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बीच सफ़हे की लड़ाई

रंगभेद की पहली सीख: एदुआर्दो गालेआनो का लेख

Posted by Reyaz-ul-haque on 9/18/2012 12:29:00 PM


उरुग्वे में जन्मे एदुआर्दो गालेआनो अभी के सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले लातिन अमेरिकी लेखकों में शुमार किए जाते हैं। लेखन और व्यापक जनसरोकारों के संवाद के अपने अनुभव को साझा करते हुए गालेआनो इस बात पर जोर देते हैं कि ‘लिखना यों ही नहीं होता बल्कि इसने कइयों को बहुत गहरे प्रभावित किया है।’ यह अनुवाद उनकी किताब Patas arriba: la escuela del mundo al revés (1998) (पातास आरिबा: ला एस्कुएला देल मुन्दो आल रेबेस । उलटबांसियां: उल्टी दुनिया की पाठशाला) का एक हिस्सा है। यह किताब ‘ग्लोबलाइज्ड’ समय के क्रूर अंतर्विरोधों और विडंबनाओं का खाका  है जो भारत सहित तथाकथित ’तीसरी दुनिया’ के देशों के लिए बहुत मौजूं है। इस किताब का अनुवाद जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के लातिन अमेरिकी साहित्य के शोधार्थी पी. कुमार मंगलम कर रहे हैं। समयांतर के अक्टूबर, 2011 के अंक में गालेआनो के एक लेख का उनका किया हिंदी अनुवाद छप चुका है, जिसे बाद में हाशिया पर भी प्रकाशित किया गया।


किसी जगह काम करने वाले लोगों को हमेशा ऊपर के बाबुओं की जी हुजूरी करनी चाहिए, उसी तरह जैसे औरतों को पुरुषों की बात माननी ही चाहिए। कुछ लोगों का जन्म ही हुक्म देने के लिए होता है।

जिस तरह किसी व्यक्ति के पुरुष होने भर से उसे महिलाओं पर हुक्म चलाने का अधिकार मिल जाता है, उसी तरह रंगभेद भी किसी खास रंगवाले परिवार में जन्म लेने भर से किसी का जीवन भर औरों से नीचे और कमतर रहना तय कर देता है। यह वैसे ही है जैसे गरीबी के लिए शोषण की ऐतिहासिक प्रक्रिया को नहीं, बल्कि गरीबों को ही जिम्मेवार ठहरा दिया जाता है। यह बताया-सिखाया जाता है कि गरीबी और रंगभेद के मारे लोग तो अपना यही नसीब लेकर पैदा होते हैं। यह सब कुछ यहीं नहीं रुकता। यह भी मान लिया गया है कि समाज के हाशिए पर फेंके गए ये लोग स्वभाव से ही अपराधी होते हैं। ऐसे में काली चमड़ी के किसी गरीब के दिखते ही अपराध और डर का भयानक माहौल बना दिया जाता है।

भ्रम, मान्यताएं और इतिहास के सबक

दोनों अमेरिकी महादेशों और यूरोप में भी पुलिस की कार्रवाई अपने रंग के खिलाफ थोपे गये पूर्वाग्रहों के शिकार लोगों को ही निशाना बनाती है। पुलिसिया शक के घेरे में आया हर वह व्यक्ति जो गोरा नहीं है, सबके दिलो-दिमाग में दर्ज इस भ्रम को किसी भी कानून से कहीं ज्यादा कठोर बना देता है कि अपराध का रंग हर हाल में काला, भूरा या कम से कम पीला तो होता ही है।

इस तरह कुछ लोगों को अपराधी बता देने वाली यह सोच दरअसल इतिहास की सच्चाइयों को जान-बूझकर नजरअंदाज करती है। और ज्यादा नहीं तो सिर्फ पिछले पांच सौ सालों की बात करें तो यह मानना पड़ेगा कि गोरी चमड़ी के अत्याचार कम नहीं हैं। पुनर्जागरण के दौर में गोरे दुनिया की कुल आबादी का मुश्किल से पांचवां हिस्सा थे, तब भी वे इसका ‘दैवीय’ संदेश दुनिया भर में फैलाते (या कहें कि थोपते) टूटे पड़ रहे थे। इसी ‘दैवीय’ इच्छा की गोरी करतूतों ने अमेरिकी महाद्वीपों में जितने मूलवासियों को मारा उनकी गिनती तो फिर भी की जा सकती है (लेखक के अनुसार यह संख्या लाखों में है-अनु.) लेकिन अफ्रीका में ऐसे ही लोगों  का आंकड़ा कहीं नहीं मिलता ।

