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बीच सफ़हे की लड़ाई

असम हिंसा: खतरे की घंटी

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/04/2012 03:22:00 PM



हाशिया की राम पुनियानी के इस लेख के कई बिंदुओं से असहमति है, लेकिन असम में मौजूदा हालात और ब्राह्मणवादी सांप्रदायिक ताकतों के दुष्प्रचार को देखते हुए इस लेख को पोस्ट किया जाना जरूरी लग रहा है. 

असम के बोडो क्षेत्रीय स्वायत्तशासी जिलों कोकराझार और चिरांग में हुई व्यापक हिंसा (जुलाई 2012) ने देश की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया है। प्रधानमंत्री स्वयं हिंसाग्रस्त क्षेत्र में पहुंचे और वहां के घटनाक्रम को देश के लिए कलंक बताया। उन्होंने हिंसा पर नियंत्रण करने में असफल रहने पर अपनी ही पार्टी के मुख्यमंत्री की जमकर खिंचाई भी की। क्षेत्र में सेना की तैनाती में अक्षम्य देरी हुई, जिससे हालात बिगड़ते चले गए। असम में जो कुछ घटा, उसमें बड़ी संख्या में लोगों की जानें तो गईं हीं, इससे भी अधिक त्रासद था लाखों लोगों का अपने घर-बार छोड़कर भागने पर मजबूर हो जाना। विशेषकर तब जबकि बुआई का मौसम शुरू ही हुआ था। इन लोगों को जिन राहत शिविरों में रखा गया है वहां सुविधाओं का भीषण अभाव है और इन शिविरों की संख्या भी जरूरत से बहुत कम है। एक अन्य दुःखद पहलू यह है कि इस हिंसा को बोडो और “अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों“, जिनमें से अधिकांश मुसलमान हैं, के बीच संघर्ष के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।

यह पहली बार नहीं है कि असम को जातीय हिंसा ने अपनी चपेट में लिया हो। परंतु हालिया हिंसा का व्यापक और दूरगामी प्रभाव पड़ने का अंदेशा है। इस क्षेत्र में स्थानीय जनजातीय समूहों और मुस्लिम अल्पसंख्यक, जिन्हें “बांग्लादेशी घुसपैठिए“ कहा जाता है, के बीच कई दशकों से शत्रुतापूर्ण रिश्ते रहे हैं। सभी स्थानीय समस्याओं के लिए तथाकथित बांग्लादेशी घुसपैठियों को दोषी बताया जाता रहा है। ऐसा प्रचार किया जाता रहा है कि असम एक ज्वालामुखी के मुहाने पर बैठा है। “असम असमियों के लिए है“, यह नारा भी उछाला जाता रहा है। यह नारा ठीक उसी तरह का है जैसा कि शिवसेना महाराष्ट्र में उछालती रही है। शिवसेना का भी कहना है कि महाराष्ट्र केवल मराठियों के लिए है। असम में व्याप्त इस गंभीर सामाजिक टकराव को केन्द्र व राज्य, दोनों ही सरकारें नजरअंदाज करती रही हैं।

इस आंतरिक टकराव का प्रकटीकरण पहली बार तब हुआ जब आल असम स्टूडेन्टस यूनियन ने मतदाता सूचियों में से “बांग्लादेशी घुसपैठियों“ के नाम हटाने की मांग को लेकर आंदोलन शुरू किया। इस आंदोलन को भाजपा का पूरा समर्थन प्राप्त था। इसी दौरान अल्पसंख्यकों के खिलाफ भयावह हिंसा हुई। नेल्ली जनसंहार में कुछ ही घंटों के भीतर तीन हजार से ज्यादा मुसलमानों को मौत के घाट उतार दिया गया। इस आंदोलन और जनसंहार के बाद हुए चुनाव आल असम स्टूडेन्टस यूनियन जो अब असम गणपरिषद के नाम से जानी जाती है, असम में सत्ता में आ गई। नेल्ली जनसंहार की जांच के लिए त्रिभुवनदास तिवारी आयोग की नियुक्ति की गई। असम गणपरिषद ने सत्ता में आने के बाद नेल्ली जनसंहार के दोषियों के खिलाफ सारे आरोप वापस ले लिए और तिवारी आयोग की रिपोर्ट को कभी सार्वजनिक नहीं किया गया।

