हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

शांति के ठेकेदार देश हथियारों के सबसे बड़े उत्पादक भी हैं

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/22/2012 07:17:00 PM


एदुआर्दो गालेआनो से यह बातचीत द प्रोग्रेसिव के लिए आल्टरनेटिव रेडियो के डेविड बार्सामियन ने की है. यह बातचीत 13 जुलाई 2003 को की गई थी और बाद में साक्षात्कारों की किताब लाउडर दैन बॉम्ब्स में प्रकाशित हुई थी. नीचे का परिचयात्मक नोट (संपादित) भी बार्सामियन का लिखा हुआ है. अनुवाद: रेयाज़ उल हक़
एदुआर्दो गालेआनो लातिन अमेरिका के सबसे असाधारण लेखकों, किस्सागो, पत्रकारों और इतिहासकारों में से एक हैं. ओपेन वेन्स ऑफ लातिन अमेरिका: फाइव सेंचुरीज ऑफ द पिलेज ऑफ अ कॉन्टीनेंट उनकी क्लासिक रचना है. उनकी दूसरी किताबों में बुक ऑफ एम्ब्रेसेज, वी से नो: क्रॉनिकल्स 1963-1991 और तीन खंडों में पुरस्कृत रचना मेमोरी ऑफ फायर शामिल हैं. इसके अलावा मिरर, वाकिंग वर्ड्स, सॉकर इन सन एंड शैडो, अपसाइड डाउन, डेज एंड नाइट्स ऑफ लव एंड वार, वायसेज ऑफ टाइम उनकी अन्य चर्चित किताबें हैं.

गालेआनो के उरुग्वाई नरम, सुस्त लहजे में कही गई बातों में धारदार बौद्धिकता के साथ-साथ काव्यात्मक संवेदना, काटती हुई चुटकियां और सामाजिक न्याय की प्रतिबद्धता मिली हुई है.

1940 में मोंतेविदेओ में जन्मे गालेआनो एक अद्भुत रचनाकार हैं. 13 साल की उम्र में वे एक स्थानीय समाजवादी साप्ताहिक में राजनीतिक टिप्पणियां और कार्टून प्रस्तुत करने लगे थे. बाद में वे विभिन्न पत्रिकाओं और अखबारों के संपादक बने जिनमें एपोका दैनिक भी शामिल है. 1973 में वे अर्जेंटीना में निर्वासन में चले गए जहां उन्होंने क्राइसिस पत्रिका की स्थापना की और उसका संपादन किया. वे 1976 से 1984 तक स्पेन में रहे और उसके बाद उरुग्वे लौटे.

मीडिया और उपभोक्तावाद के प्रखर आलोचन गालेआनो अपनी किताब वी से नो में लिखते हैं: ‘मास मीडिया हकीकत को उजागर नहीं करता. वह उसे छुपाता है. वह बदलाव लाने में मदद नहीं करता, वह बदलावों से बचने में मदद करता है. यह जनवादी भागीदारी को बढ़ावा नहीं देता. यह निष्क्रियता, चीजों को बरदाश्त करने और मतलबपरस्ती को बढ़ावा देता है. यह रचनात्मकता पैदा नहीं करता, यह उपभोक्ताओं को पैदा करता है.’

अपनी किताब डेज एंड नाइट्स ऑफ लव एंड वार में वे इसकी व्याख्या करते हैं कि वे क्यों लिखते हैं और क्या लिखते हैं: ‘कोई भी आदमी दूसरों तक अपनी बात पहुंचाने और उनसे जुड़ने के लिए लिखता है, वह दर्द पहुंचाने वाली चीजों को नकारने के लिए लिखता है और खुशी देने वाली चीजों को बांटने के लिए लिखता है. लोग अपने अकेलेपन के खिलाफ और दूसरों के अकेलेपन के खिलाफ लिखते हैं...चेतना को जगाने के लिए, पहचान को उजागर करने के लिए लिखते हैं- क्या साहित्य इस वक्त में बेहतर काम करने का दावा कर सकता है?’

गालेआनो अपने पाठकों को लातिन अमेरिका के दौरे पर ले चलते हैं, जो इसाबेल आयेंदे के मुताबिक ‘नक्शे पर एक बीमार दिल की शक्ल में उभरने वाला महाद्वीप है.’ उनकी कल्पनाशील लेखन शैली पूरे गोलार्ध में बीमारों को ऑक्सीजन मुहैया कराती है. मेमोरी ऑफ फायर के दूसरे खंड फेसेड एंड मास्क्स की शुरुआत इस मिथकीय तरीके से होती है:

‘नीला बाघ दुनिया को कुचल देगा. बिना शैतान और बिना मौत वाली दूसरी दुनिया इस दुनिया के विनाश से पैदा होगी. यह दुनिया यही चाहती है. यह पुरानी और नाखुश दुनिया मर जाना चाहती है, यह जन्म लेना चाहती है. बंद आंखों के पीछे रोते रहने से थक चुकी और अंधी हो चुकी यह दुनिया. मरने के करीब पहुंच चुकी यह दुनिया जल्दी-जल्दी दिनों को पार करती है, वक्त के अंबार को और रात को पीछे छोड़ते हुए. इसे सितारों की हमदर्दी हासिल है. जल्दी ही आदि पिता सुनेंगे कि दुनिया कुछ दूसरा होना चाहती है और तब निजात मिलेगी, अपने झूले में सो रहा नीला बाघ कूदेगा.’

