हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

आटो क्षेत्र में वर्तमान असंतोष की लहर की वजह

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/24/2012 04:34:00 PM

यह लेख भारत के राजनीतिक अर्थशास्त्र के अध्ययन की जानीमानी और प्रतिष्ठित पत्रिका अस्पेक्ट्स ऑफ इंडियन इकोनॉमी के ताजा जून, 2012 अंक में छपा है. ऑटो निर्माण के क्षेत्र में काम करनेवाले मजदूरों के बीच बढ़ते असंतोष और उथल-पुथल की बुनियादी वजहों और मजदूरों के शोषण के बारे में गंभीर जानकारियां मुहैया करानेवाले इस लेख का अनुवाद नागरिक ने किया है और हाशिया पर इसे थोड़े सुधार के साथ प्रस्तुत किया जा रहा है.

गुड़गांव-मानेसर ऑटो क्षेत्र में वेतन समझौते के संबंध में 6 अप्रैल, 2012 के बिजनेस स्टैंडर्ड में ‘मोटाउन ब्रेसेस फॉर वेज रिवीजंस आफ्टर थ्री ईयर्स’ (तीन साल बाद वेतन बढ़ोतरी के लिए तैयार मोटाउन) शीर्षक से एक लेख छपा। इसी अखबार में दो बड़ी ऑटो पार्ट सप्लायर फैक्टरियों में हड़ताल की रिपोर्टिग करते हुए ‘हरिद्वार फैक्टरीज ब्रिउ मानेसर लाइक लेबर सिचुएशन’ (हरिद्वार की फैक्टरियों में पैदा हुईं मानेसर जैसी श्रम स्थितियां) जैसे चेतावनीपूर्ण शीर्षक के साथ एक और खबर प्रकाशित हुई। भारतीय रिजर्व बैंक ने अपनी हालिया रिपोर्ट ‘‘मॉनेटरी एंड मैक्रोइकोनॉमिक डेवलपमेंट्स’’ में  ‘वेतन खर्चों में नियमित वृद्धि से चौतरफा महंगाई के दबाव’ की चेतावनी दी है।

औद्योगिक वेतन स्तरों में क्या हो रहा है? क्या वास्तव में ही समृद्धि, जिसकी सरकारी संस्थाएं बात कर रही हैं, ‘रिसते हुए’ (‘ट्रिकल डाउन’) मजदूरों तक पहुंच रही हैं? क्या अब मजदूर मजबूत स्थिति में हैं और क्या वे मूल्य निर्माण का ज्यादा बढ़ा हिस्सा हासिल कर पा रहे हैं?

वास्तव में पिछले कुछ वर्षों में खासकर ऑटो व ऑटो पार्ट क्षेत्र में श्रमिक असंतोष में उभार आया है। इनमें कुछ प्रमुख घटनाएं निम्न हैं – महिंद्रा (नासिक), मई 2009 और मार्च 2009; सनबीम ऑटो (गुड़गांव), मई 2009; बॉश चेसिस) पुणे, जुलाई 2009; होंडा मोटरसाइकिल (मानेसर) अगस्त 2009; रिको ऑटो (गुड़गांव), अगस्त 2009, इसमें गुड़गांव में पूरे ऑटो उद्योग में हुई आम हड़ताल भी शामिल है; प्रिकोल (कोयंबटूर), सितंबर 2009; वाल्वो (होसकोटे, कर्नाटक), अगस्त 2010; एम.आर.एफ. टायर्स(चेन्नई), अक्टूर 2010 और जून 2011; जनरल मोटर्स (हलोल, गुजरात), मार्च 2011; मारूति सुजुकी (मानेसर), जून-अक्टूबर 2011; बॉश(बेंगलुरू), सितंबर 2011; डनलप (हुगली), अक्टूबर 2011; कपारो (श्रीपेरुंबदूर, तमिलनाडु), दिसंबर 2011; डनलप (अंबत्तूर, तमिलनाडू), फरवरी 2012; हुंडई(चेन्नई), अप्रैल व दिसंबर 2011-जनवरी 2012 इत्यादि।

