हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

क्रांतिकारी आत्महत्या: एक घोषणापत्र

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/15/2012 11:39:00 AM


सोचिए विदर्भ और दूसरे राज्यों के दो लाख से अधिक किसानों की आत्महत्याओं के बारे में. और इसकी वजहों के बारे में सोचिए. याद करने की कोशिश कीजिए कि इस सदी के इस सबसे बड़े जनसंहार का आखिर नतीजा क्या निकला? किसकी जिंदगी की चिंता किसे है? भूख से मरते लोगों के बारे में सोचिए, कुपोषण के शिकार बच्चों के बारे में, दवाओं के बिना मरते बीमारों के बारे में; जलाई जाती दलित बस्तियों और अल्पसंख्यकों के कत्लेआमों के बारे में, बांधों और एक्सप्रेस वे के लिए उजाड़े जाते गांवों के बारे में सोचिए...और पढ़िए हेई पी. न्यूटन का यह लेख.
 
हेई पी. न्यूटन ब्लैक पैंथर पार्टी के संस्थापकों में से थे. अमेरिका में मुख्यत: अश्वेतों के नेतृत्व में क्रांति के लिए काम करने वाले इस मार्क्सवादी-लेनिनवादी संगठन के अग्रणी नेता, मुख्य सिद्धांतकार और विचारक के रूप में न्यूटन ने अपनी आत्मकथा रिवोल्यूशनी सुसाइड में अपने संघर्षों से भरे शानदार जीवन के बारे में लिखा है. इसमें वे अमेरिका की अभिशप्त अश्वेत बस्तियों से लेकर मुक्ति की नई इबारत रचते चीन के गांवों के अपने अनुभव के बारे में लिखते हैं. किताब की शुरुआत में उन्होंने क्रांतिकारी आत्महत्या की अपनी अवधारणा के बारे में समझाया है. इसमें सांस्थानिक हिंसा, अपमान और मौतों के बरअक्स क्रांतिकारी संघर्षों में होने वाली शहादतों को रख कर उम्मीद की रोशनी को उजाले में बदलने की कोशिश की गई है. ब्लैक पैंथर आंदोलन ने भारत के दलित आंदोलन पर भी गहरी छाप छोड़ी और दलित पैंथर इसी क्रांतिकारी आंदोलन से प्रेरणा हासिल करते हुए स्थापित हुआ था.

एक घोषणापत्र


नई जमीन उठ खड़ी हो. जन्म ले एक दूसरी दुनिया. आसमान में लिख दी जाए खूनी अमन की एक इबारत. साहस से भरी एक दूसरी पीढ़ी को आगे आए, आजादी को प्यार करने वाले लोग बढ़ें, सुकून से भरी खूबसूरती और फैसलाकुन पकड़ की ताकत हमारी रूहों और हमारे खून में धड़के. लड़ाकू गीत लिखे जाएं. खत्म हो जाएं मातम के गीत. इनसानों की एक नस्ल उठे और काबिज हो जाए!
 मार्ग्रेट वॉकर, ‘‘फॉर माई पीपुल’’

क्रांतिकारी आत्महत्या: मुक्ति का रास्ता


गश्ती दल के जॉन फ्रे की मौत के मामले में मेरी पहली सुनवाई के बाद सान लुईस ओबिस्पो के कैलीफोर्निया मेन्स कॉलोनी में बिताए गए बाईस महीने मैंने लगभग लगातार कालकोठरी में बिताए. चार गुना छह की उस कोठरी में  अपने मामले से संबंधित किताबों और कागजों को छोड़ कर पढ़ने वाली किसी भी दूसरी चीज की इजाजत नहीं थी. इस कानून को सख्ती ले लागू किए जाने के बावजूद जब पहरेदार नहीं देख रहा होता तो दूसरे कैदी मेरे दरवाजे के नीचे से पत्रिकाएं सरका देते थे. इस तरह मुझे मिली पत्रिकाओं में से एक ईबोनी पत्रिका का मई, 1970 अंक था. इनमें डॉ. हरबर्ट हेन्डिन के काम का सार संक्षेप प्रस्तुत करते हुए लेसी बांको का एक लेख छपा था. हेन्डिन ने प्रमुख अमेरिकी शहरों में अश्वेत लोगों के बीच आत्महत्याओं का तुलनात्मक अध्ययन किया था. डॉ. हेन्डिन ने पाया था कि उन्नीस से पैंतीस साल की उम्र के अश्वेत पुरुषों के बीच आत्महत्या की दर पिछले दस से पंद्रह सालों में दोगुनी हो गई थी और इसने इसी आयुवर्ग के श्वेत पुरुषों की दर को पीछे छोड़ दिया था. इस लेख का तब मुझ पर काफी गहरा असर पड़ा था और यह असर अब भी मौजूद है. इसके दूरगामी संबंधों के बारे में मैंने लंबे समय तक और गहराई से विचार किया.

