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बीच सफ़हे की लड़ाई

जेएनयू: GSCASH को सजा देने का अधिकार मिले

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/11/2012 02:59:00 PM

जेएनयू में कल वोटिंग हैं- कल छात्र जेंडर सेंसेटाइजेशन कमेटी अगेंस्ट सेक्सुअल हैरसमेंट (GSCASH) के लिए छात्र प्रतिनिधियों को चुनेंगे. इसमें सबसे अहम मुद्दा GSCASH को सजा देने में सक्षम बनाने का है, क्योंकि जैसा कि लंबे समय से देखा जा रहा है, प्रशासन फैकल्टी मेंबरों को बचाता आया है. दो-तीन साल पहले ऐसा ही एक मामला हिंदी सेंटर के एक प्राध्यापक का देखा गया था, जिसमें आइसा के नेतृत्ववाले जेएनयूएसयू ने फैकल्टी मेंबर को बचाने की भरपूर कोशिश की थी और GSCASH द्वारा की गई सिफारिश को घटा कर सजा को बहुत कम करदिया गया था. ऐसा इसलिए होता है कि GSCASH सिर्फ सिफारिश कर सकती है, सजा लागू करने का अधिकार वीसी को है. छात्र मांग कर रहे हैं कि वीसी से यह अधिकार छीना जाए और GSCASH जो सिफारिश करे वह प्रशासन के लिए बाध्यकारी हो. यह मांग DSU तथा Struggle Committee against Lyngdoh, Privatization & Brahmanism की तरफ से पेश की जा रही है. बाकी संगठन इस पर या तो चुप हैं या इसके खिलाफ हैं. SFI का तो यहां तक कहना है कि इससे लैंगिक न्याय के मकसद को नुकसान पहुंचेगा. हमें नहीं भूलना चाहिए कि ऐसे ही संगठनों का अब तक कैंपस में यौन उत्पीड़कों को बचाने का लंबा इतिहास रहा है. यहां हम Struggle Committee का 10 अप्रैल का पर्चा पोस्ट कर रहे हैं.




एक संस्था के रूप में GSCASH लैंगिक न्याय के लिए और यौन उत्पीड़न जैसे उत्पीड़क व्यवहारों तथा इसको जायज ठहराने वाली विचारधाराओं के खिलाफ खड़ा हुआ है. हालांकि आजकल जेएनयू में इस तरह की बातें प्रचारित की जा रही हैं कि GSCASH महिलाओं के हाथ में पुरुषों को ‘धमकाने’ का औजार है. यह जेएनयू जैसे एक प्रगतिशील कैंपस के लिए दुर्भाग्य की बात है कि यहां भी लैंगिक न्याय की बहस सिमट कर ‘पुरुष बनाम स्त्री’ पर आ जाती है. लेकिन इससे यह संकेत भी मिलता है कि लैंगिक न्याय और समानता की हमारी लड़ाई अभी अधूरी है. कैंपस के बाहर की दुनिया में उत्पीड़क सामाजिक संबंधों तथा पितृसत्ता के रूप में भेदभावपरक वैचारिक संरचनाओं के खिलाफ लैंगिक न्याय के लिए रोज ब रोज लड़ाई लड़ी जा रही है. जेएनयू ऐसे सामाजिक यथार्थ से अलग नहीं है और इसलिए जेएनयू में भी पितृसत्तात्मक कायदों और व्यवहारों के खिलाफ सामूहिक छात्र संघर्षों की जरूरत है. अगर GSCASH को लैंगिक न्याय की लड़ाई लड़नी है तो एक संस्था के रूप में इसे हमारे संगठित प्रगतिशील आंदोलनों के एक पूरक के बतौर काम करना जरूरी है. इसीलिए Struggle Committee का मानना है कि आनेवाला GSCASH चुनाव महज वोट देने और अपना प्रतिनिधि चुनने का मौका ही नहीं है बल्कि इसी के साथ यह एक ऐसा मौका भी है जब हम लैंगिक मुद्दों पर बहस और चर्चाएं कर सकते हैं और एक नई प्रतिबद्धता के साथ कैंपस में लैंगिक न्याय के लिए छात्र आंदोलनों को आगे बढ़ा सकते हैं.



