हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

अभिव्यक्ति की आजादी और नाक का सवाल

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/18/2012 06:22:00 PM

मई दिवस के दिन जेएनयू में लाल बैंड की प्रस्तुति के दौरान जो कुछ हुआ, उस पर अलग-अलग तरह के नजरिए और टिप्पणियां सामने आई हैं. विभिन्न पहलुओं के साथ कुल मिला कर यह बहस अभी खत्म नहीं हुई है और फेसबुक से लेकर जेएनयू तक में यह बहस अब भी चल रही है. कवितेन्द्र इन्दु ने इस पूरे मुद्दे पर और त्रिथा को गणपति की वंदना गाने से रोक दिए जाने के विरोध में लिखे गए लेखों विस्तार से नजर डाली है. वे इस पूरे प्रसंग में अब तक बड़ी सुविधा के साथ अनदेखे किए जाते रहे कुछ जरूरी सवाल उठाए हैं और अभिव्यक्ति की आजादी के वर्ग चरित्र पर भी गौर किया है. वे डीबेट ऑनलाइन के संपादकों में से एक हैं और उन्होंने इस लेख को हाशिया पर पोस्ट करने की इजाजत दी है.


मजदूर दिवस के अवसर पर जे. एन. यू. में आयोजित कार्यक्रम अखबार से लेकर इन्टरनेट तक पर गंभीर और उत्तेजक चर्चा का विषय बन गया है। अपार प्रशंसा के साथ-साथ इस कार्यक्रम की कई आलोचनाएं भी सामने आईं हैं। इनके अलावा कुछ आलोचनाएं ऐसी भी हैं, जिसका संबंध पार्टी लाइन से नहीं, बल्कि राजनैतिक-सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक-संस्कृतिकर्मी या श्रोता के रूप में हममें से हर एक की भूमिका से जुड़ा हुआ है। अपूर्वानंद ने 6 मई के जनसत्ता में ‘मई दिवस पर गणपति’ शीर्षक लेख में उक्त अवसर पर त्रिथा को ‘गणपति-गणपति’ पूरा न करने देने को ‘सामूहिक सहमति से कलाभिव्यक्ति की हत्या’ का नाम दिया है। मीरा विश्वनाथन के हस्तक्षेप के बाद यह बहस और भी गंभीर हो गयी है। VAKRATUNDA MAHAKAYA… OR WHAT CANNOT BE SUNG IN THE UNIVERSITY? शीर्षक लेख में उन्होंने बेहद संवेदनशीलता के साथ इस घटना को ‘सेंसरशिप’ का उदाहरण बताते हुए व्यापक फलक पर ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ का सवाल उठाया है। उनकी इस मार्मिक चेतावनी में सच्चाई है कि आज हम अपनी सुविधा के हिसाब से जो चाहे फैसला कर सकते हैं लेकिन उसका अनिवार्य संबंध हमारी नैतिक वैधता से बनता है, भविष्य में हम किस मुंह से सेंसरशिप का विरोध करेंगे अगर आज खुद अपने मंच से किसी को बोलने से रोकते हैं।

चूंकि हम हमेशा से अभिव्यक्ति की आजादी का समर्थन करते रहे हैं और भविष्य में भी निश्चित रूप से सेंसरशिप का विरोध करेंगे, इसीलिए इस मुद्दे पर अपनी पोजीशन को स्पष्ट करना हमारे लिए जरूरी हो जाता है। अगर यह मान लिया जाए कि किसी को गाने या बोलने से रोकना हर हालत में ‘अभिव्यक्ति की हत्या’ या ‘सेंसरशिप’ है, तब तो बहस की कोई सूरत ही नहीं बचती। ऐसी स्थिति में हमें इस बात की भी कल्पना कर लेनी चाहिए कि कल को जब हम अपने कमरे में पढ़ या सो रहे हों तो कोई हमारे दरवाजे के बाहर गाने या बजाने लगे तो उसे मना करना भी हमारा अपराध बन जायेगा। लेकिन अगर आपको लगता है कि उसे यह कहने में कोई बुराई नहीं कि भइया मेरे किसी ऐसी जगह जाकर गाओ-बजाओ जहां लोग पसंद करे या किसी को डिस्टर्ब न हो, तो बात की जा सकती है।

