हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

देशभक्ति का स्वांग बंद करो, जनद्रोही क़ानून रद्द करो

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/11/2012 04:23:00 PM

दख़ल, लखनऊ की पहल पर 9 अगस्त से 15 अगस्त 2012 तक लखनऊ में विभिन्न संगठनों द्वारा जनद्रोही क़ानूनों और राज्य दमन के ख़िलाफ़ सात दिवसीय साझा दस्तक का आयोजन किया जा रहा है। जन संवाद के इस कार्यक्रम में जनपक्षधर कलाकार और क़लमकार अपनी रचनाओं के साथ हिस्सेदारी बंटायेंगे। लखनऊ में आयोजित प्रेस वार्ता में जारी इस साझे आयोजन का परचा पेश है.

इक़बालिया बयान

पूरे होशो-हवास में और बिना किसी दबाव के हम एलान करते हैं कि हां, हम भी देशद्रोही हैं और हमें इस पर गर्व है। सरकार चाहे तो हमें गिरफ़्तार करे, जेल में ठूंसें, मुक़दमा ठोंके और जज साहेबान बामशक़्क़्त उम्र क़ैद की सज़ा सुनायें।

साथियों,

हम सफ़ाई नहीं देना चाहते। जिरह करना चाहते हैं कि यह देश आख़िर किसका है? कारपोरेट घरानों का, बिल्डरों का, थैलीशाहों का, सेज़ के शहंशाहों का, मुनाफ़े के लुटेरों का, माफ़िया और बिचौलियों का, संसद और विधानसभाओं में कांव-कांव करनेवालों का, नक़ली मुद्दों पर आग लगानेवालों का... अपराध, उद्योग और राजनीति के नापाक गठबंधन का, बाज़ार की दादागिरी का? या कि देश के आम नागरिकों का जिनके सामने जीने का संकट दिनोंदिन गहराता जा रहा है? शर्म की बात है कि आज़ादी के 64 बरस गुज़र गये लेकिन देश की मेहनतकश जनता को दुख-मुसीबतों और अभावों की गठरी से आज़ादी नहीं मिल सकी। नाइनसाफ़ी का पहाड़ और ऊंचा हो गया, ग़ैर बराबरी की खाई और चौड़ी हो गयी।

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में इतना अधिक विकास हुआ कि मछलियां बूंद-बूंद को तरसें और मगरमच्छ भरा समुंदर पी जायें, कि बस्ती-बस्ती आफ़त बरसे और महलों की रौनक़ बढ़ जाये। यह निजीकरण, उदारीकरण उर्फ़ लूट के खगोलीकरण का नतीज़ा है- लोकतंत्र और मानवता की हत्या है, अधर्म और महापाप है।

ग़ुलाम भारत में बिरसा मुंडा और भगत सिंह सरीखे क्रांतिवीरों को, कला और क़लम के निर्भीक सिपाहियों को और यहां तक कि गांधीजी जैसे अहिंसा के पुजारियों को भी देशद्रोही होने का तमग़ा मिला था। आज़ाद हिंदुस्तान में भी यह सिलसिला बदस्तूर जारी है। जो जनता पर निशाना साध रही नीतियों और योजनाओं की मक्कारियों को नंगा करे, सच बोले, इनसाफ़ की तरफ़दारी करे, देश की इज़्ज़त-आबरू को लुटने से बचाने की क़सम खाये- राजद्रोही उर्फ़ देशद्रोही कहलाये। जो विकास के देवताओं पर अपनी धरती, नदी, पहाड़ और जंगल को, क़ुदरत के बेशक़ीमती ख़ज़ाने को, अपनी आजीविका, आत्मनिर्भरता, परिवेश, संस्कृति और स्वाभिमान को न्यौछावर करने से इनकार करे- विकास का दुश्मन उर्फ़ माओवादी कहलाये, देश की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा ख़तरा हो जाये।

मशहूर कवि रघुवीर सहाय की पंक्तियां हैं ‘राष्ट्रहान में भला कौन वह भारत भाग्य विधाता है? डरा हुआ मन बेमन जिसका बाजा रोज़ बजाता है।‘ भारत भाग्य विधाता कई भेस में है- हिंदुस्तान के बाहर भी है, अमरीका और इज़रायल में भी है। वह विकास का मसीहा है, इतना बड़ा देशभक्त है कि हर क़ीमत पर हिंदुस्तान को महाबली देशों की जमात में शामिल कराने पर आमादा है। वह आतंकवाद का शोर मचा कर, सभ्यताओं के संघर्ष का बिगुल बजा कर लूट का अश्वमेघ यज्ञ कराता है। उसे सरहदों की हिफ़ाज़त की चिंता है, देशवासियों के जीवन की नहीं।