सवाल: ओपेन वेन्स ऑफ लैटिन अमेरिका की दस लाख से ज्यादा प्रतियां बिकी हैं. इसका अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ है. इसे आपने तीन महीनों में लिखा था, जो कि असाधारण रूप से बहुत छोटी अवधि है. ऊर्जा के इस विस्फोट का स्रोत क्या था?

गालेआनो:  कॉफी. इस किताब का असली लेखक कॉफी है. मैंने समुद्ग के बराबर कॉफी पी, क्योंकि तब 1970 में सुबह के समय मैं मोंतेविदेओ में विश्वविद्यालय में काम करता था. मैं विश्वविद्यालय प्रकाशनों का संपादक था. दोपहर में मैं बतौर संपादक एक निजी प्रकाशक के यहां काम करता था जहां मुझे हर तरह की किताबों को फिर से लिखना और सुधारना पड़ता था. आप जितनी तरह की किताबों की कल्पना कर सकते हैं, उतनी तरह की किताबें, जैसे कि मच्छरों का यौन जीवन. तब शाम के सात या आठ बजे से लेकर सुबह के पांच या छह बजे तक मैं ओपेन वेन्स लिखता था. मैं तीन महीनों तक सोया नहीं. लेकिन यह तो कॉफी के गुणों का प्रचार था. इसलिए अगर आप वामपंथी नहीं बनना चाहते कॉफी से सतर्क रहें.

सवाल: लेकिन किताब के इतने लंबे समय तक लोकप्रिय बने की वजह क्या है?

गालेआनो: शायद अपनी ही पीड़ा से मजे लेने की प्रवृत्ति. मैं इसे समझ नहीं सकता. किताब उन पाठकों को खूब सारी ऐतिहासिक सूचनाएं मुहैया कराती है जो विशेषज्ञ नहीं हैं. मैंने ओपेन वेन्स में तथ्यों की खोज नहीं की है. मैंने इतिहास को फिर से ऐसी भाषा में लिखने की कोशिश की है जिसे कोई भी समझ सके. शायद इसीलिए किताब इतनी कामयाब हुई होगी. शुरुआत में तो यह बिल्कुल कामयाब नहीं थी. लेकिन बाद में इसने अपनी राह बनाई और चल निकली. यह आज भी चल रही है.

शायद किताब का केंद्रीय विचार ही इसके लिए संबल बन गया हो कि आप किसी बौने को गलती से बच्चा नहीं समझ सकते. उनका कद एक होता है लेकिन फिर भी वे पूरी तरह अलग होते हैं. इसलिए जब आप वह सब बातें सुनते हैं जो टेक्नोक्रेट विकासशील देशों के बारे में कहते हैं तो मानो वे बताना चाहते हैं कि हम पूंजीवाद के बचपन के दौर से गुजर रहे हैं, जो कि बिल्कुल ही सही नहीं है. लातिन अमेरिका विकास के रास्ते पर नहीं जा रहा है. यह विकास का नतीजा है, पिछली पांच सदियों के इतिहास का नतीजा है.

सवाल: पत्रिकाओं में लिखते हुए या विश्वविद्यालयों में पढ़ाते हुए आपका एक आरामदेह जीवन हो सकता था, लेकिन अरसा हुआ जब आपने बेआवाज लोगों की तरफ से मेहनत करने का फैसला किया.

गालेआनो: मुझे नहीं लगता कि ऐसा कोई है जो बेआवाज हो. हरेक आदमी के पास कहने के लिए कुछ होता है, कुछ ऐसा जो दूसरों द्वारा सुने जाने की काबिलियत रखता है. इसलिए मैं बेआवाजों की आवाज बनने के इस नजरिए से इत्तेफाक नहीं रखता. मसला यह है कि थोड़े से लोग हैं जिनको यह विशेष अधिकार हासिल है, कि उनको सुना जाता है. मैं एक शहीद नहीं हूं और न ही हीरो हूं.

हम सबको जानने का और अपनी बात कह पाने का अधिकार है, जो आजकल बहुत मुश्किल है. जब तक हम एक छुपी हुई तानाशाही के आदेशों को मानते रहेंगे, ऐसा ही रहेगा. यह एक शब्द, एक तसवीर, एक सुर की तानाशाही है और शायद यह दूसरी तानाशाहियों से अधिक खतरनाक है क्योंकि यह पूरी दुनिया के स्तर पर काम करती है. यह ताकत की अंतरराष्ट्रीय संरचना है जो उन सार्वभौम मूल्यों को थोपती है जो उपभोक्तावाद और हिंसा पर आधारित हैं. इसका मतलब यह है कि आप वो हैं जिसके आप मालिक हैं. अगर आपके पास कुछ नहीं है तो आप कुछ भी नहीं हैं. आपका अधिकार चीजों को खरीदने की आपकी क्षमता पर निर्भर करता है. आप उन चीजों द्वारा परिभाषित किए जाते हैं जिनको आपने खरीदा है. यह ऐसा है मानो आपको आपकी कार चला रही हो. आपको आपके सुपरमार्केट ने खरीद रखा हो. आप अपने टीवी के पर्दे द्वारा देखे जाते हों. आपका कंप्यूटर आपकी प्रोग्रामिंग करता हो. हम सब अपने औजारों के औजार हो गए हैं.

