हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

कैसे लड़ें पूंजीवादी व्यवस्था-तंत्रों से

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/24/2012 10:00:00 AM

कुछ तो मौजूदा आर्थिक संकट और कुछ ‘कल्याणकारी’ राज्यों द्वारा खर्चों में कटौती की वजह से अनेक देशों में व्यस्था विरोधी आंदोलनों की एक लहर पिछले साल से देखी जा रही है. इन आंदोलनों में अधिकतर स्वत:स्फूर्त हैं, बिना किसी स्पष्ट राजनीतिक विचारधारा के साथ चलाए जा रहे हैं और अधिकतर में किसी राजनीतिक संगठन का नेतृत्व भी नहीं है. लेकिन इन आंदोलनों में जो दिखता है वह दरअसल जनता का गुस्सा और आक्रोश है, भले ही उसे किसी राजनीतिक संगठन या विचारधारा का नेतृत्व नहीं हासिल है. जेएनयू में लातिन अमेरिकी साहित्य के शोध छात्र पी. कुमार मंगलम ने अपने इस लेख में स्पेन में चले ऐसे ही एक आंदोलन की भारत के अन्ना हजारे आंदोलन से तुलना करने की कोशिश की है और दिखाया है कि अन्ना के नेतृत्ववाले प्रतिक्रियावादी आंदोलन का जनता के वास्तविक सवालों से कोई लेना-देना नहीं है.


राह दिखाता स्पेन का 'लुटे-पिटे' लोगों का आन्दोलन
भारत के 'अन्ना' आन्दोलन के सन्दर्भ में

तो अब यह सबको मालूम हो चुका है कि यू. पी. सहित पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में टीम अन्ना ने किसी एक पार्टी के खिलाफ़ चुनाव प्रचार नहीं किया. मुंबई में अपने तुरत-फुरत खत्म कर दिये गये अनशन के बाद स्वास्थ्य लाभ ले रहे अन्ना ने खुद ही कांग्रेस के खिलाफ प्रचार न करने की बात की थी. हालांकि इसी टीम के अन्य सदस्य कभी ‘ईमानदार’ उम्मीदवारों के पक्ष में और दूसरी तरफ केन्द्र सरकार यानी कांग्रेस के खिलाफ़ मुहिम चलाने की बात भी करते रहे हैं. इससे उनकी समझ और ईमानदारी तथा उससे भी बढ़कर राजनीतिक पक्षधरता उलझी और ठीक-ठीक कहें तो सन्देहास्पद ही मालूम पड़ती है. उलझन और सन्देह बनाने-बढ़ाने वाले इन ‘टीम अन्नाई’ दांवपेचों से कुछ  सबक निकलते हैं जो जनवादी कारवाईयों के लिए अत्यधिक प्रासंगिक हैं. ये सबक आर्थिक-राजनीतिक वस्तुस्थिति  और उससे संबद्ध सत्ता की विभिन्न अभिव्यक्तियों की समझ के आधार पर विविध रणनीतियां और कार्यक्रम बनाने की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं. साथ ही, इनके आधार पर ‘जन लोकपाल’ आन्दोलन, जो निश्चित रूप से अन्ना और उसमें भी ‘टीम अन्ना’ का होकर रह गया, तथा बदलाव और बेहतरी के दावों पर चल रहे या चलाए जाने वाले आंदोलनों की असफलता और सीमा को भी समझा जा सकता है.

स्पेन में हाल-हाल (दिसंबर,2011) तक सत्ता में रहे दल ‘पार्तिदो सोसियालिस्ता ओब्रेरो एस्पान्योल’(स्पेन की समाजवादी कामगार पार्टी) की यूरोपीय आर्थिक मंदी का हवाला देते हुए लागू  की गई आर्थिक नीतियों के खिलाफ़ राजधानी माद्रिद और अन्य छोटे-बड़े शहरों में लोग सड़क पर हैं. पिछली 15 मई से जारी इस आंदोलन के साथियों ने खुद को ’लौस इन्दिग्नादोस’ या ‘लुटा-पिटा’ घोषित कर रखा है . इसे संयुक्त राज्य अमेरिका में चल रहे ‘Occupy Wall Street’ के आन्दोलन्कारियों द्वारा खुद को 99% कहे जाने से जोड़ें तो दुनिया भर में पूंजीवादी व्यवस्था की संकल्पना पर उठ रहे सवाल स्पष्टतः देखे जा सकते हैं.

यह लेख स्पेन के ‘लुटे-पिटे’ लोगों के आंदोलन, जिसे M-15 आंदोलन भी कहा जा रहा है, के द्वारा उठाये जा रहे मुद्दों को भारत में जन आंदोलनो के लिए उपयोगी मानते हुए सामने लाने का प्रयास है. यह प्रयास ‘जन लोकपाल’ आंदोलन के अनुभवों के परिप्रेक्ष्य में और भी जरूरी हो गया है.

