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ब्रह्मेश्वर मुखिया की हत्या के निहितार्थ

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/12/2012 06:12:00 PM


रणवीर सेना के मुखिया ब्रह्मेश्वर सिंह और उसकी हत्या से जुड़े जातीय ताने-बाने को समझने की कोशिश कर रहे हैं निखिल आनंद. उनका यह आलेख हंस के जुलाई अंक में प्रकाशित हुआ है. 

बिहार के प्रतिबंधित हथियारबंद संगठन रणवीर सेना के सुप्रीमो बरमेश्वर सिंह की हत्या की खबर जैसे ही आग की तरह भोजपुर की आबोहवा में फैली, अज्ञात भय की आशंका से बिहार की एक बड़ी आबादी का दिल काँप उठा। इसी दिन की बात है कि हाई एलर्ट के बावजूद सेना समर्थकों ने हथियार से लैस होकर भोजपुर मुख्यालय में स्थित दलित छात्रावासों पर हमला बोल दिया। हैरत ये की प्रशासन ने सुरक्षा मुहैया कराने की बजाय 200 छात्रों को होस्टल से निकाल बाहर कर जिम्मेदारी की इतिश्री कर ली। इसी दिन शाम को भोजपुर के चरपोखरी थाना क्षेत्र इलाके में 20 वर्षीय संतोष रजक की हत्या कर दी गई। संतोष की सिकरहट्टा इलाके के फतेहपुर मार्केट में ड्राईक्लीनिंग की दुकान थी और वो साईकिल से घर लौट रहा था तब गोली मार दी गई। इस हत्या का कारण और मामले की तफ्शीश की स्थिति का फिलहाल पता नहीं लेकिन पुलिस ने इसे उपद्रव से जोड़कर देखने से साफ इंकार कर दिया। बिहार की किसी भी इलेक्ट्रोनिक और प्रिंट मिडिया में सेना सुप्रीमों की हत्या व हंगामे की खबर के बीच दलितों से जुड़ी इन खबरों का जिक्र तक नहीं था। शुक्र है कि इससे ज्यादा कुछ अनहोनी नहीं हुई। हालांकि तब तक ये खबर भी हवा में तैरने लगी थी की हत्या में सेना विरोधी संगठन या समुदाय नहीं बल्कि अपनों का ही हाथ है तब जाकर लोगों ने राहत की साँस ली।

बिहार की भूमि आधारित अर्थव्यवस्था में जाति की एक बड़ी भूमिका रही है। 10 फीसदी से भी कम संभ्रांत जाति समूह जमीन के बड़े हिस्से का मालिक रहा तो 90 फीसदी दलित- पिछड़ा- पसमांदा लोगों का एक बड़ा भाग मालिकों की जमीन पर चाकरी कर जीवन यापन करता रहा है। फिर सवर्ण सामंतों ने इस व्यवस्था में शोषण और ऐशो- आराम की भी पूरी गुंजाइश राजशाही अंदाज में निकाल ली थी। बिहार में सामंती गठजोड़ के खिलाफ पिछड़ी जातियों ने गोलबंदी शुरू की तो मान- सम्मान, हक- हकूक और भागीदारी का मुद्दा प्रमुखता से सामने आया जिससे सामाजिक द्वंद्व पैदा हुआ। एक ओर बड़ी आबादी की बुलंद ख्वाहिशों की उड़ान को लेकर जिंदा होते जज्ब़ात थे तो दूसरी तरफ संभ्रांत सवर्ण जमात की इतिहास के कब्र में बने गढ़ों और मठों को बचाने की कोशिश थी। इसी पृष्ठभूमि में रोटी और बेटी को बचाने के लिये बनी रणवीर सेना कहने के लिये सवर्ण किसानों की सेना थी लेकिन हकीकत में ये सिर्फ भूमिहार जाति की दबंगों का संगठन रही। रणवीर सेना का नामकरण भी कम दिलचस्प नहीं जो एक राजपूत विरोधी नायक के नाम पर हुआ है। इस संगठन का नाम 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में सुर्खियों में उभरे रिटायर्ड आर्मीमैन रणवीर चौधरी उर्फ रणवीर बाबा के नाम पर रखा गया। प्रचलित किस्सागोई के अनुसार रणवीर चौधरी ने ही भोजपुर के इलाके में राजपूत भूमिपतियों का रुतबे और वर्चस्व को खत्मकर भूमिहारों के वजूद की स्थापना की थी।  इस संगठन को कई दलों और उसके नेताओं का राजनीतिक संरक्षण प्राप्त था।  खास बात कि नीतीश कुमार की सरकार ने सत्ता में आते ही पहला काम ये किया कि ‘अमीर दास आयोग’ को भंग कर दिया जिसे बाथे जनसंहार के बाद रणवीर सेना के करतूतों की जाँच के लिये लालू राज में बनाया गया था। बावजूद इसके रणवीर सेना से कांग्रेस, एल.जे.पी., आर.जे.डी. खासकर बी.जे.पी., समता- जे.डी.यू., के छोटे- बड़े नेताओं के साँठ- गाँठ की हकीकत जगजाहिर हो चुकी है।

