हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

भारतीय अर्थव्यवस्था: डगमगाते घोड़े की सरपट दौड़

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/03/2012 12:37:00 PM

भारतीय अर्थव्यवस्था की मौजूदा दशा पर कोबाद गांधी द्वारा लिखे जा रहे चार लेखों में से यह पहला है. गांधी तिहाड़ जेल में बंद मार्क्सवादी/माओवादी विचारक हैं. उन्होंने दो किताबें लिखी हैं: भारतीय अर्थव्यवस्था पर (वैश्वीकरण, भारत की संप्रभुता पर हमला, 2004) और दूसरी विश्व अर्थव्यवस्था पर (कैपिटलिज्म इन कोमा, 2009). ये लेख मेनस्ट्रीम पत्रिका में क्रमवार रूप से प्रकाशित हुए हैं. अनुवाद: रेयाज उल हक

पिछले साल सितंबर में मध्य में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बारहवीं पंचवर्षीय योजना के अप्रोच पेपर (दृष्टिकोण पत्र) को मंजूरी दी. इस साल 15 मार्च को वित्त मंत्री ने 2012-13 का बजट पेश किया. दोनों में अच्छे इरादे व्यक्त किए गए थे, हालांकि बदकिस्मती से ऐसे ही इरादे वास्तविक योजना नीति या बजटीय कार्यान्वयन में नहीं दिखाए गए लगते थे.

बारहवीं योजना के लिए गढ़ा गया नारा था: ‘तेज, टिकाऊ और अधिक समावेशी वृद्धि’. अपने बजट भाषण में वित्त मंत्री ने इसका उल्लेख किया कि बजट का मुख्य मकसद ‘संकट से उबरने के लिए घरेलू मांग पर आधारित वृध्दि पर जोर देना’ था. चाहे कोई ‘समावेशी वृद्धि’ कहे या ‘घरेलू मांग पर आधारित वृद्धि’, दोनों का मतलब एक ही है- लोगों की खरीदने की ताकत को बढ़ाना ताकि औद्योगिक गतिशीलता को तेज किया जा सके और इस तरह समग्रता में वृद्धि को आगे बढ़ाया जा सके.

अगर सचमुच में ऐसी एक नीति लागू की जाती है तो उसके नतीजे में अभूतपूर्व वृद्धि का ऊपर की ओर बढ़ता हुआ एक चक्र पैदा होगा, जिसे घरेलू कारक तय करेंगे न कि अंतरराष्ट्रीय समर्थन. अधिक औद्योगिक गतिविधि का मतलब अधिक रोजगार होगा और अधिक रोजगार का मतलब खरीदने की ताकत में और अधिक इजाफा होगा...इसी तरह वृद्धि और तरक्की का ऊपर की ओर बढ़ता हुआ चक्र जारी रहेगा.

अवधारणा तो मुकम्मल है, खामी इसको लागू करने में है. जो नीतियां अब तक लागू की गई हैं, दुर्भाग्य से वे घोषित इरादों के साथ मेल नहीं खातीं. इन्होंने संरचनात्मक विकृतियों को जन्म दिया है. इन्होंने एक विकृत अर्थव्यवस्था को रचा है जो अधिकतर विदेशी मदद पर निर्भर रहते हुए उठती-गिरती रहती है.

चार हिस्सों वाले इस लेख के पहले हिस्से में मैं कुछ संरचनात्मक विकृतियों को पेश करूंगा और मौजूदा हालात का एक जायजा भी लूंगा. बाद में आनेवाले हिस्सों में मैं वित्तीय, औद्योगिक, कृषि वगैरह विभिन्न क्षेत्रों का और विस्तार से विश्लेषण करूंगा और फिर समापन से पहले मौजूदा बाजार की प्रकृति का भी जायजा लूंगा. पहली और बड़ी संरचनात्मक विकृति है: जबकि कृषि का जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद, जो एक साल में हमारे देश में उत्पादित सभी वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य है) में योगदान महज 14 प्रतिशत ही है, यह हमारी आबादी के 60 प्रतिशत से अधिक हिस्से को सहारा देती है. और दूसरी तरफ सेवा क्षेत्र (सर्विस सेक्टर) का जीडीपी में 60 प्रतिशत से अधिक योगदान है लेकिन आबादी का केवल पांच फीसदी इस पर निर्भर है. यहां तक कि निर्माण क्षेत्र जीडीपी के 20 प्रतिशत पर ठहरा हुआ है. विकसित देशों में, हालांकि सेवा क्षेत्र भी बड़ा है, इसी के अनुपात में उस पर आबादी निर्भर करती है. लेकिन भारत जैसे विकासशील देशों में एक जबरदस्त वृद्धि केवल एक गतिशील औद्योगिक/ निर्माण क्षेत्र के साथ ही हासिल की जा सकती है जो कृषि से विस्थापित हुई आबादी को जज्ब कर सके. लेकिन यहां विभिन्न कारणों से निर्माण और स्थानीय उद्यमिता को दबाया जा रहा है और कृषि से विस्थापित हुई आबादी अधभूखे लोगों का अस्थिर समुदाय बन गई है.

