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बीजापुर जनसंहार पर सीडीआरओ की रिपोर्ट

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/31/2012 01:12:00 AM

सीडीआरओ  द्वारा तथ्यों की जाँच-पड़ताल


कोऑर्डिनेशन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स आर्गेनाइजेशन (सीडीआरओ) से जुड़े अधिकार कार्यकर्ताओं की एक अखिल भारतीय टीम ने छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले के उस क्षेत्र का दौरा किया, जहाँ 28 जून, 2012 की रात में सीआरपीएफ के जवानों द्वारा गोली चलाने के कारण 17 आदिवासियों की मौत हो गई थी। इस टीम ने 6 और 7 जुलाई को सिरकेगुडम, कोटागुडेम तथा राजुपेंटा गाँवों का दौरा किया और घटना के बारे में जानकारी हासिल की। आगे टीम द्वारा की गई जाँच की संक्षिप्त रिपोर्ट दी गई है।

तीनों ही गाँव बासागुड़ा पुलिस स्टेशन के अंतर्गत आते हैं। ये तीनों गाँव बहुत ही छोटे हैं और एक-दूसरे के आस-पास बसे हैं। इन गाँवों से पुलिस स्टेशन की दूरी तकरीबन एक किलोमीटर है। इन तीनों गाँवों से तकरीबन तीन किलोमीटर की दूरी पर एक सीआरपीएफ कैंप स्थित है। सिरकेगुडम में कुल 25 और राजुपेंटा में 12 घर हैं। ये दोनों कोरसागुदेम पंचायत के अंतर्गत आते हैं। कोटागुडा में 30 घर हैं और यह चीपुरूपट्टी पंचायत के अंतर्गत आता है। इन तीनों गाँवों के अधिकांश लोग दोरला कोया जनजाति से संबंधित हैं।
28 जून की रात में तकरीबन 8 बजे इन तीनों गाँवों से तकरीबन 60 आदिवासी सिरकेगुडम और कोटागुडेम के बीच के खुले क्षेत्र में इकट्ठे हुए थे। चूंकि आदिवासी दिन में काम में व्यस्त रहते हैं, इसलिए अमूमन रात में सामूहिक फैसले करने के लिए इस तरह की बैठकें होती रहती हैं। दरसअल, बुआई का मौसम आने वाला था, इसलिए यह बैठक खेती से जुड़े विभिन्न मसलों से   संबंधित थी। इसमें बीज बोने के पारंपरिक त्योहार की तारीख भी तय करनी थी, जिसे बीजा पोंडम के नाम से जाना जाता है (यह काम कुछ हफ्ते पहले ही होना था, लेकिन इसमें देरी हो गई क्योंकि इसे करवाने वाले पुजारी की मौत हो गई थी)। इसके अलावा, इस बैठक में दूसरे कई मुद्दों पर भी चर्चा की जानी थी, मसलन जुताई के लिए जमीन का वितरण, बगैर जानवर वाले परिवारों की मदद, नए आए ट्रैक्टर के उपयोग के लिए किराए की राशि और मछली के उत्पादन को बढ़ाने की तरकीब। आदिवासियों को पिछले दो सालों में तेंदु पत्ता इकट्ठा करने का पैसा नहीं मिला था। उन्हें अब जाकर 10,000 हजार की बकाया राशि मिली थी। इस बैठक में वे इस बात की भी चर्चा करने वाले थे कि इस पैसे को कैसे खर्च किया जाए। इस रात आकाश में बहुत ज्यादा बादल थे और बहुत कम दिखाई दे रहा था। इस बैठक में सिर्फ इन तीन गाँवों के ही लोग थे और उनके पास कोई हथियार नहीं था।