बिहार में जनसंहारों की शुरुआत 70 के दशक में ही हो चुकी थी जिसमें बेलछी जनसंहार राष्ट्रीय सुर्खियों में छाया और इंदिरा गाँधी तक सुदूर ग्रामीण इलाके में हाथी पर बैठ कर पहुँची थी। रणवीर सेना की हथियारबंद दबंगई का अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि 1994 में संगठन के उदय के बाद कुल 37 जनसंहार हुए जिसमें से 30  इसी के नाम दर्ज है। 1995 से 2000 की अवधि में हुए 37 जनसंहारों में 370 लोगों के कत्ल हुए जिनमें से लगभग 300 लोगों की नृशंस हत्या रणवीर सेना ने की है। ब्रह्मेश्वर सिंह के नेतृत्व में जो बड़े जनसंहार हुए उनमें बथानी टोला में 21, हैबसपुर में 10, एकवारी में 9, चरपोखरी में 10, लक्ष्मणपुर- बाथे में 62, शंकरबिगहा में 23, नारायणपुर-मखदुमपुर में 12, सिंदानी- बेलागंज में 12 और मियाँपुर में 33 लोगों का सामूहिक कत्ल किया गया। लक्ष्मणपुर बाथे हत्याकांड के वक्त भूमिगत ब्रह्मेश्वर का एक बयान काफी सुर्खियों में रहा कि “हम महिलाओं को इसलिये मारते हैं कि वो नक्सली पैदा करते हैं। बच्चों को इसलिये मारते हैं कि वो बड़े होकर नक्सली बनेंगें और हमारे खिलाफ बंदूक उठायेंगे।” जेल में बंद रणवीर सेना के गुर्गों के अनुसार सुप्रीमो का सीधा निर्देश होता था कि “महिला- बच्चा- बूढ़ा देखने की जरूरत नहीं है, जो मिलता जाये उसे मारते जाना जरूरी है। हत्या तो करते ही थे मौका मिलने पर बलात्कार की भी छूट होती थी।”

1995 से 2002 यानी 7 साल तक भूमिगत और 2002 से 2011 यानी 9 साल जेल में रहने के बाद ब्रह्मेश्वर ने बाहर निकलते ही किसी भी जनसंहार में संलग्नता से इनकार करते हुए अपने राजनीतिक महत्वकांक्षा का इजहार किया। लेकिन 2002 में पटना में गिरफ्तारी के वक्त 5 लाख रूपये के इनामी मुखिया को अपने करतूतों का कभी अफसोस नहीं रहा और जरूरत पड़ने पर हमेशा हथियार उठाने की बात कही थी। मुखिया पर तीन जिलों में कुल 26 मामले दर्ज हुए जिनमें से 22 सिर्फ भोजपुर में थे, 16 मामलों में न्यायालय ने बरी कर दिया था और 10 मामले अब भी लम्बित थे। नजदीकी बताते है कि ब्रह्मेश्वर सिंह को हिन्दुत्व व राष्ट्रवादी राजनीति से आकर्षण, भूमिहार जाति के प्रति अगाध प्रेम और दलित- पिछड़ी- पसमांदा जातियों के प्रति घोर घृणा का भाव था। 2004 में तो ब्रह्मेश्वर ने आरा जिला जेल में बंद रहते समय रणवीर सेना समर्थकों सहित 97 कैदियों के साथ जातीय आधार पर अलग किचेन की माँग को लेकर हड़ताल कर दिया था।

