हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

आतंक के साए में आम झारखंडी

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/04/2012 04:44:00 PM

कुछ समय पहले लेखकों, पत्रकारों, मानवाधिकार और सामाजिक कार्यकर्ताओं का एक दल झारखंड में चलाए जा रहे ऑपरेशन ग्रीन हंट के शिकार आदिवासियों से मिलने और जमीनी हालात का जायजा लेने गया. लौटने के बाद इस जायजे की आतंक के साए में आम झारखंडी नामक इस रिपोर्ट  के लिखे जाने और इसके प्रकाशन के संदर्भ में जो कुछ हुआ, उसे खुद इस रिपोर्ट की भूमिका में इस दल के कुछ सदस्यों ने साफ किया है. इस लंबी रिपोर्ट को सिलसिलेवार तरीके से हाशिया पर पोस्ट किया जाएगा. इसी के साथ यहां पूरी रिपोर्ट भी पोस्ट की जा रही है. शुरुआत रिपोर्ट की भूमिका से. इस रिपोर्ट को व्यक्तिगत रूप से प्रशांत राही और चंद्रिका ने हमें उपलब्ध कराया है.

 

भूमिका

बिहार से अलग होकर झारखण्ड को राज्य बने एक दशक से ज्यादा बीत चुका है. इस दौरान राज्य ने विस्थापन-विरोधी जनसंघर्ष और राजकीय सैन्य दमन की एक नयी सूरत देखी है. एक ओर जल, जंगल, ज़मीन के अधिकार को लेकर तेज होते अनेक जन संघर्ष, तो दूसरी ओर ‘ऑपरेशन ग्रीन हंट’ के नाम से केंद्र एवं राज्य सरकार द्वारा संयुक्त रूप से संचालित राजकीय दमन की जोरदार मुहीम. ‘ऑपरेशन ग्रीन हंट’  देश के अलग-अलग राज्यों के मुख्यतः आदिवासी-बहुल इलाकों में चलाया जाने वाला एक ऐसा अभियान है जिसके अन्तर्गत केन्द्र सरकार ने विभिन्न प्रादेशिक सरकारों के साथ मिलकर पिछले 2-3 सालों से सीआरपीएफ, कोबरा और विभिन्न क्षेत्रीय नामों से सैन्य बलों को माओवादियों को निशाना बनाने की कार्यवाही के लिए लगाया हुआ है. माओवादियों को निशाना बनाने के लिए चलाये जा रहे इस अभियान के तहत अन्य जन आंदोलनों का दमन भी पहले से ज्यादा तीव्रता के साथ हो रहा है (‘ऑपरेशन ग्रीनहंट’ क्यों चलाया जा रहा है, इस विषय में कुछ बातें इस रिपोर्ट के दूसरे हिस्से में विचारार्थ प्रस्तुत की गयी हैं).

यह राज्य द्वारा बढ़ता सैन्यीकरण किसी युद्ध की तैयारी जैसा लगता है. जैसे राज्य “अपने” ही लोगों के खिलाफ ‘लो इन्टेन्सिटी कान्फ्लिक्ट’ (निम्न तीव्रता वाली जंग) में उलझा हो. झारखण्ड के गांवों में सैन्य बलों के इस अभियान के तहत आगजनी, घरों के उजाड़े जाने और दमन के तमाम रूपों की जो खबरें बड़े महानगरों तक छन-छन कर आती हैं उनकी तह में जाने की ज़रूरत लंबे समय से रही है. इन खबरों ने  लोकतांत्रिक दायरों में स्वाभाविक तौर से इन चिंताओं को जन्म दिया है कि कहीं कारपोरेट लालच के चलते खनिज संपदाओं से सर्वाधिक समृद्ध इस राज्य के गांवों से लोगों को विस्थापित तो नहीं किया जा रहा है? युवा अब अपनी आजीविका के साथ ही सुरक्षा के खातिर भी अन्य राज्यों की ओर पलायन करने को मजबूर तो नहीं कर दिये जा रहे हैं? छत्तीसगढ़ के सलवा जुडूम की तर्ज़ पर क्या यहाँ भी माओवादियों की खोज के नाम पर आदिवासियों का दमन तो नहीं हो रहा?