सवाल: इस चक्र का कोई अंत है?

गालेआनो: उपभोक्ता समाज अगर अपने मूल्यों को पूरी दुनिया पर थोप दे तो धरती का अंत हो जाए. हम इसे कबूल नहीं कर सकते. इस विनाश की कीमत चुकाने के लिए हमारे पास काफी हवा, धरती, या पानी नहीं है.
पूरे लातिन अमेरिका पर जो मॉडल थोप दिया गया है वह एम्सटर्डम या फ्लोरेंस या बोलोग्ना नहीं है. इन शहरों में कारें सड़कों की मालिक नहीं हैं. इन शहरों में बाइकें हैं, सार्वजनिक यातायात है और पैदल चलनेवाले लोग हैं. ये ऐसे शहर हैं, जिनको लोग अपना महसूस करते हैं. ये शहर एक साझी जगह मुहैया कराते हैं. ये ऐसे शहर हैं जिनका जन्म आदमी की मिलने की जरूरत से हुआ है. ‘मैं अपने दोस्त से मिलना चाहता हूं. मैं बाकी लोगों से मिलना चाहता हूं’ के नतीजे में इन शहरों की पैदाइश हुई है. आज शहर ऐसी जगहें हैं जहां मशीनें मशीनों से मिलती हैं. हम मनुष्य घुसपैठिए या बाहरी हो गए हैं.

और हम किस तरह का होना चाहते हैं? लॉस एंजेल्स की तरह, जहां कारों के पास आदमियों से ज्यादा जगह है. यह तो नामुमकिन सपना है. हम उनकी तरह नहीं हो सकते. अगर दुनिया भर में संयुक्त राज्य अमेरिका जितनी कारें हो जाएं कि हरेक आदमी के पास एक कार हो तो दुनिया खत्म हो जाएगी. हमने हवा में जहर घोल दिया है, धरती को जहरीला बना दिया है, पानी को जहरीला बना दिया है, आदमी की रूह में जहर भर दी है. हर चीज जहरीली हो गई है.

जब एक लातिन अमेरिकी राष्ट्रपति अपने भाषण में कहते हैं, ‘हम पहली दुनिया का हिस्सा बन रहे हैं,’ तो पहली बात तो यह है कि वे झूठ बोल रहे हैं. दूसरी, यह व्यावहारिक रूप से नामुमकिन है. और तीसरी बात यह है कि उनको जेल में होना चाहिए क्योंकि यह अपराध के लिए उकसाना है. अगर आप कहते हैं, ‘मैं चाहता हूं कि मोंतेविदेओ लॉस एंजेल्स बन जाए,’ तो आप दरअसल मोंतेविदेओ के विनाश को बुलावा दे रहे हैं.

सवाल: संयुक्त राज्य में काफी सारे लोग जब लातिन अमेरिका के बारे में सोचते हैं तो दूर दूर तक फैले एक समुद्रतट (बीच), एक खेल के मैदान, कानकुन और आकापुल्को से लेकर कोपाकाबाना और मार देल प्लाता को देखते हैं. या फिर वे एक खतरनाक और डरावने चेहरे को देखते हैं: नशीली दवाओं के तस्कर, वामपंथी गुरिल्ला, झुग्गी और झोपड़ियां. लातिन अमेरिका को लेकर संयुक्त राज्य के इस रवैए के बारे में आपका क्या कहना है?

गालेआनो: मैं जब भी संयुक्त राज्य आता हूं, मैं यहां की आबादी के एक बहुत बड़े हिस्से की अज्ञानता को देख कर हैरान रह जाता हूं. उनको लातिन अमेरिका के बारे में या दुनिया के बारे में लगभग कुछ पता नहीं है. संयुक्त राज्य की सीमाओं के बाहर होने वाली चीजों से वे बिल्कुल ही अंधे-बहरे हैं.

मैं कई बरस पहले स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय में प्रोफेसर था. एक बार मैं एक बुजुर्ग प्रोफेसर के साथ टहल रहा था, जो एक अहम और सभ्य आदमी थे. अचानक उन्होंने मुझसे पूछा, ‘आप कहां से आए हैं?’

मैंने कहा, ‘उरुग्वे.’

उन्होंने कहा, ‘उरुग्वे?’

जैसे ही मैंने जाना कि कोई नहीं जानता कि उरुग्वे कहां है, मैंने जल्दी से बात का विषय बदलने की कोशिश की और किसी और चीज पर बात करने लगा.

लेकिन वे इतने भले थे कि उन्होंने कहा, ‘खैर, हम वहां बहुत भयानक काम कर रहे हैं.’

अचानक मुझे समझ में आया कि वे ग्वातेमाला के बारे में बोल रहे थे, क्योंकि द न्यू यार्क टाइम्स ने हाल ही में ग्वातेमाला में सीआईए की गतिविधियों के बारे में कुछ लेख प्रकाशित किए थे.

मैंने कहा, ‘नहीं, यह तो ग्वातेमाला है.’

‘ओह, ग्वातेमाला.’

‘हां, ग्वातेमाला.’

