हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

बिहार का विकास और भूमि सुधार का सवाल

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/02/2012 08:00:00 AM

बेलछी कांड पर आए फैसले और इसके कुछ महीनों के भीतर ही हिंदू फासीवादी राजसत्ता के सीधे संरक्षण में चलनेवाले भू-स्वामियों के हत्यारे संगठन रणवीर सेना के ब्रह्मेश्वर सिंह की रहस्यमय हत्या के बाद से बिहार में भूमि सुधारों, भूमिहीन दलितों-पिछड़ों की स्थिति एक बार फिर बहस के केंद्र में है. यह भी कि राज्य द्वारा अपनी भूमिकाओं को समेटते जाने की प्रक्रिया के ही समांतर इस पर अर्धसामंती जकड़नबंदी के बढ़ने के ही संकेत मिल रहे हैं. बिहार में भूमि सुधार की जरूरत, इसके इतिहास, इसके पक्ष-विपक्ष में दावों और इसे हासिल करने के बतौर राजनीतिक कार्रवाई के रास्ते की तलाश करते हुए  कुछ समय पहले लिखा गया सचिन कुमार का यह लंबा लेख, जो मूलत: एक सेमिनार में प्रस्तुत करने के लिए लिखा गया था, हाशिया पर पोस्ट कर रहे हैं.

एक समय बीमारू प्रदेश कहे जानेवाले बिहार को अचानक देश में एक मॉडल के रूप में दिखाया जाने लगा है। इसकी कुलांचे भरती आर्थिक वृद्धि दर ने पिछले दिनों में काफी सुर्खियां बटोरी हैं। नव उदारवादी विकास के रथ पर सवार बिहार सरकार ने राज्य के विकास के चमकदार दावे पेश किये हैं। लेकिन इन दावों की हवा तब निकल जाती है जब यह सामने आता है कि लगभग 70 फीसदी लोगों को रोजगार देने वाले कृषि क्षेत्र की राज्य सकल घरेलू उत्पाद में महज 21.74 फीसदी हिस्सेदारी है। पर्याप्त जल संसाधन और काफी उपजाऊ भूमि के बावजूद कृषि में ठहराव की हालत है। खेती योग्य भूमि के लगातार दूसरे कार्यों में हस्तांतरण और घटती उत्पादकता के बीच सरकार इस क्षेत्र से ध्यान हटाकर हॉर्टीकल्चर को बढ़ावा दे रही है जिसकी वजह से ग्रामीण व्यवस्था का संकट और गहरा गया है। इस बीच सरकार ने भूमि सुधार का भी दिखावा किया और इसके लिए एक आयोग का गठन किया। लेकिन जब इस आयोग की रिपोर्ट आई तो इस सरकार का नव उदारवादी चरित्र पुख्ता ही हुआ, जिसने रिपोर्ट को स्वीकार करने से भी मना कर दिया।

यह तो तय है कि बिहार में व्यापक जनता को बदहाली से निजात दिलाने के रास्ते में सबसे पहला कदम कृषि अर्थव्यवस्था की संस्थागत बाधाओं को दूर करना है। बिहार की गरीबी का सीधा संबंध कृषि अर्थव्यवस्था की इन संस्थागत बाधाओं से है। विभिन्न अध्ययनों ने दिखाया है कि भूमि सुधार गरीबी को कम करने में मदद करता है। विश्व बैंक के एक अध्ययन का आकलन है कि भूमि सुधार गरीबी पर सीधा प्रभाव डालता है और प्रति व्यक्ति आय में 10 फीसदी तक की वृद्धि होती है (थॉमसन, 2003:413)। इसी तरह भारत डोगरा एफएओ के एक अध्ययन का हवाला देते हैं जिसका आकलन है कि भारत में खेती की जमीन के महज 5 फीसदी पुनर्वितरण और बेहतर सिंचाई की सुविधा ग्रामीण गरीबी को पहले की बनिस्बत 30 फीसदी तक नीचे ला सकती है। बिहार में गरीबी के मुख्य कारणों के बारे में बात करते हुए भूमि आयोग (2008) की रिपोर्ट कहती है, ‘‘यह साफ है कि भूमि मालिकाने की एक भारी असमान पैटर्न और बंटाईदारी की एक लूट वाली व्यवस्था की वजह से बिहार में संस्थागत बाधा कायम है जो कृषि विकास के रास्ते में भारी बाधा उत्पन्न कर रही है।’’ हालांकि जो विश्व बैंक भूमि सुधार से गरीबी के रिश्ते के बारे में बात कर रहा था उसी ने बिहार में भूमि सुधार की सबसे पहले मुखालिफत की। दरअसल यह अब बाजारों के पक्ष में सुधार का प्रवक्ता बन गया है।

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कृषि के संकट की हालत कृषि की जीडीपी में घटती भूमिका से भी स्पष्ट होती है। बिहार सरकार के आर्थिक सर्वेक्षण 2010-11 के अनुसार कृषि की सकल घरेलू उत्पाद में योगदान महज 21.74 फीसदी रह गया है। इसके साथ-साथ भूमिहीनता का भी गरीबी से सीधा संबंध है। 1999-2000 में एनएसएसओ द्वारा किए गए 55वें राउंड के सर्वेक्षण के अनुसार बिहार में कुल कृषि मजदूरों का 76.6 फीसदी पूरी तरह भूमिहीन हैं। इस मामले में दलितों की हालत और ज्यादा खराब है। एनएसएसओ के इसी साल के आंकड़े कहते हैं कि कुल घरों का लगभग 23.8 फीसदी दलित पूरी तरह भूमिहीन थे। ये तथ्य स्पष्ट करते हैं कि भूमिहीनता का सीधा संबंध गरीबी से है। इसके अलावा भूमि के मालिकाने में भी भारी असमानता व्याप्त है। यह भूमि सुधार के दावों के खोखलेपन को स्पष्ट करता है। एनएसएसओ की सर्वेक्षण रिपोर्ट (Report 191, 2003) के अनुसार जमीन के मालिकाने वाले समुदाय के लगभग 96.5 फीसदी लोग सीमांत और छोटे किसान हैं, जिनके पास कुल जमीन का लगभग 66 फीसदी है। वहीं महज 3.5 फीसदी छोटे और मध्यम किसानों के पास लगभग 33 फीसदी जमीन है। इसमें भी बड़ी जोत वाले महज 0.1 फीसदी जमींदारों के पास 4.63 फीसदी जमीन का मालिकाना है। इस तरह अब भी जमीन पर भूपतियों का कब्जा है। यह हालत भी तब है जब जमींदारों को अपनी जमीन को बेनामी में रूपांतरित करने का पर्याप्त मौका मिला है। मुक्ति पूर्व चीन में 1937 के एक अध्ययन का आकलन है कि सबसे गरीब 57.2 फीसदी चीनी ग्रामीणों के पास महज 23.5 फीसदी फसल योग्य जमीन थी जबकि अमीर 2.6 फीसदी लोगों के पास 28.7 फीसदी (एस्पेक्ट्स ऑफ इंडियाज इकोनॉमी, 1)। भूमि के मालिकाने में व्याप्त असमानताओं के संदर्भ में 1937 के चीन और आज के बिहार की समानताओं का अंदाजा लगाया जा सकता है।

