हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

“ईमाँ मुझे खैंचे है तो रोके है मुझे कुफ्र”

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/06/2012 12:04:00 AM

“ईमाँ मुझे खैंचे है तो रोके है मुझे कुफ्र”

(‘मरंगगोड़ा...‘ को पढ़ते हुए)

रणेन्द्र 

महुआ माजी के बहुप्रतीक्षित उपन्यास ‘मरंगगोड़ा नीलकंठ हुआ‘ ने कई कारणों से अत्यधिक उत्सुकता जगा दी थी । एक तो स्थानीय अखबारों में इस उपन्यास के प्रकाशन के एक-दो महीने पूर्व से ही महुआ जी के आधे-आधे पेज के साक्षात्कारों ने उत्प्रेरक का काम किया था । उन साक्षात्कारों की विशेषता यह होती थी कि सारंडा के सघन वन, ‘हो‘ जनजाति, माओवाद एवं अथक शोध की चर्चा तो खूब होती थी किन्तु उपन्यास के मूल विषय जादूगोड़ा के यूरेनियम खनन, विकिरण और उससे दुष्प्रभावित होने वाली पीढि़यों की थीम पर रहस्य का पर्दा रखा जाता था । दूसरी ओर विश्व पुस्तक मेले में लोकार्पण के पहले ही राजकमल प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड द्वारा इस उपन्यास की पांडुलिपि को मैला आंचल-फणीश्वरनाथ रेणु कृति सम्मान प्रदान किये जाने ने उत्सुकता को चरम पर पहुँचा दिया। एक बड़े स्टार की बड़े बजट की भव्य फिल्म के सफलतम प्रदर्शन जैसा माहौल बनाने में दोनों सफल रहे ।

कल्पना का अन्त और यथार्थ की भयावहता
मई, 1998 राजस्थान के पोखरण में एटमी विस्फोट के जरिए जो अतिराष्ट्रवाद का बवंडर खड़ा किया जा रहा था, उसके राजनीतिक निहितार्थ स्पष्ट थे । किन्तु पूरा माहौल, पूरी मीडिया, प्रिन्ट-विजुअल सब राष्ट्रीयता में ‘उब-डूब‘ कर रहे थे । इसके खिलाफ बोलना देशद्रोही होना था । निजाम और नाभिकीय ऊर्जा के पीछे खड़ी पूंजी का यह बहुत ही पुराना और आजमाया हुआ टोटका था जो समय के साथ और धारदार होता गया ।

पोखरण की विकिरणयुक्त धूल अभी बैठी भी नहीं थी कि 14 अगस्त, 1998 के फ्रन्टलाइन में अरून्धति राय के आलेख ‘द एन्ड ऑफ इमेजिनेशन‘ ने ‘भारीजल‘ के बौछार का काम किया। सब साफ हो रहा था, राष्ट्रवाद का गुबार भी ।

अगले ही वर्ष 1999 में श्री प्रकाश (उपन्यास में आदित्य श्री) का वृत्तचित्र ‘बुद्धा विप्स इन जादूगोड़ा‘ प्रदर्शित हुआ, देखने का मौका मिला । विकिरण प्रभावित पीढि़यों की विकलांगता, फेफड़े के कैंसर, बाँझपन, आदि की भयावहता ने राष्ट्र-राज्य के आन्तरिक उपनिवेशवाद के घिनौने चेहरे को आईना दिखाया । जोआर (झारखण्डी ऑर्गनाजेशन अगेंस्ट रेडिएशन) के जादूगोड़ा स्थित कार्यालय में घनश्याम बिरूली (सगेन) एवं जेवियर डॉयस (जॉन डायस) से भेंट और ‘पीली खल्ली-काली करतूत‘ जैसे जेवियर के आलेखों ने यूरेनियम कॉरपोरेशन ऑफ इन्डिया लिमिटेड (यूसीआईएल) के पदाधिकारियों के सफेद झूठ पर से न केवल पर्दा उठाया बल्कि सर्ववंचितों की दबी-कुचली, पीड़ा-दुख, संत्रास-कराह को लगातार बुलन्द आवाज प्रदान की ।
साफ-सुथरी, कार्बन और ग्रीन गैसों से मुक्त वैकल्पिक ऊर्जा के रूप में नाभिकीय ऊर्जा की अपरिहार्यता को गोयबल्स के सिद्धान्त के तहत इतनी बार दुहराया गया कि भारतीय मध्यवर्ग ने इसे सहज स्वीकार कर लिया। इस स्वीकार्यता की पृष्ठभूमि में पंडित नेहरू एवं होमी जहांगीर भाभा का आभा-मंडल भी काम कर रहा था । 2020 ईस्वी तक 20,000 मेगावाट बिजली नाभिकीय ऊर्जा से उत्पन्न करने का लक्ष्य हमने स्वीकार कर लिया है । अप्रैल 2011 में फुकुशिमा के तीन परमाणु संयत्रों में विस्फोट की त्रासदी के बाद भी देश छह नये परमाणु रिएक्टर लगाने की जल्दी में है । तमिलनाडु के कुडनकुलम और महाराष्ट्र के जैतापुर में हो रहे जनविरोध के पीछे देशद्रोही ताकतें और विदेशी पैसा नजर आ रहा है । ऐसे धुँधलके भरे समय में ‘मरंगगोड़ा नीलकंठ हुआ‘ का प्रकाशन हिन्दी जगत के लिए अत्यन्त ही महत्वपूर्ण परिघटना है । विषय के चयन, जनपक्षधरता की विकलता, अछूते-वैज्ञानिक विषय के लगभग हर आयाम पर लेखिका की पकड़ की जितनी प्रशंसा की जाए वह कम होगी । उग्रराष्ट्रवाद, गोपनीयता, कार्बनमुक्त ऊर्जा के तिलिस्म और प्रतिष्ठित वैज्ञानिक संस्थानों के गहन झूठ के खिलाफ हिन्दी में ऐसी कोई कृति मेरी जानकारी में पहले प्रकाशित नहीं हुई ।

