हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

कितना हरा भरा था मेरा पहाड़

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/20/2012 06:34:00 PM

आप जिस जमीन पर खड़े हैं, अगर उसके नीचे खनिज हैं तो आप जेल में डाले जा सकते हैं, खतरनाक आतंकवादी घोषित किए जा सकते हैं या फिर आप किसी फर्जी मुठभेड़ में मारे जा सकते हैं. स्टर्लाइट कंपनी की मिसाल देते हुए नीरज अग्रवाल की यह रिपोर्ट बताती है कि किस तरह मेहनतकश जनता और उसके संसाधनों पर कॉरपोरेट कंपनियों का हमला बढ़ रहा है.पैनोस द्वारा प्रकाशित बुलडोजर और महुआ के फूल से.

मैनपाट में, जिसकी पहचान कभी छत्तीसगढ़ के इकलौते हिल स्टेशन से होती थी, आज वादियों में स्टर्लाइट के बॉक्साइट खनन की वजह से काली धूल भरी है। पूरे राज्य में यह कम्पनी अपने आप को कानून से परे मानते हुए नियम-कानून की धज्जियाँ उड़ा रही है और जो लोग इसकी परियोजनाओं की वजह से उजड़ गये हैं, उनसे किये गये वायदों से मुकर जाना उसकी आदत बन गई है। सरकार, कहाँ तो इस कम्पनी के खिलाफ कोई कदम उठाती, उलटे उसे नवाज़ती है और ऐसी सुविधा किसी दूसरी कम्पनी को नहीं मिलती।
 
मैनपाट के निवासी 45 वर्षीय जगरदेव यादव के पास हर उस आदमी के लिए जो छत्तीसगढ़ में घर बनाना चाहता हो, एक दिली सलाह है ‘‘पहले जाकर पता लगा लीजिए कि यह जगह बॉक्साइट या आइरन ओर जैसे खनिजों से सम्पन्न इलाके में तो नहीं है.’’
 
यादव, जिनका जन्म मैनपाट में हुआ था, अभी हाल में जेल में थे और सरगुजा पुलिस ने उनकी पिटाई की थी। उनकी गलती? उन्होंने मैनपाट में स्टर्लाइट द्वारा बॉक्साइट के उत्खनन का विरोध किया था-इस तरह की यह न तो पहली घटना थी और शायद न ही आखिरी। उन्होंने अपनी जमीन से, जिसका हाल ही में स्टर्लाइट ने खनन के लिए अधिग्रहण किया था, पुनर्वासित हुए बगैर हटने से इन्कार कर दिया। फिर जो आम तौर पर होता है वह हुआ-उनके परिवार के आठ सदस्यों को, जिनमें महिलाएं और बच्चे शामिल थे, पुलिस पकड़ कर ले गई। आस-पड़ोस के लोगों के कहने-सुनने के बाद थाने से महिलाओं और बच्चों को तो छोड़ दिया गया मगर यादव वहीं रह गये। उन्हें पुलिस ने गै़र-कानूनी ढंग से हिरासत में रखा और उनकी बांह तोड़ दी। जब वह आखिरकार छूटे तब उन्होंने एक ग़ैर-सरकारी संस्था मैनपाट बचाओ संघर्ष समिति के माध्यम से जिले के प्रशासनिक अधिकारियों और गृह मंत्री से इस घटना की शिकायत की। घटना की जांच का आश्वासन तो सब ने दिया लेकिन इस हृदय विदारक घटना के 1 महीने बाद भी कसूरवार पुलिस वालों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं हुई। यादव, जो एक कैजुअल मजदूर का काम करते थे, अब अपनी टूटी बांह लिए घर पर बैठने को मजबूर हैं। अपनी बीवी-बच्चों के लिए उनके पास अब न पैसा है और न भोजन।
 
