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भारतीय अर्थव्यवस्था: डगमगाते घोड़े की सरपट दौड़-2

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/22/2012 11:55:00 AM


भारतीय अर्थव्यवस्था की मौजूदा दशा पर कोबाद गांधी के चार हिस्सों वाले लेख का यह दूसरा हिस्सा है. गांधी एक माओवादी विचारक हैं और फिलहाल तिहाड़ जेल में बंद हैं. उन्होंने दो किताबें लिखी हैं: एक भारतीय अर्थव्यवस्था पर है (Globalisation: Attack on India’s Sovereignty, हिंदी अनुवाद- वैश्वीकरण: भारत की संप्रभुता पर हमला, 2004) और दूसरी विश्व अर्थव्यवस्था पर है (Capitalism in Coma, 2009) इसके पहले हिस्से का अनुवाद हाशिया पर यहां पढ़ें. ये लेख मेनस्ट्रीम पत्रिका के मई और जून अंकों में प्रकाशित हुए हैं. अनुवाद: रेयाज उल हक

 

वित्त क्षेत्र: सारा पैसा कहां गया?

चाहे खेती का विकास हो या औद्योगिक, निवेश और विकास के लिए धन/वित्त जरूरी होते हैं. वित्त/धन का खुद में कोई अर्थ नहीं होता, जब तक कि संपत्ति पैदा करने में इसका सार्थक उपयोग नहीं होता. दुर्भाग्य से, वैश्वीकरण के इस दौर में बहुत सारा वित्त सट्टा बाजार में चला जाता है जहां वह अरबपतियों के छोटे से गिरोह के लिए अप्रत्याशित मुनाफे पैदा करता है जबकि देश के विकास में उसका बहुत थोड़ा योगदान होता है.

चार हिस्सों के अपने लेख के इस दूसरे हिस्से में मैं अपने देश के वित्त की स्थिति के बारे में बात करूंगा, मैं बात करूंगा कि कैसे इसकी भरपाई की जा सकती है और देश के हित में उसके उपयोग का सबसे असरदार तरीका क्या है.

वित्त के मुख्य स्रोत बैंकिंग और घरेलू बचत, सरकारी फंड और विदेशी फंड हैं. इस लेख में मैं वित्त के इन तीनों क्षेत्रों पर गौर करूंगा.

बैंकिंग और घरेलू बचत

यहां मैंने इन दोनों को बैंकों में रखी गई कानूनी बचत (निजी और कारोबारी दोनों) के एक काफी बड़े हिस्से के रूप में आपस में मिला दिया है. लेकिन बचतें दूसरी जगहों पर भी जाती हैं, जैसे कि शेयर बाजार/म्युचुअल फंड में, सोना खरीदने में, रियल एस्टेट में वगैरह. हालांकि बाद वाली जगहें मुख्यत: सट्टा कारोबार में आती हैं, इसलिए मैं पहले वाले स्वरूपों पर ही गौर करूंगा जो कि अधिकतर निवेश और उपभोग के लिए कर्जों के लिए उपयोग में लाए जाते हैं. बेशक बैंक में जमा बचत में बीमा, भविष्य निधि/पेंशन फंड, पोस्टल डिपॉजिट आदि को भी शामिल किया जाना चाहिए. यहां मैं बहुत विस्तार में नहीं जाऊंगा, बल्कि मैं कुल घरेलू बचत पर विचार करूंगा. इसके बाद मैं हमारे यहां के बैंकों की दशा और सेहत पर नजर डालूंगा.