‘सामूहिक सहमति से कलाभिव्यक्ति की हत्या’ जैसा दिल-दहलाऊ जुमला पटकते हुए अपूर्वानंद ने इस सवाल का उत्तर देने की जरूरत ही नहीं समझी है कि अभिव्यक्ति की आजादी का उसके संदर्भ से कोई लेना-देना होता है कि नहीं, लेकिन मीरा ने स्पष्ट शब्दों में स्वीकार किया है कि ‘‘Of course, we seem to have agreed that there are limits to the freedom of expression. But surely these limits are meant to be ‘reasonable’’ किसी अभिव्यक्ति को रोकने के पीछे ‘रीजनेबल’ कारण क्या हो सकते हैं, इसका उत्तर उनके इस प्रश्न में निहित है कि ‘‘Would singing a hymn to Ganapati on May Day have led to a carnage? Did it amount to hate-speech? If not, why shut it up instead of dealing with it in the terms of democratic debate?’’ यानी किसी भी अभिव्यक्ति को रोका जाना तभी उचित है जब वह घृणा फैला रहा हो या उससे दंगा भड़कने की उम्मीद हो ! मुझे लगता है कि यहाँ मीरा ने सेंसरशिप की वही सरकारी परिभाषा ग्रहण कर ली है, जिसका खुद सत्ता मनमाना इस्तेमाल करती है। ‘अभिव्यक्ति’ के पक्ष में इतनी अधिक ‘उदारता’ भी काफी गंभीर स्थितियां पैदा कर सकती है। मसलन कल्पना करें कि आप के ही तर्कों का सहारा लेकर निर्धारित कार्यक्रम की अवहेलना करते हुए दस-बीस और लोग मंच पर अपनी कला का प्रदर्शन करने का अनुरोध करने लगें तो क्या आप उन्हें इजाजत दे देंगे? अगर नहीं तो किस तर्क से उन्हें रोकना अभिव्यक्ति पर सेंसरशिप नहीं होगा? कोई बड़ी आसानी से कह सकता है कि वहां पर ऐसा कुछ तो हुआ नहीं था ! लेकिन जब आप किसी सवाल को भविष्य से जोड़ते हुए इतने व्यापक फलक पर उठाते हैं तो आपको उन स्थितियों की कल्पना भी करनी चाहिए जो आपके द्वारा निर्मित की जा रही सैद्धान्तिकी से पैदा हो सकती हैं। कैम्पस में UGBM से लेकर बाहर सेमिनारों तक में हम अक्सर देखते हैं कि कोई वक्ता जब ज्यादा लम्बा बोलने लगता है तो संचालक उसे रोकता है और अगर वह तब भी न माने तो माइक ही ऑफ कर दिया जाता है। आपकी माने तो यह भी सेंसरशिप या ‘अभिव्यक्ति की हत्या’ का ही एक रूप होगा।

जाहिर है कि हमारे लिए असली सवाल खुद सेंसरशिप कि परिभाषा का है, जिसे  मीरा जी ने बिना व्याख्यायित किये उस प्रकरण पर चस्पां कर दिया है और इस तरह त्रिथा को रोके जाने से सहमत हर व्यक्ति पर सेंसरशिप समर्थक होने का आरोप अप्रत्यक्ष ढंग से मढ़ दिया है। इस प्रसंग में मुझे हाई स्कूल में पढ़े निबंध Rules Of The Road का एक दृष्टान्त प्रासंगिक लगता है, जो आजादी और उसकी सीमाओं  को पहचानने में हमारी सहायता कर सकता है ‘एक सज्जन सुबह-सुबह अपनी छड़ी घुमाते हुए मार्निंग वाक पर जा रहे थे, सामने से आते एक व्यक्ति ने उनकी छड़ी से बचते हुए उनसे सम्हाल कर छड़ी घुमाने की प्रार्थना की। सज्जन बोले की सड़क सार्वजनिक है और छड़ी मेरी, मुझे इस जगह अपनी छड़ी घुमाने की आजादी है। दूसरे व्यक्ति ने कहा कि बिलकुल जनाब! लेकिन आपकी आजादी की सीमा वहीं खत्म हो जाती है, जहाँ से मेरी नाक शुरू होती है। अगर आपकी हरकतें दूसरों के लिए नाजायज परेशानी पैदा करने लगती है, तो आपको इस आजादी के औचित्य पर पुनर्विचार करना चाहिए।