ईबोनी के लेख ने मुझे दुर्खीम के क्लासिक अध्ययन सुसाइड की याद दिला दी, यह किताब मैं ओकलैंड सिटी कॉलेज में समाजशास्त्र के अपने अध्ययन के दौरान पहले पढ़ चुका था. दुर्खीम के मुताबिक हर तरह की आत्महत्याएं सामाजिक स्थितियों से जुड़ी होती हैं. वे कहते हैं कि आत्महत्या की बुनियादी वजह निजी स्वभाव नहीं है बल्कि सामाजिक माहौल में मौजूद ताकतें हैं. दूसरे शब्दों में आत्महत्या की वजह बुनियादी तौर पर बाहरी कारक हैं न कि आंतरिक कारक. जब मैंने अश्वेत लोगों की दशाओं के बारे में और डॉ. हेन्डिन के अध्ययन के बारे में सोचा तो मैंने दुर्खीम के विश्लेषण को विकसित करना शुरू किया और इसे संयुक्त राज्य में अश्वेत लोगों के अनुभवों पर लागू किया. आखिरकार इसने मुझे ‘क्रांतिकारी आत्महत्या’ की अवधारणा पर पहुंचाया.

क्रांतिकारी आत्महत्या को समझे के लिए पहले प्रतिक्रियावादी आत्महत्या के बारे में जानना जरूरी है क्योंकि इन दोनों में बहुत फर्क है. डॉ. हेन्डिन प्रतिक्रियावादी आत्महत्या के बारे में बता रहे थे: उस इनसान की प्रतिक्रिया जिसने उन सामाजिक स्थितियों के जवाब में अपनी जान ले ली जो उस पर हावी हो गईं और उसको बेचारगी में धकेल किया था. उन्होंने जिन युवा अश्वेत पुरुषों का अध्ययन किया था, उनके मानवीय आत्मसम्मान को छीन लिया गया था, उत्पीड़नकारी ताकतों द्वारा कुचल दिए गए वे लोग सम्मान के साथ, आजाद इनसानों के रूप में जीने के अधिकार से वंचित कर दिए गए थे.

दॉस्तोएव्स्की के क्राइम एंड पनिशमेंट में एक अच्छी मिसाल मिलती है. इसका एक पात्र मार्मेलादोव, जो बेहद गरीब है, कहता है कि गरीबी कोई पाप नहीं है. वह कहता है कि गरीबी में एक इनसान आत्मा की सहज श्रेष्ठता हासिल कर सकता जो कि भीख मांगने के पेशे में मुमकिन नहीं है. क्योंकि जहां समाज एक गरीब को एक छड़ी से भगा सकता है, भिखारी को झाड़ू से भगाया जाता है. क्यों? क्योंकि भिखारी सबसे निचले तल पर है, वह अपना आत्मसम्मान खो चुका है. आखिरकार, आत्मसम्मान से वंचित, डर के आगे लाचार और हताश होकर वह अपने ही खून में खुद को डुबो लेता है. यह आत्महत्या है.

प्रतिक्रियावादी आत्महत्या से जुड़ा हुआ, हालांकि उससे भी दर्दनाक और अपमानजनक है एक आत्मिक मौत, जिससे संयुक्त राज्य में दसियों लाख अश्वेत लोग गुजर रहे हैं. यह मौत अश्वेत समुदाय में आज हर जगह पाई जाती है. इसके पीड़ित लोग उस उत्पीड़न से लड़ना छोड़ देते हैं जो अलग अलग शक्लों में उनका खून चूसती है. लंबे समय से यही रुख अपनाया जाता रहा है: क्या फायदा? अगर लोग संयुक्त राज्य जितनी बड़ी ताकत के खिलाफ उठ खड़े हुए तो वो बच नहीं पाएंगे. इस पर भरोसा करते हुए अनेक अश्वेत आत्मा की मौत की तरफ ले जाए गए हैं. उनका शरीर नहीं मरता लेकिन उनकी जिंदगी एक खामोश निराशा की गहराइयों में डूब जाती है. तब भी हरेक अश्वेत के दिल में यह उम्मीद रहती है कि भविष्य में जिंदगी किसी तरह बदलेगी.

