हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

वे जो कलक्टर नहीं बन सके

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/29/2012 11:51:00 AM

चंद्रिका

कलक्टर मेनन के लिए दुवाएं की जा रही हैं. मानवाधिकार कार्यकर्ता और सामाजिक कार्यकर्ता उन्हें निःशर्त रिहा किए जाने की मांग कर रहे हैं. कलक्टर के दोस्त उनसे जुड़ी पुरानी यादें सुना रहे हैं. मुख्यमंत्री ‘बेहद चिंतित’ हैं और गृहमंत्री लगातार बढ़ रही ऐसी घटनाओं से ‘परेशान’. अखबारों के सम्पादक और पत्रकारों के शब्द उलझन भरे ज़ेहन से निकले हुए लगते हैं. प्रधानमंत्री के 6 साल पहले रटे-रटाए वाक्य को दुहराना वाजिब नहीं;[1] पर यह देश की जो आंतरिक असुरक्षा है वह लगातार बढ़ती जा रही है और अब देश और सुरक्षा के मायने समझ से परे हो गए हैं.[2]

आखिर एक कलक्टर जो ‘सुराज’ लाना चाहता है, उसे बंधक बनाया जाना कितना उचित है, के जवाब में एक बूढ़ा कलक्टर, जिसने सरकार की नीतियों से तंग आकर वर्षों पहले कलेक्टरी से इस्तीफा दे दिया है, कहता है- ‘युद्ध में सही और गलत को नहीं आंका जा सकता’.[3] तो क्या सुराज=युद्ध?[4] किसी डिक्नरी के पन्नों में ऐसे मायने नहीं जोड़े गए हैं.[5] पिछले दो-तीन दशकों में छत्तीसगढ़ के इतिहास में ऐसे कई शब्द हैं जिनके अर्थ खोजना व्यर्थ है; पर जिनका जिक्र करना यहां बेहद जरूरी. कि अखबारों में कलक्टर की रिहाई के लिए उलझन भरे, दुखी और चिंतित लोगों के शब्द जो काले अक्षरों में छप रहे हैं, वह बेहद स्याह पक्ष है, ‘सभ्य’ और अभिजात्यों का पक्ष.

यह अखबारों और किताबों के पन्ने से अलग एक पन्ना हैं ‘पन्ना लाल’ जो छत्तीसगढ़ (छत्तीसगढ़ तब मध्यप्रदेश का हिस्सा था) में उस इलाके के पूर्व डी.आई.जी रह चुके हैं, जिन इलाकों में ये घटनाएं घटित हो रही हैं. 1992 में जब ‘जन जागरण’ अभियान इन क्षेत्रों में चलाया गया. मकसद था नक्सलियों की सत्ता को खत्म ‘करना’. उसी वर्ष गृह राज्यमंत्री गौरीशंकर शेजवार ने कुछ दिनों बाद नक्सलियों के ‘खात्मे’ की घोषणा कर दी. अयोध्यानाथ पाठक और दिनेश जुगरान महानिरीक्षक के तौर पर नियुक्त किए गए थे. जन-जागरण के इस अभियान में ‘जन-प्रताड़ना’ के आंकड़े जुटाना मुश्किल है. पर करीगुंडम, एलमागुडा, पालोड़ी, पोटऊ पाली, दुगमरका, सल्लातोंग, टुडनमरका, साकलेयर गावों के लोगों की यादों में आंकड़े नहीं, वृत्तांत और कहानियां पड़ी हुई हैं. सोड़ी गंगा जो दूसरी कक्षा तक पढ़े हैं और एक गांव के अध्यापक हैं उनके पास जन-जागरण की प्रताड़ना के कई किस्से हैं. तो क्या जन-जागरण=प्रताड़ना? शायद शब्दको के मायने समाज की अर्थवत्ता से अलग है. यह अभियान कुछ वर्षों तक चलता रहा और पुलिस माओवादियों की वर्दी पहनकर घूमती रही...घूमती रही कि माओवादियों जितनी स्वीकार्यता पुलिस को भी मिल जाए. गांवों में नक्सली बनकर पुलिस जाती और गांव वालों के साथ जमीन पर बैठती, उनसे बातचीत करती. पर यह हकीकत के एक हिस्से का नाट्यरूपांतरण था. माओवादियों ने आदिवासियों के लिए तेंदू पत्ते के कीमत की लड़ाई, जंगल में हक की लड़ाई और 15000 एकड़ जमीन के बंटवारे तालाबों के निर्माण जैसे कई काम करवाए थे. तब छत्तीसगढ़ मध्यप्रदेश था. यह समय था जब पुराने आरोप ध्वस्त हो रहे थे और नक्सली आंध्र के इलाकों से नहीं आते थे. बल्कि आदिवासी माओवादी हो रहे थे और माओवादी आदिवासी. जिसे मछली और पानी का संबंध कहा गया.[6]

सलवा-जुडुम यानि ‘शांति अभियान’ ‘सुराज’ के ठीक पहले का अभियान है. पिछले सात वर्षों में चलाए गए इस ‘शांति-अभियान’ के सरकारी आंकड़े 644 गांवों के उजाड़े जाने के हैं. लगभग 3.5 लाख लोगों के विस्थापन के. घरों के जालाए जाने, लोगों के पीटे जाने, पेड़ों पर टांग के गोली मार देने और महिलाओं के बलात्कार के आंकड़े…..पिछले बरस माड़वी जोगी अपने साथ हुए दुर्व्यवहार को बताते-बताते वापस घर में चली गई और हमने सैन्य बलों के उत्पात के बारे में सवाल पूछना ज्यादती समझा. माड़वी लेके नाम की एक महिला को उनके पिता और भाई माड़वी जोगा और माड़वी भीमा के सामने पुलिस ने नग्न किया और पुलिस स्टेशन से घर तक जाने को कहा…..  बीबीसी हिन्दी में अभी खबर लगी है कि कलक्टर को कुछ कपड़े और दवाईयां पहुंचाई जा चुकी हैं और उसके साथ कुछ खाने-पीने की चीजें भी.[7]

आंकड़ों में 16 मार्च, 2011 को ताड़मेटला में 7 साल के एक बच्चे को सैन्य बलों ने पीटा, यह दर्ज नहीं है, हवाई फायरिंग सुनकर गांव के कितने लोग भागे, यह भी दर्ज नहीं है. कुछ गैर सरकारी दस्तावेजों और पत्रिका की रिपोर्टों में 207 घरों का जलाया जाना दर्ज है. आंकड़ों में घटित हुई इन घटनाओं ने हर आदमी को क्रोधित किया, आंकड़े में हर आदमी गुस्से में है, आंकड़े में उसकी उग्रता स्वाभाविक है और इस संगठित उग्रता में हर आदमी उग्रवादी है. देश और सरकार के दस्तावेजों में इसानी स्वभावों के आंकड़े नहीं दर्ज किए जाते. तो क्या ‘शांति अभियान’=तबाही. डिक्शनरी देख सकते हैं. राज्य सरकार ‘शांति-अभियान’ चलाती है और देश की सर्वोच्च न्यायालय एक फैसले में उसे तत्काल बंद करने का आदेश देती है. राज्य शान्ति चाहता है? न्यायालय शांति नहीं चाहता? शांति और न्याय एक दूसरे के विरुद्ध कैसे हैं? ऐसे ढेरों सवाल.

कलक्टर मेनन का स्वास्थ्य ठीक नहीं है और माओवादी उनकी दवा को लेकर चिंता जाहिर कर रहे हैं और उन्हें दवायां सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों द्वारा दूसरे दिन भी भेज दी गई हैं. आज कलक्टर को अगवा किए 6 दिन बीत चुके है. 6 बरस पहले 2006 से सैन्य बलों द्वारा गायब की गई 2 लड़कियों का अभी तक कोई पता नहीं चला है जिनका नाम मडकम हूँगी और वेको बजारे है. ‘शान्ति-अभियान’ की तबाही में ऐसे कई लोग गायब हुए जिनका पता नहीं चला, पिछले बरस देवा[8] बता रहे थे कि करीगुंडम में नाले के पास दो लाशें मिली थी और कई ऐसी लाशें हैं जो किसी नाले के किनारे नहीं मिली.

आदिवासियों पर हुए अनगिनत जुल्म के विरुद्ध क्या माओवादियों की इस लोकतांत्रिक कार्रवाई की सराहना की जानी चाहिए? मसलन राजनैतिक कैदी के तौर पर कलक्टर को सुविधाएं मुहैया कराना, अगवा की जिम्मेदारी लेना और बातचीत के जरिए 6 दिनों में हल करने का प्रयास करना. 6 वर्षों से और 6 वर्षों में सरकार द्वारा ….. क्या सैन्यबलों द्वारा गायब किए गए, हत्या किए गए या जाने क्या किए गए की निंदा नहीं करनी चहिए? कि वे जो गायब हुए हैं वे कलक्टर नहीं थे आदिवासी थे बस.




[1] सरकारी दस्तावेजों में यकीन रखने वाले प्रधानमंत्री के इस बयान को नक्सल प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्री व डी.जी.पी. से हुई किसी बैठक के दस्तावेज में देखें या दूसरे दिन के अखबार पर भरोसा करें.
[2] विस्तार के लिए सभी के संदर्भ पुराने अखबारों मे देखें, यदि अखबारों में यकीन रखते हो तो.
[3] मेरे फेसबुक पर बी.डी. शर्मा के बयान देखें, जिसे बीबीसी हिन्दी की साइट से उठाया गया है. बीबीसी के बजाफेसबुक पर यकीन करना सीखें या चीन के क्रान्तिकारी  माओत्से तुंग के वाक्य सब पर शक करो’ में यकीन करें.
[4] सुराज के अन्य मायने समझने के लिए गांधी द्वारा लिखित पुस्तक हिन्द स्वराज भी देखें, मूल गुजराती में और अब दुनिया के तमाम भाषाओं में अनुदित. दो वर्ष पहले हिन्द स्वराज के सौ वर्ष पूरे हुए.  
[5] दुनिया की किसी भी भाषा में बनाई गयी अब तक की कोई भी  डिक्नरी देखें. एक डिक्नरी कुछ लोग मिलकर बनाते हैं और उसपर लोग यकीन करते हैं….इकाई व्यक्ति के तौर पर मुझ पर यकीन कर सकते हैं.
[6] माओवादी पार्टी के शीर्षस्थ नेतागणपति’ का ओपेन पत्रिका में साक्षात्कार देखें
[7] बी.बीसी. हिन्दी डॉट काम
[8] गांव के सदस्य.

नोनाडांगा के दमन के विरुद्ध...

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/27/2012 11:37:00 PM

नोनाडांगा में और पूरे पश्चिम बंग में तृणमूल सरकार जिस तरह जनविरोधी कार्रवाइयों को अंजाम दे रही है, उससे सिर्फ यह बात साबित होती है कि सत्ता में कोई भी पार्टी रहे, व्यवस्था सिर्फ मुट्ठी भर संपन्न तबके के हित में ही काम करती है और मेहनतकश जनता का उत्पीड़न और शोषण दिनोदिन तेज होता जाता है. नोनाडांगा की घटनाओं पर पिछले दिनों कई संगठनों ने यह पर्चा जारी किया था, जिनमें पीयूडीआर, क्रांतिकारी नौजवान सभा, विद्यार्थी युवजन सभा, पीडीएफआई, मेहनतकश मजदूर मोर्चा, एआईएफटीयू (न्यू), इन्कलाबी मजदूर केन्द्र, सन्हति-दिल्ली, मजदूर पत्रिका, जेटीएसए, पोस्को प्रतिरोध सोलिडेरिटी-दिल्ली, दिशा छात्र संगठन, बिगुल मजदूर दस्ता, एनएसआई और श्रमिक संग्राम कमेटी आदि शामिल हैं.

कोलकाता नगर निगम (केएमडीए) द्वारा पुलिस बल की मदद से नोनाडांगा बस्ती को उजाड़ने के खिलाफ  बस्तीवासियों का जुझारू प्रतिरोध चल रहा है. हम वहां के गरीबों और मेहनतकशों की जुझारू एकता को सलाम करते हैं! केवल पश्चिम बंगाल ही नहीं, बल्कि देशभर में ‘सौंदर्यीकरण’ और ‘विकास’ के नाम पर इसी तरह बड़े पैमाने पर शहरी गरीबों-मज़दूरों को उजाड़कर शहरों के बाहरी इलाकों में फेंक दिया जा रहा है. हमें देशभर में गरीबों को उजाड़ने के इस अभियान के कारणों की पड़ताल करनी होगी, ताकि हम ज्यादा मज़बूती से संगठित होकर व्यापक एकजुटता कायम कर सकें. हमें नोनाडांगा के प्रतिरोध को पूरे देश के पैमाने पर फैलाना होगा, और देशव्यापी स्तर पर संगठित होकर पूंजी के राजनीतिक नौकर की इन गरीब-मज़दूर विरोधी नवउदारवादी नीतियों और तानाशाही का मुकाबला करना होगा. हमें समझना होगा कि नोनाडांगा सहित, देशभर में हो रहे इस तरह के जुझारू प्रतिरोधों को जब तक एक कड़ी में पिरोया नहीं जाएगा, उन्हें देशव्यापी नहीं बनाया जाएगा, तब तक पूंजी के राजनीतिक नौकर-केंद्र और राज्य सरकारों की गरीब-मज़दूर विरोधी नीतियों का मुकाबला करना मुश्किल होगा.

आज भारत की शहरी इलाकों में प्रतिरोध बढ़ता जा रहा है. शासक वर्ग ”देश के विकास“ की लफ्फाजी, कॉरपोरेट पार्कों और चुनावी वायदों तले मेहनतकश जनता की बदहाली को छिपाने की चाहे जितनी कोशिशें करें, लेकिन वे इस पूंजीवादी ”विकास“ की प्रक्रिया में निहित हिंसा को छिपा नहीं सकते. इनकी नीतियों के चलते ही देश की ग़रीब-मेहनतकश जनता कंगाली-बदहाली के नारकीय दलदल में धंसती जा रही है. गांव के गरीब अपनी जगह-जमीन से उजड़ कर शहरों की ओर पलायन करने को मजबूर हो रहे हैं और शहरी मेहनतकश जनता को जिंदा रहने तक के लिए जरूरी वेतन-मजदूरी, इंसानों के रहने लायक घर और साफ पानी तक नहीं मिल रहा है. मजदूर बस्तियों तक में मालिक जमात छोटे-छोटे कमरों तक के किराए तेजी से बढ़ाते जा रही है. इन नीतियों को लागू करने के लिए, अब ऐसी नर्क जैसी जगहों तक से गरीबों-मेहनतकशों को उजाड़ा जा रहा है. उन्हें ‘पुनर्वास’ के नाम पर दूर-दराज के इलाकों में पटका जा रहा है, जिसके चलते काम की जगह और रहने की जगह में अधिक दूरी होने की वजह से उनका काफी समय, पैसा, श्रम आने-जाने में ही लग जाता है, बचा-खुचा मालिक जमात निचोड़ लेती है. अगर वे उजाड़े जाने का विरोध करते हैं, तो पुलिस-प्रशासन के दम पर उनके प्रतिरोध को बर्बरता से कुचल दिया जाता है.