अमेरिका और अफ्रीका के मूलवासियों का भयंकर शोषण करने वाले, उनकी खरीद-बिक्री करने वाले और उनकी आगे की पीढ़ियों तक को वहां के कारखानों व बागानों में बंधुआ मजदूर बना देने वाले यूरोप के राजा गोरे ही थे। ‘सभ्यता’ की आड़ में पूरी दुनिया पर हावी साम्राज्यवाद के अनगिनत क्रूर कानून गोरों ने ही बनाए थे। पिछली सदी के दो विश्व युद्धों में चौंसठ लाख से भी ज्यादा हत्याओं, जिनमें ज्यादातर आम लोग ही थे, के अगुआ गोरी चमड़ी वाले यूरोपीय और जापानी थे। और यहूदियों सहित कम्युनिस्टों, बंजारों व समलैंगिकों को यातना शिविरों में मारने वाले नाजी भी गोरे ही थे।

दुनिया में आज तक कायम हुए सभी साम्राज्यों की कोशिश यह साबित करने की रही है कि कुछ लोग तो पैदा ही आजाद रहने के लिए हुए हैं क्योंकि बाकियों की किस्मत में सिर्फ़ गुलामी बदी है। वैसे यूरोपीय लालच को पूरा करते पुनर्जागरण और अमेरिका पर कब्जे के साथ ही यह मान्यता अपने सबसे घिनौने रूप में सामने आई। तब से ही दूसरे देशों पर कब्जा करने और बनाए रखने के लिए रंगभेद का इस्तेमाल होता आया है। तभी तो गुलामी झेलते समाजों के ज्यादातर लोग अपना ही देश चलाने लायक नहीं समझे जाते और गोरे खुद-ब-खुद उनके भाग्यविधाता हो जाते हैं। कब्जा करने वाले देशों में भी शासन प्रक्रिया में गोरों की ही चलती है जहां अन्य समुदाय हाशिए पर फेंक दिए गए हैं। देखा जाए तो साम्राज्यवाद को जितनी जरूरत बारूद की पड़ी उतना ही रंगभेद भी उसके काम आया। तब रोम में बैठे पोप का काम ही इस तरह चले लूटखसोट को ‘दैवीय’ इच्छा ठहराना हो गया था। कब्जे और लूट को कानूनी हैसियत देते तथाकथित ‘अंतर्राष्ट्रीय कानून’ भी उसी दौर में आए, तभी जब रंगभेद गुलाम समाजों के दमन और उनके संसाधनों की लूट का रास्ता बना रहा था।

स्पेनी कब्जे में रहे दक्षिण अमेरिका में तो व्यक्तियों की सामाजिक हैसियत उनके खून में मिले नस्लों के हिसाब से तय कर दी गई। इस तरह बनी सामाजिक सीढ़ी की पहचान कराती एक पूरी शब्दावली ही गढ़ ली गई। उदाहरण के लिए, गोरी और अश्वेत नस्लों का मेल बताता शब्द ‘(Mulato-मुलातो )’ दरअसल ‘ (mula- मूला)’ से बना है जिसका अर्थ है खच्चर, यानी गधे और घोड़ी की पैदाइश। ‘नई दुनिया’ में यूरोपीयनों, अमेरिकीयों व अफ्रीकीयों के पंचमेल से निकली हजारों पहचानों को अलगाता व उनके बीच ऊँच-नीच भरता यह कोई अकेला शब्द नहीं था। इनमें से कई तो सीधे-सादे हैं जैसे कि (castizo-कास्तिशो- पुराना), (cuarteron- क्वारतेरोन- नस्ल का चौथाई हिस्सा), (quinteron-किंतेरोन- नस्ल का पांचवा हिस्सा), (morisco-मोरिस्को- इस्लाम से धर्मांतरित ईसाई)’ (lobo-लोबो- असभ्य) आदि। कई और दो-तीन शब्दों को जोड़कर बनाए गए हैं जैसे कि (torna atras- तोर्ना आत्रास- पीछे जाओ) (ahi te estas-आइ ते एस्तास- तुम वहां हो)  और (no te entiendo- नो ते एन्तिएन्दो- मैं तुम्हें नहीं समझा)।