जब मीटिंग चल रही थी, उसी दौरान सीआरपीएफ और कोबरा (कमांडो बटालियन फॉर रेसोल्यूट एक्शन, जो कि सीआरपीएफ की एक खास नक्सल विरोधी गुरिल्ला यूनिट है) कमांडो की एक बड़ी टुकड़ी ने पूरे क्षेत्र को घेर लिया। इसमें 100 से ज्यादा लोग थे। गाँववालों के अनुसार तकरीबन दस बजे इन लोगों ने कोई चेतावनी दिए बगैर फायरिंग शुरू कर दी। पहली बार पश्चिमी दिशा से फायरिंग हुई। इसमें तीन आदिवासियों को गोली लगी और तुरंत ही उनकी मौत हो गई। इसके तुरंत बाद तीन और दिशाओं से गोलियाँ चलने लगीं। भयभीत गाँववाले चिल्लाने लगे और उन्होंने भागना शुरू कर दिया। अधिकांश लोग अपने-अपने गाँवों की ओर भागे। कुछ लोगों ने घास रखने के लिए बने स्थान की ओट में छिपकर जान बचाने की कोशिश की। जो लोग अपनी जान बचाकर भाग रहे थे, उन पर भी गोलियाँ चलाई गईं। तकरीबन 30 मिनट तक गोलीबारी चलती रही। इसके बाद मानो मृतकों का सर्वे करने के लिए सीआरपीएफ के जवानों ने दो आग जलाने वाली बंदूकों से फायर किया जिससे इस क्षेत्र में रोशनी हो गई। सीआरपीएफ जवान इसी क्षेत्र में रुके रहे।
टीम द्वारा की गई तथ्यों की जाँच से यह बात स्पष्ट है कि आदिवासी शांतिपूर्ण तरीके से बैठक कर रहे थे। इस बैठक में मौजूद किसी भी व्यक्ति के पास आग्नेयास्त्र नहीं था। सीआरपीएफ के जवानों ने इन्हें घेर लिया और बिना किसी चेतावनी के अंधाधुंध गोलियाँ चलाईं। इस गोलीबारी के कारण 16 आदिवासी मारे गए। 15 लोगों की उसी रात मौत हो गई और 15 साल के इरपा सुरो ने अगले दिन बीजापुर के अस्पताल में दम तोड़ दिया। मारे गए लोगों में से छह लोग नाबालिग थे। नाबालिग लोगों में के. रामा की 12 साल की बेटी काका सरस्वती भी शामिल थी। जब वह भागकर कोटागुडेम के अपने घर में जा रही थी तो उसे गोली मार दी गई। बाकी पाँच नाबालिग लोगों में से दो काका राहुल (16) और मडकाम रामविलास (16) बासागुडा के स्कूल में दसवीं क्लास में पढ़ते थे। वे दोनों बासागुडा में होस्टल में रहते थे और गर्मियों की छुट्टी में घर आए थे।

यह बिल्कुल साफ है कि उस रात सिरकेगुडम में लोगों की बेरहमी से हत्या की गई। गाँववालों के अनुसार जो लोग गोलियों से नहीं मरे, उन्हें पुलिस ने गाँव से ली गई कुल्हाड़ियों से मार डाला। गाँव के बाहर के बहुत सारे प्रत्यक्षदर्शियों ने यह बताया कि कुछ लोगों के सीने और ललाट पर कुल्हाड़ी से मारे जाने के निशान थे। इस तरह की जानकारी देने वालों में मीडिया के वे लोग भी शामिल थे जिन्होंने लाशों को दफनाए जाने से पहले देखा था।

इस क्रूर हत्या का सत्रहवाँ शिकार इपरा रमेश था। वह आई लचमी का पति और तीन बच्चों का पिता था। गोलीबारी शुरू होने के बाद वह भागकर सुरक्षित अपने घर में चला गया। पाँच बजे सुबह हालात का जायजा लेने के लिए अपने घर से बाहर निकला। सीआरपीएफ के लोगों ने उनका पीछा किया और उसके परिवार के सदस्यों के सामने ईंट से मार-मारकर उसकी हत्या कर दी। रमेश के पिता इरपा राजू के अनुसार, सीआरपीएफ के लोगों ने उनके घर से 5,000 रुपए भी ले लिए। इसी रात पुलिस ने राजुपेंटा में इरपा नारायणा के घर से 3000 हजार और मडकाम रमेश के घर से 2,000 रुपए ले लिए।

