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बीच सफ़हे की लड़ाई

झोंपड़पट्टी: जेल में लिखा एक गीत, कबीर कला मंच

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/29/2012 10:12:00 AM

कबीर कला मंच उस जनता का सांस्कृतिक चेहरा है जिससे भाषा छीन ली गई, संस्कृति से बेदखल कर दिया गया, जमीन और आजीविका के साधन छीन लिए गए और सदियों की गुलामी में धकेल दिया गया. इसीलिए जब इस दलित, पिछड़े, अल्पसंख्यक तबके के लोग अपने अधिकारों की आवाज को बुलंद करते हैं तो उनको फर्जी मुठभेड़ों में मार दिया जाता है, गिरफ्तार कर वे जेल में डाल दिए जाते हैं. उनके गीतों को भी खामोश करने की कोशिश की जाती है. लेकिन वे गीत हैं कि जेल की दीवारों को पार कर दुनिया में बज उठते हैं. पुलिस के दमन की वजह से भूमिगत हुई दलित कलाकारों की सांस्कृतिक संस्था कबीर कला मंच के गिरफ्तार किए गए सदस्यों में से एक दीपक डेंगले ने इस गीत को जेल में लिखा है और इसे गाया है सागर गोरखे ने. हमारे बीच में इस गीत को पहुंचाया है कबीर कला मंच बचाव समिति ने.



झोंपड़ पट्टी रे - 2
हे अँगरेज़ आया मशीन लाया
मिल बनाया -- झोंपड़ पट्टी
चमार, बुनकर, लोहार, मेहतर
सब समाया -- झोंपड़ पट्टी
सारी दुनिया को ऊंचा उठा के
मजदूर रह लिया -- झोंपड़ पट्टी

झोंपड़ पट्टी रे - 2
बंबू, चटाई, पतरा, लकड़ी, ऊपर प्लास्टिक
बन गयी झोंपड़ी
रेलवे लाइन, बाजू में वाइन
कैसे भी तो ढंक गयी खोपड़ी
अपनी भाषा, कल्चर बनाईके
बढ़ती चल रही -- झोपड़ पट्टी
झोंपड़ पट्टी रे - 2

सब हैं दादा, सब हैं भाई
लफड़ा, झगड़ा, ये मार पिटाई
दारू, गांजा, पनी मास्टर
भूखे बच्चे, रोती लुगाई
घर-घर मान्य देसी शहर में
डूबती चल रही -- झोंपड़ पट्टी
झोंपड़ पट्टी रे - 2

कामगार और किसानों के दम पर
आज़ादी के उड़े कबूतर
गोरा जा के आया काला
टूटा वोह सपनों का मंज़र
साठ सालों में चुना लगा गए
देखती रह गयी -- झोंपड़ पट्टी

झोंपड़ पट्टी रे - 2

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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