‘अन्ना' आन्दोलन का टूटा तिलिस्म

भ्रष्टाचार मिटाने के लिए ‘जन लोकपाल’ का नारा देकर चले आंदोलन में अवधारणाओं और उन्हें सामने लाती व आगे बढ़ाती मांगों के सतहीपन से वर्तमान व्यवस्था को मजबूती ही मिली है. इसे भ्रष्टाचार की परिभाषा और ‘जन लोकपाल’ सहित बदलाव के लिए ‘टीम अन्ना’ के दूसरे सुझावों के स्तर पर समझा जा सकता है. भ्रष्टाचार को धन के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष लेन-देन या दूसरे शब्दों में कहें तो व्यवस्था की कार्यप्रणाली के स्तर पर ही देखा गया. इसमें व्यवस्था की संकल्पना या वर्तमान व्यवस्था की जरूरत पर ही सवाल खड़ा करने की बात सामने नहीं आई. पूरी पारदर्शिता के साथ संसद में बैठे दक्षिणपंथी से लेकर संसदीय वामपंथी दलों की सहमति से पारित कानूनों जैसे कि ‘सेज़ ऐक्ट-2005’ से व्यवस्था के जनविरोधी चरित्र में ‘सुधार’ या ‘परिवर्तन’ की सीमा जाहिर होती है. वर्षों से कश्मीर और उत्तर-पूर्व में देश की ‘सुरक्षा’ और ‘अखंडता’ के नाम पर जायज ठहराये जाते रहे कानून ‘आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर ऐक्ट (आफ्स्पा)’ पर संसद के सभी दलों के साथ-साथ ‘टीम अन्ना’ की भी चुप्पी भी यही जाहिर करती है.

जब इस आंदोलन के मंच से ‘वंदे मातरम’ और ‘भारत माता की जय’ जैसे नारों और ‘भ्रष्टाचारियों को फांसी पर लटका देने’ जैसे दावे होते हैं तब अपने मूल में प्रतिगामी और पौरूषवादी ‘राष्ट्रवाद’ को ही स्वीकार्यता दी जाती है. ‘टीम अन्ना’ भले ही जानबूझकर या भीड़ देखकर इस पहलू को नजरअंदाज करे यह खतरा कम नहीं होता. यहां यह बताना भी जरूरी है कि ऐसे दावे और नारे लोगों को बारीकियों  में जाकर व्यवस्था पर सवाल खड़ा करने की उनकी उदासीनता व अनिच्छा से छूट दिलाकर ‘लड़ने’ और ‘परिवर्तन’ लाने की सुविधा देते है. यह स्थिति तो व्यवस्था के लिए मुफ़ीद ही नहीं बल्कि संजीवनी की तरह है. ‘राष्ट्रवाद’ की ऐसी ही पौरूषवादी और विभेदकारी धारणाओं से समर्थित, पोषित और साथ ही इन्हीं धारणाओं को स्थापित करती और आगे बढ़ाती है यह व्यवस्था. ऐसे में यह कोई आश्चर्य नहीं कि इस आंदोलन से अपने स्थायित्व और वैचारिक वर्चस्व को मिलने वाली किसी भी चुनौती को लेकर निश्चिंत राजसत्ता ‘टीम अन्ना’ को ‘अनशन’ के लिए सभी सुविधाएं देती है. अतिशयोक्ति भले ही लगे लेकिन 16 अगस्त,2011 से शुरू हुए अनशन से पहले अन्ना की गिरफ़्तारी और तमाम सरकारी हेकड़ी दरअसल इस आंदोलन के लिए जरूरी परिस्थितियां ही बना और जुटा रहे थे. देश के कई हिस्सों में चल रहे जीवन के संघर्षों की कानोंकान खबर लगने से पहले ही उन्हें कुचल डालने वाला यह निज़ाम इस आंदोलन के लिए मैदान मुहैया कराने के लिए पूरा सरकारी अमला यूं ही नहीं झोंक देता.

ऐसे में, कांग्रेस, भाजपा,जनता दल (यू), बसपा, इत्यादि लगभग सभी पार्टियां भ्रष्टाचार मिटा देने और लोकपाल कानून पास करने तथा अपने द्वारा शासित राज्यों में लोकायुक्त बनाने की बातें  बड़े जोर-शोर से कर रही हैं. अपने यथास्थितिवादी और शोषक चरित्र को बिना छुपाए ही पाक-साफ़ दिखने का इससे अच्छा मौका क्या ही हो सकता है. तभी तो यह संभव हो पाता है कि उत्तर प्रदेश में चुनाव के ठीक पहले भ्रष्ट बताकर निकाले गये बसपाई को हाथों-हाथ लेने को आतुर भाजपा उत्तराखंड में लोकायुक्त कानून पास कराकर अन्ना और उनके साथियों की वाहवाही बटोर लेती है. यह भी कि चुनाव के दौर में "हम किसी दल के साथ नहीं हैं" कहने वाली ‘टीम अन्ना’ उत्तराखंड में घूम-घूमकर भाजपा सरकार को प्रशस्ति पत्र बांट तथा उसके लिए  वोट बटोर रही थी .यह समझना भी कोई मुश्किल नहीं है कि आंदोलन के मंच से भूमि सुधार और किसानों की समस्याएं दूर करने के तमाम दावे क्यों सिर्फ़ अपने वाजिब सरोकारों के लिए आंदोलन का समर्थन कर रहे लोगों, जो समर्थन में आए जनसमुदाय का बड़ा हिस्सा थे, को भुलावे में रखने के लिए ही थे. यह अनायास नहीं कि कई राज्यों में खुदकुशी कर रहे किसानों की बात हो, औपनिवेशिक भूमि अधिग्रहण कानून से दर-बदर किये गये छोटे-मंझोले किसानों का दर्द हो या खुदरा व्यापार में कभी भी थोप दिये जाने वाले प्रत्यक्ष विदेशी निवेशी से आशंकित करोड़ो लोगों की बात हो ‘टीम अन्ना’ रह-रहकर इनकी दुहाई देकर चुप्पी साध लेती है.