मारे गए लोगों की सूची

कोटागुडेम के लोगः

1. काका सरस्वती (12), के. रामा की बेटी।
2. काका सम्माय्या (32), किसान, के. नेगी का पति।
3. काका राहुल (16), बासागुडा में दसवीं क्लास का छात्र, के. नारायणा का बेटा।
4. मडकाम रामविलास (16), बासागुडा में दसवीं क्लास का छात्र, काका राहुल का सहपाठी और एम. बुचैया का बेटा।
5. मडकाम दीलिप (17) पामेड में आठवीं तक की पढ़ाई करने के बाद अपने पिता एम. मुतैया की खेती में मदद करता था।
6. इरपा रमेश (30) किसान, आई. लचमी का पति और तीन बच्चों का पिता।
7. इरपा दिनेश (25) किसान, आई. जानकी के पिता, चार बच्चों के पिता, इरपा रमेश के छोटे भाई।
8. मडकाम नागेश (35), पहले एक पेशेवर ढोलक बजाने वाले थे, जो त्योहारों के दौरान ढोलक बजाते थे, एम. सामी के पति, दो बच्चों के पिता। इनकी पत्नी के गर्भ में इनका तीसरा बच्चा है।
9. मडकाम सुरेश (30), किसान, एम. सामी के पति एवं दो बच्चों के पिता और मडकाम नागेश के छोटे भाई।
10. इरपा नारायणा (45), किसान, आई. नारसी के पति और चार बच्चों के पिता।

राजुपेंटा के लोगः

11. इरपा रमैया (40), किसान, आई. भीमी का पति, पाँच बच्चों का पिता।
12. इरपा सुरेश (15), पाँचवी क्लास तक पढ़ा, आई. चंद्रैया का बेटा, 29 जून को बीजापुर अस्पताल में इसकी मौत हो गई।

सिरकेगुडम के लोगः


13. सरके रमन्ना (25), किसान, एस. सोमलु के पति, तीन बच्चों के पिता।
14. अपका मैतू (16), ए. सुखराम का बेटा, खेती में अपने पिता की मदद करता था।
15. कोरसा बीचेम (22), ए. गुट्टा का बेटा, पहले हैदराबाद के बोरवेल फर्म में काम करता था, एक महीने पहले अपने पिता की खेती में मदद करने वापस आया था।
16. कुंजम मल्ला (25), किसान, के. लखमाडू का बेटा।
17. माडवी अएतू (40), किसान, एम. कामली का पति और चार बच्चों का पिता।

गोलीबारी में 6 आदिवासी घायल हुए। इनमें से चार काका रमेश (11) और काका पार्वथी (10), इरपा चिन्नक्का (40) और एबका चोटू (16) को बीजापुर और जगदलपुर के अस्पतालों में दाखिल कराया गया था।। अब ये लोग इलाज के बाद घर लौट आए हैं। मडकाम सोमैया (30) और काका स्नेती (19) को रायपुर के अस्पताल में ले जाया गया था। अभी भी इनका इलाज चल रहा है, लेकिन ये खतरे से बाहर हैं। घायल लोगों में से काका रमेश (13) और उसकी छोटी बहन काका पार्वथी (11) बाल-बाल बचे हैं। गोलीबारी शुरू होने के बाद वे कोटागुडेम में अपने घर की ओर भागे और उनके बाईं बाँह पर गोली लगी। इरपा मुन्ना (26) और सरका पुल्लाइया (20) भी घायल हुए थे, लेकिन सीआरपीएफ के लोग इन्हें अस्पताल लेकर नहीं गए। सरकेगुडा और कोटागुडेम  में आदिवासियों द्वारा पारंपरिक दवाइयों की मदद से इनका इलाज किया जा रहा है। गोलीबारी में कुछ जानवर भी मारे गए।