दूसरी संरचनात्मक विकृति है: अंतरराष्ट्रीय व्यापार में निर्भरता बढ़ रही है जो घरेलू बाजार को और अधिक कमजोर कर रही है. विदेश व्यापार 2004-05 में जीडीपी के 37 प्रतिशत के मुकाबले अभी जीडीपी का 53 प्रतिशत है (आर्थिक सर्वेक्षण 2011-12). सस्ते माल के आयात की बाढ़ में स्थानीय उत्पादन बह गया है और इसने अनेक उद्योगों को निर्यात पर निर्भर बना दिया है. यहां तक कि सरकार भी (स्थानीय उत्पादन के बजाए) आयातों को बढ़ावा दे रही है, जैसे कि रक्षा मामलों में. मिसाल के लिए टाट्रा के विदेशी हेवी ड्यूटी ट्रकों को जबलपुर कारखाने में बनाने के बाद उनकी जितनी कीमत होती उससे लगभग दोगुनी कीमतों पर उनको आयातित किया जा रहा है. न केवल आयात किए जा रहे ट्रक खराब गुणवत्ता के बताए जा रहे हैं और करदाताओं का पैसा बरबाद किया जा रहा है, बल्कि ऐसी नीति से भारत के बजाए पश्चिम में रोजगार पैदा करने में मदद मिल रही है. इसलिए हैरानी की बात नहीं है कि पश्चिम भारी रक्षा के ऑर्डरों से खुश है.

तीसरी संरचनात्मक विकृति है: आबादी का बड़ा हिस्सा बाजार तंत्र के भीतर मुश्किल से ही आता है. जबकि हमारे लोगों में से 77 प्रतिशत या 80 करोड़ लोग महज 20 रुपए रोजाना पर गुजर बसर कर रहे हैं और अन्य 10 प्रतिशत इससे कुछ ही बेहतर हालत में हैं, तो ये लोग कैसे बाजार की रचना कर सकते हैं? हालांकि नीतियां बनाने वाले इन जर्जर लोगों से भी बाजार को निचोड़ लेना चाहते हैं- सी.एस. प्रहलाद के ‘बॉटम ऑफ पिरामिड के सौजन्य से’- तब भी उनकी क्षमताएं सीमित हैं. हो यह रहा है कि बड़े कारोबार आवश्यक वस्तुओं के स्थानीय उत्पादन को खत्म कर रहे हैं और साथ में बेरोजगारी को बढ़ा रहे हैं. दरअसल यह ऊपर के 10 प्रतिशत हैं, और खास कर ऊपर के एक प्रतिशत हैं जो औद्योगिक वस्तुओं के लिए बड़े घरेलू बाजार के रूप में काम करते हैं.

और चौथी प्रमुख संरचनात्मक विकृति है: काले बाजार के जरिए अर्थव्यवस्था से बहुत भारी रकम को व्यवस्थित रूप से निकाल कर विभिन्न माध्यमों से विदेश भेज दिया जाना (अंदाजा लगाया गया है कि यह जीडीपी का 50 प्रतिशत है). ये गतिविधियां राजस्व वसूली में और देश के भीतर पूंजी संचित करने में रुकावट डालती हैं.