इसके एक दशक बाद, हिंसा का एक और दौर हुआ जिसके शिकार आज भी राहत शिविरों में नारकीय जीवन बिता रहे हैं। पिछले दशक के शुरूआती वर्षों में बोडो जनजातीय नेताओं के साथ एक समझौता किया गया जिसके अंतर्गत बोडो क्षेत्रीय स्वायत्तशासी परिषद का गठन हुआ। इस परिषद के अंतर्गत चार जिले-कोकराझार, चिरांग, बक्सा व उदलगिरी रखे गए। समझौते के अंतर्गत, बोडो अतिवादियों को अपने हथियार डालने थे जो उन्होंने नहीं किया और इन हथियारों का उपयोग अन्य स्थानीय निवासियों को आतंकित करने के लिए किया जाता रहा। अलग-अलग अनुमानों के अनुसार, इन जिलों में बोडो आबादी का प्रतिशत 22 से 29 के बीच है। उनके अलावा, वहां संथाल, राजबंगी, अन्य आदिवासी और मुसलमान भी रहते हैं। बोडो इन जिलों में अल्पसंख्यक हैं। इस क्षेत्र में अल्पसंख्यक होने के बावजूद, बोडो समुदाय ने शासन के अपने अधिकार का दुरूपयोग करते हुए ऐसी नीतियां लागू कीं जिससे गैर-बोडो निवासियों के सामाजिक-आर्थिक हालात बिगड़ते गए। इस क्षेत्र के गैर-बोडो निवासी बदहाली में जी रहे हैं और वे बोडो क्षेत्रीय स्वायत्तशासी परिषद के गठन के खिलाफ थे और हैं। हालिया हिंसा के पहले ऐसी अफवाहें फैलाई गईं कि बांग्लादेश से बड़ी संख्या में हथियारबंद लोग इस क्षेत्र में घुस आए हैं। इसके बाद हिंसा शुरू हो गई।

असम के मुख्यमंत्री ने हिंसा के पीछे “विदेशी हाथ“ होने से इंकार किया है। इस क्षेत्र में असली समस्या यह है कि समय के साथ आबादी बढ़ गई है और खेती की जमीन व अन्य आर्थिक संसाधनों पर भारी दबाव पड़ रहा है। इस दबाव से जनित समस्याओं को सुलझाने की बजाए क्षेत्र की आर्थिक बदहाली और वहां रोजगार की कमी के लिए बांग्लादेशी घुसपैठियों को दोषी ठहराया जा रहा है। “बांग्लादेशी घुसपैठिए“ शब्द पूरे देश व विशेषकर असम में बहुत लोकप्रिय हो गया है। मुंबई में जब बेरोजगारी का संकट बढ़ने लगा तो इसका दोष गैर-मराठी प्रवासियों के सिर मढ़ दिया गया। सच यह है कि बढ़ती आबादी और घटते संसाधनों के कारण सारे देश में बेरोजगारी और गरीबी बढ़ रही है और इसके लिए किसी समूह विशेष को दोषी ठहराना व्यर्थ है। असम में समस्या और गंभीर इसलिए है क्योंकि जिन लोगों को समस्या के लिए दोशी ठहराया जा रहा है, वे विदेशी बताए जाते हैं। क्या यह सच है?

असम में बांग्लाभाषियों की बड़ी आबादी है। उनमें से अधिकांश मुसलमान हैं। क्या ये लोग हाल में यहां आकर बसे हैं? क्या उनकी घुसपैठ के पीछे कोई राजनैतिक लक्ष्य है? क्या वे केवल पिछले कुछ दशकों से ही यहां आते रहे हैं?