संयुक्त राज्य के बाहर होनेवाली घटनाओं के बारे में यह अज्ञानता भारी सुरक्षा के भाव से जुड़ी है. फौजी ताकत जो कुछ चाहती है वह इसलिए कर सकती है क्योंकि लोग नहीं जानते कि कोसोवो कहां है या इराक या ग्वातेमाला या एल साल्वादोर कहां हैं. और मिसाल के लिए उन्हें नहीं पता कि न्यू यार्क की स्थापना के सदियों पहले बगदाद में दस लाख लोग रहते थे और दुनिया की महानतम संस्कृतियों में से एक वहां बसती थी.

यही बात ‘हमारे’ अमेरिका के लिए सही है. दूसरा अमेरिका, हम मास्टर्स वाइस की अनुगूंज नहीं हैं.

सवाल: या फिर उसके शरीर की परछाईं.

गालेआनो: लातिन अमेरिका के शासक वर्ग भी परछाईं और अनुगूंज बनने के सपने देखते हैं. मैं हमेशा कहता हूं कि लातिन अमेरिका का सबसे बदतर गुनाह बेवकूफी का गुनाह है, क्योंकि हम अपनी ही हास्यास्पद तसवीर देख कर मजे लेते हैं. मिसाल के लिए, जब मैं यहां संयुक्त राज्य अमेरिका में लातिन अमेरिकियों से मिलता हूं तो वे कहते हैं, ‘अब मैं अमेरिका में हूं.’ आह, अब आप अमेरिका में हैं, क्योंकि आप संयुक्त राज्य में हैं. इसके पहले आप कहां थे? ग्रीनलैंड में? एशिया में? जापान में? हमने एक ऐसा आइना देख रहे हैं जो हमारा अपमान करता है और हमसे नफरत करता है और उसे देखते हुए हमने अपने बारे में विकृत नजरिए को ही अपना लिया है.

सवाल: आपने गरीबी की नाइंसाफी के बारे में लिखा है.

गालेआनो: इस दुनिया में नाइंसाफी इतने बड़े पैमाने पर है. भौतिक अर्थों में अमीरों और गरीब लोगों के बीच का फर्क, दूरी इन तीस सालों में कई गुना बढ़ गई है, जब से मैंने ओपेन वेन्स लिखी है.

आखिरी संयुक्त राष्ट्र रिपोर्ट बताती है कि 1999 में 225 की संपत्ति पूरी मानवता की कुल आमदनी का आधा है. यह रोटियों और मछलियों का नाइंसाफी भरा बंटवारा है.

लेकिन इसी समय दुनिया में एक समान आदतें थोपी जा रही हैं. हम वैश्विक एकीकरण को कबूल कर लेने को मजबूर किए गए हैं, जो कि एक तरह से पूरी दुनिया का मैक्डोनॉल्डीकरण है. इस दुनिया में जितनी तरह की दुनियाएं बसती हैं, उनके खिलाफ यह एक प्रकार की हिंसा है. अमूमन मैं कहता हूं कि मैं दो संभावनाओं में से चुनने की मजबूरी के विचार को खारिज करता हूं: या तो आप भूख से मरते हैं या उदासी से. हम इसे रोज ब रोज व्यवहार में लाते हैं- और हम इस पर गौर नहीं करते क्योंकि यह अदृश्य है, यह छुपी हुई है- यह अलग-अलग तरह का होने की क्षमताओं, जीवन जीने, जश्न मनाने, नाचने, सपने देखने, पीने, सोचने और महसूस करने के इतने सारे तरीकों की सामूहिक हत्या है. यह एक वर्जित इंद्रधनुष है. अब हम एक ही रास्ता अपनाए जाने के लिए अधिक से अधिक बाध्य किए जा रहे हैं. और यह अकेला रास्ता मुख्यत: संयुक्त राज्य के कारखानों में उत्पादित होता है.

सवाल: आपने अपनी शुरुआती उम्र में ही रेडिकल राजनीति अपना ली थी. क्या यह परिवार के असर की वजह से था?

गालेआनो: नहीं, यह मेरे कलेजे की वजह से था. शायद मैं अभी भी नाराजगी को संगठित करने की कोशिश कर रहा हूं. मेरा दिमाग, जो कि बहुत तेज नहीं है, कई बार मुझे अपनी भावनाओं को संगठित करने में उपयोगी साबित होता है. उनसे मायने निकालता है, लेकिन इस प्रक्रिया में मैं भावनाओं से विचारों की तरफ जाता हूं. मैं इसका उलटा रास्ता नहीं अपनाता.

हरेक चीज की तरह राजनीति में जो मैं सोचता हूं और जो मैं महसूस करता हूं उसके बीच हमेशा एक नामुमकिन लेकिन इच्छित जुड़ाव की तलाश करता हूं. इसका मकसद एक ऐसी भाषा को विकसित करना, उसे जीतना, उसे हासिल करना और खोजना है जो एक ही साथ भावनाओं और विचारों को अभिव्यक्त करने में सक्षम हो. एक ऐसी भाषा, जिसे कैरिबियाई तट के छोटे से शहर के कोलंबियाई ‘फील-थिंकिग लैंग्वेज’ (सोचने को महसूस करने वाली भाषा) कहते हैं. यह ऐसी भाषा है जो उन सारी चीजों को फिर से एक कर सकने में सक्षम है जिसे प्रभुत्वशाली संस्कृति ने अलग कर दिया है. यह प्रभुत्वशाली संस्कृति हमेशा जिस चीज को छूती है उसे टुकड़ों में तोड़ देती है. आपके विचारों के लिए अलग भाषा है और भावनाओं के लिए अलग. दिल और दिमाग अलग कर दिए गए हैं. इसी तरह सार्वजनिक भाषण और निजी जीवन भी. इतिहास और वर्तमान भी अलग कर दिए गए हैं.

