हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

मारुति में हत्या और आगजनी के लिए प्रबंधन जवाबदेह

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/23/2012 06:08:00 PM


मारुति एक बार फिर से चर्चा में है. पिछले साल तीन दौरों में चली हड़ताल के बाद मजदूरों पर एक बार फिर प्रबंधन, शासन-प्रशासन एवं श्रम विभाग की मिलीभगत से दमन जारी है और मजदूरों के वाजिब व जायज़ मांगों के लिए चलाए जा रहे लंबे संघर्ष को एक दुर्घटना की आड़ में हड़पने की साजिश भी जारी है. मजदूर पत्रिका का बयान.

गुड़गांव को नई अर्थनीति का शानदार मिसाल माना जाता था. दुनिया भर के पूंजीपति अपने इस आशियाना में पूंजी लगाना चाहते थे क्योंकि सभी चीजें उनके मन के मुताबिक थीं. यहां ऐसा प्रशासन भी है जो उन्हें हर सुविधा मुहैया करनेवाला है - सस्ती जमीन, कम टैक्स और सबसे बड़ी चीज सस्ते श्रम का भण्डार. और हां यह सस्ता श्रम पूंजीविरोधी परम्पराओं से भी दूर था -- यानी ‘औद्योगिक शांति’ का वादा. इस आशियाने में पूंजी को मजदूरों का निर्बाध शोषण करने की छूट रही है और इस तरह उन्हें अपार मुनाफा कमाने की सम्भावना रहती है. गुड़गांव ‘शाइनिंग इण्डिया’ की मिसाल बन गया. यहां के चमचमाते आलीशान भवन समृद्धि का एलान करते हैं और यहां का विशाल औद्योगिक क्षेत्र भारत के आर्थिक विकास का नमूना बन गया.

लेकिन यह दुनिया भी अब चरमरा रही है. आखिर यह परस्पर विरोधी चीजों से बनी हुई है. एक इस दुनिया के मालिक हैं जो इस नए वैभव का उपभोग कर रहे हैं और दूसरी ओर है इसे अपने श्रम से निर्माण करने वालों की दुनिया जो हर चीज से वंचित है. श्रम करने वालों के जिम्मे है केवल कमरतोड़ मेहनत. इन श्रमिकों के सस्ते श्रम से यह पूरी सुंदर दुनिया बन रही है और वे नारकीय स्थिति में गुजर-बसर करने को मजबूर हैं. मजदूरों द्वारा जीते गए श्रम कानून मानों इस क्षेत्र में वर्जित हैं. और नव-उदारवादी पूंजीवाद के लिए यह तो ‘शो पीस’ ही बन गया था. राज्य है, लेकिन वह बस यहां पूंजी के लिए हर चीज को सुगम बनाने के लिए है - चाहे वह जमीन अधिग्रहण हो, टैक्सों में कटौती हो या फिर बिजली. और सबसे अव्वल बात तो है यहां श्रम कानूनों का लागू न होना. पर एक समय ऐसा आया कि श्रम करने वालों ने अपना हक मांगना शुरू कर दिया.

2005 में होण्डा मोटरसाइकल एण्ड स्कूटर्स इण्डिया लिमिटेड में जबरदस्त हड़ताल हुई और उसे बर्बर पुलिस दमन व गुण्डावाहिनी के हमले से जूझना पड़ा. फिर भी मजदूरों ने दिखा दिया कि वे भी मानव हैं और एक मानवोचित जिन्दगी के लिए वे उठ खड़े हुए हैं. इनके इस कदम को क्षेत्र की बाकी फैक्ट्रियों के मजदूरों से समर्थन मिला और इस एकता के सामने प्रबंधन को वार्ता पर आना पड़ा. यह हड़ताल दुनिया भर में मजदूर संघर्षों से प्राप्त यूनियन बनाने के अधिकार के लिए था. अपनी मांगों को लागू करवाने के लिए संगठन बनाने का अधिकार ये मजदूर फिर एक बार लड़कर ले रहे थे और इस प्रकार श्रम कानूनों के विरोधी नव-उदारवाद को भी चुनौती दे रहे थे.

तब से लेकर अब तक इस प्राथमिक जनवादी अधिकार के लिए गुड़गांव भर के मजदूरों को लड़ना पड़ रहा है. अपने ऊपर होने वाले शोषण-अत्याचार के खिलाफ संगठित प्रतिरोध के लिए यूनियन बनाना जरूरी है और मजदूरों की इस तरह की एकता को नहीं बनने देने के लिए प्रबंधन कृतसंकल्प रहता है. वह तो मजदूरों को नारकीय परिस्थितियों में रखकर, उनसे जानवर जैसा बर्ताव कर सस्ते श्रम का शोषण करना चाहता है और मजदूर अगर किसी तरह सिर उठाए तो उसे कुचल देने के लिए वह प्रशासन, पुलिस के साथ मिलकर हर हथकण्डा अपनाता है.