इस मायने में ये बड़ी बात नहीं है क्योंकि बिहार की पुलिस बैरकों में खानपान का इंतजाम जातिगत आधार पर पहले से मौजूद है। इसी संदर्भ में डॉक्टरों- इंजीनियरों- अफसरों की जातिगत आधार पर गोलबंदी व गुटबाजी कोई नई बात नहीं है। ये इस बात से भी जाहिर होता है कि मुखिया की मौत के बाद श्रद्धांजली देने वालों में तमाम स्वजातीय नेता, ब्यूरोक्रेट, वकील, डॉक्टर, इंजीनियर, पत्रकार, छात्र- शिक्षक और बुद्धिजीवी लाईन लाइन लगाकर खड़े थे। कई लोग खुलकर श्रद्धासुमन अर्पित करने गये तो कई दूसरे प्रोग्रेसिव मुखौटे वाले छुपकर गये। जातिगत सहानुभूति हासिल करने वालों में बड़े नेताओं से लेकर हाशिये पर खड़े नेता शामिल हैं। अन्य दूसरी जाति के नेताओं ने भी उपस्थिति दर्ज कराकर सहानुभूति बटोरने की कोशिश की जिनके चुनाव क्षेत्र में भूमिहारों का वोट अहम मायने रखता है। संघर्ष की चुनौतियों से जूझने के बावजूद बिहार के सभी वामदलों खासकर सी.पी.आई. (एम.एल.) ने सरकार की खिंचाई तो की ही, ब्रह्मेश्वर सिंह को अपराधी से ज्यादा की अहमियत नहीं दी। बी.जे.पी. अध्यक्ष सी.पी.ठाकुर और बिहार सरकार के मंत्री गिरिराज सिंह, कांग्रेस नेता अखिलेश सिंह व रामजतन सिन्हा, जे.डी.यू. सांसद जगदीश शर्मा , जे.डी.यू. के विक्षुब्ध नेताओं में सांसद ललन सिंह व पूर्व सांसद अरूण कुमार सहित कई विधायक हत्या के दिन से लेकर दाहसंस्कार और तेरहवीं तक सक्रिय खासतौर पर सक्रिय दिखे। श्राद्धभोज की तैयारियों में मुख्यमंत्री के विशेष निर्देश पर सारा प्रशासनिक अमला जुटा रहा। वैसे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सेवा यात्रा में व्यस्त रहने के कारण हत्या के बाद की स्थिति, 60 किलोमीट लम्बी शवयात्रा - दाहसंस्कार और सी.बी.आई. इनक्वायरी की घोषणा तक सारा मैनेजमेंट डी.जी.पी. अभ्यानंद ने समाज भावना से बखूबी किया जिसके लिए स्वजातीय नेताओं ने उन्हे विशेष धन्यवाद दिया और प्रशंसा की। मुखिया के पार्थिव शरीर के दर्शन को जाने वाले आई.ए.एस. अधिकारी शशिशेखर शर्मा को नगरविकास विभाग से पशुपालन विभाग स्थानांतरित कर दिया गया जहाँ पर उनके पशुपालन मंत्री गिरिराज सिंह होंगे जिन्होंने ब्रह्मेश्वर को महान गाँधीवादी नेता घोषित किया है। ‘ब्रह्मेश्वर इफेक्ट’ के बाद प्रशासनिक कसरत भी खुब हुई जिसमें तीन दर्जन आई.ए.एस. और 101 डी.एस.पी. स्थानांतरित कर दिये गये।

ब्रह्मेश्वर मुखिया की हत्या 1 जून को हुई तो इत्तिफाक ही है कि 4 जून, 2012 को फारबिसगंज हत्याकांड के एक साल पूरे हुए। अंतर्राष्ट्रीय सुर्खियाँ बनी फारबिसगंज मामले में सरकार ने माँग के बावजूद न तो सी.बी.आई. जाँच करवाया, न अब तक कोई कार्रवाई की, न जाँच रिपोर्ट आयी और न ही पीड़ितों को न्याय मिल सका है। वहीं रणवीर सेना के द्वारा 11 जुलाई, 1996 को अंजाम दिये गये बथानी टोला जनसंहार में 21 लोगों की हत्या मामले में भी पीड़ितों को न्याय नहीं मिल सका और सभी आरोपी दोषमुक्त करार दिये गये। सरकार ने बथानी टोला मामले में सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कही है पर इसको लेकर गठबंधन के सवर्ण नेताओं का विरोध भी खुलकर आ चुका है। हाल ही में औरंगाबाद के धमनी गाँव के मुखिया देवेन्द्र सिंह उर्फ छोटू कुशवाहा की हत्या के बाद जनता के लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शन पर एस.पी.- डी.एम. की मौजूदगी में बर्बरता और जुल्म ढाये गये। यही नहीं पूर्व विधायक राजाराम सिंह सहित 29 प्रर्दशनकारियों को जेल में डाल दिया गया। इस मामले में पी.यू.सी.एल. की रिपोर्ट में पुलिस – प्रशासन को आरोपी बनाया गया लेकिन सरकार चुप है जबकि इस मामले में भी सी.बी.आई. जाँच की माँग की जा रही है। बिहार में ऐसे तमाम मामलों की लम्बी फेहरिश्त है जिसमें दलित- पिछड़े – पसमांदा समुदाय के पीड़ितों को न्याय दिलाने के नाम पर सरकार कोताही बरत रही है। जाहिर सी बात है कि सत्ता में आते ही अमीर दास आयोग को भंग करने और सवर्ण आयोग स्थापित करने वाली सरकार ने मुखिया हत्याकांड की जाँच सी.बी.आई. से कराने की सिफारिश कर दी।