नोनाडांगा में भी यही हुआ. बीते 30 मार्च को तृणमूल कांग्रेस की अगुवाई वाली प.बंगाल सरकार और उसके पुलिस बल के पूरे सहयोग से कोलकाता नगर निगम ने ”सौंदर्यीकरण“ और ”विकास“ के नाम पर नोनाडांगा की झुग्गी-बस्ती में 200 से अधिक मकानों पर बुलडोजर चला दिया या उन्हें आग के हवाले कर दिया. पूरे शहर की अर्थव्यवस्था को चलाने के लिए इन गरीबों-मेहनतकशों का ‘‘कानूनी’’ तरीके से शोषण तो किया ही जाता है, लेकिन अब उन्हे बेघर भी कर दिया गया है. ये लोग अपने राज्यभर के अलग-अलग हिस्सों के गांवों-जंगलों से उजड़कर काम की तलाश में यहां आए थे और यहां से भी उन्हें उजाड़ दिया गया. तानाशाह तृणमूल सरकार इसका प्रतिरोध करने वालों के खिलाफ ”कानूनी“ और पुलिसिया दमन का इस्तेमाल कर रही है. 4 अप्रैल को उच्छेद प्रतिरोध समिति के बैनर तले बस्तीवासियों ने जुलूस निकाला तो पुलिस ने बर्बर लाठीचार्ज कर दिया. उसके चार दिन बाद 8 अप्रैल को आयोजित धरना-प्रदर्शन पर भी पुलिस ने हमला बोल दिया और 67 लोगों को गिरफ्तार कर लिया. उसके बाद 9 और 12 अप्रैल को नोनाडांगा के बाशिंदों के समर्थन में हुई मीटिंग और रैली पर गुंडों द्वारा हमला कराया गया (सीपीएम के जिस जनविरोधी नीतियों को इस्तेमाल करते हुए ममताबनर्जी सत्ता में आयी, आज उसी गुंडागर्दी और जनविरोधीनीतियों को लागू कर रही है) और पुलिस ने सैकड़ों कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया. विभिन्न जनसंगठनों और जनवादी अधिकार संगठनों के 7 कार्यकर्ता या तो जेल में हैं या 26 अप्रैल तक की पुलिस रिमांड में हैं. उन पर विभिन्न धाराएं लगाई गई है. इनमें से एक कार्यकर्ता पर गैर-कानूनी गतिविधि निरोधक कानून (यूएपीए) के तहत ‘देशद्रोही गतिविधियों’ में संलिप्त होने की धारा तक लगाई गई है. यही नहीं, 12 अप्रैल को अदालत में सुनवाई के दौरान 40 वकीलों की टीम ने नोनाडांगा के निवासियों को ‘देशद्रोही’ साबित करने और उन पर कई संगीन धाराएं लगवाने का पूरा प्रयास किया और यहां तक दावा किया कि नोनाडांगा का इस्तेमाल ‘हथियार जमा करने के लिए’ किया जाता था.

इसके बावजूद बस्ती वासी बस्ती में डटे हैं. उन्होंने तिरपाल आदि डालकर रहने के लिए अस्थायी इंतजाम किया है. वे वहां सामुदायिक रसोई चला रहे हैं और खाली हाथों और अदमनीय दृढ़ता के बूते रोजाना पुलिस का मुकाबला कर रहे हैं. 11 अप्रैल से उन्होंने आमरण भूख-हड़ताल भी शुरू कर दी है. दूसरी ओर, राज्य सरकार और पूंजीवादी मीडिया, शहर के मुख्य स्थान पर स्थित इस बस्ती की जमीन पर निगाहें गड़ाए बैठे थैलीशाहों के इशारे पर उन्हें ‘अवैध अतिक्रमणकारी’ साबित करने पर तुली है.

नोनाडांगा से हमें सबक लेना चाहिए, क्योंकि जगह-जमीन से बेदखली की तलवार केवल नोनाडांगा पर ही लटक नहीं रही है, या केवल दिल्ली के भलस्वा का ही मामला नहीं है. आज भारत में, 256 लाख लोग बेघर हैं या झुग्गी-बस्तियों में रसातल का जीवन जीने को मजबूर हैं, और यह संख्या तेजी से बढ़ रही है. शहरों को शासक वर्गों की जरूरतों के अनुसार बदला जा रहा है, और इसके लिए हम लोगों को झुग्गियों से उजाड़ना एक सामान्य बात बना दी गई है. दिल्ली में, शीला दीक्षित की अगुवाई वाली कांग्रेस सरकार ने अगले कुछ महीनों में उजाड़े जाने के लिए 44 कॉलोनियों को सूचीबद्ध किया है, जिनमें पहले चरण में 33 कॉलोनियों को उजाड़ा जाएगा. पुनर्वास के नाम पर आवंटित किए जाने वाले थोड़े से सरकारी फ्लैट भी उन्हीं को आवंटित किए जाएंगे जिनके पास 2007 से दिल्ली का मतदाता पहचान पत्र, आधार कार्ड और राशन कार्ड होगा और जो 80,000 रुपए की एकमुश्त रकम जमा कराने की क्षमता रखते होंगें. हमें इन कानूनी पेचीदगियों में उलझाकर हमारे मौलिक अधिकार के लिए संघर्ष को पस्त कर देते हैं.

दिल्ली की छह पुनर्वास बस्तियों की हालत हम सभी जानते हैं. भलस्वा में 11 साल से जन सुविधाओं की गैर उपलब्धि पर शिकायत की गई है और उन्हें प्राप्त होने की मांग रखी गई है. भलस्वा की महिला साथियों के एक प्रतिनिधिमंडल ने शीला दीक्षित को बस्ती में मिलने वाला गन्दा पानी बोतल में भर कर दिया, तो उन्हें लगा कि कहीं यह हथियार तो नहीं है. महिला साथियों ने उन्हें बताया कि यह पानी हम लोग कई सालों से पेय जल के रूप में इस्तेमाल कर रही हैं और इसकी वजह से होने वाली बीमारियों से जूझ रही हैं तो वे हैरान हो गईं. अब जनता के दबाव से आज दिल्ली जल बोर्ड और शीला दीक्षित सरकार को जल वितरण व्यवस्था को सुधारने का काम करना पड़ रहा है. लेकिन यह केवल साफ पानी की लड़ाई नहीं है, बल्कि पुनर्वास बस्तियों में रहने वाले लोगों के हक से जुड़ी है. शहर की विभिन्न झुग्गी-बस्तियों में रहने वाले लोगों के दम पर ही पूंजीपतियों की तिजोरियां भरती हैं और शहरों की चमक-धमक बनी रहती है. फिर भी, चुनावों में झूठे वायदे करके सत्ता में पहुंचने वाली किसी भी पार्टी के नेताओं को इन बस्तियों के लोग शहर की शान पर धब्बा नजर आते हैं. हम जानते हैं कि 2010 के राष्ट्रमंडल खेलों के लिए ऐसी अनेक बस्तियों पर बुलडोजर चलाए गए थे. हम यह भी नहीं भूले हैं कि पूंजीपतियों के तलवे चाटने वाली राजनीतिक पार्टियों ने हमारी ‘गंदी और बदसूरत’ बस्तियों को छिपाने के प्रयास किए थे ताकि हम अमीरों को दिखाई तक न दें और उनका ‘मूड’ न खराब हो.

दिल्ली में भी हमने अधिकारों और मांगों के लिए आए दिन सड़कों पर उतर कर संघर्ष किया है, लेकिन हमारे ये संघर्ष बिखरे और असंगठित रहे हैं. ऐसे समय में, जब कोलकाता में हमारे भाई-बहन केवल जिंदा रहने की ही नहीं, बल्कि सम्मानित और स्वतंत्र जीवन जीने के अपने अधिकार की हिफाजत की लड़ाई लड़ रहे हैं, तो हमें उनका समर्थन करना चाहिए और पश्चिम बंगाल सरकार के तानाशाह रवैये की पुरजोर निंदा करनी चाहिए.

आइए, हम लोग नोनाडांगा के अपने साथियों के लिए एकजुटता जाहिर करें और अपने-अपने इलाकों में भी हमारे खुद के संघर्षों को तेज़ कर दें.

हम तृणमूल कांग्रेस की अगुवाई वाली प.बंगाल सरकार की बस्ती उजाड़ने इस कार्रवाई और 4 अप्रैल को नोनाडांगा के निवासियों एवं उनके समर्थकों पर पुलिस द्वारा बर्बर लाठीचार्ज तथा आए दिन होने वाली सरकारी हिंसा की पुरजोर निंदा करते हैं. देबोलीना की यूएपीए कानून के अन्तर्गत गिरफ्तारी का हम घोर निन्दा करते हैं.

हम मांग करते हैं कि:
  • 8 अप्रैल को गिरफ्तार किए गए कार्यकर्ताओं पर लगाए गए मामले वापस लिए जाएं, और उन्हें तुरंत बिना शर्त रिहा किया जाए.
  • राज्य सरकार नोनाडांगा वासियों और कार्यकर्ताओं के दमन-उत्पीड़न को तुरंत बंद करे और संगठित होने तथा विरोध जताने के उनके जनवादी अधिकारों के हनन के लिए उनसे माफी मांगे.
  • 4 अप्रैल के लाठी चार्ज में दोषी पुलिसकर्मियों को सजा दो.
  • नोनाडांगा के झुग्गीवासियों और हॉकरों के आवास और पुनर्वास के अधिकार को तुरंत निष्पक्ष एवं न्यायपूर्ण तरीके से सुनिश्चित किया जाए.
  • कोलकाता नगर निगम द्वारा नोनाडांगा में किए जा रहे सभी निर्माण कार्यों पर तुरंत रोक लगाई जाए.
  • नव-उदारवादी, पूंजीवादी विकास के व्यापक जनविरोधी अभियान को, और इसके तहत ‘विकास’ के नाम पर शहर में बस्तियां उजाड़ने के अभियान को बंद किया जाए.
  • दिल्ली में झुग्गी-बस्तियां उजाड़ने की प्रक्रिया को भी तुरंत रोका जाए और शहर के झुग्गी-झोपड़ीवासियों को पर्याप्त जगह और पीने का साफ पानी और उचित साफ-सफाई की सुविधाओं वाले सम्मानजनक आवास मुहैया कराए जाएं.

हर्सोरिया हेल्थकेयर, गुड़गाँव के मजदूर संघर्ष कर रहे हैं, आपका साथ चाहिए

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/27/2012 11:06:00 PM


हर्सोरिया हेल्थकेयर प्राइवेट लिमिटेड, गुड़गाँव में जारी आन्दोलन के बारे कल हमें साथी श्यामबीर से यह जानकारी प्राप्त हुई थी। 

विगत अप्रैल के से हर्सोरिया हेल्थकेयर प्राइवेट लिमिटेड, उद्योग विहार, फेज - 4, गुड़गाँव के 450-500 मजदूर अपने माँगों के समर्थन में कारखाने के परिसर के अंदर धरने पर बैठे.हुए हैं लेकिन कम्पनी प्रबन्धन या श्रम विभाग और जिला प्रशासन के कानों में जूँ नहीं रेंग रही है।

इस फैक्टरी में कुल 250 स्थायी श्रमिक, 300 ठेका श्रमिक और 50 अस्थायी श्रमिक कार्यरत हैं। ये आन्दोलनरत मजदूर अपने यूनियन के तीन नेताओं की सेवाओं की समाप्ति और 10 श्रमिकों के निलंबन के खिलाफ विरोध प्रकट कर रहे हैं। इन नेताओं में से दो की सेवाओं को दिसम्बर, 2011 में समाप्त किया गया, जबकि एक अन्य को फरवरी, 2012 में निकाल दिया गया था। आन्दोलनकारी श्रमिकों की  माँगों में दीपावली बोनस का भुगतान और अस्थायी एवं ठेका श्रमिकों की सेवाओं को नियमित किया जाना शामिल हैं। ये मजदूर उनके विभागों में लगातार और मनमाने परिवर्तन, वेतन के भुगतान में देरी, काम की तीव्रता में लगातार बढ़ोत्तरी और कम्पनी की सेवा में 4 साल के पूरा होने पर 1500 रुपये प्रति माह के वफादारी बोनस का भुगतान न होने का भी विरोध कर रहे हैं।

इस कारखाने में  अप्रैल 2011 में हड़ताल हुई थी जब प्रबन्धन ने 7 मजदूरों को बर्खास्त कर दिया था जिनमें से 6 को वार्ता के पश्चात वापस ले लिया गया था। इनमें से तीन मजदूरों की सेवाओं को फिर से समाप्त कर दिया गया है। अप्रैल 2011 की हड़ताल के दौरान हड़ताली मजदूरों के खिलाफ बर्बर लाठी चार्ज किया गया था और 7 मजदूरों को गिरफ्तार कर उन्हें विभिन्न मामलों में फँसाया गया था जिसमें से एक कारखाने के गेट पर यूनियन का झण्डा फहराने से सम्बन्धित है। करीब 21 लोगों को ऐसे ही झूठे मामलों में फँसाया गया है। मजदूर इन मुकदमों को वापस लिए जाने की माँग कर रहे हैं।  इस बीच  कम्पनी प्रबन्धन 100 अन्य  मजदूरों की सेवाओं की समाप्ति का आदेश जारी कर दिया है। कम्पनी प्रबन्धन भी घोषित किया है कि वह कम्पनी के परिसर के भीतर स्थायी श्रमिकों को देखना नहीं चाहता है।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नाम 'नंदीग्राम डायरी' के लेखक का खुला पत्र

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/27/2012 10:06:00 PM

पत्र की कुछेक स्थापनाओं, विचारों और नजरियों से असहमति के बावजूद यह पत्र हाशिया पर पोस्ट किया जा रहा है, जिसे पुष्पराज ने ममता बनर्जी को हाल में पश्चिम बंग के घटनाक्रमों और ममता-तृणमूल और सरकार के फासीवादी रवैये पर लिखा है. तो इसकी वजह वह आत्माधिकार है, जिसका दावा पुष्पराज ने किया है और जनवादी अधिकारों के पक्ष में की गई उनकी अपील है. पत्र को उसके मूल रूप में ज्यों का त्यों पोस्ट किया जा रहा है. इसे इसकी अंतरंग शैली और अपीलीय स्वरूप के कारण संपादित नहीं किया गया है. 

सुश्री ममता बनर्जी जी,
माननीया मुख्यमंत्री,
प . बंगाल .