2007-08 में सकल घरेलू उत्पाद का 37 प्रतिशत रही कुल घरेलू बचत 2010-11 में गिर कर 32 प्रतिशत रह गई. मुद्रास्फीति के ऊंची बनी रहने के साथ लोगों की आमदनी की बुनियाद हिलने लगी है और उनके पास बचत करने के लिए बहुत कम बच पाता है. इसके साथ, सार्वजनिक स्वास्थ्य की गिरती हुई दशा की वजह से यह छोटी सी बचत भी बीमारियों के इलाज, दवाओं और अस्पतालों की फीस के भारी खर्चों को चुकाने में बह जाती है. अंदाजा लगाया गया है कि परिवार अपनी कुल आमदनी का 10 फीसदी जितना हिस्सा स्वास्थ्य की देख रेख पर खर्च करते हैं. इसी के साथ सार्वजनिक बचत 2007-08 के पांच फीसदी से गिर कर 2010-11 में 1.7 फीसदी पर आ गई. मुद्रास्फीति ऊंची बनी हुई है और अप्रत्यक्ष करों में लगातार वृद्धि जारी है, जिससे बचत में और अधिक गिरावट आने की आशंका है.

अब अगर हम बैंकिंग क्षेत्र का रुख करें तो 2008 की मंदी के दौरान कहा गया कि हमारे राष्ट्रीयकृत बैंक दुनिया के सबसे सुरक्षित बैंकों में से हैं. यह पूरी तरह सही नहीं है. असल में वे पूरी तरह कमजोर हैं, उनके एनपीए (नन पर्फर्मिंग एसेट्स जो बुरे कर्जों को दिया गया एक शिष्ट नाम है) लगातार ऊपर की तरफ जा रहे हैं और भारी सरकारी मदद उनको डूबने से बचाए हुए है.

विशाल अमेरिकी बैंक इस लिए भहरा कर गिर पड़े क्योंकि डेरिवेटिव्स/बंधक बाजार में सट्टा निवेश नाकाम रहा: यूरो कर्ज संकट उन भारी कर्जों का नतीजा है, जिनको देश अदा कर पाने में नाकाम हैं; और भारतीय बैंक गैर जिम्मेदाराना उधारियों की वजह से मुश्किलों का सामना कर रहे हैं, जो अधिकतर बड़े कारोबारियों को दी गई हैं.

अभी अभी खत्म हुए वित्त वर्ष (2011-12) में इन बैंकों के एनपीए ने आसमान छू रहे थे. उन्होंने 1.5 लाख करोड़ को पार कर लिया जो कि 2008 के बाद से तीन गुना ज्यादा है. ऐसा बिजली, रियल एस्टेट, सड़क, टेक्सटाइल और विमानन में भारी उधारियों की वजह से है. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने अंदाजा लगाया है कि बैंकिंग क्षेत्र के मूल्य में 35 प्रतिशत की गिरावट आएगी.

2011-12 में सरकार ने 20,157 करोड़ रुपए की भारी मदद सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को मुहैया कराई थी. 2011-12 में यह राशि 26,000 करोड़ थी. लेकिन ये दो साल अपवाद नहीं थे, यह कदम नीतिगत रुझान के रूप में सामने आया है. वित्त मंत्री ने कहा है कि आर्थिक मदद के रूप में अगले दशक में 4.5 करोड़ रुपए की भारी रकम झोंकने की योजना है- यानी 35,000 करोड़ रुपए हर साल!! यह करदाताओं का पैसा है जिसे (किंगफिशर जैसे) बड़े कारोबारियों को दिया जा रहा है, जिन्होंने अपने भारी कर्जों की अदायगी नहीं की है.

किंगफिशर एयरलाइन एक एनपीए की बेहतरीन मिसाल है, जहां कंपनी दिवालिया हो गई लेकिन इसके मालिक विजय माल्या अपनी सात सितारा जीवन शैली को शराब और रियल एस्टेट से होनेवाली आमदनी से जारी रखे हुए हैं. एयरलाइन के ऊपर 7482 करोड़ का भारी कर्ज था जिसे एक डूब गए कर्जे यानी एनपीए के रूप में लिया जाएगा, बजाए इसके कि इसके मालिक की संपत्ति और मुनाफे को जब्त कर लिया जाए. बैंक इस एनपीए से पिंड छुड़ा लेंगे और सरकार बैंकों को इसके बदले में भुगतान कर देगी. बैंकों के डूब गए कर्जों (एनपीए) की भरमार से निबटने का यही तरीका हो गया है.