स्पेन के 'लुटे-पिटों' का आन्दोलन

"बस बहुत हो चुका"

"रोटी के बिना शांति नहीं"

"कहा तो जाता है, लेकिन यह लोकतंत्र नहीं है "

न जाने कितनी ओर से आ रहे नारों में यही आवाजें छाई हुई थीं. दिन था 15 मई, साल 2011 और जगह स्पेन की राजधानी माद्रिद की ‘पुएर्ता देल सोल’. वहां ‘प्लाज़ा’ कही जाने वाली यह जगह, जिसे हम अपने यहां सार्वजनिक मैदान जैसा समझ सकते हैं, माद्रिद का सबसे बड़ा प्लाज़ा है.

14 मई की रात से ही जुट रहे लोग, जो अगले दिन अनगिनत हो चुके थे, तब की ‘समाजवादी’ सरकार से ये सारे सवाल पूछ रहे थे. खोसे लुईस रोद्रिगेज़ जापातेरो की सरकार ने 12 मई को आर्थिक मंदी का हवाला देते हुए कई कटौती प्रस्तावों की घोषणा की थी. इनमें से प्रमुख थे-

1.सभी कर्मियों के वेतन में 5% और सरकारी कर्मचारियों के वेतन में 15% की कटौती.

2. उनके पेंशन पर रोक.

3. बच्चों के जन्म पर हर मां को दी जाने वाली 2,500 यूरो (1 यूरो=लगभग 68 रूपये)  की मदद पर रोक.

इन कटौतियों के साथ सरकार 15,000(1 मिलियन=10 लाख) मिलियन यूरो की बचत के फ़ायदे गिना रही थी. बजटीय खर्चों में कटौतियों के जो फ़ायदे सरकार गिना रही थी उसके तर्कों को समझना बेहतर होगा. 2007-08 से पहले संयुक्त राज्य अमेरिका और फिर यूरोप के देशों में उधार और वायदे के कारोबारी बैंकों और संस्थाओं के दिवालिएपन की भरपाई सरकारें करती आ रही थीं. ‘बेल आउट’ कही गई यह कार्रवाई दर असल बड़ी पूंजी के संकट को जनता की कमाई से उबारने की प्रक्रिया है. और तो और, इस अनियोजित खर्चे से पैदा बजट असंतुलन को पाटने के लिए सरकारों ने कर्ज़ लेने से भी गुरेज़ नहीं किया जो उन्हें वैश्विक और क्षेत्रीय स्तर की कर्जदाता संस्थाओं से उंचे ब्याज दर सहित इन्हीं संस्थाओं की अन्य शर्तों पर मिला.

कर्ज चुकाने के लिए और कर्ज लेने से हालत यह होती गई कि यूरोप के देशों में कर्ज उनके सकल राष्ट्रीय उत्पाद से भी ज्यादा हो गया. कुछ देशों में तो यह खतरनाक स्तर पर पंहुच गया जैसे यूनान में यह सकल घरेलु उत्पाद का 166%, इटली में 121% तथा स्पेन में 67% . कर्ज लौटा देने की इनकी कमजोर होती क्षमता के कारण एक तरफ तो इन्हें नये कर्ज नहीं मिल रहे थे और जो मिले वो भी असामान्य उंची ब्याज दरों पर. ब्याज चुकाने के लिए सरकारों ने राजस्व बढ़ाने के लिए बड़ी पूंजी पर करभार बढ़ाने के बजाय खर्चे और खासकर सामाजिक खर्चों में कटौती का ही रास्ता अख़्तियार किया. इन कटौतियों से होने वाली ‘अतिरिक्त आय’ के नुस्खे के साथ ही वित्तीय संस्थायें कर्ज देने को तैयार हुईं. इसी आर्थिक व्यवस्था से बंधे और इसके तर्कों से संचालित हो रही ‘संप्रभु’ देशों की सरकारों ने यह नुस्खा आजमाने में पूरी भक्ति दिखाई. जो थोड़ा-बहुत हिचके,पीछे रहे या अपनी जनता के राय के साथ चलने की कोशिश कर रहे थे उन्हें बदल दिया गया. पुर्तगाल में पापांदेराउ और इटली में सिल्वियो बर्लुस्कोनी की जगह पर सीधे कारोबारी जगत के ‘विशेषज्ञों’ को बिठा दिया गया.