उस रात सीआरपीएफ के लोग मैदान में ही जमे रहे और रात में ही वे 15 लाशों को बासागुडा ले गए और वे इरपा रमेश को सुबह ले गए। घायल लोगों के अलावा वे 25 गाँव वालों को भी अपने साथ ले गए, जिन्हें शाम में छोड़ दिया गया। आदिवासी उसी दिन बासागुडा गए और उन्होंने माँग की कि मृतकों के शव उन्हें सौंपे जाए। शाम में पुलिस ने उन्हें शव वापस कर दिया और अगले दिन गाँव के लोगों ने उनका अंतिम संस्कार कर दिया। कुछ लोगों का शव जलाया गया, तो कुछ लोगों को दफना दिया गया। इरपा दिनेश का शव अभी तक गाँव में वापस नहीं आया था, क्योंकि पुलिस के अनुसार वह एक माओवादी था। उसके शव को बासागुडा पुलिस स्टेशन के नजदीक दफना दिया गया।  

मानक नियमों का उल्लंघन करते हुए सीआरपीएफ के लोग न सिर्फ लाशों को अपने साथ ले गए, बल्कि उन्होंने लाशों के नीचे की जमीन में लगे खून के धब्बों को हटाने के लिए उस मिट्टी को भी निकालकर ले गए। बीजापुर के सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस ने ‘ऑन रेकार्ड’ यह कहा है कि ‘बासागुडा थाना में डॉक्टरों की एक टीम के द्वारा समुचित पोस्टमार्टम किया गया और उसकी रिपोर्ट तैयार की जा रही है।’ पोस्टमार्टम थाना में नहीं, बल्कि ऐसे अस्पताल में होना चाहिए जहाँ सभी आवश्यक साधन मौजूद हों। यह बात भी गौर करने लायक है कि गाँव के लोग इस बात पर एकमत थे कि पोस्टमार्टम नहीं हुआ है। बहुत सारे रिपोर्टरों ने भी इस बात का समर्थन किया। इन रिपोर्टरों को किसी भी शव पर ऐसा कोई निशान नहीं दिखा था, जो पोस्टमार्टम के बाद शरीर पर बन जाता है। 
    
जांच-पड़ताल दल के सदस्यों से गांववालों ने यह भी बताया की 29 जून की सुबह को सीआरपीएफ के जवान दो महिलाओं को घसीटते हुए मैदान में लेकर गए और उनके कपड़ों को फाड़ डाला। साथ ही तीन अन्य महिलाओं को भी गालियां दीं, पीटा और बलात्कार रेप करने की धमकी दी।

यह तथ्य साफ बताते हैं कि पुलिस प्रतिष्ठान, एस.पी. बीजापुर से लेकर सीआरपीएफ के उच्च अधिकारी तक आदिवासी नागरिकों के हत्याकांड को माओवादियों के साथ हुई जवाबी गोलीबारी में हुई हत्या के तौर पर प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके लिए वह सीआरपीएफ और कोबरा कमांडो के छह घायल सैनिकों का बार-बार जिक्र कर रहे हैं। इस पूरे झूठ को राजनीतिक वर्ग के केंद्रीय गृहमंत्री द्वारा और विस्तारित किया गया। वृहत रूप में, यह ‘ऑपरेशन सिल्गर’ के तहत कई सप्ताह पहले ही सीआरपीएफ और कोबरा कमांडो की तीन टीमों ने इस इलाके के लिए प्लान बनाया था, जिसमें इनके पास खुफिया जानकारी थी कि यहां बड़ी संख्या में माओवादी एकत्रित होने वाले हैं। इस ऑपरेशन के आई.जी. के अनुसार सीआरपीएफ के जवान सिरकेगुडम में होने वाली सभा तक पहुंचते और जाकर विषय का पता लगाते, उससे पहले ही इनके ऊपर फायरिंग होने लगी जिसके बाद आत्म-सुरक्षा में सीआरपीएफ के जवानों को फायरिंग करनी पड़ी। सीआरपीएफ के पंकज कुमार सिंह का कहना है कि ‘यहां पूर्ण रूप से तैयार माओवादी कैंप चलाया जा रहा था, उनकी तैयारियां इस प्रकार से थीं की यदि कोई हमला होता है, उस स्थिति में वह 10 मिनट में भाग सकते थे। हमने वहां से आई.ई.डी., बहुत सारा साहित्य, पॉलिथिन टेंट और सोलर लाईट तथा नली भरी हुई बंदूकें बरामद की हैं।’