आज भी बड़े कर्जदार (जिनके ऊपर 10 करोड़ या इससे ज्यादा के कर्जे हैं) 47,000 करोड़ का भुगतान नहीं कर पाए हैं- और बैंकों ने उनमें से आधे से भी मांगने की जहमत नहीं उठाई है. जबकि बैंक किसानों और मध्यवर्ग से कर्जों की अदायगी के लिए सख्ती भरे तरीके अपनाते हैं, भारी रकमों वाले कर्जों की बात आते ही वे नरम पड़ जाते हैं.

जो भी हो, यह स्थिति न केवल बैंकों की खतरनाक स्थिति की ओर इशारा करती है, बल्कि उन क्षेत्रों के संकेत भी देती है, जो कर्जों का भुगतान कर पाने के काबिल नहीं हैं. जब तक सरकार वास्तविक विकास और कल्याण खर्चों की कीमत पर उनकी मदद करना जारी रखती है- बड़े कारोबार और बैंक लाभ में रहते हैं, जबकि नुकसान देश और इसके विकास को उठाना पड़ता है. अगर सरकार अपने खुद के ‘निजीकरण’ के नारे को लेकर गंभीर है तो इसे ऐसी कंपनियों में कोई दखलअंदाजी नहीं करनी चाहिए और नुकसान उठा रही कंपनियों को डूब जाने देना चाहिए.

सरकारी निवेश

इसके दो पहलू हैं: धन जमा करना और दूसरा खर्च की प्रकृति. धन को बढ़ाने की जरूरत होती है, खास कर जो लोग कर अदा कर सकते हैं उनसे कर लेकर. और खर्चे मुख्यत: परिसंपत्ति पैदा करने के लिए होना चाहिए.

अब अगर कोई भारत के कर राजस्व को देखे तो यह जीडीपी का महज 10 फीसदी है, जबकि दूसरे अधिकतर देशों में यह 20 से 30 फीसदी के बीच होता है. कुछ तो इसकी वजह भारी काला धन है. और इस सीमित राजस्व में से एक बड़ा हिस्सा अप्रत्यक्ष करों में से आता है (वह कर जो वस्तुओं और सेवाओं पर लगाया जाता है और जिसका असर सबसे अधिक गरीबों और मध्यम वर्गों पर पड़ता है), जबकि प्रत्यक्ष कर (जिसे अधिकतर अमीरों और कॉरपोरेट अदा करते हैं) ज्यों का त्यों बना हुआ है. इसलिए 2010-11 में कॉरपोरेट कर महज 33 प्रतिशत बढ़े जबकि अप्रत्यक्ष करों में 125 फीसदी की भारी वृद्धि हुई. इसके अलावा केंद्रीय कर, बिक्री कर जिनसे राज्य सरकारों के राजस्व का बड़ा हिस्सा आता है और चुंगी, ये सब अप्रत्यक्ष कर हैं. यहां तक कि प्रत्यक्ष करों में भी अधिकतर हिस्सा कर्मचारियों से आता है (जहां भुगतान के स्रोत पर ही कर काट लिये जाते हैं), जबकि नीतियों में मौजूद छूटों का फायदा उठाते हुए कारोबार मुश्किल से ही भुगतान करते हैं. यहां तक कि महाधनाढ्य (सुपर रिच तबका) उच्च मध्यवर्ग के किसी आदमी जितना ही भुगतान करके छुट्टी पा लेता है. अंत में, काले धन की भारी मात्रा फिर से इसी धनी तबके के हाथों में है, जो इस चुराए गए धन पर कोई कर नहीं अदा करता है.

साफ साफ दिखता है कि मौजूदा बजट में भी इसी नीति को जारी रखा गया है. जबकि एक तरफ अप्रत्यक्ष करों में 45,000 हजार करोड़ रुपयों की भारी वृद्धि की जरूरत दिखाई गई है (ऊपर से पेट्रोल, डीजल और रसोई गैसों की कीमतें और बढ़ने का खतरा है), तो दूसरी तरफ सेक्योरिटी लेन-देन पर करों को 20 फीसदी तक घटाया गया है, फिल्म उद्योग को सेवा करों के दायरे से बाहर कर दिया गया है, बिजली और सड़क निर्माण क्षेत्रों को टैक्स हॉलीडे दिए गए हैं और बड़े कारोबारियों को दी जा रही अनेक रियायतों को जारी रखा गया है.