मैनपाट में यादव जैसी कहानी अकेली नहीं है। यह जगह कभी छत्तीसगढ़ की अकेली पर्वत नगरी थी जो सरगुजा जिले में समुद्र तल से 990 मीटर की ऊंचाई पर अवस्थित थी। एक बार तो वहाँ के हरियाली भरे माहौल में गरमी के मौसम में भी ठंड की आहट मिल गई थी। लेकिन आजकल इस इलाके में उन दिनों की झलक तक नहीं मिलती क्योंकि इस इलाके की हरियाली को नजर लग गई है। अब इस कस्बे की चैड़ी, धूल भरी सड़कों पर शोर-शराबे से भरपूर ट्रक चलते हैं जहाँ कभी पतले रास्ते थे जिनके दोनों तरफ सौ साल पुराने पेड़ों की कतार हुआ करती थी। खुदाई स्थलों से निकली हुई काली धूल पूरी फिजां में भरी रहती है। यह पूरे मैनपाट में भरी है और कोई 28 वर्ग किलोमीटर पर इस धूल का ही साम्राज्य है। ट्रक इस धूल की मात्रा और प्रदूषण की हाँ में हाँ मिलाते हैं। मैनपाट में रहने वाले लोगों के घरों के नीचे पाये जाने वाले बॉक्साइट की सम्पन्नता ने ही उन्हें कहीं का नहीं छोड़ा।
 
अथ बॉक्साइट कथा 
ऐसा अनुमान किया जाता है कि सरगुजा जिले में 5.754 करोड़ टन बॉक्साइट का उत्खनन सम्भव है। यह संख्या पूरे राज्य में मौजूद बॉक्साइट का 57 प्रतिशत है। इस 5.754 करोड़ टन में से 4.221 करोड़ टन तो ‘निश्चित रूप से’ उपलब्ध है, 1.356 करोड़ टन की उपलब्धता ‘सम्भावित’ है और बाकी 17.6 लाख टन खनिज ‘शायद’ मौजूद है।
 
श्रेणीबद्धता के शीर्षकों से बॉक्साइट के मिलने और उसके उत्खनन की सम्भावनाओं का पता लगता है। कुल उपलब्ध खनिज में से 5.1 करोड़ टन मेटलर्जिकल ग्रेड का बॉक्साइट है जबकि बाकी के 60 लाख टन की गुणवत्ता के बारे में अभी कोई जानकारी नहीं है। वह डिपॉजिट जिनका सबसे किफायत के साथ उत्खनन किया जा सकता है वह पाट पूर्वी और दक्षिण पूर्वी सरगुजा में पाट (यह प्लैटो का स्थानीय नाम है) वाले इलाके में मिलते हैं जिनमें मैनपाट, समारी और जमीर पाट शामिल हैं।
 
2 जुलाई, 1992 को मैनपाट की लगभग 639.169 हेक्टेयर जमीन सरकारी उपक्रम भारत अल्युमिनियम कम्पनी लिमिटेड (बाल्को) को 20 साल के लिए बॉक्साइट के खनन के लिए लीज पर दी गई। उस समय मैनपाट मध्य प्रदेश का हिस्सा था। बाल्को को लीश में मिली 325 एकड़ जमीन मैनपाट के मांझी-मझवार जन-जाति की थी। मैनपाट में रहने वाले दलितों और आदिवासियों को यह भरोसा दिया गया कि बाल्को उनकी जमीन की क्षतिपूर्ति के लिए पैसा देगा। उनको रोशगार, वैकल्पिक जमीन और स्कूल तथा अस्पताल आदि की शक्ल में समेकित विकास के सपने भी दिखाये गये।
 
भारत में जहाँ भी परियोजनाओं में विस्थापन और पुनर्वास की बात होती है वहाँ अब रिवाज-सा चल पड़ा है कि वायदे या तो आधे-अधूरे तरीके से पूरे किये जाते हैं या फिर उन्हें पूरी तरह से ही भुला दिया जाता है। कुछ लोगों को उनकी जमीन का जो मुआवजा मिलना चाहिए था उसके आधे से भी कम मिला। उदाहरण के लिए बाल्को ने कुछ विस्थापितों को उनकी जमीन का मुआवजा 12,000 रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से भुगतान किया जबकि इस इलाके में सरकार द्वारा प्रति एकड़ जमीन की कीमत 50,000 रुपये निर्धारित की गई थी। बहुत-से लोग इतने भाग्यशाली नहीं थे कि उन्हें मुआवजे की यह छोटी सी राशि भी मिलती। 1992 तक जमीन तो 112 लोगों की गई मगर केवल 50 को ही मुआवजा मिल पाया। बाकी लोग न्याय मिलने की मृगतृष्णा में एक दरवाजे से दूसरी चैखट तक चक्कर ही काटते रहे। जब कुछ भी न बन पड़ा तो कई लोगों ने दिहाड़ी पर उसी कम्पनी में काम करना शुरू कर दिया जिसने उनकी जमीन दखल कर ली थी।
 
