हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

जगनमोहन रेड्डी यानी भारत में मीडिया सिर्फ कॉरपोरेट का नहीं है (भाग- 2)

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/31/2012 08:20:00 PM


पार्टी मुखपत्र का ज़माना लद गया
-दिलीप खान

इससे पहले इन दोनों लिंक पर घूम आए

वाईएसआरकी छवि के बाद जगन के पास राजनीतिक तौर पर शक्तिशाली बनने के लिए जो सबसे अहम हथियारहै, वो है साक्षी। यह जगन भी जानते हैं और विरोधी पार्टियां भी। इसलिए बाकी पार्टियांजगन से ज़्यादा उसके मीडिया समूह पर निशाना साध रहे हैं और जगन अपने मीडिया समूह केबचाव को खुद का बचाव समझते हुए लगभग अभियान चलाए हुए हैं। आंध्र प्रदेश में यदि साक्षी-जगनमोहनके रिश्तों की पड़ताल होती है तो इसके साथ-साथ इनाडु और टीडीपी के रिश्तों की भी होनीचाहिए, क्योंकि जगन का हमेशा ये तर्क रहा है कि उन्होंने इनाडु-रिलायंस-टीडीपी की दुरभिसंधिको ध्वस्त करने के लिए ही अपना अख़बार शुरू किया। मुख्यमंत्री किरण रेड्डी उस समय बेहदपरेशान थे जब मुख्यमंत्री के दौर में चलने वाले हर उम्मीदवार पर साक्षी चोट कर रहाथा। चाहे किरण रेड्डी हो, चाहे रोसैया। किरण रेड्डी के पास ऐसा कोई मीडिया नहीं हैजो खुलकर उनकी सलामी बजाए। टीडीपी के पास है, वाईएसआर कांग्रेस के पास है। असल मेंआंध्र में कांग्रेस पार्टी के भीतर ही कई गुट हैं। इसलिए एक आम राय किसी ख़ास नेताके बारे में मीडिया में नहीं उभर पाती। हां, किरण के पास मुश्किल ही सही लेकिन रास्तेहैं। इन्हीं रास्तों का इस्तेमाल उन्होंने अभी जगन के ख़िलाफ़ किया। सीबीआई की छापेमारीको सीधे-सीधे किरण की बाजी न भी कहें तो साक्षी में दिए जाने वाले सरकारी विज्ञापनोंपर पाबंदी कुछ ऐसा ही कदम है। लेकिन इसका मतलब ये नहीं निकाला जाना चाहिए कि आंध्रमें कांग्रेस पार्टी मीडियाविहीन है। कांग्रेस सांसद टी सुब्बीरामी रेड्डी के भतीजेटी वेंकटरामी रेड्डी का दक्कन क्रॉनिकल होल्डिंग्स कंपनी में 21 फ़ीसदी शेयर है। इसतरह दक्कन क्रॉनिकल, एशियन एज, फाइनेंसियल क्रॉनिकल और आंध्र भूमि में उनकी बड़ी हिस्सेदारीहै। साक्षी प्रकरण में इन अख़बारों की सरकारी भूमिका और पक्षधरता इस बात को पुख्ताकर रही थी कि कम से कम आंध्र प्रदेश में मीडिया अब राजनीतिक तौर पर टुकड़ों में बंटचुका है।
प. बंगाल में कुछ अखबारों पर लगी पाबंदी को बयान करता कार्टून 
असलमें पार्टी मुखपत्र का जमाना अब लद गया। राजनीतिक दल यह जानने लगे हैं कि मुखपत्र कोया तो पार्टी कैडर पढ़ते हैं या फिर आलोचना के वास्ते विरोधी पार्टियां। हद से हद किसीविषय पर पार्टी का पक्ष जानने के लिए मीडिया उससे गुजरता है। लेकिन मीडिया की मौजूदागति मुखपत्र की बजाए रोजमर्रा के स्रोतों से ख़बर जमा करने की वजह से ही कायम हुई है।