GSCASH को मजबूत करने और लैंगिक न्याय को सुनिश्चित करने की लड़ाई कोई अलग-थलग सवाल नहीं है. अपने कैंपस को लैंगिक मुद्दों पर संवेदनशील बनाने के लिए उठाए गए हरेक कदम के साथ ही हम यह भी सुनिश्चित करते हैं कि हमारा कैंपस और अधिक जनवादी और सबके लिए खुला हुआ हो- किसी के लिंग, वर्ग, जाति या धर्म के आधार पर भेदभाव न हो. क्या लिंगदोह सिफारिशों के खिलाफ लड़ाई के लिए प्रतिबद्ध हम सब लोग लैंगिक न्याय के सवाल पर चुप रह सकते हैं? पितृसत्ता के खिलाफ हमारी लड़ाई और लिंगदोह के खिलाफ हमारी लड़ाई में क्या हम एक ही दुश्मन से नहीं लड़ रहे हैं- नव उदारवादी निजीकरण की नीतियों से, जो ब्राह्मणवाद के वैचारिक ढांचे में फल-फूल रही हैं? राज्य द्वारा थोपा गया लिंगदोह छात्र राजनीति का अराजनीतिकरण करने के लिए लागू किया गया है ताकि उच्च शिक्षा का मेरिट के ब्राह्मणवादी तर्क के साथ निजीकरण किया जा सके. जेएनयू प्रशासन जैसी ताकतें लिंगदोह के लिए रास्ता साफ करने, सामाजिक न्याय को नाकाम करने और जेएनयू को मुनाफा कमाने के संस्थान के रूप में बदल देने में मददगार रही हैं. 2007 में इसी जेएनयू प्रशासन ने अशोक माथुर कमेटी के नेतृत्व में GSCASH के लिए पितृसत्तात्मक प्रावधानों को पेश किया था. अशोक माथुर कमेटी ने ऐसे प्रतिक्रियावादी सुझाव दिए कि फैकल्टी के खिलाफ दर्ज किए गए मामलों को रियायत के साथ देखा जाए. उसने GSCASH के students representatives से कहा कि वे ‘विकृत’ यौन व्यवहारों को लेकर सतर्क रहे. साफ है कि फैकल्टी और प्रशासन में मौजूद इन्ही ताकतों को जिन्हें कोई यौन व्यवहार तब ‘विकृत’ लगता है जब वह जातिवादी, पितृसत्तात्मक सामान्यताओं के तहत नहीं होता, पिछड़े और दलित ‘बौद्धिक बौने’ लगते हैं और ये मानते हैं कि शिक्षा को एक माल के रूप में खरीदा-बेचा जाना चाहिए. इसलिए वे टाटाओं-बिरलाओं और मिस्टर लिंगदोह के एजेंट के रूप में काम कर रहे सिर्फ जातिवादी और सांप्रदायिक ही नहीं है,बल्कि वे पितृसत्तात्मक भी हैं. और इसीलिए निजीकरण और ब्राह्मणवाद के खिलाफ हमारी लड़ाई को सामाजिक-लैंगिक न्याय और कैंपस डेमोक्रेसी की लड़ाई भी होना चाहिए. इसीलिए JNUSU के संविधान में यह प्रावधान था कि GSCASH के चुनाव JNUSU के चुनावों के साथ होंगे. यह इसका सबूत है कि जेएनयू का छात्र समुदाय यह मानता रहा है कि ये दोनों संघर्ष न केवल साझे संघर्ष हैं बल्कि इन संघर्षों को अलग नहीं किया जा सकता.



ऐसी ही राजनीतिक प्रतिबद्धता के साथ Struggle Committee ने GSCASH चुनावों को लिंगदोह के तहत कराए जाने का विरोध किया था.पिछले दिनों एक अंतरिम उपाय के तहत JNUSU चुनावों को लिंगदोह के तहत करा कर और JNUSU संविधान को परे रख कर जेएनयू में छात्रसंघ चुनावों के प्रगतिशील चरित्र को ऐसा नुकसान पहुंचाया गया है जिसकी भरपाई नहीं हो सकती. GSCASH चुनावों पर भी लिंगदोह को लागू करना पूरी तरह आत्मसमर्पण होता. इसलिए सामूहिक तौर पर छात्रों ने AO मीटिंग में दूसरे संगठनों को जिनमें खुद को प्रगतिशील करनेवाले और इस मुद्दे पर चुप्पी साधे बैठे SFI-AISA शामिल थे, यह मानने पर मजबूर किया कि GSCASH चुनावों पर लिंगदोह नहीं लगाया जाए. हालांकि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हम JNUSU चुनावों के साथ ही GSCASH चुनाव नहीं करवा पाए. हमने सख्ती से यह मांग रखी कि आनेवाले समय में GSCASH चुनाव JNUSU चुनावों के साथ ही कराए जाएं. हमें यह याद रखने की जरूरत है कि भले ही GSCASH छात्र संघ का हिस्सा नहीं है फिर भी यह छात्रों के संघर्ष का एक मंच है. इसके अलावा JNUSU चुनावों के साथ ही बिना लिंगदोह के GSCASH चुनाव करना हमारी तरफ से लिंगदोह के खिलाफ और कैंपस डेमोक्रेसी के पक्ष में एक मजबूत कदम होगा.