यह व्याख्या इस भयानक अपराध को बेशर्मी से झुठलाने वाली है। आत्म-सुरक्षा के नाम पर एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल किलिंग को सही बताने का पुलिस एवं अर्धसैनिक बलों का यह एक पसंदीदा उपाय है। जांच दल के सदस्यों का यह मानना है कि उस रात को कोई भी क्रॉस फायरिंग नहीं हुई। फायरिंग पूरी तरह से एकतरफा थी, वह भी विशेष सुरक्षा बलों की ओर से अकारण एवं अचानक। उस रात को घायल हुए सीआरपीएफ और कोबरा के छह जवानों के बारे जिस प्रकार सीआरपीएफ के अधिकारी बता रहे हैं, वह केवल अपनी फायरिंग को जायज ठहराने के लिए ऐसा कर रहे हैं। जांच दल ने देखा कि जहां आदिवासी एकत्रित हुए थे उसके आस-पास के दर्जनों भर पेड़ों पर गोलियों के निशान थे। गोलियों के निशान कुछ घरों पर भी देखने को मिले, जिससे यह पता चलता है कि इकट्ठा हुए आदिवासियों पर चारों तरफ से गोली चलाई गई है। यह संभव है कि छह जवान अपने ही साथियों द्वारा दूसरी ओर से की जा रही गोलीबारी में घायल हुए हों। गांववालों का यह मत है कि सीआरपीएफ और कोबरा के छह जवान अपनी ही क्रॉस फायरिंग में घायल हुए हैं। गांव के सभी आदिवासियों से जांच दल ने बात की। उनका यह कहना है कि मीटिंग में कोई भी माओवादी नही था तथा जो भी लोग मीटिंग में एकत्रित हुए थे, उनमें से किसी के पास भी हथियार नही थे।

राष्ट्रीय मीडिया में ऐसी रिपोर्टें आने के बाद कि बड़ी संख्या में नागरिकों की हत्या की गई है, जिसमें कम उम्र के बच्चे (नाबालिग) भी हैं, सरकारी रुख थोड़ा कमजोर हुआ। लेकिन ये लोग अपने मुख्य तर्क पर टिके हुए हैं कि मीटिंग में हथियारबंद माओवादी उपस्थित थे और यह एनकाउंटर बिल्कुल सही है। सीआरपीएफ का अब यह कहना है कि मारे गए लोगों में से सात - मडकाम सुरेश, मडकाम नागेश, माडवी अयातू, काका सम्मैया, कोरसा बीजी, मडकाम दिलीप और इरपा नारायण माओवादी हैं। इनके विरुद्ध छत्तीसगढ़ राज्य के विभिन्न पुलिस स्टेशनों में गंभीर प्रकष्ति के कई सारे केस दर्ज हैं। मारे गए आदिवासी नागरिकों के बारे में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री का कहना है कि माओवादियों ने आदिवासियों को मानव सुरक्षा कवच के रूप में प्रयोग किया, जो नागरिकों की हत्या का कारण बना।