यूरेनियम खनन, नाभिकीय ऊर्जा उत्पादन, परमाणु बम एवं विकिरणयुक्त कचरे की आदिवासी इलाकों में डपिंग यूरेनियम विकिरण से जुड़े ये चार यक्ष प्रश्न हैं जिनका आदिवासी जीवन पर पड़नेवाले संहारात्मक कुप्रभाव, पर्यावरण विध्वंस एवं परमाणु निःशस्त्रीकरण जैसे तीन तीक्ष्ण कोणों से पड़ताल किए जाने की आवश्यकता ही मुख्यधारा ने महसूस नहीं की । जबकि ये न केवल झारखण्ड के जादूगोड़ा, मेघालय के खासी हिल्स जिले की समस्या है बल्कि कजाकस्तान, आस्ट्रेलिया, कनाडा, अमेरिका, लैटिन अमेरिका, रूस, उजबेकिस्तान, अफ्रीकी देशों आदि की भी कहानी यही है । हर कहीं पीढि़यों को धीमी-घिनौनी मौत देती जनसंहार की ये अमानुषिक गतिविधियाँ जनजातीय इलाकों में सत्ता प्रतिष्ठानों द्वारा निर्लज्ज भाव से संचालित हो रही हैं । किन्तु हिन्दी के साहित्यकारों की तो छोडि़ए टोही पत्रकारों का भी ध्यान इस ओर कम ही गया है ।

झारखण्डी ऑर्गनाइजेशन अगेन्स्ट रेडिएशन (जोआर) के संस्थापक घनश्याम बिरूली, (उपन्यास में सगेन), फिल्मकार श्री प्रकाश (उपन्यास में आदित्यश्री) एवं चाईबासा में आदिवासियों द्वारा संचालित एक गैर सरकारी संस्था ‘विन्दराई इन्स्टीच्यूट फॉर रिसर्च स्टडी एण्ड एक्शन (बिरसा) के जेवियर डायस (उपन्यास में जॉन डायस) इस उपन्यास के मुख्य पात्र हैं। यथार्थ में इन्ही तीन लोगों के प्रयास से जादूगोड़ा के विकिरण पीडि़त आवाम की लड़ाई न केवल शुरू हुई बल्कि राष्ट्रीय अन्तर्राष्ट्रीय मंचों तक पहुँची एवं यूसीआईएल को कई निरोधात्मक उपाय अपनाने पर मजबूर होना पड़ा।

जादूगोड़ा (उपन्यास में मरंगगोड़ा) हावड़ा-मुम्बई रेल लाइन पर टाटा नगर (जमशेदपुर) रेलवे स्टेशन से 24 किलोमीटर की दूरी पर है । 1967 ईस्वी से यूरेनियम कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड यहाँ की खदानों से यूरेनियम का खनन करवा रहा है जिसका शोधन भी जादूगोड़ा में ही होता है । प्रतिवर्ष तीन लाख रेडियोधर्मी कचरे की डम्पिंग भी इसी इलाके में होती है । खदान से निकलनेवाला कचरा इससे दस गुना ज्यादा यानी तीस लाख टन प्रतिवर्ष होता है ।

सगेन तीन पीढि़यों से इस धीमे जनसंहार का साक्षी है । उसके दादा (ततंग) जम्बीरा, उसके अपा (पिता) रेकोण्डा ने तो बजाप्ता खनिक (माइनर) के तौर पर कार्य किया है । परमाणु ऊर्जा विभाग द्वारा नियंत्रित यूसीआईएल बिना सुरक्षात्मक उपाय जैसे दस्ताने-विशेष ड्रेस आदि के अपने खनिकों को खदानों में उतारता रहा। यूरेनियम की पीली धूल कपड़ों - जूतों पर लिए बेपरवाह - गैर जानकार खनिक घर जाता रहा । पत्नियाँ उन यूरेनियम धूल भरे कपड़ों को नंगे हाथों धोती रहीं । नतीजन सगेन का दादा (ततंग) जम्बीरा और दादी (जियंग) सुकुरमनी पीब-लहू से बजबजाते घाव और कैंसर से मृत्यु के शिकार हुए ।

“खदान के मिल से लगातार निकलने वाले गीले कचरे, जिन्हें बड़े-बड़े पाइपों द्वारा लाकर बनाए गए डैम में डाला जाता, सूख कर सफेद मैदान का शक्ल लेते जा रहे थे । सगेन और उसके साथियों को खेलने की नयी जगह मिल गयी थी ।” (पृ. 91) यह है वैज्ञानिक संस्था की अक्षम्य लापरवाही का एक नमूना जो इलाके में विकलांगता की महामारी लाता रहा ।

सगेन के पिता रेकोण्डा ने कम्पनी के खिलाफ लड़ाई शुरू की, स्थानीय मजदूरों की बहाली की लड़ाई । नतीजन यूरेनियम चोरी-स्मगलिंग के अपराध, देशद्रोह के संगीन आरोप के साथ जेल में भेज दिए गए ।

