हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

नोनाडांगा के दमन के विरुद्ध...

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/27/2012 11:37:00 PM

नोनाडांगा में और पूरे पश्चिम बंग में तृणमूल सरकार जिस तरह जनविरोधी कार्रवाइयों को अंजाम दे रही है, उससे सिर्फ यह बात साबित होती है कि सत्ता में कोई भी पार्टी रहे, व्यवस्था सिर्फ मुट्ठी भर संपन्न तबके के हित में ही काम करती है और मेहनतकश जनता का उत्पीड़न और शोषण दिनोदिन तेज होता जाता है. नोनाडांगा की घटनाओं पर पिछले दिनों कई संगठनों ने यह पर्चा जारी किया था, जिनमें पीयूडीआर, क्रांतिकारी नौजवान सभा, विद्यार्थी युवजन सभा, पीडीएफआई, मेहनतकश मजदूर मोर्चा, एआईएफटीयू (न्यू), इन्कलाबी मजदूर केन्द्र, सन्हति-दिल्ली, मजदूर पत्रिका, जेटीएसए, पोस्को प्रतिरोध सोलिडेरिटी-दिल्ली, दिशा छात्र संगठन, बिगुल मजदूर दस्ता, एनएसआई और श्रमिक संग्राम कमेटी आदि शामिल हैं.

कोलकाता नगर निगम (केएमडीए) द्वारा पुलिस बल की मदद से नोनाडांगा बस्ती को उजाड़ने के खिलाफ  बस्तीवासियों का जुझारू प्रतिरोध चल रहा है. हम वहां के गरीबों और मेहनतकशों की जुझारू एकता को सलाम करते हैं! केवल पश्चिम बंगाल ही नहीं, बल्कि देशभर में ‘सौंदर्यीकरण’ और ‘विकास’ के नाम पर इसी तरह बड़े पैमाने पर शहरी गरीबों-मज़दूरों को उजाड़कर शहरों के बाहरी इलाकों में फेंक दिया जा रहा है. हमें देशभर में गरीबों को उजाड़ने के इस अभियान के कारणों की पड़ताल करनी होगी, ताकि हम ज्यादा मज़बूती से संगठित होकर व्यापक एकजुटता कायम कर सकें. हमें नोनाडांगा के प्रतिरोध को पूरे देश के पैमाने पर फैलाना होगा, और देशव्यापी स्तर पर संगठित होकर पूंजी के राजनीतिक नौकर की इन गरीब-मज़दूर विरोधी नवउदारवादी नीतियों और तानाशाही का मुकाबला करना होगा. हमें समझना होगा कि नोनाडांगा सहित, देशभर में हो रहे इस तरह के जुझारू प्रतिरोधों को जब तक एक कड़ी में पिरोया नहीं जाएगा, उन्हें देशव्यापी नहीं बनाया जाएगा, तब तक पूंजी के राजनीतिक नौकर-केंद्र और राज्य सरकारों की गरीब-मज़दूर विरोधी नीतियों का मुकाबला करना मुश्किल होगा.

आज भारत की शहरी इलाकों में प्रतिरोध बढ़ता जा रहा है. शासक वर्ग ”देश के विकास“ की लफ्फाजी, कॉरपोरेट पार्कों और चुनावी वायदों तले मेहनतकश जनता की बदहाली को छिपाने की चाहे जितनी कोशिशें करें, लेकिन वे इस पूंजीवादी ”विकास“ की प्रक्रिया में निहित हिंसा को छिपा नहीं सकते. इनकी नीतियों के चलते ही देश की ग़रीब-मेहनतकश जनता कंगाली-बदहाली के नारकीय दलदल में धंसती जा रही है. गांव के गरीब अपनी जगह-जमीन से उजड़ कर शहरों की ओर पलायन करने को मजबूर हो रहे हैं और शहरी मेहनतकश जनता को जिंदा रहने तक के लिए जरूरी वेतन-मजदूरी, इंसानों के रहने लायक घर और साफ पानी तक नहीं मिल रहा है. मजदूर बस्तियों तक में मालिक जमात छोटे-छोटे कमरों तक के किराए तेजी से बढ़ाते जा रही है. इन नीतियों को लागू करने के लिए, अब ऐसी नर्क जैसी जगहों तक से गरीबों-मेहनतकशों को उजाड़ा जा रहा है. उन्हें ‘पुनर्वास’ के नाम पर दूर-दराज के इलाकों में पटका जा रहा है, जिसके चलते काम की जगह और रहने की जगह में अधिक दूरी होने की वजह से उनका काफी समय, पैसा, श्रम आने-जाने में ही लग जाता है, बचा-खुचा मालिक जमात निचोड़ लेती है. अगर वे उजाड़े जाने का विरोध करते हैं, तो पुलिस-प्रशासन के दम पर उनके प्रतिरोध को बर्बरता से कुचल दिया जाता है.