सुरक्षा प्रतिश्ठानों के अत्यधिक बौद्धिक समूह ने अब एक नया डिस्कोर्स चलाया है जिसके तहत इस घटना को ‘दुर्भाग्यपूर्ण समानांतर नुकसान (कोलेटरल डैमेज)’ कहना शुरू किया है। साथ में यह भी कहा जाता है कि भविष्य में यह कैसे कम हो इसका ध्यान रखा जाएगा। उस बादल भरी रात में एकत्रित हुए लोगों के बीच हथियारबंद लोग उपस्थिति हैं, इसका पता लगा सकना सीआरपीएफ और कोबरा के जवानों के लिए बिल्कुल संभव नहीं था, वह भी तब जब वह उस स्थान से 100 मीटर दूर थे। उन्होंने एक जगह जमा हुए गांव वालों को घेर कर तब तक फायरिंग की जब तक वो मर नहीं गए। यदि यह सही भी मान लिया जाए कि सीआरपीएफ ने गोलीबारी जवाबी फायरिंग में की, तब भी इस बात को औचित्यपूर्ण व सही नहीं ठहराया जा सकता कि गांव के एकत्रित समूह पर गोलीबारी की जाए।

पिछले कई वर्षों में इन इलाकों ने ऐसी ही दर्दनाक व भयानक हिंसा को देखा है। विशेष रूप से 2005 से दक्षिण बस्तर में पुलिस और आपराधिक सलवा जुडूम के हत्यारे गिरोह साथ मिलकर आदिवासियों को प्रताड़ित कर रहे हैं। इन छह वर्षों के लंबे भय के दौरान, इन तीन गांवों में रहने वाले लोगों पर सलवा जुडूम के द्वारा कई सारे हमले किए गए, घरों को लूटा व जलाया गया। इसके कारण कई सारे लोग गांव छोड़ कर चले गए। इनमें से बहुत सारे पड़ोसी राज्य आंध्र प्रदेश के खम्मम जिले में चले गए। दो आदिवासी, सिरकेगुडम गांव के मडकम बिला और कोरसा भीमा भी पुलिस द्वारा मारे गए। तीन वर्ष पहले यह आदिवासी अपने गांव वापस आकर अपने जीवन को दोबारा से खड़ा करने की प्रक्रिया में थे तभी यहां 28 जून को सामूहिक हत्याकांड हुआ।

कोरसेगुडा और चिपुरूपट्टी पंचायतों के कई सारे गांवों में पुलिस के द्वारा जारी प्रताड़ना की घटनाएं पाई गईं। जबकि पहले दौर में राज्य के द्वारा आदिवासियों पर की गई बर्बरता के बारे एक समान शब्द सुनने को मिलता था कि यह सलवा जुडूम ने किया है। परंतु आज के समय में लोगों का कहना है कि (अर्धसैनिक) बल यहां बड़ी समस्या पैदा कर रहे हैं, इसमें सीआरपीएफ के साथ-साथ पिछले दो सालों में इस इलाके में काफी बड़ी संख्या में लाए गए पैरामिलिट्री और स्पेशल पुलिस शामिल हैं। गांववालों का कहना है कि फोर्सेस रात को गांव के नजदीक आकर हवा में फायरिंग करते हैं और यह देखते हैं कि यदि कोई बाहर आकर भागता है तो उसकी गोली मारकर हत्या कर दी जाती है। कोरसेगुडा, चिपुरूपट्टी और अन्य पंचायतों के लोग बासागुडा जा कर अपना राशन खरीदते हैं और अपने कुछ उत्पादों को बेचते भी हैं। लेकिन केवल महिलाएं ही जाती हैं, क्योंकि पुरुषों को बासागुडा पुलिस द्वारा कभी भी उठा लिया जाता है, उनसे सवाल किया जाता है, मारा जाता है, गाली दी जाती है और कई बार तो एक सप्ताह तक हवालात में बंद रखा जाता है। झूठे मुकदमों में कुछ लागों को बंद करने के बाद गांव के पुरुष दूर ही रहने लगे।