मैनपाट में वर्षों से रह रहे बहुत से परिवारों को अपना घर-द्वार छोड़ कर जीविका और सिर पर छप्पर की तलाश में दूसरे स्थानों पर जाने के लिए मजबूर होना पड़ा। जो अपनी जगह बने रहे उनके पास बाल्को के खनन में लगे प्राइवेट ठेकेदारों के यहाँ काम करने के अलावा कोई चारा नहीं बचा। किसी भी विस्थापित को इस शब्द के सही मायने के अनुसार काम नहीं मिला। इन लोगों ने बाल्को के अत्याचारों के खि़लाफ आवाजें तो बुलन्द कीं लेकिन कम्पनी के कर्ता-धर्ता लोगों ने इनकी आवाजों को दबा दिया।
 
1 नवम्बर, 2000 को जब मध्य प्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ एक नया राज्य बना तब दलितों और आदिवासियों को उम्मीद बंधी कि अब उनकी तकलीफें नई राज्य सरकार जरूर सुनेगी। लेकिन कुछ दिनों बाद बाल्को को एक प्राइवेट कम्पनी-स्टर्लाइट समूह को लगभग 551 करोड़ रुपये में बेच दिया गया और तब मालिकाना और प्रबन्धन इस नई कम्पनी के हाथ चला गया। बाल्को सार्वजनिक क्षेत्र का पहला प्रतिष्ठान था जिसका राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबन्धन (राजग) की केन्द्रीय सरकार ने विनिवेश किया था।
 
स्टर्लाइट द्वारा अधिग्रहण किये जाने के बाद बाल्को के कोरबा अल्युमिनियम कॉम्प्लेक्स के कर्मचारियों की छंटनी कर दी गई। स्टर्लाइट प्रबन्धन ने मैनपाट में काम कर रहे कर्मचारियों की जिम्मेवारी लेने से हाथ खींच लिया। लेकिन जब कर्मचारियों की तरफ से दबाव पड़ना शुरू हुआ तब स्टर्लाइट प्रबन्धन ने कुछ वायदे किये। इन वायदों को पूरा तो नहीं ही किया जाना था। प्रबन्धन चाहता था कि कामगार मैनपाट में कुछ नये हिस्से की खुदाई करें जिससे यह कोरबा की अपनी अल्युमिनियम कम्पनी का विस्तार कर सके।
 
घर में बेघर 
जिन किसानों की जमीन का स्टर्लाइट ने अधिग्रहण किया था उनसे उसने अच्छा खासा मुआवजा देने की जबान दी थी। मगर बदले में उन्हें प्राइवेट ठेकेदारों की मेहरबानी पर रहना पड़ा। यह सारा कुछ पलक झपकते ही हो गया-किसानों को पता भी नहीं लगा कि क्यों और कब वह किसान से कामगार बन गये। न सिर्फ उन्होंने अपनी जमीन और घर-बार से हाथ धोया वरन वह छोटे शिविरों या किराये के मकानों में भी रहने को बाध्य हुए।
 
खेतों के साथ-साथ फसल भी चली गई। विक्रय के लिए जितना धान पहले सहकारी समितियों तक पहुँचता था उसकी मात्रा में भारी कमी आई। इस साल तो हालात एकदम खराब हो गये-जहाँ सरकार ने सरगुजा जिले के दूसरे प्रखण्डों में हजारों टन धान सहकारी समितियों से खरीदा वहीं मैनपाट की सहकारी समिति तक एक किलोग्राम धान भी बिक्री के लिए नहीं पहुँचा।
 
वह खेत जिनका स्टर्लाइट ने अधिग्रहण नहीं भी किया था वहाँ भी कोई फसल पैदा नहीं हुई। मैनपाट गाँव के एक टोले कुदारीडीह के 70 वर्षीय सोमनाथ मांझी कहते हैं, ‘‘बॉक्साइट के खनन में जमीन में गहरा छेद कर के ब्लास्टिंग की जाती है और इसका पूरे इलाके पर धमाकेदार दुष्प्रभाव पड़ता है। इससे खेतों में दरार पड़ जाती है और दरार पड़े खेतों में खेती नहीं की जा सकती।’’ ब्लास्टिंग की वजह से इस इलाके के बाशिन्दों की सेहत पर भी बुरा असर पड़ा है जिससे आँख और कान सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं।
 