हमारी अर्थव्यवस्था के भीतर ये वे चार प्रमुख संरचनात्मक विकृतियां हैं जो घोषित रूप से योजना नीति और बजटीय अपेक्षाओं में व्यक्त अच्छे इरादों को नकारती हैं. और इन्हीं ने अर्थव्यवस्था को खतरे की कगार पर ला खड़ा किया है, भले ही मीडिया नियमित रूप से ‘मजबूत बुनियाद’ जैसी बातें दोहराता रहता है. अब हमें इसका जायजा लेने दें कि आज हम कहां खड़े हैं. अर्थव्यवस्था की वृद्धि 2005-06 के 9.6 फीसदी की ऊंचाई से गिर 2011-12 में 6.9 पर आ गई और आशंका जताई जा रही है कि यह मौजूदा वर्ष में और गिर कर 6.1 या उससे भी नीचे आ जाएगी. औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईए) पिछले वित्त वर्ष में लगातार गिरता रहा और सबसे बदतर गिरावट वस्तु निर्माण क्षेत्र में आई जो 15 प्रतिशत से अधिक की नकारात्मक वृद्धि झेल रहा है. बिजली, दूरसंचार और वायु परिवहन जैसे अनेक मुख्यों में क्षेत्र गंभीर संकट की हालत है. तब सरकार भुगतान संतुलन के संकट की कगार पर खड़ी है और यह संकट बहुत हद तक उस संकट के समान है जिसका हमने 1990-91 में सामना किया था, जब हमें अपने सोने का भंडार बंधक रखना पड़ा था. उस साल चालू खाता घाटा (जिसका मतलब है कि हम जितना आयात कर रहे हैं वह हमारे कुल निर्यात तथा हमें हासिल हो रही विदेशी रकम से अधिक हो गया है) जीडीपी के तीन फीसदी तक चढ़ गया था जबकि अभी खत्म हुए वित्त वर्ष में यह तेजी से चढ़ कर 3.6 फीसदी हो गया है ( 2000-01 में यह गिर कर जीडीपी का 0.6 फीसदी हो गया था). तब हमारा विदेश मुद्रा भंडार लगभग पूरी तरह खाली हो गया था जिससे खलबली मच गई थी. हालांकि अभी यह 300 बिलियन डॉलर है, लेकिन चीजें सतह पर जितनी सुखद दिख रही हैं उतनी हैं नहीं- 2011 के दिसंबर के आखिर में विदेशी कर्ज 335 बिलियन डॉलर था (जिसमें से 120 बिलियन डॉलर का भुगतान इस साल जून तक किया जाना था) और पिछले वित्त वर्ष में व्यापार घाटा 200 बिलियन डॉलर था. यही नहीं, रुपए में आई भारी गिरावट की वजह से - जुलाई, 2011 से अब तक रुपए का 13 प्रतिशत अवमूल्यन हुआ है - पुनर्भुगतान की रकम और आयातों के मूल्य में उछाल आई है. तो फिर अर्थव्यवस्था के अनेक क्षेत्र अर्ध-दिवालिएपन की दशा में हैं. बैंक एनपीए ने (नन पर्फर्मिंग एसेट्स जो बुरे कर्जों को दिया गया एक शिष्ट नाम है) पिछले साल आकाश छू लिया था और उनकी मदद के लिए भारी सरकारी आर्थिक सहायता (बेल आउट) की जरूरत है. इसी के साथ साथ 2011-12 में 389 कंपनियों के 2 लाख करोड़ के नहीं अदा किए गए कर्जों की वजह से उद्योग संकट में था और आर्थिक सहायता की मांग कर रहा था. इस तरह वित्त और उद्योग दोनों बेहद तंग दर्रे में फंसे हुए हैं.

अगर हम सरकार के वित्त पर वापस बात करें तो हालात यहां भी बेहतर नहीं हैं. कर राजस्व और घरेलू बचत गिर रही है जबकि राजस्व घाटा और सार्वजनिक कर्ज बढ़ रहे हैं. कुल खर्च के प्रतिशत के रूप में कर राजस्व 2006-07 के 60 फीसदी से गिर कर 2011-12 में 46 फीसदी हो गया. सकल घरेलू बचत 2007-08 में जीडीपी के 37 प्रतिशत से गिर कर 2010-11 में 32 प्रतिशत हो गई. केंद्र का राजस्व घाटा पिछले वित्त वर्ष में 4.5 फीसदी के बजट आकलन के मुकाबले जीडीपी के 5.9 फीसदी तक पहुंच गया. इसके नतीजे में सरकार का कर्ज 2007-08 में 1.3 लाख करोड़ से जबरदस्त रूप में बढ़ कर 2011-12 में 4.1 लाख करोड़ रुपए हो गया. इसी अवधि में प्रति व्यक्ति कर्ज 23,287 से बढ़ कर 36,888 रुपए हो गया. ऊपर की ओर बढ़ते कर्ज के इस चक्र के नतीजे में भारी ब्याज भुगतान, ग्रामीण विकास तथा जन-कल्याण के लिए बेहद जरूरी कोष में कटौती होनी तय है.

आखिर में जब हम कृषि का रुख करते हैं तो यहां के हालात भी उतने की निराशा से भरे हुए हैं. खाद्यान्न के उत्पादन में वृद्धि 1980 के दशक के औसत 3.1 फीसदी से गिर कर 1990 के दशक में 1.1 प्रतिशत रह गई थी और यह 2001-10 की अवधि के लिए महज एक प्रतिशत रही. नतीजे में 1990-91 के रोजाना 510 ग्राम के प्रति व्यक्ति खाद्यान्न उपलब्धता में जबरदस्त गिरावट आई और यह 2009-10 में 440 ग्राम रोजाना रह गई. लागत बढ़ने और इसी के मुताबिक उपज और बाजार भाव में बढ़ोत्तरी नहीं होने की वजह से खेती प्रभावित हुई.