इन सभी नामों में नो ते एन्तिएन्दो (मैं तुम्हें नहीं समझा) इतिहास की सच्चाइयों को सबसे सही ढंग से बयान करता है। अमेरिकी महाद्वीप को ‘खोज’ लिए जाने से लेकर अब तक के पांच सौ साल ऐसे ही ‘नहीं समझे’ गए लोगों का सिलसिला है। कोलम्बस ने अमेरिकी मूलवासियों को हिन्दुस्तानी, क्यूबा के लोगों को चीनी व हैती के बाशिंदो को जापानी समझा और पेश किया था। कोलम्बस के भाई बार्तोलोमे ने ही अमेरिकी महादेशों में मौत की सजा देने की शुरुआत की थी। नए ईसाई धर्म के प्रतीकों को शुभ मानकर उन्हें बीजों के साथ बोने के ‘महापाप’ में उसने छ्ह मूलवासियों को जिंदा जला दिया था। Conquistadores (कोन्किस्तादोरेस - विजेता) कहलाए हमलावरों ने मेक्सिको के पूर्वी तट के आस-पास बसने वालों से वहां का नाम पूछा। उनकी भाषा से बिल्कुल अनजान मूलवासियों ने यह  कहा कि “वे(मूलवासी) उन्हें समझ नहीं पा रहे” और अपनी माया संस्कृति की भाषा के युकातान  शब्द का प्रयोग किया। तब से इस जगह का नाम ही युकातान  पड़ गया। दक्षिण अमेरिका के बिल्कुल बीच में मौजूद एक झील का नाम पूछने पर वहां के लोगों ने उन्हें पानी के लिए पूछा और इपाकाराई  जैसा कुछ कहा। यही आज के पराग्वे की राजधानी आसुन्सियोन से सटे इस झील का नाम भी बन चुका है। मूलवासियों के शरीर पर कभी भी ज्यादा बाल नहीं थे, लेकिन 1694 में दिक्सिओनारे उनिवर्सल (विश्वकोश) लिखने वाले आंतोइने फुरेतिएरे ने उन्हें बालों से भरे शरीर वाला बतलाया। वह दरअसल बाहर के ‘जंगलियों’ को बालों से भरे बंदर की तरह दिखाती रही यूरोपीय समझदारी को ही दुहरा रहे थे। 1774 में  ग्वातेमाला के गांव सान आंद्रेस इत्जापान  में एक ईसाई धर्मगुरु ने  यह देखा कि वहां के मूलवासी वर्जिन मेरी  नहीं, बल्कि उसके पांवों के पास पड़े सांप को पूजते थे। वह उनके लिए पुराने दिनों की साथी और माया संस्कृति की देवी का रूप था। धर्मगुरू यह देख भी अचकचाए कि मूलवासी ईसाई सलीब भी इसीलिए पूजते थे कि यह धरती और वर्षा के मिलने का भान देता है। ठीक उसी वक्त,  सुदूर जर्मनी के कानिग्सबर्ग में  बैठे दार्शनिक इमैनुएल कांट अमेरिका का भविष्य बता रहे थे। वे यह फरमान सुना रहे थे कि “अमेरिका के मूलवासी तो सभ्य जीवन के बिल्कुल अयोग्य थे और आज नहीं तो कल खत्म होने वाले थे”। यह बात और है कि कांट ने कभी  अमेरिका देखा भी नहीं था। जो भी हो, मूलवासियों के जीवन का सच यही था, भले ही यह उनकी अपनी वजह से बिल्कुल नहीं रहा हो। ‘सभ्य’ यूरोपियनों की मार-काट, उनके साथ आए जानलेवा रोगों और बागानों तथा सोने-चांदी की खदानों में हाड़तोड़ बेगार से बहुत कम ही मूलवासी जिंदा बच पाए थे।