इन सब के बावजूद किसान से कामगार बने मजदूर ही स्टर्लाइट का अधिकांश काम करते हैं। उनको वेतन बहुत कम मिलता है यद्यपि उन्हें खदानों में बहुत ही खतरनाक परिस्थितियों में काम करना पड़ता है।
इस बीच ठेकेदार जहाँ तक बन पड़ता है इन मजदूरों का शोषण करते हैं। ऐसा कई बार हुआ है कि महीनों मजदूरों से काम करवा लेने के बाद ठेकेदारों ने स्टर्लाइट से अपना हिसाब-किताब पूरा कर लिया और कामगारों को उनके काम का पैसा दिये बिना चुपचाप खिसक लिये। (स्टर्लाइट ने बार-बार ठेके ऐसे लोगों को दिये हैं जिन का मजदूरों के साथ धोखा-धड़ी करने का इतिहास रहा है। यह तब भी हुआ है जब कामगारों ने स्टर्लाइट के अधिकारियों से इन ठेकेदारों की बेइमानी की शिकायत की है। स्टर्लाइट का मानना है कि यह एक ऐसा मुद्दा है जिसे ठेकेदारों और कामगारों को ही सुलझाना चाहिये।)
 
इण्डियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस के रामबली यादव के पास ऐसे मजदूरों की एक लम्बी सूची है जिनका इस तरह से शोषण हुआ है। उदाहरण के लिए बालाजी मेटल एण्ड मिनरल कम्पनी नाम का एक प्राइवेट समूह है जो स्टर्लाइट के लिए ठेके पर बॉक्साइट का खनन और ढुलाई करता था। अपना भुगतान लेकर इस कम्पनी के अधिकारी गायब हो गये। इस कम्पनी पर मजदूरों का 1 करोड़ 80 लाख रुपया बकाया है। इससे भी ज्यादा बुरी बात यह है कि यह जानते हुए कि यह कम्पनी ऐसी गलीज हरकत कर सकती है, राज्य सरकार ने कोशिश की कि बालाजी छत्तीसगढ़ मिनरल डेवलपमेन्ट कार्पोरेशन (सीएमडीसी) के लिए ठेकेदारी करे। रामबली यादव कहते हैं कि, ‘‘न केवल इस कम्पनी पर सरकार की तरफ से कोई कार्यवाही नहीं हुई, सरकारी अफसरों ने बालाजी को सीएमडीसी में ठेका देने की भी कोशिश की। हम लोगों की हड़ताल की वजह से इस कम्पनी को ठेका देने का काम स्थगित हो गया। लेकिन इस हरकत से कोई भी आदमी यह आसानी से अन्दाजा लगा सकता है कि स्टर्लाइट और छत्तीसगढ़ सरकार में काम कर रहे लोगों की नीयत कैसी है।’’
 
अगर स्टर्लाइट समूह द्वारा दिये गये आँकड़ों पर विश्वास किया जाय तो हर साल मैनपाट से लगभग पाँच लाख टन बॉक्साइट का खनन सम्भव है। 2005-06 के आंकड़ों के अनुसार मैनपाट से प्रति वर्ष 5,65,301 टन बॉक्साइट का उत्पादन होता था। इतना फायदा उठाने के बावजूद स्टर्लाइट को कभी यह ख्याल नहीं आया कि इसका कुछ हिस्सा मजदूरों की सुविधाओं पर भी खर्च किया जाए।
 