सगेन अपने ताऊ के यहाँ भेज दिया जाता है जहाँ उसकी फिर से पढ़ाई शुरू होती है । कॉलेज के दिनों में सगेन झारखण्डी आन्दोलनकारी संगठनों के साथ जुड़ता है । सगेन जादूगोड़ा के इलाके में ‘बेरोजगार विस्थापित संघ‘ की स्थापना कर पिता की लड़ाई को आगे बढ़ाता है । बिरसा संगठन का जॉन डायस 1992 के द वल्र्ड यूरेनियम हियरिंग, श्लेजवर्ग, आस्ट्रिया में भाग ले कर लौटा है । उसे यूरेनियम विकिरण की भयावहता का अहसास हो चुका है । कम्पनी की नौकरी के प्रशिक्षण के दौरान सगेन भी यूरेनियम, विकिरण, अल्फा, बिटा, गामा किरणें, ऊतकों को भेदने की क्षमता की गहन जानकारी प्राप्त करता है । सगेन के साथ पाठक भी इस वैज्ञानिक विषय से परिचित होते हैं ।

जॉन डायस और सगेन कुछ मित्र डॉक्टरों की मदद से मरंगगोड़ा (जादूगोड़ा) के आसपास के गाँव-टोले में स्वास्थ्य सर्वेक्षण करवाते हैं । परिणाम के आधार पर लड़ाई आगे बढ़ती है । लड़ाई को और प्रामाणिक बनाने के लिए आन्दोलनों पर वृत्तचित्र बनाने वाले आदित्यश्री को मरंगगोड़ा आमंत्रित किया जाता है । कथा आदित्यश्री, उसके वृत्तचित्र ‘बुद्धा विप्स इन जादूगोड़ा‘ के निर्माण, जापान के विभिन्न शहरों में उसके प्रदर्शन, उसकी जापानी प्रेमिका मोमोका, सारंडा के माओवाद पर अध्ययन के लिए लन्दन से आई प्रज्ञा आदि के सहारे आगे बढ़ती है और अब तक उपेक्षित, अनदेखे नरक का द्वार झटके से खोल देती है । अन्तर्राष्ट्रीय मंचों-कार्यक्रमों में आदित्यश्री तथा सगेन की भागीदारी के बहाने पाठक पूरी दुनिया के जनजातीय इलाकों में सत्ता और पूँजी प्रतिष्ठानों द्वारा जबरन पैदा किए जा रहे नरक के कई संस्करणों से परिचित होता है । वह शिद्दत से महसूस करता है कि जापान का हिरोशिमा-नागासाकी अमेरिका का थ्री माइल आइलैंड न्यूक्लियर पावर प्लान्ट एक्सीडेंट, चेरनोबिल, फुकुशिमा के रास्ते मानवता और उसकी  माता पृथ्वी को नष्ट करने की कोशिशें निरन्तर जारी हैं।

महुआ माजी की यह सशक्त वैचारिक रचना अपनी सघनता और बहुआयामी विस्तार के साथ विषय की आतंककारी भयावहता एवं वैश्विकता से सुपरिचित करवाती, उद्वेलित करती है । यही इसकी सफलता है और लेखिका की परिश्रमी लेखनी का सुफल भी ।

यूनानी काव्यशास्त्री लोंजाइनस ने कहा था कि “पूर्ण निर्दोषता टुच्ची रचना का गुण है, उदात्त रचना का नहीं।” स्पष्ट है कि श्रेष्ठतम रचनाएँ भी निर्दोष नहीं हुआ करती । एक पाठक के नजरिए से ‘मरंगगोड़ा नीलकंठ हुआ‘ के पाठ में जो बातें खटकती हैं उनका उल्लेख भी जरूरी लगता है ।

‘पैचवर्क‘ भी एक कला है

कई सुधीजनों को फॉर्मेट-शिल्प के ख्याल से इसे उपन्यास मानने में कठिनाई हो सकती है । निबंधात्मकता इस पुस्तक की सबसे बड़ी समस्या है या सबसे बड़ा गुण, इसे तय करना कठिन है । विषय इतना जटिल, इतना संश्लिष्ट और वैज्ञानिक सूचनाओं से जुड़ा है कि इसे कथात्मकता में बाँधना एक दुष्कर कार्य था । घनश्याम बिरूली और श्रीप्रकाश के पास लगभग डेढ़ दशक से काम करते-करते पुस्तकालय भर सामग्री एकत्रित हो गई है। इंटरनेट पर तो इस विषय पर हजार पृष्ठों की सामग्री उपलब्ध है । लेखिका इनमें से अधिकतम का उपयोग करने का लोभ संवरण नहीं कर पाईं हैं । साथ ही विषय की विशिष्टता और महत्ता का लेखिका को इतना जबरदस्त अहसास है कि वे बिंदास तरीके से अखबारी कतरनों का भी सीधे-सीधे उपयोग करते दिखती हैं। उदाहरणार्थ पृ. 201 पर संदीप पाण्डेय की पदयात्रा का विवरण नाम-तिथि सहित। सुनीता नारायण का प्रेस वक्तव्य पृ. 364 । शैलेन्द्र महतो की पुस्तक ‘झारखण्ड की समरगाथा‘ में ‘जंगल आन्दोलन‘ (पृ 263-270), चांडिल गोलीकांड (पृ. 262) गुवा गोलीकांड आदि सविस्तार वर्णित है । वरीय पत्रकार अनुज कुमार सिन्हा भी प्रभात खबर में इन पर श्रृंखलाबद्ध आलेख प्रकाशित करते रहे हैं। इनका भी अधिकतम उपयोग लेखिका ने कर लिया है । डॉ बी. वीरोत्तम के ‘झारखण्ड: इतिहास और संस्कृति‘ एवं दमयन्ती सिंकु की पुस्तक ‘सिंहभूम के शहीद लड़ाका हो‘ से ‘हो इतिहास के उद्धरण, इतिहासकार डॉ अशोक कुमार सेन का आलेख तो पात्रों के संवादों में सीधे उद्धृत हैं आदि । हालाँकि लेखिका ने पुस्तक के अन्त में इन उद्धरणों के लिए लेखकों-सम्पादकों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की है किन्तु ये सारे उपक्रम इसकी निबंधात्मकता को ही सघन करते हैं ।

