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बीच सफ़हे की लड़ाई

सीमा-विश्वविजय को बिना शर्त रिहा करो!

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/13/2012 05:53:00 PM

  • सीमा विश्वविजय को बिना शर्त रिहा करो!
  • दमनकारी कानूनों के शिकार सभी बंदियों को रिहा करो!
  • यू.ए.पी.ए. जैसे दमनकारी कानूनों को रद्द करो!!
  • जनता पर दमन अभियान बंद करो!!
इलाहाबाद की विशेष निचली अदालत में 8 जून, 2012 को सीमा विश्वविजय को उम्र कैद सुना कर न्यायाधीश महोदय ने न्याय की धज्जियां उड़ा दीं। पुलिस के विशेष दस्तों की बनाई गई झूठी कहानी और तथ्य के नाम पर झूठी जब्ती को न्यायाधीश ने अपने न्याय का आधार बना लिया। सीमा विश्वविजय की हकीकत को नकार कर उन्हें राज्य के खिलाफ षड्यंत्र करने व युद्ध छेड़ने का अभियुक्त घोषित किया। इस कथित न्याय से लोगों में गुस्सा, क्षोभ और न्याय की इस व्यवस्था के प्रति हिकारत बढ़ गयी।

6 फरवरी, 2010 को सीमा आजाद विश्व पुस्तक मेले से इलाहाबाद लौट रही थीं। विश्वविजय उन्हें लाने के लिए इलाहाबाद रेलवे स्टेशन पहुंचे थे। वहीं उन्हें पुलिस के विशेष दस्ते ने उठा लिया। इसके बाद उन पर जो मुकदमा दर्ज किया गया और पुलिस व मीडिया के एक हिस्से ने मिलकर आतंकवाद व देशद्रोह का जो अपराधिक झूठ रचा वह एक लोकतांत्रिक समाज पर गहरा धब्बा है। झूठ और अपराध गढ़ने का यह रिवाज अंग्रेजों के जमाने से चलता आ रहा है। आज यह कहीं अधिक संगीन हो उठा है। लोकतांत्रिक व जनवादी मूल्यों को मानने व उस पर चलने वाले हजारों लोगों पर ढाए जा रहे जुल्म का जोर बढ़ता ही जा रहा है।

सीमा और विश्वविजय को जो सज़ा हुई है वह कहीं से भी उनके किसी कृत्य के कारण नहीं हुई है। मुकदमे का ज्यादातर हिस्सा दूसरे मुकदमों की बातों को लेकर है। जो बातें अभी आरोप मात्र के रूप में ही हों और सिद्ध न हुई हों उन्हें सच और सिद्ध मान कर सीमा और विश्वविजय को दोषी ठहराया गया है। लगता है कि न्यायाधीश महोदय ने अपने मन में पहले ही यह बात बैठा दी हो कि दोनों को दोषी ठहराना है। फिर उसी अनुसार पुलिस के गवाहों और सरकारी वकील के दिये हुए तर्कों और तथ्यों को सजाते हुए फैसला लिख दिया गया है। अभियोजन पक्ष के रूप में पुलिस जो कुछ कह रही थी उसी को मुकदमे के फैसले के रूप में मान्यता दे दी गयी है।

सीमा आजाद और विश्वविजय जनता के हक में काम करने वाले पक्षधर कार्यकर्ता रहे हैं। दोनों ही छात्र आंदोलन व संगठन में हिस्सेदारी करते हुए सक्रिय सामाजिक जीवन में उतरे। सीमा आजाद इलाहाबाद से निकलने वाली पत्रिका ‘दस्तक’ का संपादन करने लगीं। इस पत्रिका ने लगातार उन जनवादी मुद्दों को उठाया और पक्ष लिया जिस पर दमन तेजी से बढ़ा है। उसने उत्तर प्रदेश में माफियाओं की लूट, किसानों को उजाड़ने वाली ‘गंगा एक्सप्रेस वे’ व एस.इ.जेड. जैसी योजनाओं के खिलाफ लिखा और छापा। मुस्लिम युवाओं की आतंकवाद के नाम पर मनमानी गिरफ्तारियों और आदिवासी लोगों पर सरकार की फौजी कार्रवाईयों के खिलाफ लिखकर सरकार की गलत नीति का विरोध किया। इस जुल्म के विरोध में खड़ा होना ही अपराध हो गया।