ये सब इसलिए भी हो रहा है कि यूरोपीय यूनियन की आर्थिक कार्यप्रणाली में निर्णायक भूमिका यूरोपीय केंद्रीय बैंक (E.C.B) की है जो ईकाई राष्ट्रों की सरकारों के प्रति न तो जवाबदेह है और न ही इन सरकारों का इसके कामकाज या नीति-निर्धारण की प्रक्रिया में कोई दखल है. इसके अलावा, पूरे यूनियन के लिए एक मुद्रा की व्यवस्था से छोटे देशों के लिए अपने बजट असंतुलन को अपनी जरूरत के मुताबिक स्थानीय  मुद्रा छापकर पाटने का विकल्प भी खतम हो गया है. यूनियन के पहले से ही आर्थिक रूप से मजबूत रहे देशों जैसे कि जर्मनी, फ्रांस इत्यादि इन संस्थाओं की मनमर्जी खतम करने की दिशा में कोई कदम उठाना तो दूर इनके फरमानों को लागू किये जाने की नसीहतें (पढ़ें दबाव) देते रहते हैं. कम-से-कम पिछले दस सालों में इन देशों में काबिज रही उदारीकरण की घोर समर्थक दक्षिणपंथी सरकारों के दौर में अत्यधिक केंद्रिक्रित और गैर बराबरी बढ़ाने वाली आर्थिक व्यवस्था, जिसकी अनिवार्य परिणती राजनीतिक स्तर पर भी होती है, ही हावी है. इस निजाम को आगे बढाते हुए बड़े और संपन्न देशों से इतर अन्य छोटे मुल्कों में भी दक्षिणपंथी उभार, जैसे कि स्पेन और इटली की वर्तमान सरकारें, तथा कई देशों में रंगभेद और घोर मुस्लिम विरोध की सवारी करती और उसे आगे बढ़ाती सरकारे बनने से गरीबी और बेकारी से पैदा हो रहा अनिश्चय तथा गुस्सा और गहराता जा रहा है. इस पूरी प्रक्रिया में 1930 के दशक की महामंदी के बाद कीन्स के नुस्खों पर खड़े ‘कल्याणकारी राज्य’ और इसके राजनीतिक चेहरे के बतौर लगभग पूरे यूरोप में कायम रही ‘सोशल डेमोक्रेटिक’ दलीय परंपरा या तो खत्म की जा रही है या पूर्व में खुद को ‘समाजवादी’ घोषित करते रहे दलों के द्वारा नव उदारवादी एजेंडे को पूरी तरह अंगीकार किया जा रहा है . स्पेन में दिसंबर, 2011 तक सत्तासीन रहा ‘समाजवादी’ दल भी इसी कड़ी का हिस्सा है.

15 मई, 2011 से माद्रिद के पुएर्ता देल सोल से बारबार सुनाई दे रहे नारे "पूरी व्यवस्था ही समस्या है", "लोकतंत्र हो या तानाशाही दमन हमेशा ही चलता रहता है", "नेता और बैंकरों को शिक्षा की जरूरत है " घोषित और अघोषित दक्षिणपंथी दलों व सिर्फ़ अपने गवर्निंग बौडी को जवाबदेह बैंकों की मिलीभगत से चल रही पूंजीवादी व्यवस्था के जनविरोधी मूल चरित्र से ही सवाल कर रहे थे. ऐसे  कई अन्य सवाल और वर्तमान व्यवस्था से उपजे संकट के विभिन्न पक्षों को वहां जुटे लोग सामने ला रहे थे. हिस्सेदारी करने आए ख्वान आगीर्रे उस समय तक बेरोजगार हो चुके 50 लाख लोगों की तरफ से सभी सांवैधानिक और मौलिक अधिकारों को सुनियोजित ढ़ंग से खतम करने वाली व्यवस्था की परतें खोल रहे थे तो फ्रांसीसी सेना की ओर से नाज़ियों के खिलाफ़ लड़ चुके, 1948 के अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार  पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले अंतिम जीवित व्यक्ति तथा "इन्दिगनादोस" पुस्तक के लेखक स्टिफाने हेसेल इस जनाक्रोश को द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूरोप में लागू रहे सामाजिक सुरक्षा के विविध उपायों के खत्म किये जाने से जोड़ रहे थे .

यहां से उठ रहे नारे तथा सवाल किसी एक निश्चित दलिय एजेंडे के तहत नहीं रखे जा सकते हैं और न ही पहले से तय और घोषित कार्यक्रम या मांगपत्रों से निर्धारित हो रहे हैं. वर्ग संघर्ष की स्पष्ट व्याख्याओं व क्रांति के अगुआ दस्ते के रूप में किसान, मजदूरों सहित पूरे सवर्हारा वर्ग की अनिवार्य उपस्थिती पर केंद्रित पारंपरिक वामपंथी आंदोलनों से जितना यह अपने नारों में विविधता और सिर्फ़ वर्ग संघर्ष की बात न करने की वजह से अलग है, उतना ही लोगों के जुटने तथा निर्णय लेने की प्रक्रिया के स्तर पर भी है. मसलन, 14 मई की रात से पुएर्ता देल सोल पर जुटने या स्पेन के अन्य शहरों, जैसे 26 जून से कादिज़ और 25 जून से बार्सीलोना से आनेवालों जत्थों का 23 जुलाई,2011 को माद्रिद में मिलना किसी एक दल या संगठन ने तय नहीं किया था . और न ही जुटे हुए सारे लोग कुछ पूर्वनिर्धारित कार्यक्रमों को लागू कर रहे थे. यहां जमा अनगिनत लोग अलग-अलग चिंताओं तथा मांगों के साथ विभिन्न संगठनों से आए थे. हालांकि व्यापक स्तर पर व्यवस्था से क्षुब्ध ये लोग सभी महत्वपूर्ण निर्णय एक-दूसरे से बातचीत, बहस, प्रस्तावों के समर्थन, विरोध और अस्वीकृति के जरिये  ही ले रहे थे. हर रविवार को यहां लगने वाली आम सभा ऐसी ही व्यापक सहमतियों की गवाह बनती है. यहां सुनाई देने वाले तमाम अलग-अलग नारों से जमा हुए ‘लुटे-पिटे लोगों’ की अलग-अलग चिंताए सामने आ रहीं थी. ऐसे कुछ नारे थे:

"राज्य=पूंजी, ये सब बर्बाद करते हैं और हमें कीमत चुकानी पड़ती है "

"अनिश्चितताओं से भरे इस लोकतंत्र का सबसे बड़ा फ़रेब चुनावी तामझाम है "

"यहां जुटी जनता चुनावी संस्था को अवैध घोषित करती है "

"जब बात कानून और न्याय की आएगी तो हम न्याय चुनेंगे "

"हम नहीं चाहते कि कोई दल इस आंदोलन से जुड़े. हम चाहते हैं कि कुछ बदले "