किसी कार्यक्रम की मर्यादा भंग करने, उसके सरोकारों को नुकसान पहुंचाने या कार्यक्रम को असफल बना देने वाले प्रयास आजादी नहीं लापरवाही, गैर जिम्मेदारी या फिर बदमाशी होते हैं और उन्हें यथासंभव हानि-रहित ढंग से रोकना ‘सेंसरशिप’ नहीं, बल्कि कार्यक्रम से संबंधित हर व्यक्ति का दायित्व है। सेंसरशिप वहां होती है जहाँ किसी को अपने मंच से अपनी बात कहने या सार्वजनिक मंच से जायज बात कहने से रोका जाता है। अगर त्रिथा जी को उनके एलबम प्रकाशित करने या म्यूजिक कन्सर्ट करने से रोका जाता है तो वह निःसंदेह सेंसरशिप का उदाहरण होगा और हम सभी उसके खिलाफ आवाज उठायेंगे। लेकिन जब आप किसी अन्य के मंच का इस्तेमाल कर रहे हों तो आपको अनिवार्य रूप से उसे मंच के प्रति जिम्मेदार बनना पड़ता है। अगर हम इस पूर्व शर्त को भुला देंगे तो अवसरवादी लोग अभिव्यक्ति की आजादी का नारा लगाते हुए सार्वजनिक मंचों पर कब्जा कर लेंगे और अराजक लोग अपने विरोधियों के कार्यक्रमों को तबाह कर डालेंगे। ऐसे में कोई भी किसी कार्यक्रम का आयोजन क्यों करायेगा? जाहिर है कि सेंसरशिप का संबंध किसी भी किस्म की अभिव्यक्ति को रोकने से नहीं बल्कि औचित्यपूर्ण (reasonable) अभिव्यक्ति को बाधित करने से है। शोर मचाना भी एक अभिव्यक्ति ही है, लेकिन जाहिर है कि बहुत से मौकों पर अनुचित होने के कारण ही आप इस अभिव्यक्ति पर पाबंदी लगाते हैं।

जिस तरह से दोनों लेखकों ने गणपति के उद्भव के जनजातीय स्रोतों की ओर इशारा करते हुए ‘गणपति गायन’ को स्वीकार्य ठहराने की कोशिश की है, वह अभिव्यक्ति की आजादी और उसके औचित्य को लेकर खुद उनके मन में मौजूद उलझन का परिचायक है। अन्यथा अगर तथाकथित अभिव्यक्ति की आजादी ही सर्वोपरि मूल्य है तो फिर गणपति का संबंध जनजातियों से रहा हो, चाहे न रहा हो, इससे क्या फर्क पर पड़ जाता है? अगर आप अभिव्यक्ति के औचित्य की जरूरत स्वीकार करने के चलते गणपति की प्रगतिशीलता सिद्ध करना चाह रहें तो यह याद रखना चाहिए कि ऐतिहासिक प्रक्रिया में प्रतीकों के अर्थ बदल जाया करते हैं, इसलिए केवल ‘ओरिजिन’ के आधार के पर किसी प्रतीक की प्रगतिशीलता सिद्ध करने की बजाय उसका ‘डेवलपमेंट’ भी देखा जाना चाहिए, नहीं तो हनुमान चलीसा को भी प्रगतिशील मानना पड़ जायेगा और जाति व्यवस्था को भी। इतना तो अपूर्वानंद को भी स्वीकार करना पड़ा है कि आज ‘गणपति शुद्ध हिंदू देवता है’।  इस प्रसंग में मैं मीरा के तर्को को ही दोहराना चाहूंगा ‘‘Does the mere image of Che Guevara occurring on vodka bottles ... allow us to ignore his iconic status as a revolutionary?’’ जाहिर है, बिल्कुल नहीं ! मेरा प्रश्न यह है कि क्या वोद्का की बोतल पर क्रन्तिकारी चेग्वेरा का लेबल लगा देने भर से वोद्का भी क्रान्तिकारी हो उठती है? क्या वह मई दिवस के कार्यक्रम में बांटे जाने की योग्यता हासिल कर लेती है? जाहिर है कि बिल्कुल नहीं ! सवाल लेबल का नहीं पूरी अन्तर्वस्तु का है। इसलिए गणपति का नाम ले लेने भर से कोई गीत प्रगतिशील सिद्ध नहीं हो जाता। सवाल यह होता है कि गणपति का नाम लेकर जो कुछ सुनाया जा रहा था, घंटी बजा-बजाकर जिस शैली में सुनाया जा रहा था वह किसी जनजातीय जुड़ाव की अभिव्यक्त था या उसी ब्राहमणवादी प्रक्रिया का, जिसके जरिये एक जनजातीय देवता को हिंदू धर्म में आत्मसात कर लिया गया?