असंतोष केवल ऑटो उद्योग तक सीमित नहीं है, लेकिन वह वहां ज्यादा केंद्रित है। पिछले कुछ वर्षों में ऑटो उद्योग काफी तेजी से बढ़ा है। 2004-05 में 85 लाख वाहनों (दोपहिया, तिपहिया, सवारी गाड़ियों व व्यावसायिक वाहनों को मिलाकर) के मुकाबले 2011-12 में उत्पादन 2 करोड़ 4 लाख वाहनों तक पहुंच गया। कारों का उत्पादन 2004-05 में 12 लाख से बढ़कर 2010-11 में 30 लाख तक पहुंच गया। (और संभवतः 2011-12 में और बढ़ा हो) ऑटो उद्योग की पिछले एक दशक में तीव्र वृद्धि की सुविज्ञात सफलता गाथा है विशाल राजकीय सब्सिडी के दम पर सरकार भारत को ऑटोमोबाइल क्षेत्र के लिए वैश्विक मैन्यूफैक्चरिंग केंद्र(हब) बनाने के लिए कृतसंकल्प है। [1]

दूसरी ओर, यह एक अच्छे ढंग से छुपा रहस्य है कि ऑटो क्षेत्र में वास्तविक मजदूरी (मुद्रास्फीति की गलत गणना को छोड़ते हुए भी) 2000-01 से 2009-10 की अवधि में निरंतर गिरी है। (उद्योगों के वार्षिक सर्वे, एएसआई, से उपलब्ध सबसे नए आंकडे़ 2009-10 के ही हैं।) यह सच है कि मोटर वाहन उद्योग में वार्षिक वेतन 2000-01 के 79,446 रुपये से 2004-05 में 88,671 रूपये और 2009-10 में 1,09,575 रुपये तक नाममात्र के लिए बढ़ा है। 

हालांकि औद्योगिक मजदूरों के लिए उपभोक्ता दाम सूचकांक (सीपीआई-आईडब्ल्यू) नियमित रूप से मजदूरी की तुलना में कहीं तेजी से बढ़ा है।  इस तरह ऑटो उद्योग में 2000-01 और 2009-10 के बीच वास्तविक मजदूरी 18.9 प्रतिशत गिरी है. (चार्ट-1 देखें)



दूसरी तरफ अर्थव्यवस्था में मंदी के वर्षों की गिरावट को छोड़कर ऑटो उद्योग में प्रति मजदूर द्वारा कुल मूल्य वृद्धि [2] में भी बढ़ोत्तरी होती रही है। 2000-01 में प्रत्येक मजदूर ने 2.9 लाख रूपये का मूल्य जोड़ा था। यह आंकड़ा 2009-10 में बढ़कर 7.9 लाख रुपये तक पहुंच गया (चार्ट-2 देखें)।



स्वभावतः, जैसा कि चार्ट-3 में देखा जा सकता है, जोड़े गये मूल्य के अनुपात में मजदूरी भी निरंतर गिर रही है। 2000-01 में मजदूरों का वेतन जोड़े गये मूल्य का 27.4 प्रतिशत था। 2009-10 में यह अनुपात 15.4 प्रतिशत तक गिर गया।



मार्क्सवादी संदर्भों में बात करते हुए आइए काम के दिन के दो हिस्सों में बंटवारे के हिसाब से विचार करते हैं। पहले हिस्से में मजदूर अपनी आजीविका के लिए काम करता है (और अपने परिवार की आजीविका के लिए भी, ताकि भविष्य में मजदूरों की उपलब्धता भी सुनिश्चित हो सके)। उस समय में मजदूर आगत (इनपुट) में जो मूल्य जोड़ता है, वह उसे मिलने वाली मजदूरी के बराबर होता है। [3] लेकिन मजदूर केवल इतने समय बाद काम बंद नहीं कर सकता। पूंजीपति ने उसकी काम करने की सामर्थ्य (श्रम शक्ति) को पूरे दिन के लिए खरीदा है। (उत्पादन के साधनों से विहीन होने के कारण मजदूर के सामने जिंदा रहने के लिए अपनी श्रम शक्ति बेचने के अलावा कोई चारा नहीं है) वह बाकी के पूरे दिन भी श्रम करना जारी रखता है, फिर चाहे काम का दिन 8,10,12, या 16 घंटे का ही क्यों न हो। अतिरिक्त घंटे अतिरिक्त श्रम काल होता है। इसकी भी गणना हम पैसे में कर सकते हैं। निश्चित तौर पर संभव है कि पूंजीपति इस अतिरिक्त में से बैंकों को ब्याज, भूस्वामी को किराया, प्रबंधकों को वेतन और इसी तरह अन्य भुगतान करता हो, लेकिन यह सभी दूसरे लोग पूंजीपति द्वारा इसी अतिरिक्त में से हिस्सा बांटते हैं।