विगत 18 जुलाई को फिर एक बार मजदूरों में अशांति फैल गई. अत्याचार करने वाले शोषकों के अपमान के विरुद्ध एक मजदूर ने अपना विरोध प्रदर्शित किया. ऐसे में प्रबंधन ने मजदूरों को उनकी जगह दिखाने के लिए ऐसी दरिंदगी का परिचय दिया कि दिल दहल उठता है. कार निर्माता मारुति सुजु़की के कारखाने में जो घटना घटी उसका ब्योरेवार तथ्य इस प्रकार हैः

एक सुपरवाइजर ने एक मजदूर को जातिसूचक गाली देकर अपमानित किया तो उसने विरोध किया. ऐसे में प्रबंधन ने उस मजदूर को अभद्रता के आरोप में निलंबित कर दिया. इस पर मारुति के यूनियन ने मांग की कि दोषी सुपरवाइजर के खिलाफ कार्यवाही की जाए तथा अपमानित मजदूर का नाजायज निलंबन रोका जाए. इसके बाद यूनियन ने लगातार यह प्रयास भी जारी रखा कि प्रबंधन इस घटना की निष्पक्ष जांच करवाए. इस घटना की नाजुकता को देखते हुए काम से छूटे शिफ्ट के मजदूर वहीं बने रहे लेकिन B शिफ्ट के मजदूरों ने उत्पादन कार्य जारी रखा. इससे पता चलता है कि मजूदर मामले का समाधन चाहते थे. वे उचित कार्रवाई की मांग कर रहे थे. लेकिन प्रबंधन अपनी जिद पर बना रहा. ज्ञात हो कि विगत महीने में दो यूनियन लीडरों को प्रबंधन ने झूठे आरोपों में फंसा कर निलंबित कर दिया था लेकिन मजूदरों के प्रतिरोध के बाद उसी दिन वापस ले लिया था. इसके साथ यह भी महत्वपूर्ण बात है कि वार्ता के दौरान श्रम विभाग ने खुलकर प्रबंधन का साथ दिया और प्रबंधन की भाषा बोलता रहा. इस तरह की घटनाओं से मजदूर गुस्से में थे.

18 जुलाई की शाम को प्रबंधन ने वार्ता तोड़ दी और पूर्वनियोजित ढंग से अपने बौंसरों (गुण्डों) को बुला लिया. ऐसी स्थिति में उकसावेबाजों (agent provocateurs) का काम करते हुए इन्होंने मजदूरों को  आक्रोशित कर दिया और प्रबंधन के साथ झड़प शुरू हो गई. फिर आगजनी हुई और एक व्यक्ति की दुखद मृत्यु हो गई. इस तरह प्रबंधन, श्रम विभाग व प्रशासन ने मिलकर घटना को शांतिपूर्ण ढंग से हल न कर इसे ऐसा मोड़ दिया कि दोष मजदूरों पर मढ़ा जा सके. लेकिन इनकी नापाक मिलीभगत आज बहुत दिनों से लोगों के सामने है.

मारुति सुजु़की में एकदम जायज, कानूनी व मौलिक हक यानी संगठन (यूनियन) बनाने के हक से मजदूरों को वंचित रखा गया. यह है पूंजी के सामने नतमस्तक भारतीय जनतंत्र का हाल. मजदूरों को उनके मौलिक अधिकारों से वंचित कर उनसे पशुवत व्यवहार किया जाता है. पूरे प्रकरण के लिए वही लोग जिम्मेवार हैं जो मजदूरों के साथ ऐसा करते हैं. जैसा कि अकसर हमारे जनतंत्र में देखा जाता है कि जब मजदूर अपने हकों के लिए, अपनी गरिमा के लिए उठ खड़े होते हैं तो उनको कुचल दिया जाता है. यहां भी ऐसा ही हुआ और 100 से अधिक मजदूरों को गिरफ्तार कर लिया गया. मजदूरों पर दमन ढाया जाने लगा. लेकिन जुर्म करने वालों को तो विरोध का सामना करना ही पड़ता है. इतिहास इस बात का साक्षी है और आगे भी ऐसा ही होगा.

देशी-विदेशी कारपोरेट घरानों की चरागाह बनी यह एनसीआर अब उबाल पर है. चाहे नोएडा हो या गुड़गांव, मजदूर अब अपनी गुलामी को बर्दाश्त नहीं करने वाले. लगातार विरोध के द्वारा वे अपने शोषण-दमन के खिलाफ लड़ाई जारी रखे हुए हैं. पूंजी के अबाध राज के लिए सरकार ने एनसीआर को चिह्नित किया था जहां श्रम कानून कारगर नहीं होंगे, जहां सस्ता श्रम होगा और जहां पूंजीपतियों को बिना मोल के हर सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी. लेकिन यह आशियाना कब तक? आखिर मजदूर उठ खड़े हुए. उन्हें अपनी जानवरों जैसी स्थिति का बोध हुआ और वे विरोध करने लगे. सरकार व प्रबंधन को यह नागवार गुजरा. वे क्रूर दमन चलाने में लग गए. मारुति में हुई घटना इसी की एक कड़ी है.