नोनाडांगा में भी यही हुआ. बीते 30 मार्च को तृणमूल कांग्रेस की अगुवाई वाली प.बंगाल सरकार और उसके पुलिस बल के पूरे सहयोग से कोलकाता नगर निगम ने ”सौंदर्यीकरण“ और ”विकास“ के नाम पर नोनाडांगा की झुग्गी-बस्ती में 200 से अधिक मकानों पर बुलडोजर चला दिया या उन्हें आग के हवाले कर दिया. पूरे शहर की अर्थव्यवस्था को चलाने के लिए इन गरीबों-मेहनतकशों का ‘‘कानूनी’’ तरीके से शोषण तो किया ही जाता है, लेकिन अब उन्हे बेघर भी कर दिया गया है. ये लोग अपने राज्यभर के अलग-अलग हिस्सों के गांवों-जंगलों से उजड़कर काम की तलाश में यहां आए थे और यहां से भी उन्हें उजाड़ दिया गया. तानाशाह तृणमूल सरकार इसका प्रतिरोध करने वालों के खिलाफ ”कानूनी“ और पुलिसिया दमन का इस्तेमाल कर रही है. 4 अप्रैल को उच्छेद प्रतिरोध समिति के बैनर तले बस्तीवासियों ने जुलूस निकाला तो पुलिस ने बर्बर लाठीचार्ज कर दिया. उसके चार दिन बाद 8 अप्रैल को आयोजित धरना-प्रदर्शन पर भी पुलिस ने हमला बोल दिया और 67 लोगों को गिरफ्तार कर लिया. उसके बाद 9 और 12 अप्रैल को नोनाडांगा के बाशिंदों के समर्थन में हुई मीटिंग और रैली पर गुंडों द्वारा हमला कराया गया (सीपीएम के जिस जनविरोधी नीतियों को इस्तेमाल करते हुए ममताबनर्जी सत्ता में आयी, आज उसी गुंडागर्दी और जनविरोधीनीतियों को लागू कर रही है) और पुलिस ने सैकड़ों कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया. विभिन्न जनसंगठनों और जनवादी अधिकार संगठनों के 7 कार्यकर्ता या तो जेल में हैं या 26 अप्रैल तक की पुलिस रिमांड में हैं. उन पर विभिन्न धाराएं लगाई गई है. इनमें से एक कार्यकर्ता पर गैर-कानूनी गतिविधि निरोधक कानून (यूएपीए) के तहत ‘देशद्रोही गतिविधियों’ में संलिप्त होने की धारा तक लगाई गई है. यही नहीं, 12 अप्रैल को अदालत में सुनवाई के दौरान 40 वकीलों की टीम ने नोनाडांगा के निवासियों को ‘देशद्रोही’ साबित करने और उन पर कई संगीन धाराएं लगवाने का पूरा प्रयास किया और यहां तक दावा किया कि नोनाडांगा का इस्तेमाल ‘हथियार जमा करने के लिए’ किया जाता था.

इसके बावजूद बस्ती वासी बस्ती में डटे हैं. उन्होंने तिरपाल आदि डालकर रहने के लिए अस्थायी इंतजाम किया है. वे वहां सामुदायिक रसोई चला रहे हैं और खाली हाथों और अदमनीय दृढ़ता के बूते रोजाना पुलिस का मुकाबला कर रहे हैं. 11 अप्रैल से उन्होंने आमरण भूख-हड़ताल भी शुरू कर दी है. दूसरी ओर, राज्य सरकार और पूंजीवादी मीडिया, शहर के मुख्य स्थान पर स्थित इस बस्ती की जमीन पर निगाहें गड़ाए बैठे थैलीशाहों के इशारे पर उन्हें ‘अवैध अतिक्रमणकारी’ साबित करने पर तुली है.

नोनाडांगा से हमें सबक लेना चाहिए, क्योंकि जगह-जमीन से बेदखली की तलवार केवल नोनाडांगा पर ही लटक नहीं रही है, या केवल दिल्ली के भलस्वा का ही मामला नहीं है. आज भारत में, 256 लाख लोग बेघर हैं या झुग्गी-बस्तियों में रसातल का जीवन जीने को मजबूर हैं, और यह संख्या तेजी से बढ़ रही है. शहरों को शासक वर्गों की जरूरतों के अनुसार बदला जा रहा है, और इसके लिए हम लोगों को झुग्गियों से उजाड़ना एक सामान्य बात बना दी गई है. दिल्ली में, शीला दीक्षित की अगुवाई वाली कांग्रेस सरकार ने अगले कुछ महीनों में उजाड़े जाने के लिए 44 कॉलोनियों को सूचीबद्ध किया है, जिनमें पहले चरण में 33 कॉलोनियों को उजाड़ा जाएगा. पुनर्वास के नाम पर आवंटित किए जाने वाले थोड़े से सरकारी फ्लैट भी उन्हीं को आवंटित किए जाएंगे जिनके पास 2007 से दिल्ली का मतदाता पहचान पत्र, आधार कार्ड और राशन कार्ड होगा और जो 80,000 रुपए की एकमुश्त रकम जमा कराने की क्षमता रखते होंगें. हमें इन कानूनी पेचीदगियों में उलझाकर हमारे मौलिक अधिकार के लिए संघर्ष को पस्त कर देते हैं.