अपूर्वानंद स्वीकार करते हैं कि मई दिवस के साथ गणपति गायन की संगति बैठा पाना मुश्किल है और मीरा भी मानती हैं कि ‘‘लोग कन्सर्ट में गणपति स्तुति सुनने की उम्मीद लेकर नहीं आए थे।’’ ऐसे में तो वह प्रस्तुति अनुचित ही सिद्ध होती है, इससे निपटने का यही तरीका हो सकता है कि लोगों (आयोजकों-श्रोताओं) की अपेक्षाओं को ही मूर्खतापूर्ण सिद्ध कर दिया जाय। ठीक यही काम अपूर्वानंद करते हैं। वे मजदूर दिवस का आयोजन करने वाले को दिग्भ्रमित तथा मजदूरों से कटा हुआ बताते हैं और ज्ञान देते हैं कि जो किसी अन्य अवसर पर स्वीकार्य है, वह मजदूर दिवस के अवसर पर भी स्वीकार्य होना चाहिए। इस पर एक टिप्पणीकार ने बिल्कुल ठीक पूछा है कि ‘क्या तेरही के अवसर पर सोहर का गायन भी स्वीकार्य होगा?’ मीरा ने सीधे-सीधे तो यह नहीं कहा है, लेकिन उनका लेख यही साबित करने की कोषिष करता है। उनके लेख के शीर्षक पर ध्यान दें ‘VAKRATUNDA MAHAKAYA… OR WHAT CANNOT BE SUNG IN THE UNIVERSITY?’ सवाल तो मई दिवस का है फिर उन्होंने ‘यूनिवर्सिटी’ क्यों जोड़ा? इसके निहितार्थ पर गौर करें तो समझ आ जाएगा कि Everything could be sung in the University And hence on the May day also! (हर चीज विश्वविद्यालय  में गाई जा सकती  है, इसलिए वह मजदूर दिवस के अवसर पर भी गाई जा सकती है) इस तर्क की विडम्बना तब समझ में आएगी जब कुछ शरारती लोग अम्बेडकर के जन्मदिवस पर आयोजित कार्यक्रमों में जाकर ‘गणपति स्तुति’, मुहर्रम के अवसर पर ‘वन्दे मातरम’ और गणेश चतुर्थी के कार्यक्रम में ‘कल्पना के पुत्र हे भगवान’ गाने की इजाजत मांगेंगे और मना करने पर अभिव्यक्ति की हत्या का नारा लगाएंगे।

यह आश्चर्यजनक है कि दोनों लेखकों ने त्रिथा की तीनों प्रस्तुतियों के अर्थ और अंतर्वस्तु पर कोई गंभीर बात कहने की बजाय उसे कुल मिलाकर गणपति के प्रतीक में reduce कर दिया है। इसका कारण यह हो सकता है कि या तो उसमें औचित्यपूर्ण ठहराने लायक कोई बात ही उन्हें न मिली हो या खुद उन्होंने उसे ध्यान से न सुना हो, उन्हें केवल यही नागवार गुजरा हो कि कोई कुछ भी गा रहा हो उसे क्यूं रोका जाय? आपको न पसंद हो मत ध्यान दीजिए!