सवालों के घेरे में हैं प्रशासन व प्रबंधन. क्यों यूनियन बनाने के अधिकार के लिए मजदूरों को बार-बार हड़ताल पर जाना पड़ता है? इसके लिए कौन जिम्मेवार है? कौन कानून की अवहेलना कर रहा है? बेशक प्रबंधन. क्या इसके लिए उसे कोई सजा है? क्यों नहीं? कौन काम की जगह पर अत्याचार करता है? क्या हाथापाई करना, पगड़ी उतार देना, जातिसूचक गाली देना किसी जनतांत्रिक समाज को स्वीकार्य होगा? लेकिन यह इस क्षेत्र की फैक्ट्रियों में आम बात है. गुण्डों के सहारे मजदूरों की गतिविधियों पर रोक लगाना किस कानून में स्वीकृत है? किस ठेका मजदूरी कानून के तहत वहां अत्यंत कम मजदूरी पर काम लिया जाता है? लेकिन पूंजी के लिए तो कानून उसका खिलौना है और मजदूर इस बात को खूब महसूस कर रहे हैं. उनकी लड़ाई जायज है और इसे बदनाम करने की हर कोशिश के सामने ये सवाल सामने आएंगे.

18 जुलाई की घटना की फैक्टशीट हमने पेश कर दी. और पीछे जाएं तो पूछा जाएगा कि एक ही मांग जो कानूनसम्मत है यानी यूनियन बनाने की मांग को लेकर मारुति के मजदूरों को क्यों बार-बार हड़ताल पर जाना पड़ता है? अपने न्यायोचित मांगों को लेकर लड़ने वाले इन मजदूरों पर दमन करने वालों को किस न्यायबोध के तहत सही ठहराए जा सकता है? बातें साफ हैं - एक तरफ वे शोषक हैं जो सस्ती दर पर मानव श्रम की लूट करना चाहते हैं और दूसरी तरफ वे जिनको अपने इनसानी वजूद को बनाए रखने के लिए हर कदम पर जूझना पड़ता है. मारुति का संघर्ष उस पूरी नव-उदारपंथी दुनिया के खिलाफ एक संघर्ष है जो श्रम की दुनिया पर हमला कर उसके हर हक को कूड़ेदान में डाल देना चाहती है और इसके लिए लगातार अभियान चलाए रहती है.

आज मीडिया मारुति में हुई आगजनी और एक प्रबंधक की मृत्यु को दिखाकर मजदूरों के संघर्ष को बदनाम करना चाह रहा है. उस दिन वह कहां था जब मजदूर अपने कानूनी हकों को भी लागू करने के लिए संघर्ष कर रहे थे और पुलिस, प्रशासन व गुण्डों का सामना कर रहे थे? आखिर मीडिया भी तो कारपोरेट घरानों का है. इन घटनाओं से यह कहा जा रहा है कि भारत का विकास रुकेगा क्योंकि निवेश का वातावरण प्रभावित होगा. वाह रे वाह! अमेरिका में मंदी कौन सी हड़ताल के चलते आया और वहां क्यों पूंजी निवेश रुकने लगा? टाटा मोटर्स में आज रह-रहकर काम बंदी क्या हड़ताल के चलते है? नहीं. यह पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया का संकट है जिसके चलते ऐसा हो रहा है. और इसे मजदूरों की हड़तालों पर मढ़ना सरासर गलत प्रचार है. इस बहाने पूंजी के तुष्टिकरण के लिए गुहार लगाया जाता है और सस्ते श्रम व प्राकृतिक संसाधनों को उसके हवाले कर देने के लिए तर्क बनाए जाते हैं. लेकिन सच्चाई कुछ और है. मजदूरों की हकमारी हो रही है और सुनियोजित ढंग से, नीतिगत रूप में हो रही है यह बात स्पष्ट है. इसीलिए मारुति के मजदूरों की लड़ाई इस नव-उदारपंथी दुनिया को बेनकाब करते हुए इसके खिलाफ एक जुझारू आह्वान है. यह इस अन्यायी पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया पर प्रश्न चिह्न खड़े करती है. तमाम तथ्य व तर्क यही मांग करते हैं कि न्यायपसंद लोग इन मजदूरों के संघर्ष के समर्थन में आगे आएं और आवाज बुलंद करें.

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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