सवाल: आपका कहना है कि इतिहास किसी संग्रहालय में रखी परीकथा नहीं है.

गालेआनो: आधिकारिक इतिहास तो संग्रहालय में रखी एक परीकथा ही है, कभी-कभी तो एक दानवकथा भी है. लेकिन मैं यादों में यकीन रखता हूं, इसलिए नहीं कि यह ऐसी जगह हैं जहां हमें पहुंचना है, बल्कि ये वो जगह है जहां से हमें अपने सफर की शुरुआत करनी है. यह वो गुलेल है जो आपको वर्तमान में फेंकती है, आपको भविष्य के बारे में कल्पना करने में सक्षम बनाती है न कि उसे ज्यों का त्यों कबूल करने पर मजबूर करती है. अगर इतिहास महज मरे हुए लोगों, मरे हुए नामों, मरे हुए तथ्यों का जमघट होता तो मेरे लिए तो यह पूरी तरह नामुमकिन होता कि मैं इतिहास से कोई रिश्ता बना पाता. इसीलिए मैंने मेमोरी ऑफ फायर वर्तमान काल का उपयोग करते हुए लिखी, जिसमें मैंने हर घटना को सजीव रूप में रखने की कोशिश की है ताकि पाठक जब उसे पढ़े तो वे घटनाएं फिर से घटें और वह उन घटानाओं को जी सके.

सवाल: आपकी मेमोरी ऑफ फायर त्रयी परंपरागत इतिहास से एक नाटकीय प्रस्थान है. आपने कविता, खबरों और विद्वत्ता का मिश्रण पेश किया है. ऐसा करने की आपको प्रेरणा कहां से मिली?

गालेआनो: मैंने आत्माओं की सरहदों को कभी कबूल नहीं किया, न ही मैंने लिखने की कला की सरहदों को स्वीकार किया. जब मैं बच्चा था तो मेरी पढ़ाई कैथोलिक तरीके से हुई थी. मुझे यह मान लेना सिखाया गया था कि शरीर और आत्मा आपस में दुश्मन होती हैं. कि ‘ब्यूटी एंड द बीस्ट’ की कहानी की तरह शरीर पाप, अपराध, आनंद, और आत्मा के संक्रमण स्रोत था.

मेरे लिए इस विचार को, इस अलगाव को अपने भीतर उतारना बहुत मुश्किल था. मैंने अपने भीतर वास्तव में जो महसूस किया और एक खुली हुई सच्चाई के रूप में ईश्वर की तरफ से जो मेरे सामने आता रहा था, उसके बीच के अंतर्विरोध पर मैंने हमेशा गौर किया. तब मैं ईश्वर में यकीन करता था और मानता था कि वो मुझमें यकीन रखता है. और इसलिए इस अंतर्विरोध के साथ जीना आसान नहीं था.

जब मैं दस या ग्यारह साल का था, मेरे सामने एक भयानक संकट आया. मैंने अपने शरीर को लेकर एक अपराधबोध के आतंक को महसूस किया, जो मेरे ख्याल से इस तथ्य के साथ जुड़ी थी कि मेरी यौनिकता विकसित हो रही थी. मेरा शरीर मेरे लिए नरक का स्रोत था, मुझे नर्क में ले जा रहा था. अब मैं इसे कबूल करता हूं. मैं अब इसे अच्छी तरह से जानता हूं कि मैं नर्क में जानेवाला हूं, और गर्म उष्णकटिबंधीय देशों ने मुझे नर्क की लपटों को बरदाश्त करने के लिए तपाया है. अब यह उतना भयावह नहीं होगा.

जब मैंने लिखना शुरू किया, मैंने महसूस किया कि मुझे लेख और कथेतर लेखन को कविता या कहानियों या उपन्यासों जैसी दूसरी विधाओं से अलग करने वाली सीमा का सम्मान करना था.

मुझे इसे तरह के श्रेणीकरण से नफरत है. इस दुनिया में वर्गीकरण की एक सनक है. हम सबके साथ कीड़ों की तरह व्यवहार होता है. हमारे चेहरों पर एक लेबल होना चाहिए. अनेक पत्रकार कहते हैं, ‘आप एक राजनीतिक लेखक हैं, ठीक?’ मुझे बस मानव इतिहास से एक ऐसे लेखक का नाम बता दीजिए जो राजनीतिक नहीं था. हम सब राजनीतिक हैं, यहां तक कि हम नहीं जानते कि हम राजनीतिक हैं.

मैं महसूस करता हूं कि मैं सीमाओं का उल्लंघन कर रहा हूं, और मैं हर बार खुशी महसूस करता हूं कि मैं ऐसा कर सकता हूं. मैं कल्पना करता हूं कि मुझे लेखक के बजाए तस्कर होना चाहिए था, सीमाओं के ऐसे उल्लंघन के मजे की वजह से, असल में अपने भीतर के तस्कर और पापी को उजागर करने की वजह से.

