हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

रंग काला - वर्ण काला

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/24/2012 05:51:00 PM

सोमनाथ उराँव राँची के निकट मांडर प्रखंड के महुआजाड़ी गाँव के आदिवासी युवा हैं. इन्होंने मांडर कॉलेज से बी.ए. एवं राँची विश्वविद्यालय के जनजातीय-क्षेत्रीय भाषा विभाग से कुड़ुख भाषा में एम.ए. किया है । इन दिनों राँची में रहते हैं और एक छोटी नौकरी करते हैं। वे कविता लिखते रहे हैं और यह कविता रणेन्द्र ने हमें मुहैया कराई है.

घने जंगल के
अँधेर-काले कोने से
शुरू की थी यात्रा

हजारो वनस्पतियों के
सत्त से बनी खेत की काली मिट्टी ने
हमे गढ़ा

धूप और भूख ने
सिंझाया - पकाया
पठारी के काले चट्टानों ने
दी छाती को चैड़ाई
सरना के भूरे-काले साखू ने
मन आकाश को ऊँचाई

अखड़ा-मान्दर-गीत-नृत्य ने
लय दिया, गति दी प्राण दिये

हमारा काला रंग
हथीदह के
अथाह जल की गहराई
जंगल का अछोर विस्तार
जल बून्दों के भार से
बोझिल काला बादर - घन श्याम
बरसने - झूमने को आतुर

इसी काले तन के पसीने की बून्दों से
सींचते हैं खेत पकता है अनाज
जीवन पाती रही है मानवता
फैलती रही है खुशी, हँसी, किलकारी

धरती - प्रकृति के सारे रंगो को
निचोड़ने वाला, निगल - पचाने वाला
सफेद रंग
रंग चरका, कुष्ठ खिला
आँखें नीली, नासिका ऊँची
भूरे बाल, गोरा रंग
राजा रंग, यह चरका रंग


नीली आँखों की सुनहरी निगाहों में
हम अँधेरा, हम सन्देह
हम अज्ञान, हम भय
हम ही गुलाम, दास हमी

हम अपढ़, हम गँवार
चोर हम ही, हम ही चुहाड़
गरीबी के बेटे, दुख के प्रेमी
हम ही दागी हम महुआ लोभी
टुच्चे हम, लुच्चे हम, हम कुली हम रेजा
समय कुसमय हम से सजाएँ वे अपनी सेजा

नस्ल से अपराधी हम
जनम - जनम के बागी हम
हम नक्सली हम खूनी-लूटेरा
हर मन के अँधेरे कोने में
हम कालों का डेरा

फेंक रहे दान भीख के रूपये हजार-हजार
पर बन्दूक की एक गोली पर हमरा नाम उधार

गर्व करें कि खुश हों
कलपें कि रोये
कि सच यही कि हम काले
हमारा रंग काला - वर्ण काला

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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