ब्रह्मेश्वर सिंह के महिमामंडन की इस पूरी प्रक्रिया पर चर्चा इसलिए भी जरूरी है कि आज के 21वीं शताब्दी में मध्ययुगीन बर्बरता और नश्लीय हिंसा की मानसिकता वाले ब्रह्मेश्वर जैसे आईकॉन या रोल-मॉडल स्थापित कर कोई भी अपने जाति का नेता तो बन सकता है लेकिन समूचे समाज, राज्य या देश का नेता बनना मुश्किल है। गणेश दत्त और स्वामी सहजानंद सरस्वती ने तो भूमिहार समाज को सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान दिलाकर ब्राह्मणों के समकक्ष का सम्मान दिलाया। इन्हीं के द्वारा शुरू किये गये संस्कृतिकरण और सुधारवादी प्रयास की बदौलत ही भूमिहारों ने बींसवीं शताब्दी के तीन दशकों तक स्थापित कायस्थों की प्रशासनिक वर्चस्व को खत्म तो किया ही, राजनीतिक- सामाजिक श्रेष्ठता भी साबित की। स्वामी सहजानंद देश के बड़े किसान नेता बने जिनको भूमिहार रैयतो के साथ ही अपने- अपने जातीय संगठनों से जुड़े तमाम दलित- पिछड़े नेताओं का भी समर्थन मिला था। अपनी जातिगत निष्ठा के बावजूद सहजानंद सरस्वती ने इस पूरी कौम को एक प्रोग्रेसिव आउटलुक दिया जिसकी बदौलत श्रीकृष्ण सिंह बिहार के पहले मुख्यमंत्री हो सके अन्यथा उस समय जाति के आधार पर राजनीतिक खींचतान खूब हो रही थी। श्रीकृष्ण सिंह भी अपने पहले कार्यकाल में प्रगतिशील धारा के समर्थक थे लेकिन बाद में अपनी जाति के नेताओं की घेरेबंदी में सिमट कर रह गये। परिणाम ये हुआ कि भूमिहार नेतृत्व में बिहार की राजनीति का स्कोप खत्म हो गया और श्रीकृष्ण सिंह के मुख्यमंत्री बनने के 60 सालों के बाद भी इस समाज के नेता अपनी जाति की राजनीति में उलझ कर रह गये है। किसी भी एक भूमिहार नेता की पहचान आज की तारीख में प्रगतिवादी और सामाजिक न्याय समर्थक नेता के तौर पर नहीं है जो बिहार और देश की राजनीति के फलक पर छा सके। ऐसे में ब्रह्मेश्वर की नायक के रूप में स्थापना इस समाज के लिए त्रासदी से कम नहीं है। ये भी दिलचस्प है कि जे.पी. ने श्रीकृष्ण सिंह पर कालांतर में ‘भूमिहारवाद’ का आरोप लगाया था। वैसे आजादी के दौर में भी तमाम बड़े नेता जिसमें डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, सर गणेश दत्त, स्वामी सहजानंद, अनुग्रह नारायण सिन्हा, श्रीकृष्ण सिंह, डॉ. सच्चिदानंद सिंहा, ब्रजकिशोर प्रसाद अपने- अपने जातीय संगठनो से भी जुड़े हुए थे। बाद में इनलोगों ने राजनीतिक भाषणों में जाति का विरोध भले ही किया लेकिन जाति संगठनों के संरक्षक की भूमिका में बने रहे।