सादर अभिवादन
मै पुष्पराज नंदीग्राम में घटित कृषक संग्राम पर केन्द्रित पुस्तक "नंदीग्राम डायरी "का लेखक हूँ. यह पुस्तक पेगुइन इण्डिया से 2009 में प्रकाशित हुई. मै आपको नंदीग्राम की घटनाओं का एक अधिकृत साक्षी होने के आत्म -अधिकार के साथ पत्र लिख रहा हूँ. जब मेरी पुस्तक प्रकाशित हुई तो एक तरह का विवाद प्रचारित किया गया कि यह पुस्तक मार्क्सवादी - कम्युनिस्ट पार्टी की विरोधी शक्तिओं का परिणाम है. पुस्तक के लेखक के विरुद्ध कई तरह के आरोप चर्चे में आये. आरोप और अफवाहों के दौर से गुजरते हुए इस लेखक को बेहद तनाव से गुजरना पड़ा. लेकिन सचाई है कि ये आरोप सी.पी.एम की ओ़र से नहीं लगाये गए थे. हमारे खिलाफ दुष्प्रचार करनेवाले वे लेखक -पत्रकार थे, जिन्हें यह संदेह था कि इस पुस्तक के लेखन के लिए तृणमूल -कांग्रेस से लेखक को काफी धन प्राप्त हुआ है. पुस्तक प्रकाशन के बाद सी .पी .एम के घटक संगठन जनवादी लेखक संघ के एक प्रमुख राष्ट्रीय कर्ताधर्ता (नामचीन लेखक )ने मेरे साथ मेरी रचना प्रक्रिया पर संवाद किया, उनसे मेरे अच्छे लेखकीय संबंध कायम हुए. संभव है कि मेरी पुस्तक से नंदीग्राम का सत्य उजागर होने से सी.पी.एम की छवि प्रभावित हुई हो पर सी.पी.एम ने इसे व्यक्तिगत शत्रुता का विषय नहीं बनाया. सी.पी.एम के एक राष्ट्रीय स्तर के नेता ने कोलकाता स्थित अपने आवास पर बुलाकर मेरे साथ मेरी पुस्तक के सन्दर्भ में सम्मानजनक संवाद किया. ऐसा क्यों हुआ कि सी.पी.एम के किसी बड़े नेता या कामरेड कैडरों ने मेरे साथ बदले के भाव में अपमानजनक व्यवहार नहीं किया? मेरी समझ में ऐसा इसलिए हुआ कि सी.पी.एम विचारधारा से लैस एक राजनीतिक संगठन है और इनके भीतर अपने गुण-दोष को समझने-परखने की राजनीतिक -वैज्ञानिक दृष्टि है. सी.पी.एम ने हमारे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला नहीं किया और संभव है, हमारे लिखे से संगठन के भीतर नंदीग्राम में हुई गलतिओं पर विमर्श किया गया हो.

इस समय आपके बंगाल में आप मुख्यमंत्री का कार्टून बनानेवाले प्रध्यापक अंबिकेश महापात्र पर टी.एम.सी समर्थकों का हमला और महापात्र को जेल भेजने की कार्रवाई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उलंघन है. महापात्र के साथ हुई घटना के बाद वैज्ञानिक पार्थ सारथी रॉय की गिरफ्तारी भी सभ्य लोकतान्त्रिक समाज के लिए शर्मनाक घटना है .इन गिरफ्तारियो से आपकी छवि पूरी दुनिया में प्रभावित हुई है. आपकी सरकार के खाद्य -आपूर्ति मंत्री ज्योतिप्रिय मल्लिक का बयान बेहद आपत्तिजनक है. जिसमे उन्होंने सी.पी.एम कार्यकर्ताओं के साथ तृणमूल कार्यकर्ताओं को शादी -ब्याह ना करने और सामाजिक बहिष्कार करने का उपदेश पढाया है .आपके दल से जुड़े मंत्री के बयान को पूरे देश में तृणमूल -कांग्रेस के बयान की तरह प्रसारित किया गया है. अब तक आपके दल की ओ़र से इस बयान का खंडन नहीं किया गया है. ममता जी, यह सब क्या हो रहा है? प्रो. महापात्र का कार्टून कलात्मक अभिव्यक्ति है. आपके दल के समर्थकों और कोलकाता पुलिस की कार्रवाई कानून का उलंघन है. उजड़ते झुग्गिओं को बचाने के पक्ष में वैज्ञानिक पार्थ सारथी रॉय का खड़ा होना, भद्रलोक बांग्ला समाज की गौरवशाली परंपरा का हिस्सा है. आपके मंत्री ज्योतिप्रिय मल्लिक का बयान उन्हें शत्रु घोषित करता है, जो आपके विरोधी हें. किसी लोकतान्त्रिक राष्ट्र में यह संभव नहीं है कि एक सत्ताधारी राजनीतिक दल अपने राजनीतिक विरोधिओं को अपना शत्रु घोषित कर दे. मुझे आशंका है कि आपने अगर सतर्कता नहीं बरती तो आपके मंत्री के बयान से पूरे बंगाल में हिंसा -प्रतिहिंसा को बल मिलेगा और राज्य शासन इस संभावित अराजकता से निपटने में नाकामयाब होगी.

मै इस पत्र के द्वारा आपको नंदीग्राम के पीड़ितों को न्याय दिलाने के आश्वाlन का स्मरण दिलाना चाहता हूँ. शहीद सूबेदार मेजर आदित्य बेरा 10 नवम्बर 2007 के इलाका दखल के बाद लापता हें. आपकी सरकार ने जो पुलिस सी.आई.डी जाँच कराई, इस जाँच के बाद आदित्य बेरा अब तक सरकार के रिकॉर्ड में लापता हें. भारतीय सेना में अपनी बहादुरी के लिए सम्मानित सूबेदार मेजर का परिवार आपके शासन काल में भुखमरी का शिकार है. आदित्य बेरा के परिवार को भुखमरी से बचाने का जिम्मा किसका है...? आदित्य बेरा की विधवा पत्नी को भारतीय सेना से पेंशन दिलवाने का जिम्मा किसका है ...? आदित्य बेरा के परिवार जनो ने अपनी तंगहाली से परेशान होकर मीडिया को अपने घर आने से मना कर दिया है. गोकुलनगर की तापसी दास को 14 मार्च 2007 को गुप्तांग और जंघा में गोली लगी थी. तापसी दास विकलांगता से अभिशप्त होकर भिक्षाटन के सहारे जिन्दा है. मातंगनी हाजरा के साथ आज़ादी का संग्राम लड़नेवाली गोकुलनगर की 96 वर्षीया स्वतंत्रतासेनानी रशोमई दास अधिकारी का घर नंदीग्राम संग्राम के दौरान दो बार जला दिया गया. स्वतंत्रता सेनानी का पेंशन ठुकरानेवाली रशोमई दास अधिकारी से मिलकर तब रैमसे क्लार्क का दिल दहल उठा था. नंदीग्राम संग्राम "माँ-माटी-मानुष" की रक्षा के बुनियादी सूत्रवाक्य से शुरू हुआ था. कालांतर में यह "माँ -माटी - मानुष" आपकी पार्टी का राजनीतिक अस्त्र हो गया और इसी अस्त्र -मंत्र से आपने बंगाल की सत्ता हासिल की. शहीद आदित्य बेरा, तापसी दास, माँ रशोमई दास अधिकारी के प्रति राज्य का सम्मानजनक रवैया स्पष्ट होना चाहिए. नंदीग्राम के पीड़ितों के जख्म को भूलना, संघर्ष और शहादत की विरासत का अपमान होगा.

माननीया ममता बनर्जी जी, आप शांत चित्त से मेरे पत्र पर विचार करें. जो आपकी पार्टी के विरोधी हें, वे राज्य के शत्रु नहीं हें. उन्हें भी आपकी पार्टी के कार्यकर्ताओं -समर्थकों के समतुल्य नागरिकीय अधिकार प्राप्त हें. वे आपके राजनीतिक उदेश्यों और विचारधारा से सहमत हो जायें तो आपके समर्थक हो सकते हें. जो आपसे सहमत ना हों, उन्हें विरोधी और शत्रु मान लेना -अविवेकपूर्ण, अलोकतांत्रिक, अराजनीतिक और मानवाधिकार विरोधी फैसला है .आपने बंगाल में गरीब, मेहनतकशों और किसानों की समृधि का वादा किया है. मेहनतकशों के बच्चे मार्क्स को पढ़कर अपनी मेहनत का दाम जानने और अपनी हकों के प्रति सचेतन होने का ज्ञान प्राप्त करेंगे. आपने सी.पी.एम विरोध को मार्क्स विरोध के रूप में मार्क्स को पाठ्यक्रम से हटाकर गरीबों का अहित किया है. नंदीग्राम संग्राम के प्रमुख कर्ताधर्ता निशिकांत मंडल संग्राम पूर्व सी.पी एम् के समर्पित नेता थे. कालांतर में तृणमूल कांग्रेस के नेता हुए. लेकिन उनके लहू में मार्क्सवाद घुला था. मार्क्सवाद के बिना आप प्रतिरोध की संस्कृति की कल्पना नहीं कर सकती हें. मार्क्स सी.पी.एम नामक किसी राजनितिक दल की स्थाई संपत्ति नहीं हो सकते हें. मार्क्सवाद एक वैज्ञानिक दृष्टि है. मार्क्स को पाठ्यक्रम से अलग करने से आनेवाली पीढ़िया दृष्टिहीन हो जाएँगी. मार्क्स से घृणा का मतलब गरीबों से घृणा मान लिया जायेगा .आपके साथ सबसे कमज़ोर, मेहनतकश वर्ग की उम्मीदें जुडी हें. अमरीका भारतीय लोकतंत्र को निगलने के लिए तैयार है. मार्क्स के बिना हम अमरीका से बचने का रास्ता नहीं जान सकते. वैश्विक पूंजी के आखेट के विरुद्ध मार्क्स वैश्विक - मानवता का सबसे उम्दा प्रतीक है. आपको फिर से मार्क्स को समझने की कोशिश करनी चाहिए.

सुश्री ममता जी, नंदीग्राम में खड़े होकर बंगाल और भारत को देखने की कोशिश करिए तो आपको विराट बंगाल के भीतर विराट भारत दिखेगा. ग्रामेर मानुष, कृषक मानुष की समृद्धि के बिना बंगाल और भारत का उद्धार संभव नहीं है. नंदीग्राम में छूटी हुई आकाँक्षाओं को अंजाम दीजिये और अपनी चूकों के लिए भूल -सुधार व क्षमायाचना सार्वजनिक करिए. बंगाल के समाज में एक शहीद फौजी, एक स्वतंत्रता सेनानी माँ और एक वैज्ञानिक -प्रध्यापक की हैसियत मुख्यमंत्री से ऊपर रही है. आप इस वर्ग के प्रति राज्य सरकार की कृतज्ञता स्पष्ट करें. वरना पुलिस -प्रशासन की चूक और किसी मंत्री के बयान को संपूर्ण सरकार का दोष मान लिया जायेगा. और किसी सिंगुर-नंदीग्राम के रक्तपात के बिना भी आपकी सरकार अधोपतन की तरफ लुढ़कती जाएगी. मेरी राय पर मशविरा कर अपना पक्ष स्पष्ट करें तो नंदीग्राम के संघर्ष और शहादत की विरासत का सम्मान होगा, जिसकी ताप ने आपको सत्ता दिलाई है.

जय नंदीग्राम, जय सोनार बांग्ला, जय भारत...

सादर
-पुष्पराज
द्वारा - प्रगतिशील साहित्य सदन,
निकट-दूर शिक्षा निदेशालय,
अशोक राजपथ, पटना-6
मो. 9431862080

पुजारियों की पैदावार

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/27/2012 12:56:00 AM

जानी-मानी समाजशास्त्री मीरा नंदा ने फ्रंटलाइन में 4-17 जुलाई, 2009 अंक में छपे इस लेख में दिखाया है कि किस तरह भारत की शासन व्यवस्था गले तक ब्राह्मणवादी कीचड़ में लिथड़ी हुई है. इसके साथ-साथ उन्होंने यह भी दिखाया है कि किस तरह सार्वजनिक संसाधनों का इस्तेमाल करते हुए शिक्षा और खास कर उच्च शिक्षा में ब्राह्मणवादी मूल्यों और व्यवहारों को प्रोत्साहित किया जा रहा है. तरह-तरह के पाखंडी बाबाओं और पुरोहितों-देवताओं के इस दौर में किस तरह वित्त पूंजी और ब्राह्मणवादी हिंदू फासीवाद गले में गले डाले विकास कर रहे हैं, मीरा नंदा के इस आलेख में देखा जा सकता है. बर्बरता के विरुद्ध ब्लॉग से. अनुवाद: अमर


मानद विश्वविद्यालय का दर्ज़ा प्राप्त कई शैक्षिक संस्थान हिन्दू कर्मकाण्डों के खुदरा व्यापारियों के लिये आपूर्ति की महत्वपूर्ण कड़ियों की भूमिका निभा रहे हैं। भारत में जो बाज़ार के लिए फ़ायदेमंद है वही देवताओं के लिये भी फ़ायदेमंद सिद्ध हो रहा है। भारतीय मध्यवर्ग अपनी भौतिक सम्पदा में वृद्धि के अनुपात में ही ‘पूजा’ और ‘होम’ में भी उत्तरोत्तर वृद्धि करना आवश्यक और अनिवार्य समझता है। हर वाहन की ख़रीद के साथ पूजा होती है; ठीक वैसे ही जैसे ज़मीन के छोटे-से टुकड़े पर भी किसी निर्माण से पहले ‘भूमि-पूजन’ अनिवार्य होता है। और हर पूजा के साथ एक ज्योतिषाचार्य और एक वास्तुशास्त्री भी जुड़ा ही रहता है। और हर प्रतिष्ठित ज्योतिषाचार्य और वास्तुशास्त्री को कम्प्यूटर चलाना  और अंग्रेज़ी बोलना तो आना ही चाहिए ताकि वह अपनी बातों को ‘वैज्ञानिक’ ढंग से प्रस्तुत कर सके।

