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साल 2011 में 14 हजार से अधिक किसानों ने की आत्महत्या

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/21/2012 02:29:00 PM



द हिंदू के ग्रामीण मामलों के संपादक पी. साईनाथ विदर्भ और दूसरे राज्यों में किसानों की आत्महत्याओं पर लगातार लिखते रहे हैं. 3 जुलाई के द हिंदू में उनका यह नया लेख प्रकाशित हुआ, जिसमें उन्होंने महाराष्ट्र में लगातार बढ़ती आत्महत्याओं पर चिंता जताई है. मनीष शांडिल्य का अनुवाद.

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार 2011 में कम से कम 14,027 किसानों ने आत्महत्या की है. इस तरह 1995 के बाद से आत्महत्या करने वाले किसानों की कुल संख्या 2,70,940 हो चुकी है. महाराष्ट्र में एक बार फिर आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या में बढ़ोतरी दर्ज की गयी है. महाराष्ट्र में 2010 के मुकाबले 2011 में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या 3141 से बढ़कर 3337 हो गई. (2009 में यह संख्या 2872 थी). बीते एक साल से राज्य स्तर पर आंकड़ों के साथ की जा रही भारी छेड़छाड़ के बावजूद यह भयावह आंकड़ा सामने आया है. आंकड़ों को कम कर बताने के लिए ‘किसान’ शब्द को फिर से परिभाषित भी किया गया. साथ ही सरकारों और प्रमुख बीज कंपनियों द्वारा मीडिया और अन्य मंचों पर महंगे अभियान भी चलाये गये थे जिसमें यह प्रचार किया गया कि उनके प्रयासों से हालात बहुत बेहतर हुए हैं. महाराष्ट्र एक दशक से भी अधिक समय से एक ऐसा राज्य बना हुआ है जहां सबसे ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की है.

महाराष्ट्र में 1995 के बाद आत्महत्या करने वाले किसानों की कुल संख्या 54,000 का आंकड़ा छूने को है. इनमें से 33,752 किसानों ने 2003 के बाद आत्महत्या की है यानी इन नौ सालों में हर साल 3,750 किसानों ने आत्महत्या की. साथ ही महाराष्ट्र में 1995-2002 के बीच 20,066 किसानों ने आत्महत्या की थी यानी इन आठ सालों के दौरान हर साल 2,508 किसानों ने आत्महत्या की. उल्लेखनीय तथ्य यह है कि किसानों की आत्महत्या में भी वृद्धि हो रही है और देश भर में उनकी संख्या भी घट रही है. महाराष्ट्र में यह समस्या शहरीकरण के कारण और भी भयावह हो जाती है. गौरतलब है कि महाराष्ट्र देश का वह राज्य है जहां सबसे तेज गति से शहरीकरण हो रहा है. ‘बढ़ती आत्महत्या-सिकुड़ती जनसंख्या’ का समीकरण यह बताता है कि कृषक समुदाय पर दबाव बहुत बढ़ गया है. कुछ ही महीने बाद 2011 की जनगणना के आधार पर किसानों के जो आंकड़े प्राप्त होंगे उससे एक ज्यादा स्पष्ट तस्वीर सामने आयेगी. प्रति एक लाख किसानों में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या के आधार पर आत्महत्या करने वाले किसानों का अनुपात निकाला जाता है. वर्तमान में राष्ट्रीय और राज्यवार, दोनों स्तरों पर यह अनुपात 2001 की पुरानी जनगणना पर ही आधारित है.

सबसे बुरी तरह प्रभावित पांच राज्यों का हाल

2011 के आत्महत्याओं का आंकड़ा बताता है कि छत्तीसगढ़ में किसी किसान ने आत्महत्या नहीं की है. इस कारण यह आंकड़ा संदिग्ध हो जाता है. किसी राज्य में किसान का आत्महत्या नहीं करना एक अच्छी खबर होनी चाहिए थी. लेकिन छत्तीसगढ़ में पिछले पांच वर्षों में 7,777 किसानों ने आत्महत्या की थी जिनमें 2010 में आत्महत्या करने वाले 1,126 किसान शामिल है. यह राज्य कई वर्षों से इन त्रासद मौतों से बहुत बुरी तरह प्रभावित राज्यों में से एक रहा है. किसानों की आत्महत्या की समस्या से सबसे बुरी तरह प्रभावित पांच राज्यों (महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश) के आंकड़े 2011 में हुई कुल किसान आत्महत्याओं के 64 प्रतिशत के आसपास है. छत्तीसगढ़ के ‘शून्य’ के बावजूद 2010 के मुकाबले स्थिति में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं हुआ है. 2010 में इन पांच राज्यों की प्रतिशत हिस्सेदारी 66 प्रतिशत के करीब थी.