तो क्या भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए कोई उम्मीद नहीं है? बेशक शेयर बाजार के बढ़ते सूचकांक और विदेशी पूंजी का भारी प्रवाह मौजूद है! सही है, इस साल के पहले तीन महीनों में विदेशी सांस्थानिक निवेश बहुत बढ़ा है, लेकिन यह केवल तभी हुआ जब वित्त मंत्री ने उनके द्वारा मांगी गई रियायतों के एक सिलसिले का एलान किया. और जहां तक शेयर सूचकांकों के बढ़ने का सवाल है, तो इसकी वजह एक फलती-फूलती अर्थव्यवस्था नहीं है, बल्कि इसकी अकेली वजह भारी विदेशी सांस्थानिक निवेश का देश के भीतर आ रहा प्रवाह है. सरकार (1) शेयर की कीमतों को बनाए रखने, (2) रुपए में और अधिक गिरावट को रोकरने और (3) सबसे अधिक भुगतान संतुलन के संकट को रोकने के लिए इस प्रवाह को बनाए रखने के लिए बेकरार है. इसलिए सरकार विदेशी इशारों पर और अधिक झुकने को बाध्य है क्योंकि यह इनके जाल में फंस चुकी है.

लेकिन अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की भारी अस्थिरता को देखते हुए ऐसी निर्भरता भारी खतरों से भरपूर है. दरअसल सरकार के लिए बेहतर होगा कि वह सीआईआई (कारोबार की एक शीर्ष संस्था) के अध्यक्ष की उस बात पर गौर करे, जिसे उनको 24 मार्च, 2012 को हुए एक सम्मेलन में कहना पड़ा था. उन्होंने कहा था:
20वीं सदी भर में संसाधनों और मालों के मूल्य में वास्तव में गिरावट आई, जिसने वृद्धि को बड़े पैमाने पर तेज किया. वैश्विक जीडीपी 20 गुना बढ़ा. पिछली सदियों के उलट पिछले 10 सालों में चीजें अप्रत्याशित रूप से बदली हैं. संसाधन पर आधारित वृद्धि का दौर, जो माल की कीमतों में गिरावट का नतीजा था, अब खत्म हो चुका है. भारी अस्थिरता अब नई परिघटना है...ऊंची कीमतों और मालों के अभाव ने पूरी दुनिया का पीछा करना शुरू कर दिया है. हमने अब तक जो दुनिया देखी है वह अब एक दूसरी तरह की दुनिया होने जा रही है. अब यह न केवल असंतुलन बल्कि कहीं अधिक अस्थिरता की गवाह होगी.

और ये शब्द किसी वामपंथी के नहीं हैं. बल्कि कन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री के मुखिया के हैं. ऐसे दौर में आर्थिक सुधारों पर बात करते हुए सावधानी से पैर रखने की जरूरत है. इसमें अनेक लातिन अमेरिकी सरकारों के अनुभवों से सीखा जा सकता है. जैसा कि हमने देखा है, अतीत की राजनीति ने अर्थव्यवस्था को संकट की कगार पर ला दिया और और इसी इलाज को जारी रखा जाना इसे पतन की गहराइयों में फेंक देगा. 15 अप्रैल, 2012 को प्रधानमंत्री की मौजूदगी में दिए गए अपने एक भाषण में रिजर्व बैंक के गवर्नर तक मौजूदा स्थिति की तुलना 1991 के भुगतान संतुलन के संकट से कर रहे थे. उन्होंने इसकी ओर ध्यान दिलाया कि जीडीपी का 23.3 फीसदी लघु अवधि का कर्ज 1991 के मुकाबले (10.1 फीसदी) दोगुना है.

अगर हमें पतन की गहराई से बचना है तो मजबूत कदम उठाए जाने की जरूरत है. पहला और सबसे जरूरी कदम अपनी अर्थव्यवस्था की संरचनात्मक विकृतियों को सही करने की आपात जरूरत है.

Related Posts by Categories



Widget by Hoctro | Jack Book
  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ भारतीय अर्थव्यवस्था: डगमगाते घोड़े की सरपट दौड़ ”

  2. By Jaya Karki on April 14, 2014 at 1:59 PM

    Kobad Ghandy aur Anuradha Ghandy ke baremain please more articles and their information . we are more keen to know about Kobad;s condition.
    Hasiya mere liye sabse upayogi aur gyanbardhak blog raha hai . Isne mere soch main paribartan laya hai.
    Dhanyabad. Main niyamit rupmain study karta naya naya matter dhudta hun.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


फीड पाएं


रीडर में पढें या ई मेल से पाएं:

अपना ई मेल लिखें :




हाशिये में खोजें