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ऐसी हालत में भूमि सुधार ही वह पहला कदम है जिसके जरिए उत्पादक शक्तियों को मुक्त किया जा सकता है। इसके बिना विकास और कृषि उत्पादकता को बढ़ाने की कोई भी बात बेमानी होगी। वास्तविक भूमि सुधार जमीन पर सामंती और अर्धसामंती मालिकाने और सामंती-अर्धसामंती शोषण का अंत करता है। यह व्यापक जनता को न केवल आर्थिक रूप से सशक्त बनाता है बल्कि यह उनको राजनीतिक रूप से जागरूकता प्रदान करता है। यह लोकतंत्र के प्रति लोगों की जागरूकता के लिए भी जरूरी है।

वास्तविक भूमि सुधार का मतलब है गरीब और निम्न मध्यम किसानों समेत भूमिहीन किसानों को मुफ्त में जमीन का वितरण करना। भूमि सुधार जमींदार के हाथों से अतिरिक्त को मुक्त करता है। इससे किसानों की क्रयक्षमता बढ़ती है जिसकी वजह से राष्ट्रीय उद्योग के लिए बाजार का विस्तार होता है। औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि के लिए किसान आवश्यक कच्चा माल उपलब्ध कराते हैं। इससे उनके लिए रोजगार मिलता है।

इस तरह वास्तविक भूमि सुधार और राष्ट्रीय औद्योगिकीकरण दोनों ही एक दूसरे से जुड़े हुए हैं और पूरक हैं। एक के बिना दूसरा असंभव है। भूमि सुधार जहां बिना राष्ट्रीय औद्योगिकीकरण के अर्धसामंती बंधनों को खत्म नहीं कर सकता है वहीं राष्ट्रीय औद्योगिकीकरण बिना भूमि सुधार के हासिल नहीं किया जा सकता। राष्ट्रीय उद्योग किसानों को उत्पादन और उपभोग के समान मुहैया कराता है तो दूसरी तरफ कृषि के मशीनीकरण की वजह से मुक्त हुए लोगों और बढ़ी हुई आबादी के लिए रोजगार पैदा करता है। इस तरह भूमि सुधार का पूरा मसला गरीबी के साथ-साथ औद्योगिकीकरण के साथ भी जुड़ा हुआ है। 

1930 के दशक में बिहार में किसानों का एक संघर्ष स्वामी सहजानंद सरस्वती के नेतृत्व में शुरू हुआ जो आगे चल कर किसानों के एक जुझारू आंदोलन के रूप में स्थापित हुआ। उसने जमींदारी उन्मूलन की मांग को एक प्रधान मुद्दा बनाया। इसके अलावा देश के विभिन्न क्षेत्रों में अकाल और जनता के बीच भारी असंतोष से भी सरकार काफी चिंतित थी। शासक वर्ग की इस चिंता को हम इस कथन से समझ सकते है, जैसा सुनीति कुमार घोष ने लिखा है, ‘‘भारत में बढ़ रही कृषि समस्याओं से अमरीका काफी चिंतित था। खासकर चीन में क्रांति और वहां से खदेड़े जाने के बाद वह कुछ ज्यादा समझदार हो गया था। पचास के दशक की शुरुआत और फिर साठ के दशक में भारत में अमरीकी राजदूत चेस्टर बाउल्स का कहना था, ‘कम्युनिज्म को रोकने का सबसे आसान तरीका है कि लोकतांत्रिक दुनिया भूमि सुधार करे, इससे पहले कि कम्युनिस्ट भूमि सुधार के अभाव को लोकतंत्र को उखाड़ फेंकने के एक बहाने के रूप में इस्तेमाल करें‘। 1952 में वह भूमि संबंधी नीतियों के विशेषज्ञ वुल्फ लेडेजिन्सकी और प्रोफेसर केनेथ पारसंस को भारत लाया। कई राज्यों के गहन अध्ययन के बाद लेडेजिन्सकी ने कहा, ‘किसानों की कटु शिकायतें उसे 1949 में कम्युनिस्ट पूर्व चीन की शिकायतों की याद दिलाती हैं। उसने कहा कि यहां भूमि असमानताएं एशिया की अन्य जगहों जितनी ही बुरी या फिर उससे भी खराब हैं।‘‘ इस तरह इन तमाम शिकायतों ने भारत में भूमि सुधार करने के लिए शासक वर्ग को बाध्य किया।

भूमि सुधार का इतिहास

बिहार में भूमि सुधार कानूनों की पूरी श्रृंखला ही रही है। यहां 1947 में पूरे देश में सबसे पहले जमींदारी उन्मूलन कानून बना। बिहार सरकार ने यह कानून राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद की झिड़कियों को नकारते हुए बनाया। 1950 में बिहार भूमि सुधार अधिनियम पास किया गया। न्यायालय में चुनौती दिये जाने के बाद उच्चतम न्यायालय की अनुशंसा पर यह 1952 तक ही लागू हो पाया। इसमें भी जमींदारों को व्यक्तिगत खेती और खास जमीन के नाम पर अतिरिक्त जमीन रखने की छूट दी गई। इसका परिणाम यह हुआ कि ढेर सारे भूस्वामियों को रैयतों को बेदखल कर व्यक्तिगत खेती के नाम पर भूमि का बड़ा हिस्सा बचाए रखने का रास्ता मिल गया। इतना ही नहीं इसमें जमींदारों को घर, आंगन, खढ़ी, बागीचा, तालाब, पुस्तकालय और पूजागृह के नाम पर भी जमीन रखने की छूट दी गई। इसके अलावा खास जमीन (ऐसी जमीन जिसपर वे खुद या मजदूरों से, अपने मवेशी या फिर भाड़े के मवेशी द्वारा खेती करवाते थे ) और व्यापार, हैंडीक्राफ्ट, व्यापार और स्टोरेज के लिए जमीन रखने की छूट भी दी गई। 1952 तक महज 155 जमींदारों को ही नोटिस भेजा जा सका। इस देरी को देखते हुए इस कानून में कुछ सुधार किया गया और 1959 तक ही तमाम जमींदारों को नोटिस भेजा जा सका। जमींदारी उन्मूलन कानून बनने से पहले यहां 2,05,927 एस्टेट थे। लेकिन बाद में भूमि सुधार कमेटी ने सूचित किया था कि इस अधिनियम से 4,74,000 भूस्वामी प्रभावित होंगे। सीलिंग से बचने के लिए अपने एस्टेट को जमींदारों ने कई हिस्सों में बांट दिया। एक आकलन के अनुसार जमींदार कुल जमीन का लगभग 14 फीसदी हिस्सा, लगभग 15 लाख एकड़ विशेष कैटेगरी के नाम पर बचाने में सफल रहे। दरअसल भूस्वामियों और शासक को दोनों की जाति और वर्ग समान था। जैसा कि आनंद चकवर्ती ने कहा है, ‘‘राज्य में औपनिवेषिक काल में भी भूमि के पैटर्न पर मामूली नजर डालने से भी पता चलता है कि कृषि में शोषण की निर्णायक कारक जाति थी। अधिकतर जमींदार और उनके रैयत भी उंची जाति के थे। इसमें भूमिहार, ब्राह्मण और राजपूत जातियों का बहुमत था। रैयतों का उच्च स्तर भी लगभग इन्हीं जातियों से था या फिर अन्य पिछड़ी जाति कैटेगरी वाले समूह के ऊपरी हिस्सेवाले लोगों का‘। इसके अलावा रैयतों की परिभाषा भी काफी अजीब थी। मूलतः कानूनी रूप से वे लोग रैयत थे जो कम से कम 12 साल से अधिक समय से उस जमीन पर खेती कर रहे थे। इसका मतलब यह था कि 12 साल से कम समय तक खेत पर खेती करने वाले लोग रैयत नहीं थे। इसके अलावा रैयतों के पास इसका कोई लिखित कांटैक्ट नहीं था। इस तरह पूरा कानून ही जमींदारों के पक्ष में इस्तेमाल हुआ। जमींदारों ने अपनी जमीन बचाने के लिए बड़े-बड़े धार्मिक मठ बना दिए और अन्य कई रास्तों का इस्तेमाल किया। इस तरह नौकरशाही, जमींदारों और शासक वर्ग के पूरे तंत्र ने सामूहिक रूप से इस सीमित सुधार वाले कानून का भी मखौल उड़ाया। जमींदारी उन्मूलन कानून के तहत सरकार ने जमींदारों को मुआवजा देकर बिचौलियों के सबसे उच्च स्तर के हित में काम किया, जबकि इसका बोझ व्यापक हद तक किसानों पर पड़ा। इस तरह जमींदारी उन्मूलन की इस पूरी कसरत ने न सिर्फ जमींदारों को अपनी जोत को बेनामी और फर्जी बना लेने का पर्याप्त मौका ही दिया बल्कि एक तरह से भूमिहीन और वास्तविक खेतिहरों के खिलाफ भी काम किया। जमींदारी उन्मूलन के दौरान मुक्त की गई जमीन को खरीदने के लिए किसानों को प्रोत्साहित किया गया। इसकी वजह से केवल अमीर किसान ही जमीन हासिल कर सकते थे और गरीब किसानों को अपनी जमीन खो देनी पड़ी। इस तरह से गरीब किसान या तो बंटाईदार या फिर कृषि मजदूर बन गए। भूमि सुधार के पहले दौर में कृषि मजदूरों की संख्या में वृद्धि में इसके संकेत मिलते हैं। इस तरह जमींदारी उन्मूलन से मूलतः उच्च किसानों और मध्य जातियों के उच्च वर्गों को ही फायदा मिला।