इस लिहाज से मुखपत्र उनके एजेंडे में उपयुक्त नहीं बैठता। लेकिन राजनीतिक पार्टी केनजरिए से सोचें तो यदि मीडिया मुखपत्र को पढ़ता भी है तो इससे पार्टी को कितना लाभहोगा? कोई ज़रूरी नहीं है कि उसी राजनीतिक नजरिए से मीडिया पार्टी की बात को जनता केबीच रखे। इसलिए बरास्ते मीडिया अपनी बात रखने-रखवाने में राजनीतिक दलों और नेताओं कोएक अवरोध तो दिखता ही है। ज़्यादा मुफीद यह होगा कि मुखपत्र के जरिए मीडिया तक बातपहुंचाने की बजाए सीधे मीडिया के जरिए अपनी बात लोगों तक पहुंचाए। नेताओं ने इस योजनापर बीते वर्षों में तेजी से काम किया है और अब वो सीधे-सीधे मीडिया के मालिक बन रहेहैं। भारतीय राजनीति में ये हाल के बदलाव हैं, लेकिन बड़े बदलाव हैं। अपनी राजनीति,अपनी ख़बर, अपना मीडिया।
दक्षिणभारत में सघन दिखने वाला मीडिया-राजनीति का यह रूप धीरे-धीरे पूरे देश में फैल रहाहै। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हाल ही में घोषणा की कि वो पार्टीकी तरफ़ से नया अख़बार और टीवी चैनल लॉन्च करेंगी। नाम तक उन्होंने जाहिर कर दिया।दैनिक पश्चिमबंग और पश्चिमबंग टीवी। इस नामकरण और घोषणा को एक ख़ास पृष्ठभूमि में ममताने पेश किया। उन्होंने पहले राज्य के सरकारी पुस्तकालयों में अंग्रेज़ी अख़बार सहितकुछ बड़े बांग्ला अख़बारों पर यह कहकर पाबंदी लगा दी कि वो राजनीतिक तौर पर पूर्वाग्रहीसमाचारपत्र हैं। फिर उन्होंने सार्वजनिक तौर पर कहा कि तृणमूल कांग्रेस के काम-काजोंको चूंकि ये अख़बार ठीक से जनता के बीच पेश नहीं कर पाते, इसलिए जनता तक बात पहुंचानेके लिहाज से वो मीडिया में हाथ आजमा रही हैं। जबकि पश्चिम बंगाल में ऐसे कई मीडियासमूह हैं जिनपर तृणमूल कांग्रेस की अच्छी पकड़ है। आरपी ग्रुप के चैनल कोलकाता टीवीको तृणमूल कांग्रेस ने बेल-आउट के लिए संपर्क किया था। तृणमूल कांग्रेस की तरफ़ सेराज्यसभा सांसद स्वपन सदन बोस यानी टुटू बोस संबाद प्रतिदिन नाम से अख़बार चलाते हैं।प्रतिदिन प्रकाशन के वो मालिक हैं। बंगाल मीडिया प्राइवेट लिमिटेड जो चैलन-10 चलातीहै वो तृणमूल कांग्रेस के पक्ष में हमेशा ख़बर चलाता है। इसके मालिक शांतनु घोष औरश्रीमति सुदेशना घोष तृणमूल के प्रति वफ़ादार हैं। इस वफ़ादारी की कहानी काफी पुरानीहै। सीपीएम के कब्जे में भी मीडिया है। आकाश बांग्ला और ज़ी न्यूज़ के साझा उपक्रमज़ी आकाश में बड़ी हिस्सेदारी रखने वाले अवीक दत्ता सीपीएम कार्यकर्ता हैं। वो सीपीएमके पत्र गणशक्ति के सहायक संपादक हैं और सीपीएम के छात्र नेता रह चुके हैं। अवीक दत्तान सिर्फ़ आकाश बांग्ला चलाते हैं बल्कि एक और टीवी चैनल 24 घंटा भी चलाते हैं।
अबतकरीबन हर राज्य में राजनीतिक पार्टियों के बीच मीडिया का बंटवारा हो रहा है। या तोखुद राजनेता ही मीडिया कारोबार में उतर जा रहे हैं या फिर संपादकों को राज्यसभा जानेकी उम्मीद जगाकर अपने पक्ष में कर ले रहे हैं। बहुत दिन नहीं हुए जब बिहार के मीडियापर प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष मार्कंडेय काट्जू ने टिप्पणी की थी कि वहां का मीडियाआज़ाद नहीं है। जाहिर है जवाब सरकार को देना चाहिए, लेकिन झारखंड के एक बड़े अख़बार,जोकि