मेरे खयाल से यह बेहद गंभीर मुद्दा है। अभिव्यक्ति का अधिकार अनिवार्य रूप से एक जिम्मेदारी की पूर्वापेक्षा रखता है, वह है संबद्ध श्रोताओं द्वारा गंभीरतापूर्वक ध्यान दिये जाने का दायित्व। श्रोताओं के इस दायित्व के बिना अभिव्यक्ति की आजादी एक निरर्थक संवैधानिक अधिकार में बदल जाती है। जिसका आशय केवल यह होता है कि आपको बड़बड़ाने का अधिकार है और हमें उसकी उपेक्षा करने का। जब सरकार या उसके प्रतिनिधि ‘उदारतापूर्वक’ जन आन्दोलनों को प्रदर्शन और नारेबाजी की अनुमति तो देते हैं, लेकिन उनकी जायज मांगों पर बिल्कुल ध्यान नहीं देते तो असल में वे अपने दायित्व की घनघोर उपेक्षा करते हुए ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ प्रदान करने का पाखंड कर रहे होते हैं। यह पाखंड भी अभिव्यक्ति के दमन के बराबर ही होता है। इससे सावधान होने की जरूरत इसलिये भी है क्योंकि मीरा जी कार्यक्रम के श्रोताओं से जिस सहनशीलता (Tolrence) और अनुग्रह (Grace)  की मांग कर रही हैं, वह वही पाखंड है जो प्रायः इस बड़प्पन के रूप में प्रकट होता है कि ‘उसको बड़बड़ाने दो तुम क्यों ध्यान देते हो’ या ‘उसको भी अपने मन वाली कर लेने दो, तुम्हारा क्या जाता है!’ यह संवेदनहीनता की स्थिति को प्रोत्साहन देना है, जो अभिव्यक्ति के मूल उद्देष्य -संप्रेषण- को ही खारिज कर देता है।

पुस्तकों, भाषणों, या व्यक्तिगत आयोजनों में तो यह बात किसी हद तक सहनीय हो सकती है, क्योंकि वहां श्रोताओं के पास चुनने या उपेक्षा कर देने का विकल्प सुलभ रहता है, लेकिन सरोकारों से जुड़े गंभीर आयोजनों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के प्रसंग में यह स्थिति बेहद गंभीर रूप धारण कर लेती है। एक वक्ता जब श्रोताओं को बुरी तरह ऊबा देता है तो वे या तो कार्यक्रम में रुचि लेना बंद कर किन्हीं अन्य गतिविधियों में लग जाते हैं या कार्यक्रम छोड़कर जाने लगते हैं। निस्संदेह यह उन सरोकारों को गंभीर क्षति पहुंचाता है जिसके लिये आयोजन किया गया था। अगर श्रोता उन सरोकारों के प्रति गंभीर हुए तो फिर ऐसी स्थितियां उन्हें वक्ता/कलाकार का विरोध करने पर भी मजबूर कर सकती हैं। गणपति गायन के दौरान श्रोताओं की मुखर असहमति दरअसल ‘गणपति’ के प्रति किसी विषेष दुराग्रह की नहीं उस ऊब का स्वाभाविक परिणाम थी जो त्रिथा जी ने समझ में न आ सकने योग्य अपनी तीनों प्रस्तुतियों में कुछ शब्दों के निरंतर दुहराव के जरिये पैदा की थी। उनकी प्रस्तुतियों की असंगति और शैली का उबाऊपन तो उनके पहले गीत में ही प्रकट हो गया था।  चूंकि लाल बैंड ने उन्हें इंट्रोड्यूस किया था, इसलिए श्रोताओं को उम्मीद थी की वे आगे कुछ प्रासंगिक भी सुनाएंगी लेकिन ‘गणपति स्तुति’ ने उस ऊब को विरोध के निर्णायक बिंदु तक पहुचा दिया।

अगर श्रोताओं ने त्रिथा के दो गीतों को धैर्यपूर्वक सुना तो क्या यह उनका दायित्व नहीं बनता था कि वे कुछ ऐसा भी सुनाएं जिसका कुछ संबंध मजदूर दिवस से भी बनता हो? कोई कह सकता है कि उन्हें इन चीजों के बारे में नहीं पता था, लेकिन यह जवाब बतौर कलाकार के जिम्मेदारियों और जवाबदेहियों से आपको बरी नहीं करता। आप अपने हित में किसी मंच का इस्तेमाल करने के लिए इतने आतुर हों और खुद उस मंच के बारे में जानने तक की जरूरत आपको न महसूस हो, तो अपनी ही कला के बारे में कैसी गंभीरता प्रकट कर रहें हैं आप?