अब अगर हम सरकार के खर्चे की तरफ आएं तो हालांकि यह पूरी तरह बेकाबू हो गया है, लेकिन उसका बहुत कम हिस्सा ही परिसंपत्तियों के निर्माण लगाया जाता है. सरकार के कुल राजस्व का 25 फीसदी अपने कर्मचारियों को भुगतान में जाता है. और इसमें मंत्रियों, सांसदों वगैरह द्वारा ली जा रही भारी रकमें शामिल नहीं है. इसके बाद एक बड़ी राशि सरकार के 5 लाख करोड़ रुपए के कर्जे का ब्याज चुकाने में चली जाती है. इसके बाद भारी रकम सामाजिक कल्याण योजनाओं पर खर्च होती है, जहां वो परिसंपत्तियों के निर्माण के जरिए कोई रोजगार पैदा किए बिना बस खैरात की तरह बांट दी जाती है. अगर हम भारी पूंजीगत खर्च जैसे शब्दों की तरफ मुड़ें भी तो रक्षा खर्चों की तरह (जिनका 2012-13 में 80,000 करोड़ रुपए का बजट है) भारी खर्चे सामान के आयात पर होते हैं न कि स्थानीय निर्माण पर. इसमें शक नहीं है कि ऐसी भारी रक्षा खरीद पश्चिम को तो खुश कर देती है लेकिन भारत को रोजगार से वंचित करती है.

अंत में ऐसी भारी रकमें भी हैं जो हमारे मंत्रियों और सांसदों के विदेशी दौरों, पांच सितारा जीवन शैली वगैरह पर बरबाद की जाती है. मिसाल के लिए राष्ट्रपति ने 206 करोड़ रुपए विदेश याओं पर खर्च किए (जो अब तक के इतिहास में सबसे ज्यादा है), 6 करोड़ नई सजी-धजी कार पर, और अब रिटायर होने के बाद उनके रहने लिए पुणे में सेना की जमीन पर एक नया बड़ा-सा बंगला बन रहा है. फिर केंद्रीय मंत्रियों ने 2011-12 में अपनी यात्राओं के मद में 47 करोड़ रुपए के बजट की तुलना में 400 करोड़ रुपए खर्च किए (इसके पिछले साल के महज 56 करोड़ रुपए से इसकी तुलना करें)!!

इस तरह हम पाते हैं कि सरकार जितना राजस्व जमा करती है उतना मौजूदा व्यवस्था द्वारा ही आसानी से सोख लिया जा सकता है. यह अपने खर्चों को उत्पादक बनाने के लिए उनको पुनर्गठित कर पाने के नाकाबिल भी है. बारहवीं योजना का परिप्रेक्ष्य पत्र देखे तो वह एक सृजनात्मक दिशा में जाता हुआ भी नहीं दिखता. इसलिए राजस्व घाटे और कर्जों का बढ़ना जारी रहेगा, जबकि वास्तविक विकास एक कल्पना बनी रहेगी.

आखिर में अब हम वित्त क्षेत्र के तीसरे बिंदू की तरफ मुड़ते हैं यानी विदेशी फंडिंग की तरफ, जो चीजों के मौजूदा ताने-बाने में सबसे मुख्य पहलू लगती है.

विदेशी निवेश

इस निवेश के तीन रास्ते हैं: (क) विदेशी उधार- सरकारी और निजी दोनों, (ख) प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई)- जिसमें कारोबारों के अधिग्रहण से लेकर नया कारोबार शुरू करना तक शामिल है, (ग) विदेशी सांस्थानिक निवेश (एफआईआई)- यह अधिक सट्टेबाज पूंजी है.