सवाल: हाल ही में आपने लान्नान फाउंडेशन की तरफ से पुरस्कार हासिल किया है, जिसे इंटरनेशनल टेलीफोन एंड टेलीग्राफ (आइटीटी) के एक पूर्व निदेशक के फंड से स्थापित किया गया था. आईटीटी एक बहुराष्ट्रीय निगम है जिसकी आपने अपने लेखन में बहुत आलोचना की है और जिसकी चिले में सल्वादोर आयेंदे के तख्तापलट में प्रमुख भूमिका रही थी.

गालेआनो: मैंने आईटीटी से पुरस्कार नहीं लिया है. मुझे पुरस्कार लान्नान फाउंडेशन से मिला है.

सवाल: लेकिन इसका पैसा तो वहीं से आता है.

गालेआनो: यह नर्क से स्वर्ग का एक अच्छा सफर है.

सवाल: आपको क्यों लगता है कि संयुक्त राज्य इतना हिंसक समाज है?

गालेआनो: मैं नहीं कहूंगा कि संयुक्त राज्य एक हिंसक समाज है. यहां सुंदरता और लोकतंत्र की उर्जा भी है. मैं यह कहते हुए अपने ही जाल में नहीं फंसूंगा कि ‘दुनिया की सबसे बुरी चीज संयुक्त राज्य है.’ यह कहना तो बहुत आसान होगा. असलियत कहीं अधिक जटिल है.

यहां हिंसा की संस्कृति है, सारी चीजों में गहरे तक पैठती हुई फौजी संस्कृति जो सब पर अपने निशान छोड़ रही है. यह जिसको छूती है उसको संक्रमित करती हुई फैल रही है. मिसाल के लिए आपका मनोरंजन उद्योग है जिसमें हिंसा भरी हुई है. टीवी और बड़े परदों पर खून का समुद्र ठांठें मार रहा है. हर चीज हर समय धमाके करती रहती है- कारें, लोग. यह एक तरह की सारी चीजों की लगातार जारी बमबारी है. मनोरंजन उद्योग कहता है, ‘हम इसके दोषी नहीं हैं. हिंसक यथार्थ ही फिल्मों और टीवी के आइने में दिख रहा है. हम हिंसा का आविष्कार नहीं कर रहे हैं. हिंसा सड़कों से आ रही हं.’ लेकिन इस चक्र में मीडिया का भी प्रभाव पड़ता है.

इसलिए शायद युगोस्लाविया और लिटलटन, कोलोरादो के बीच कोई संबंध है. दोनों ही हिंसा की समान संस्कृति की अभिव्यक्तियां हैं. शांति के नाम पर युद्ध लड़े जा रहे हैं और फौजी कार्रवाइयों को मानवतावादी अभियान कहा जा रहा है. हम खबरों, फिल्मों और सड़कों पर रोज ब रोज हिंसा देखते हैं.

दुनिया एक हिंसक जगह है. और अगर एक गरीब आदमी कुछ चुरा लेता है या अपहरण करता है या मार देता है तो इसकी निंदा करना बहुत आसान है. लेकिन इसकी जड़ों की तलाश करना और उस व्यवस्था की निंदा करना इतना आसान नहीं है जो अपराधों और नशीली दवाओं के इस्तेमाल की वजह है. हरेक दिन हरेक आदमी बहुत सारा आक्रोश और गुस्सा पी रहा है.

सवाल: पेंटागन की भूमिका के बारे में क्या कहेंगे?

गालेआनो: संयुक्त राज्य का फौजी बजट बेतुका है. आखिर दुश्मन कौन है? यह पश्चिमी फिल्म की तरह है. आपको एक खलनायक चाहिए होता है. अगर वह नहीं हो तो आप उसका आविष्कार कर लेते हैं. संयुक्त राज्य में आपको नए-नए खलनायकों की जरूरत होती है. सुबह में सद्दाम हुसैन तो दोपहर में मिलोसेविक. लेकिन आपको एक बुरा आदमी चाहिए ही. अगर लड़ने के लिए शैतान नहीं हो तो बेचारे ईश्वर का क्या होगा!

इस सिर के बल खड़ी दुनिया की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक यह है कि जिन पांच देशों ने शांति कायम करने का ठेका ले रखा है वही दुनिया में हथियारों के पांच सबसे बड़े उत्पादक देश भी हैं. दुनिया के हथियारों में लगभग आधे संयुक्त राज्य में बनते हैं, जिसके बाद ग्रेट ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और चीन का नंबर है. ये वे देश हैं जिनको संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वीटो की ताकत भी मिली हुई है. संयुक्त राष्ट्र का जन्म दुनिया में शांति लाने के लिए हुआ था लेकिन शांति के पवित्र, सुंदर और काव्यात्मक मकसद वाले पांचों देश युद्ध का कारोबार चलाने वाले देश भी हैं.

उरुग्वे संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में है. यह सभा पूरी तरह प्रतीकात्मक है. आम सभा सुझाव दे सकती है, लेकिन फैसले इन पांच देशों द्वारा लिए जाते हैं, जिनका दुनिया पर कब्जा है और जो उसे नियंत्रित करते हैं.

