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बीच सफ़हे की लड़ाई

जेल से कविता: किस किस को कैद करोगे

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/18/2012 03:31:00 PM

दो अंकों में वृद्धि दर की हत्यारी उड़ान पर निकली व्यवस्था जनता के गीतों से डरती है. वो उन गीतों से डरती है जो जनता को अपने समय की असलियत बताते हैं. इसीलिए महाराष्ट्र में दलितों के बीच गीतों के जरिए उनकी मुक्ति के विचार ले जानेवाले कबीर कला मंच के साथियों को पिछले साल भूमिगत होना पड़ा, क्योंकि पुलिस उनकी गिरफ्तारियां करने लगी थी. मंच के कई कलाकार अभी जेल में हैं. कबीर कला मंच ने बाबा साहेब आंबेडकर की नए सिरे से व्याख्या करते हुए क्रांतिकारी आंदोलन और दलित आंदोलन को एक साथ चलाए जाने की जरूरत पर जोर दिया. उन्होंने यह भी दिखाया कि कैसे बाबा साहेब के विचार भी दरअसल दलितों की मुक्ति के लिए एक क्रांतिकारी आंदोलन की तरफ ही ले जाते हैं, जिसे अधिकतर दलित और आंबेडकरवादी आंदोलनों ने संसदीय दायरे में सीमित कर रखा है. फिल्मकार आनंद पटवर्धन की फिल्म जय भीम कॉमरेड इसी घटना के विरोध के साथ खत्म होती है और कई दूसरे कार्यकर्ताओं के साथ मिल कर आनंद ने कबीर कला मंच बचाव समिति का गठन भी किया है. नीचे हम जो गीत पोस्ट कर रहे हैं, वह कबीर कला मंच के एक कलाकार अशोक डेंगले ने जेल में लिखा है. आवाज कामायनी बली महाबल की है. सीजीनेट-स्वरा के सौजन्य से.





किस किस को कैद करोगे?
लाखों हैं मुक्ति के पंछी, कैद करोगे किसको
लेकर पिंजरा उड़ जाएंगे खबर न होगी तुझको
इस पिंजरे की सलाखों का लोहा हमने ही निकाला है
ये लोहा पिघलाने हमने अपना खून उबाला है
लोहा लोहे को पहचानेगा, फिर क्या होगा समझो
लेकर पिंजरा उड़ जाएंगे खबर न होगी तुझको
इस पिंजरे की दीवारों में हमने पसीना बहाया है
ईंट बनाने, सीमेंट बनाने मिट्टी को भी भिगोया है
मिट्टी कभी गद्दार न होगी, क्या बतलायें तुझको
लेकर पिंजरा उड़ जाएंगे खबर न होगी तुझको
इस पिंजरे के पुर्जे पुर्जे हमें बताते अपने किस्से
कितने मज़दूर दफन हुए हैं इस पिंजरे के नींव के नीचे
वो मज़दूर हैं साथ हमारे, कौन रोकेगा हमको
लेकर पिंजरा उड़ जाएंगे खबर न होगी तुझको
कैद में डालो, फांसी लगा दो, हंटर से चमड़ी भी निकालो
न्याय के रस्ते चल पड़े हैं, बाँध लगा लो, कांटे बिछा लो
कितना ज़ुल्म करेगा ज़ालिम, थक जाना है तुझको
लेकर पिंजरा उड़ जाएंगे खबर न होगी तुझको

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  1. 0 टिप्पणियां: Responses to “ जेल से कविता: किस किस को कैद करोगे ”

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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