सीलिंग से संबंधित कानून

बिहार में सीलिंग से संबंधित कानून 19 अप्रैल, 1962 को अस्तित्व में आया। इसमें कुछ सुधार कर इसे अगस्त, 1963 में प्रकाशित किया गया। इसमें सीलिंग का निर्धारण भूमि के वर्गीकरण के आधार पर 20-60 एकड़ तक किया गया। इसमें यह भी प्रावधान किया गया कि भूस्वामी अपनी जमीन अपने बेटे, बेटियों, अपने बेटे के बेटों एवं बेटियों या अन्य दूसरे लोगों तथा ऐसे लोगों जिनको यह जमीन भूस्वामित्व के मृत्युपरांत प्राप्त होगा- को उपहार के रूप में प्रदान कर सकता है। इस तरह से सीलिंग कानून में भी जमींदारों को अपनी जमीन बचाए रखने के पर्याप्त मौके प्रदान किए गए। यह भी एक त्रासदी ही है कि जमींदारी उन्मूलन कानून बनने के 12 साल बाद ही सीलिंग कानून बना, वह भी इतना उदार कि जमींदार अपने हित के अनुरूप इसका इस्तेमाल कर सकें। जमींदारी उन्मूलन कानून बनने के बाद से ही जमींदारों को पता था कि अब जल्दी से सीलिंग कानून आएगा। इस दौरान जमींदारों ने अपनी जमीन बचाने के तमाम कानूनी छिद्रों का इस्तेमाल किया। सीलिंग में भी जमीन, घर, चारागाह और प्लांटेशन के नाम पर जमीन रखने की छूट दी गई थी। केंद्र सरकार की भूमि सुधार लागू करने वाली कमेटी की बैठक में 26 जून, 1964 को बिहार के तात्कालिन मुख्यमंत्री केबी सहाय ने बताया कि वे कानून की पुनर्जांच करेंगे और पुनर्वितरण के लिए पर्याप्त जमीन उपलब्ध कराने के लिए उपयुक्त उपाय किए जाएंगे। लेकिन इस कमेटी की 1966 में रिपोर्ट आने तक इसमें कोई भी प्रगति नहीं हुई थी, न ही कोई ऐसा कानून बनाया गया। हालांकि जिस मुख्यमंत्री ने इस काम पर रोक लगायी उन्होंने ही 1955 में राजस्व मंत्री के रूप में सीलिंग कानून की वकालत की थी। उसी समय इस विभाग की एक रिपोर्ट बिहार एग्रीकल्चरल लैंड (सीलिंग एंड मैनेजमेंट बिल, 1955) का कहना था, ‘‘अधिकतर भूस्वामी खुद अपनी सारी जमीनें नहीं जोतते हैं बल्कि इसके लिए वे उप-रैयतों का सहारा लेते हैं। ...ऐसी व्यवस्था जिसमें भूमि के व्यापक हिस्से पर उप-रैयतों द्वारा खेती की जाती हो, प्रभावी कृषि उत्पादन के लिए उपयुक्त नहीं है। ...अनुभव से पता चला है कि जब तक खेती करने वालों को उसका मालिकाना नहीं दिया जाता, उत्पादन के प्रति उनका लगाव एक आदर्श बिंदु तक नहीं पहुँचता है।...यदि अतिरिक्त जमीन को जमींदारों से लेकर भूमिहीन किसानों या फिर गैर आर्थिक आकार वाले जोतदारों को बांट दिया जाता है तो यह कृषि उत्पादन को बढ़ाने में मददगार होगा।’’ [1]  लेकिन मुख्यमंत्री बनने के बाद इस पूरी प्रक्रिया को के.बी. सहाय ने खुद ही ठंडे बस्ते में डाल दिया । भारत में योजना आयोग ने पांच जिलों के पॉकटों में जमीन पर मालिकाने की हालत को समझने के लिए 1963 में लेडेजिन्सकी को आमंत्रित किया। इन पांच जिलों में फोर्ड फाउंडेशन के सहयोग से 1960 में इंटेंसिव एग्रीकल्चरल डेवलपमेंट प्रोग्राम (IADP) की शुरुआत की गई थी। इस अध्ययन का आकलन था कि पांच जिलों में से तमिलनाडु के तंजाउर, आंध्र प्रदेश के पश्चिमी गोदावरी, पंजाब के लुधियाना और बिहार के शाहाबाद (अब भोजपुर, रोहतास, भभुआ और बक्सर) में भूमि का मालिकाना बड़े पैमाने पर असमान था और 50 फीसदी या इससे अधिक किसान पूरी या फिर थोड़े कम पट्टे पर खेती करते थे। इनमें से अधिकतर पट्टे मौखिक थे। इनसे भारी लगान वसूला जाता था और इनको भूमि पर खेती से संबंधित कोई सुरक्षा प्राप्त नहीं थी। इस तरह भूमि सीलिंग कानून महज ‘कागजी कथन’ बनकर रह गया। [2]