कहा जाता है कि कोई 4,500 कामगार इस कम्पनी के लिए काम कर रहे होंगे जो खनन से लेकर कम्पनी के सारे क्रिया कलाप सम्भालते हैं लेकिन इन लोगों को कम्पनी का वह कोई भी लाभ नहीं मिलता जो स्वयं कम्पनी के रोजगार नियमों में निहित है। मिसाल के लिए, कामगारों के लिए बोनस की व्यवस्था है पर यह उन्हें कभी नहीं मिला। गर्भवती महिलाओं को उनकी चिकित्सा और प्रसव के खर्च के लिए 40,000 रुपये दिये जाने का प्रावधान है मगर पिछले डेढ़ साल में एक भी महिला को इस मद में कोई भुगतान नहीं किया गया। महिला कामगारों के लिए मातृत्व अवकाश की व्यवस्था है और उस दौरान उनका वेतन उन्हें दिये जाने का नियम है मगर यह लाभ किसी भी महिला को नहीं मिलता। कम्पनी के नियमों में यह कहा गया है कि कामगारों को रहने के लिए घर दिया जाना चाहिए और उनके बच्चों के लिए शिक्षा सुविधायें उपलब्ध की जानी चाहिए लेकिन कम्पनी ने इस दिशा में कोई प्रयास ही नहीं किया है। इसके अलावा इन खतरनाक कामों में बुनियादी रक्षा कवच दिए जाने की कानूनी बाध्यता भी पूरी नहीं की गई है। मजदूरों को हेलमेट, जूते या टोपी जैसी कोई चीज नहीं दी गई है जिसकी वजह से बहुत से लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा है। खनन स्थलों पर या उनके नजदीक कोई स्वास्थ्य सेवा भी उपलब्ध नहीं है। अगर कार्यस्थल पर किसी मजदूर की मौत हो जाती है तो उसकी क्षतिपूर्ति के लिए चर्चा तक नहीं होती। इस तरह की मौत की कोई जिम्मेवारी नहीं लेता और कम्पनी तो हरगिज नहीं।
 
सज़ा कोई नहीं, केवल ईनाम  
अब यह मजाक लगता है कि मैनपाट, जो कभी छत्तीसगढ़ के शिमला के नाम से जाना जाता था, इतना ज्यादा प्रदूषित हो चुका है कि लोगों ने यहाँ आना बन्द कर दिया है। यहाँ के पहले के दर्शनीय स्थल जैसे कुदरीडीह, केसरा, बरिमा और सपनादार अब स्टर्लाइट ग्रुप के खनन स्थल हैं।
 
अपने पूर्वज बाल्को की ही तरह स्टर्लाइट ने भी पर्यावरण के प्रति कोई चिन्ता नहीं दिखाई है। बड़े पैमाने पर जंगल कटाई के कारण मैनपाट की खुद की आबोहवा में जमीन-आसमान का फर्क पड़ा है। सरगुजा के तत्कालीन कलक्टर मनोज पिंगुआ, जिनका स्थानान्तरण हाल ही में निदेशक-आदिवासी कल्याण के पद पर हुआ है, ने टिप्पणी की है कि बॉक्साइट का खनन करते वक्त कम्पनी ने सारे नियम-कानूनों को ताक पर रख दिया। जब शुरू-शुरू में बाल्को को लीज दी गई थी उस समय इस इलाके में 9,000 साल के पेड़ हुआ करते थे। पिंगुआ ने इलाके के सर्वेक्षण में पाया कि स्टर्लाइट ने ग़ैर-कानूनी तरीके से 4,000 पेड़ों  का सफाया कर दिया जिसमें साल और दूसरे किस्म के पेड़ शामिल थे। गै़र-कानूनी ढंग से पेड़ काटे जाने के कारण पिंगुआ ने सरकार से सिफारिश की कि स्टर्लाइट के साथ हुये लीज के करार को निरस्त कर दिया जाय। इसके बदले सरकार ने एक इन्क्वायरी गठित कर दी जिसमें वही बातें निकलीं जो पहले से ही पता थीं कि 4,000 पेड़ों को गै़र-कानूनी ढंग से काटा गया। पिंगुआ ने फिर सरकार को लिखा कि लीज को निरस्त कर दिया जाए। लेकिन इस तरह की सिफारिशें अब आम हो गई हैं और स्टर्लाइट के खि़लाफ कोई कार्रवाई नहीं होती। सच यह है कि जहाँ एक ओर स्टर्लाइट कम्पनी पेड़ों को काटने जैसे गै़र-कानूनी काम में आकंठ डूबी थी, सरकार ने इसे अपनी खदानों की क्षमता बढ़ाने का पुरस्कार देने का काम किया। मैनपाट की कुड़ाम खदान की क्षमता 6 लाख टन, कुसुमी की टाटीझरिया खदान की क्षमता चार लाख टन और समारी की क्षमता 5 लाख टन बढ़ा देने की इजाजत मिल गई।
यह सब इतनी सफाई से हुआ कि मैनपाट के लोगों को भनक तक नहीं लगी, यद्यपि एक जन-सुनवाई का कार्यक्रम हुआ था। जिन लोगों को इस ‘जन-सुनवाई’ के बारे में पता था उन्हें इस आम-सभा में भाग नहीं लेने दिया गया। दूसरी तरफ पर्यावरण संरक्षण बोर्ड के क्षेत्र अधिकारी सुरेश चन्द्र का दावा है कि बिना अनुमति के खदान की क्षमता बढ़ाने पर स्टर्लाइट की एक बरिमा खदान के खि़लाफ कार्यवाही की गई थी। उनके अनुसार यह मामला अब अदालत में है। चन्द्र यह भी कहते हैं कि जब दूसरी खदानों की क्षमता बढ़ाने के लिए सरकार ने अनुमति दी थी तब ‘जन-सुनवाई’ भी हुई थी। वह कहते हैं कि इन सभाओं में किसी की ओर से कोई प्रतिवाद नहीं किया गया था।
 
