हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

बचकाने स्वप्नलोक से बचें!

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/01/2012 03:34:00 PM

अपने इस नोट में तैमूर रहमान लाल बैंड में आई दरार और उसके बाद बैंड के एक प्रमुख गायक शहराम अजहर द्वारा लगाए गए आरोपों का जवाब दे रहे हैं.

जब अमरीका से पढ़ाई कर लौटा, तब मैं अति वाम विचारों के जबरदस्त प्रभाव में था। मैं मेहनतकश तबके के कपड़े पहना करता था, गिटार बजाना बिल्कुल छोड़ दिया क्योंकि इसे मैं बुर्जुआ समझता था, मुख्यधारा के मीडिया या राजनीति में कोई दिलचस्पी नहीं लेता था (अखबार पढ़ना भी छोड़ दिया था)। मुझे सारे वामपंथी बुद्धिजीवी छद्म लगते थे, और मैं मेहनतकशों का असीम गुणगान करता रहता था (हालांकि मजदूरों के साथ काम करने का मेरा कोई अनुभव नहीं था)।

 जो कॉमरेड अच्छे कपड़े पहनता था, मेरी नजर उसे खारिज कर देती थी। धाराप्रवाह बोलने वाला मुझे धोखेबाज लगता। जिसे राजनितिक या व्यक्तिगत जीवन में थोड़ी-सी भी सफलता हासिल होती थी, उसे शक की निगाह से देखता था। सिर्फ गरीब और भूखे लोग ही आदर के पात्र थे, शायद प्रशंसा के भी।

समाजवाद की इस बचकाना समझदारियों के साथ 1998 में मैं कम्युनिस्ट मजदूर किसान पार्टी में शामिल हुआ और मजदूर आंदोलन में काम करने लगा। साइकिल से काम पर जाता, एयर कंडिशनर या डिऑडरेंट का इस्तेमाल नहीं करता, चुभने वाले जूते पहनता, गांव में जाने के लिए सबसे खराब और सस्ते आवागमन के साधनों का इस्तेमाल करता। यह सब करते हुए मुझे लगता था कि मैं मेहनतकश जनता की सेवा कर रहा हूं। लेकिन, दरअसल, मैं अपने दोषी बुर्जुआ चेतना को संतुष्ट भर कर रहा था। मैं कुछ ऐसा दिखावा कर रहा था, जो वास्तव में मैं नहीं था। मैं बस वैसा-जैसा होने का दिखावा कर रहा था। यह सब खुद के ‘डी-ग्रेडिंग’ करने की प्रक्रिया की समझदारी से संचालित हो रहा था। इस मुहावरे की विडंबना को मैं अभी तक भूल नहीं सका हूं।

मेरे साथ कुछ ऐसा नहीं हुआ जिसके चलते मैं इस बचकानी मूर्खता से छुटकारा पा सकूं। धैर्यपूर्ण अध्ययन और कड़ी मेहनत ने मुझे सिखाया कि यह सब मेरी ग्रंथियां थीं और इनका मेहनतकश जनता की असली जरूरतों से कोई लेना-देना नहीं था।

सबसे पहले, मुझे मजदूर आदोलन ने ही मुझे इस मजदूरवाद से निकाला। संघर्षों के दौरान मैंने देखा कि किस तरह अंजुमन मुजारीन पंजाब ने व्यवस्था की हर कमजोरी को अपने अधिकारों की लड़ाई में इस्तेमाल किया। किस तरह पकिस्तान ट्रेड यूनियन फेडरेशन ने हर उस कानूनी व्यवस्था का इस्तेमाल किया, जो उनके संघर्षों को मदद दे सकें। और किस तरह हश्तनगर आंदोलन ने शासक-वर्ग के अंदरूनी विरोधाभासों का इस्तेमाल जमीन बचाने के लिए किया।

सचमुच के इस आंदोलन ने मुझे एक मुख्य बात सिखायी, जो मेरी रणनीति का आदर्श दर्शन है। समाजवादी विचारों को येन केन प्रकारेण मुख्यधारा में लाया जाना चाहिए। सीधे शब्दों में कहें, उद्देश्य था समाजवादी विचारों को लोकप्रिय बनाना। और इसे किसी भी तरह से किया जाना चाहिए। इसलिए, मुझे यह स्वीकार करने में कोई शर्म महसूस नहीं होती कि मैंने पूंजीवादी कॉरपोरेशनों, मुख्यधारा के पूंजीवादी मीडिया के साथ काम किया, विज्ञापन के हथकंडे अपनाये और सोशल मीडिया का उपयोग किया, बुर्जुआ राजनीतिक दलों के साथ काम किया, यह सब किया बस एक उद्देश्य को पूरा करने के लिए : मुख्यधारा में समाजवाद के आदर्शों को लोकप्रिय बनाने के लिए।