बांग्लादेशी घुसपैठियों के मिथक का इस्तेमाल लम्बे समय से पूरे देश के साम्प्रदायिक तत्वों द्वारा अपने हित साधन के लिए किया जाता रहा है। यहां तक कि पूरे देश में इस मिथक ने जड़ें पकड़ ली हैं। बांग्लादेशी घुसपैठियों के मसले को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया जा रहा है। बंगाली प्रवासियों का असम में आने का सिलसिला 1875 के आसपास शुरू हुआ परंतु इसे गति दी अंग्रेजों ने 20वीं सदी के पहले दशक में। उस समय पड़ोसी बंगाल की आबादी बहुत ज्यादा हो गई थी और वहां राजनैतिक चेतना भी फैल रही थी। बंगाल में जनसंख्या घनत्व बहुत अधिक हो जाने के कारण वहां बार-बार अकाल पड़ रहे थे। इसके विपरीत, असम में आबादी बहुत कम थी और वहां से ब्रिटिश सरकार को अपेक्षित राजस्व प्राप्त नहीं हो रहा था। इस समस्या के सुलझाव के लिए ब्रिटिश सरकार ने “मानवरोपण’’ कार्यक्रम शुरू किया, जिसके अंतर्गत बंगाल के लोगों को असम में बसने के लिए प्रेरित किया गया और उन्हें इसके बदले बहुत-से लाभ भी दिए गए। ब्रिटिश शासकों ने अपनी “फूट डालो और राज करो“ की नीति के अंतर्गत लाईन सिस्टम लागू किया जिसके अंतर्गत प्रवासियों और स्थानीय निवासियों को अलग-अलग क्षेत्रों में बसाया जाता था। बांग्लाभाषी मुसलमानों का असम में बसने का यह सिलसिला लंबे समय तक चला और सन 1930 के आसपास, बांग्लाभाषी मुसलमानों का असम की आबादी में अच्छा-खासा  हिस्सा हो गया था। आजाद भारत में असम में मुस्लिम आबादी की दशकीय वृद्धि दर उतनी ही रही है जितनी कि अन्य राज्यों की मुस्लिम आबादी की (स्त्रोतः मुस्लिम्स इन इंडियाः एस. यू. अहमदः जनगणना आंकड़ों के विश्लेषण पर आधारित)।

आजादी के तुरंत बाद के सालों में असम की कुल आबादी और उसमें मुसलमानों के प्रतिशत संबंधी आंकड़े एकदम स्पष्ट हैं। हां, जिस समय पाकिस्तानी सेना पूर्वी पाकिस्तान के निवासियों का दमन कर रही थी उस समय कुछ बांग्लादेशी अवश्य भाग कर असम आएं होंगे। उसके बाद भी आर्थिक कारणों से असम में गरीब बांग्लादेशियों के बसने का सिलसिला जारी रहा होगा, जैसा कि दुनिया के सभी हिस्सों में होता है। प्रश्न यह है कि हम इस आप्रवासन को किस दृष्टि से देखें। उदाहरणार्थ, भारत में बहुत बड़ी संख्या में नेपाली रहते हैं परंतु उन्हें न तो नीची निगाहों से देखा जाता है और न ही उनका दानवीकरण किया जाता है। यहां तक कि बांग्लादेश से आने वाले हिन्दुओं के साथ प्रवासी के रूप में व्यवहार किया जाता है जबकि वहीं से आने वाले मुसलमानों को घुसपैठिया, भारत की सुरक्षा के लिए खतरा और न जाने क्या क्या बताया जाता है। यहां यह उल्लेखनीय है कि उत्तर-पूर्वी राज्यों में व्यापार-व्यवसाय पर मुख्यतः राजस्थान के मारवाड़ियों का कब्जा है। असम में बिहारी भी बड़ी संख्या में रहते हैं।

