हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

क्या आपके गीत संघर्ष को आगे बढ़ाने के औजार हैं, तैमूर जी

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/10/2012 06:29:00 PM

जेएनयू में डीएसयू ने पोस्टर लगाते हुए जो अहम सवाल उठाए थे, और लाल बैंड की प्रस्तुति पर जो कुछ और सवाल आए थे, उन पर लाल बैंड के तैमूर रहमान ने अलग-अलग जवाब दिए. यह उन जवाबों पर एक टिप्पणी है, और यह इस अहम नुक्ते की तरफ इशारा करती है कि अगर आप क्रांतिकारी संघर्ष में जनता के साथ हैं तो आप मिटाए नहीं जा सकते-न तो सरकारी दमन आपकी आवाज दबा सकता है और न ही पैसे की तंगी. इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप किस सुर में गा रहे हैं या बेसुरा गा रहे हैं. संघर्षरत जनता अपनी आवाज को, अपने संघर्ष की हिमायत में खड़ी आवाज को पहचान लेती है और उसे स्वीकार कर लेती है- भले ही वह बेसुरी ही क्यों न हो. अहम बात है सही राजनीति और समझौताविहीन क्रांतिकारी संघर्ष. टिप्पणीकार की इच्छा है कि यह टिप्पणी अविनाश के नाम से पोस्ट की जाए.

तैमूर जी,
मैंने आपके दोनों जवाब पढ़े हैं. लेकिन बात आप जहाँ ख़त्म करते हैं वहीँ से बात शुरू होती है. सवाल महज सुर में गाने और नहीं गाने का नहीं है. बल्कि सवाल मजदूर वर्ग के संघर्ष में गानों की भूमिका पर है. दुनिया की तमाम क्रांतियों में सांस्कृतिक कार्यों की काफी अहम भूमिका रही है. बल्कि सबसे पिछड़े लोगों के बीच काम करते हुए तो इसका महत्व और बढ़ जाता है.

आपकी चिंता सांस्कृतिक कार्यों के लिए धन जुटाने पर काफी अधिक है. मैंने दुनिया की बहुतेरी क्रांतियों के इतिहास पढ़े हैं. मैंने कहीं नहीं पढ़ा कि कोई भी सांस्कृतिक आन्दोलन केवल इसलिए कमजोर हुआ हो कि  वो आर्थिक संसाधनों के आभाव का सामना कर रहा हो. सच तो ये रहा है कि जो भी सांस्कृतिक आन्दोलन ख़त्म हुए वो इसलिए कि उन्होंने जनता के लिए गाना छोड़ दिया था. जहाँ तक जनता के गानों का सवाल रहा है तो ये साफ़ है कि जनता के गानों के धुन और उनके वाद्य यन्त्र हमेशा उनकी संस्कृति से ही जुड़े रहे  हैं.

पीट सीगर और बॉब डिल्लन जैसे लोगों ने भी जनता के  लिए गाया. हमारे अपने देश में भी ऐसी हजारों मिसालें हैं जहाँ बिना संसाधनों के बहुत कम पढ़े-लिखे लोगों के गाने आम जनता की आवाज़ बन गए. तैमूर जी, आप जिस जगह में गा रहे होते हैं उनकी मिट्टी की आवाज़ ही उसकी अपनी आवाज़ होती है और वो उन्हें काफी अंदर तक झकझोरती है और ऐसे गाने महज गाने नहीं रह जाते, बल्कि जनता के संघर्ष के औजार बन जाते हैं. जब हम आपसे सवाल करते हैं तो  यही पूछते हैं कि आपके गाने संघर्ष को आगे बढ़ने के औजार बन रहे हैं या फिर लोगों के मनोरंजन का एक और साधन? आपको ये भी शायद पता हो कि दुनिया का कोई भी आन्दोलन शासक वर्ग के दमन की वजह से ख़त्म नहीं हुआ बल्कि तमाम आंदोलन जनता के साथ धोखाधड़ी की वजह से, जनता से अलगाव की वजह से ख़त्म हुए. आपका देश भी इस मामले में कोई अलग नहीं है.