इन निबंधों का पैचवर्क इतना ज्यादा हो गया है कि जम्बीरा-मन्जारी, सगेन-चारिबा, आदित्यश्री-मोमोका, आदित्यश्री-प्रज्ञा की कथाएँ ही पुस्तक की वैचारिकता का रसभंग करती नजर आती हैं । सच तो यह है कि भयावह यथार्थ से जुड़ी सूचनाओं की डपिंग का भार इतना ज्यादा हो गया है कि संवेदना उसे झेल नहीं पाती, कराहती दिखती हैं । कथा साहित्य में संवेदना और सूचना का संतुलन साधना एक अत्यन्त दुष्कर कार्य है जो कठिन श्रम और समय की माँग करता है । इस मोर्चे पर लेखिका थोड़ी सी चूकती हुई लगती हैं ।

उत्तर आधुनिकता के इस कठिन दौर में संश्लिष्ट यथार्थ को कलात्मक रचना में ढालने का बखूबी अंजाम कई वरिष्ठ, समकालीन एवं नये रचनाकार देते रहे हैं । सूची बहुत लम्बी हो सकती है किन्तु इस सन्दर्भ में संजीव का ‘जंगल जहाँ शुरू होता है‘, मैत्रेयी पुष्पा की अल्मा कबूतरी‘ राजू शर्मा का ‘विसर्जन‘, उदयप्रकाश का ‘मैंगोसिल‘, गीत चतुर्वेदी की ‘पिंक स्लिप डैडी‘, मनोज रूपड़ा के ‘प्रतिसंसार‘, कुणाल सिंह के ‘आदिग्राम उपाख्यान‘ आदि को देखे जा सकते हैं । ये सारे रचनाकार सूचनाओं को अपने मानस के ‘मेल्टिंग पॉट‘ में पहले पिघलने देते हैं । सच है कि इसमें कई वर्ष लगते हैं । किन्तु उसके बाद जो ढल कर निकलता है वह मुकम्मल रचना होती है, जिसमें ढूँढे भी ‘पैच वर्क‘ नहीं मिलते ।

भाषा का तमाशा

इस रचना की दूसरी बड़ी समस्या संवादों का तत्सम प्रधान होना है । संवाद सगेन के दादा जी (ततंग) बोल रहे हों या दादी बोल रही हों, चारिबा बोल रही हो या लन्दन से शोध करने आई प्रज्ञा सबके-सब, बोल-चाल में तत्सम प्रधान हिन्दी का प्रयोग करते हैं ।

सगेन के दादा जी जम्बीरा, दादी सुकुरमनी, मेन्जारी, साथी चारिबा, जब त्यागी-महात्मा, किंवदन्ती पुरूष, वीर, स्वाभिमानी, उदारता, प्राणियों, उल्लंघन, कुकृत्य आदि शब्दों का प्रयोग करते हैं तो असहजता उभरती है। लन्दन से आई ‘प्रज्ञा‘ जो बताती है उसकी हिन्दी अच्छी नहीं है लेकिन उसके संवाद में भी कोई सावधानी नहीं बरती गई है । प्रज्ञा तो कभी-कभी ऐसी प्राञ्जल हिन्दी बोलती दिखती है कि जयशंकर प्रसाद भी शरमा जायें। किसी पात्र के उच्चारण वैशिष्ट्य की झलक पूरी पुस्तक में कहीं भी नहीं मिलती ।

वीर भारत तलवार ने अपनी युवावस्था के कई महत्वपूर्ण वर्ष सिंहभूम-खूँटी-पंचपरगना के इलाकों में घूमते-संघर्ष करते बिताई है । अपनी पुस्तक ‘झारखण्ड के आदिवासियों के बीच‘ में उन्होंने एक पूरा अध्याय ‘आदिवासियों के हिन्दी के कुछ विशिष्ट प्रयोग‘ पर लिखा है । जिसमें उनकी हिन्दी शब्द-उच्चारण के खास लहजे एवं विशिष्ट वाक्य विन्यास को खोला गया है ।

आदिवासी पात्रों के संवाद, खास अन्दाजे बयां, कहन की खूबसूरती देखनी हो तो रोज केरकेट्टा के संग्रह ‘पगहा जोरी-जोरी रे घाटो‘ की कहानियों को पढ़ना चाहिए । नई पीढ़ी के कथाकारों के सिरमौर पंकज मित्र की कहानियों में उत्तरी छोटानागपुर की बोली खोरठा के उच्चारण, शब्दों के खास बलाघात, उससे उभरी ध्वनि की खूबसूरती को परखा जा सकता है जो उनकी कहानियों की खास पहचान, सिगनेचर ट्यून बन गयी हैं ।

इस पुस्तक के संवादों के तत्सम प्रधान होने के दो कारण समझ में आ रहे हैं । लेखिका की मातृभाषा बांग्ला में तत्सम शब्द घुले मिले हैं । वहाँ वे सहज रूप से समाहित हैं। अतएव उन्हें झारखण्ड-सिंहभूम के पात्रों के संवाद में भी वे कहीं से अटपटे नहीं लगते । दूसरी बात उपन्यास के लिए शोध के दौरान पुस्तकाकार रूप में या इन्टरनेट से प्रिन्ट के रूप में जो सामग्री लेखिका को मिली वह अंग्रेजी में थी । शब्दकोश से आई अनुवाद की भाषा स्वाभाविक रूप से तत्सम ही होगी। लेकिन इसी पुस्तक की पांडुलिपि को ‘फणीश्वरनाथ रेणु कृति सम्मान‘ से सम्मानित किया गया है । शायद जन्नतनशीन शख्सीयतों के साथ मजाक की नयी रिवायत चल पड़ी है ।