दिल्ली की छह पुनर्वास बस्तियों की हालत हम सभी जानते हैं. भलस्वा में 11 साल से जन सुविधाओं की गैर उपलब्धि पर शिकायत की गई है और उन्हें प्राप्त होने की मांग रखी गई है. भलस्वा की महिला साथियों के एक प्रतिनिधिमंडल ने शीला दीक्षित को बस्ती में मिलने वाला गन्दा पानी बोतल में भर कर दिया, तो उन्हें लगा कि कहीं यह हथियार तो नहीं है. महिला साथियों ने उन्हें बताया कि यह पानी हम लोग कई सालों से पेय जल के रूप में इस्तेमाल कर रही हैं और इसकी वजह से होने वाली बीमारियों से जूझ रही हैं तो वे हैरान हो गईं. अब जनता के दबाव से आज दिल्ली जल बोर्ड और शीला दीक्षित सरकार को जल वितरण व्यवस्था को सुधारने का काम करना पड़ रहा है. लेकिन यह केवल साफ पानी की लड़ाई नहीं है, बल्कि पुनर्वास बस्तियों में रहने वाले लोगों के हक से जुड़ी है. शहर की विभिन्न झुग्गी-बस्तियों में रहने वाले लोगों के दम पर ही पूंजीपतियों की तिजोरियां भरती हैं और शहरों की चमक-धमक बनी रहती है. फिर भी, चुनावों में झूठे वायदे करके सत्ता में पहुंचने वाली किसी भी पार्टी के नेताओं को इन बस्तियों के लोग शहर की शान पर धब्बा नजर आते हैं. हम जानते हैं कि 2010 के राष्ट्रमंडल खेलों के लिए ऐसी अनेक बस्तियों पर बुलडोजर चलाए गए थे. हम यह भी नहीं भूले हैं कि पूंजीपतियों के तलवे चाटने वाली राजनीतिक पार्टियों ने हमारी ‘गंदी और बदसूरत’ बस्तियों को छिपाने के प्रयास किए थे ताकि हम अमीरों को दिखाई तक न दें और उनका ‘मूड’ न खराब हो.

दिल्ली में भी हमने अधिकारों और मांगों के लिए आए दिन सड़कों पर उतर कर संघर्ष किया है, लेकिन हमारे ये संघर्ष बिखरे और असंगठित रहे हैं. ऐसे समय में, जब कोलकाता में हमारे भाई-बहन केवल जिंदा रहने की ही नहीं, बल्कि सम्मानित और स्वतंत्र जीवन जीने के अपने अधिकार की हिफाजत की लड़ाई लड़ रहे हैं, तो हमें उनका समर्थन करना चाहिए और पश्चिम बंगाल सरकार के तानाशाह रवैये की पुरजोर निंदा करनी चाहिए.

आइए, हम लोग नोनाडांगा के अपने साथियों के लिए एकजुटता जाहिर करें और अपने-अपने इलाकों में भी हमारे खुद के संघर्षों को तेज़ कर दें.

हम तृणमूल कांग्रेस की अगुवाई वाली प.बंगाल सरकार की बस्ती उजाड़ने इस कार्रवाई और 4 अप्रैल को नोनाडांगा के निवासियों एवं उनके समर्थकों पर पुलिस द्वारा बर्बर लाठीचार्ज तथा आए दिन होने वाली सरकारी हिंसा की पुरजोर निंदा करते हैं. देबोलीना की यूएपीए कानून के अन्तर्गत गिरफ्तारी का हम घोर निन्दा करते हैं.

हम मांग करते हैं कि:
  • 8 अप्रैल को गिरफ्तार किए गए कार्यकर्ताओं पर लगाए गए मामले वापस लिए जाएं, और उन्हें तुरंत बिना शर्त रिहा किया जाए.
  • राज्य सरकार नोनाडांगा वासियों और कार्यकर्ताओं के दमन-उत्पीड़न को तुरंत बंद करे और संगठित होने तथा विरोध जताने के उनके जनवादी अधिकारों के हनन के लिए उनसे माफी मांगे.
  • 4 अप्रैल के लाठी चार्ज में दोषी पुलिसकर्मियों को सजा दो.
  • नोनाडांगा के झुग्गीवासियों और हॉकरों के आवास और पुनर्वास के अधिकार को तुरंत निष्पक्ष एवं न्यायपूर्ण तरीके से सुनिश्चित किया जाए.
  • कोलकाता नगर निगम द्वारा नोनाडांगा में किए जा रहे सभी निर्माण कार्यों पर तुरंत रोक लगाई जाए.
  • नव-उदारवादी, पूंजीवादी विकास के व्यापक जनविरोधी अभियान को, और इसके तहत ‘विकास’ के नाम पर शहर में बस्तियां उजाड़ने के अभियान को बंद किया जाए.
  • दिल्ली में झुग्गी-बस्तियां उजाड़ने की प्रक्रिया को भी तुरंत रोका जाए और शहर के झुग्गी-झोपड़ीवासियों को पर्याप्त जगह और पीने का साफ पानी और उचित साफ-सफाई की सुविधाओं वाले सम्मानजनक आवास मुहैया कराए जाएं.

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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