ऐसा हो सकता है कि छत्तीसगढ़ के आंकड़े सही समय पर एनसीआरबी को प्राप्त नहीं हुए हों. या इसका एक मतलब यह हो सकता है कि राज्य में किसानों की आत्महत्या संबंधी आंकड़ों में देर से छेड़छाड़ शुरू हुई हो. दूसरे राज्यों में यह खेल कई सालों से चल रहा है. महाराष्ट्र में प्रधानमंत्री की विदर्भ यात्रा के बाद 2007 से ऐसा किया जा रहा है. केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार 2008 के बाद से संसद में किसानों से संबंधित एनसीआरबी के खौफनाक आंकड़ों को सामने रखने से परहेज कर रहे हैं. (लेकिन केंद्र सरकार अन्य सभी श्रेणियों के लिए एनसीआरबी को उद्धृत करती है). अब तो राज्य सरकारें भी एनसीआरबी को भेजे जाने वाले आंकड़ों में बड़े पैमाने पर हेरा-फेरी करने लगी हैं.

ऐसे में जबकि उपरोक्त पांच राज्यों पर सुखाड़ के काले बादल मंडरा रहे हैं, अगले साल सामने आने वाले आंकड़ों की भयावहता चिंता की लकीरों को और गहरा कर देती हैं. महाराष्ट्र में विदर्भ और मराठवाड़ा क्षेत्रों में हालात तो पहले से ही काफी बुरे हैं. (यह स्थिति अधिकारियों को आंकड़ों में ज्यादा हेरा-फेरी करने के लिए उकसाती है). यदि पिछले पांच वर्षों के छत्तीसगढ़ के वार्षिक औसत के आधार पर आकलन किया जाए तो राष्ट्रीय स्तर पर 2011 में आत्महत्या करने वाले किसानों की कुल संख्या 15,582 और उपरोक्त पांच राज्यों की कुल प्रतिशत हिस्सेदारी 68 प्रतिशत (10,524) के करीब हो जायेगी, जो अब तक की सबसे ऊंची प्रतिशत भागीदारी होगी. जब 1995 में पहली बार एनसीआरबी ने किसानों की आत्महत्या के आंकड़ों को अलग से सारणीबद्ध किया था, तब आत्महत्या करने वाले 56.04 फीसदी किसान उपरोक्त पांच राज्यों के थे.

2011 में पांच राज्यों में 2010 की तुलना में किसानों की आत्महत्या के आंकड़ों में 50 से अधिक की वृद्धि दर्ज हुई है. इन राज्यों में शामिल हैं: गुजरात (55), हरियाणा (87), मध्य प्रदेश (89), तमिलनाडु (82). अकेले महाराष्ट्र में 2010 की तुलना में 2011 में 196 की वृद्धि देखी गई है. साथ ही नौ राज्यों में किसानों की आत्महत्या की संख्या में 50 से अधिक की कमी भी दर्ज की गई है. 2011 में 2010 के मुकाबले कर्नाटक में 485, आंध्र प्रदेश में 319 और पश्चिम बंगाल में 186 की गिरावट दर्ज की गई है. लेकिन ये सभी राज्य छत्तीसगढ़ से ‘पीछे’ हैं जहां राज्य सरकार के दावे के अनुसार 2011 में किसी भी किसान ने आत्महत्या नहीं की है. गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ में 2010 में 1126 किसानों ने आत्महत्या की थी.


प्रमुख तथ्य
  • 1995 से अब तक कुल 2,70,940 किसानों ने आत्महत्या की है.
  • महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा किसान आत्महत्या करते है.
  • आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या लगातार बढ़ रही है और कृषक आबादी घट रही है.
  • इस समस्या से सबसे बुरी तरह प्रभावित पांच राज्य महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश हैं.
  • उपरोक्त पांच राज्यों में सुखाड़ की आशंका के कारण अगले साल सामने आने वाले आंकड़े और भयावह हो सकते हैं.
  • छत्तीसगढ़ सरकार के दावे के अनुसार राज्य में किसी भी किसान ने 2011 में आत्महत्या नहीं की है. जबकि 2010 में राज्य में 1126 किसानों ने आत्महत्या की थी.

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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