‘हो‘ समुदाय का मानवशास्त्र

न जाने क्यों ऐसा लगा कि पुस्तक के प्रारम्भ के लगभग डेढ़ सौ पृष्ठों में लेखिका ‘हो‘ समाज की एक-एक प्रथा-परम्परा के बारे में बताने के लिए आतुर हैं । ऐसा भान होता है कि इन प्रथाओं से परिचित करवाने के लिए ही कहानी गढ़ी जा रही है । पृष्ठ 34 से 37 तक सगेन के दादाजी जम्बीरा के विवाह की एक-एक रस्म पृष्ठ- 38 से 39 तक बच्चे के जन्म की रस्म, पृष्ठ 41 में एकसिया संस्कार और पृष्ठ 50 से 51 मृत्यु और अन्तिम संस्कार के विवरण ।  यहाँ साफ तौर पर पाठक को जबरन एंथ्रोपोलॉजी पढ़ाने का कार्य-व्यापार का अहसास होता है ।

महुआ माजी अपनी ‘हो‘ शब्दावली ज्ञान से इतनी अभिभूत हैं कि प्रथम पृष्ठ में ही उसकी बौछार पाठक को सचेत कर देती है । पृष्ठ 11 पर प्रयुक्त शब्द ‘मोतायेन‘ के लिए मैंने दमयन्ती सिंकु की कजि-बुरू: हो-हिन्दी शब्दकोश की शरण ली । वहाँ भी उसका अर्थ नहीं मिला तो मुण्डारी टुड कोठारि (मुण्डारी शब्दकोश) की शरण में गया लेकिन वहाँ से भी कोई सहारा नहीं मिला ।    लेकिन एक सवाल मन में यह भी है कि अगर जादूगोड़ा (मरंगगोड़ा) के मुख्य निवासी संताल हैं तो उनकी संस्कृति पर लेखिका की लेखनी ने कृपणता क्यों बरती है ? भूमिज एवं अन्य समुदाय भी सिरे से गायब हैं । गैर-आदिवासी भी महरूम है चर्चा से । सिंहभूम के पूर्व निवासी सराक और भूईयाँ का तो केवल उल्लेख करके छोड़ दिया गया है ।

वैचित्र्य का आग्रह

वीर भारत तलवार अपने लेखन और व्याख्यानों में भी आदिवासी इलाकों में ट्रिप लगा कर लिखने वालों के खिलाफ कड़ी टिप्पणियाँ करते रहे हैं । अपनी पुस्तक ‘झारखण्ड के आदिवासियों के बीच‘ के पृ. 437 पर तो वे महाश्वेता देवी की इस प्रवृति के विरूद्ध ही कड़ी टिप्पणी करते हैं।

स्वाभाविक है कि सोद्देश्य घूमना भी हमारे भीतर पर्यटकीय भाव जगाता है और वैचित्र्य के प्रति आकर्षण जगाता है । वही आकर्षण अनायास इस रचना में भी आया है । उदाहरण के तौर पर भोजन में भात के साथ ‘लाल चीटों की चटनी‘ (पृ. 24), भुने पंखहीन फतिंगे के साथ भुना भात (पृ. 128) आदि । यह आदिवासी समाज का दैनंदिन का भोजन नहीं है । यह समय-परिस्थिति विशेष का, कभी-कभार का भोजन है । यह लेखिका भी जानती हैं किन्तु वैचित्र्य के आग्रह के कारण यह विवरण पुस्तक में इस रूप में आया है मानो यह आदिवासियों का रोजमर्रा का भोजन हो । आखिर आदिवासी हमसे अलग जो ठहरे ।

उसी प्रकार आदिम एवं अल्प संख्यक बिरहोड़ों के प्रति जो बड़े आदिवासी-गैर आदिवासी समुदायों की हिकारत भरी किंवदन्तियाँ-अफवाहें हैं वे यथार्थ-वर्णन के रूप में आई हैं । सच तो यह है कि बन्दर खाते या अपने बुजुर्गों को मार कर खाते न सुना गया न देखा गया । यह धिक्कार-घृणाभाव समाज के स्तरीकरण का परिणाम भर है इसे समाजशास्त्री लेखिका से बेहतर कौन जान सकता है ।

असुर इस इलाके के सबसे प्राचीनतम अधिवासी हैं, जिन्हें पहले मुण्डाओं ने पराजित किया फिर उराँवों ने । पराजित कौमों को खल-राक्षस साबित करना हर वर्चस्वशील संस्कृति की खासियत रही है यही मुण्डाओं के सोसोबोंगा गीतिकथा का सत्य है । लेखिका इस विश्लेषण में नहीं जाती । नयेपन के आकर्षण में सुनी-सुनाई बातों, किंवदन्तियों, घृणा-धिक्कार भाव को हुबहू प्रस्तुत कर देती हैं ।

नाजुकी उनके दामन की क्या कहिए

यूरेनियम के खनन, नाभिकीय ऊर्जा, परमाणु बम एवं विकिरणयुक्त कचरा का निपटान इतने वृहद् और इतने मानवीय विषय हैं कि ईमानदार विश्लेषण के क्रम में पूरी दुनिया का सत्ता तंत्र और पूंजी तंत्र नंगा नजर आता है । कल्याणकारी राज्य, समता-आजादी-भ्रातृत्व पर आधारित जनतंत्र, हाशियाकृत समुदायों के मानवाधिकार हनन के विलाप से दिगन्त गूँजाती मीडिया, प्राण और देह की आजादी, हरेक को गरिमा पूर्ण जीवन जीने का हक आदि-आदि सबके सब प्राणहीन खोखले शब्द मात्र हैं, बस बातें हैं और बातों का क्या ? केवल जादूगोड़ा ही क्यों दुनिया के हर यूरेनियम उत्पादक देशों का आदिवासी इलाका ‘बलि दिया हुआ क्षेत्र‘ में बदल दिया गया है जहाँ उपर्युक्त चारों गतिविधियाँ अनवरत चल रही हैं ।

