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बीच सफ़हे की लड़ाई

सिनेमा: कल्पना पर कब्जा और प्रतिरोध

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/19/2012 05:37:00 PM


कार्यकर्ता और लेखिका अरुंधति राय ने यह बयान आजमगढ़ में हुए एक आयोजन में दिया है.

मैं आजमगढ़ में आकर खुश हूँ . यह शहर कविता, गीत, संगीत का शहर है लेकिन मीडिया ने इसे तरह प्रचारित किया कि जैसे आजमगढ़ के खेतों में आतंकवादी उगते हैं और यहां के कारखानों में बम बनाए जाते हैं. इस मौके पर मैं सिनेमा के बारे में ज्यादा कुछ नहीं कहूंगी लेकिन इतना कहना चाहूंगी कि जैसे देश में जंग लड़ी जाती है, बांध बनाए जाते हैं, निजीकरण होता है तो वह भी गरीबों के नाम पर ही होता है, उसी तरह हमारे फिल्म स्टार, गरीबों के कंधे पर सवार होकर फिल्म स्टार बने हैं.

आप देखिए पहले फिल्म के कैरेक्टर गरीब होते थे, झुग्गी झोपड़ी में रहते थे. अमिताभ बच्चन की फिल्म कुली याद करिए, जिसमें वह इकबाल नाम के कुली हैं और ट्रेड यूनियन से जुडे हैं. वह जमाना गया; आज हमारी फिल्म का हीरो कौन है? अम्बानी है. गुरू फिल्म को याद करें. तो आज की फिल्मों के ये हीरो हैं. आज कुछ फिल्में गरीबी पर बन जाती हैं जैसे स्लमडाग मिलेनियर, लेकिन इसमें गरीबी को साइक्लोन, भूकम्प की तरह भगवान का बनाया हुआ बताया जाता है. इसमें कोई विलेन नहीं होता और इस तरह से हमारे इमैजिनेशन पर कब्जा कर बत़ाया जाता है कि एनजीओ और कार्पोरेट की मदद से गरीबी को खत्म किया जा सकता है.

तीस वर्ष पहले हमारे देश में दो ताले एक साथ खुले. एक बाबरी मस्जिद का और दूसरा बाजार का. इस मैनुफैक्चरिंग प्रासेस ने एक तरफ मुस्लिम ‘आतंकवाद’ को पैदा किया तो दूसरी तरफ माओवाद को. आज ऐसी स्थिति बना दी गई है कि जो भी पार्टी सत्ता में आएगी वह राइट विंग ही होगी और वह हमारे देश को और ज्यादा पुलिस स्टेट बनाएंगे. इंडिया में जो इकोनॉमिक प्रोग्रेस चल रहा है उसमें 30 करोड़ मिडिल क्लास आ गया है लेकिन इसके लिए 80 करोड़ लोगों को गरीबी में डुबो दिया गया है. ये 80 करोड़ लोग सिर्फ 20 रूपया रोज पर गुजारा करते हैं.

हमारे देश के ढाई लाख से अधिक किसान अब तक खुदकुशी के लिए मजबूर हो चुके हैं. दुनिया के सबसे ज्यादा गरीब लोग हमारे देश में रहते हैं और इनको देने के लिए सरकार के पास पानी, अस्पताल, स्कूल नहीं है, लेकिन हम अरबों रुपयों का हथियार खरीदते हैं ताकि हमें सुपर पावर कहा जाए. मुकेश अम्बानी की रिलायंस इंडस्टीज के पास दो लाख करोड़ की पूंजी है तो खुद उनकी व्यक्त्तिगत सम्पति एक लाख करोड रूपए है.

देश के 100 सबसे अमीर लोगों के पास देश की जीडीपी की एक चौथाई के बराबर सम्पत्ति है. अम्बानी ने अभी 27 टीवी चैनलों को खरीद लिया. जाहिर है अब ये चैनल क्या दिखायेंगे और बताएंगे है. जिसके पास एक लाख करोड़ है वह क्या नहीं खरीद सकते. सरकार, इलेक्शन , कोर्ट , मीडिया और सब कुछ. ये सरकार चलाते हैं, एजुकेशन, हेल्थ पालिसी बनाते हैं और अब हमारी जिंदगी भी चलाना चाहते हैं.

छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखंड आदि प्रदेशों में 2004 में कंपनियों ने 100 से ज्यादा एमओयू किए गए. आदिवासियों को बंदूक देकर सलवा जुडूम का भागीदार बनाया गया और जंगल में बहुत बड़ी लड़ाई खड़ी की गयी है. 600 गांव जला दिए गए. तीन लाख लोगों को उनके घर से भगा दिया गया. जिसने विरोध किया उसे माओवादी कह कर मार डाला या जेल में डाल दिया.

इसी कड़ी में पिछले दिनों छत्तीसगढ़ के बीजापुर में 17 आदिवासियों को मार दिया गया. दंतेवाडा की आदिवासी शिक्षिका सोनी सोरी के साथ क्या हुआ, आप जानते हैं? ऐसी स्थिति में लेखकों, एक्टिविस्टों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है, लेकिन सरकार और औद्योगिक घराने लेखकों से कहते हैं कि दूर जाकर बच्चों की कहानी लिखो, दिमाग बंद कर चिल्लाओ. ऐसा करने के लिए लिटरेचर, डांस, म्यूजिक फेस्टिवल को आयोजित किया जाता है.

अमेरिका में राकफेलर फाउंडेशन ने सीआईए बनायी. काउंसिल फार फारेन रिलेशन (सीएफआर) बनाया. वर्ल्ड बैंक बनाया. अब ये संस्थान माइक्रोफाइनेन्स से सबसे गरीब लोगों से पैसा खींच रहे हैं. माइक्रोफाइनेन्स के जाल में फंसकर एक साल में 200 लोगों को खुदकुशी करनी पड़ी; आदिवासी, मुसलमान, किसान, मजदूर सब इसकी मार की जद में हैं लेकिन हम एक होकर लड़ नहीं पा रहे क्योंकि इन्होंने हमें बांट रखा है.

हम बंटे हैं दलितो और आदिवसियों में, शिया और सुन्नी में. यह बंटवारा खड़ा करने के लिए ये फाउंडेशन पहचान की राजनीति, धार्मिक अध्ययन के नाम पर स्कालरशिप, फेलोशिप देते हैं. जो इस पर सवाल खड़ा करता है, इन झांसों में नहीं आता उसे नक्सली, माओवादी, आतंकवादी कह कर जेल में डाला जाता है, मार दिया जाता है. आज देश में बड़ा प्रेशर बनाया जा रहा है कि नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाओ. गुजरात में मुसलमानों का संहार भूल जाओ. यह वही लोग हैं जो एक समय बाजार को खोलने के लिए मनमोहन सिंह को सिर पर बैठाए घूम रहे थे. आज उन्हें एक कट्टर व्यक्ति की जरूरत है जो इस सिलसिले को तेजी से चलाये.

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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