मेरा नौजवान कॉलेज ग्रेजुएट वाला ‘आत्म’, जिसे असली दुनिया का कोई अनुभव नहीं था, जिसने रोजी-रोटी के लिए या किसी आंदोलन के लिए कभी काम नहीं किया था, जिसे मेहनतकश तबके की असली राजनीति का कोई अनुभव नहीं था, वह मुझे, इस 36 साला व्यक्ति को एक छद्म-बुर्जुआ बुद्धिजीवी समझता जो यह सब कुछ अपने को आगे बढ़ाने और लोकप्रिय बनाने के लिए कर रहा है। इसीलिए मैं समझ सकता हूं कि क्यों कुछ अनुभवहीन नौजवान कॉमरेड आज मेरे बारे में ऐसा ही सोचते हैं। लेकिन मेरा भरोसा है कि वह दिन आएगा, जब उन्हें भी अपने आज के जवान और आदर्शवादी निर्णयों पर पुनर्विचार करना होगा।

यह वह पाठ नहीं जिसे शब्दों से पढ़ाया जा सकता है। यह वह पाठ है जिसे वे सिर्फ तभी सीख सकते हैं, जब वे असली दुनिया में दाखिल होंगे और उन्हें अपने लिए और परिवार के लिए कमाना होगा, और इसके साथ लगातार मजदूर आंदोलनों में शिरकत करनी होगी। तब उन्हें समझ में आएगा कि पूंजीवादी वस्तु उत्पादन की असल दुनिया में, हर गतिविधि, हर हड़ताल, हर पोस्टर, परचा, प्रचार, म्युजिक वीडियो, गाना, संगीत आयोजन, गोष्ठियां, असल में हर एक कदम के लिए वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता होती है। जब मुझे अपने माता-पिता से या समाज से छात्रवृत्ति मिलती थी, उन दिनों मैं समाजवादी फंतासियों के स्वप्नलोक के बारे में लगातार बात कर सकता था, जिसमें क्रांतियां उद्देश्यों की पवित्रता-मात्र का परिणाम थीं। यह सिर्फ अनुभव ही सिखा सकता है कि एक समाजवादी आंदोलन खड़ा करने के रोजमर्रा के संघर्ष ऐसे बचकाने स्वप्नलोक से उसी तरह अलग थे, जैसे धरती स्वर्ग से अलग है।

अपने बचाव में, मैं बस यह कह सकता हूं कि मैंने यह सब समाजवाद को इस प्रतिक्रियावादी समाज में लोकप्रिय बनाने के लिए किया। मेरे पास कोई और रास्ता मौजूद नहीं था। मेरी राजनीति और मेरे संगीत के लिए कोई उदहारण मौजूद नहीं था। मैं कई गलतियां कीं और अपने दोस्तों को बस इतना भरोसा दिला सकता हूं कि आगे और भी कई गलतियां करूंगा। लेकिन अपने घोर आलोचकों को भी इतना भरोसा दिलाना चाहता हूं कि मेरा उद्देश्य हमेशा ज्यादा से ज्यादा लोगों तक वर्ग-विहीन समाज के महान संदेश को ले जाना रहा है।

आज लाल समाजवाद को लोगों तक पहुंचाने के इस काम में एक महत्वपूर्ण क्षण है, जब हम जवाहरलाल नेहरु विश्‍वविद्यालय में मजदूर दिवस के अवसर पर गीत-संगीत का कार्यक्रम प्रस्तुत करेंगे। हिंदुस्तान के हमारे इस कामयाब दौरे का यह चरम क्षण है, जिसने लाल को सही मायनों में एक अंतर्राष्ट्रीय बैंड बना दिया है। इस दौरे ने दोनों तरफ के प्रगतिशील तबकों को उत्साह से भर दिया है। दोनों मुल्कों के बीच दोस्ती के बाबत मेरे हजारों भाषणों से अधिक इस दौरे ने प्रभाव छोड़ा है। इसने पहले से बनी छवियों को तोड़ा है। इसने दक्षिण एशिया में वामपंथ के शब्दकोश में एक नये संगीत और अभिव्यक्ति को जोड़ा है। यह दौरा हर लिहाज से कामयाब रहा है।

मैं इसे दूसरे आंदोलनों के लिए एक आदर्श के रूप में पेश नहीं करना चाहता। लेकिन इस लेख को इतना कह कर खत्म करना चाहता हूं कि इस दौरे और अन्यत्र की तमाम खामियां मेरी गलती हैं। और सभी कामयाबियां उस सीख का नतीजा हैं, जो मैंने पकिस्तान के मजदूर आंदोलन में रहकर सीखा है। यह आलेख मेरे काम और संघर्ष पर एक व्यक्तिगत टिप्पणी भर है।

उठो मेरी दुनिया!!
दुनिया के मजदूरों एक हो!!
लाल सलाम!!

अनुवाद : प्रकाश के रे. साभार: मोहल्लालाइव

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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