जादूगोड़ा (मरंगगोड़ा) में न केवल वहाँ के यूरेनियम खानों और मिल के विकिरण युक्त कचरे की डम्पिंग होती है बल्कि यूरेनियम की पीली खल्ली जादूगोड़ा से ‘न्यूक्लियर फ्यूल कॉम्पलेक्स‘, हैदराबाद पहुँचती है । प्रसंस्करण के बाद हैदराबाद से भी विकिरण युक्त कचरा लाकर पुनः जादूगोड़ा में ही डम्प होता है । इसके अलावे बी.आर.सी. रेफर मटेरियल्स प्लान्ट, मुम्बई एवं देशभर के चिकित्सा केन्द्रों के विकिरणयुक्त कचरे भी यहीं आ कर डम्प होते हैं । यह होता है खालिस ‘बलि दिया हुआ क्षेत्र‘ । मुख्यधारा के नागरिकों के स्वास्थ्य के साथ क्यों खिलवाड़ किया जाए उसके लिए आदिवासी तो हैं ही । जेवियर डायस, घनश्याम बिरूली इसे जेनोसायड मानते हैं जो कथित ‘राष्ट्रीय‘ नाभिकीय नीति का अन्तरंग हिस्सा है । यह तथ्य एक अलग तरह की तीक्ष्णता, टकराव, तनाव, संवेदना की माँग कर रहा था । स्वाभाविक है इसके बाद निजाम से सीधे टकराहट होती । ऐसे अप्रिय सवालों के अति तीक्ष्ण नोकों को ढ़ंका नहीं जा सकता । यह रचना ऐसे टकराहटों विवादों से बचने की कोशिश करती जान पड़ती है ।

मेघालय के खासी हिल्स जिले के छात्र-युवाओं-एक्टिविस्टों ने अनवरत संघर्ष कर 1990 में अपने यहाँ के यूरेनियम खानों को बन्द करवा दिया जबकि उस खनन के पक्ष में स्वयं पूर्व राष्ट्रपति एवं न्यूक्लियर वैज्ञानिक श्री ए.पी.जे अबुल कलाम खड़े थे । अतः इस प्रसंग से भी यह रचना किनारा करती है । विवादों में कौन पड़े ?

यूरेनियम या रेडियोधर्मी धातुओं से जुड़ी तीन लड़ाइयाँ दशकों से लड़ी जा रही हैं । पहली लड़ाई तो यूरेनियम के खनन को ही बन्द करने के सवाल को लेकर है, दूसरी लड़ाई खनन, कचरे, डम्पिंग का आदिवासी समुदायों के संहार और पर्यावरण विनाश से जुड़ी है । अन्तिम और तीसरी लड़ाई परमाणु निरस्त्रीकरण को लेकर है जिससे शोवेनिज्म, निजाम और पूँजी ज्यादा गहराई से जुड़ी है । यह रचना इस तीसरे सवाल पर सायास चुप्प सी रहती है ।

झारखण्डी ऑर्गनाइजेशन अगेंस्ट रेडिएशन (जोआर, उपन्यास में मोआर) 24 फरवरी 2004 को टूट गया । जेवियर डायस (जॉन डायस) वापस बिरसा संस्था में लौट गये । इन्टरनेट पर जेवियर डायस बनाम घनश्याम बिरूली एवं श्रीप्रकाश के टकराव पर कई सामग्री, आरोप-प्रत्यारोप सप्रमाण उपलब्ध हैं । दरअसल इन्हीं मानवीय टकरावों-अन्तद्र्वन्द्वों में, ईष्र्या-द्वेष, लोभ-लालच के बीच जिन्दगानी धड़कती है । यहीं कथा के सच्चे सूत्रों से भेंट होती है । कथारस का सोता इन्हीं द्वन्द्वों-तनावों से फूट कर निकलता है । किन्तु लेखिका यहाँ भी दामन बचा कर निकल लेती हैं।

घनश्याम बिरूली (सगेन) और उनके साथियों के सक्रिय होने के दशकों पहले 1979 में नक्सली नेता सत्यनारायण सिंह ने इस इलाके में ‘इन्डियन फेडरेशन ऑफ ट्रेड यूनियन‘ को सक्रिय किया था । सबसे पहले इसी संगठन ने ‘राखा कॉपर माईन्स‘ में खनिकों के लिए ‘रेडिएशन भत्ता‘ की माँग की थी । किन्तु नक्सल सहानुभूति के ठप्पे से बचने के लिए इस घटना का उल्लेख तक इस रचना में कहीं नही है ।

कामरेड सत्यनारायण सिंह की तो छोडि़ए लेखिका को अरून्धति राय के नाम लेने से भी परहेज है । केवल संकेत से काम चलाया गया है । (पृ. 200)

वामपंथी फिल्मकार आनन्द पटवर्द्धन यहाँ अनूप पटवर्द्धन के रूप में प्रकट होते हैं (पृ. 201) । जबकि सेलीब्रिटी एक्टिविस्ट सुनीता नारायण, रमन मैग्ससे पुरस्कार विजेता संदीप पाण्डेय क्रमशः पृ. 364 एवं पृ. 201 पर अपने सही नाम-धाम-काम के साथ मौजूद हैं ।