(क) विदेशी उधार:

कॉरपोरेट क्षेत्र और सरकार दोनों अंतरराष्ट्रीय बाजार से सस्ती दरों पर भारी उधार ले रहे हैं- विकसित देशों में ब्याज दरें 0-1 फीसदी हैं. लेकिन पिछले साल एफआईआई द्वारा धन निकालने की वजह से रुपया धड़ाम से गिर गया है, और इस साल जब पुनर्भुगतान का समय आ रहा है, तो उनको 15-20 प्रतिशत अधिक अदा करना पड़ेगा- इस तरह सस्ते कर्ज के बजाए यह अब तक का सबसे महंगा कर्ज साबित हो रहा है. जिस समय उधार लिया गया था, रुपया मोटे तौर पर 46 रुपया प्रति डॉलर था. अब यह 52 रुपए के आसपास है, महज छह महीनों में 13 फीसदी का वास्तविक अवमूल्यन हुआ है.

पिछले दो सालों से सरकार भारी विदेशी उधारी लेती आई है, और अब बाहरी कर्ज 320 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया है. इसमें से 133 बिलियन डॉलर छोटी अवधि के कर्जे हैं और जून 2012 में उनका समय पूरा हो रहा है. अगर यह मान लें कि रुपया और अधिक नहीं गिरेगा, तब भी सरकार को 10 बिलियन डॉलर अतिरिक्त अदा करना होगा जो रुपए में 50,000 करोड़ बनते हैं!!

बड़े कारोबार भी यूरोपीय बाजार से हाल में भारी कर्जे लेने लगे हैं. 2008 के बाद इंडिया इंक ने यूरोपीय बैंकों से महज दो सालों में 46 बिलियन डॉलर उधार लिया. मौजूदा साल में रुपए के मूल्य आई गिरावट पर भारी भुगतान को देखते हुए अनेक कंपनियों के सामने बकाए का भुगतान नहीं कर पाने की स्थिति आ गई है. 1 बिलियन डॉलर के बकाए वाले अनिल अंबानी के आरकॉम को बकाए का भुगतान न कर पाने की स्थिति से बचने के लिए चीन से उधार लेना पड़ा है. 410 मिलियन डॉलर के बाहरी कर्ज वाली जयप्रकाश एसोसिएट्स जैसी दूसरी अनेक कंपनियां भी दिवाला निकल जाने के खतरे का सामना कर रही हैं. कहा गया है कि यूरोपीय बैंकों का भारतीय बैंकों से ऋण जोखिम 150 बिलियन डॉलर की जीडीपी के 15 फीसदी जितना ऊंचा हो सकता है. द इंडियन एक्सप्रेस (2 जनवरी, 2012) में उद्धृत एक अर्थशास्त्री के मुताबिक, ‘क्या होगा अगर संकट गहराया और यूरोपीय बैंकों को खुद के लिए पूंजी की जरूरत पड़ी...इसकी पहली गाज भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ेगी.’

(ख) प्रत्यक्ष विदेशी निवेश:

खुदरा बाजार में दाखिल होने को लेकर एफडीआई हाल में सुर्खियों में रहा था. इसका कड़ा विरोध छोटे किराना दुकानदार और किसान संगठन करते आए. अमेरिकी खुदरा बाजार की विशालकाय कंपनी वालमार्ट इसकी हिमायत कर रही है. और सरकार भी. हालांकि एफडीआई सट्टा निवेश नहीं है, लेकिन अक्सर यह ऐसी पूंजी या कारोबार के रूप में काम करती है जिसमें स्थानीय कंपनियों को तबाह करने (या निगल लेने) का रुझान होता है. इसलिए खुदरा बाजार में एफडीआई लाखों छोटे दुकानदारों को उजाड़ देगा और उनके मुनाफे को भी बहुत घटा देगा. हाल में अधिकतर बड़ी फार्मास्यूटिकल कंपनियों को विदेशी पूंजी ने खरीद लिया, अर्थव्यवस्था के दूसरे क्षेत्रों में भी यही हो रहा है. हाई-टेक सेक्टर में, जिसकी तकनीकी जानकारी का भारत में अभाव है, एफडीआई की मौजूदगी को समझा जा सकता है लेकिन साबुन, टूथपेस्ट, दवाओं वगैरह के निर्माण और बिक्री में एफडीआई नुकसानदेह दिखती है.

