय सेवाओं का लाभ लेने के लिए तीन किलोमीटर से अधिक पैदल न चलना पड़े, यह सुनिश्चित किया जाएगा। यह वही गुजरात सरकार है जो दंगों के आतंक के साये से अब तक न उबर सके अल्पसंख्यकों के इलाज और उनकी अन्य मूलभूत ज़रूरतों की पूर्ति के लिए कुछ नहीं कर रही है।

जो कानून बनाए जा रहे हैं और उनका जिस ढंग से प्रचार-प्रसार किया जा रहा है उसका एकमात्र उद्देश्य मुसलमानों का दानवीकरण करना है-यह दर्शाना है कि मुसलमान उस गाय को काटते और खाते हैं जो हिन्दुओं के लिए माता के समान पूजनीय है। उस्मानिया विश्वविद्यालय का घटनाक्रम गाय की राजनीति के सिक्के का दूसरा पहलू है। हममें से कुछ को यह अवश्य याद होगा कि हरियाणा के झज्जर में दलितों की इसलिए हत्या कर दी गई थी क्योंकि उन्होंने एक मृत गाय की खाल उतारने से इंकार कर दिया था। उस समय विहिप ने कहा था कि हिन्दुओं के लिए गाय की सुरक्षा और संरक्षण, दलितों की जान से ज्यादा महत्वपूर्ण है। विहिप को दलितों की हत्या पर कोई रंज नहीं था। यद्यपि दलित भी गाय की राजनीति के शिकार हैं तथापि इसका मुख्य निशाना मुसलमान ही हैं। संघ परिवार के विभिन्न सदस्य इस मुद्दे को लेकर समय-समय पर अल्पसंख्यक समुदाय पर निशाना साधते रहे हैं।

दलितों और मुसलमानों को खलनायक सिद्ध करने की कोशिश केवल हिन्दू “अस्मिता“ का मुद्धा नहीं है। इसका संबंध दलितों-आदिवासियों की खानपान की आदतों और उनकी जीवनशैली से भी है। संघ परिवार, ब्रिटिश शासनकाल से ही गाय पर राजनीति करता रहा है। गाय, सैकड़ों साल से उच्च जाति के हिन्दुओं का नीची जातियों का दमन करने का हथियार रही है। बौद्ध धर्म के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला करने के लिए ब्राहम्णवादी हिन्दुओं ने गाय के प्रतीक का इस्तेमाल किया था। कुछ दलित विद्वानों का कहना है कि बौद्ध धर्म से मुकाबला करने के लिए गाय के प्रतीक का चयन अत्यंत धूर्ततापूर्ण था। भैंस भी मानवमात्र के लिए गाय के बराबर उपयोगी थी परंतु उसे इसलिए नहीं चुना गया क्योंकि उसका रंग काला होता है। यह मात्र संयोग नहीं है कि काली चमड़ी वाले लोग भारत ही नहीं पूरे विष्व में प्रभुत्वशाली वर्ग के दमन के शिकार रहे हैं। वैदिक भारतीय इतिहास के उद्भट विद्वान प्रोफेसर डी. एन. झा व डाक्टर पाडुंरंग वामन काने एवं सामाजिक न्याय के पुरोधा डाक्टर भीमराव अम्बेडकर का स्पष्ट मत है कि वैदिक काल में हिन्दू गौमांस भक्षण करते थे। कृषि-आधारित समाज के उदय के साथ पशुधन का संरक्षण करने की ज़रूरत उत्पन्न हुई। नतीजे में जैन और बौद्ध धर्मों व अन्य कई पंथों ने अहिंसा को अपना ध्येयवाक्य घोषित कर दिया और यज्ञों में गाय की बलि चढ़ाने को अधार्मिक व पाप बताया जाने लगा।

वर्तमान साम्प्रदायिक राजनीति के एजेन्डे में दो मुख्य मुद्दे हैं। पहला है अल्पसंख्यकों का दमन। इसके लिए भगवान राम और गाय जैसे भावनात्मक मुद्दों को उछालकर अल्पसंख्यकों के विरूद्ध माहौल बनाया जाता रहा है। संघ परिवार के सदस्य तो गौसेवा के लिए केवल चंदा देते हैं। गौमाता की असली देखभाल, उसे चराने आदि का काम तो दलित ही करते हैं। पिछले कुछ समय से राजनैतिक और सांस्कृतिक मंचों से यह दबाव बनाया जा रहा है कि समाज के वे वर्ग जो गौमांस भक्षण करते हैं, ऐसा करना छोड़ दें।

