हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

ख्वाबों को कँपकपाती है ...

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/08/2012 06:46:00 PM

रणेन्द्र की यह कविता अपने समय के लिए एक चुनौती भी है और इसका खारिजनामा भी. यह चुनौती है कि बदलाव के गीत बदलाव के सुरों में ही गाए जाएं, भले ही उनके लिए आवाज को बेसुरा ही करना पड़े. यह खारिजनामा है ताकत और नाइंसाफी को सहनीय बनाती उस चमक-दमक का, जिसने हमारे अपने चेहरों पर पुती राख और खून को छुपा रखा है. आइए, चांद के बरअक्स चांदमारी की इस कविता में शामिल हों, क्योंकि हम स्वीकार करें या न करें, यह हमारे पड़ोस में, हमारे आस-पास हर जगह चल रही है.


भूलना चाहता हूँ
घर-दुआर का रास्ता
गाँव-टोला
दोन-टाँड़ खेत
फूलझर नदी
इजुवन-विजुवन के महुआ-साखू गाछ
अखड़ा-माँदर, सरहुल-करमा

भूलना चाहता हूँ
भर रात डेगाने वाला झूमर नाच
कि जागने से लाभ क्या
आदमखोर तो फिर भी खींच ले जाते हैं
ख्वाबों को कँपकपाती है वर्दी की छाया

भूलना चाहता हूँ
काले दिन और अँधेरी रातें
खुजलाहे कुत्ते-सा अपना वजूद
कि इस राह से जो भी गुजरता है
लतियाता जाता है

कुछ भी याद नहीं रखना चाहता
न सोनी सोरी को
न उसके नाजुक अंगों में पैवस्त
पत्थर के अश्लील टुकड़ों को
सच तो बस यह है कि
हाकिम-हुक्कामों की, कर्नल-कप्तानों की
वीरता और सम्मान की कहानियाँ ही
इतिहास के पन्नों में दर्ज होंगीं

वैसे भी
जब देश इतनी तेजी से तरक्की कर रहा हो
तो ऐसी-वैसी बातें अच्छी नहीं लगती
कविता में चाँदमारी नहीं
चाँद-चाँदनी की बातें ही शोभती हैं
शोभती हैं शफक, धनुक, हिज्र, विसाल की बातें
मीना बाजारों ने ये कैसी रंगत बिखेरी
कि बदलाव के गीत गाने वाले
अब अम्नो-शान्ति की ग़जल गुनगुना रहे हैं

आस्माँ में चमक रहा है
निजाम का दमदम दमकता ताज
मरमरी फर्श पर सुनहरी जूतियाँ
ग्लोब से गोलियाये जिस्म पर,
शफ्फाफ-पारदर्शी लिबास,
और बच्चे ‘नंगा’ कहना भूल गए है

पर हम नहीं भूलना चाहते
कि हमारी जिस्मों-जाँ पर पड़ी
नीली-काली धारियों से बुनी
चादर से ही
धुलते-पुंछते रहे हैं
बादशाहों के पाँव.

Related Posts by Categories



Widget by Hoctro | Jack Book
  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ ख्वाबों को कँपकपाती है ... ”

  2. By चन्द्रिका on May 8, 2012 at 7:55 PM

    भाषा में इस कविता को यदि सराह भी दूं तो यह एक अभिजात्य कर्म ही तो है.....

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


फीड पाएं


रीडर में पढें या ई मेल से पाएं:

अपना ई मेल लिखें :




हाशिये में खोजें