इन अर्थों में, हम कह सकते हैं कि 2000-01 में एक ऑटो मजदूर 8 घंटे की पाली में 2 घंटे, 12 मिनट अपने [4] और अपने परिवार की आजीविका के लिए खर्च करता था। उसने बाकी बचे 5 घंटे, 48 मिनट का अधिकांश पूंजीपति (और बैंकों, भूस्वामियों, प्रबंधकों और अन्य) के लिए अतिरिक्त पैदा करने में खर्च किया।

2009-10 में यह अनुपात और नीचे गिर गया। एक ऑटो कामगार अब अपने और अपने परिवार की आजीविका के लिए केवल 1 घंटा, 12 मिनट खर्च करता है और बचे 6 घंटे, 48 मिनट का अधिकांश पूंजीपति के लिए काम करता है।[5]

यह गिरावट कैसे आई? यह महज श्रम उत्पादकता में वृद्धि, नई तकनीक की मदद से एक घंटे में पहली की तुलना में ज्यादा पैदा करने की कहानी नहीं है। जैसा कि हमने पहले देखा, मजदूरों की मजदूरी वास्तविक अर्थों में लगभग पांचवें हिस्से तक गिर गयी। मालिकों द्वारा मजदूरों के विरुद्ध सक्रिय वर्ग संघर्ष छेड़ दिया गया था।

इस वर्ग-संघर्ष का अहम मोर्चा ऑटो उद्योग में स्वतंत्र ट्रेड यूनियनों के गठन के खिलाफ अलिखित कानून के रूप में मौजूद है। शायद हाल के आंदोलनों में मजदूरों की एकमात्र अति महत्वपूर्ण मांग उनकी खुद की ट्रेड यूनियन गठन करने का अधिकार पाने की थी। अधिकांश मामलों में मजदूर अभी तक भी ऐसा कर पाने में सफल नहीं हो पाये हैं। नियोक्ताओं द्वारा अपनाये जाने वाले तौर तरीकों में छंटनी करना, आपराधिक मुकदमों में फंसाना, मारपीट करना और यहां तक कि हत्या तक करवाना शामिल है। जर्मन ऑटो पार्ट निर्माता बॉश ने सफलतापूर्वक यूनियन गठन के तीन प्रयासों का विरोध किया। हुंडई, हीरो होंड़ा, वॉनजिन, मारुति-सुजुकी, ग्रेजियानो, रिको ऑटो सभी जगह कहानी एक जैसी है। जब हीरो होंडा के धारूहेडा प्लांट के 1800  कैजुएल मजदूरों ने अपनी पसंद की यूनियन में शामिल होने का प्रयास किया तो नेताओं के विरुद्ध आर्म्स एक्ट और भारतीय दंड संहिता की धारा-307 (हत्या का प्रयास) के अंतर्गत मुकदमे दर्ज कर दिये गये। [6] रिको ऑटो, गुड़गांव में 2009 मे मजदूरों पर गुंडों द्वारा हमला करवाया गया। इसमें एक मजदूर की मौत हो गयी। 2011 में मारूति आंदोलन में हरियाणा का श्रम विभाग (वास्तव में पूरी हरियाणा सरकार) ने प्रबंधन की एक शाखा (विंग) की तरह काम किया। ऑटो कंपनियां अपने कामों को गुजरात स्थानांतरित कर रही हैं। स्पष्ट उद्दंडता से यह घोषित करते हुए कि वे अपने उत्पादन को ‘यूनियन-प्रूफ’ करने के लिए ऐसा कर रहे हैं (अर्थात वे उम्मीद करते हैं कि श्रीमान मोदी उपद्रवियों से निपट लेंगे।)