1960 के दशक का अंतिम दौर भारी हलचल से भरा था। बिहार सहित देश के अन्य कोनों में बड़े पैमाने पर संघर्ष शुरू हो गए। इन संघर्षों ने सरकार को फिर से कानून में संशोधन करने को बाध्य किया। 1971 और 1973 में भी इस सीलिंग कानून में सुधार कर सीलिंग को और नीचे लाया गया। इसमें 5 सदस्यों की एक परिवार को ही इकाई माना गया और सीलिंग को घटाकर 95 से 45 एकड़ कर दिया गया। इसके बावजूद यह नहीं लागू किया गया। जो जमींदार 1962 में सीलिंग कानून के तहत आ गए थे उन्हें भी 1970 में ही नोटिस भेजा गया। पहले दौर में महज 125 भूस्वामियों को नोटिस भेजा गया। राजस्व और भूमि सुधार आयोग की रिपोर्ट के अनुसार अक्तूबर, 2007 तक राज्य में 3,67,808.24 एकड़ जमीन ली गई और 3,54,752 लाभान्वितों  के बीच 2,71,138.3 एकड़ जमीन वितरित की गई। 1,07,677.25 एकड़ के 1175 मामले अभी भी अधर में हैं। इस तरह कुल अधिगृहित जमीन 4,75,485.44 एकड़़ है।

हालांकि सीलिंग के तहत आनेवाली जमीन के बारे में अलग-अलग अध्ययन हैं। 1972 में सीलिंग अधिनियम में सुधार के दौरान तत्कालीन राजस्व मंत्री चंद्रशेखर सिंह ने विधानसभा में घोषणा की थी कि लगभग 18 लाख एकड़ जमीन सीलिंग के तहत वितरित करने के लिए हासिल किए जायेगी। 1970-71 की कृषि जनगणना के आंकड़ों के आधार पर नवंबर, 1990 में एक प्रशासनिक सेवा अकादमी के एक अध्ययन के अनुसार यह आंकड़ा करीब 17.76 लाख एकड़ है। इसमें 30 एकड़ सीलिंग रखी गई थी और भूमि की केवल एक ही कैटेगरी रखी गई थी। अगर झारखंड विभाजन के बाद इस अध्ययन के आंकड़े को नए बिहार के आधार पर समझें तो यह आंकड़ा करीब 17.76 लाख एकड़ का है। इस अध्ययन के लिहाज से 11.91 लाख एकड़ जमीन हासिल की जा सकती है। अब यदि इस अधिग्रहण की जा सकने वाली जमीन से वितरित जमीन की तुलना करें तो यह बिल्कुल नगण्य है। इस तरह यह कसरत भी पूरी तरह जनता के लिए एक झांसा बनकर रह गया।

जमीन का वितरण करने में भी दलितों के साथ भेदभाव किया गया। जहानाबाद में जारी तनाव और हिंसा पर वहां के जिलाधिकारी द्वारा भेजी गई एक गोपनीय रिपोर्ट के अनुसार 1986-87 के अंत तक वहां 581 एकड़ जमीन सीलिंग कानून के तहत अतिरिक्त घोषित की गई। इसमें से 428 एकड़ जमीन अधिगृहित की गई और इसे 516 परिवारों के बीच विभक्त किया गया। इसमें जहां 320 दलित परिवारों को 228 एकड़ जमीन दी गई वहीं अन्य जातियों के 216 परिवारों को 200 एकड़ जमीन प्रदान की गई। इस तरह जहां हरेक दलित परिवार को 0.71 एकड़ जमीन दी गई वहीं अन्य जातियों के लोगों को प्रति परिवार औसतन 0.92 एकड़ जमीन दी गई (इंदु भारती, ई.पी.डब्ल्यू. 26 नवंबर, 1988)। इस तरह बिहार में नौकरशाही के अंदर के इस जातीय पूर्वाग्रह को समझा जा सकता है।

बंटाईदारी

बंटाईदारी भी भूमि सुधार से संबंधित तक महत्वपूर्ण मसला था। बिहार में यह बिहार टेनेंसी एक्ट, 1885 के तहत नियंत्रित होता था। इसके अलावा 1961 के सीलिंग एक्ट में भी इससे जुड़े कुछ प्रावधान किए गए। टेनेंसी एक्ट, 1885 के तहत किसी भी टेनेंट को जमीन पर मालिकाना हक प्राप्त हो जाता है यदि वह 12 साल तक इस पर लगातार खेती करता है। दूसरे टेनेंटों को, जो लिखित पट्टे के आधार पर जमीन प्राप्त करते हैं, समय सीमा समाप्त होने के बाद जमीन से बेदखल करने का अधिकार रैयतों को प्राप्त था। मौखिक पट्टे वाले टेनेंट्स को लगान नहीं चुकाने या फिर भूमि का उचित उपयोग नहीं किए जाने पर ही जमीन से हटाया जा सकता था (Implementation of Land Reform Report, Year 1966) इसी रिपोर्ट में कहा गया कि तमाम पट्टे मौखिक और कानून के अनुसार सही थे। लेकिन बंटाईदारी का कानून भी पूरी तरह विफल रहा।

योजना आयोग के भूमि सुधार निदेशक ने फरवरी, 1965 में राज्य का दौरा किया। इसके अनुसार फसल बंटवारे की प्रक्रिया व्यापक रूप से प्रचलित थी। 1961 की जनगणना के अनुसार लगभग 25 फीसदी खेती करने वाले अर्धमालिकाने वाले खेतिहर हैं और दूसरे 7.5 फीसदी पूरे तौर टेनेंट्स हैं। टेनेंसी के तमाम नियम व्यवहार में अप्रभावी हैं। टेनेंट्स को मुख्य रूप से कुल उत्पादन का आधा, कई मामलों 65 फीसदी तक भूस्वामी को दे देना पड़ता है। टेनेंट्स को लगातार बदला जाता रहता है, ताकि कानूनी रूप से खेत का अधिकार उनको न प्राप्त हो जाए । अब तक टेनेंट्स के रिकार्ड जमा करने का काम बहुत ही कम हुआ है। यहां तक कि बुझारत के नाम से 10 साल से अधिक से चलाए जा रहे अभियान में मालिकाने से जुड़े मामले की ही जांच की गई, न कि टेनेंट्स (रैयत और बंटाईदार) की। इस तरह केंद्रीय सरकार की इस रिपोर्ट से ही समझा जा सकता है कि बंटाईदारी पर मामूली कामकाज भी नहीं हुआ। यहां तक कि बंटाईदारों को रिकार्ड भी नहीं किया गया।

10 जुलाई, 1964 को बिहार सरकार द्वारा अधीन रैयतों (Under Raiyyat) को रिकॉर्ड करने के लिए विशेष अभियान चलाने का निर्देश दिया गया। इसे दो चरणों में पूरा किया जाना था। पहले चरण में बुझारत और अन्य रिकार्ड जमा करने थे वहीं दूसरे चरण में अधीन रैयतों का रिकार्ड जमा करना था और इसे 1 दिसंबर, 1964 से शुरू करके 31 मार्च, 1965 तक पूरा करना था। लेकिन अचानक 12 सितंबर, 1964 को बिहार सरकार ने गोपनीय पत्र जारी किया (पत्र सं॰- SD /208/ 64-8603) जिसमें कहा गया, ‘‘अधीन रैयतों को हटाये जाने और कृषि से जुड़े अन्य तनावों की रिपोर्ट मिल रही है। सरकार चाहती है कि रैयत और अधीन रैयतों के बीच शांतिपूर्ण संबंध बनाए रखने के तमाम प्रयास किए जाने चाहिए और कोई भी ऐसे कदम नहीं उठाए जाने चाहिए जिससे अशांति पैदा हो। इसके लिए रिकॉर्ड जमा करने का काम फिलहाल रोक देना चाहिए।’’[3]  इस तरह सरकार ने खुद ही अधीन रैयतों के रिकॉर्ड जमा करने का काम रुकवा दिया। हालांकि इसी दौरान एक अन्य वरिष्ठ अधिकारी का आकलन था कि बहुमत अधीन रैयतों के रिकॉर्ड बनाने के काम में कोई गंभीर कठिनाई नहीं है, खासकर वैसे गांवों में जहां एक बड़े हिस्से पर अधीन रैयतों द्वारा खेती की जाती है। इसी अधिकारी का कहना था कि एक बार यदि राजनीतिक स्तर पर अधीन रैयतों के रिकॉर्ड जमा करने के दृढ़ निर्णय ले लिए जायेंगे और इसका व्यापक प्रचार किया जाएगा तो प्रभावित लोगों के प्रतिरोध खुद ही कम हो जायेंगे और फिर अधीन रैयतों का सही रिकॉर्ड जमा करना संभव हो पाएगा’ (Implementation of Land Reform Planning Commission, 1966: Page 51) ।[4]