जांच दल जब इन तीन गांवों की तरफ जा रहा था, तब उसने देखा की सीआरपीएफ के कई सारे हथियारबंद समूह जंगल में उपस्थित थे। उन्होंने हमें शक की नजरों से देखा परंतु किसी प्रकार की दखलंदाजी नहीं की। वो लोग उस तब भी थे, जब जांच दल कई घंटों के बाद वहां से वापस लौटा। सप्ताह भर पहले हुए खूनखराबे जिम्मेदार होने के बावजूद उनकी उपस्थित गांव वालों को सामान्य एवं भय मुक्त जीवन जीने की दोबारा कोशिषों के विरुद्ध साबित हो रही है। घटना की जांच हाई कोर्ट के वर्तमान न्यायाधीश से कराने की छत्तीसगढ़ सरकार की घोषणा पर आदिवासियों का कहना है कि जांच केवल तभी अर्थपूर्ण होगी यदि यह गांव में की जाए।

इस अमानवीयता के बीच में, इस बात के साक्ष्य हैं कि आदिवासियों के भीतर ललकार से भरी हुई अवज्ञा (डिफायंस) घर कर गई है। यह शुरुआती दौर में सलवा जुडूम के दौरान के जघन्य कृत्यों से भिन्न है, क्योंकि आदिवासी  अब और अपने गांवों को छोड़ कर जाने के बारे में नहीं सोच रहे हैं। उनके बीच में मजबूती से यह बात पैठ चुकी है कि उनके साथ अन्याय हुआ है, जिसका वह निबटारा चाहते हैं। जांच दल के सदस्य इस बात के गवाह हैं कि सरकार द्वारा भेजी गई सहायता को किस प्रकार से गांव वालों ने सिरे से नकार दिया। भोपालपट्टनम के एस.डी.एम., आर. के. कुरूवंशी कई गाड़ियों के साथ वहां पहुंचे थे जिनमें चावल, दाल, कपड़े तथा कुछ बर्तन थे जो देने के लिए लाए गए थे। गांव वाले गुस्से में अधिकारियों पर चिल्लाये और कहा कि तुमने पहले हमारे बच्चों की हत्या की और अब मदद करना चाहते हो? क्यों, हम लोग तो माओवादी हैं ना? क्या तुम माओवादियों को यह राशन देने के लिए आए हो?

जांच दल का यह मानना है कि 28 जून को 17 आदिवासियों की हत्या सरकार की माओवादियों के विरुद्ध लड़ाई की मौजूदा काउंटर-इनर्सजेंसी रणनीति का नतीजा है। छत्तीसगढ़ में बार-बार यह मान लिया जाता है कि आदिवासी लोगों का माओवादियों को समर्थन है और जानबूझ कर उन्हें क्रूर हिंसा का लक्ष्य बनाया जाता है। यह लोगों के जीवन जीने की स्वतंत्रता के अधिकारों का उल्लघंन है, जिसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। केंद्र एवं राज्य सरकार की विभिन्न संस्थाओं ने कई बार यह बताया है कि माओवाद केवल कानून व्यवस्था की समस्या नहीं है, बल्कि इसका एक मजबूत सामाजिक-आर्थिक आधार भी है। हालांकि, व्यवहार में माओवाद को केवल एक आपराधिक प्रादुर्भाव (उपज) के रूप में माना जाता है जिसका समाधन केवल हत्यारी सुरक्षा सेना की तैनाती के रूप में देखा गया है। क्रूर दमन की यह नीति खत्म होनी चाहिए। हमारा यह कहना नहीं है कि माओवादियों की हिंसा पर पुलिस आंखें बंद कर ले।  पुलिस  को निवारण और अपराध की छानबीन करनी चाहिए, साथ ही लोगों के अधिकारों को भी पूरा सम्मान देना चाहिए और पुलिस को अपना यह काम पूर्ण रूप से कानून के अंतर्गत रह कर करना चाहिए। सरकार को चाहिए कि वह से उन नीतियों को गंभीरता से लागू करे जो सामाजिक और आर्थिक अभावों को दूर करती हों। इन इलाकों में कानून एवं संविधान की अवमानना को तुरंत बंद किया जाना चाहिए। सरकार को माओवादियों के विरुद्ध सालों से चल रही हिंसात्मक दमन की नीति के स्थान पर राजनीतिक तरीकों को अपनाना चाहिए।