ठेके, ‘ट्रेनी’ और ‘अप्रेटिंस’ के आधार पर मजदूरों को (स्थायी मजदूरों के वेतन के एक हिस्से भर में) रखना वेतन घटाने का एक और समान महत्व का और पूरक तरीका है। समाचार रिपोर्टों के अनुसार दिल्ली के बाहर गुड़गांव-मानेसर-बावल जोन में, जो कि भारत के ऑटो उत्पादन के लगभग 60 प्रतिशत के लिए जिम्मेदार है, 10 लाख मजदूरों में से 80 प्रतिशत ठेके पर रखे जाते हैं। [7] मारुति-सुजुकी के मानेसर प्लांट में 970 स्थायी, 400-500 ‘ट्रेनी’, 1,100  ठेका मजदूर और 200-300 ‘अप्रेंटिस’ मजदूर हैं। [8] भारत के दूसरे किसी हिस्से में स्थिति इससे कोई भिन्न नहीं है। पश्चिम बंगाल और गुजरात के मजदूरों के ऊपर हुए आर्थिक वृद्धि संस्थान के एक सर्वे में पाया गया कि विनिर्माण क्षेत्र में 60-70 प्रतिशत मजदूर ठेका मजदूर हैं। यह आंकड़ा इन राज्यों कि औद्योगिक वार्षिक सर्वेक्षण (एएसआई) से तीन-तीन गुना ज्यादा है। (एएसआई के आंकड़े स्वयं कंपनियों द्वारा बतायी जानकारी के आधार पर तैयार किए जाते हैं।) [9] पिछले दो दशकों में औद्योगिक श्रम शक्ति में ठेका श्रमिकों के हिस्से में बेतहाशा वृद्धि देखी गयी है। इसके बावजूद कि कुल श्रमशक्ति इस दौरान नगण्य दर से बढ़ी है।

महंगाई की मार सबसे ज्यादा ठेका मजदूरों (कॉन्ट्रेक्ट वर्करों) पर पड़ी है। हालांकि उनके वेतनों को सूचीबद्ध नहीं किया गया है। इनके वास्तविक वेतनों में सीधी गिरावट हुई है। वे अपनी बर्दाश्त की सीमा पर पहुंच गये हैं और अब पलटकर लड़ाई कर रहे हैं। पिछले दशक खासकर पिछले कुछ वर्षों के दौरान यह अपनी वास्तविक मजदूरी के नुकसान के एक हिस्से की क्षतिपूर्ति का प्रयास है या कम से कम और गिरावट को रोकने का प्रयास है। उनकी हालिया बढ़ी हुई उग्रता का यही कारण है।

निश्चित तौर पर ऑटो मजदूर एक आम प्रवृत्ति के केवल शानदार उदाहरण भर है। जैसा कि चार्ट- 4 व 5 में देखा जा सकता है कि 2000-01 के मुकाबले 2009-10 में कारखाना क्षेत्र में समग्रता में वास्तविक मजदूरी कम है। हालांकि गिरावट उतनी तेज नहीं है, जितनी कि ऑटो क्षेत्र में है और इस पूरे काल में मूल्य योग के अनुपात में भी मजदूरी करखाना क्षेत्र में लगातार गिरी है।