1967 में बिहार में संयुक्त मोर्चे की सरकार बनी। इस सरकार में इंद्रदीप सिन्हा राजस्व और भूमि मंत्री बने। उन्होंने 1964 में के.वी. सहाय द्वारा जारी किए गए सर्कुलर को रद्द करके फिर बंटाईदारों और जमीन पर मालिकाने का रिकॉर्ड जमा करने का सर्कुलर जारी किया। इसके तुरंत बाद जनसंघ ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया और सरकार पर राजनीतिक संकट आ गया। इतना ही नहीं, इसने खुलेआम आह्वान किया कि बिहार के नागरिक और किसान अपने जीवन,  संपत्ति और खेत की रक्षा के लिए पुलिस पर निर्भर रहने के बजाए अपने हाथ में लाठी लेकर निकलें। इस तरह यह सरकार भी इस काम को पूरा नहीं कर सकी।

अधीन रैयतों की लगातार बेदखली के बाद भी कोई शिकायत दर्ज नहीं होने की समीक्षा करते हुए डी. बंद्योपाध्याय की अध्यक्षता वाले आयोग का ठीक ही आकलन है, ‘‘बंटाईदारों को राज्य के पूरे शासन तंत्र में विश्वास नहीं रह गया है। अब उनको अहसास हो गया है कि वे व्यवस्था से कोई भी राहत हासिल नहीं कर सकते हैं, अतः वे अपना समय, श्रम और साधन इसके पीछे भागकर खत्म नहीं करना चाहते। यह संकेत खतरनाक है। यदि वे कानूनी-प्रक्रिया के जरिए अपनी शिकायतों का हल नहीं करवाते तब या तो वे अपने भूस्वामियों के खिलाफ शिकायत करने से डरते हैं या फिर उन्होंने न्याय पाने का कोई वैकल्पिक रास्ता तलाश लिया है।’’ [5]

जाहिर है कि भूमि सुधार के पहले के तमाम कानून महज कागजी कसरत बनकर रह गए। इसके बाद बिहार में लालू प्रसाद की सरकार ने भी भूमि सुधार के दावे किए, लेकिन वो भी सरकार बाद में मुकर गई। इसके बाद मुख्यमंत्री बने नीतीश कुमार की सरकार ने बाजाब्ता भूमि सुधार आयोग का गठन किया, लेकिन इसकी सिफारिशों को मानने की बात तो दूर इसकी रिपोर्ट को भी स्वीकार नहीं किया।

भूमि सुधार आयोग (2006-2008)

भूमि सुधार आयोग ने बिहार में भूमि से जुड़े सवालों का गहन अध्ययन किया और उन कमियों को दूर करने की कोशिश की जिसका फायदा जमींदार उठाते थे। इसने भूमि सुधार को लागू करने के लिए ग्राम पंचायत से लेकर भूमि सुधार आयुक्त तक का एक तंत्र भी सुझाया। इसने बंटाईदारों की रक्षा के लिए उनके रिकॉर्ड जमा करने और फिर उसे पर्चा प्रदान करने की बात करते हुए कहा कि भू-धारी तभी बंटाईदारों को हटा सकता है जब भूस्वामी व्यक्तिगत रूप से उस जमीन पर खेती करे या फिर मृत बंटाईदार के बेटे इस पर खेती करने से इनकार कर दें। बंटाईदारों के उत्पादन खर्च वहन करने की स्थिति में बंटाईदारों को उत्पादन का 70-75 फीसदी हिस्सा और भूस्वामी के उत्पादन व्यय में सहयोगी बनने की हालत में बंटाईदारों को 60 फीसदी हिस्सा देने की सलाह दी गई।

सीलिंग कानून में सुधार की वकालत करते हुए कहा गया कि कृषि तथा गैर कृषि भूमि के बीच अंतर खत्म किया जाना चाहिए। इसने 5 सदस्यों वाले एक परिवार के लिए 15 एकड़ सीलिंग निर्धारित करने तथा 1950 से विद्यमान मठों, मंदिर, चर्च सहित तमाम धार्मिक संस्थानों के लिए भी 15 एकड़ की सीलिंग निर्धारित की। 15 एकड़ सीलिंग मानकर आयोग ने यह निष्कर्ष निकाला कि बिहार सरकार अनुमानित रूप से लगभग 20.95 लाख जमीन हासिल कर पाएगी। रिपोर्ट कहती है कि 2001 की जनगणना के आधार पर 2007 में गणना करने पर लगभग 56.55 लाख कृषि मजदूर थे। इनमें से 16.68 लाख लोग सबसे निचले पायदान पर हैं। यदि एक एकड़ के हिसाब से भी इनको जमीन दी जाए तो यह आंकड़ा 16.68 लाख एकड़ तक पहुंचता है। कोई समस्या पैदा होने की हालत में इसे एक एकड़ से घटाकर 0.66 एकड़ किया जा सकता है। इसके आधार पर लगभग 10.30 लाख एकड़ जमीन की जरूरत पड़ेगी। आयोग ने बंटाईदारों को पर्चे के आधार पर बैंक से ऋण देने की भी वकालत की। आयोग का कहना है कि ‘कॉन्टेक्ट फार्मिंग’ के सभी पहलुओं को समाहित करते हुए एक कानून होना चाहिए, ताकि किसानों विशेषकर, मध्यम, लघु तथा सीमांत कृषकों को कॉरपोरेट संगठनों द्वारा शोषण एवं दमन से सुरक्षा दी जा सके। जैसा कि हम बता चुके हैं, सरकार ने इस रिपोर्ट को स्वीकार नहीं किया और यह राज्य में भूमि सुधार के अधूरे अध्यायों में एक और अध्याय बन कर रह गया।