इस नाजुक मौके पर लंबे समय से छात्र समुदाय की इस मांग को जमीन पर उतारने के लिए ठोस कोशिशें करने की जरूरत हैं कि GSCASH को सजा देने में सक्षम (Punitive) बॉडी बनाया जाए. हम जानते हैं कि किस तरह प्रशासन द्वारा बाधाएं खड़ी किए जाने की वजह से GSCASH अब तक अपनी जिम्मेदारियां बखूबी नहीं निभा पा रहा है. फैकल्टी और कर्मचारियों के खिलाफ अधिकतर मामलों में जेएनयू प्रशासन उनका बचाव करता आया है. इसके नतीजे में लैंगिक संबंधों में गैरबराबरी कायम है. इसकी बुनियादी वजह यह है कि GSCASH महज वीसी ऑफिस को सिफारिश कर सकती है और एक बार सिफारिश पेश कर देने के बाद वीसी को यह अधिकार होता है कि अपराधियों को सजा दी जाए या नहीं. और हम यह उम्मीद नहीं कर सकते कि प्रशासन लैंगिक न्याय के प्रगतिशील सिद्धांतों पर चलेगा. हमें काम करने के इस तरीके को चुनौती देनी है. यौन उत्पीड़न किसी भी तरह से अनुशासन तोड़ने का मामला नहीं है जैसा कि प्रशासन इसे देखना चाहता है. यह पितृसत्तात्मक व्यवस्था और मानसिकता का एक लक्षण है जो प्रशासन और पदाधिकारियों में भी दिखता है, इसलिए हम वास्तव में उनसे यह अपेक्षा नहीं कर सकते कि वे खुद अपने खिलाफ खड़े होंगे. इसलिए GSCASH को प्रशासन की दखल से मुक्त होकर एक Punitive बॉडी के रूप में काम करना चाहिए.



एक प्रभावकारी GSCASH के लिए हमारा मानना है कि उसे कुछ तयशुदा मैकेनिज्म और बुनियादी सुविधाएं तत्काल मुहैया कराई जाएं और इसके लिए छात्र प्रतिनिधियों को काम करना चाहिए:


  • GSCASH एक punitive बॉडी बने और इसके फैसले सांस्थानिक दखल से मुक्त रहें. GSCASH स्वतंत्र रूप से फैसले ले और इसके फैसलों को बिना किसी देरी के लागू किया जाए.
  • बातचीत में, भावनात्मक या शारीरिक उत्पीड़न या दूसरों के निजी स्पेस का उल्लंघन करनेवाले लाइफ स्टाइल चुनने के रूप में रोज ब रोज दिखनेवाले लैंगिक भेदभाव और अन्याय से लड़ने के लिए एक कारगर व्यवस्था बनाने की जरूरत है.
  • विशाखा फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ तौर पर या कहा था कि GSCASH जैसी कमेटियों की अहम भूमिका यौन उत्पीड़न को रोकने में होनी चाहिए, हालांकि दुर्भाग्य से GSCASH सिर्फ एक ऐसी संस्था में काम कर रही है जो अक्सर दर्ज किए जाने के बाद मामलों को देखती है. उत्पीड़न को रोकनेवाली संस्था के रूप में इसकी भूमिका को एक छात्र आंदोलन के जरिए ही मजबूत किया जा सकता है जो ऐसी घटनाओं के खिलाफ लड़ाई को सुनिश्चित करे और GSCASH को भी मजबूत करे.
  • यह भी कबूल किया जाना चाहिए और एजेंडे में शामिल किया जाना चाहिए कि अपनी पसंद के मुताबिक यौन व्यवहारों को चुनने वाले लोगों को जिन समस्याओं और उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है उनको भी संबोधित किया जाना चाहिए.
  • GSCASH को यौन उत्पीड़न और लैंगिक अन्याय के मामले में शामिल लोगों के सामाजिक, आर्थिक, जातीय, वर्गीय और पेशेवर स्थिति को देखे जाने में सक्षम बनना चाहिए और इसी के साथ GSCASH को मजबूत करने की लड़ाई को जाति, वर्ग और लिंग जैसी भेदभावपरक श्रेणियों के आधार पर भेदभाव के खिलाफ सामाजिक न्याय के लिए व्यापक लड़ाई के एक हिस्से के रूप में देखे जाने की जरूरत है.
  • एक ऐसे समाज में जहां लैंगिक प्रश्न बारीकी से जाति, वर्ग और सत्ता संरचना से जुड़े हुएहैं. यौन उत्पीड़न को देखने के लिए सही नजरिया अपनाने में आनेवाली इन जटिलताओं को देखते हुए हम मांग करते हैं कि GSCASH में एक दीर्घकालीन और स्थानी लीगल काउंसिलर की नियुक्ति की जाए.

यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि GSCASH द्वारा जांच किए गए मामलों और उसके द्वारा जुटाई गई फाइलों और रिपोर्टों में प्रशासन द्वारा कोई धांधली न की जा सके. इन मामलों में गोपनीयता को बनाए रखने के लिए GSCASH को तत्काल एक फोटोकॉपी मशीन मुहैया कराने और GSCASH ऑफिस को चलाने के लिए एक स्थायी महिला स्टाफ की नियुक्ति की मांग भी हम करते हैं.

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“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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