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बीच सफ़हे की लड़ाई

जो राज्य जितना फ्रेंडली माहौल देगा, वो उतना दमनकारी होगा

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/23/2012 07:52:00 PM

दिलीप खान

जब मानेसर में मज़दूरों ने शांति से हड़ताल की, एक बार नहीं, दो बार नहीं तीन बार, तो टीवी मीडिया वाले उधर फटके तक नहीं थे. हज़ारों की संख्या में गुड़गांव में मज़दूरों ने प्रदर्शन किया था. कई कारखानों और संगठनों के मज़दूर उसमें शामिल थे. एनसीआर में इतना बड़ा मज़दूर-प्रदर्शन मुझे कोई और याद नहीं आता. सारे मीडिया वाले जान रहे थे, मानेसर में क्या चल रहा है, सिर्फ कवर नहीं कर रहे थे. चर्चा भी चलती थी कि आगे कोई ‘बड़ा हादसा’ हो सकता है. अब हुआ तो लपके पड़े हैं. मीडिया को ‘हादसे’ का इंतज़ार रहता है. हादसा करो, तो ख़बर बनेगी.

मारुति को लेकर जितनी ख़बरें चली हैं उनमें पिछले एक साल से चल रही घटनाओं को अंतिम में बस रैप-अप किया गया. अख़बार वाले नॉस्टैल्जिक होकर लिखते रहे कि –संजय गांधी के सपनों की मारुति. जो अख़बार मानेसर में संजय गांधी को देख रहा था, और इस दौरान 30-40 साल पीछे गोता लगा रहा था, उसे साल भर पहले ‘गुड कंडक्ट फॉर्म’ की याद नहीं आ रही थी. नॉस्टैल्जिया हमेशा गांधियों के पक्ष में ही क्यों रहता है?

सुनिए ज़रा श्यामबीर से


पिछले साल मज़दूरों की मांग को सुनने की बजाए भूपेंद्र सिंह हुड्डा जापान गए थे, ताकि ओसामा सुज़ुकी का भरोसा जीत सके. उनके जापान से लौटते ही दर्ज़न भर मज़दूरों को पुलिस ने पीटा था. सुज़ुकी धमकी दे रहे थे कि प्लांट को उठाकर वो गुजरात ले जाएंगे. मोदी उनको फ्रेंडली माहौल का भरोसा दे रहे थे. मानेसर में उस समय भी कुछ दिनों के लिए तालाबंदी थी. अब फिर तालाबंदी है, लेकिन इस बार हुड्डा नहीं बल्कि मोदी जापान गए हैं भरोसा जीतने. भरोसा जीतने की क़ीमत हम जानते हैं मोदी जी!

 कॉरपोरेट्स को नरेंद्र मोदी पसंद हैं. जाहिर है वो कॉरपोरेट को खुश रखते हैं. अब हवा में तो कोई खुश रहेगा नहीं, जाहिर है बदले में वो तब-तब समर्थन चाहेगा जब-जब किसी ‘दूसरे’ के साथ उनका हित टकराए. सरकार से हित टकराना नहीं है, सरकार तो मोदी ही है. तो, जिनसे हित वगैरह टकराएगा वो मज़दूर-टाइप ही कोई होगा न? यही भरोसा जीतने के लिए जापान जाना पड़ता है बॉस. यह आप भी जानते हैं और हम भी.

दिलीप के कुछ फेसबुक स्टेटसों को जोड़कर यह पोस्ट बनाई गई है.

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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