भूमि और संघर्ष

बिहार में किसानों के संघर्ष का गौरवशाली इतिहास रहा है। स्वामी सहजानंद सरस्वती के नेतृत्व में 30 का दशक किसानों के लड़ाकू जनसंघर्षों का दशक था। जमींदारी उन्मूलन का नारा सबसे पहले स्वामी सहजानंद सरस्वती के नेतृत्व में किसान सभा ने ही दिया। 1947 के बाद भी कम्युनिस्ट पार्टियों के नेतृत्व में छिटपुट आंदोलन हुए। 1960 के दशक तक साफ हो गया कि ‘जोतने वालों को जमीन’ का कांग्रेसी नारा और अन्य सरकारी कानून और कुछ नहीं बल्कि आम भूमिहीनों के साथ धोखधड़ी हैं। 1960 के दशक के अंत तक दुनिया के स्तर पर ‘कीन्सीय अर्थशास्त्र’ का जादू भी खत्म हो रहा था। अब पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था एक नए तरह से संकट के मुहाने पर खड़ी थी। इसने भूमिहीन मेहनतकशों के संकट को और बढ़ाया। इसी दौर में 1967 में कम्युनिस्ट पार्टियों के बीच बहस ने एक नया अध्याय देश के आंदोलन में जोड़ दिया। सीपीआई (एम) के अंदर ही चारू मजुमदार के नेतृत्व में एक नई बहस शुरू हुई और इसने भारतीय कृषि को अर्धसामंती करार दिया। इस तरह ‘जमीन जोतनेवालों की’ के नारे को बलपूर्वक लागू करने की एक नई दिशा सामने आई। बंगाल के नक्सलबाड़ी में भूमिहीन किसानों ने जमींदार के खेत पर कब्जा किया। यह संघर्ष पूरे देश के कई हिस्से में फैल गया। बिहार के मुसहरी और पुनपुन में भी भूमिहीनों ने जमींदारों की फसलों पर कब्जा करना शुरू कर दिया। इस दौरान जमींदारों का सामाजिक बहिष्कार संघर्ष का एक महत्वपूर्ण पहलू था। इसके साथ-साथ सीलिंग से अधिक जमीन, गैरमजरूआ जमीन पर भी दलित-भूमिहीनों ने कब्जा करना शुरू किया। यह संघर्ष फिर भोजपुर के एकवारी तक फैला। एकवारी में यह संघर्ष सामंती उत्पीड़न के खिलाफ शुरू हुआ। नक्सलवादी आंदोलन के नाम से चर्चित इस आंदोलन ने समाज के अर्धसामंती आधार और इसकी अधिरचना दोनों पर बलपूर्वक प्रहार शुरू किया। यह संघर्ष पटना, भोजपुर, मुजफ्फरपुर और कुछ अन्य जिलों में जंगल के आग की तरह फैल गया। सामंती उत्पीड़न पर करारे प्रहारों से एक तरफ भूमिहीन दलितों ने राहत की सांस ली तो दूसरी तरफ उन्होंने एक नई तरह की आजादी महसूस की। अर्धसामंती ताकतों ने अपने बाहुबल से इस आंदोलन को कुचलने की कोशिश की लेकिन भूमिहीन मेहनतकशों ने इसका हथियारबंद प्रतिकार किया। इसके बाद सामंतों ने संगठित प्रतिक्रिया शुरू की। पुलिस और प्रशासन की मदद से भी गरीबों पर भारी अत्याचार किया गया। संघर्ष का नेतृत्व करने वालों को पकड़कर फर्जी मुठभेड़ में मार दिया गया। इस भारी दमन की वजह से 1970 के मध्य तक यह आंदोलन कुछ कमजोर पड़ गया। हालांकि इस पूरे आंदोलन से भूमिहीनों में एक नई तरह की लोकतांत्रिक चेतना का विस्तार हुआ।

इस नई तरह की जनवादी चेतना ने इस प्रतिरोध को फिर से संगठित करने में मदद की और 1980 के दशक की शुरुआत से ही यह संघर्ष पुनः भोजपुर, पटना, जहानाबाद (तत्कालीन गया) तथा गया जिले के कई पॉकेटों में सामंतवाद विरोधी संघर्ष के रूप में संगठित हो गया। इसने ग्रामीण इलाकों में सामंती प्रभुत्व पर एक मजबूत चोट की। इसके बाद सामंती शक्तियों ने संगठित होकर कई निजी सेनाएं गठित कीं। इन्होंने प्रशासन की सक्रिय मदद से दलितों पर अपना हमला जारी रखा। इसी दौरान 1987 में पुलिस ने जहानाबाद जिले के अरवल में एक शांतिपूर्ण सभा को घेरकर गोलियां चलाईं। इसमें 23 लोग मारे गए और करीब 60 से अधिक लोग घायल हुए। इसे ‘आजाद’ भारत का दुसरा जालियांवाला बाग कहा गया। जब जमींदारों और पुलिस का गठजोड़ इस आंदोलन को कुचलने में सफल नहीं हुआ तो सामंती निजी सेनाओं के जरिए भूमिहीन दलितों का नरसंहार किया गया। शासक वर्ग ने इस पूरे संघर्ष को महज जातीय संघर्ष के रूप में प्रचारित किया। लेकिन वास्तव में यह एक वर्ग संघर्ष था, इसलिए कि बिहार के ग्रामीण इलाकों में जाति और वर्ग के बीच विभाजन रेखा बहुत पतली है।

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ऊंची जातियां और मध्यम जातियों का ऊपरी तबका इस शोषण तंत्र में शोषक की भूमिका में थे वहीं दलित-भूमिहीन या तो मजदूर थे या फिर बंटाईदार। इसलिए जाहिर तौर पर इस आंदोलन में अर्धसामंती उत्पीड़न के खिलाफ व्यापक दलित और पिछड़े गोलबंद हुए। इस आंदोलन ने एक नई तरह की राजनीति की बात की और जमीन के सवाल को राजनीति के सवाल के साथ जोड़ा। इसका परिणाम हुआ कि मगध, भोजपुर और उत्तरी बिहार के कई इलाकों में ग्रामीण इलाकों से सामंती प्रभुत्व कमजोर पड़ा। इसने ग्रामीण इलाकों में खेत मजदूरों के लिए मजदूरी का सवाल उठाया और बड़े पैमाने पर मजदूरी के लिए संघर्ष हुए। अब दलित-भूमिहीनों में एक नई तरह की राजनीतिक चेतना का जन्म हुआ। इसके बाद इन इलाकों में बड़े पैमाने पर सुधार कार्यक्रम चलाए गए। इन कार्यक्रमों को आंदोलनों को खत्म करने के एक औजार के रूप में इस्तेमाल किया गया।

21वीं शताब्दी के पहले दशक में यह संघर्ष पुराने इलाकों में थोड़ा कमजोर हुआ है। इसकी वजह बड़े पैमाने पर सरकारी सुधार और सरकारी दमन दोनों थे। हालांकि ग्रामीण इलाकों में सामंती प्रभुत्व में थोड़ी कमी आने के बावजूद तमाम मसले अब भी बरकरार हैं। ग्रामीण इलाकों में संघर्ष के कमजोर पड़ने की वजह से सामंतों ने जनता द्वारा प्राप्त की गई जमीन को फिर से प्रशासन की मदद से छीनना शुरू कर दिया है। बक्सर-भोजपुर के इलाकों में मैंने पाया कि जनता द्वारा प्राप्त की गई जमीन को भूस्वामियों ने मध्यम जातियों के दबंगों के हाथों सस्ते भाव में बेच दिया है। जमींदार अपनी जमीनें बेच रहे हैं और मध्यम जातियों के दबंग इसकी खरीदारी कर रहे हैं। इतना ही नहीं जमींदारों ने उस जमीन को भी बेच दिया है जिसका पर्चा सरकार ने गरीब भूमिहीनों को दिया था। बक्सर के सिकरौल प्रखंड के कई गांवों में मैंने यह पाया कि जमींदारों ने अब अंतर्विरोध को भूमिहीनों और मध्यम जाति के नए दबंगों की तरफ मोड़ दिया है। इस सारी विवादित जमीन के खरीदार भी मध्यम जाति के दबंग लोग ही हैं और वे इस पर काबिज हैं। इन इलाकों में अभी भी बड़े-बड़े मठ बरकरार है। इसी प्रखंड बसांव कला नामक गांव में एक मठ के पास करीब 1400 बीघे जमीन है। इस जमीन पर 1990 के दशक के अंतिम वर्षों में गरीबों ने संघर्ष किया था, लेकिन इनके नेताओं की हत्या कर इस संघर्ष को नष्ट कर दिया गया। इसके बाद अब इस जमीन पर मध्यम जातियों के लोग बंटाईदार/पट्टेदार के रूप में खेती कर रहे हैं। इस तरह यह एक नया रूझान है कि मध्यम जातियों के दबंग इस जमीन को खरीद रहे हैं और एक नए तरह के जमींदार के रूप में सामने आ रहे हैं। ये रोब-दाब में भी उतने ही सामंती हैं। इलाकों के सिंचित इलाके में पट्टे की राशि भी बहुत अधिक है और यह करीब 11,000 रु. प्रति बीघे तक की है।