पहचान

“मेरे पूर्वज कहां हैं? मैं किन्हें याद करूं और अपना मानूं? मेरी जड़ें कहां है? मेरा सबसे पहला पूर्वज बहुत सालों पहले अमेरिका का एक मूल निवासी था। आप गोरे लोगों के पूर्वजों ने तो उसके जीते-जी ही उसपर अपनी ‘सभ्यता’ थोप दी। वो खत्म हो गया। और मैं अब उसका ही एक अनाथ अंश हूं।’’
- मार्क ट्वेन के शब्द जो एक गोरे थे। (न्यूयार्क टाइम्स को 26 दिसम्बर 1891 में प्रकाशित)


कितनों को तो सिर्फ़ इसलिए कोड़े मारे गए, जिंदा जलाया या फांसी चढ़ाया गया क्योंकि वे मूर्तिपूजा का ‘पाप’ कर रहे थे। गोरी ‘सभ्यता’ के लिए बिल्कुल अयोग्य मूलवासी प्रकृति के साथ पूरे ताल-मेल की जिंदगी जीते थे। वे और उनके मौजूदा वंशज इसी विश्वास को जीते रहें हैं कि धरती और उस पर चलने वाली या उससे निकलने वाली हर चीज पवित्र और इसीलिए बचाए जाने लायक है।

सदियां बीत गईं, लेकिन ‘सभ्यता’ की गलतियां नहीं सुधारी गईं। अठारहवीं सदी के आखिर में अर्जेंटीना के दक्षिणी भाग में ‘रेगिस्तान-विकास’ के सैन्य अभियान ने वहां के मूलवासियों को खतम कर डाला था। यह बात है और कि तब पातागोनिया का यह क्षेत्र आज के मुकाबले कहीं ज्यादा हरा-भरा था। अभी कुछ साल पहले तक अर्जेंटीना में मूलवासी समुदायों में प्रचलित नाम रखने की मनाही थी। और तो और ऐसे सभी नामों को विदेशी घोषित कर दिया गया था।

मानवशास्त्री कातालिना बुलिउबासिच बताती हैं कि देश के उत्तरी साल्ता पहाड़ी इलाके के मूलवासियों को सरकारी रिकार्डों का हिस्सा बना देने का नायाब तरीका ढूंढ़ लिया गया था। अपने समुदायों के नामों की जगह उन्हें जो नाम दिए गए थे वास्तव में वे सभी विदेशों से आए थे। जैसे कि शेवरलेट, फोर्ड (दोनों मशहूर उत्तर अमेरिकी कार कंपनियां), वेइंतिसीएते (स्पेनी भाषा का सत्ताइस), त्रेसे (स्पेनी भाषा का तेरह) आदि। यहां तक कि कुछ को  मूलवासियों को हाशिए पर डाले रखने के बड़े हिमायती रहे देश के पूर्व राष्ट्रपति दोमिंगो  फौस्तिनो सारमिएंतो का नाम भी दे दिया गया।

न्याय प्रक्रिया

1986 में मैक्सिको की संसद के एक सदस्य चियापास क्षेत्र के सेर्रो उएको जेल के दौरे पर गए। वहां उनकी मुलाकात त्सोत्सिल नामक मूलवासी समुदाय के एक कैदी से हुई जिसे अपने पिता की हत्या के जुर्म में तीस साल की सजा सुनाई गई थी। लेकिन उन्हें यह मालूम हुआ कि उसका मृत पिता तो रोज ही उसके लिए ऑमलेट और सोयाबीन ले आता था।
दरअसल उस कैदी का पाला एक ऐसी न्याय व्यवस्था से पड़ा था जहां मुजरिम से सवाल-जवाब करने और सजा सुनाने की भाषा स्पेनी थी जो कि उसकी समझ के लगभग बाहर ही थी। कानून के डंडे ने उससे  Parricidio –पार्रिसीदियो  (पितृहत्या) जैसा कुछ कुबुलवा ही लिया था ।