तब भी, एफडीआई की हिमायत में मचाए जा रहे शोर के बावजूद इधर एक अजीब सा रुझान विकसित हुआ है- एफडीआई का बहाव पलट गया है. दूसरे शब्दों में भारत में आ रहे विदेशी निवेश से अधिक निवेश भारतीय कंपनियां विदेशों में कर रही हैं. इस परिघटना ने 2010-11 में बड़ी छलांग लगाई जब बाहर जा रही एफडीआई उसके पहले वाले साल के मुकाबले 100 फीसदी बढ़ कर 44 बिलियन डॉलर हो गई. उस साल देश के भीतर आ रही एफडीआई महज 27 बिलियन डॉलर थी, जिसके नतीजे में 17 बिलियन डॉलर का नकारात्मक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश हुआ था. बड़े कॉरपोरेट बाहर निवेश करना चाह रहे हैं. पिछले साल ही आरआईएल (रिलायंस) ने विदेशों में 5 बिलियन डॉलर का निवेश किया है, अनिल अंबानी ने 3 बिलियन डॉलर, एयरटेल ने 8 बिलियन डॉलर का निवेश किया है, जबकि एस्सार (रूइया) 2015 तक 6 बिलियन डॉलर का निवेश करने की उम्मीद कर रहे हैं. टाटा ग्रुप पहले से ही अपने कुल राजस्व का 65 फीसदी विदेशों से हासिल करता रहा है और यह ब्रिटेन का सबसे बड़ा रोजगारप्रदाता है. लक्ष्मी मित्तल ब्रिटेन के सबसे अमीर आदमी हैं. विदेशों में जा रही यह सारी पूंजी भारत के भीतर मुनाफे से पैदा हुई है और भारत में रोजगार पैदा करने के बजाए यह वास्तव में विदेशों में रोजगार पैदा कर रही है.

अगर सरकार एफडीआई के बारे में गंभीर है तो इसे बाहर की तरफ जा रहे ऐसे बड़े प्रवाह को रोकना चाहिए. लेकिन इसे रोकने की तो रहने दीजिए, सरकार खुद करदाताओं के पैसे का विदेशों में निवेश करती है. मौजूदा बजट में 1000 करोड़ रुपए जितनी बड़ी रकम का आवंटन दूसरे देशों में निवेश करने के लिए विदेश मंत्रालय को किया गया है.

(ग) विदेशी सांस्थानिक निवेश:

बढ़ती अंतरराष्ट्रीय आर्थिक अस्थिरता की हालत में ऐसे सट्टा फंडों का बड़े पैमाने पर चंचल होना, दुनिया के उन हिस्सों में जाना एक बाध्यता है, जहां मुनाफा अधिकतम हो. इसलिए मिसाल के लिए 2011 में एफआईआई उसके पहले वाले साल के मुकाबले कम हुआ. लेकिन इस साल के कुछ शुरुआती महीनों में सरकार द्वारा एफआईआई के लिए रियायतों के एक सिलसिले की घोषणा के बाद ये थोड़ा बढ़ा है.

नवंबर, 2011 में सरकार ने उस राशि में पांच गुना इजाफा किया, जितना एफआईआई भारतीय आधारभूत संरचना कंपनियों के बॉन्डों और ऋणपत्रों में निवेश कर सकता है- इसे 5 बिलियन डॉलर से 25 बिलियन डॉलर कर दिया गया. उसी महीने इसने सरकारी सेक्योरिटियों और कॉरपोरेट बॉन्डों में एफआईआई के निवेश की सीमा को 5 बिलियन डॉलर बढ़ा दिया. नए साल में यह घोषणा की गई कि भारत का शेयर बाजार विदेशियों के लिए खोल दिया गया है. ऐसे नीतिगत फैसलों का नतीजा 2012 की जनवरी और फरवरी में एफआईआई में अप्रत्याशित मुनाफा रहा. अब बजट में सरकार एक कदम और आगे जाना चाहती है- इसने संप्रभु बॉन्डों को विदेशी निवेशकों को बेचने के इरादे का एलान किया है. यह वास्तविक पूंजी खाता परिवर्तनीयता की तरफ बढ़ाया गया एक कदम है.