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किसानों का कहना था कि पट्टे पर खेत लेने की होड़ की वजह से यह राशि बढ़ती जा रही है। पट्टे की राशि में वृद्धि का मामला सिंचित और असिंचित दोनों क्षेत्रों में आम है। यहां तक कि इन इलाकों में गैर-मजरूआ जमीन पर अभी भी भूस्वामियों का कब्जा बरकरार है।

ये तथ्य यह बताते हैं कि प्रतिरोध कमजोर पड़ने की वजह से भूस्वामी न केवल कब्जा की गई जमीन को पुलिस की मदद से वापस छीन रहे हैं बल्कि वे पर्चाधारियों की जमीन पर भी काबिज हो रहे हैं। यह तथ्य दिखाता है कि भूमि सुधार का सीधा संबंध राजसत्ता के सवाल के साथ जुड़ा हुआ है।

भूमि सुधार और राजसत्ता

अब तक के अनुभवों से साफ पता चलता है कि भूमि सुधार का सवाल सीधे तौर पर राजसत्ता के सवाल के साथ जुड़ा हुआ है। कानून दर कानून बनते रहे लेकिन जनता की बदहाली में कोई बदलाव नहीं हुआ। कानून बनानेवालों ने ही कानून लागू करने में कोई दिलचस्पी नहीं ली बल्कि इसको रोक दिया। भूमि सुधार कानून या फिर न्यूनतम मजदूरी के भुगतान से जुड़े कानून को, जिन्हें सैद्धांतिक रूप से कमजोर वर्गों के हितों को ध्यान में रखकर बनाया गया था, जान-बूझ कर लागू होने से रोका गया। क्योंकि इससे राज्य के राजनीतिज्ञों और नौकरशाहों के अंतर्निहित स्वार्थ जुड़े थे। जहां भी निम्न वर्गों को उनके हितों के लिए बनाए गए कानून को लागू करने के लिए राजनीतिक रूप से गोलबंद किया गया, उनके ऊपर दबंग जातीय गिरोहों और पुलिस द्वारा संयुक्त रूप से बर्बर दमन किया गया। (EPW, April-28, 2001) । इतना ही नहीं भूस्वामियों की निजी सेनाओं के साथ नौकरशाही और राजनीतिज्ञों के रिश्तों की बात के खुलासे की वजह से अमीरदास आयोग की रिपोर्ट को भी नीतीश सरकार ने ठंडे बस्ते में डाल दिया। सामंती निजी सेनाओं से तमाम राजनीतिक दलों के संबंध उजागर हुए। इतना ही नहीं तमाम शासक वर्गीय पार्टियों ने भूमि सुधार के मामले की मुखालिफत की। पुलिस-प्रशासन न केवल जमींदार के हितैषी के रूप में काम करते रहे, बल्कि सामंती निजी गिरोहों को प्रोत्साहन भी देते रहे। शासक वर्ग की यह एक महत्वपूर्ण राजनीति थी।

‘दरअसल ये तमाम सामंती निजी गिरोह राजसत्ता के ही एक मजबूत औजार थे। शासक वर्ग और राज्य के बीच का अलगाव बुर्जुआ तंत्र का चरित्र है और बिहार में यह हासिल होने से काफी दूर है। यहां जमींदार न केवल शासक वर्ग हैं बल्कि अपने आदेषों को मनवाने के लिए राज्य मशीनरी पर काबिज हैं। वे राज्य का हिस्सा हैं या फिर उसका विस्तार हैं। बिहार में राज्य मशीनरी में न केवल आधिकारिक तंत्र शामिल है, बल्कि जमींदारों और उनके हथियारबंद गिरोहों के .गैर आधिकारिक औजार हैं।[6]

दरअसल अंग्रेजों ने कृषि से संचय के लिए एक तंत्र बनाया था। हमें ध्यान रखना चाहिए कि किसी खास तरह के संचय के लिए एक खास तरह के राजनीतिक तंत्र की जरूरत होती है। यह राजनीतिक तंत्र भी फिर उस खास तरह के संचय को बनाए रखने में मदद करता है। भारत से अंग्रेजों के जाने के बाद कृषि में उत्पादन संबंध अर्धसामंती बने रहे। इसके साथ ही साथ औपनिवेशिक शोषण अब अर्ध-औपनिवेशिक ढांचे में ढल गया। इस तरह से पुराने उत्पादन संबंधों को कायम रखते हुए अंग्रेजों ने खुद अपने साम्राज्यवादी हित भी बरकरार रखे। अब चूंकि नए राजनीतिक तंत्र (जो अपनी अंतर्वस्तु में पुराना है) के लिए भी उसी पुराने कृषि उत्पादन संबंध को बरकरार रखना जरूरी था, इसलिए इसने विद्रोह के दबाव में कानून तो बनाए लेकिन इसे कभी लागू नहीं किया। इस तरह ग्रामीण इलाकों में कुछ मामूली बदलावों के साथ बुनियादी रूप से पुराने शोषण तंत्र को ही बरकरार रखा गया।

भूस्वामी खेतों से बड़ी मात्रा में अधिशेष वसूलते हैं और फिर इसे बड़े पूंजीपतियों के हवाले करते हैं। इसका कारण यह है कि भूस्वामी उत्पादन के तमाम साधनों के आयात पर निर्भर हैं। इस तरह खेती से उत्पादित अधिशेष पूंजी के रूप में आयात-निर्यात उद्योग का एक औजार बनता है। इसी प्रकिया में साम्राज्यवादी ताकतें भी अपना हिस्सा ले जाती हैं। इस तरह जमींदार बड़ी पूंजी के एक सहयोगी के रूप में ही काम करते हैं। अर्धसामंती ताकतें यानी धनी किसान, ग्रामीण सूदखोर और वैसे जमींदार जो कृषि उपकरणों के जरिए ग्रमीण अधिशेष हड़पते हैं, ग्रामीण इलाकों में अर्धसामंती शर्तों से जुड़े हैं। ग्रामीण इलाकों में इस तरह एक नए तरह के जमींदार पुराने जमींदारों की जगह ले रहे हैं जो रोब-दाब में वैसे ही सामंती हैं। इसे हम बिहार में पिछले 20 सालों में ग्रामीण इलाकों में देख सकते हैं। 