"दक्षिण और वामपंथ के बीच की बहस का कोई मतलब नहीं है "

अराजक लगने की हद तक विविधता लिए सवाल तथा राजनीतिक सोच प्रस्तुत करते ये आह्वान वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था की तमाम अभिव्यक्तियों पर ही हमला बोलते हैं. यहां ध्यान देने वाली बात है की ये सब किसी एक नेता या मसीहा मान लिए गये व्यक्ति अथवा टीम के मार्फ़त न आकर व्यक्तियों या समूहों से आ रही हैं. अब इसे भारत में ‘जन लोकपाल’ आंदोलन की दशा-दिशा तय करते बयानों का स्त्रोत सिर्फ़ अन्ना या उनकी टीम तक सीमित रह जाने के बरक्स रखें तो दोनों आंदोलनों के आंतरिक लोकतंत्र के साथ-साथ समाज के इनके द्वारा पेश मॉडल में विभिन्न मतों के सामंज्स्य बनाने की क्षमता का अंतर भी पता चलता है. यह बात कि अनगिनत लोग एक नियत दिन को बैठ-विचारकर रणनीति बनाते हैं और यह जरूरी काम कुछ चुनिंदा लोगों पर नहीं छोड़ते इसी अंतर की ओर इशारा करती है.

स्पेन के पुएर्ता देल सोल से उठ रही विभिन्न मांगों के जरिये लोग व्यवस्था की विभिन्न संस्थाओं पर सवाल खड़े कर रहे थे. यह सब देखकर यह भ्रम हो सकता है कि उनका सारा गुस्सा राजसत्ता के दिखने वाले हिस्से की ओर लक्षित है. इससे व्यवस्था की संकल्पना के स्तर पर उनकी समझ सतही भी मालूम पड़ सकती है. लेकिन तमाम नारों के बीच और उन्हें जोड़ती हुई कुछ ऐसी बातें भी आ रहीं थी जिससे इस आंदोलन की कुछ और ही तस्वीर उभरती है.

"और पढ़ो, समझो "

"सिर्फ़ हुक्म मानना हमारा अधिकार नहीं है "

"इस लड़ाई को रोज़-रोज़ लड़ने की जरूरत है "

"हर एक का दिल धड़कती हुई क्रांति है "

इनमें सबसे पहला नारा बड़ा ही दिलचस्प और इस आंदोलन के वैचारिक स्तर को समझने के लिए महत्वपूर्ण है. पढ़ने और चीजों को समझने की बात से व्यवस्था क्या है तथा कैसे काम करती है के जटिल लेकिन रोजमर्रा की जिंदगी में गहरे तक मौजूद रहकर ‘सामान्य’ दिख पड़ने वाले तंत्रों की थाह लेने की इच्छाशक्ति जाहिर होती है. इससे भले ही व्यवस्था को बदल डालने का काम पूरा होता न दिखता हो लेकिन उसकी विविध अभिव्यक्तियों से भिड़ने का उत्साह तो बनता ही है जो बदलाव के लिए एक अहम शर्त है जिसकी बानगी बाकी नारे प्रस्तुत करते हैं. यहीं आकर यह आंदोलन भारत में ‘जन लोकपाल’ के लिए चले अभियान से राजनीतिक समझ की दृष्टि से अधिक परिपक्व और व्यवस्था के तमाम तंत्रों को समझकर लड़ाई लड़ने के मोर्चे पर ज्यादा बेहतर तैयारी में दिखता है. इसी वजह से वहां की सत्ता को इससे मिलने वाली चुनौती भी कहीं ज्यादा प्रखर है जिसको भांपते हुए शुरूआत से ही अलग-अलग तरीकों से आंदोलन को निपटा देने की तैयारियां कहीं कम तो कहीं ज्यादा दिखती रही हैं.

सबसे पहले 20 मई को, जब आंदोलन शुरू हुए पांच दिन ही हुए थे, स्थानीय निकायों के 22 मई को तय चुनावों का हवाला देते हुए वहां के चुनाव आयोग ने सभी तरह की सभाओं पर रोक लगा दी. जाहिर है, पुएर्ता देल सोल में खड़े हो रहे आंदोलन को इसका निशाना बनना ही था. इसी आदेश पर ‘त्वरित’ कार्रवाई करते हुए बार्सिलोना शहर के ‘प्लाज़ा देल कातालुन्या’ में टेंट-कनात सहित डेरा डाले प्रदर्शनकारियों को हटा दिया गया. बहाना यह बना कि उस जगह की सफ़ाई करनी है और दिन-रात चहल-पहल के जीवंत माहौल की गवाह रही सभी निशानियां खतम कर दी गईं. तभी तो वहां मौजूद एक सहभागी ने कहा "यह साफ़ करना नहीं, उजाड़ना है ". लेकिन, सत्ता के तमाम रूपों की परतें खोलकर लड़ने के लिए जमा लोग इस सबके लिए तैयार थे. आगे बढ़ते रहने और आंदोलन जारी रखने का उत्साह "न हम कहीं जाएंगे और न चुप रहेंगे, यूं ही आवाज़ उठाते रहेंगे " के नारों तथा आसपास की विज्ञापनों  से सजे बोर्डों और इश्तहारों को ढ़ंकती, आंदोलनकारीयों के गुस्से को कलात्मक अभिव्यक्ति देती इबारतों से जाहिर हो रहा था. ऐसी ही एक इबारत कह रही थी "बदलाव की लड़ाई चलते रहने वाली है"

यही नहीं, अपने जुटान और सामुहिक लड़ाई से वे लोग मानवीय रिश्तों को आंकड़ों तथा आगे रहने की होड़ में बदल देने वाली व्यवस्था को शक्ल और आधार देती अवधारणाओं के बरक्स सहयोग और सहभागिता के मूल्यों को भी स्थपित कर रहे थे. "सम्मान", " प्रेम और क्रांति हमराह हैं" तथा ऐसे ही कई और नारों में यह साफ़-साफ़ दिख रहा था. आंदोलन के समर्थन में वहां मौजूद अभी के दौर के जाने-माने लातिन अमेरिकी लेखक एदुआर्दो गालेआनो भी इन उम्मीदों को आवाज़ देते हुए कह रहे थे "दूसरी दुनिया संभव है."