खुद सरकार द्वारा बनाई गई विभिन्न कमेटियों ने देश के हालात पर जो रिपोर्टें दी हैं वे भी दिल दहला देने वाली हैं। ऐसी ही एक कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि इस समय देशी विदेशी कंपनियां अंग्रेजों के जमाने से भी बड़ी जमीन की लूट कर रही हैं। सच तो यह है कि जमीन ही नहीं, खनिज, पानी, पर्यावरण, इंसान का श्रम, महिला व बच्चों का जीवन - सभी कुछ लूटा जा रहा है। देश की राजनीति घोटाला, बेइमानी और भ्रष्टाचार में इतनी डूब चुकी है कि उसकी आलोचना व विरोध किए बिना लोकतांत्रिक समाज की कल्पना भी मुश्किल है। आज विरोध का स्वर देश के हर हिस्से से उठ रहा है।

सीमा आजाद और विश्वविजय ऐसे ही विरोध के सक्रिय हिस्सेदार रहे हैं। सच्चाई यह भी है ऐसे विरोध के स्वर को दबाने के लिए पुलिस व सेना का खुलेआम प्रयोग किया जा रहा है। राजनीतिक असहमति का दमनकारी कानूनों से निपटने का जोर आज इतना बढ़ चुका है कि इसे हर कोई ‘अघोषित आपातकाल’ का नाम दे रहा है। यह बात यूं ही नहीं कही जा रही है। खतरनाक परमाणु संयंत्र बनाने व जमीन से बेदखली का विरोध कर रहे तमिलनाडु के कूडनकुलम के लगभग 6,000 हजार किसानों को एक ही थाने में एक ही दिन राजद्रोह में निरुद्ध करना इस खतरनाक प्रवृत्ति को ही दिखा रहा है। एक अनुमान के अनुसार राजद्रोह जैसे कानूनों के तहत 10 हजार से ऊपर लोगों को जेलों में बंद किया गया है, जिसमें किसान, आदिवासी और मुसलमानों की संख्या सबसे अधिक है। हजारों ऐसे लोगों को जेलों में बंद कर दिया गया है जिन्हें यह भी नहीं पता कि उन पर कौन से जुर्म थोपे गए हैं।

सामाजिक विसंगति और विभाजन तेजी से बढ़ रहा है। एक तरफ अकूत संपत्ति का भंडार कुछ लोगों के हाथों इकट्ठा होता जा रहा है तो दूसरी ओर देश की दो-तिहाई आबादी के मुंह से दो जून का निवाला भी छिनता जा रहा है। एक तरफ धनिकों ने देश के 7,00,00,28,00,00,000 रूपए विदेश के केवल एक बैंक में जमा कर रखा है। अन्य जमाखोरी के आंकड़ों को जोड़ दिया जाय, तो अमीरी का घिनौना रूप और साफ दिखने लगेगा। इन सब बातों को बोलना विभिन्न पार्टियों की सरकारों की नजरों में अपराध हो गया है। हजारों कार्यकर्ताओं, जनपक्षधर पत्रकारों, साहित्य-संस्कृतिकर्मियों के सवाल उठाने के साहस को दमनकारी कानूनों से दफ्न कर देने का जोर बढ़ता जा रहा है।

जनवादी मूल्य वे आकांक्षाएं हैं जिनके बिना लोकतांत्रिक समाज संभव नहीं हैं। ये आकांक्षाएं ही समाज को आगे ले जाती हैं। सीमा आजाद और विश्वविजय इन्हीं आकांक्षाओं के साथ देश के उन सभी मानवाधिकार, सामाजिक, राजनीतिक कार्यकर्ताओं के हमसफर रहे हैं जो जनवादी मूल्यों के पक्ष में मजबूती से खड़े हैं। आइए, सीमा-विश्वविजय की बिना शर्त रिहाई के लिए एकजुट हों। दमनकारी कानूनों को रद्द करने और इसके शिकार हजारों लोगों की रिहाई की मांग करें। आइए, एकजुट होकर अपनी आवाज उठाएं।

सीमा विश्वविजय रिहाई मंच

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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