भारत के लगातार फलते-फूलते ‘देवताओं’ के बाज़ार को देख कर एक प्रश्न सहज ही दिमाग़ में आता है- ये मॉडर्न दिखने वाले पुजारी, ज्योतिषाचार्य, वास्तुशास्त्री, और अन्य कर्मकाण्डी दुकानदार आख़िर आ कहां से रहे हैं? सभी तरह के धार्मिक कर्मकाण्डों के लिए 21वीं सदी के हिन्दुओं की इस अनन्त मांग के लिए कर्मकाण्डी पुरोहितों की आपूर्ति आख़िर होती कहां से है? मानद विश्वविद्यालय हमेशा से ही पारम्परिक गुरुकुलों और वैदिक पाठशालाओं से लेकर घरों, मन्दिरों, दफ़्तरों, दुकानों, और बड़े-बड़े कॉरपोरेट बोर्डरूमों और अनिवासी भारतीयों तक फैली इस भारतीय मध्यवर्गीय शृंखला की एक महत्वपूर्ण कड़ी की भूमिका निभाते रहे हैं। ये विश्वविद्यालय, जिनमें से अधिकांश करदाताओं के पैसे से चलते हैं, अपने डिप्लोमा और डिग्रियों के द्वारा सक्रिय रूप से हिन्दू पुरोहित-कर्म का एक आधुनिक संस्करण तैयार कर रहे हैं और उसे मध्यवर्ग के लिए एक आर्थिक रूप से सुविधाजनक रोज़गार के रूप में भी प्रस्तुत कर रहे हैं। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने माध्यमिक स्तर से आगे की शिक्षा में ज्योतिष और कर्मकाण्ड को सम्मिलित करने के 2001 के अपने एक कुख्यात निर्णय से पहले से ही मौजूद उन संस्कृत संस्थाओं को एक नया जीवन-दान दे दिया जिन्हें विश्वविद्यालय का दर्ज़ा प्राप्त था। साथ ही भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय लोकतान्त्रिक मोर्चे की सरकार ने मानद विश्वविद्यालयों का एक ऐसा नेटवर्क तैयार कर दिया जो हिन्दू पुरोहितों के प्रशिक्षण के लिए लगातार प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से सहायक बना हुआ है। अब भाजपा चाहे अगले कई वर्षों तक भी राजनीतिक सत्ता से दूर रहे फिर भी सत्ता में रहते समय इसने जो संस्थागत ढांचा तैयार कर दिया था वह परम्परागत हिन्दू ज्ञान-विज्ञान को बढ़ावा देने के इसके उद्देश्य की पूर्ति करता रहेगा। 2001 में जब विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने उच्च शिक्षा में ज्योतिष शास्त्र को शामिल करने का निर्णय लिया तब तक अपने ज्योतिष और कर्मकाण्ड सम्बन्धी पाठ्यक्रम के लिए जाने माने तीन अखिल भारतीय संस्थानों को मानद विश्वविद्यालय की मान्यता मिल चुकी थी। वे संस्थान हैं- श्री लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ, नई दिल्ली, राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ,तिरुपति, और गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार।

इन संस्थानों की विशेषज्ञता शास्त्रीय ज्ञान के बारे में है जिसमें ज्योतिष, पौरोहित्य और योग के उच्चतर पाठ्यक्रम भी शामिल हैं- वेद-वेदांग के नियमित पाठ्यक्रम के एक भाग और विशिष्ट डिप्लोमा या सर्टीफ़िकेट पाठ्यक्रमों के रूप में भी। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (और तदोपरान्त उच्चतम न्यायालय) द्वारा ज्योतिष पाठ्यक्रम को हरी झण्डी दिखाये जाने के बाद से इनका अच्छा-ख़ासा विस्तार देखने में आया। उदाहरण के लिए श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ ने 10वीं पंचवर्षीय योजना (2002-07) के दौरान ही अपने ज्योतिष विभाग के लिए नये उपकरण ख़रीदे और एक जन्म-कुण्डली बैंक स्थापित किया। ज्योतिष और पौरोहित्य में अंश-कालिक डिप्लोमा और सर्टीफ़िकेट कार्यक्रमों को प्रारंभ करके भी इसने अपने प्रभाव-क्षेत्र का विस्तार किया। पर यह तो पानी पर तैरते हिमशैल का शिखर मात्र था।

मई, 2002 में नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संस्कृति संस्थान (आर एस एस) को विश्वविद्यालय की मान्यता मिली। यह पुरानी और प्रतिष्ठित संस्था (स्थापना-1970) जो लम्बे समय से प्राचीन संस्कृत पाण्डुलिपियों और संस्कृत विद्वानों के संरक्षण के कार्य में लगी हुई थी अब नये पाठ्यक्रम बनाने, नये कोर्स प्रारम्भ करने और नई डिग्रियां प्रदान करने के लिए अधिकृत कर दी गई। इसके दसों कैम्पसों (इलाहाबाद, पुरी, जम्मू, त्रिचूर, जयपुर, लखनऊ, श्रिंगेरी, गरली, भोपाल, मुम्बई) को भी विश्वविद्यालयों के समकक्ष होने की मान्यता मिली हुई है अर्थात उनमें से प्रत्येक (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के पहले से ही परम उदार दिशा-निर्देशों के दायरे के अन्तर्गत) नये पाठ्यक्रम तैयार करने और डिग्रियां और डिप्लोमा प्रदान करने के लिये अधिकृत है। संस्थान इन कैम्पसों और नई दिल्ली और तिरुपति के उपरोक्त विद्यापीठों की गतिविधियों को समेकित करने के लिए केन्द्रक की भूमिका निभाता है। ग़ैर सरकारी गुरुकुलों और वैदिक पाठशालाओं को अनुदान और वित्तीय सहायता देना इसके कार्यभारों में से एक है। संस्कृत डिग्री धारकों के लिए रोज़गार के अवसर बेहतर करने के लिये संस्थान ज्योतिष और कर्मकाण्ड से जुड़े पाठ्यक्रमों के लिये छात्र वृत्तियां भी देता है। इसी सन्दर्भ में उन दो संस्थाओं को अभी हाल में ही ‘योग विश्वविद्यालय’ की मान्यता दिये जाने का उल्लेख भी आवश्यक है जो सीधे-सीधे ज्योतिष और कर्म-काण्ड से तो नहीं जुड़े हैं परन्तु फिर भी पुजारियों की अनवरत आपूर्ति सुनिश्चित करने में जिनकी भूमिका महत्वपूर्ण है। वे संस्थाएं हैं- बेंगलुरु स्थित स्वामी विवेकानन्द योग अनुसन्धान संस्था जिसे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने 2001 में मान्यता प्रदान की थी, और मुंगेर फ़ोर्ट, बिहार स्थित बिहार योग भारती जिसे 2000 में विश्वविद्यालय के समकक्ष होने की मान्यता मिली।

पुरोहित-प्रशिक्षण संस्थानों के इस उलझे हुए ताने-बाने में दो और धागे भी हैं। केन्द्र सरकार उज्जैन स्थित महर्षि सान्दीपनि राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान को वित्तपोषित करती है जो देश भर में कुकुरमुत्तों की तरह उगती ग़ैर सरकारी वैदिक पाठशालाओं और गुरुकुलों को मान्यता और धन उपलब्ध कराने वाली संस्था के रूप में कार्य करता है। इन गुरुकुलों का मानकीकरण और उदीयमान पुरोहितों के लिए परीक्षाएं आयोजित करना इस संस्था के कार्यभारों में से हैं। इस संस्था से मान्यता मिलना गुरुकुलों की दुकान चलाने के लिए माने रखता है।

पूर्वोक्त मानद विश्वविद्यालयों के अलावा भी विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा अनुमोदित राज्य स्तरीय विश्वविद्यालयों की एक श्रेणी है जिसमें मध्यप्रदेश स्थित महर्षि महेश योगी का विश्वविद्यालय और रामटेक, महाराष्ट्र स्थित कवि कुलगुरु कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय शामिल हैं। इन्हें विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से विश्वविद्यालय की पदवी स्थापना के पश्चात नहीं मिली अपितु इनकी तो स्थापना ही इनके प्रान्तीय विधान-मण्डलों द्वारा अपने आप में सम्पूर्ण विश्वविद्यालयों के रूप में की गई थी और बाद में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा मान्यता प्रदान कर दी गई।

महर्षि महेश योगी वैदिक विश्वविद्यालय की स्थापना कांग्रेस मुख्यमन्त्री दिग्विजय सिंह के कार्यकाल में 1995 में राज्य विधानमण्डल के सर्वसम्मत प्रस्ताव द्वारा की गई थी। ऐसा महेश योगी को मध्य प्रदेश के अपने धरतीपुत्र के रूप में सम्मानित करने के लिए किया गया था। यह संस्था सभी तरह के वैदिक ज्ञान में पीएच-डी आदि उच्च शैक्षिक उपाधियों का स्रोत बन चुकी है। इसके अनेक स्नातकों ने आगे चल कर कई मुनाफ़ा कमाने वाले उद्योग स्थापित किये और/या वास्तुशास्त्रियों, ज्योतिषियों, रत्नशास्त्रियों इत्यादि के तौर पर अकादमियों की स्थापना की।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की मान्यता प्राप्त ये राज्य-स्तरीय विश्वविद्यालय और योग विश्वविद्यालय देश भर में जहां-तहां उगते छोटे-मोटे गुरुकुलों और वैदिक पाठशालाओं के लिए अन्तिम सीढ़ी की भूमिका निभाते हैं। इनमें से कई पौरोहित्य पाठशालाएं छोटे-छोटे साधनहीन लड़कों (लड़कियां निषिद्ध हैं) को प्रवेश देकर उन्हें पारम्परिक कर्मकाण्ड का प्रशिक्षण देते हैं। पर क्योंकि वे अकादमिक डिग्रियां प्रदान करने के लिये अधिकृत नहीं हैं अतः वे अपने छात्रों को किसी भी ऐसे मानद या मान्यताप्राप्त राज्य-स्तरीय विश्वविद्यालय में भेज देते हैं जिसकी विशेषज्ञता योगिक अथवा वैदिक विज्ञानों में हो जिनके दायरे में मोटे तौर पर ज्योतिष से लेकर योग तक सभी कुछ आ जाता है। इससे पुजारियों और कर्मकाण्डियों के रूप में देश-विदेश के बाज़ारों में उनके विद्यार्थियों की ‘मार्केटेबिलिटी’ बेहतर हो जाती है।

ये सही है कि संस्कृत की शिक्षा का हिन्दू धर्म के कर्मकाण्डों से गहरा सम्बन्ध है और कई बार दोनों को अलग-अलग करना कठिन होता है। यज्ञ या पूजा संस्कृत की डिग्री प्राप्त करने के लिये यजुर्वेद के अध्ययन का एक प्रायोगिक पहलू मात्र है। परन्तु संस्कृत में लिखे धार्मिक साहित्य के अध्यापन और कर्मकाण्डों के अध्यापन के बीच में कोई सीमारेखा खींचने का प्रयास करने के स्थान पर भारतीय शिक्षा व्यवस्था ठीक विपरीत दिशा में मुड़ गई है। यह संस्कृत और हिन्दू दर्शन की शिक्षा की आड़ में जनता के पैसे और संसाधनों का उपयोग हिन्दू कर्मकाण्डों को बढ़ावा देने के लिए कर रही है।

अगर भारत अपने सार्वजनिक संसाधन मानद विश्वविद्यालयों के माध्यम से बहुमत के धर्म को प्रोत्सहित करने में झोंकता है तो क्या वह ख़ुद को एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य कह सकता है?

झारखंड: संगीनों पर सुरक्षित गांव

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/23/2012 07:03:00 PM

यह उन लोगों की कहानियां हैं, जो आजादी, इंसाफ और शांति के साथ जीना चाहते हैं. अपने गांव में खेतों में उगती हुई फसल, अपने जानवरों, अपनी छोटी-सी दुकान और अपने छोटे-से परिवार के साथ एक खुशहाल जिंदगी चाहते हैं. लेकिन यह चाहना एक अपराध है. अमेरिका, दिल्ली और रांची में बैठे हुक्मरानों ने इसे संविधान, जनतंत्र और विकास के खिलाफ एक अपराध घोषित कर रखा है. उनकी फौजें गांवों में हत्याएं करती फिर रही है, फसलों और अनाजों को तबाह करती, कॉरपोरेट कंपनियों के लिए इलाके की जमीन पर कब्जा करने की कोशिश करती, बलात्कारों और आगजनी का सहारा लेती हुई ये फौजें दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की फौजें हैं.लोग जब पलट कर जवाब देते हैं तो वे आतंकवादी करार दिए जाते हैं. अपने समय की कई दबा दी गई सच्चाइयों को पेश करती, चंद्रिका की रिपोर्ट, जिसे उन्होंने झारखंड के अपने दौरे से लौट कर लिखा है. चंद्रिका हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा में शोध करते हुए स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं.   
नैतिकता की रक्षा के करने के लिए कुरुक्षेत्र में 18 अक्षौहिणी सेना की विनाश लीला की भी हम निंदा नहीं करते बल्कि उन सबों से हम राष्ट्रहित की सीख लेते हैं.
-जी.एस.रथ, डी.जी.पी. झारखण्ड, प्रभात खबर, 30 मार्च 2012, पृष्ठ-6

भारतीय राज्य हमारे आंदोलन को हिंसा के नाम पर दुष्प्रचारित करता है क्योंकि वह हिंसा पर एकाधिकार चाहता है, जबकि राज्य के परमाणु बम से लेकर बृहद सैन्य बल अहिंसा के लिए नहीं हैं. 
प्रशांत, माओवादी पार्टी के सदस्य

यह मार्च की पतझड़ का मौसम है. पेड़ों की पत्तियां सूख कर गिर चुकी हैं और रात के तकरीबन नौ बजे हैं जब हम जंगल में अपना रास्ता भूल चुके हैं. झारखण्ड झाड़ों का प्रदेश है और यहां घूमते हुए यह महसूस किया जा सकता है  कि यहां राज्य, नौकरशाही और लोकतंत्र सब अपना रास्ता भूल चुके हैं. यह गढ़वा और लातेहार के बीच की कोई जगह है. मेरे साथ दैनिक भास्कर के पत्रकार सतीश हैं जिन्हें कुछ महीने पहले माओवादी होने के आरोप में पुलिस द्वारा प्रताड़ित किया जा चुका है. सड़क जैसी कोई चीज इन्हीं पत्तियों के नीचे दबी है जो साहस के साथ बगैर किसी पुल के नदी और नालों के उस पार निकल जाती है, मसलन नदी को सड़क नहीं, सड़क को नदी पार करती है.  हम मोटरसाईकिल को बार-बार रोक, पीछे मुड़ कर देखते हैं और स्वाभाविक भय के साथ आगे बढ़ जाते हैं. सूखी पत्तियों पर घूमते पहिए किसी के पीछा करने का आभास देते हैं. यह पहियों के रौंदने से पत्तियों के चरमराने की  आवाज है. साखू के फूल पूरे जंगल को  खुशबू से भरे हुए हैं पर खौफ और भय किसी भी खुशबू और आनंद पर भारी होते हैं. सतीश को इन इलाकों में जंगली जानवरों का उतना भय नहीं है जितना कोबरा बटालियन का, जो कई बार ग्रीन हंट अभियान के दौरान रात को जंगलों में रुक जाती है. यह अभियान “माओवादियों के सफाए” के लिए इन इलाकों में पिछले दो वर्षों से चलाया जा रहा है. सतीश एक घटना का जिक्र करते हैं जिसमे सी.आर.पी.एफ. ने एक गूंगे-बहरे चरवाहे की कुछ दिन पहले गोली मारकर हत्या कर दी है. 20-25 कि.मी. भटकने के बाद हमे वह रास्ता मिल जाता है जिसके सहारे हम जंगल से बाहर निकल पाते हैं.