इस प्रचार अभियान के चलते आमजनों की खानपान की आदतों में कुछ परिवर्तन तो आया है परंतु आज भी देश में गौमांस की खपत, मुर्गे और बकरे के मांस की कुल खपत से भी ज्यादा है। गौमांस का बड़े पैमाने पर निर्यात भी किया जाता है। संघ परिवार जहां अल्पसंख्यकों को स्थायी रूप से आतंकित रखना चाहता है वहीं वह लैंगिक और जातिगत रिश्तों में यथास्थितिवाद का पोषक भी है। यथास्थिति को बनाए रखने के लिए कई अलग-अलग मंचों व तरीकों से धूर्ततापूर्ण  उपाय किए जा रहे हैं। राजनीति, संस्कृति और शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रहे संघ से प्रेरित संगठन इस उद्देश्य की पूर्ति में लगे हुए हैं। संघ परिवार की दलितों के प्रति नीति काफी जटिल है। सन् 1980 में आरक्षण के मुद्दे पर दलित-विरोधी हिंसा, सन् 1986 में अन्य पिछड़ा वर्गों के लिए पदोन्नति में आरक्षण के मुद्दे पर पिछड़े वर्गों के खिलाफ हिंसा और मंडल के खिलाफ कमंडल का इस्तेमाल, इस नीति के कुछ पहलू हैं।

इसके समानांतर, दलितों को हिन्दुत्व के झंडे तले लाने का षड़यंत्र भी जारी है। सन् 1980 के दशक के मध्य से संघ ने “सामाजिक समरसता मंचों“ की स्थापना शुरू की। इन मंचों का उद्देश्य दलितों का हिन्दुकरण है। श्री श्री रविशंकर और अन्य कई बाबा ऊंची और नीची जातियों के हिन्दुओं के बीच सौहार्दपूर्ण संबंधों पर जोर देते रहे हैं परंतु दलितों के साथ हो रहे अन्याय के मुद्दे पर वे ख़ामोशी ओढ़े हुए हैं। यह, साम्प्रदायिक राजनीति के लैंगिक और जातिगत ढांचे  को जस का तस बनाए रखने के लक्ष्य के अनुरूप है।

सामाजिक समरसता मंचों द्वारा सामाजिक न्याय और जातिवादी अत्याचार के मुद्दों को हाशिए पर खिसकाने की कोशिश की जा रही है। इसके साथ ही, श्रेष्ठि वर्ग के सांस्कृतिक मूल्यों को पूरे समाज पर लादने की साजिश भी चल रही है। खान-पान की आदतें किसी भी समुदाय की सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न अंग होती हैं। गौमांस, आदिवासियों और दलितों के भोजन का अविभाज्य हिस्सा है। यह भी दिलचस्प है कि शाकाहार को मांसाहार से श्रेष्ठ सिद्ध करने के अभियान भी चल रहे हैं। ऐसा बताया जा रहा है मानो मांसाहारी एक तरह के अपराधी हैं व स्वभाव से ही क्रूर है।

जहां एक ओर दलितों का एक बड़ा तबका सामाजिक और आर्थिक न्याय के लिए कठिन संघर्ष कर रहा है वहीं उनके हिन्दुकरण के प्रयास भी जारी हैं। उनकी खानपान की आदतों और जीने के तरीके पर किए जा रहे हमले इसी प्रयास का हिस्सा हैं। राज्यतंत्र दलितों के सामाजिक और प्रजातांत्रिक अधिकारों पर साम्प्रदायिक ताकतों के हमले को रोकने में असफल रहा है। न तो राज्य उन्हें जानोमाल की सुरक्षा दे सका है और न अवसर की समानता। और अब तो यह भी दूसरे तय करना चाहते हैं कि दलित और आदिवासी क्या खाएं और क्या नहीं।

ऐसा लगता है कि आने वाले समय में गौमाता साम्प्रदायिक राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण प्रतीक बनने जा रही है। इस खेल से इस राजनीति के दो प्रमुख लक्ष्यों का आभास मिलता है। सतही तौर पर ऐसा लगता है कि इन ताकतों का एकमात्र उद्देश्य’ अल्पसंख्यकों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाकर रखना है। असल में उनका एजेन्डा अधिक व्यापक है। वे अल्पसंख्यकों के साथ-साथ दलितों और आदिवासियों को भी सामाजिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में दमित बनाए रखना चाहते हैं।

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


फीड पाएं


रीडर में पढें या ई मेल से पाएं:

अपना ई मेल लिखें :




हाशिये में खोजें