उभरती घटनाओं के पीछे की यह पूरी पृष्ठभूमि है जिसे मीडिया हिंसा कहता है- अर्थात प्रबंधकों की नियमित हिंसा नहीं, बल्कि मजदूरों का प्रतिरोध है। दो हालिया उदाहरणों को लीजिए: येनम (पुद्दुचेरी के अंतर्गत आने वाला काकीनाडा, आंध्रप्रदेश के निकट का एक छोटा सा इलाका) में जनवरी, 2012 में स्थायी किये जाने तथा वेतन वृद्धि की मांग के लिए रिजेन्सी सिरेमिक्स के 8 सौ मजदूर हड़ताल पर थे। 27 जनवरी को उनके धरने पर हमलाकर पुलिस ने उनके यूनियन अध्यक्ष को मार दिया और कुछ अन्य लोगों को घायल कर दिया। गुस्साये मजदूरों ने बदला लेने के लिए कंपनी के अध्यक्ष पर हमला कर दिया (जिससे बाद में उसकी मौत हो गयी) और मालिकों की बहुत सी सम्पत्ति को तोड़-फोड़ दिया और आग लगा दी। 19 मार्च 2012 को गुडगांव में ओरिएन्ट क्राफ्ट (टोमी हिलाफिगर, डीकेएनवाई तथा गैप की अंतरराष्ट्रीय रिटेल श्रृंखलाओं को वस्त्र निर्यातक) के ठेका मजदूरों द्वारा रविवार की छुट्टी करने के एवज में दो दिन का वेतन काट लेने का प्रतिरोध कर रहे थे। बदले में एक ठेकेदार ने कैंची से एक मजदूर पर हमला कर दिया। हजारों मजदूरों ने बदला लेने के लिए कंपनी का एक वाहन और पुलिस कार जला दी। कोर्ट ने ठेकेदार को जमानत पर रिहा कर दिया और गिरफ्तार मजदूरों को जेल भेज दिया।


श्रम ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार वास्तविक मजदूरी में गिरावट केवल औद्योगिक श्रमिकों तक सीमित नहीं है। उल्लेखनीय रूप से मनरेगा के बावजूद 2004-05 से 2008-09 के बीच में ग्रामीण क्षेत्रों में भी वास्तविक मजदूरी गिरी है।[10] यह सस्ते जन उपभोक्ता माल पैदा करने वाले उद्योगों के लिए बुरी खबर हो सकती है, लेकिन वे कारपोरेट क्षेत्र के छोटे से भी छोटे हिस्सा बनते हैं। संपूर्णता में निम्न ग्रामीण मजदूरी और निम्न ग्रामीण आय दूसरे अर्थ में कारपोरेट क्षेत्र के लिए अच्छी खबर है। यह औद्योगिक मजदूरों की मजदूरी को और गिराने में सहायक है क्योंकि गांव में विकल्प बहुत क्षीण हो जाते हैं।

संदर्भ सूची


[1] देखें Aspects of India’s Economy no. 45

[2] मशीनों के अवमूल्यन को घटाकर भौतिक आगतों के मूल्य और निर्गतों के मूल्य के बीच का अंतर.

[3] उदाहरण को सरल बनाने के लिए हम खराब हो चुकी मशीनों के स्थानापन्नों की आवश्यकता तथा उत्पादन की अन्य परिस्थितियों को नजरअंदाज कर दे रहे हैं।

[4] लगभग सभी ऑटो मजदूर पुरुष होते हैं.

[5] यह एक मजदूर और एक पूंजीपति के बीच के हिस्से हैं। लेकिन निश्चित तौर पर पूंजीपति अपने व फैक्टरी के सभी मजदूरों द्वारा पैदा अतिरिक्त मूल्य को पाता है। इस प्रकार हजार मजदूरों वाली एक फैक्टरी में पूंजीपति प्रतिदिन 6,800 घंटे अतिरिक्त श्रम के रूप में पाता है।

[6] “MNCs can’t wish unions away”, हिना खान, हिंदू बिजनेस लाइन (22/9/2011).

[7] “Maruti workers-management talks to resume today”, बिजनेस स्टैंडर्ड (6/6/2011).

[8] “Workers’ struggle in Maruti-Suzuki”, प्रसेनजित बोस और सुरिंद्र घोष, द हिंदू  (28/9/2011).

[9] “60-70 per cent of industrial workers in Bengal, Gujarat are contract labour”, हिंदू बिजनेस लाइन (22/7/2009).

[10] देखें Yoshifumi Usami, “A Note on Recent Trends in Wage Rates”, Review of Agrarian Studies, Vol. I, no. 1, January-June 2011. उसामी लिखते हैं: “मजदूरी में नाममात्र की वृद्धि तेजी से होती है, लेकिन औद्योगिक श्रम के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक और ग्रामीण श्रम के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक जैसे वे कारक को मुद्रास्फीति के प्रभाव को कम करने के लिए बनाए गए हैं इससे भी अधिक तेजी से बढ़ते हैं.” 2009-10 के कुछ आंकड़ों के लिए यहां देखें.

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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