1947 के बाद तमाम पार्टियों की सरकारें बनीं। पिछड़े और दलितों के प्रतिनिधित्व का दावा करने वाले लोग भी सत्ता में आए लेकिन तमाम लोग एक ही लीक पर चलते रहे। यहां तक कि भूमि सुधार आयोग की रिपोर्ट के खिलाफ तमाम शासक वर्गीय पार्टियां न केवल एकजुट हो गयीं बल्कि दलित और पिछड़ों के प्रतिनिधित्व का दावा करने वाले भी ऊंची जातियों को गोलबंद करने में जुट गए। यह भूमि सुधार के खिलाफ शासक वर्गीय पार्टियों की गोलबंदी को साफ करता है।

दरअसल किसानों की बदहाली की एक मुख्य वजह अर्धऔपनिवेशिक और अर्धसामंती शोषण का बरकरार रहना है। अर्धऔपनिवेशिक परिस्थिति अर्धसामंती संबंधों को बरकरार रखती है। इसलिए अर्धऔपनिवेशिक परिस्थिति में अर्धसामंतवाद का खात्मा संभव नहीं है। इसका मतलब यह है कि जमींदार, साम्राज्यवादी ताकतों और बड़ी पूंजी की सत्ता इस पूरे शोषण तंत्र का नियंत्रण करती है और बनाए रखती है। ऐसे में बड़ा सवाल सामने आता है कि क्या शासक वर्ग खुद अपने ही हितों के खिलाफ काम करेगा? जाहिर है कि नहीं करेगा। भूमि सुधार के प्रति शासक वर्ग का पूर्वाग्रह इस बात को साबित करता है।

इसके साथ-साथ यह भी समझने की जरूरत है कि सरकार को भूमि सुधार से आपति नहीं है बल्कि उसे भूमिहीनों को जमीन देने से आपत्ति है। बड़े कॉरपोरेशन और बड़ी पूंजी के पक्ष में भूमि सुधार करने में उसे कोई दिक्कत नहीं है। वे लगातार निगमों की राह में रुकावट बनने वाले तमाम कानूनों को रद्द कर उन्हें जमीन देने में अपनी पूरी ताकत लगा रहे हैं। पिछले साल फारबिसगंज में हुई फायरिंग की घटना भी इसको स्पष्ट करती है।

इसके साथ-साथ, अकेले भूमि सुधार भी भूमिहीनों की बदहाली को दूर नहीं कर सकता। साम्राज्यवादी नीतियों की वजह से खेती का संकट सर्वव्यापी है। इसलिए एक राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का निर्माण भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है जिसमें किसानों को सिंचाई और उत्पादन के अन्य लागतों की उचित व्यवस्था हो। जहां तक शासक वर्ग की दमनकारी भूमिका और निजी सेनाओं का सवाल है तो मजदूर और किसानों का उत्पीड़ित तबका जब तक ऐसी मांगें पेश नहीं करता जो शासक वर्गों के हितों के खिलाफ हों तब तक राजसत्ता जनता के लिए एक शातिपूर्ण संस्था के रूप में काम करती है। लेकिन जैसे ही शोषित वर्गों की मांगें शोषक वर्ग के हितों के साथ टकराव में आती हैं, यहां तक कि मजदूरों या फिर किसानों के शांतिपूर्ण प्रतिरोधों में भी शामिल होने पर शासक वर्ग अपने असली रूप में सामने आ जाता है। विभिन्न कानूनों के जरिए भी राजसत्ता संघर्षरत जनता को शांत रखने में असफल होती है तो शोषक वर्ग निजी सेनाओं या फिर निजी गिरोहों द्वारा बर्बर दमन का सहारा लेता है। यह बिहार के ग्रामीण इलाकों में सर्वविदित है। दरअसल हमेशा से ही कानूनों को जनविद्रोहों को शांत करने की सहयोगी भूमिका के रूप में ही इस्तेमाल किया जाता रहा है। इसको हम भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में दिए गए भाषण से भी समझ सकते है। उनका कहना था कि ‘हालांकि सीलिंग को लागू करने से जमींदारों का एक बहुत छोटा हिस्सा ही प्रभावित होगा, और इसके व्यावहारिक लाभ बहुत नहीं हैं, लेकिन इसके भावनात्मक लाभ बहुत अधिक हैं।’ [7]

ये तमाम तथ्य इसकी तरफ इशारा करते हैं कि भूमि सुधार का कोई भी कानूनी रास्ता संभव नहीं है। जनता के संघर्ष ही भूमि सुधार के लिए रास्ता साफ कर सकते हैं। इसके साथ-साथ संघर्ष की बदौलत ही वे जमीन का मालिकाना हासिल कर सकते हैं। इसके लिए जरूरी है कि भूमि के लिए संघर्ष का विस्तार राजसत्ता के सवाल तक किया जाए। एक सही मायने में स्वत्रतंत्र और आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था ही गरीबों की बेहतरी का रास्ता प्रशस्त कर सकती है।


फुटनोट

[1] " most of the landholders do not cultivate all their lands themselves and employ sub tenants to bring the same under cultivation...... Such an arrangement by which large areas of land are cultivated through sub tenants is not conducive to efficient agricultural production. It has been found by experience that unless the land is owned by the tiller, his incentive to production does not reach the optimum point...... If surplus lands are taken away from the landholders and distributed to landless workers or holders of uneconomic fragments it will contribute to efficiency in agricultural production" [Statement of Objects and Reasons: Bihar Agricultural Lands (Ceiling and Management) Bill, 1955.]

[2] सुनीति कुमार घोष द्वारा उद्धृत

[3] Reports have been received about the eviction of  under-raiyats and other agrarian disturbances. Government desire that every effort should be made to maintain peaceful  relations between the raiyat and the under-raiyat and requisite steps should be taken to avoid any action which may give rise to disorder. In order to achieve the same, the collection of details to that extent should be kept in abeyance

[4] There should be no serious difficulty in recording the  majority of under-raiyats, particularly in villages where substantial areas are cultivated by them. I am of the view that once a firm decision is taken at political level for recording under-raiyats, and it is made widely known, agitation by affected interests may itself subside and the preparation of a fairly accurate record of under-raiyats become possible

[5] bataidars have lost faith in the whole system of governance in the state. They are, perhaps, convinced that they could get no relief from the system and therefore, they did not want to waste their time, labour and resources chasing a mirage. Portents are dangerous .If they did not want to redress their grievances through the legal process, then either they are so afraid and oppressed that they did not dare file any complaint against their lord and masters- the landowners or they have found out some alternate source where they could find some rough and ready justice. (Bihar land reform commission-2008, page 52)

[6] The  separation  between  ruling  classes  and state,  characteristic  of  a  bourgeois  system, is  far  from  being  achieved  in  Bihar.  Land- lords  are  not  just  a  ruling  class,  getting  the  state,machinery  to  do  their  bidding,  but  are themselves  part  of, or  extensions  of, the  state.  The  state  machinery  in Bihar  comprises  not  only  its official  apparatus,  but also  the  non-official  apparatus  of  landlord and  their  armed  gangs  (militias  formed  by dominant  castes)... (Quoted in Anand Chakravati Economic  and Political Weekly  April  28,  2001)

[7] ‘...though the imposition of ceilings would affect only an infinitesimal minority of landlords, and though its actual practical gains would not be much, the sentimental gains would be tremendous.’ सुनीति कुमार घोष द्वारा Imperialism’s Tightening Grip on Indian Agriculture, 1998, Pp11-12 में उद्धृत

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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