हमारे देश में भी बहुतेरे लोग लड़ रहे हैं और वे बहुत ही बुरे आतंक का सामना कर रहे हैं. लेकिनं उन्होंने इसकी कभी परवाह नहीं की. जाहिर तौर पर हम यहाँ आपकी समीक्षा करने नहीं बैठे हैं लेकिन इतना मुझे जरूर कहना है की ‘लाल’ को लाल ही रहने दीजिए. हम आपसे सुर में गाने के लिए भी नहीं कहेंगे. बस हम तो आपसे यही कहेंगे की आप सोचिए कि आप किसके लिए गा रहे हैं. साम्राज्यवाद के खिलाफ मजदूर वर्ग के संघर्ष को आगे बढ़ने के लिए या फिर लोगो का मनोरंजन करने और पोपुलर होने के लिए? हम आपसे यही अपेक्षा करेंगे कि आप कॉरपोरेट के बजाए जनता के साथ खड़े होंगे. जनता आपको ना केवल सरकारी आतंक से बचाएगी बल्कि आपके लिए तमाम संसाधन भी जुटाएगी.

पोपुलर पॉलिटिक्स एक बात है और क्लास पॉलिटिक्स एक बात है. जब आप वर्किंग क्लास की बात कर रहे हों तो आपको तय करना होगा कि आप पोपुलर पॉलिटिक्स करना चाहते हैं या फिर क्लास पॉलिटिक्स. क्लास पॉलिटिक्स को पोपुलर बनाने के नाम पर उसे भोथरा बना देना दरअसल शासक वर्ग की राजनीति को ही मदद करना है. पोपुलरिटी का भी अपना वर्ग चरित्र है, इसे हमें हमेशा ध्यान में रखना चाहिए. फॉर्म को ज्यों का त्यों रखते हुए कॉरपोरेट सौंदर्यबोध की प्रतियोगिता में क्रांतिकारी सौंदर्यबोध को खड़ा करना दरअसल क्रांतिकारी सौंदर्यबोध को ख़त्म करना है. चूँकि बुर्जुआजी सौंदर्यबोध कभी क्रांतिकारी सौन्दर्य बोध हो ही नहीं ससकता, न ही वह वर्किंग क्लास के आंदोलन की मदद कर सकता है.

आपने तो खुद को वर्ग च्युत (डी-क्लास) करने की कोशिशों का मजाक उड़ाते हुए इसे फालतू बताया है और उसके बरअक्स कॉरपोरेट फंड और उसकी स्टाइल को पाकिस्तान के वर्किंग  क्लास आंदोलन के लिए जरूरी बताया है. खैर ये आपकी बात है और आप मत भूलिए कि कल आपसे इतिहास पूछेगा कि आपने वर्किंग क्लास आंदोलन को इस कॉरपोरेट लुक के जरिए कितनी मदद की.

इस संदर्भ में मुझे इकबाल बानो का गाया फैज़ का गीत याद आता है, जिसके दौरान इनक़लाब जिंदाबाद के नारे गूंजने लगे थे. जहाँ तक मैं जानता हूँ सच तो यही है कि अधिकतर इस्लामिक देशों में कम्युनिस्ट पार्टियाँ सबसे मजबूत थीं. लेकिन इन कम्युनिस्ट पार्टियों के ढुलमुल रवैये और साम्राज्यवादी ताकतों की भयानक साजिशों के जरिए इनका खात्मा किया गया. इसलिए ये कहना उतना सच नहीं है कि इसलामी देशों की अवाम फंडामेंटलिस्ट रही है. असल बात ये है कि किसी क्रांतिकारी विकल्प के अभाव में वो कई अलग-अलग रास्तों पर जा रही है. मैं आशा करता हूँ कि आप इन तथ्यों पर उतनी ही शिद्दत से गौर करेंगे जितनी शिद्दत से लोगों को आप दहशतगर्द बता रहे हैं. जब आप जनता और वर्किंग क्लास के लिए गाएंगे तो वो आपको जरूर सुनेंगे और फिर आपकी आवाज़ खुद में एक ताकत बन जाएगी.

शुक्रिया

फैशन शो में लाल: यही है क्रांतिकारी संस्कृति?
 

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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