बीसवीं सदी युद्धों की सदी थी- करीब 10 करोड़ लोग मारे गए. यह लोगों की बहुत बड़ी संख्या है- बहुत बड़ी संख्या. हर बार जब मैं युगोस्लाविया, इराक, अफ्रीका और कहीं किसी और जगह युद्ध के बारे में सुनता हूं, हमेशा मैं एक ही सवाल पूछता हूं, जिसका जवाब मुझे कभी नहीं मिला: ‘हथियार कौन बेच रहा है? इस मानवीय त्रासदी से मुनाफा कौन कमा रहा है?’ मुझे मीडिया में कभी इसका जवाब नहीं मिला और यही वह मुख्य सवाल है, जिसे आपको तब पूछना चाहिए जब आप युद्ध के बारे में सुनते हैं. हथियार कौन बेच रहा है? वही पांच प्रभुत्वशाली देश जिन्होंने शांति का ठेका ले रखा है. यह भयावह है, लेकिन यही हकीकत है.

सवाल: हम आदिवासी लोगों से क्या सीख सकते हैं?

गालेआनो: बहुत कुछ. सीखने लायक पहली बात है प्रकृति के साथ बेफिक्री. वरना आप पर्यावरण का बागबानी के साथ घालमेल कर देंगे. आप भू-दृश्य को प्रकृति समझने लगेंगे. प्रकृति का मतलब है आप, मैं. हम प्रकृति का हिस्सा हैं, इसलिए प्रकृति के खिलाफ किया गया कोई भी अपराध मानवता के खिलाफ किया गया अपराध है. लेकिन मैं इस नजरिए से सहमत नहीं हूं कि हम खुदकुशी कर रहे हैं, क्योंकि मैं खुदकुशी नहीं कर रहा हूं. इनसानी आबादी का महज 20 प्रतिशत हिस्सा प्राकृतिक संसाधनों को बरबाद कर रहा है और धरती को जहरीला बना रहा है, 80 प्रतिशत लोग इसके नतीजे भुगत रहे हैं.

कभी-कभी जब राजनीतिक नेता दिल पर हाथ रख कर कहते हैं, ‘हम खुदकुशी कर रहे हैं,’ तो वे दुनिया के सबसे मुनाफा देने वाले उद्योगों द्वारा किए गए अपराधों का हवाला दे रहे होते हं. जो जितना ज्यादा नुकसान पहुंचाता है वह उतना ज्यादा मुनाफा कमाता है. और वे सब ग्रीन (पर्यावरण के संरक्षक) हैं. जब मैं नौजवान था, वादियां हरी थीं, मजाक हरे थे और लड़कियों की चाहत लिए बूढ़े हरे थे. अब हर कोई ग्रीन है. विश्व बैंक ग्रीन है. अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष ग्रीन है. रसायन उद्योग ग्रीन है. ऑटोमोबाइल उद्योग ग्रीन है. यहां तक कि सैन्य उद्योग भी ग्रीन है. हर कोई ग्रीन है.

यह दिलचस्प है क्योंकि सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दियों में जब यूरोप ने अमेरिका को जीता, बहुत सारे इंडियेन लोगों को इसलिए सजा दी गई थी या जिंदा जला दिया गया था कि वे मूर्तिपूजा का गुनाह कर रहे थे. वे प्रकृति से प्यार कर रहे थे.

आज ताकतवर व्यवस्था प्रकृति को ऐसी बाधा नहीं मानती कि मुनाफा हासिल करने के लिए जिस पर काबू पाना चाहिए. प्रकृति पर विजय हासिल करना, प्रकृति को पराजित किए जाने योग्य मानना- यह पुरानी भाषा थी. अब नई भाषा प्रकृति को संरक्षित करने के बारे में है. लेकिन दोनों ही मामलों में भाषा अलगाव को उजागर करती है. हम, इनसान और प्रकृति, भिन्न हैं.

इंडियन संस्कृति से हमें जुड़ाव का गहरा बोध सीखने की जरूरत है. यह ऐसी चीज है, जिसे ईश्वर को टेन कमांडमेंट्स में शामिल करना चाहिए. यह ग्यारहवां कमांडमेंट होता: ‘तुम्हें प्रकृति से प्यार करना चाहिए, तुम जिससे जुड़े हुए हो.’

सवाल: सोवियत संघ के ध्वंस पर आपकी प्रतिक्रिया क्या थी?

गालेआनो: मैंने कभी भी खुद को सोवियत संघ के कथित समाजवाद से जुड़ा हुआ महसूस नहीं किया. मुझे हमेशा महसूस हुआ कि यह बिल्कुल भी समाजवाद था ही नहीं. वहां नौकरशाही काम करती थी, जिसका जनता से कोई संबंध नहीं था. वे जनता के नाम पर काम करते थे, लेकिन उन्होंने जनता को तिरस्कृत कर दिया था. वे अपने सभी भाषणों में और सारी आधिकारिक भाषा में जनता को सम्मान देते थे, लेकिन वे जनता से अल्पसंख्यक के बतौर या बच्चों या भेड़ों के बतौर पेश आते थे.

इसलिए सोवियत संघ के ढह जाने पर मुझे नहीं लगा कि समाजवाद मर गया है. इसका ढह जाना इतनी आसानी से हुआ कि यह देखने लायक था: लगभग कोई खून-खराबा नहीं हुआ, कोई आंसू नहीं, कुछ भी नहीं. लेकिन समाजवाद नहीं मरा था क्योंकि इसका जन्म ही नहीं हुआ था. यह ऐसी चीज है, जिसके बारे में मैं उम्मीद करता हूं कि शायद मानवता उसे खोज लेगी.