बीते कुछ सालों से बिहार के बाज़ार में भी संभावना तलाश रहा है, ने काट्जू केबयान के विरोध में दो पेज का लेख छापा। अख़बार के प्रधान संपादक ने उसे लिखा था, जिनकेबारे में आजकल चर्चा गरम है कि वो जनता दल (यूनाइटेड) की तरफ़ से राज्यसभा आने की हरसंभवकोशिश में लगे हैं। झारखंड में मीडिया, राजनेता और कॉरपोरेट की भूमिका पर यहां चर्चाकरना बहुत मुफ़ीद नहीं है, लेकिन संक्षेप में यह बता दिया जाए कि झारखंड और बिहार सेनिकलने वाले प्रभात ख़बर की फादर कंपनी ऊषा मार्टिन खनन कारोबार में भी संलग्न है।जाहिर है राजनेताओं के साथ गठजोड़ उनकी ज़रूरत है। उसी राज्य से अनाधिकारिक तौर परयह ख़बर भी मिल रही है कि देश में सबसे ज़्यादा पढ़े जाने वाले हिंदी अख़बारों मेंसे एक ने जिंदल ग्रुप के साथ यह समझौता किया है कि वो जिंदल के पक्ष में अगले पांचसाल तक स्टोरी करेगा। बिहार के मीडिया में प्रकाश झा के पैसों की बहुत चर्चा है औरलोग जानते हैं कि प्रकाश झा का जनता दल (यू) के साथ क्या संबंध है।
वापसआंध्र प्रदेश चलते हैं। वहां जनाधार को विस्तार देने की खातिर हर बड़ी पार्टी ने अपना-अपनामीडिया खोल रखा है या यूं कहें कि हर मीडिया वाली राजनीतिक पार्टी बड़ी पार्टी बन गईहै। तेलंगाना राष्ट्र समिति के अध्यक्ष के चंद्रशेखर राव टी-न्यूज़ नाम से चैनल चलातेहैं। चंद्रशेखर राव तेलंगाना ब्रॉडकास्टिंग प्राइवेट लिमिटेड नाम की कंपनी के मालिकहैं और यही कंपनी टी-न्यूज़ चैनल की फादर कंपनी है। अलग तेलंगाना के मुद्दे को लेकरसबसे बड़े नेता के तौर पर चंद्रशेखर राव के उभार में उनकी पृथक पार्टी के साथ-साथ इसचैनल का भी बड़ा योगदान है। इस तरह साक्षी कोई अपवाद नहीं बल्कि वहां की राजनीति केलिए नियम है।
मुकेश अम्बानी और नीमेश कम्पानी: मीडिया खेल के बाजीगर 
मीडियाबाज़ार की गुपचुप शैली में यह पता लगाना काफ़ी मुश्किल है कि किस कंपनी के साथ किसकाहित नत्थी है। साक्षी ने शुरुआत से ही लगातार यह इल्जाम लगाया कि इनाडु, रिलायंस औरटीडीपी के चंद्रबाबू नायडू के बीच गठजोड़ है। इसी बीच इनाडु ने यह आधिकारिक घोषणा कीकि उषोदया इंटरप्राइजेज में 40 प्रतिशत शेयर ख़रीदने के साथ ही ईटीवी के 10 चैनलोंके सौ फ़ीसदी शेयर का मालिक रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड हो गया है। सिर्फ तेलुगू ईटीवीऔर ईटीवी-2 पर रामोजी राव की पकड़ कायम रही, जहां वो 51 फ़ीसदी और रिलायंस 49 फ़ीसदीशेयर के मालिक हैं। इस तरह साक्षी के आरोप को बल मिला। साक्षी ने यह भी कहा कि नीमेशकंपानी के मार्फत रिलायंस ने उषोदया इंटरप्राइजेज में जो निवेश किया है वो इसलिए हैताकि केजी बेसिन मामले में रिलायंस को चंद्रबाबू नायडू का लाभ मिल सके। उस समय साक्षीने यह दावा किया कि खरीद-बिक्री का ये पूरा मामला फर्जीवाड़े पर आधारित है और अगर कोर्टमें मामला साबित हो गया तो रामोजी राव पर 7700 करोड़ रुपए का जुर्माना भी लग सकता है।