फिर भी कई बार ऐसे मौके आए हैं जब सरकारी अधिकारी और स्टर्लाइट, बॉक्साइट के गै़र-कानूनी खनन, खदान की सतह को वापस समतल किये जाने में कम्पनी की विफलता और स्थानीय विकास में अरुचि जैसे मुद्दों पर आमने-सामने थे। कभी-कभी इस विवाद के कारण स्टर्लाइट को बॉक्साइट का खनन रोकना भी पड़ा है। लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कम्पनी कितने कानून तोड़ रही है, और ऐसा वह अक्सर करती है, मसला हमेशा कम्पनी के हक में ही हल होता है।
 
नियम-कानून दूसरों के लिए हैं 
कबीरधाम के जिस इलाके में स्टर्लाइट बॉक्साइट का खनन कर रही है वह राज्य के मुख्यमंत्री रमण सिंह का गृह जिला है और इसने भी अपने हिस्से के सारे विवादों को ठीक-ठाक ही झेला है। इस इलाके की खदानों से बॉक्साइट के खनन के लिए किसी भी कम्पनी को इजाजत नहीं मिली है लेकिन स्टर्लाइट की बात अलग है। यह कम्पनी हर साल 3,00,000 टन बॉक्साइट निकाल लेती है।
 
चालीस साल पहले मध्य प्रदेश सरकार ने घोषणा की थी कि कबीरधाम के सारे बॉक्साइट के खनन का काम केवल सरकारी उपक्रमों के माध्यम से ही होगा। उन दिनों कबीरधाम दुर्ग जिले में हुआ करता था। इस विषय की एक सरकारी अधिसूचना (नं. 2918/2875/12) भी 16 जून, 1969 को जारी की गई थी। इसी आधार पर बाल्को को इस इलाके में खनन की लीज दी गई थी। जब 2 मार्च, 2001 को बाल्को के स्वत्वाधिकार विनिवेश के बाद स्टर्लाइट को हस्तान्तरित किये गये तब यह अपने आप स्पष्ट होना चाहिये था कि स्टर्लाइट का कबीरधाम की खदानों पर कोई अधिकार नहीं होगा क्योंकि वह एक सरकारी प्रकल्प न होकर एक प्राइवेट कम्पनी थी। लेकिन स्टर्लाइट ने इस खदान पर अपना अधिकार बरकरार रखा।
 
इसका क्या यह मतलब निकलता है कि छत्तीसगढ़ सरकार मध्यप्रदेश सरकार के अध्यादेशों को वैध नहीं मानती? ऐसा है नहीं। स्टर्लाइट को जब कबीरधाम इलाके की बोड़ाई-दलदली खदानों की लीज दी गई थी तब सात दूसरी प्राइवेट कम्पनियों ने कबीरधाम जिले के बांकी क्षेत्र में सरकार से बॉक्साइट के खनन की इजाजत मांगी थी। लेकिन 2003 से 2004 के बीच मिले इन सारे आवेदनों को सरकार ने इसलिए खारिज कर दिया कि 1969 वाले मध्यप्रदेश सरकार के अध्यादेश के अनुसार यह इस काम के लिए अयोग्य थे। अगर सरकार यह कहती है कि प्राइवेट कम्पनियाँ इस इलाके में खनन नहीं कर सकतीं तब फिर स्टर्लाइट को विशेष रूप से कैसे यह अनुमति मिल गई?
 