इन मायनों में M-15 आंदोलन और ‘टीम अन्ना’ के आंदोलन में फ़र्क देखा जा सकता है. याद करिए किस तरह से अन्ना की स्वास्थ्य चिंताओं तथा उनकी टीम के बिना व्यापक जनसहमति के लिए गये राजनीतिक निर्णयों और दिये गये बयानों के बीच मौजूदा व्यवस्था से इतर एक बेहतर दुनिया की आस लिए आंदोलन में भागीदारी करने वाले लोगों की आशाएं कैसे कमजोर पड़ गईं थी. वर्तमान व्यवस्था में ही कुछ जोड़कर या मामूली बदलाव करते हुए इसे ‘ठीक’ कर देने तक सीमित रहे और स्थापित आर्थिक-राजनीतिक तंत्र को नकारते हुए बराबरी और न्याय की उम्मीद न देने और निर्णय प्रक्रिया को कुछ लोगों पर छोड़ देने की स्वाभाविक परिणति थी यह.

अब क्या: कुछ निष्कर्ष

M-15 आंदोलन की तात्कालिक वजह बने 12 मई, 2011 को लागू कटौती-प्रस्तावों को आगे बढाते हुए ज़ापातेरो की सरकार ने मुख्य विपक्षी दल ‘पार्तिदो पोपुलार’ के साथ मिलकर बजट घाटा को जी.डी.पी के 0.4% तक सीमित करने वाला संविधान-संशोधन प्रस्ताव पारित कराया . 1975 में तानाशाह फ्रांको के फ़ासीवादी राज के खात्मे के बाद के राजनीतिक परिदृश्य में ‘समाजवादी’ और घोषित रूप से धार्मिक कट्टरवाद, अंधराष्ट्रवाद एवं स्वच्छंद बाजारवाद के झंडाबरदार दल के बीच किसी भी तरह का यह पहला समझौता था. 2004-11 के अपने कार्यकाल में ज़ापातेरो की सरकार द्वारा लागू किये कये कई प्रगतिशील कानूनों-प्रस्तावों जैसे कि पहले 14 हफ्तों तक गर्भपात कराने का अधिकार (कुछ शर्तों के साथ 16-17 आयुवर्ग की लड़कियों के लिए भी), आप्रवासियों  के लिए 60 दिन तक बिना किसी दस्तावेजी अनिवार्यता के रहने की छूट, बड़ी पूंजी के उद्दमों पर टैक्स में बढ़ोतरी , इत्यादि की वजह से इसी ‘पार्तिदो पोपुलार’ की तीखी आलोचना झेल रही सरकार का यह समर्पण दुःखद तो था लेकिन अप्रत्याशित नहीं. वस्तुतः निजी पूंजी के संकट को पहले अमेरिका और बाद में यूरोप में आर्थिक मंदी करार दिये जाने के साथ-साथ उससे निपटने के सभी उपाय सरकारों की आर्थिक-राजनीतिक संप्रभुता को ही खतम कर रहे थे. ऐसे में, 2009 से ही ज़ापातेरो की सरकार जनहित के कई प्रस्तावों से पीछे हट रही थी. मुख्य विपक्षी दल सरकारी कटौतियों को नाकाफ़ी बताते हुए आये दिन बजट व्यय खासकर सामाजिक खर्चे में भारी कमी और बाजार को कामगारों की भरती और छंटनी के मुद्दे पर और ज्यादा छूट दिये जाने की मांग कर रहा था. महत्वपूर्ण आर्थिक मुद्दों पर दक्षिणपंथी दलों तथा संसद के अंदर और बाहर मजबूती से जम चुकी मुक्त बाजार के समर्थक संस्थाओं और अवधारणाओं से सरकार के संचालित होने की परिणती थी यह समझौता. इसके अलावा इससे राजनीतिक दलों के वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ़ होने के भ्रम दूर हुआ. साथ ही, कमोबेश सभी दलों के बीच आर्थिक मोर्चे पर कायम सहमति, अपनी राजनीतिक तथा अन्य सभी अभिव्यक्तियों के साथ, जाहिर हुई. इस अद्भुत विचार साम्य से उभर रही विकल्पहीनता के वास्तविक संकट को M-15 के "सच्चा लोकतंत्र तुरंत बहाल करो " के आह्वान में स्पष्ट देखा जा सकता है. आंदोलन के समर्थन में आए प्रसिद्ध स्पेनी संगीतकार लुईस एदुआर्दो की "यह आंदोलन पार्टीशाही के खिलाफ़ है " बात इसी की ओर इशारा कर रही थी.