लेकिनजानकारी, सूचना और आरोप-प्रत्यारोप का यह अद्भुत दौर है। इनाडु-रिलायंस के जिन रिश्तोंको जोड़-शोर से साक्षी ने उठाया उसका दूसरा सिरा पकड़ते हुए टीडीपी नेता रेवंत रेड्डीने दिसंबर 2011 में एक नया रहस्योद्घाटन किया। उनका आरोप है कि नीमेश कंपानी ने जगनमोहनरेड्डी के साक्षी मीडिया समूह में भी निवेश किया है। रेवंत का कहना है कि जेएम फाइनेंसिल्स,लैटिट्यूड और मर्केंटाइल प्राइवेट लिमिटेड के अध्यक्ष नीमेश कंपानी ने 27.65 करोड़रुपए मेटाफर रियल एस्टेट एंड प्रोजेक्ट्स लिमिटेड में निवेश किया जोकि पटलूरी वाराप्रसाद की कंपनी है। रियल एस्टेट का धंधा करने वाले प्रसाद को वाईएस राजशेखर रेड्डीपरिवार का करीबी माना जाता है। तो कहानी यह है कि प्रसाद की कंपनी में 27.65 करोड़लगाने के एवज में नीमेश कंपानी ने प्रसाद को इस बात के लिए तैयार किया कि वो जगति प्रकाशनमें कुछ निवेश करे और डील के मुताबिक प्रसाद ने बाद के दिनों में जगनमोहन रेड्डी केजगति प्रकाशन में 10 करोड़ रुपए का निवेश किया।
मीडियाअध्ययन में मीडियाटाइजेशन का सिद्धांत है जिसमें यह बताया गया है कि किस तरह मीडियाआज की राजनीति को संचालित करता है। एजेंडा सेटिंग जैसे सिद्धांत से यह महत्वपूर्ण अर्थमें भिन्न है। एजेंडा सेटिंग सिर्फ यह बताता है कि मीडिया किसी देश में एक कम महत्वपूर्णमुद्दे को भी सबसे बड़े मुद्दे के तौर पर स्थापित करने की शक्ति रखता है, लेकिन मीडियाटाइजेशनयह कहता है कि असल में राजनीति की दिशा और दशा दोनों को मोड़ने में आज का मीडिया बेहदमहत्वपूर्ण हो गया है। इस तरह अगर किसी राजनेता या पार्टी के पास मीडिया है तो वह विरोधीपार्टी से एक हाथ ऊपर है। इसमें राज्य मायने नहीं रखता। आंध्र प्रदेश हो चाहे तमिलनाडुया फिर पंजाब, मीडिया अपने असर के मामले में स्थान निरपेक्ष है। शिरोमणि अकाली दल केसुखबीर सिंह बादल सिर्फ पार्टी में मालिकाना भाव नहीं रखते बल्कि वो पंजाब के लोकप्रियटीवी चैनल पीटीसी और पीटीसी न्यूज़ के भी मालिक हैं। जी-नेक्स्ट मीडिया प्राइवेट लिमिटेडनाम की उनकी मीडिया कंपनी है। बीते दिनों संपन्न हुए पंजाब विधानसभा चुनाव में जब राजनीतिकप्रचार अभियान चल रहा था तो कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी सहित अन्य कई नेताओं ने बादलपरिवार पर यह आरोप लगाया कि उन्होंने अपने चैनल को पार्टी के प्रचार का मंच बना रखाहै। पंजाब के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ जब एक ही पार्टी ने दुबारा सत्ता में वापसीकी। शिरोमणि अकाली दल को बड़ी जीत हासिल हुई। कुछ-न-कुछ राहुल गांधी के आरोप में तोवजन होगा, कुछ-न-कुछ पीटीसी न्यूज़ का तो असर होगा!

Related Posts by Categories



Widget by Hoctro | Jack Book
  1. 0 टिप्पणियां: Responses to “ जगनमोहन रेड्डी यानी भारत में मीडिया सिर्फ कॉरपोरेट का नहीं है (भाग- 2) ”

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


फीड पाएं


रीडर में पढें या ई मेल से पाएं:

अपना ई मेल लिखें :




हाशिये में खोजें