केंद्र और राज्य सरकार, दोनों के ही सुरक्षा बलों का बीते दिनों कई गुना विस्तार हुआ है. फिर भी क्रमशः कानून और व्यवस्था राज्य के हाथ से केंद्र अपने हाथ में ले रहा है. हमने देखा  कि आधुनिक हथियारों से लैस अर्द्धसैनिक बलों के कैंप ज्यादातर स्कूलों और कॉलेजों में ही जगह घेर बैठे हैं. इनके अलावा जगह-जगह अब अलग से बड़े-बड़े स्थायी कैम्पों का निर्माण भी होता दिखायी देता है. हमें पता चला कि सीआरपीएफ ने यहां के स्थानीय पुलिस बल के हाथों से उनके अधिकार छीनना शुरू कर दिया है. बदले समीकरणों का अंदाजा तथ्य संकलन के दौरान इस खुलासे से भी हुआ कि ट्रैफिक पुलिस के काम को कुछ जगह सीआरपीएफ ने अपने हाथों में ले लिया है. स्थानीय पुलिस की भूमिका क्रमशः नगण्य होती जाने की सम्भावना यहाँ वास्तविक है. हज़ारों की तादाद में झारखंड सशस्त्र पुलिस (जैप), झारखण्ड जैग्वार, केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सी.आर.पी.एफ.), कमांडो बटालियन फार रेजोल्यूट एक्शन (कोबरा), आदि बलों की तैनाती और ‘काउंटर इंसर्जेन्सी एवं जंगल युद्ध कौशल प्रशिक्षण स्कूल’ की स्थापना ने झारखण्ड को देशव्यापी ‘ऑपरशन ग्रीन हंट’ के नक़्शे पर लक्षित प्रमुख राज्यों की अगली कतार में ला खड़ा किया है. सी.डी.आर.ओ. के तत्वावधान में गठित हमारा जांच दल जनता के खिलाफ उग्रतर होते इस युद्ध की ज़मीनी हकीकत से रूबरू होकर जनजीवन की सुरक्षा के पहलुओं के मद्देनज़र कोई सामान्य समझदारी विकसित करने निकला था.

ऐसी स्थिति में हमारे दल के सामने अपनी जांच के सन्दर्भ में फौरी तौर पर यह सवाल था कि देश की आतंरिक सुरक्षा खतरे में होने का दावा कर सुरक्षा के उपाय के तौर पर छेड़े गये इस आपरेशन का ज़मीनी स्तर पर क्या असर पड़ रहा है? कभी सुरक्षा तो कभी विकास के नाम पर क्या आदिवासियों के लोकतांत्रिक और संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ है? आम झारखंडी की सुरक्षा बढ़ने के बजाय क्या उस पर सरकारी बलों के आतंक का साया तो नहीं मंडरा रहा है? जहाँ-जहाँ मानवाधिकारों को पैरों तले रौंदा गया है, उस अन्याय और अत्याचार को रोकने और दुरुस्त करने की क्या सम्भावनाएं दिखायी देती हैं? क्या पिछले जांच दलों के दौरों या किसी भी प्रकार शिकायतें दर्ज किये जाने के बाद कोई भरपाई या कोई भी सकारात्मक कार्यवाही हुई है? क्या पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों से लेकर जवानों तक के दोष-निवारण के कोई उपाय किये जा रहे हैं? क्या भविष्य में ऐसी कोई उम्मीद है?

इस पूरे परिदृश्य के गर्भ में लोकतांत्रिक अधिकारों के सन्दर्भ में यह सवाल भी पल रहे हैं कि आपरेशन ग्रीनहंट के बाद से यहाँ का जन आंदोलन आज कहाँ खड़ा है? क्या यह परिस्थिति झारखण्ड को सचमुच गृह युद्ध की ओर धकेल रही है? अगर हाँ, तो इस युद्ध के क्या कोई नियम भी होंगे? अगर आज ऐसे नियमों के कोई आसार न दिख रहे हों, तो भी भविष्य में किसी प्रकार के लोकतान्त्रिक और लोकपक्षीय समाधान के तौर पर दोष-निवारण का क्या कोई  मेकैनिज्म (प्रणाली) इजाद किया जायेगा?