बात यहीं नहीं थमती। ऐसा विश्वास किया जाता है कि स्टर्लाइट ने मैनपाट और कबीरधाम की खदानों को कर्ज लेने के लिए गिरवी रख दिया हुआ है। इस मसले पर कम्पनी की राय जानने के लिए इस लेखक ने कम्पनी के जन-सम्पर्क विभाग के अध्यक्ष, दीपक पाचपोरे से कई बार बात करनी चाही मगर वह हमेशा ‘व्यस्त’ रहने के कारण कभी उपलब्ध नहीं हो सके।

चन्द्रशेखर दुबे, सांसद, जो कि बहुत सी खनिज समितियों के सदस्य हैं, का कहना है कि स्टर्लाइट ने अक्टूबर, 2004 में मैनपाट-सरगुजा और बोड़ई, दलदली-कबीरधाम खदानों की लीज की मूल प्रति को एक दीर्घावधि कर्ज हेतु इन्रााटस्ट्रक्चर लीजिंग एण्ड फाइनेन्शियल ट्रस्ट कम्पनी लिमिटेड के पास गिरवी रख दिया है। उनका कहना है कि यह लीज की शर्तों के खि़लाफ है। दुबे की मांग है कि सरकार स्टर्लाइट के साथ शेयर होल्डर करार को समाप्त कर दे क्योंकि कम्पनी ने शर्तों का उल्लंघन किया है और सेन्ट्रल विजिलेन्स कमीशन या केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो को इस पूरे मसले के तथ्य जानने के लिए नियुक्त करे।

इसके अलावा स्टर्लाइट ने, जिसे कबीरधाम के 591 हेक्टेयर के विस्तृत क्षेत्र पर 30 वर्षों की अवधि के लिए खनन की लीज दी गई थी, विस्थापित लोगों का पुनर्वास किये बिना अपना काम शुरू कर दिया। इस लेख के लिखे जाने के समय तक स्टर्लाइट के काम की वजह से 52 परिवार उजड़ चुके थे। इनमें से अधिकांश बैगा जन-जाति के लोग थे। जब स्टर्लाइट प्रबन्धन ने कबीरधाम के जिला मुख्यालय से करीब 100 किलोमीटर दूर बैगा आदिवासियों की जमीन का सेमरसन्टा, दलदली, रबड़ा, केशरमादा और मुण्डा दादर गाँवों में अधिग्रहण किया तो उसने इन आदिवासियों से बहुत सारे वायदे किये लेकिन कम्पनी ने अपनी बात नहीं रखी। उसके बदले कम्पनी अब यह कहती है कि यह छत्तीसगढ़ सरकार का काम है कि वह विस्थापित आदिवासियों के लिए जमीन की व्यवस्था करे। उसका दावा है कि एक बार जमीन की व्यवस्था हो जाये तो कम्पनी अपने दूसरे कर्तव्यों का निर्वहन करेगी। आदिवासियों ने यह मांग रखी थी कि उन्हें किसी ऐसी जगह पुनर्वास दिया जाय जहाँ उचित सुविधायें उपलब्ध हों और प्रत्येक विस्थापित परिवार के कम से कम एक सदस्य को नौकरी दी जाय। लेकिन जमीन के मसले पर सरकार का उत्तर आने में समय लग रहा है और इस बीच कम्पनी आदिवासियों की काश्तकारी जमीन को गड्ढों से भरी बंजर भूमि बनाने में व्यस्त है।

विस्थापित आदिवासियों का कहना है कि स्टर्लाइट 591 हेक्टेयर जमीन अधिगृहित करने के बाद 1 जनवरी, 2004 से बॉक्साइट खनन का काम कर रही है। इसमें 300 हेक्टेयर जमीन किसानों की थी और बैगा आदिवासियों के पास 100 हेक्टेयर जमीन थी। सेमरसन्टा के एक ग्रामीण रूप सिंह उड्डे बताते हैं कि सरकार और स्टर्लाइट प्रबन्धन ने मिल कर सेमरसन्टा के आधे आदिवासियों को बैजलपुर, तारसिंह और सिंघारी गाँवों में 2004 में ले जाकर बसाया।