कार्यक्रम का स्वरूप ही ऐसा था कि मीरा जी को भी स्वीकार करना पड़ता है कि ‘‘Clearly, people did not come to the concert expecting to hear a hymn to Ganapati.’’ तो फिर त्रिथा की प्रस्तुति भी ‘Clearly’ अनौचित्यपूर्ण थी।  अगर लोग ‘वक्रतुंड महाकाय’ सुनाने की उम्मीद लेकर नहीं आये थे, तो क्या उन्हें जबरदस्ती वह सुनाया जाना उचित होता? और अगर आयोजकों की ना-जानकारी/भूल से वह शुरू हो ही गया, तो समझ में आने के बाद भूल-सुधार करना चाहिए था या नहीं? JNUSU ने ठीक यही किया था। यह तथ्य बेहद महत्वपूर्ण है कि गणपति स्तुति को रोकने का फैसला JNUSU के चन्द प्रतिनिधियों ने अपनी विचारधारा के वशीभूत होकर मनमाने ढंग से नहीं लिया, बल्कि हजारों श्रोताओं के विरोध के औचित्य को समझते हुए लिया। यह भी ‘डेमोक्रेसी’ की ही एक अभिव्यक्ति थी। JNUSU  विश्वविद्यालय के छात्र समुदाय का प्रतिनिधि होता है और अगर जनमत की आवाज जायज है तो उसके लिए इससे बड़ा अपराध और कुछ हो ही नहीं सकता कि वह उस जनमत की अवहेलना कर दे। JNUSU ने ठीक वही किया जो उसका अपरिहार्य कर्तव्य था। आयोजक/संचालक कलाकारों और श्रोताओं के बीच सेतु की तरह होते हैं और उनकी जवाबदेही दोनों के प्रति होती है। दोनों में विरोध उत्पन्न हो जाने की स्थिति में उन्हें तय करना ही पड़ता है कि किसका पक्ष उचित है।

श्रोताओं से सहनशीलता की मांग करना बिल्कुल जायज है, लेकिन सहनशीलता की कोई सीमा होती है या नहीं? अभिव्यक्ति की आजादी की ही तरह असहमति प्रकट करने का अधिकार भी कोई मायने रखता है या नही? असहमति प्रकट करने की बजाय अगर श्रोतागण अपने को ठगा हुआ महसूस करते हुए कार्यक्रम छोड़कर चले जाते तो कार्यक्रम की असफलता की जिम्मेदारी किस पर होती? याद रखिए अपनी जिम्मेदारी को न समझकर श्रोताओं को उबाने वाला वक्ता/कलाकार असल में बाद वाले ‘जेनुइन परफारमर्स’ की ‘अभिव्यक्तियों’ के लिये संकट खड़ा कर रहा होता है, इसलिये उसकी अभिव्यक्ति के औचित्य का प्रष्न भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है, जितना उसकी ‘आजादी’ का !

यह समझ पाना मुश्किल है क्यों अपूर्वानंद और मीरा दोनों ने ही इस घटना के लिए पूरी तरह  जिम्मेदार लाल बैंड की भूमिका की ओर संकेत तक नहीं किया, जबकि वो खुद सार्वजनिक तौर पर अपनी गलती स्वीकार कर रहें हैं।  यहाँ यह जोड़ना बेहद जरूरी है कि यह स्वीकार उनकी भूल की गंभीरता को बिलकुल कम नहीं करता, क्योंकि भले उन्होंने त्रिथा कि प्रस्तुति के विषय में अनभिज्ञ होने के चलते उन्हें इजाजत दे दी हो, लेकिन ऐसा करके उन्होंने उन्हीं सरोकारों के साथ समझौता किया है, जिनके लिए उन्हें पहचाना और सम्मानित किया जाता है। आखिर आप बिना जाने किसी को एक संस्था की साख का इस्तेमाल करने कैसे दे सकते हैं?  

अपूर्वानंद ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ का सवाल मध्यवर्गीय दृष्टिकोण से उठा रहे हैं। उनकी ‘आजादी’ एक खास काट की अभिजात-मध्यवर्गीय आजादी है जो लेखकों-कलाकारों को प्राप्त होनी चाहिए। इरोम शर्मिला, सोनी सोरी से लेकर करोड़ों दलितों-आदिवासियों-स्त्रियों और गरीबों की आवाज जब सत्ता द्वारा अनसुनी कर दी जाती है, कुचल दी जाती है तो उन्हें अभिव्यक्ति की आजादी पर कोई हमला होता नहीं दिखाई देता। इस अभिजात्य-मध्यवर्गीय दृष्टिकोण के कारण ही उन्हें मजदूर दिवस के अवसर पर इकट्ठा हुए हजारों लोगों के सरोकारों और रुचियों की उपेक्षा पर भी कोई दर्द नहीं होता।