हम अपनी यात्रा की शुरुआत कर रहे थे जबकि यहां के स्थानीय पत्रकारों ने मुलाकात की और वे इन इलाकों की कहानियां सुनाते रहे. मौत और हत्याओं की कहानियां, बरसों पहले के किस्से, झारखण्ड बनने के बाद से कल परसों तक के किस्से. कहना मुश्किल है कि झारखण्ड बना या बिगड़ गया. जबकि राज्य और ज्यादा असुरक्षित हुआ और स्कूलों-गांवों में सी.आर.पी.एफ. व कोबरा कमांडो लगा दिए गए. लोगों की सुरक्षा यह है कि इन इलाकों से अक्सर कोई गायब हो जाता है और हफ्ते-दस दिन बाद गांव वालों को अखबारों से पता चलता है कि उसकी लाश किसी नदी किनारे या किसी नाले में सड़ चुकी है या जिले पार किसी जेल में उसे कैद कर दिया गया है. सैन्य बल उसे ‘माओवादी’ बताते हैं जो एक “मुठभेड़” में मारा गया और यदि वह कैद है तो जाने कितने ‘इल्जामों’ का दोषी. वह उन घटनाओं का भी दोषी है जो उसके सूरत या बम्बई में किसी फैक्ट्री में काम करते हुए घटित हुई. गांव के लोगों को तब थोड़ा सुकून होता है जब गायब शख्स जेल में पहुंच जाता है. यहां जेल में पहुंचना ही सुरक्षित होने का प्रमाण है. जबकि कुछ प्रमाण ऐसे भी हैं कि वर्षों पहले गायब लोग अभी तक जेल नहीं पहुंचे और न ही उनकी लाश मिली है. पिता, पत्नी और परिवार के अलावा ऐसे लोगों का इंतजार अब कोई गांव वाला नहीं करता. क्योंकि लोगों को पता हैं कि किसी भी इंतजार की एक उम्र होती है.

लातेहार जिले में जिस जगह पर हम रुके हुए हैं वहां से बरवाडीह तकरीबन 20 किमी. है. जयराम प्रसाद अपने छोटे बेटे के साथ तड़के ही हमसे मिलने पहुंचते हैं और बातचीत शुरु हो इससे पहले उनका गला रूंध जाता है. वे देर तक रोते रहते हैं. फिर वे बताते हैं कि 21 मार्च को पुलिस ने उनके बड़े बेटे संजय को थाने में बुलाया था और आज पांच दिन से वह लापता है. संजय बरवाडीह में मोबाइल की एक दुकान चलाता था. कोई अधिकारी कहता हैं कि बातचीत के बाद उन्होंने उसे उसी रात छोड़ दिया था, एस.पी. क्रांति कुमार कहते हैं कि उसे मंडल के आस-पास जंगल से 23 की रात को पकड़ा गया है. जयराम कानून का हवाला देते हुए कहते हैं कि अगर एस.पी. की ही बात को सही मान लें तो 24 घंटे में उसे कोर्ट के सामने प्रस्तुत किया जाना चाहिए था पर पांच दिन बीत चुके हैं. यदि उसे छोड़ दिया गया तो 35 साल की उम्र में क्या वह अपने घर का रास्ता भूल जाएगा. जयराम की आशंकाएं कुछ और हैं पर अभी तक किसी लावारिस लाश की खबर किसी भी अखबार में नहीं छपी है. उस दोपहर हमें पता चला कि संजय को माओवादियों का सहयोग करने के आरोप में जेल भेज दिया गया है. पकड़े जाने के पूरे छह दिन बाद, इन इलाकों में ‘सहयोग’ सबसे बड़ा जुल्म है. यह ‘सहयोग’ किसी अपराध में सहयोग करना नहीं है बल्कि इंसानी व्यवहारों के तहत किया गया सहयोग है. कि वे गांव या पड़ोस के गांव से आए किसी आगंतुक को खाना खिलाते हैं, संभव है वह पड़ोस का ही कोई युवक हो, वे उसे पानी पिलाते हैं. अगले दिन पुलिस आती है और गांव वालों के इस व्यवहार को ‘अपराध’ घोषित कर देती है ‘माओवादियों को सहयोग करने का अपराध’. सामुदायिकता के इस सहज व्यवहार और सामाजिकता को राज्य ने प्रतिबंधित कर दिया है. तो क्या लोगों को ‘असामाजिक’ हो जाना चाहिए कि भूखे को खाना न खिलाएं, कि प्यासे को पानी न पिलाएं और एक राहगीर को रास्ता न बताएं. मानवाधिकार के प्रश्न बहुत पीछे छूट चुके हैं. शायद यह जैव अधिकार या जैव व्यवहार जैसी किसी अवधारणा के दायरे में आएगा. एक मोबाइल और सिम` का दुकानदार आखिर अपने सामान को किसे बेचे जबकि पुलिस व सैन्य बल की निगाह में जाने कौन ग्राहक कल माओवादी घोषित कर दिया जाए.

बरवाडीह के लादी गांव में परइया, कोरबा और उरांव जनजाति के तकरीबन 80 घर हैं. यह एक घाटी नुमा जगह है जो चारों तरफ पहाड़ों से घिरी हुई दिखती है. गांव की तरफ आती हुई लीक खत्म होती है और पहला घर जसिंता देवी का है जो पुलिस की गोली से अपने घर में ही मारी गई थी, इस घटना को एक लंबा अर्सा बीत चुका है. हमारे पहुंचते ही एक महिला आंगन में उस जगह जा कर खड़ी हो जाती है जहां जसिंता देवी गोली से निढाल हुई थी. वह महिला जसिंता देवी की सास हैं. क्रोधित हो उन्होंने हमे पहले कैमरा बंद करने को कहा. फिर बताया कि पुलिस उस दिन माओवादियों को खोजने आई थी और हमारे घर में आग लगाना चाह रही थी जिसका जसिंता ने विरोध किया और वह उनकी गोलियों से मारी गई. मिट्टी की दीवारों में गोलियों के निशान अभी भी बने हुए हैं. जसिंता को जिस समय गोली मारी गई उसकी 7 महीने की बेटी प्रियंका उसके पास ही थी जो अब थोड़ी बड़ी हो गई है. गांव वाले बताते हैं कि पुलिस ने अपनी इस हत्या का इल्ज़ाम माओवादियों पर लगाया. चुरकुन पहड़िया गुस्से में बोलते हैं कि गांव में एकता है और हमने पुलिस को दोबारा यहां आने से मना कर दिया है. जब दोबारा पुलिस आई तो हमने उसे खदेड़ भी दिया. अक्सर गांवों मे हमने पाया कि ह्त्या के बाद सैन्य बलों द्वारा दी गयी एक “मोहलत” होती है. वे कुछ महीने तक दुबारा गांव में लौटकर नहीं आते. एक हत्या पूरे गांव में वर्षों तक खौफ को जिंदा रखती है. खौफ इतना कि लोग काम करने के बाद मजदूरी लेने तक से डरते हैं. मनरेगा, सड़क निर्माण, इंदिरा आवास जैसी योजनाओं के लिए वे काम करते हैं और उनकी मजदूरी इन योजनाओं की तरह ही अधूरी पड़ी है.

वहां लड़कियां फिर से स्कूल जाने लगी हैं और कुछ बच्चे स्कूल की चहरदीवारी पर बैठे हैं. करमडीह के स्कूल से सैन्य बलों का कैंप वापस जा चुका है. यह एक सामान्य स्थिति है जो 31 जनवरी की शाम के दहशत के बाद लौटी है. दुकानदार ने अपने घर के आसपास खोदी गई मिट्टी को पाट दिया है. सैन्य बलों द्वारा यह खुदाई माओवादियों के छुपाए गए शस्त्र खोजने के लिए की गई थी. यहां से उन्हें भिंडी के पौधे की कुछ जड़ें मिली थी. 31 जनवरी की शाम को सात बजे माओवादियों के एक दस्ते ने हवाई फायरिंग की. देर रात तक गोलियां चली, देर रात तक दहशत पली. लोग बंदूकों की एक आवाज के बाद दूसरी आवाज का इंतज़ार करते रहे और दूसरी के बाद तीसरी फिर सुबह जाने किस गिनती के बाद आई. सुबह तक सब कुछ शांत हो चुका था. रात की घटना के अवशेष में दीवारों पर सुराख के निशान बचे थे. अगले दिन सैन्य बल स्कूल छोड़कर चले गए, उसके एक दिन बाद बच्चे भी स्कूल चले गए. अध्यापकों से ज्यादा इन स्कूलों में बच्चे खाना बनानेवाले का इंतजार करते हैं और स्कूल की चहरदीवारी पर बैठे बच्चे वही कर रहे हैं.

अगले गांव नवरनागू जाने के लिए यहां से हमे पैदल चलना था, पहाड़ी के उस पार तक. यह कोयल नदी के किनारे का एक गांव है. 250 किमी. लम्बी इस नदी में कई छोटी नदियां मिलती हैं. अपनी पूरी यात्रा के दौरान हमने कोयल नदी को कई बार पार किया. गांव में एक महिला चटाई बीन रही है, यह किसी पेड़ की मजबूत पत्तियां हैं जिन्हें एक-दूसरे के ऊपर-नीचे गूथा जा रहा है. एक कमसिन उम्र की बच्ची झाड़ू बुहार रही है, गांव के अकेले अध्यापक पढ़ाने के लिए चले गए हैं. लूकस मिंज की हत्या को एक महीने बीत चुके हैं. गांव से ढोल परवला तकरीबन एक किमी. की दूरी पर था, जहां लूकस मिंज की लाश नदी की रेत पर 5 दिनों बाद पाई गई थी, जो पानी में सड़ चुकी थी. लूकस बोलने और सुनने में अक्षम थे और नदी किनारे वे गाय चराने जाया करते थे. उनकी हत्या की सही तारीख गांव के लोगों को नहीं पता पर यह शायद 1 फरवरी की तारीख थी. इस घटना को नदी में एक मछली पकड़ने वाले ने देखा था, सैन्य बलों ने नदी के उस पार से दो गोलियां चलाई थी. एक महीने बीत चुके हैं सैन्य बलों ने इधर आना स्थगित किया हुआ है.

हम छत्तीसगढ़ की सीमाओं को छूते हुए बल्लीगढ़ और होमिया पहुंचे थे. राज्य ने भले ही प्रेदेशों की इन सीमाओं को निर्धारित किया हुआ है पर प्रकृति और लोगों ने उसे मान्यता नहीं दी है. इन गांवों के लिए छत्तीसगढ़ एक बाजार है, एक ओकड़ा (ओझा) का घर है, वहां से आकर एक बैगा रोज यहीं घूमा करता है, छत्तीसगढ़ का सबकुछ यहां ज्यादा से ज्यादा सुलभ है. यह गढ़वा जिले का एक बड़ा गांव है 12 किमी. में फैला हुआ. भुइयां, खरवार और गोड़ आदिवासियों की दस हजार जनसंख्या वाला गांव. एक गांव जिसमे दो नदियां बहती हैं. हम यहां के कुछ युवकों के साथ गांव के बीच बहती पोपरा नदी तक गए. हमने यहां ज्यादा वक्त गुजारा और गांव का लंबा इतिहास सुना. इस गांव का इतिहास एक स्थानीय सामंत रामनाथ पाण्डे उर्फ फुल्लू पाण्डे के प्रताड़ना का इतिहास है. जिसके इल्जामों के दस्तावेज संक्षेप में लिखना भी मुश्किल है. एकनाथ भुईयां 67 साल पहले से कहानी को शुरु करते हैं जब फुल्लु पाण्डे का परिवार यहां आकर बसा था. गांव के लोगों ने एक ब्राम्हण को पूजा-पाठ के लिए बसा लिया था. गांव की सैकडो एकड़ जमीन अब उसके कब्जे में है. जमीनों पर यह कब्जेदारी भूदान और भू-सुधार के बाद की कथा है. अभी पिछले बरस ही गांव वालों की 150 एकड़ जमीन के कागजात बनवाकर स्थानीय सामंत फुल्लु पाण्डे ने जिंदल के हाथों बेच दिया है. गांव वाले जमीन को अब भी जोत रहे हैं, उन्होंने अपने जमीन के कागजों पर शहर में जाकर लेमिनेशन करवा लिया है कि कागज मजबूत रहेगा तो जमीन बनी रहेगी. पर लगातार यह भय बना हुआ है कि जिंदल जाने कब आ जाए. हम बीच में एकनाथ से किसी घटना की तारीख पूछते हैं तो वे अपनी भाषा में कहते हैं कि हम नहीं जानते कि तारीख कितने किलो की होती है. वे बताते हैं कि हम धन से नहीं, मन से पढ़े लोग हैं.

उनकी आवाज तब थोड़ी धीमी हो जाती है. यह गांव की बहू-बेटियों से जुड़ा मसला है. लड़कियों की उम्र बढ़ती, गांव में नई बहुएं आतीं तो किसको बख्श देना है यह फुल्लू पाण्डे की इच्छा पर निर्भर करता. लेकिन सैकडों को उसने नहीं बख्शा, इन घटनाओं के आंकड़े क्रूरता और शर्मिंदगी के हैं जिन्हें कोई नहीं जुटाता. ऐसी घटनाओं का जिक्र करने के बाद मैने एकनाथ के चेहरे पर पछतावे का भाव देखा मानो अपने गांव के विरुद्ध उसने कोई अपराध कर दिया हो. एक लड़का जो पेड़ से सटा हुआ बैठा है उसकी उम्र तकरीबन 25 साल है और उसकी छह एकड़ जमीन चली गई है. वह कहता है कि अगर एम.सी.सी. (यानी भाकपा-माओवादी) के लोग गांववालों का साथ देंगे तो जिंदल यहां नहीं आएगा. फुल्लु पाण्डे अब गांव से दूर किसी कस्बे में रहने लगा है. अब तक गांव के सैकड़ों लोग इकट्ठा हो चुके हैं. हमारे कागजों पर सब अपना नाम दर्ज करा देना चाहते हैं. जाने उनकी क्या उम्मीदें हैं कि कागजों पर लिखे उनके नाम उनकी जोत की जमीन के दस्तावेज बन जाएंगे

गढ़वा, पलामू और लातेहार के कई गांवों में हम घूमते रहे. कहानियां बदल जाती थीं, पीड़ाएं कम या ज्यादा हो जाती थीं, बस. दुकानदार, किसान, मजदूर और गांव के सरपंच जाने कितनों पर माओवादियों के सहयोग करने का आरोप है, उन्हें खाना खिलाने का आरोप, किसी विस्फोट में शामिल होने का आरोप. खाना खिलाने के आरोप में बरगड़, कुमीकोला के सरपंच रामदास मिंज और फिदा हुसैन 20 जनवरी से जेल में हैं. उन पर आरोप यह भी है कि भंडरिया में माओवादियों द्वारा सैन्य बलों की जो गाड़ी उड़ाई गई, वे उस घटना में सहयोगी थे. जबकि गांव वालों का कहना है कि इस घटना के 12 घंटे पहले ही पुलिस उन्हें थाने में लेकर गई थी और घटना के दौरान वे थाने में ही थे. क्या राज्य के विरुद्ध माओवादियों के सहयोग में पूरा का पूरा इलाका खड़ा है? क्या और क्यों के प्रश्न अनुत्तरित रह जाते हैं.