उपरोक्त फौरी सवालों का जवाब ढूंढने और भविष्य के सवालों के सन्दर्भ में न्यूनतम समझदारी विकसित करने की मंशा से आयोजित इस जाँच में सबसे पहले झारखण्ड के पश्चिमी छोर पर छोटा नागपुर पठार की पीठ पर बसे तीन जिलों का व्यापक दौरा किया गया. जिस दौरान कुछ गाँवों में कुछ परिवारों के साथ विस्तृत बातचीत की गयी. इस पहले चरण में पलामू को छूते हुए मुख्यतः लातेहार और गढ़वा जिलों में स्थानीय मानवाधिकार संगठनों की मदद से चिह्नित किये गये मानवाधिकार उल्लंघन के लगभग दर्ज़न भर मामलों से सम्बन्धित तथ्य जुटाये गये. विभिन्न राज्यों में नागरिक स्वतंत्रता और लोकतान्त्रिक अधिकारों के लिए संघर्षरत संगठनों और व्यक्तियों को लेकर गठित की गयी इस अखिल भारतीय टीम का पहला दौरा 25 मार्च 2012 की सुबह प्रदेश की राजधानी रांची से आरम्भ हुआ और लौटकर 30 मार्च को उसी शहर में आयोजित पत्रकार वार्ता के साथ समाप्त हुआ. जहां जाँच दल ने अपने अंतरिम निष्कर्ष लिखित और मौखिक रूप से पेश किये. इसके अगले चरण में जांच दल ने 20-23 मई 2012 को सारंडा और उससे जुड़े पोड़ाहाट क्षेत्र का दौरा किया. सारंडा पहाड़ों और जंगलों में बसे गावों का वही दूरस्थ क्षेत्र है जहां सरकारी बलों ने ऑपरेशन ग्रीनहंट के तहत अगस्त 2011 में ऑपरेशन एनाकोंडा के नाम से केंद्रीकृत सघन सैन्य कार्रवाई चलायी थी. आज भी लगातार सैन्य बलों द्वारा गांवों में क्रूर दमन और लूटपाट जारी है. दोनों दौरों की संयुक्त रिपोर्ट भाग एक और दो के रूप में इस पुस्तिका में शामिल है. जिससे अपने को लोकतांत्रिक कहने वाले भारतीय राज्य के तमाम दावों की सच्चाईयां और उसके पीछे निहित आशय उघड़ कर सामने आ सकते है.
  
अपने इन दौरों से देश को झारखण्ड में जन जीवन की सुरक्षा से सम्बंधित हालात से वाकिफ कराने के लिए सी.डी.आर.ओ. के तत्वावधान में निकले दो जांच दलों में से पहले में निम्न संगठनों के निम्न व्यक्ति शामिल रहे:

शशि भूषण पाठक, अलोका कुजूर एवं लिक्स रोज (पी.यू.सी.एल., झारखण्ड); अफज़ल अनीस (यूनाइटेड मिल्ली फोरम, झारखण्ड); इप्सिता पति (संवाददाता, ‘द हिन्दू’, रांची); शाहनवाज़ आलम एवं राजीव यादव (पी.यू.सी.एल., उत्तर प्रदेश); गौतम नवलखा एवं मेघा बहल (पी.यू.डी.आर., दिल्ली); नरसिम्हा रेड्डी (ओ.पी.डी.आर., आन्ध्र प्रदेश); अमर नंद्याला (ह्यूमन राइट्स फोरम, आन्ध्र प्रदेश); मनिश्वर (कमेटी फार पीस एंड डेमोक्रेसी, मणिपुर, दिल्ली) और वर्धा, महाराष्ट्र से चन्द्रिका एवं उत्तराखंड से प्रशान्त राही (दोनों स्वतंत्र पत्रकार). विभिन्न स्थानों पर मुख्यतः पी.यू.सी.एल. के स्थानीय मानवाधिकार कार्यकर्त्ता और विभिन्न समाचार पत्रों एवं न्यूज़ चैनलों के संवाददाता इस दौरे में शामिल होते रहे. उनके प्रति पूरा सम्मान और आभार प्रकट करते हुए हमें यह खेद है कि उनकी अधिक संख्या और स्थानाभाव के चलते सब के नाम दर्ज करना फिलहाल संभव नहीं हो पा रहा है.