ऐसे कदम आर्थिक अस्थिरता के दौर में भारी खतरों से भरे हुए हैं. जबकि लातिन अमेरिका जैसे अधिकतर दूसरे देश अपनी अर्थव्यवस्थाओं को बचाने के लिए सुरक्षात्मक दीवारें खड़ी कर रहे हैं, भारत बेतुके रूप से इसे और अधिक खोलने को आमादा दिख रहा है.

देश के वित्त का पुनर्गठन

तो कुल मिला कर हम पाते हैं कि हमारे देश का वित्त कोई खास मजबूत नहीं है. बैंकों में व्यवस्थागत एनपीए समस्याएं हैं और अनेकों को लगातार आर्थिक मदद की जरूरत है. राजस्व घाटे और बढ़ते सार्वजनिक कर्जे के साथ-साथ सरकारी वित्तों का कमजोर होता जाना बढ़ रहा है. और जहां तक विदेशी धन का मामला है, रुपए के मूल्य में लगातार जारी गिरावट तथा भारी अंतरराष्ट्रीय अस्थिरता ने ऐसे धन को गैरभरोसेमंद और यहां तक कि खतरनाक भी बना दिया है.

तब भी अभी उपलब्ध वित्त संसाधनों का ही एक न्यायसंगत पुनर्गठन इसमें बदलाव ला सकता है. इसमें बस यह करने की जरूरत है कि जो लोग धन अदा करने में सक्षम हैं उनसे प्रभावकारी तरीके से इसे जमा किया जाए. इसी के साथ साथ ऐसे धन के अधिक वैज्ञानिक उपयोग पर ध्यान केंद्रित किये जाने की जरूरत है.

मिसाल के लिए स्वदेशी जागरण मंच के गुरुमूर्ति ने कहा: ‘अमीरों के डेरिवेटिवों पर कर नहीं लगाया जाना बेतुका है...प्रति 100 रुपयों पर 10 पैसे का कर लगाने से 88,000 करोड़ रुपए आएंगे...’ (संडे स्टैंडर्ड, 11 मार्च, 2012). इसी के साथ करों के दायरे में भारी काले धन के ले आना, 46,000 करोड़ के सालाना कॉरपोरेट रियायतों (पिछले छह सालों का औसत) को हटाना, महाधनाढ्यों (सुपर रिच तबके) पर आयकर की दरें बढ़ाना आदि-आदि बस कुछ ऐसे कदम हैं जो फंड में 5 लाख करोड़ रुपए तक की वृद्धि कर सकते हैं. अगर गरीबों और मध्य वर्गों को राहत देने के लिए अप्रत्यक्ष करों को घटा दिया जाए (जिससे उपभोग खर्च भी बढ़ेगा) तब भी सरकार के पास खर्च के लिए 3 से 4 लाख करोड़ रुपए उपलब्ध रहेंगे.

और अगर यह पूरी राशि यों ही नहीं गंवा दी गई बल्कि इसका उपयोग परिसंपत्ति निर्माण को बढ़ाने के लिए किया गया तो रातोंरात इसके चमत्कारिक नतीजे देखने को मिलेंगे. लेकिन इसके लिए बेकार के खर्चों में कटौती करनी होगी, बैंकों और कारोबारियों को आर्थिक सहायता बंद करनी होगी, रियायतों और कल्याण योजनाओं को खैरात के रूप में चलाने के बजाए विकास-केंद्रित बनाना होगा, सर्वोच्च न्यायालय के सुझाव के मुताबिक सारे ठेके खुली निविदा के जरिए पूरी तरह पारदर्शी बनाने होंगे, पूंजीगत खर्चे स्थानीय उद्योगों पर करने होंगे न कि आयातों पर, वगैरह वगैरह.

ऐसे सारे कदमों को अपनाते हुए ही हमारे देश को एक सच्चे विकास के रास्ते पर ले जाया जा सकता है.

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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