झारखण्ड के एक सशस्त्र माओवादी दस्ते ने एक दोपहर हमसे मुलाकात की. यह कोयल नदी के किनारे की कोई जगह थी. अपनी लंबी बातचीत के दौरान उन्होंने कई ऐसे तथ्य बताए जो उनके संघर्ष से सीधे तौर पर जुड़े हुए थे. उन्होंने टीपीसी, जेएलटी, जेपीसी, पीएलएफआई और जेजेएमपी जैसे संगठनो पर आरोप लगाए जो माओवाद के नाम पर उनके संघर्ष को बदनाम कर रहे हैं और जिनमे से कुछ को पुलिस द्वारा संरक्षण भी मिला हुआ है. वे चिंतित थे कि सैन्य बलों द्वारा गांव वालों पर जो कार्यवाही की जा रही है उससे आदिवासियों की आर्थिकी पर इस बार भारी असर पड़ने वाला है. यह महुआ और तेंदू पत्ते का मौसम है. सैन्य बलों की प्रताड़ना के भय से लोग इसे इकट्ठा करने के लिए अपने गांव से दूर नहीं जा पा रहे. कई उत्तरों के साथ हम लौट आए और ज़ेहन में नए प्रश्न उभरने गले. झारखण्ड मानवाधिकार संगठन के शशिभूषण पाठक ने डी.जी.पी. जी.एस. रथ से मिलने की इच्छा जाहिर की पर वे राज्यसभा के चुनाव में व्यस्त थे. उन्होंने मिलने से इनकार कर दिया. अलबत्ता दूसरे दिन उनका एक लेख अखबार में छपा जिसमें वे महाभारत के युद्ध से राष्ट्रहित की सीख लेने की सलाह दे रहे थे. शायद वे इस मिथक के सहारे झारखण्ड की मिट्टी को युद्ध में लाल होने की हिमायत में खड़े हैं.

इस दौरान अखबार हमारी पहुंच से दूर थे, पर हम कई अप्रकाशित खबरों के करीब. बहेरटाड़ के सरपंच बीफा और गांव के अन्य 8 लोगों को हफ्ते भर पहले सीआरपीएफ ने पिटाई के बाद छोड़ दिया है. बीफा की दाहिनी आंख से दिखना कम हो गया है. गांव के बगल में सीआरपीएफ का एक स्थायी कैम्प बनाया जा रहा है. बगल ही मुर्गीडीह गांव है जहां बिरजू ओरांव की दसो उंगलियों को कटर से चीड़ दिया गया है, उंगली में पट्टी बांधकर वे काम पर चले गए हैं. अपनी-अपनी तकलीफों के साथ सब अपने-अपने गांव में जिंदा हैं.

संतोष जिनके दोस्त राजेन्द्र प्रसाद की हत्या जतिन नरवाल एस.पी. के आवास में पिटाई से हुई थी, इसके एवज में राजेन्द्र की पत्नी मंजू को कोई नौकरी दे दी गई है. संतोष जो राजद के स्थानीय नेता हैं वे अपने दोस्त की हत्या के अपराधियों को सजा दिलाना चाहते हैं. उनको लगातार धमकियां मिल रही हैं. कुछ माओवादी घटनाओं के तहत इनका नाम अखबारों और पुलिस के दस्तावेजों में शामिल किया जा चुका है. सुल्तानी घाटी में नशे मे धुत सीआरपीएफ के ‘जवानों’ ने एक टेम्पो ड्राइवर दारा सिंह की कुछ दिन पहले हत्या कर दी है. चंद दिनों में अनगिनत घटनाएं हैं. वह जो अखबारों में प्रकाशित हुई और वे जिनका किसी अखबार में कोई जिक्र भी नहीं. गांव में अखबार कम पहुंचते हैं और अखबारों में गांव भी.

यह 28 मार्च की तारीख थी जब रात के 10 बजे हम चेमू-सान्या पहुंचे. यह 1857 के क्रांतिकारी नीलांबर-पीतांबर का गांव है, यहां आने के लिए सड़क को 20 किमी. पीछे छोड़ना पड़ता है. जिसके सहारे यहां तक हम पहुंचे हैं वह नदी-नाले-सड़क-खाई का एक मिश्रित रूप है. पूरे झारखण्ड में आज उनकी 153वीं शहादत मनाई जा रही है. झारखण्ड के नेता नामधारी सिंह इंदर चंदवा में नीलांबर-पीतांबर की प्रतिमा स्थापना के लिए आए हुए हैं. उन्होंने युवावों से नीलांबर-पीतांबर जैसा होने का आह्वान किया है. आज के ही दिन नीलांबर-पीतांबर विश्वविद्यालय ने भी एक बड़ा आयोजन रखा है. माओवादियों के स्शस्त्र दस्ते ने धनकारा गांव में मशाल जुलूस निकाला है. हम गांव के एक सिरे पर हैं यहां काफी ठंड है, गांव के लोगों ने सूखी लकड़ियां जला रखी हैं और इसके आस-पास कुछ लोग बैठे हैं. अलाव की रोशनी के सहारे इर्द-गिर्द के 2-3 घरों को देखा जा सकता है. बांस के फट्ठों का एक लंबा-सा तख्त है जहां गांव के लोग अक्सर इकट्ठा हुआ करते हैं. किसी भी आयोजन से गांव के लोग अनभिज्ञ हैं. शायद माओवादियों का एक दस्ता थोड़ी देर पहले यहां से गुजर चुका है. थोड़ी देर बाद कुछ बच्चे आते है, जो संघम के बाल कलाकार है और जलते अलाव की आंच में जीतन मरांडी के कुछ गीत सुनाते हैं. ये झारखण्ड के लूटे जाने के गीत हैं, इनमे लोगों के संघर्ष में बुलाने की पुकार है. यह गांव कुटकु-मंडल बाध परियोजना के तहत 32 डूबने वाले गांवों में से एक है. 1912 में पूरे सौ साल पहले किए गए सर्वे के आधार पर लोगों की जमीनों का जो मुआवजा तय किया गया था वह कुछ लोगों को मिल चुका है. इन सौ वर्षों में पीढ़ियां बदल चुकी हैं और उनके गांव छोड़ने के इरादे भी. 1972 में बांध बनने की जो परियोजना चालू हुई थी वह 97 से स्थगित है. बगैर किसी सूचना के बांध के इंजीनियर बैजनाथ मिश्रा ने बांध के अस्थाई फाटक को बंद कर दिया था और पूरा इलाका डूब गया था. जानवरों की संख्या नहीं गिनी जा सकी, तबाही के अन्य आंकलन नहीं लगाए जा सके पर 21 लोग पानी में डूब कर मर गए. बनवारी लाल अंतिम युवक के मौत की याद सुनाते हैं कि कैसे वह 7 दिनों तक बगैर कुछ खाए-पीए पेड़ पर लटका रहा और जब लोग तसले के सहारे तैरते हुए उसके पास पहुंचे तो अचानक वह पानी में गिर गया. डूबते गांवों से लोगों को बचाने इस दौरान कोई प्रसाशन न आया. माओवादियों ने उसी बीच इंजीनियर बैजनाथ को इस तबाही के इल्जाम में मौत की सजा सुनाई और उसकी हत्या कर दी गई. इसके बाद परियोजना का कार्य स्थगित कर दिया गया. यह स्थगन अभी भी जारी है और 32 गांवों का उजड़ना थम-सा गया है. लोगों के पलायन की वजहें बदल गयी हैं. अब सैन्य बल आते हैं और माओवादियों के सहयोग के लिए युवकों को पीटते हैं, उनके घरों के ताले तोड़ दिए जाते हैं, वे उनके अनाज एक दूसरे में मिला देते हैं. मनगू, सतीस, जोखन सिंह, करम दयाल सब कहीं चले जाना चाहते हैं. ऐसी जगह जहां वे पुलिस प्रताड़ना से बच सकें. वे चले भी जाते हैं पर जब भी वे साल-दो साल बाद इलाहाबाद, बनारस से लौटकर आते हैं. कोई न कोई इल्जाम उनके इंतज़ार में होता है. अपने गांव में लौटना किसी खतरे में लौटने जैसा है. युवाओं के नीलांबर-पीतांबर बनने का नामधारी सिंह इंदर द्वारा किया गया आह्वान दूसरे दिन अखबारों में प्रमुखता से छपा है.

हम वहां से लौट आए हैं, बस घटनाएं वहां पर चल रही है…घटनाएं अपना रास्ता नहीं भूलतीं... और न ही उन्हें किसी रास्ते की जरूरत होती है. जब यह रिपोर्ट लिखी जा रही है...ऑपरेशन ऑक्टोपस वहां शुरू हो चुका है. नीलांबर-पीताम्बर के गांव चेमू-सान्या में सैन्य बलों ने गोलियां चलाई हैं. मारे गए लोगों की संख्या का पता नहीं चल रहा है .....यहां महिलाओ के साथ बलात्कार भी हुए है... पत्रकारों के इलाक़े में जाने पर मनाही है। मनोज विश्वकर्मा के पास लातेहार में नीलांबर पीताम्बर की जीवनी मिली थी जिसके आरोप मे 1 अप्रैल को उनको जेल भेज दिया गया है. बरवाडीह में एक ‘मुठभेड़’ में छह माओवादियों के मारे जाने की खबरें अखबारों के पहले पन्ने पर छपी हैं. दूसरे दिन माओवादियों ने इस खबर के गलत होने की पुष्टि की है. जो कहीं छपने के बजाय, कहीं छिप गयी है.
(तसवीरें देखने के लिए क्लिक करें)

कितना हरा भरा था मेरा पहाड़

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/20/2012 06:34:00 PM

आप जिस जमीन पर खड़े हैं, अगर उसके नीचे खनिज हैं तो आप जेल में डाले जा सकते हैं, खतरनाक आतंकवादी घोषित किए जा सकते हैं या फिर आप किसी फर्जी मुठभेड़ में मारे जा सकते हैं. स्टर्लाइट कंपनी की मिसाल देते हुए नीरज अग्रवाल की यह रिपोर्ट बताती है कि किस तरह मेहनतकश जनता और उसके संसाधनों पर कॉरपोरेट कंपनियों का हमला बढ़ रहा है.पैनोस द्वारा प्रकाशित बुलडोजर और महुआ के फूल से.

मैनपाट में, जिसकी पहचान कभी छत्तीसगढ़ के इकलौते हिल स्टेशन से होती थी, आज वादियों में स्टर्लाइट के बॉक्साइट खनन की वजह से काली धूल भरी है। पूरे राज्य में यह कम्पनी अपने आप को कानून से परे मानते हुए नियम-कानून की धज्जियाँ उड़ा रही है और जो लोग इसकी परियोजनाओं की वजह से उजड़ गये हैं, उनसे किये गये वायदों से मुकर जाना उसकी आदत बन गई है। सरकार, कहाँ तो इस कम्पनी के खिलाफ कोई कदम उठाती, उलटे उसे नवाज़ती है और ऐसी सुविधा किसी दूसरी कम्पनी को नहीं मिलती।
 
मैनपाट के निवासी 45 वर्षीय जगरदेव यादव के पास हर उस आदमी के लिए जो छत्तीसगढ़ में घर बनाना चाहता हो, एक दिली सलाह है ‘‘पहले जाकर पता लगा लीजिए कि यह जगह बॉक्साइट या आइरन ओर जैसे खनिजों से सम्पन्न इलाके में तो नहीं है.’’
 
यादव, जिनका जन्म मैनपाट में हुआ था, अभी हाल में जेल में थे और सरगुजा पुलिस ने उनकी पिटाई की थी। उनकी गलती? उन्होंने मैनपाट में स्टर्लाइट द्वारा बॉक्साइट के उत्खनन का विरोध किया था-इस तरह की यह न तो पहली घटना थी और शायद न ही आखिरी। उन्होंने अपनी जमीन से, जिसका हाल ही में स्टर्लाइट ने खनन के लिए अधिग्रहण किया था, पुनर्वासित हुए बगैर हटने से इन्कार कर दिया। फिर जो आम तौर पर होता है वह हुआ-उनके परिवार के आठ सदस्यों को, जिनमें महिलाएं और बच्चे शामिल थे, पुलिस पकड़ कर ले गई। आस-पड़ोस के लोगों के कहने-सुनने के बाद थाने से महिलाओं और बच्चों को तो छोड़ दिया गया मगर यादव वहीं रह गये। उन्हें पुलिस ने गै़र-कानूनी ढंग से हिरासत में रखा और उनकी बांह तोड़ दी। जब वह आखिरकार छूटे तब उन्होंने एक ग़ैर-सरकारी संस्था मैनपाट बचाओ संघर्ष समिति के माध्यम से जिले के प्रशासनिक अधिकारियों और गृह मंत्री से इस घटना की शिकायत की। घटना की जांच का आश्वासन तो सब ने दिया लेकिन इस हृदय विदारक घटना के 1 महीने बाद भी कसूरवार पुलिस वालों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं हुई। यादव, जो एक कैजुअल मजदूर का काम करते थे, अब अपनी टूटी बांह लिए घर पर बैठने को मजबूर हैं। अपनी बीवी-बच्चों के लिए उनके पास अब न पैसा है और न भोजन।
 
मैनपाट में यादव जैसी कहानी अकेली नहीं है। यह जगह कभी छत्तीसगढ़ की अकेली पर्वत नगरी थी जो सरगुजा जिले में समुद्र तल से 990 मीटर की ऊंचाई पर अवस्थित थी। एक बार तो वहाँ के हरियाली भरे माहौल में गरमी के मौसम में भी ठंड की आहट मिल गई थी। लेकिन आजकल इस इलाके में उन दिनों की झलक तक नहीं मिलती क्योंकि इस इलाके की हरियाली को नजर लग गई है। अब इस कस्बे की चैड़ी, धूल भरी सड़कों पर शोर-शराबे से भरपूर ट्रक चलते हैं जहाँ कभी पतले रास्ते थे जिनके दोनों तरफ सौ साल पुराने पेड़ों की कतार हुआ करती थी। खुदाई स्थलों से निकली हुई काली धूल पूरी फिजां में भरी रहती है। यह पूरे मैनपाट में भरी है और कोई 28 वर्ग किलोमीटर पर इस धूल का ही साम्राज्य है। ट्रक इस धूल की मात्रा और प्रदूषण की हाँ में हाँ मिलाते हैं। मैनपाट में रहने वाले लोगों के घरों के नीचे पाये जाने वाले बॉक्साइट की सम्पन्नता ने ही उन्हें कहीं का नहीं छोड़ा।
 