जांच के दूसरे, अर्थात सारंडा-पोडैयाहाट क्षेत्र में जाने वाले दल में शशि भूषण पाठक, आलोका कुजूर, मिथिलेश कुमार एवं संतोष यादव (पी.यू.सी.एल., झारखण्ड); पुनीत मिंज (झारखण्ड माइन्स एरिया को-आर्डिनेशन कमेटी – जमैक); चिलुका चंद्रशेखर, नारायण राव एवं आर. राजनन्दम (ए.पी.सी.एल.सी., आन्ध्र प्रदेश); प्रीतिपाल सिंह एवं नरभिंदर सिंह (ए.पी.डी.आर., पंजाब); शाहनवाज़ आलम एवं राजीव यादव (पी.यू.सी.एल., उत्तर प्रदेश); गौतम नवलखा, मेघा बहल एवं श्रुति जैन (पी.यू.डी.आर., दिल्ली) और वर्धा, महाराष्ट्र से चन्द्रिका एवं उत्तराखंड से प्रशान्त राही (दोनों स्वतंत्र पत्रकार) शामिल थे. इस चरण में कुछ-एक सामाजिक कार्यकर्ताओं की ओर से न्यूनतम स्थानीय मार्गदर्शन प्राप्त हुआ.

दो चरणों में ज़मीनी जांच करने वाले उपरोक्त दल के सामूहिक निर्णय के अनुसार नियुक्त की गयी लेखकों की टीम ने 26 जून, 2012 को इस रिपोर्ट को अंतिम रूप दिया. जांच दल के इन सर्वसम्मति से चुने हुए लेखकों की समझ से यह रिपोर्ट झारखण्ड के ज़मीनी यथार्थ को बिना किसी लाग-लपेट के, तथ्यपरक रूप से प्रस्तुत करती है. परन्तु सी.डी.आर.ओ. नामक जिस संस्था के तत्वावधान में यह जांच आयोजित हुई, उसके नेतृत्व की ओर से इसे हूबहू प्रकाशित करने या न करने को लेकर पूरे एक सप्ताह तक ऊहापोह की स्थिति बनी रही. यह स्थिति स्वतंत्र मानवाधिकार संगठनों के इस साझे मंच के भीतर की नीतिगत बहसों से उपज रही थी. चूंकि सी.डी.आर.ओ. नीतिगत कारणों से इस रिपोर्ट की ज़िम्मेदारी लेने को तैयार नहीं हो पा रहा था, अतः इसे तैयार करने वाले लेखकों में भारी असंतोष का पनपना स्वाभाविक था. नीतिगत बहस का मुख्य मुद्दा इस रिपोर्ट में शामिल माओवादी नेताओं का साक्षात्कार बताया जा रहा था. चूँकि मानवाधिकार कार्यकर्ता इस सवाल पर बंटे रहे कि जांच के दौरान अप्रत्याशित रूप से हमारे सामने पड़े माओवादियों से पूछे गये अपने सवालों के जवाब अपने इस सांझे मंच के तत्वावधान में सार्वजनिक कैसे किये जायें, अतः हम कुछ लेखकों ने इसे सार्वजनिक करने का साहस करने का व्यक्तिगत फैसला कर लिया. पहले से ही काफी विलंबित इस रिपोर्ट को और अधिक लटकाये जाने की सम्भावना देख, हम अंततः आज इसे सार्वजनिक करने जा रहे हैं. छत्तीसगढ़ के बीजापुर क्षेत्र में हुई ताज़ी घटना के मद्देनज़र झारखंड में डेढ़ से लेकर साढ़े तीन माह पहले तक हुई इस जांच की रिपोर्ट पर पर्दा उठा देना हमें अब निहायत ज़रूरी मालूम हो रहा है. किसी संगठन विशेष के अपने फैसलों और देश के पैमाने पर आम जन के हित के बीच किसको वरीयता दी जाये? इसी बात को लेकर दुविधा के लंबे दौर से गुजरने के बाद इस तथ्यपरक रिपोर्ट को आखिरकार शोषित-उत्पीडित आदिवासी जनता के नाम समर्पित किया जा रहा है.
रिपोर्ट लेखन टीम के कुछ सदस्य
जुलाई 04, 2012

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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