भाजपा और उसके सहयोगी संगठनों के “घुसपैठियो’’ के बारे में दुष्प्रचार के पीछे राजनैतिक निहित स्वार्थ हैं। जहां देश के दूसरे हिस्सों में मध्यकालीन इतिहास का इस्तेमाल मुसलमानों को दानव-रूप में प्रस्तुत करने के लिए किया जाता है वहीं उत्तर-पूर्व में उन्हें घुसपैठिया बताकर राजनैतिक लक्ष्य साधे जाते हैं। यह अत्यंत दुःखद है कि नेशनल काउंसिल ऑफ चर्चेस इन इंडिया भी इस दुष्प्रचार के झांसे में आ गया और उसके प्रवक्ता ने फरमाया कि बांग्लादेशी घुसपैठियों ने असम में दस हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर कब्जा कर लिया है! सच यह है कि भारत के विभाजन के समय भी असम में मुसलमानों की अच्छी-खासी आबादी थी। इसके बाद, आर्थिक कारणों से कुछ बांग्लादेशी असम में आ बसे होंगें। असम को विभाजित कर 6 नए राज्य बना देने के बाद मुसलमान मुख्यतः उस इलाके में बच रहे जिसे अब असम कहा जाता है, और शायद इसलिए प्रतिशत के लिहाज से उनकी आबादी कुछ ज्यादा प्रतीत होती है।

साम्प्रदायिक ताकतों द्वारा बांग्लादेशीयों की कथित घुसपैठ के बारे में दुष्प्रचार और तीखा होता जा रहा है। यहां तक कि कई आमजन इसे सही मानने लगे हैं। असम में इस मसले पर कई आंदोलन होने से भी इस मिथक को बल मिला है। असम में मुख्य समस्या आर्थिक विकास का अभाव है न कि स्थानीय रहवासियों को ‘घुसपैठियों’ द्वारा उनकी जमीनों से बेदखल किया जाना। असम का मसला मुंबई की शिवसेना-ब्रांड राजनीति और “साम्प्रदायिक विदेशी“ के मिथक का काकटेल है। इसके अलावा, इसमें नस्लीय मसलों को भी शामिल कर दिया गया है। नेल्ली से लेकर हालिया हिंसा तक लगातार एक समुदाय विशेष को उनके घरों और गांवों से खदेड़ने का क्रम चल रहा है। पहले घुसपैठ के नाम पर दुष्प्रचार किया जाता है और फिर प्रायोजित हिंसा होती है।

असम में सबसे पहली ज़रूरत है सभी समूहों का निशस्त्रीकरण। इसके बाद यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि विस्थापित लोग फिर से अपने गांवों में वापिस जा सकें और बुआई का मौसम खत्म होने के पहले खेती का काम शुरू कर सकें। अगर ऐसा नहीं किया गया तो बहुत बड़ी संख्या में गरीब लोगों के पास खाने के लिए अन्न का एक दाना भी नहीं बचेगा। पिछले सौ वर्षों के जनसंख्या संबंधी आंकड़ों का निष्पक्ष अध्ययन और विश्लेषण कर बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को “घुसपैठ“ का सच जनता के सामने लाना चाहिए। “बांग्लादेशी घुसपैठियो’’ के नाम पर साम्प्रदायिक ताकतों द्वारा खेली जा रही राजनीति का पर्दाफाश होना चाहिए। जो लोग हिंसा के शिकार हुए हैं उनके घावों पर मरहम लगाने का काम भी प्राथमिकता के आधार पर किया जाना चाहिए। उनके साथ सार्थक संवाद स्थापित करके और उन्हें न्याय दिलाकर ही इस समस्या का समाधान किया जा सकता है।

(मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण: अमरीश हरदेनिया)

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ असम हिंसा: खतरे की घंटी ”

  2. By Anonymous on August 5, 2012 at 8:47 AM

    marwadi mahasabha condemn the obliq reference of community by writer in bad taste.marwadi always give strength to economy of place whereever they r going and doing business.assam will be richer in all respect if marwadi community flourish there.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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