सीमा आज़ाद और उनके पति विश्वविजय का यह संगीन जुर्म था कि उन्होंने इस बदसूरत, फूहड़ और अश्लील तसवीर को बदलने की ठानी। क़लम थामी और संघर्ष की राह चुनी। हज़ारों लोगों को उजाड़नेवाली गंगा एक्सप्रेस वे जैसी परियोजनाओं और अपनी ही जनता के ख़िलाफ़ युद्ध का मोर्चा खोलने जैसे सरकारी धतकरमों को कटघरे में खड़ा करने की ज़ुर्रत की। यह ख़तरनाक़ काम उनके माओवादी होने का पक्का सबूत बना। ढाई साल पहले दोनों क़ानून के हत्थे चढ़े, सीधे जेल पहुंचे और गुज़री 8 जून को निचली अदालत ने उन्हें उम्र क़ैद की सज़ा सुना दी। राहत की बात है कि इसी 6 अगस्त को ज़मानत पर उनकी रिहाई हो चुकी है लेकिन याद रहे कि अभी जोकरी इल्ज़ामों से रिहाई बाक़ी है। यह अकेला मामला नहीं है। आज हिंदुस्तान की जेलें ऐसे हज़ारों क़ैदियों से आबाद हैं जिन्होंने ज़ुबान खोलने का गुनाह किया। अपना भारत महान- जय हे, जय हे, भारत भाग्य विधाता...

तो गिरफ़्तारी, मुक़दमा, जेल उन सिरफिरों को सबक़ सिखाने के लिए है जो झूठी आज़ादी से देश और देश के लोगों की रिहाई चाहते हैं। समझदारी की अलख जगाते हैं कि घुट-घुट कर मरने से तो अच्छी है लड़ाई... सबके साथ, सबके भले के लिए। यह लड़ाई आसान नहीं- शिक़ायत और सुनवाई के तमाम संवैधानिक रास्तों की नाकेबंदी है। फ़रमान है कि उफ़ न करो, नज़र झुका के चलो, हदों में रहो। वरना भुगतो, क़ानून का बेरहम डंडा झेलो। यह शर्मनाक है कि विलायती हुक़ूमत की यह ज़ालिमाना विरासत आज़ाद हिंदुस्तान में भी बाअदब जारी है बल्कि और ज़हरीली हो गयी है। अदालतें बेचारी क्या करें? क़ानून तो शहंशाहों का चलता है।

आज़ादी और जम्हूरियत को घायल करनेवाले, सच को सज़ा और झूठ को बाइज़्ज़त बरी करनेवाले, इनसाफ़ की आवाज़ों को बेड़ियों में जकड़ने और गिद्ध इरादों को पूरा आसमान सौंप देनेवाले ऐसे बेहया, भ्रष्ट और शातिर क़ानूनों पर हमारी हज़ार बार आक्थू-आक्थू... ।

यह समय की मांग है कि हम बेहतर भविष्य का साझा सपना बुनें, चुप्पी तोड़ें और गर्व से कहें कि सच की पैरवी करना, दुखियारों के साथ खड़े होना, इनसानी हैसियत में और अपनी हंसी-ख़ुशी से जीने का अधिकार मांगना अगर देशद्रोह है तो बेशक़, हम भी देशद्रोही हैं। सच्चे हिंदुस्तानी का यही धर्म है- देश के ज़िम्मेदार नागरिक होने का यही तक़ाज़ा है, बदहालियों को अंगूठा दिखाने का यही रास्ता है, अंधेरा मिटाने का यही अचूक मंत्र है।

इसी कड़ी में दख़ल, लखनऊ की पहल पर भारत छोड़ो आंदोलन की 70वीं सालगिरह, 9 अगस्त से 65वें स्वाधीनता दिवस, 15 अगस्त 2012 तक लखनऊ में सात दिवसीय साझा दस्तक का आयोजन किया जा रहा है। कार्यक्रम का समापन पड़ाव धरना स्थल होगा- शाम 3 से 5 बजे तक। आपसे अपील है कि कार्यक्रम के हमसफ़र बनें, इस परचे को जन-जन तक पहुंचायें और मिल कर आवाज़ उठायें कि-

देशभक्ति का स्वांग बंद करो, जनद्रोही क़ानून रद्द करो

पिंजरा खोलो, जनता को आज़ादी दो

साझीदार:

काला क़ानून एवं दमन विरोधी मंच, सीमा-विश्वविजय रिहाई मंच, अमुक आर्टिस्ट ग्रुप, भारतीय जन संसद, इंडियन वर्कर्स कौंसिल, इनसानी बिरादरी, जन संस्कृति मंच, क्रांतिकारी सांस्कृतिक मंच, मज़दूर परिषद

दख़ल, लखनऊ द्वारा जारी


संपर्क: 9453682439 , 9335556115 , 9335223922 , 9415011487 dakhalgroup@gmail.com

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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