निःसंदेह मीरा के सरोकार अपूर्वानंद से भिन्न हैं, इसीलिए वे कुडनकुलम और नोनाडांगा की संघर्षरत जनता की आवाज को भी ‘अभिव्यक्ति’ ही मानती हैं। लेकिन विडम्बना यह है कि अपनी सारी संवेदनशीलता के बावजूद त्रिथा प्रकरण पर उनकी समझ अपूर्वानंद की मान्यताओं का ही परिष्कृत विस्तार बनकर रह जाती है। वे उक्त कार्यक्रम में मौजूद लोगों को श्रोता नहीं बल्कि ‘भीड़’ (crowd) और उनके विरोध को शोर (uproar) कहकर संबोधित करती हैं। इसका क्या औचित्य है? क्या उन्होंने अंडे, टमाटर या पत्थर फेंके थे या कोई और अशोभनीय व्यवहार किया था? (क्योंकि तब बात बिल्कुल दूसरी होती) लेकिन चूंकि वे मानकर चल रहीं हैं कि वह ‘भीड़’ थी और भीड़ से विवेक की उम्मीद नहीं की जा सकती, इसीलिए उसे कोई हक नहीं है फरमाइश करने का कि वह क्या सुनना चाहती है, क्या नहीं!

आश्चर्यजनक है कि लगभग बीस मिनट तक हजारों श्रोताओं द्वारा एक नये कलाकार की असंगत प्रस्तुतियों बरदाश्त करने के बावजूद वे इसे उनके धैर्य या ‘कलाभिव्यक्ति’ को प्रोत्साहन के रूप में नहीं देखते, जबकि तीसरे गीत को बीच में रोकना उन्हें ‘सामूहिक सहमति से कलाभिव्यक्ति की हत्या’ या श्रोताओं की ‘अविश्वसनीय असहनशीलता’ का प्रमाण नजर आने लगता है। आखिर श्रोताओं के भी कोई अधिकार होते हैं या नहीं? यह दुर्भाग्यपूर्ण है, लेकिन दोनों ही लेखों से जो समझ सामने आती है उसके अनुसार श्रोताओं की अपनी कोई ‘एजेंसी’ नहीं होती, कोई अधिकार नहीं होते ! केवल अभिव्यक्ति का अधिकार महत्वपूर्ण होता है और वह मंच पर मौजूद वक्ताओं/कलाकारों के पास होता है। हैरानी की बात है कि त्रिथा के ‘अधिकार’ को लेकर इतने कटिबद्ध ये बौद्धिक हजारों लोगों की असहमति को कोई ‘अभिव्यक्ति’ मानने को तैयार ही नहीं हैं ! ‘कलाभिव्यक्ति’ के प्रति गंभीर रवैये के लिए यह समझना बेहद जरूरी है कि न तो कलाकार श्रोताओं का जर-खरीद गुलाम है कि श्रोता जो मांगें, वही सुनाये; न ही श्रोता कलाकार के बंधुआ मजदूर हैं कि वह जो चाहेगा, वही सुनाएगा, आपको सुनना भी पड़ेगा और ताली भी बजानी पड़ेगी! 