मैं नहीं मानता कि जिंदगी बिना सत्ता प्रतिष्ठान* पर हमला किए बदलेगी, वह सत्ता प्रतिष्ठान जो धरती के अभागों का उत्पीड़न करता जा रहा है. यही भरोसा क्रांतिकारी आत्महत्या की अवधारणा के केंद्र में है.  इसलिए उन ताकतों को बरदाश्त करने से बेहतर उनका विरोध करना है जो मुझे अपनी ही हत्या करने की तरफ ले जाएंगी. हालांकि मेरी बात को मौत के समान मान लिए जाने का खतरा है, लेकिन इससे जो स्थितियां बरदाश्त से बाहर हैं उनके बदलने की संभावना है, चाहे यह कितना भी मुश्किल हो. और यह संभावना अहम है, क्योंकि इनसान के वजूद की बहुत सारी चीजें मुश्किलों की वास्तविक समझदारी के बिना, उम्मीद पर टिकी हुई हैं. दरअसल हम सभी - अश्वेत और गोरे समान रूप से -  एक ही बीमारी के शिकार हैं, मौत की बीमारी के. लेकिन मर जाने से पहले हम किस तरह जीएंगे? मैं कहूंगा कि उम्मीद और आत्मसम्मान के साथ. और अगर इसके नतीजे में समय से पहले मौत आती है तो उस मौत का जो मतलब होगा, वैसा मतलब प्रतिक्रियावादी आत्महत्या का कभी नहीं हो सकता. यह आत्मसम्मान की कीमत है.

क्रांतिकारी आत्महत्या का मतलब यह नहीं है कि मैं या मेरे कॉमरेड मरने की चाहत रखते हैं. इसका मतलब ठीक इसका उल्टा है. हममें उम्मीद और इनसानी आत्मसम्मान के साथ जीने की ऐसी मजबूत चाहत है कि इनके बिना वजूद ही नामुमकिन है. जब प्रतिक्रियावादी ताकतें हमें कुचलती हैं, हमें इन ताकतों के खिलाफ आगे बढ़ना ही होगा, मौत का जोखिम उठा कर भी. हमें भगाया भी गया तो हम छड़ी से भगाए जाएंगे.

चे गेवारा ने कहा था कि एक क्रांतिकारी के लिए मौत हकीकत है और विजय सपना. चूंकि क्रांतिकारी अपनी जिंदगी इतने खतरे उठाते हुए जीते हैं, उनका जिंदा रह पाना एक चमत्कार होता है. पहले इंटरनेशनल के सबसे जुझारू खेमे के बाकूनिन ने इसी से मिलता जुलता एक बयान अपनी रिवोल्यूशनरी कैटेसिज्म में दिया है. उनके लिए एक क्रांतिकारी को जो पहला जरूरी सबक सीखना होता है वह यह है कि वह जान ले कि वह एक अभिशप्त इनसान है. जब तक वह इसे नहीं समझ लेता, वह अपनी जिंदगी के बुनियादी मतलब को नहीं समझ सकता.

जब फिदेल कास्त्रो और उनका छोटा सा दल मैक्सिको में क्यूबाई क्रांति की तैयारियां कर रहा था तो उनके अनेक कॉमरेडों को बाकूनिन के इस नियम की बहुत थोड़ी समझ थी. अपने जहाज के चलना शुरू करने से कुछ घंटों पहले फिदेल एक एक के पास गए और पूछा कि उनके मर जाने की स्थिति में किसको इसकी खबर भेजनी चाहिए. केवल तभी क्रांति की भयानक गंभीरता ने उनके दिलों को छुआ. उनका संघर्ष अब रोमांटिक नहीं रह गया. पहले नजारा उत्साह से भरा और जीवंत था. लेकिन जब मौत का सरल-सा, सब पर छा जाने वाला सवाल उठ खड़ा हुआ, हरेक आदमी खामोश हो गया.

इस देश के अनेक तथाकथित क्रांतिकारी भले वो अश्वेत हों या गोरे, इस हकीकत को कबूल करने को तैयार नहीं हैं. ब्लैक पैंथर्स आत्मघाती नहीं हैं, न ही हम अपने जीवनकाल में क्रांति के नतीजों को रोमांटिसाइज करते हैं. दूसरे तथाकथित क्रांतिकारी इस भ्रम से चिपके रहते हैं कि वे अपने जीवन में क्रांति ला देंगे और बूढ़े होकर मरेंगे. वह नहीं हो सकता.

