हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

एक अभिजातीय सनक में तबदील हो रहा है लाल

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/01/2012 05:25:00 PM

तैमूर रहमान द्वारा लिखा गया नोट और कल शाम जेएनयू में उनकी बातचीत वास्तव में शहराम अजहर के इस आरोप की पुष्टि ही करते हैं कि लाल एक ‘अभिजातीय सनक में तबदील’ हो रहा है. राजनीतिक शब्दावलियों और लफ्फाजियों के बावजूद वास्तविक राजनीतिक सवालों से कतराना, सोवियत संघ और चीनी सांस्कृतिक क्रांति को लेकर मध्यवर्गीय नैतिकता से ओत-प्रोत फैसले सुनाना इसे जाहिर करने के लिए काफी थे कि लाल मुश्किल से सीपीएम-सीपीआई की शैली वाली ‘क्रांतिकारिता’ के करीब ही पहुंच सका है. इसकी इस थोथी अभिजात राजनीतिक समझ में ही गिरावट और भटकाव के बीच छिपे हुए हैं. यही राजनीतिक समझ एक तरफ मे-डे कैफे के नाम से क्रांति की दुकान चला रही है तो दूसरी तरफ मशहूरियत और कामयाबियों के लिए राजनीतिक सरोकारों और मकसद को बेच रही है. इसीलिए हैरानी की बात नहीं है कि भारत में लाल के बड़े तरफदारों में वही लोग शामिल हैं जिन्होंने यहां क्रांति को धोखा दिया है और जनता के हितों के खिलाफ खड़े हैं:सीपीएम-सीपीआई तथा सीपीआई(एमएल) लिबरेशन/आइसा. शहराम अजहर का बयान. अनुवाद: हाशिया

मैं चाहूंगा कि मैं उस भ्रम को दूर करूं जो हाल ही में एक्सप्रेस ट्रिब्यून को दिए गए मेरे इंटरव्यू से पैदा हो सकता है. मैं शुरू में ही कहना चाहूंगा कि (लाल बैंड में आई) यह दरार किसी निजी मतभेद की वजह से पैदा नहीं हुई है. न ही यह लाल के मुख्य गायक के रूप में काम करते रहने की किसी चाहत से पैदा हुई है. 2010 में जब तैमूर ने यह साफ कर दिया था वे गायक के रूप में काम करना चाहते हैं, तो मैंने उनको अनेक मौकों पर लिखा और कहा कि ‘मैं खुद को आंदोलन के एक सिपाही के रूप में देखता हूं और देखता रहूंगा: जो आंदोलन सामाजिक बदलाव की एक तलाश है जिसे फैज और जालिब ने शुरू किया था.’

2008 में जब बैंड बना था तो यह साफ था कि हम इसे उत्पीड़ित, शोषित और समाज के दबे-कुचले तबकों के अधिकारों से सरोकार रखने वाले मसलों पर जागरुकता पैदा करने के लिए एक मंच के बतौर इस्तेमाल करेंगे. यह व्यापक दर्शकों तक पैगाम ले जाने का एक मौका था. हम संगीत उद्योग में प्रभुत्व के लिए होड़ नहीं कर रहे थे, हम इस तहरीक से नौजवानों को प्रेरित करने की कोशिश कर रहे थे. हमें जो ताकत प्रेरित कर रही थी वह इनकलाब थी, न कि निजी मशहूरियत. लाल का एक तहरीक के रूप में गिरावट और इसके एक तिजारती शोर-शराबे में बदल जाने ने इसके सबसे प्रतिबद्ध नौजवान बुद्धिजीवियों को यह सवाल करने पर मजबूर किया है और उनका यह पूछना जायज ही है कि: कहां है वह इनकलाबी तहरीक जिसे हम खड़ी करना चाहते थे? क्या फैशन शो में प्रस्तुतियां करना इसे खड़ा करने का रास्ता है? क्या टी-शर्ट बेचना वह मकसद है, जिसे हमने खुद के लिए तय किया था? लाल में मेरी गैरमौजूदगी और इसमें आई गिरावट को लेकर मुझे अपने दोस्तों और प्रशंसकों के सैकड़ों पैगामात मिले तो मैंने 8 महीने पहले फैसला किया कि लोगों के सामने मैं सच्चाई को पेश करूं. हालांकि लाल ब्रिगेड के मेरे कॉमरेडों ने मुझसे कहा कि मेरा बयान उनके उन कामों पर पूरी तरह पानी फेर देगा जिन्हें वे लाल के मंच का इस्तेमाल करते हुए किसी तरह कर रहे थे. मैंने उनकी सलाह मानी और चुप रहा. मेरी खामोशी मेरे कॉमरेडों की सामूहिक इच्छा के नतीजे में पैदा हुई थी और इसीलिए मैंने अब इसे तोड़ने का फैसला किया है. इसे एक और एलीटिस्ट सनक में बदल जाने के पहले इसके पीछे के दर्शन को बचा ले जाना जरूरी है.

यह बदकिस्मती ही है कि कैसे वे विचार और विजन जो अपने मूल रूप में बहुत साफ थे, सिर के बल खड़ी हो गए हैं. निजी तौर पर मेरे लिए मुख्यधारा की कामयाबी (या इसकी कमी) केवल उसी हद तक मायने रखती है जब तक यह हमारे मकसद को आगे बढ़ाने में मदद करती है. तब भी यह ऐसा था और अब भी ऐसा ही है. जब मैंने जालिब का यह शेर गाया तो मैं इसे दिल से मानता भी था:
ऐ मेरे वतन के फनकारो जुल्मत पे ना अपना फन वारो
ये महल सराओं के वासी कातिल हैं सभी अपने यारों


अपने संघर्ष के हर कदम पर मैंने तैमूर की मशहूरियत की तमन्ना और लाल ब्रिगेड के सदस्यों के इनकलाबी जोश के बीच पुल को तलाशने की कोशिश की. मैं अपने बेहतरीन दोस्त की मकबूलियत की ललक और उन नौजवानों के बीच झूलता रहा जो एक तहरीक से कम किसी भी चीज की चाहत नहीं रखते. और मैंने इस दूसरी चीज को चुना है. मैं मानता हूं कि नौजवानों की एक ईमानदार इनकलाबी तहरीक ही हमारे देश को बेहतर बना सकती है, रूपांतरित कर सकती है. मैं मानता था और अब भी मानता हूं कि फैज और जालिब के पैगामों में हमारे वतन को बदल देने की ताकत है अगर ये समाज के उत्पीड़ित, शोषित तबकों के दिलो-दिमाग में पैठ जाएं. हमें तिजारती मुनाफों की कसौटियों के आगे घुटने टेकने की जरूरत नहीं है. अगर यह आदर्शवाद है, तो मैं इस आदर्शवाद के साथ खड़ा हूं.

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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