20वीं शताब्दी के शुरुआत में ही दलित- पिछड़ों में जो जातिगत भावना और एकजुटता का संचार हुआ उसनें इन्हे सामाजिक – राजनीतिक रूप से स्थापित करने में मदद की। इसी कालखंड में आर्यसमाज ने हिन्दुओं के बीच सुधारवादी प्रक्रिया के तहत जनेऊ अभियान शुरू किया था जिसका दलित – पिछड़ों के बुद्धिजीवियों ने खूब समर्थन दिया और बाद में ये इस तबके के लिए श्रेष्ठता का प्रतीक बन गया। मुंगेर के लाखोचक में 26 मई, 1925 को सामूहिक जनेऊ धारण करने के लिये आयोजित यादवों के समारोह पर भूमिहारों का ने हमला कर दिया था जिसमें बताया जाता है कि 20 लोगों की हत्या हुई और 60 से ज्यादा घायल हुए थे। पिछड़ों में सामाजिक न्याय को लेकर हो रहे उभार के खिलाफ सवर्णों के प्रतिरोध की ये पहली सबसे बड़ी घटना थी। समझा जा सकता है कि इस घटना के जब 100 साल होने जा रहे हैं, सामाजिक न्याय और भागीदारी का सवाल अब भी जिंदा है जिनकी बुनियाद पर आज बिहार ही नहीं देश की राजनीतिक बिसात बिछी है और जिसे दरकिनार करना किसी आने वाले भविष्य में भी मुश्किल है।

मुखिया हत्याकांड के बाद स्वजातीय नेताओं की सक्रियता समझी जा सकती है। बी.जे.पी. नेता सी.पी.ठाकुर और गिरिराज सिंह ने काफी तेवर दिखलाये और मुखिया को स्वामी सहजानंद सरस्वती के समकक्ष का किसान नेता तो साबित करने की कोशिश की ही महान गाँधीवादी घोषित कर दिया। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने तो पहले ही डी.जी.पी. अभ्यानंद को इस मामले की कमान देकर चुप्पी साध ली थी। उधर उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी भी इस मामले में ज्यादा कुछ बोलने से बचते दिखे। लेकिन राजनीति के हाशिये पर बैठे आर.जे.डी. नेता लालू यादव और एल.जे.पी. नेता रामविलास पासवान बी.जे.पी. नेताओं से बयानबाजी में होड़ लेकर ब्रह्मेश्वर सिंह को महान किसान नेता घोषित करने में लगे थे। बयानबाजी का दौर भी ऐसा मानो ये सभी लुटे- पिटे नेता सुर्खियां बटोर कर एकबारगी राजनीति के मुख्यधारा में लौट जाना चाहते हों। लेकिन इसी बहाने जो कोशिश हो रही थी वो ब्रह्मेश्वर सिंह को नये प्रतीक नायक के रूप में स्थापित करने की। यूँ तो स्वामी सहजानंद सरस्वती और श्रीकृष्ण सिंह के नाम पर होने वाले आयोजनों में दलीय आधार पर जातीय एकजुटता देखने को मिलती है। लेकिन मंडल- मंदिर के बाद खुलकर पहली बार भूमिहार समाज का पुलिस- प्रशासन के संरक्षण में आरा से लेकर पटना तक राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन सड़कों पर हुआ। भूमिहारों की इस गोलबंदी के बाद बिहार में एक बार फिर नये सिरे से सामाजिक- राजनीतिक गोलबंदी की सुगबुगाहट तेज है। इस पूरी प्रक्रिया में अन्य सवर्ण जातियों की कुनमुनाहट का अहसास भी बखूबी दिखाई दे रहा है। बंद कमरों में ये तमाम गैर भूमिहार सवर्ण नेता तल्खी का इजहार कर रहे है, भले ही इनमें से कुछ राजनीतिक मजबूरी में सहानुभूति बटोरने की लाईन में भी मौजूद थे। उधर भूमिहार समुदाय की इस राजनीतिक गोलबंदी पर दलित – पिछड़े – पसमांदा समुदाय के बीच भी मौन ध्रुवीकरण की प्रक्रिया तेज है। मंडल के बाद काफी मुखर हुई ये जातियाँ इस पूरे घटनाक्रम को काफी गंभीरता से ले रही है। खास बात ये जातियाँ विकल्पहीनता के बावजूद नीतीश – लालू – रामविलास के उपर मौजूदा सामाजिक- मनोवैज्ञानिक निर्भरता से उबर कर 21वीं सदी का नया नायक तलाश करना चाहती है। ये सब उसी वक्त हो रहा है जब एक अग्रणी सवर्ण जाति अपने तमाम प्रगतिशील धारा के विचारकों की लम्बी फेहरिश्त को दरकिनार कर बर्बरता और हिंसा के प्रतीक ब्रह्मेश्वर को अपने नये नायक के रूप में प्रतिस्थापित करने में जुटा है। जाहिर है कि मंडल के उत्तरार्ध काल में जातीय ध्रुवीकरण का दूसरा दौर बिहार में शुरू हो चुका है।

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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