आजकल, काफी हद तक मूलवासियों की ही मेहनत पर बाजारी ‘विकास’ के लिए मचलती अर्थ्व्यवस्थाओं के लिए ये समुदाय एक बोझ से ज्यादा कुछ भी नहीं हैं। मिटा दिए जाने की तमाम कोशिशों के बावजूद मूलवासी बहुल रह गए देशों में एक ग्वातेमाला में भी ये समुदाय सबसे सताए हुए लोग हैं। वहीं खुद को मिश्रित और गोरी नस्लों का बताते लोग मायामी के रईसों के पहनावे और खाने की नकल में मूलवासीयों से अलग दिखने की खामख्याली पाले रहते हैं। इस सबके बीच हजारों विदेशी सैलानी देश के चीचीकास्तेनांगो  बाजार का रुख करते हैं, जहां वे कल्पना शक्ति और कला का अद्भुत मेल बनी इन्हीं मूलवासियों की हस्तकारी खरीदते हैं।

1954 में सत्ता हथियाने वाले कर्नल कार्लोस कास्तिल्यो आरमास की ख्वाहिश ग्वातेमाला को डिज्नीलैंड बनाए देने की थी। मूलवासियों को ‘अज्ञान’ और ‘पिछड़ेपन’ से उबार लेने के लिए वह उन्हें सुंदरता की पहचान कराना चाहते थे। सरकारी प्रचार मूलवासियों को बुनाई और कढ़ाई सिखाने के फायदे बताते नहीं थकते थे। खैर, आरमास अपने महान लक्ष्य को पूरा करने से पहले ही स्वर्ग सिधार गए।

मूलवासी और अश्वेत बहुल देशों में भी नहाना न चाहे रहे बच्चे मांओं से ये ताने सुना करते हैं कि “तू आदिवासी दिख रहा है या किसी काले आदमी की तरह दुर्गंध कर रहा है”। लेकिन औपनिवेशिक इतिहासों में मूलवासियों की नहाने की आदत से हमलावरों का अंचभित रह जाना बार-बार दर्ज हुआ है। तब से ही इन्हीं मूलवासियों और फिर अफ्रीकी गुलामों ने लातिन अमेरिका के बाकी लोगों को सफाई की आदतें दी हैं। यह सब भुला दिया गया है और इन समुदायों को धन्यवाद का एक छोटा शब्द भी नसीब नहीं है।

शरीर को आनंद देने की वजह से ईसाई धर्म शुरू से ही नहाने को पाप मानता रहा है। स्पेन में धार्मिक अदालतों के दौर में कोई भी नहाने की आदत भर से ही इस्लामी तौर-तरीकों वाला अधर्मी मान लिया जाता था और इसीलिए जिंदा जला दिया जा सकता था। आज भी यहां गर्मियों में समुद्र किनारे मौज-मस्ती करते शेख ही असली अरब हैं, वहां का एक गरीब तो फिर एक साधारण और रंगभेदियों के लिए गंदगी से बजबजाता मुसलमान ही है। वैसे बावड़ियों और बागों से लकदक ग्रानादा के ला आलांब्रा महल को देखने वाला यह जानता है कि इस्लामी सभ्यता में पानी का महत्व तब से रहा है, जब ईसाई धर्म में पीने के अलावा पानी के किसी भी अन्य उपयोग की मनाही थी। वास्तव में यूरोप में नहाना बहुत बाद में लोकप्रिय हुआ, लगभग उसी वक्त जब टी.वी. पहले-पहल आया।

देवी

इएमान्या की पूजा वाली रात सारा समुद्र तट त्यौहार की खुशी में डूब जाता है। बाहिया, रियो डी जानेईरो, मोंतेवीदियो जैसे शहर समुद्र की इस देवी का उत्सव मनाते हैं। लोगों की भारी भीड़ बालू पर मोमबत्तियों की लड़ियां लगाती है और साथ लाए सफेद फूल, इत्र, गले के हार, केक, मिठाइयां और देवी को पसंद अन्य भेंटें भेजती है। इसके बाद देवी से मन्नतें मांगने का सिलसिला शुरू होता है।

किसी को दबा हुआ खजाना चाहिए, किसी को अब तक नहीं मिला प्यार, कोई बिछड़ गए लोगों की वापसी मांगता है और कोई दुनिया छोड़ चुके अपनों को फिर पाना चाहता है। मन्नतों और दुआओं के इन चंद लम्हों में ही शायद इन लोगों को यह जादुई एहसास होता है कि देवी उन्हें सुन रही हैं और उनकी असंभव-सी लगने वाली दुआएं कबूल भी कर रही हैं। इन चंद पलों का जादुई एहसास इनके पूरे वजूद को रात में भी रोशनी से भर देता है।