मांगें:

1. 28 जून की रात को सिरकेगुडम गांव के पास हुए ऑपरेशन में शमिल सभी सीआरपीएफ और कोबरा बटालियन के कर्मियों पर आईपीसी की धारा 302 के तहत हत्या का केस दर्ज हो, साथ ही अन्य प्रभावी दंड संहिता के अंतर्गत कार्रवाई हो। इसके अलावा इन पर एससी एंड एसटी (प्रिवेंनशन ऑफ एट्रोसिटीज) एक्ट के तहत भी केस चलाया जाए।

2.28 जून की रात को सिरकेगुडम गांव के पास हुए ऑपरेशन में शामिल सभी सीआरपीएफ और कोबरा बटालियन के कर्मियों पर महिलाओं के साथ किए गए उत्पीड़न, लूट, संपति को नश्ट करने के लिए केस दर्ज किया जाए। इन सब पर आईपीसी की उपयुक्त धाराओं के तहत कार्रवाई की जाए।

3.केंद्र और राज्य सरकारें माओवादियों को क्रूर एवं दमनात्मक तरीके से दबाने की चल रही नीति को बंद कर आंदोलन को राजनीतिक तरीके से संबोधित करें।

4.सरकार संविधान की पांचवी अनुसूची तथा इस क्षेत्र के जंगल, जमीन एवं अन्य प्राकृतिक संसाधनों पर यहां के आदिवासी लोगों के अधिकारों का सम्मान करे। आदिवासियों के लिए बनाए गए संरक्षात्मक विधानों का दृढ़तापूर्वक पालन किया जाए।

जांच-दल के सदस्यः

 1.प्रीतिपाल सिंह, एसोसिएशन  फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स (एएफडीआर), पंजाब।

2. प्रशांत हाल्दार, सचिव, एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स, (एपीडीआर), पश्चिम बंगाल।

3.आशीष गुप्ता, पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स (पीयूडीआर), दिल्ली। और संयोजक, कोर्डिनेशन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स आर्गेनाजेशंस (सीडीआरओ), दिल्ली।

4.आर. शिवाशंकर, नल्लौर जिला सचिव, आर्गेनाइजेशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स, (ओपीडीआर) और बी.राम रेड्डी, ओपीडीआर वारंगल जिला संयोजक।

5.सी. चन्द्रशेखर, स्टेट जनरल सेक्रेटरी, आंध्र प्रदेश सिविल लिबर्टीज कमेटी (एपीसीएलसी), वी. चिट्टिबाबू और डी.सुरेश कुमार, स्टेट वाईस प्रसिडेंट, एन. श्रीमानारायणा, वी.रघुनाथ और आर.राजूनंदन, स्टेट ज्वाइंट सेक्रेटरी, गुंटी रवि, स्टेट कमेटी सदस्य और बालाकृष्णा और मुरलीकृष्णा, सदस्य कुरनूल जिला, (एपीसीएलसी)।

6.वी.एस. कृष्णा, स्टेट जनरल सेक्रेटरी ऑफ हृयूमन राइटस फोरम (एचआरएफ), एस. के. खादर बाबू और डी. अदिनारायणा, एचआरएफ प्रसिडेन्ट और जनरल सेक्रेटरी, खम्मम जिला।

(एफडीआर, एपीडीआर, पीयूडीआर, ओपीडीआर, एपीसीएलसी और एचआरएफ सीडीआरओ के सदस्य हैं)

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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