मेघा पाटेकर को सुमेधा पाणिकर क्यों बनना पड़ा ? (पृष्ठ 181) राँची की प्रतिष्ठित- जझारू पत्रकार-लेखिका वासवी किड़ो क्यों पल्लवी में तब्दील हुई ? जबकि शैलेन्द्र महतो, स्व. देवेन्द्र माँझी, मचुआ गगराई, सुले पूर्ति, निरल इनेम होरो, स्व. विनोद बिहारी महतो, दिशम गुरू शिबू सोरेन जैसे ढेरों लोग अपने सही नाम-काम के साथ रचना में यत्र-तत्र उपस्थित हैं। इस कृति में ‘नाम‘ उल्लेख भी सुचिन्तित, योजनाबद्ध, राजनीति-रणनीति के तहत लगता है । जिनका भविष्य में अब उपयोग नहीं होना उनका नाम परिवर्तित कर दिया गया है । जिनसे भविष्य में लाभ होना है वे अपने पूरे नाम-धाम के साथ मौजूद हैं । जिनसे विवादास्पद होने का भय है उनके नाम लेने से भी परहेज किया गया है ।

प्रज्ञा की दुविधा या लेखिका की

लन्दन से माओवाद पर समाजशास्त्रीय शोध करने आई प्रज्ञा सारंडा का पर्यटकीय भ्रमण कर ही सब कुछ जानना चाहती हैं । सारंडा भ्रमण के क्रम में चारिबा, हत्या आदि कुछ घटनाओं का उल्लेख करती है और बातचीत में ग्रामीणों के शोषण उनकी नक्सलियों के प्रति सहानुभूति, नक्सली नेताओं की गिरफ्तारी आदि की सूचना भी सामने आती है । (पृ. 286)

उसके बाद एक अध्याय ‘फायर ऑफ द फॉरेस्ट‘ में सारंडा की अशान्ति पर चिन्ता जताते हुए अखबारी कतरनों की सूची-विवरण प्रस्तुत किया जाता है । अब तक शोधार्थी माओवाद से फिसलकर उग्रवाद पर पहुँच चुकी है । एक नक्सली नेता का इनकाउटंर, पुलिसकर्मियों का जीप उड़ाया जाना, कुछ सैद्धान्तिक-सूचनात्मक बातें बस। माओवाद, नहीं उग्रवाद पर शोध खत्म।

माओवाद पर प्रोजेक्ट करने की दुविधा बस यही है कि यहाँ कोई बीच का रास्ता नहीं हो सकता । दामन की नजाकत नहीं बचाई जा सकती । अगर आप जनपक्षधर होंगे, ‘पोलिटिकली करेक्ट‘ होना चाहेंगे तो निजाम की आँखों की किरकिरी हो जायेंगे । दूसरी ओर सत्ता-प्रतिष्ठान और कॉरपोरेट नियंत्रित मीडिया की सुनेंगे तो उग्रवाद और हिंसा के अलावा कुछ और दिखेगा ही नहीं । साथ ही जनपक्षधरता की छवि भंग होने का खतरा अलग । खतरे दोनों हालत में हैं। अतः बेहतर यही है कि माओवाद के बदले मरंगगोड़ा की महिलाओं की सामाजिक स्थिति पर प्रोजेक्ट किया जाए।

बदशक्ल और बदअक्ल लोग ब्रान्ड एम्बेस्डर नहीं हुआ करते

एशिया का सबसे सघन वनों में एक ‘सारंडा‘ वैसे सैलानियों के लिए जिन्हें थोड़ा सा ऐडवेंचर, थोड़ी सी खतरे से खेलने की चाह रही हो उनके लिए दुर्दम्य आकर्षण केन्द्र रहा है। प्रज्ञा, आदित्यश्री, चारिब और अभिषेक के साथ पाठक पृष्ठ 225 से 326 तक लगभग सौ पृष्ठ तक सारंडा की यात्रा करता रहता है । एक ही यात्रा में मयूर, हिरण, हाथी, जंगली भैंसे सबसे भेंट होती है । पलाश के नारंगी और सखुआ फूलों के श्वेताभ सौन्दर्य से मदमाता जंगल, झरने का अलौकिक संगीत और प्रकृति की लुका छिपी । बीच-बीच में ‘हो‘ लोक कथा, इतिहास, लको बोदरा की वारड्चिति लिपि से भेंट, यही तो है झारखण्ड पर्यटन विभाग का अतुल्य-अद्वितीय झारखण्ड, रूमानी निगाहों से फील गुड करवाता, आमंत्रण देता, लुभाता । 

उफ यह नशा: भाग डी के बोस

यह रचना कथारस को गति देने के लिए जापानी युवती मोमोका-आदित्यश्री और प्रज्ञा-आदित्यश्री के प्रेम-प्रसंगों को पतवार बनाती है । मोमोका-आदित्यश्री और जापान में उतरा हुआ वसंत, सकुरा फूल की खूबसूरती एक बेहतरीन रूमानी परिवेश रचते हैं । किन्तु प्रज्ञा की मुखर यौनिकता अखरती है ? यहाँ कहन में घुली-मिली नहीं अलग से रेखांकित होती हुई यौनिकता मौजूद है यथाः “बंजर कहाँ ? देखकर तो लगता है अभी अभी जागी है अलसाई नींद से ! ”प्रज्ञा सोचती है,“ जरूर किसी के इन्तजार में अपनी देह बिछाए तैयार पड़ी होगी ।” प्रज्ञा के होठों पर शरारती मुस्कुराहट उभरती है ।” कौन हो सकता है वह शख्स ? अच्छा, अच्छा समझी ! हल ! हल का स्पर्श पाने को ही बेचैन होगी इसकी कामुक देह ! ... और उसका कोमल स्पर्श पाते ही अथवा उसके द्वारा क्रूरता से रौंदे जाते ही पैदा करेगी फसल !” (पृष्ठ 262)

