हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

तुम कैसे कैद रह सकती हो दयामनी दी

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/02/2012 08:51:00 PM

रणेन्द्र की ये कविताएं संघर्षरत आदिवासियों की आवाज नहीं हैं, उस संघर्ष का हिस्सा हैं.


समझिए साहब


कैसे समझाए साहब
ये खतियान में दर्ज
जमीन के टुकड़े भर नहीं हैं,
हमारे खेत
हमारी भूख का विस्तार हैं
हमारे होने के सबूत।

यहाँ की हवा में
हमारे पूर्वजों की साँसें धुली हैं,
उनकी देह का ताप शेष है
इस पीली धूप में अब भी ।

सब जानते हैं साहब
विश्वविजयी हैं
आपके यज्ञ के अश्व,
आपकी चतुरंगिणी सेना,
अरज बस इतनी
यहाँ आहिस्ता धरिएगा पाँव,
यह मिट्टी,
हमारे पूर्वजों की राख से बनी है,
उनके पसीने की नमकीन गंध
और हमारे बच्चों की किलकारियाँ
उठंग कर सोई हैं वहीं ।

हरीतिमा की गहरी जड़ों से
जुड़ी हैं हमारी सभ्यता की जड़ें
पहाड़, नदी, पेड़ों में
हमारे देवताओं का वास है ।

और इस साखू का क्या करेंगे
जिसकी जड़ें मरती ही नहीं
हर चट्टान फोड़ कर फुनगती हैं ।

हर गरजन पर भारी हैं
महुआ के टपकने
गुलईंची के खिलने
और धान में दूध भरने की ध्वनियाँ
और आपको
कैसे समझाए साहब?



आज्ञा


1
आज्ञाकारी सेवक
आज्ञाकारी शिष्य
आज्ञाकारी पुत्र
आज्ञाकारी भाई
आज्ञाकारिणी पत्नी
आज्ञाकारिणी जनता
आज्ञाकारी होना
सुखी होना है
बिना सुख को जाने

2
आज्ञाएँ
ऊँची जगहों से बरसती हैं
पालन करवाने के आवेश,
आवृत हिंसा के आवेग से भरी
आज्ञाकारी होना
अपना सम्मान बचाना है
बिना सम्मान के भाव को जाने

3
आज्ञा देने वालों की
गरदने तनी होती हैं
शीश पर मुकुट का आभास
आज्ञाकारी की गरदन झुकी
पीठ पर कोड़ों का अहसास
आज्ञाकारी होना
दंडधारियों से बच निकलना है
आजादी और बराबरी से नजरें चुराये


दयामनी दी कैद में


1
जंगल पहाड़ की बेटी की राह में
वे पहाड़ खड़ा करना चाहते हैं
और घना जंगल भरना
उनकी इस सादगी पर
वह ठठा कर हँस रही है

2
भूख से मजबूत
कोई जंजीर नहीं
गरीबी से बढ़कर
नहीं कोई ऊँची दीवार
वे जेल की दीवार ऊँची कर रहे
इस मासूमियत पर
वह मुस्कुरा रही है।

3
वनों की हरीतिमा
तुम्हारी निगाहों में,
छोटानागपुर का पठार
तुम्हारे कांधे का विस्तार,
साँसों में सारंडा-नेतरहाट की हवा,
धमनियों में
स्वर्णरेखा, शंख, कोयल, दामोदर की धारा,
जैसे
क्षिति, जल, पावक, गगन, समीर के अंशों से
बनी तुम, तुम्हारी देह
वैसे ही
तुम्हारे भी अंश उन पाँच तत्वो में
अब वनों की हरीतिमा
जल की शीतलता
मिट्टी की कोख
धूप की ताप को
कैसे कैद कर सकता है कोई
तुम कैसे कैद रह सकती हो
दयामनी दी।

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  1. 3 टिप्पणियां: Responses to “ तुम कैसे कैद रह सकती हो दयामनी दी ”

  2. By कविता रावत on December 5, 2012 at 9:56 AM

    bahut badiya umda rachna..

  3. By प्रफुल्ल कोलख्यान on January 9, 2013 at 4:32 PM

    यह सच है कि हिंदी कविता की स्थिति बहुत उत्साहजनक नहीं है। फिर भी कुछ कवियों की कविताओं पर अधिक गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है। रणेंद्र जी की कवितओं पर भी गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। इसी विचार के संदर्भ में कुछ नये सवाल भी खड़े होंगे और संभवतः उनके कुछ संभावित भी जवाब भी सामने आयेंगे। अभी यहाँ तो इतना ही...

  4. By Reyaz-ul-haque on January 11, 2013 at 1:31 AM

    शुक्रिया प्रफुल्ल जी. आप विस्तार से लिखेंगे, इसकी उम्मीद है.

    रेयाज

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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