गरीब देशों के नजरिए से, दुनिया की परिधि पर मौजूद देशों के नजरिए से देखें तो मौजूदा हालात पहले से बदतर हैं क्योंकि सोवियत संघ था तो कम से कम एक निश्चित शक्ति संतुलन था. अब यह शक्ति संतुलन गायब हो गया है और हमारे पास विकल्प नहीं हैं. आजादी के साथ काम करने की संभावनाएं घटी हैं.

सवाल: क्या उम्मीद के कुछ ऐसे संकेत हैं, जिनकी तरफ आप इशारा कर सकते हैं?

गालेआनो: अमेरिका और मैक्सिको के भीतर उम्मीद के बहुत सारे संकेत हैं, दूसरे देशों के भीतर भी. बहुत सारे आंदोलन हैं, लेकिन मीडिया में उनके बारे में कोई खोज-खबर नहीं है. वे कमोबेश खुफिया हैं क्योंकि वे स्थानीय स्तर पर काम करते हैं. कभी-कभी तो वे बहुत छोटे होते हैं. लेकिन वे जवाब लिये हुए होते हैं, वे एक भिन्न दुनिया की तलाश में हैं और मौजूदा दुनिया को अपनी नियति के रूप में कबूल नहीं करते हुए वे इसे एक चुनौती के बतौर जी रहे हैं. बहुत सारे छोटे-छोटे आंदोलन हैं जो हर कहीं मानवाधिकारों के लिए, लैंगिक भेदभाव के खिलाफ, नाइंसाफी के खिलाफ, बच्चों के उत्पीड़न के खिलाफ और खेती के गैर नुकसानदेह तरीकों को बचाए रखने और उन्हें विकसित करने के लिए चल रहे हैं.

मैक्सिको में एल बारसोन नाम का एक लोकप्रिय आंदोलन है. मैक्सिको के बाहर इसे कोई भी नहीं जानता, लेकिन यह बहुत महत्वपूर्ण है. यह एक स्वत:स्फूर्त आंदोलन है जो मैक्सिको के बैंकों के दबाव का प्रतिरोध करने की जरूरत से जन्मा है. शुरुआत में यह सौ-एक लोगों से बड़ा आंदोलन नहीं था, जो लालची वित्तीय ताकतों से अपनी चीजें बचा रहे थे- अपने घर, अपना बिजनेस, अपने खेत. लेकिन यह बड़ा और बड़ा होता गया और अब इसमें दस लाख से अधिक लोग हैं. वे अब इतने अहम हो गए हैं कि जब एल बारसोन का एक प्रतिनिधिमंडल वाशिंगटन गया तो उसका स्वागत अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष के उपाध्यक्ष ने किया. मेरा अंदाजा है कि ऐसे महत्वपूर्ण आदमी ने जो अपनी बीवी से भी बात नहीं करता, एल बारसोन का स्वागत किया.

ढेर सारे आंदोलन हैं जो हमसे कह रहे हैं कि उम्मीद मुमकिन है. आनेवाला कल आज का ही एक दूसरा नाम नहीं होगा.

सवाल: आपने उपकार (चैरिटी) और एकता (सोलिडेरिटी) में फर्क दिखाया है.

गालेआनो: मैं उपकार में यकीन नहीं करता. मुझे एकता में यकीन है. उपकार सिर पर खड़ा होता है, इसलिए यह अपमानजनक है. यह ऊपर से नीचे आता है. एकता बराबरी के स्तर पर होती है. यह दूसरों का सम्मान करती है और दूसरों से सीखती है. मैंने दूसरे लोगों से बहुत कुछ सीखा है. हर दिन मैं सीख रहा हूं. मैं एक जिज्ञासु इनसान हूं, हमेशा दूसरे लोगों को पढ़ता रहता हूं, उनकी आवाजें, उनके रहस्य, उनकी कहानियां, उनके रंग. मैं उनके शब्द चुराता हूं, शायद मुझे गिरफ्तार किया जाना चाहिए.

सवाल: आप ‘आब्रिगार एस्पेरांसास’ (abrigar esperanzas) के बारे में समझाएंगे?

गालेआनो: आब्रिगार एस्पेरांसास उम्मीद कायम रखने की एक खूबसूरत स्पेनी अभिव्यक्ति है. उम्मीद को बचाए रखने की जरूरत होती है.

सवाल: इसलिए कि यह कमजोर होती है?

गालेआनो: वो कमजोर होती है और थोड़ी नाजुक. लेकिन वह जिंदा होती है. मेरा एक दोस्त है जो कहता है, ‘मैं पूरी तरह नाउम्मीद हूं, मुझे किसी चीज में यकीन नहीं है.’ लेकिन आप जीते रहते हैं. ऐसा कैसे होता है? मैं उम्मीद करता हूं कि मैं कभी उम्मीद नहीं खोऊंगा, लेकिन अगर वह दिन आता है जब मुझे यकीन है कि अपेक्षा करने के लिए, भरोसा करने के लिए मेरे पास कुछ नहीं होगा, और इनसानी हालात मूर्खता और अपराध को अभिशप्त होंगे, तब मैं उम्मीद करता हूं कि मैं इतना ईमानदार होऊंगा कि मैं खुद को मार सकूं. बेशक, मैं जानता हूं कि इनसानी हालात ऐसी चीज है जो एक ही साथ भयावह भी है और शानदार भी. हमारी बनावट बहुत बुरी है लेकिन हम खत्म नहीं हुए हैं.

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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