प्रज्ञा-आदित्य के सेन्सुअस संवाद के क्रम में हवा कुछ ज्यादा ही हल्की ज्यादा स्तरहीन हो गई लगती है:
“जी नहीं । फिलहाल मुझे न तो किसी पाइप लाइन से नीचे उतरना पसन्द है और न ही किसी पाइप लाइन के सहारे किसी के अन्दर !” वाक्य के अन्तिम शब्दों को कुछ ज्यादा ही चबा चबा कर बोला आदित्यश्री । (पृ. 387)

नाम में क्या रखा है 

मरंगगोड़ा (मरंग: बड़ा, गोड़ा: समतल मैदान) ‘हो - संताल‘ समुदायों के इलाके का नाम है। दोनों संस्कृतियाँ अत्यन्त समृद्ध एवं विशिष्ट धार्मिक, आध्यात्मिक पृष्ठभूमि से सम्पन्न हैं। अतएव मंरगगोड़ा के साथ शीर्षक के लिए ‘हो‘ या ‘संताल‘ मिथकों से ही किसी शब्द का चयन किया जाना चाहिए था । वैसे ‘नीलकंठ‘ का मिथक समुद्र मंथन से निकले हलाहल का पान कर पूरी सृष्टि को उसके संहार से बचाने का है । किन्तु मरंगगोड़ा या जादूगोड़ा अपने यूरेनियम खनन, प्रसंस्करण, परिवहन और कचरेपन के हलाहल से मानवता के संहार में लगा है। इस रेडियोधर्मी तत्व की विनाशलीला यहीं तक नहीं रूकती । मई 1998, पोखरन विस्फोट के चार साल बाद मुख्य भूमिका निभाने वाले न्यूक्लियर वैज्ञानिक महामहिम हो गये, राष्ट्र के प्रथम नागरिक किन्तु पोखरन के आस-पास के उन गाँव वालों का क्या हुआ जिन्हें विस्फोट के मात्र तीन घंटे पहले घर खाली करने को कहा गया । विस्फोट के बाद उनके खेत-घर सब रेडियोधर्मी धूल से भर गए । उनके देह-प्राण के संकट, धीमी मौत पर सब मौन हैं । (इकोनॉमिक एण्ड पोलिटिकल वीकली, अगस्त 22, 2009 पृ. 47) यानी यूरेनियम जैसा रेडियाधर्मी तत्व अपने हर रूप में जनसंहारक है । यह चरित्र तो ‘भष्मासुर‘ का है नीलकंठ महादेव शिवशंकर का नहीं । तो ‘मरंगगोड़ा नीलकंठ कैसे हुआ ?‘

आवरण-चित्र: आदिवासी ऐसे ही होते हैं

आवरण पर बैसन नृत्य के लिए तैयार बस्तर का आदिवासी युवा, चिन्ता की मुद्रा में दिख रहा है । चिन्ता आँखों में बाद में झलकती है उसके मुरैठे में सजा हुआ सींग पहले दिखता है जबकि पूरी पुस्तक में न बस्तर का जिक्र हुआ है, न बैसन नृत्य का और न मुरिया आदिवासियों का । तो फिर यह सींग सजा चित्र क्यों ? क्या यह मुख्य धारा की रूढ़ अवधारणा को और मजबूत नहीं करेगा जिसमें आदिवासी ‘अन्य‘ हैं, कुछ अलग जैसे, उत्सुकता जगाने वाले, थोड़े दया के पात्र, थोड़े डरावने भी ।

और अन्त में 

वीर भारत तलवार से क्षमायाचना के साथ कि ट्रिप लगा कर ही रामशरण जोशी ने ‘आदमी, बैल और सपने‘ जैसी महत्वपूर्ण कृति रची थी वैसी ही महत्वपूर्ण-स्मरणीय कृति महुआ जी ने भी रची है । ‘मरंगगोड़ा नीलकंठ हुआ‘ ने साफ-सुथरी ऊर्जा और अतिराष्ट्रवाद के घने घटाटोप से ढंके ‘बलि दिए हुए क्षेत्रों‘ के आतंककारी यथार्थ और मौन संहार के हाहाकार को जिस प्रतिबद्धता और जुनून के साथ आवाज दी गई है उसके लिए महुआ माजी लाख-लाख बार बधाई की पात्र हैं । यह सघन वैचारिक कृति सविस्तार, बहुआयामी प्रमाणों के साथ दुनिया भर के सत्ता प्रतिष्ठानों का मुखौटा उतारती है । लेखिका की प्रतिभा, परिश्रम और प्रतिबद्धता के प्रति सम्मान हमारे मन में बढ़ा है । एक बार पुनः लेखिका के जुनून को सलाम । अपने अछूते-अनूठे विषय और बहुआयामी प्रस्तुति के लिए यह कृति संसार के बड़े से बड़े पुरस्कार की हकदार है । यही हमारी सात्विक कामना भी है ।

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ “ईमाँ मुझे खैंचे है तो रोके है मुझे कुफ्र” ”

  2. By vibha rani on July 6, 2012 at 3:03 PM

    रणेन्द्र कुमार का यह लेख नया ज्ञानोदय मे पहले ही आ चुका है। बेहतर होता की लेख को यहा^ देने से पहले इसका सौजन्य भी दे दिया जाता। सुना है की इस पर महुआ माजी का आलेख नया ज्ञानोदय के नए अंक मे आया है। उसे भी सामने रखें, ताकि पाठकों को एक दूसरे की बातें समझने मे आसानी हो सके।

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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