अथ बॉक्साइट कथा 
ऐसा अनुमान किया जाता है कि सरगुजा जिले में 5.754 करोड़ टन बॉक्साइट का उत्खनन सम्भव है। यह संख्या पूरे राज्य में मौजूद बॉक्साइट का 57 प्रतिशत है। इस 5.754 करोड़ टन में से 4.221 करोड़ टन तो ‘निश्चित रूप से’ उपलब्ध है, 1.356 करोड़ टन की उपलब्धता ‘सम्भावित’ है और बाकी 17.6 लाख टन खनिज ‘शायद’ मौजूद है।
 
श्रेणीबद्धता के शीर्षकों से बॉक्साइट के मिलने और उसके उत्खनन की सम्भावनाओं का पता लगता है। कुल उपलब्ध खनिज में से 5.1 करोड़ टन मेटलर्जिकल ग्रेड का बॉक्साइट है जबकि बाकी के 60 लाख टन की गुणवत्ता के बारे में अभी कोई जानकारी नहीं है। वह डिपॉजिट जिनका सबसे किफायत के साथ उत्खनन किया जा सकता है वह पाट पूर्वी और दक्षिण पूर्वी सरगुजा में पाट (यह प्लैटो का स्थानीय नाम है) वाले इलाके में मिलते हैं जिनमें मैनपाट, समारी और जमीर पाट शामिल हैं।
 
2 जुलाई, 1992 को मैनपाट की लगभग 639.169 हेक्टेयर जमीन सरकारी उपक्रम भारत अल्युमिनियम कम्पनी लिमिटेड (बाल्को) को 20 साल के लिए बॉक्साइट के खनन के लिए लीज पर दी गई। उस समय मैनपाट मध्य प्रदेश का हिस्सा था। बाल्को को लीश में मिली 325 एकड़ जमीन मैनपाट के मांझी-मझवार जन-जाति की थी। मैनपाट में रहने वाले दलितों और आदिवासियों को यह भरोसा दिया गया कि बाल्को उनकी जमीन की क्षतिपूर्ति के लिए पैसा देगा। उनको रोशगार, वैकल्पिक जमीन और स्कूल तथा अस्पताल आदि की शक्ल में समेकित विकास के सपने भी दिखाये गये।
 
भारत में जहाँ भी परियोजनाओं में विस्थापन और पुनर्वास की बात होती है वहाँ अब रिवाज-सा चल पड़ा है कि वायदे या तो आधे-अधूरे तरीके से पूरे किये जाते हैं या फिर उन्हें पूरी तरह से ही भुला दिया जाता है। कुछ लोगों को उनकी जमीन का जो मुआवजा मिलना चाहिए था उसके आधे से भी कम मिला। उदाहरण के लिए बाल्को ने कुछ विस्थापितों को उनकी जमीन का मुआवजा 12,000 रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से भुगतान किया जबकि इस इलाके में सरकार द्वारा प्रति एकड़ जमीन की कीमत 50,000 रुपये निर्धारित की गई थी। बहुत-से लोग इतने भाग्यशाली नहीं थे कि उन्हें मुआवजे की यह छोटी सी राशि भी मिलती। 1992 तक जमीन तो 112 लोगों की गई मगर केवल 50 को ही मुआवजा मिल पाया। बाकी लोग न्याय मिलने की मृगतृष्णा में एक दरवाजे से दूसरी चैखट तक चक्कर ही काटते रहे। जब कुछ भी न बन पड़ा तो कई लोगों ने दिहाड़ी पर उसी कम्पनी में काम करना शुरू कर दिया जिसने उनकी जमीन दखल कर ली थी।
 
मैनपाट में वर्षों से रह रहे बहुत से परिवारों को अपना घर-द्वार छोड़ कर जीविका और सिर पर छप्पर की तलाश में दूसरे स्थानों पर जाने के लिए मजबूर होना पड़ा। जो अपनी जगह बने रहे उनके पास बाल्को के खनन में लगे प्राइवेट ठेकेदारों के यहाँ काम करने के अलावा कोई चारा नहीं बचा। किसी भी विस्थापित को इस शब्द के सही मायने के अनुसार काम नहीं मिला। इन लोगों ने बाल्को के अत्याचारों के खि़लाफ आवाजें तो बुलन्द कीं लेकिन कम्पनी के कर्ता-धर्ता लोगों ने इनकी आवाजों को दबा दिया।
 
1 नवम्बर, 2000 को जब मध्य प्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ एक नया राज्य बना तब दलितों और आदिवासियों को उम्मीद बंधी कि अब उनकी तकलीफें नई राज्य सरकार जरूर सुनेगी। लेकिन कुछ दिनों बाद बाल्को को एक प्राइवेट कम्पनी-स्टर्लाइट समूह को लगभग 551 करोड़ रुपये में बेच दिया गया और तब मालिकाना और प्रबन्धन इस नई कम्पनी के हाथ चला गया। बाल्को सार्वजनिक क्षेत्र का पहला प्रतिष्ठान था जिसका राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबन्धन (राजग) की केन्द्रीय सरकार ने विनिवेश किया था।
 
स्टर्लाइट द्वारा अधिग्रहण किये जाने के बाद बाल्को के कोरबा अल्युमिनियम कॉम्प्लेक्स के कर्मचारियों की छंटनी कर दी गई। स्टर्लाइट प्रबन्धन ने मैनपाट में काम कर रहे कर्मचारियों की जिम्मेवारी लेने से हाथ खींच लिया। लेकिन जब कर्मचारियों की तरफ से दबाव पड़ना शुरू हुआ तब स्टर्लाइट प्रबन्धन ने कुछ वायदे किये। इन वायदों को पूरा तो नहीं ही किया जाना था। प्रबन्धन चाहता था कि कामगार मैनपाट में कुछ नये हिस्से की खुदाई करें जिससे यह कोरबा की अपनी अल्युमिनियम कम्पनी का विस्तार कर सके।
 
घर में बेघर 
जिन किसानों की जमीन का स्टर्लाइट ने अधिग्रहण किया था उनसे उसने अच्छा खासा मुआवजा देने की जबान दी थी। मगर बदले में उन्हें प्राइवेट ठेकेदारों की मेहरबानी पर रहना पड़ा। यह सारा कुछ पलक झपकते ही हो गया-किसानों को पता भी नहीं लगा कि क्यों और कब वह किसान से कामगार बन गये। न सिर्फ उन्होंने अपनी जमीन और घर-बार से हाथ धोया वरन वह छोटे शिविरों या किराये के मकानों में भी रहने को बाध्य हुए।
 
खेतों के साथ-साथ फसल भी चली गई। विक्रय के लिए जितना धान पहले सहकारी समितियों तक पहुँचता था उसकी मात्रा में भारी कमी आई। इस साल तो हालात एकदम खराब हो गये-जहाँ सरकार ने सरगुजा जिले के दूसरे प्रखण्डों में हजारों टन धान सहकारी समितियों से खरीदा वहीं मैनपाट की सहकारी समिति तक एक किलोग्राम धान भी बिक्री के लिए नहीं पहुँचा।
 
वह खेत जिनका स्टर्लाइट ने अधिग्रहण नहीं भी किया था वहाँ भी कोई फसल पैदा नहीं हुई। मैनपाट गाँव के एक टोले कुदारीडीह के 70 वर्षीय सोमनाथ मांझी कहते हैं, ‘‘बॉक्साइट के खनन में जमीन में गहरा छेद कर के ब्लास्टिंग की जाती है और इसका पूरे इलाके पर धमाकेदार दुष्प्रभाव पड़ता है। इससे खेतों में दरार पड़ जाती है और दरार पड़े खेतों में खेती नहीं की जा सकती।’’ ब्लास्टिंग की वजह से इस इलाके के बाशिन्दों की सेहत पर भी बुरा असर पड़ा है जिससे आँख और कान सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं।
 
इन सब के बावजूद किसान से कामगार बने मजदूर ही स्टर्लाइट का अधिकांश काम करते हैं। उनको वेतन बहुत कम मिलता है यद्यपि उन्हें खदानों में बहुत ही खतरनाक परिस्थितियों में काम करना पड़ता है।
इस बीच ठेकेदार जहाँ तक बन पड़ता है इन मजदूरों का शोषण करते हैं। ऐसा कई बार हुआ है कि महीनों मजदूरों से काम करवा लेने के बाद ठेकेदारों ने स्टर्लाइट से अपना हिसाब-किताब पूरा कर लिया और कामगारों को उनके काम का पैसा दिये बिना चुपचाप खिसक लिये। (स्टर्लाइट ने बार-बार ठेके ऐसे लोगों को दिये हैं जिन का मजदूरों के साथ धोखा-धड़ी करने का इतिहास रहा है। यह तब भी हुआ है जब कामगारों ने स्टर्लाइट के अधिकारियों से इन ठेकेदारों की बेइमानी की शिकायत की है। स्टर्लाइट का मानना है कि यह एक ऐसा मुद्दा है जिसे ठेकेदारों और कामगारों को ही सुलझाना चाहिये।)
 
इण्डियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस के रामबली यादव के पास ऐसे मजदूरों की एक लम्बी सूची है जिनका इस तरह से शोषण हुआ है। उदाहरण के लिए बालाजी मेटल एण्ड मिनरल कम्पनी नाम का एक प्राइवेट समूह है जो स्टर्लाइट के लिए ठेके पर बॉक्साइट का खनन और ढुलाई करता था। अपना भुगतान लेकर इस कम्पनी के अधिकारी गायब हो गये। इस कम्पनी पर मजदूरों का 1 करोड़ 80 लाख रुपया बकाया है। इससे भी ज्यादा बुरी बात यह है कि यह जानते हुए कि यह कम्पनी ऐसी गलीज हरकत कर सकती है, राज्य सरकार ने कोशिश की कि बालाजी छत्तीसगढ़ मिनरल डेवलपमेन्ट कार्पोरेशन (सीएमडीसी) के लिए ठेकेदारी करे। रामबली यादव कहते हैं कि, ‘‘न केवल इस कम्पनी पर सरकार की तरफ से कोई कार्यवाही नहीं हुई, सरकारी अफसरों ने बालाजी को सीएमडीसी में ठेका देने की भी कोशिश की। हम लोगों की हड़ताल की वजह से इस कम्पनी को ठेका देने का काम स्थगित हो गया। लेकिन इस हरकत से कोई भी आदमी यह आसानी से अन्दाजा लगा सकता है कि स्टर्लाइट और छत्तीसगढ़ सरकार में काम कर रहे लोगों की नीयत कैसी है।’’
 
अगर स्टर्लाइट समूह द्वारा दिये गये आँकड़ों पर विश्वास किया जाय तो हर साल मैनपाट से लगभग पाँच लाख टन बॉक्साइट का खनन सम्भव है। 2005-06 के आंकड़ों के अनुसार मैनपाट से प्रति वर्ष 5,65,301 टन बॉक्साइट का उत्पादन होता था। इतना फायदा उठाने के बावजूद स्टर्लाइट को कभी यह ख्याल नहीं आया कि इसका कुछ हिस्सा मजदूरों की सुविधाओं पर भी खर्च किया जाए।
 
कहा जाता है कि कोई 4,500 कामगार इस कम्पनी के लिए काम कर रहे होंगे जो खनन से लेकर कम्पनी के सारे क्रिया कलाप सम्भालते हैं लेकिन इन लोगों को कम्पनी का वह कोई भी लाभ नहीं मिलता जो स्वयं कम्पनी के रोजगार नियमों में निहित है। मिसाल के लिए, कामगारों के लिए बोनस की व्यवस्था है पर यह उन्हें कभी नहीं मिला। गर्भवती महिलाओं को उनकी चिकित्सा और प्रसव के खर्च के लिए 40,000 रुपये दिये जाने का प्रावधान है मगर पिछले डेढ़ साल में एक भी महिला को इस मद में कोई भुगतान नहीं किया गया। महिला कामगारों के लिए मातृत्व अवकाश की व्यवस्था है और उस दौरान उनका वेतन उन्हें दिये जाने का नियम है मगर यह लाभ किसी भी महिला को नहीं मिलता। कम्पनी के नियमों में यह कहा गया है कि कामगारों को रहने के लिए घर दिया जाना चाहिए और उनके बच्चों के लिए शिक्षा सुविधायें उपलब्ध की जानी चाहिए लेकिन कम्पनी ने इस दिशा में कोई प्रयास ही नहीं किया है। इसके अलावा इन खतरनाक कामों में बुनियादी रक्षा कवच दिए जाने की कानूनी बाध्यता भी पूरी नहीं की गई है। मजदूरों को हेलमेट, जूते या टोपी जैसी कोई चीज नहीं दी गई है जिसकी वजह से बहुत से लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा है। खनन स्थलों पर या उनके नजदीक कोई स्वास्थ्य सेवा भी उपलब्ध नहीं है। अगर कार्यस्थल पर किसी मजदूर की मौत हो जाती है तो उसकी क्षतिपूर्ति के लिए चर्चा तक नहीं होती। इस तरह की मौत की कोई जिम्मेवारी नहीं लेता और कम्पनी तो हरगिज नहीं।
 
सज़ा कोई नहीं, केवल ईनाम  
अब यह मजाक लगता है कि मैनपाट, जो कभी छत्तीसगढ़ के शिमला के नाम से जाना जाता था, इतना ज्यादा प्रदूषित हो चुका है कि लोगों ने यहाँ आना बन्द कर दिया है। यहाँ के पहले के दर्शनीय स्थल जैसे कुदरीडीह, केसरा, बरिमा और सपनादार अब स्टर्लाइट ग्रुप के खनन स्थल हैं।
 