अगर बात भारत की करें तो इसी विकल्पहीनता का आलम है. 1991 के बाद लागू हुए आर्थिक ’उदारीकरण’ के विभिन्न पहलुओं को लेकर थोड़े-बहुत मौकापरस्त विरोध के पीछे लगभग सभी दलों की सहमति हमारे दौर की सच्चाई है. ऐसे में, अन्ना के आंदोलन की शुरूआत में सरकार को भ्रष्टाचार के मुद्दे पर घेरने को व्यवस्था के लिए चुनौती समझकर समर्थन में आए लोग ‘टीम अन्ना’ के व्यक्तिगत ईमानदारी और कुछ दलों के दिखावे के शोशेबाजियों के उत्सव से खुद को जुड़ा नहीं महसूस कर पा रहे थे. यहां पर इस आंदोलन तथा M-15 के ‘लुटे-पिटे’ लोगों के आंदोलन के अंतर को विकल्प प्रस्तुत करने की बुनियादी कसौटी पर समझा जा सकता है. इसके साथ यह जोड़ना भी जरूरी है कि स्पेन के आंदोलनकारियों द्वारा भी किसी एक खास मॉडल की बात नहीं कही जा रही थी. उनके बीच से आ रही बातों से आगे की रणनीतियों और कार्यक्रमों की कोई साफ़ तस्वीर नहीं उभर रही थी. एक प्रदर्शनकारी आल्बेर्तो का मानना था कि "आंदोलन को अन्य शहरों और कस्बों तक फैलना चाहिये ". वहीं समर्थन में आए कातालुन्या विश्वविद्यालय के अध्यापक इस्माएल पेन्या कह रहे थे "मेरा मानना है कि प्रस्तावों को ठोस रूप देना जरूरी है ताकि व्यवस्था में बदलाव के अभियान को एक मुकम्मल शक्ल दी जा सके जिसके अभाव में यह आंदोलन भी असफल हो जाएगा".

वैसे M-15 का आंदोलन नारों और संगठन के स्तर पर जितना विविध और विकेंद्रित रहा है उससे जन आंदोलनों को पार्टी कार्यक्रम तथा संगठन के चश्मे से देखने वाले इसकी सार्थकता और सफलता पर संदेह करेंगे. लेकिन Occupy Wall Street के जन उभार से लेकर Arab Spring तक तथा थोड़ा पीछे जाकर लातिन अमेरिका के Pink Tide के प्रगतिशील सरकारों की बात हो, कम-से-कम शुरुआत में ये सभी विभिन्न स्तरों पर इसी तरह की विविधता और  विकेंद्रीकरण की बुनियाद पर आगे बढ़े. Arab Spring को आगे चलकर कुछ संगठनों-दलों द्वारा हथिया लिया जाना और बाद में मिस्र तथा ट्युनीशिया के चुनावों में इस्लामिक दलों का राजनीतिक दबदबा तो दिखता है वहीं दूसरी तरफ़ Occupy आंदोलन आज भी किसी एक पार्टी के झंडे के बगैर चल रहा है. लातिन अमेरिका में चाहे वह इक्वादोर की राफाएल कोर्रेआ की सरकार हो या वोलिबियाई इवो मारालेस की, इनकी शुरुआत वहां के मूल निवासियों के अधिकारों के लिए संघर्षरत अनेकों संगठनों के साथ आकर लड़ने से हुई थी. यह परिघटना वर्तमान समय में सभी जगह हावी पूंजीवादी आर्थिक-राजनीतिक व्यवस्था और उससे संबद्ध सामाजिक तथा सांस्कृतिक विद्रूपताओं से समाज के विभिन्न स्तरों पर पनप रहे असंतोष तथा विखंडन की अलग-अलग रूपों में हो रही अभिव्यक्ति के बतौर देखी-समझी जा सकती है. सीधे-सीधे दिख जाने वाले दो वर्गों की स्थापना के आधार पर कार्यक्रम बनाना तथा उसमें व्यापक जनभागीदारी सुनिश्चित करते हुए किसी आंदोलन को आगे बढ़ाना अगर असंभव या मुश्किल नहीं तो कम-से-कम एकमात्र विकल्प नहीं रह गया है. यह कहा जा सकता है कि अभी के अनिश्चित हालातों में उभर रही असहमति की तमाम आवाजों को ऐसे ही आंदोलनों में सुना जा सकेगा जो अपने अनुभवों से सीखते, आगे बढ़ते, हारते तथा बदलती हुई परिस्थितियों में रास्ता बनाते अपनी जरूरतों-मागों के हिसाब से बेहतर दुनिया गढ़ेंगे. कुछ ऐसा ही स्पेन में हो रहा है जहां पिछले साल 20 नवंबर को हुए आम चुनावों में फ्रांको की तानाशाही (1939-75) की  वैचारिक उत्तराधिकारी दल ‘पार्तिदो पोपुलार’ प्रचंड बहुमत से सत्ता में आई और मारियानो राखोई नए प्रधानमंत्री चुने गए. चुनाव पूर्व के ‘स्पेन को बदल डालने’ के ‘साहस’ का प्रदर्शन करते हुए सत्ताधारी दल का उठाया गया सबसे पहला कदम सामान्य आय वर्ग और मजदूरों के खिलाफ़ था. साप्ताहिक कार्य घंटों को 35 से बढ़ाकर 37.5 कर दिया गया . बीमारी की हालत में मिलने वाली आर्थिक मदद को खतम कर दी गई और अब बीमारी के चौथे से बीसवें दिन तक उन्हें  वेतन का 60% ही मिला करेगा . राजधानी माद्रिद में सरकार की प्रतिनिधि एस्पेरांजा आगीर्रे ज्यादा काम लेने, वेतन बढ़ोतरी पर रोक, सामाजिक व्यय में भारी कटौती सहित अन्य उपायों से सरकारी खर्चे में 40,000 मिलियन यूरो की बचत का जश्न मनाते हुए बता रहीं थी कि "अब बिना मजदूरों की संख्या बढ़ाए ज्यादा उत्पादन हो सकेगा ". वहीं सरकार की न्यायिक सलाहकार रेखिना प्लान्योल कामगारों से "राष्ट्रहित" में ये "कुर्बानी" देने की अपील कर रहीं थी. सिर्फ़ आर्थिक ही नहीं अन्य मोर्चों पर भी इस सरकार ने ‘सुधार' के अपने प्रतिगामी मूल्यों को थोपना शुरू किया. मसलन काफ़ी हद तक संप्रभु रहे इकाई राज्यों के बजट प्रस्तावों के लिए केंद्र से अनुमति मिलना अनिवार्य कर दिया गया. महिलाओं और किशोरियों के गर्भपात के अधिकार को भी ख़तम कर 1985  तक लागू रहे क़ानून को वापस लाने की बात की जा रही है जो यह अधिकार सिर्फ़ अभिभावकों और समाज की मर्जी पर छोड़ता था. 