मैं अपनी क्रांति को जीने की आकांक्षा नहीं करता, और सबसे गंभीर कॉमरेड मेरे इस यथार्थवाद से शायद सहमत होंगे. इसलिए ‘अपने जीवन में क्रांति’ का मतलब मेरे लिए उससे अलग है जो दूसरे लोग इसके उपयोग करते हुए लगाते हैं. मैं समझता हूं कि क्रांति हमारे जीवनकाल में आगे बढ़ेगी लेकिन मैं यह उम्मीद नहीं करता कि मैं इसके फल का मजा उठा पाऊंगा. हकीकत कहीं अधिक उदासी से भरी होगी.

मुझे इसमें कोई संदेह नहीं है कि जीत क्रांति की होगी. दुनिया की जनता जीतेगी, सत्ता पर कब्जा करेगी, उत्पादन के साधनों पर कब्जा करेगी, नस्लवाद, पूंजीवाद, प्रतिक्रियावादी अंतरसांप्रदायिकता- प्रतिक्रियावादी आत्महत्या को ध्वस्त करेगी. लोग एक नई दुनिया पर फतह हासिल करेंगे. तब भी मैं जब क्रांति में शामिल अलग-अलग व्यक्तियों के बारे में सोचता हूं, मैं उनके बच पाने के बारे में पहले से नहीं कह सकता. क्रांतिकारियों को इस तथ्य को कबूल करना ही होगा, खास कर अमेरिका के अश्वेत क्रांतिकारियों को, जिनकी जिंदगी एक औपनिवेशिक समाज की बुराइयों के तहत लगातार खतरे में रहती है. जिस तरह हम जी रहे हैं उसे देखते हुए क्रांतिकारी आत्महत्या के विचार को कबूल करना मुश्किल नहीं है. इस मामले में हम गोरे नस्लवादियों से अलग हैं. उन्होंने नस्ली सफाए का सामना नहीं किया है.

बहुत बड़ी और तात्कालिक समस्या पूरी दुनिया को बचाने की है. अगर दुनिया नहीं बदलती, तो इसके सारे लोगों के सामने अमेरिकी साम्राज्य के सत्ता प्रतिष्ठान के लालच, उत्पीड़न और हिंसा का खतरा बना रहेगा. इबारत दीवार पर लिखी हुई है. संयुक्त राज्य अपने खुद के और सारी मानवता के वजूद को खतरे में डाल रहा है. अगर अमेरिकी जनता आगे आनेवाले विनाश के बारे में जानती होती तो वो खुद को बचाने के लिए कल ही इस समाज को बदल डालती. ब्लैक पैंथर पार्टी क्रांति का हिरावल दस्ता (वैनगार्ड पार्टी) है, जो इस देश को अपराध बोध के बोझ से निजात दिलाना चाहता है. हम सच्ची बराबरी और रचनात्मक काम के साधनों को स्थापित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं.

कुछ लोग हमारे संघर्ष को अश्वेत लोगों के बीच मौजूद आत्महत्या की प्रवृत्ति के प्रतीक के रूप में देखते हैं. खासकर विद्वान और अकादमिशियन फौरन इस तरह के आरोप लगा देते हैं. वे फर्क को देख पाने में नाकाम रहते हैं. पुल से कूद जाना और एक उत्पीड़नकारी सेना की जबरदस्त ताकत का नामोनिशान मिटा डालने के लिए आगे बढ़ना एक ही चीज नहीं है. जब विद्वान हमारी कार्रवाइयों को आत्मघाती कहते हैं, तो उनको तर्कसंगत होना चाहिए और उन्हें सारे ऐतिहासिक आंदोलनों के बारे में भी यही रुख अपनाना चाहिए. यानी अमेरिकी उपनिवेशित जनता, अट्ठारहवीं सदी के फ्रांसीसी, 1917 के रूसी, वारसा के यहूदी, एनएलएफ, उत्तरी वियतनामी- हर वो जनता जो क्रूर और ताकतवर बलों के खिलाफ संघर्ष करती है वह आत्मघाती है. यह भी कि अगर ब्लैक पैंथर अश्वेत लोगों के बीच मौजूद आत्महत्या की प्रवृत्तियों का प्रतीक है तब तो पूरी तीसरी दुनिया ही आत्मघाती है. क्योंकि तीसरी दुनिया का पूरा इरादा संयुक्त राज्य के शासक वर्ग का प्रतिरोध करने और उस पर विजय हासिल करने का है. अगर विद्वान अपने विश्लेषण को आगे बढ़ाना चाहते हैं तो उनको दुनिया के पांच में से चार हिस्सों के रू ब रू भी होना चाहिए, जो साम्राज्य की ताकतों का नामोनिशान मिटाने को प्रतिबद्ध हैं. तब इस तरह तो तीसरी दुनिया आत्मघाती के बदले हत्यारी बन जाएगी हालांकि हत्या का मतलब किसी के जीवन को गैरकानूनी तरीके से मिटाना है और तीसरी दुनिया तो केवल अपनी हिफाजत करना चाहती है. तो क्या सिक्का पलट गया है? क्या संयुक्त राज्य की सरकार आत्मघाती है? मुझे लगता है कि ऐसा ही है.