समुद्री लहरें जब इनकी भेंट अपने साथ बहा कर ले जा चुकी होती हैं तब ये लोग समुद्र की तरफ मुंह किए, इस सावधानी से कि देवी की तरफ उनकी पीठ न पड़े, धीरे-धीरे वापस शहर की ओर लौटते हैं।


यह मान लिया गया है कि आदिवासी और अश्वेत कायर तथा डरपोक होते हैं। लेकिन यही लोग  कभी औपनिवेशिक युद्धों में, कभी आजादी की लड़ाई और आजादी के बाद लातिन अमेरिकी गृह युद्धों में हथियार की तरह इस्तेमाल भी हुए हैं। वे सिपाही मूलवासी ही थे जिनका इस्तेमाल स्पेनी हमलावरों ने उन्हीं के लोगों को मारने के लिS किया। अठारहवीं सदी में छिड़ने वाली आजादी की लड़ाइयां हमेशा पहली पंक्ति में झोंक दिए गए अर्जेंटीना के अश्वेतों के लिए बरबादी ही लाईं। वहीं आजादी मिलने के बाद हुए पराग्वे युद्ध के मैदान ब्राजील के अश्वेतों की लाशों से अटे पड़े थे।

मूलवासी ही चिली के खिलाफ पेरू और बोलिविया की संयुक्त सेना के अगुआ दस्ते बने। ये लोग जिन्हें पेरू के लेखक रिकार्दो पाल्मा बिल्कुल ही गया-गुजरा मानते थे,  मारकाट के सबसे ज्यादा शिकार बने। वहां का शासक वर्ग तो देशभक्ति का झंडा बुलंद कर खुद भाग खड़ा होता था। हाल के दौर में एक्वाडोर और पेरू के बीच हुए युद्ध में मरने वाले मूलवासी थे और ग्वातेमाला की पहाड़ियों में बसे उनके गांव के गांव उजाड़ने वाले सरकारी फौजों के सिपाही भी मूलवासी ही थे। मूलवासी और गोरी नस्ल की पैदाइश फौजी अफसरान ऐसे हर अपराध से अपने ही खून के आधे हिस्से की बरबादी लिख रहे थे।

मूलवासियों के बारे में और भी तमाम तरह की भ्रांतियां हैं। जैसे कि लोग कहते हैं कि ‘‘तुम तो किसी काले आदमी की तरह काम कर रहे हो’’। ये कहने वाले वही लोग हैं  जो यह भी कहते हैं कि काले तो आलसी और कामचोर हैं। वे कहते हैं ‘‘गोरा आदमी दौड़ता है और काला आदमी भागता है’’। यह काले आदमी की बड़ाई करने के लिए नहीं, बल्कि यह बताने के लिए होता है कि गोरा जो दौड़ता है वह एक सामान्य इंसान है, जो कभी कुछ भी गलत नहीं करता तथा काला इंसान जो भागता है, वह तो दरअसल चोर है, जो गोरे को लूट कर भाग रहा होता है। यहां तक कि गरीब और कानून के सताए चरवाहों की पीड़ा बयान करता मार्तिन फिएर्रो (इसी नाम की किताब का मुख्य पात्र) भी इसी सोच का शिकार है। उसे यह कहने में कोई गुरेज नहीं होता कि काले और मूलवासी तो चोर ही होते हैं और दुनिया भर के कष्ट झेलने के लिए ही पैदा होते हैं। उसका यह मानना है कि ‘‘एक मूलवासी जैसा है वैसा ही रहना चाहता है। वह तो पैदा ही चोर बनने के लिए हुआ है और चोर रहकर ही मर जाता है।’’

काले और  मूलवासी चोर होते हैं। ये पूरी बात यह साबित करती है कि जिनके साथ सबसे ज्यादा अन्याय हुआ है और जो सबसे ज्यादा लूटे गए हैं, वे ही चोर भी ठहराए गए हैं।

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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