कटौती तथा और कटौती के नित नए फरमानों तथा पारिवारिक मूल्यों और ‘संस्कृति' के नाम पर पितृसत्ता और सामंती मूल्यों की मजबूती के दौर में M -15  आन्दोलन की जरूरत पहले से कहीं ज्यादा है और वह जारी भी है. तभी तो जब वहाँ के वित्त मंत्री लुईस दे गिन्दोस यूरोपियन यूनियन को पिछली सरकार से ज्यादा कटौती एवं  बचत हासिल करने का भरोसा दे रहे थे और मीडिया ‘जनमत संग्रहों' में तमाम सरकारी फैसलों पर लोकप्रिय समर्थन का दावा कर रहा था तब इस सबके बीच 7 फरवरी, 2012 को कटौती प्रस्तावों के खिलाफ़ हुए व्यापक प्रदर्शनों में लग रहे नारे M-15 आन्दोलन से ही निकले थे. ऐसा ही एक नारा था "समस्या आर्थिक मंदी नहीं, यह व्यवस्था है."

भारत में अदूरदर्शी राजनितिक दृष्टि की शिकार और अब निष्प्राण हो चुके आन्दोलन के एकमात्र बच रहे प्रतीक ‘टीम अन्ना' की यदा- कदा ही सुनाई पड़ने वाली घोषणाएं पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में नक्कारखाने में तूती की आवाज़ बनकर रह गई. इसके इस हश्र को देखते हुए, उम्मीद अब उन अनगिनत तथा देश के कई हिस्सों में बिखरे पड़े छोटे-बड़े जनउभारों से है जो स्थानीय स्तर पर जीवन अधिकारों से जुड़े स्थानीय मुद्दों को उठाते हुए,  इस प्रक्रिया में वृहद सरोकार बनाते हुए ऐसे ही अन्य जनांदोलनों  के साथ मिलते-लड़ते, व्यवस्था के बड़े और विस्तृत तंत्र के व्याकरण को अपनी जिजीविषा से खारिज कर रहे हैं.

(रामशरण जोशी के लिए जिन्होंने हिंदी में लिखने को उत्साहित किया) 

इस लेख के साथ एक सन्दर्भ सूची भी थी, जिसे ब्लॉगर पर पोस्ट करने में मुश्किल आने की वजह से हटा दिया गया है. संदर्भ सूची के साथ लेख यहां क्लिक करके हासिल किया जा सकता है. 

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ कैसे लड़ें पूंजीवादी व्यवस्था-तंत्रों से ”

  2. By Reyaz-ul-haque on May 24, 2012 at 5:34 PM

    लेखक ने एक अच्छा आकलन पेश किया है, लेकिन मेरी सहमति उनके इस निष्कर्ष से नहीं है कि ‘सीधे-सीधे दिख जाने वाले दो वर्गों की स्थापना के आधार पर कार्यक्रम बनाना तथा उसमें व्यापक जनभागीदारी सुनिश्चित करते हुए किसी आंदोलन को आगे बढ़ाना अगर असंभव या मुश्किल नहीं तो कम-से-कम एकमात्र विकल्प नहीं रह गया है.’ मुझे लगता है कि वर्गीय आधार पर राजनीति करने वाले किसी दलगत नेतृत्व से बचने की यह कोशिश इसलिए है कि पिछले छह-सात दशकों में यूरोप की कम्युनिस्ट-वामपंथी पार्टियों ने सिवाय जनता को धोखा देने और संघर्ष से भागने के कुछ नहीं किया है. उन्होंने जनता का भरोसा तोड़ा है और इसीलिए वे आज इस संकट को क्रांतिकारी संघर्ष में बदल पाने में नाकाम साबित हुई हैं.
    इसके अलावा, भले ही समाज के विभिन्न तबके बहुत बिखरे हुए दिखें और वे ‘सीधे-सीधे दिख जाने वाले दो वर्गों’ के रूप में संगठित नहीं हों, लेकिन उनके खिलाफ साम्राज्यवादी शोषण और उत्पीड़न ही उनको एक करता है और उनकी एकताबद्ध संघर्ष की जरूरत को सामने लाता है. और इसीलिए दो वर्गों की स्थापना के आधार पर ही आंदोलनों को तार्किक परिणति तक पहुंचाया जा सकता है, भले ही इन आंदोलनों की शुरुआत इस आधार पर नहीं हुई हो.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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