परिभाषाओं को इस तरह फिर से तय करते ही ‘क्रांतिकारी आत्महत्या’ शब्द शुरू में जितने सरल लगते थे, उतने नहीं रह जाते हैं. इन शब्दों को पेश करते हुए मैंने दो जाने-पहचाने शब्दों को लिया और उनको मिला कर एक अनजान सा शब्द बना दिया है, एक ताजा शब्द, जिसमें ‘क्रांतिकारी’ शब्द ने ‘आत्महत्या’ शब्द को एक ऐसे विचार में बदल दिया है जिसके आयाम और मायने अलग हैं और इनका उपयोग एक नई और जटिल स्थिति में होता है.

जेल के मेरे अनुभव व्यवहार में क्रांतिकारी आत्महत्या की बेहतर मिसाल हैं, क्योंकि जेल बाहरी दुनिया का छोटा नमूना है. अपनी सजा की शुरुआत से ही मैंने अधिकारियों से सहयोग करने से इनकार कर दिया. इसके नतीजे में मुझे ‘लॉकअप’ यानी कालकोठरी में रखा गया. समय बीतने के साथ-साथ मैं अडिग बना रहा जिसकी वजह से वे मेरे व्यवहार को आत्मघाती मानने लगे थे. मुझे कहा गया कि मैं तनाव में डिग कर टूट जाऊंगा. मैं नहीं टूटा और न ही अपनी जगह से पीछे हटा. मैं मजबूत बनता गया.

अगर मैं उनके उत्पीड़न के आगे झुक गया होता और उनकी इच्छा मान ली होती तो मैंने अपनी आत्मा की हत्या कर दी होती और इस तरह खुद को एक जीवित मौत की तरफ धकेल दिया होता. मेरे लिए जेल में सहयोग करने का मतलब प्रतिक्रियावादी आत्महत्या है. जबकि कालकोठरी शारीरिक और मानसिक रूप से नुकसान पहुंचानेवाली हो सकती है, मैंने जो कदम उठाए वे जोखिम की समझ के साथ उठाए. मुझे एक निश्चित स्थिति को बरदाश्त करना था, ऐसा करते हुए मेरे प्रतिरोध ने उनको बता दिया कि वे जिन चीजों के पक्ष में खड़े हैं मैं उन सबको खारिज करता हूं. भले ही मेरा संघर्ष मेरी सेहत को नुकसान पहुंचा सकता था, मुझे मार भी सकता था, लेकिन मैंने इसे अपने साथी कैदियों की चेतना को ऊपर उठाने के एक तरीके के रूप में देखा, आगे बढ़ रही क्रांति में योगदान के रूप में देखा. केवल प्रतिरोध ही उस दबाव को खत्म कर सकता है जो प्रतिक्रियावादी आत्महत्या की वजह बनता है.

क्रांतिकारी आत्महत्या की अवधारणा पराजयवादी या भाग्यवादी नहीं है. इसके उलट यह यथार्थ के प्रति जागरुकता के साथ साथ उम्मीद की संभावना को जताती है- यथार्थ इसलिए कि क्रांतिकारी को हमेशा मौत का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए और उम्मीद इसलिए क्योंकि यह बदलाव लाने की मजबूत प्रतिबद्धता का प्रतीक है. सबसे ऊपर यह मांग करती है कि क्रांतिकारी को अपनी मौत और अपनी जिंदगी को अभिन्न हिस्से के रूप में देखना चाहिए. चेयरमैन माओ कहते हैं कि मौत तो हम सबकी होनी है, लेकिन इसका महत्व अलग अलग होता है: एक प्रतिक्रियावादी के लिए मौत पंख से भी हल्की होती है, एक क्रांति के लिए मरना माउंट ताइ से भी भारी होता है.

------
* आर्थिक बुनियाद पर टिकी और मीडिया तथा सभी माध्यमिक शैक्षिक और सांस्कृतिक संस्थानों की मदद से मजबूत बनाई जाती सत्ता संरचना.

अनुवाद: रेयाज उल हक

Related Posts by Categories



Widget by Hoctro | Jack Book
  1. 0 टिप्पणियां: Responses to “ क्रांतिकारी आत्महत्या: एक घोषणापत्र ”

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


फीड पाएं


रीडर में पढें या ई मेल से पाएं:

अपना ई मेल लिखें :




हाशिये में खोजें