अपने पूर्वज बाल्को की ही तरह स्टर्लाइट ने भी पर्यावरण के प्रति कोई चिन्ता नहीं दिखाई है। बड़े पैमाने पर जंगल कटाई के कारण मैनपाट की खुद की आबोहवा में जमीन-आसमान का फर्क पड़ा है। सरगुजा के तत्कालीन कलक्टर मनोज पिंगुआ, जिनका स्थानान्तरण हाल ही में निदेशक-आदिवासी कल्याण के पद पर हुआ है, ने टिप्पणी की है कि बॉक्साइट का खनन करते वक्त कम्पनी ने सारे नियम-कानूनों को ताक पर रख दिया। जब शुरू-शुरू में बाल्को को लीज दी गई थी उस समय इस इलाके में 9,000 साल के पेड़ हुआ करते थे। पिंगुआ ने इलाके के सर्वेक्षण में पाया कि स्टर्लाइट ने ग़ैर-कानूनी तरीके से 4,000 पेड़ों  का सफाया कर दिया जिसमें साल और दूसरे किस्म के पेड़ शामिल थे। गै़र-कानूनी ढंग से पेड़ काटे जाने के कारण पिंगुआ ने सरकार से सिफारिश की कि स्टर्लाइट के साथ हुये लीज के करार को निरस्त कर दिया जाय। इसके बदले सरकार ने एक इन्क्वायरी गठित कर दी जिसमें वही बातें निकलीं जो पहले से ही पता थीं कि 4,000 पेड़ों को गै़र-कानूनी ढंग से काटा गया। पिंगुआ ने फिर सरकार को लिखा कि लीज को निरस्त कर दिया जाए। लेकिन इस तरह की सिफारिशें अब आम हो गई हैं और स्टर्लाइट के खि़लाफ कोई कार्रवाई नहीं होती। सच यह है कि जहाँ एक ओर स्टर्लाइट कम्पनी पेड़ों को काटने जैसे गै़र-कानूनी काम में आकंठ डूबी थी, सरकार ने इसे अपनी खदानों की क्षमता बढ़ाने का पुरस्कार देने का काम किया। मैनपाट की कुड़ाम खदान की क्षमता 6 लाख टन, कुसुमी की टाटीझरिया खदान की क्षमता चार लाख टन और समारी की क्षमता 5 लाख टन बढ़ा देने की इजाजत मिल गई।
यह सब इतनी सफाई से हुआ कि मैनपाट के लोगों को भनक तक नहीं लगी, यद्यपि एक जन-सुनवाई का कार्यक्रम हुआ था। जिन लोगों को इस ‘जन-सुनवाई’ के बारे में पता था उन्हें इस आम-सभा में भाग नहीं लेने दिया गया। दूसरी तरफ पर्यावरण संरक्षण बोर्ड के क्षेत्र अधिकारी सुरेश चन्द्र का दावा है कि बिना अनुमति के खदान की क्षमता बढ़ाने पर स्टर्लाइट की एक बरिमा खदान के खि़लाफ कार्यवाही की गई थी। उनके अनुसार यह मामला अब अदालत में है। चन्द्र यह भी कहते हैं कि जब दूसरी खदानों की क्षमता बढ़ाने के लिए सरकार ने अनुमति दी थी तब ‘जन-सुनवाई’ भी हुई थी। वह कहते हैं कि इन सभाओं में किसी की ओर से कोई प्रतिवाद नहीं किया गया था।
 
फिर भी कई बार ऐसे मौके आए हैं जब सरकारी अधिकारी और स्टर्लाइट, बॉक्साइट के गै़र-कानूनी खनन, खदान की सतह को वापस समतल किये जाने में कम्पनी की विफलता और स्थानीय विकास में अरुचि जैसे मुद्दों पर आमने-सामने थे। कभी-कभी इस विवाद के कारण स्टर्लाइट को बॉक्साइट का खनन रोकना भी पड़ा है। लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कम्पनी कितने कानून तोड़ रही है, और ऐसा वह अक्सर करती है, मसला हमेशा कम्पनी के हक में ही हल होता है।
 
नियम-कानून दूसरों के लिए हैं 
कबीरधाम के जिस इलाके में स्टर्लाइट बॉक्साइट का खनन कर रही है वह राज्य के मुख्यमंत्री रमण सिंह का गृह जिला है और इसने भी अपने हिस्से के सारे विवादों को ठीक-ठाक ही झेला है। इस इलाके की खदानों से बॉक्साइट के खनन के लिए किसी भी कम्पनी को इजाजत नहीं मिली है लेकिन स्टर्लाइट की बात अलग है। यह कम्पनी हर साल 3,00,000 टन बॉक्साइट निकाल लेती है।
 
चालीस साल पहले मध्य प्रदेश सरकार ने घोषणा की थी कि कबीरधाम के सारे बॉक्साइट के खनन का काम केवल सरकारी उपक्रमों के माध्यम से ही होगा। उन दिनों कबीरधाम दुर्ग जिले में हुआ करता था। इस विषय की एक सरकारी अधिसूचना (नं. 2918/2875/12) भी 16 जून, 1969 को जारी की गई थी। इसी आधार पर बाल्को को इस इलाके में खनन की लीज दी गई थी। जब 2 मार्च, 2001 को बाल्को के स्वत्वाधिकार विनिवेश के बाद स्टर्लाइट को हस्तान्तरित किये गये तब यह अपने आप स्पष्ट होना चाहिये था कि स्टर्लाइट का कबीरधाम की खदानों पर कोई अधिकार नहीं होगा क्योंकि वह एक सरकारी प्रकल्प न होकर एक प्राइवेट कम्पनी थी। लेकिन स्टर्लाइट ने इस खदान पर अपना अधिकार बरकरार रखा।
 
इसका क्या यह मतलब निकलता है कि छत्तीसगढ़ सरकार मध्यप्रदेश सरकार के अध्यादेशों को वैध नहीं मानती? ऐसा है नहीं। स्टर्लाइट को जब कबीरधाम इलाके की बोड़ाई-दलदली खदानों की लीज दी गई थी तब सात दूसरी प्राइवेट कम्पनियों ने कबीरधाम जिले के बांकी क्षेत्र में सरकार से बॉक्साइट के खनन की इजाजत मांगी थी। लेकिन 2003 से 2004 के बीच मिले इन सारे आवेदनों को सरकार ने इसलिए खारिज कर दिया कि 1969 वाले मध्यप्रदेश सरकार के अध्यादेश के अनुसार यह इस काम के लिए अयोग्य थे। अगर सरकार यह कहती है कि प्राइवेट कम्पनियाँ इस इलाके में खनन नहीं कर सकतीं तब फिर स्टर्लाइट को विशेष रूप से कैसे यह अनुमति मिल गई?
 
बात यहीं नहीं थमती। ऐसा विश्वास किया जाता है कि स्टर्लाइट ने मैनपाट और कबीरधाम की खदानों को कर्ज लेने के लिए गिरवी रख दिया हुआ है। इस मसले पर कम्पनी की राय जानने के लिए इस लेखक ने कम्पनी के जन-सम्पर्क विभाग के अध्यक्ष, दीपक पाचपोरे से कई बार बात करनी चाही मगर वह हमेशा ‘व्यस्त’ रहने के कारण कभी उपलब्ध नहीं हो सके।

चन्द्रशेखर दुबे, सांसद, जो कि बहुत सी खनिज समितियों के सदस्य हैं, का कहना है कि स्टर्लाइट ने अक्टूबर, 2004 में मैनपाट-सरगुजा और बोड़ई, दलदली-कबीरधाम खदानों की लीज की मूल प्रति को एक दीर्घावधि कर्ज हेतु इन्रााटस्ट्रक्चर लीजिंग एण्ड फाइनेन्शियल ट्रस्ट कम्पनी लिमिटेड के पास गिरवी रख दिया है। उनका कहना है कि यह लीज की शर्तों के खि़लाफ है। दुबे की मांग है कि सरकार स्टर्लाइट के साथ शेयर होल्डर करार को समाप्त कर दे क्योंकि कम्पनी ने शर्तों का उल्लंघन किया है और सेन्ट्रल विजिलेन्स कमीशन या केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो को इस पूरे मसले के तथ्य जानने के लिए नियुक्त करे।

इसके अलावा स्टर्लाइट ने, जिसे कबीरधाम के 591 हेक्टेयर के विस्तृत क्षेत्र पर 30 वर्षों की अवधि के लिए खनन की लीज दी गई थी, विस्थापित लोगों का पुनर्वास किये बिना अपना काम शुरू कर दिया। इस लेख के लिखे जाने के समय तक स्टर्लाइट के काम की वजह से 52 परिवार उजड़ चुके थे। इनमें से अधिकांश बैगा जन-जाति के लोग थे। जब स्टर्लाइट प्रबन्धन ने कबीरधाम के जिला मुख्यालय से करीब 100 किलोमीटर दूर बैगा आदिवासियों की जमीन का सेमरसन्टा, दलदली, रबड़ा, केशरमादा और मुण्डा दादर गाँवों में अधिग्रहण किया तो उसने इन आदिवासियों से बहुत सारे वायदे किये लेकिन कम्पनी ने अपनी बात नहीं रखी। उसके बदले कम्पनी अब यह कहती है कि यह छत्तीसगढ़ सरकार का काम है कि वह विस्थापित आदिवासियों के लिए जमीन की व्यवस्था करे। उसका दावा है कि एक बार जमीन की व्यवस्था हो जाये तो कम्पनी अपने दूसरे कर्तव्यों का निर्वहन करेगी। आदिवासियों ने यह मांग रखी थी कि उन्हें किसी ऐसी जगह पुनर्वास दिया जाय जहाँ उचित सुविधायें उपलब्ध हों और प्रत्येक विस्थापित परिवार के कम से कम एक सदस्य को नौकरी दी जाय। लेकिन जमीन के मसले पर सरकार का उत्तर आने में समय लग रहा है और इस बीच कम्पनी आदिवासियों की काश्तकारी जमीन को गड्ढों से भरी बंजर भूमि बनाने में व्यस्त है।

विस्थापित आदिवासियों का कहना है कि स्टर्लाइट 591 हेक्टेयर जमीन अधिगृहित करने के बाद 1 जनवरी, 2004 से बॉक्साइट खनन का काम कर रही है। इसमें 300 हेक्टेयर जमीन किसानों की थी और बैगा आदिवासियों के पास 100 हेक्टेयर जमीन थी। सेमरसन्टा के एक ग्रामीण रूप सिंह उड्डे बताते हैं कि सरकार और स्टर्लाइट प्रबन्धन ने मिल कर सेमरसन्टा के आधे आदिवासियों को बैजलपुर, तारसिंह और सिंघारी गाँवों में 2004 में ले जाकर बसाया।

उनको न तो खेती के लिए कोई जमीन दी गई और न ही उनके पास अस्पताल, स्कूल या सड़क जैसी कोई बुनियादी सुविधा ही उपलब्ध थी। उड्डे बताते हैं कि, ‘‘हमारे पास मेरे पिताजी के नाम से 12 एकड़ जमीन थी। इसी जमीन से स्टर्लाइट ने खुदाई का काम शुरू किया था और अब यह जमीन पूरी तरह उलट-पलट हो गई है। क्षतिपूर्ति के नाम पर सरकार ने हमारे पिता जी को बैजलपुर ले जाकर बसा दिया। उसके बाद फिर कोई यह पूछने नहीं आया कि हम लोग जिन्दा कैसे हैं?’’ साफ तौर पर किसी भी विस्थापित को नौकरी देने का तो कोई सवाल ही नहीं उठता। उनकी जीविका के अकेले स्रोत उनकी जमीन को बड़ी बेरहमी के साथ उनसे छीन लिया।
इस साल 7 जनवरी को आदिवासियों ने स्टर्लाइट द्वारा खनन पर प्रतिबन्ध लगाने की मांग को लेकर हड़ताल शुरू कर दी। सात दिन बाद सरकार ने आदिवासियों को समझा-बुझा कर उनकी हड़ताल इस बात का आश्वासन देकर तुड़वा दी की जमीन की निशानदेही शुरू कर दी गई है और खुदाई का काम तब तक नहीं शुरू होगा जब तब उनकी वैकल्पिक जमीन उन्हें मिल न जाए। जिला प्रशासन ने भी आदिवासियों को आश्वासन दिया कि दो महीनों के अन्दर उनकी सारी समस्याओं का समाधान कर दिया जायेगा पर आज तक कुछ भी नहीं हुआ।
स्टर्लाइट के दलदली खनन क्षेत्र के प्रबन्धक एनएस चौधरी का कहना है कि सरकार जमीन के मसले को हल करने का काम देख रही है। वह यह भी कहते हैं कि स्टर्लाइट ने सरकार के पास जमीन अधिग्रहण के लिए पैसा पहले ही जमा कर दिया है और पुनर्वास का काम शीघ्र ही शुरू कर दिये जाने की उम्मीद है। लेकिन जब उनसे ही विस्थापित परिवार के एक सदस्य को नौकरी देने का सवाल किया जाता है तब वह खामोशी अख्तियार कर लेते हैं।
 
चालाकी कम, धूर्तता ज्यादा

स्थानीय लोगों से किये गये वायदों और आश्वासनों पर अपने पत्ते न खोलने के अलावा कम्पनी सरकारी नियम-कानूनों का निडर होकर उल्लंघन करती है और ऐसा माना जाता है कि मैनपाट और बोड़ई-दलदली की खदानों की क्षमता बढ़ाये जाने के कारणों पर भी स्टर्लाइट सच बोलने से परहेज कर रही है। इसका कोरबा अल्युमिनियम कॉम्प्लेक्स, जिसकी क्षमता दो लाख मीट्रिक टन प्रति वर्ष है, बड़े आराम से मैनपाट और बोड़ई-दलदली की खदानों से मिलने वाले बॉक्साइट (क्रमशः साढ़े चार लाख मीट्रिक टन और तीन लाख मीट्रिक टन) से चल सकता है। इसके बावजूद स्टर्लाइट ने इन दोनों खदानों की क्षमता बढ़ाने के लिए इजाजत यह कह कर मांगी कि कोरबा रिफाइनरी की क्षमता बढ़ाने के लिए यह आवश्यक होगा। स्टर्लाइट की इच्छा थी कि मैनपाट की खदान की क्षमता तीन लाख मीट्रिक टन और बोड़ई-दलदली की क्षमता साढ़े नौ लाख टन प्रति वर्ष तक बढ़ाई जाय। 2003 में जब इन खदानों पर काम शुरू करने का जयघोष हुआ था तब स्टर्लाइट ने यह कहा था कि इस (खनिज) का इस्तेमाल 6 लाख मीट्रिक टन क्षमता वाले अल्युमिनियम स्मेल्टर और अल्युमिना रिफाइनरी में किया जायेगा। मजे की बात है कि रिफाइनरी का काम अभी प्लानिंग के स्तर से आगे बढ़ा ही नहीं है।

दुबे के अनुसार स्टर्लाइट द्वारा इन खदानों की क्षमता बढ़ाने के सही मकसद का कोरबा से कोई लेना-देना ही नहीं है। वह कहते हैं, ‘‘मैनपाट और दलदली के बॉक्साइट से स्टर्लाइट लांजीगढ़ (उड़ीसा) में अपनी रिफाइनरी चलाना चाहती है’’। वह आगे कहते हैं कि यह खदानें स्टर्लाइट को दी ही इस शर्त पर गई हैं कि उनसे निकलने वाले बॉक्साइट का उपयोग छत्तीसगढ़ में ही होगा।

एक पत्रकार ने जब इन सारी पेचीदगियों को सुलझाना चाहा तो स्टर्लाइट से जवाब मिलता है कि ऐसी बातों के लिए स्टर्लाइट ग्रुप में किसी के पास समय नहीं है। इस तरह के सवाल अगर कोई स्थानीय आदमी उठाये तो उसका अगला पड़ाव जेल में ही होगा। यादव, जो बिना बात जेल काट आये, धूर्तों के चक्कर में पड़ने वाली कहानी के अच्छे उदाहरण हैं।

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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