इस बात को दोहराया जाना जरूरी है कि सुनने-ध्यान देने के दयित्व के बिना अभिव्यक्ति का अधिकार केवल एक निरर्थक पाखंड है और ठीक यही तथ्य खुद वक्ताओं/कलाकारों के ऊपर यह नैतिक जिम्मेदारी डालता है कि वे अवसर, मंच और श्रोताओं की भी परवाह करें ! अगर आप उनकी मांगों को नहीं सुन सकते तो आपको उनसे यह अपेक्षा करने का क्या अधिकार है कि वे आपकी अभिव्यक्ति को सुने? संप्रेषण वक्ता और श्रोता से एक साझेपन की अपेक्षा करता है, इस तथ्य की उपेक्षा करके अभिव्यक्ति की रक्षा नहीं की जा सकती। जे. एन. यू. में इस साझेपन के उदाहरण अक्सर देखने को मिल जायेंगे जब जनप्रिय कलाकार कुछ चीजें अपने मन की सुनाते हैं और कुछ श्रोताओं की फरमाइश पर। श्रोताओं की फरमाइश पर कुछ सुनाना कलाकार की विवशता नहीं बल्कि उसके सम्मान, उसकी जनप्रियता का सबूत होता है। उक्त लेखों के जरिए ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ की जो धारणा प्रस्तावित की गयी है, उसे मानें तो होली की पूर्व संध्या पर आयोजित होने वाला ‘चाट सम्मेलन’ अभिव्यक्ति के हनन का भयानक उदाहरण बन जायेगा - क्योंकि वहां ‘अक्षम चाटों’ को ‘जनता की मांग’ पर आयोजकगण ससम्मान कंधे पर उठाकर किनारे लगा देते हैं। लेकिन अगर अभिव्यक्ति के संदर्भ, जिम्मेदारी तथा साझेपन की जरूरत पर ध्यान दें, तो चाट सम्मेलन बहुत कुछ सिखा सकता है। इससे इतना तो समझा ही जा सकता है कि कलाकार बनना भी सीखना पड़ता है और अपनी कला के अनुकूल मंच भी तलाशना पड़ता है।

हजारों श्रोताओं के सरोकारों, समझ और रुचि की उपेक्षा करते हुए गढ़ी गयी ‘पवित्र कला’ की अभिजात्य धारणा खुद कला के लिए भी घातक है। कबीर से लेकर फै़ज़ और लाल बैंड तक को एक रेडिकल आवाज के रूप में प्रतिष्ठित करने का काम आलोचकों ने नहीं, उसी श्रोता समुदाय ने किया है जिसे ‘भीड़’ कहकर इतनी हिकारत से दुत्कारा जा रहा है। ऐतिहासिक प्रक्रिया में कला की अन्तिम परख भी श्रोताओं पर ही निर्भर करती है। कला भी समाज के भीतर ही जन्म लेती है और उसी से खुराक पाकर पलती-बढ़ती है। व्यापक समाज से संवाद न करने वाली और अपने समय के ज्वलंत सवालों से मुंह चुराने वाली कला म्यूजियम की वस्तु बनकर रह जाती है। त्रिथा प्रकरण इसी सच्चाई का एक रूपक है। त्रिथा को गणपति स्तुति पूरी करने से रोका जाना भविष्य में दमनकारी सेंसरशिप के खिलाफ खड़े होने के हमारे नैतिक अधिकार से हमें बिलकुल वंचित नहीं करता, इसके उलट वह वक्ता और श्रोता के रूप में हमें हमारी भूमिकाओं के प्रति आगाह करता है। वह इस बात का नैतिक साहस प्रदान करता है कि लोगों को उनके अधिकार से वंचित करने वाली हर ‘दमनकारी अभिव्यक्ति’ को पूरे विवेक, पूरी गंभीरता और पूरी ताकत के साथ रोका ही जाना चाहिए!

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  1. 2 टिप्पणियां: Responses to “ अभिव्यक्ति की आजादी और नाक का सवाल ”

  2. By amitesh on May 18, 2012 at 8:28 PM

    बहस पर आप कितना ही भाषाई मुलम्मा चढ़ा दें मूल बात वहीं की वहीं है. त्रिथा को गाने के लिये लाल बैंड ने बुलाया और जब वो दो गाने गा चुकी थी तो तीसरे गीत के समय उन्हें जबरन उठाना एक सेंसरशिप ही है. और यह वहीं तर्क है जहां बहुमत की आवाज को जनमत की आवाज मान लिया जाता है. 'गणेश' के प्रतीकों से अगर मजदुरों का कुछ लेना देना नहीं है, तो निकलिये और उन हजारो लोकगीतों, नाटयरुपों , लोककलाओं का शुद्धिकरण कीजिये जिसमें गणेश के साथ ना जाने कितने देवी देवताओं की वंदना होगी. लेकिन गीतों में क्रांति रच के और गीतों से क्रांति का स्वप्न देखनी वाली जनता को यह समझ लेना चाहिये कि स्वपन और यथार्थ में जागृति का अंतर होता है.

  3. By सुज्ञ on May 19, 2012 at 6:45 PM

    सार्थक प्रस्तुति!! आभार

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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