उनको न तो खेती के लिए कोई जमीन दी गई और न ही उनके पास अस्पताल, स्कूल या सड़क जैसी कोई बुनियादी सुविधा ही उपलब्ध थी। उड्डे बताते हैं कि, ‘‘हमारे पास मेरे पिताजी के नाम से 12 एकड़ जमीन थी। इसी जमीन से स्टर्लाइट ने खुदाई का काम शुरू किया था और अब यह जमीन पूरी तरह उलट-पलट हो गई है। क्षतिपूर्ति के नाम पर सरकार ने हमारे पिता जी को बैजलपुर ले जाकर बसा दिया। उसके बाद फिर कोई यह पूछने नहीं आया कि हम लोग जिन्दा कैसे हैं?’’ साफ तौर पर किसी भी विस्थापित को नौकरी देने का तो कोई सवाल ही नहीं उठता। उनकी जीविका के अकेले स्रोत उनकी जमीन को बड़ी बेरहमी के साथ उनसे छीन लिया।
इस साल 7 जनवरी को आदिवासियों ने स्टर्लाइट द्वारा खनन पर प्रतिबन्ध लगाने की मांग को लेकर हड़ताल शुरू कर दी। सात दिन बाद सरकार ने आदिवासियों को समझा-बुझा कर उनकी हड़ताल इस बात का आश्वासन देकर तुड़वा दी की जमीन की निशानदेही शुरू कर दी गई है और खुदाई का काम तब तक नहीं शुरू होगा जब तब उनकी वैकल्पिक जमीन उन्हें मिल न जाए। जिला प्रशासन ने भी आदिवासियों को आश्वासन दिया कि दो महीनों के अन्दर उनकी सारी समस्याओं का समाधान कर दिया जायेगा पर आज तक कुछ भी नहीं हुआ।
स्टर्लाइट के दलदली खनन क्षेत्र के प्रबन्धक एनएस चौधरी का कहना है कि सरकार जमीन के मसले को हल करने का काम देख रही है। वह यह भी कहते हैं कि स्टर्लाइट ने सरकार के पास जमीन अधिग्रहण के लिए पैसा पहले ही जमा कर दिया है और पुनर्वास का काम शीघ्र ही शुरू कर दिये जाने की उम्मीद है। लेकिन जब उनसे ही विस्थापित परिवार के एक सदस्य को नौकरी देने का सवाल किया जाता है तब वह खामोशी अख्तियार कर लेते हैं।
 
चालाकी कम, धूर्तता ज्यादा

स्थानीय लोगों से किये गये वायदों और आश्वासनों पर अपने पत्ते न खोलने के अलावा कम्पनी सरकारी नियम-कानूनों का निडर होकर उल्लंघन करती है और ऐसा माना जाता है कि मैनपाट और बोड़ई-दलदली की खदानों की क्षमता बढ़ाये जाने के कारणों पर भी स्टर्लाइट सच बोलने से परहेज कर रही है। इसका कोरबा अल्युमिनियम कॉम्प्लेक्स, जिसकी क्षमता दो लाख मीट्रिक टन प्रति वर्ष है, बड़े आराम से मैनपाट और बोड़ई-दलदली की खदानों से मिलने वाले बॉक्साइट (क्रमशः साढ़े चार लाख मीट्रिक टन और तीन लाख मीट्रिक टन) से चल सकता है। इसके बावजूद स्टर्लाइट ने इन दोनों खदानों की क्षमता बढ़ाने के लिए इजाजत यह कह कर मांगी कि कोरबा रिफाइनरी की क्षमता बढ़ाने के लिए यह आवश्यक होगा। स्टर्लाइट की इच्छा थी कि मैनपाट की खदान की क्षमता तीन लाख मीट्रिक टन और बोड़ई-दलदली की क्षमता साढ़े नौ लाख टन प्रति वर्ष तक बढ़ाई जाय। 2003 में जब इन खदानों पर काम शुरू करने का जयघोष हुआ था तब स्टर्लाइट ने यह कहा था कि इस (खनिज) का इस्तेमाल 6 लाख मीट्रिक टन क्षमता वाले अल्युमिनियम स्मेल्टर और अल्युमिना रिफाइनरी में किया जायेगा। मजे की बात है कि रिफाइनरी का काम अभी प्लानिंग के स्तर से आगे बढ़ा ही नहीं है।

दुबे के अनुसार स्टर्लाइट द्वारा इन खदानों की क्षमता बढ़ाने के सही मकसद का कोरबा से कोई लेना-देना ही नहीं है। वह कहते हैं, ‘‘मैनपाट और दलदली के बॉक्साइट से स्टर्लाइट लांजीगढ़ (उड़ीसा) में अपनी रिफाइनरी चलाना चाहती है’’। वह आगे कहते हैं कि यह खदानें स्टर्लाइट को दी ही इस शर्त पर गई हैं कि उनसे निकलने वाले बॉक्साइट का उपयोग छत्तीसगढ़ में ही होगा।

एक पत्रकार ने जब इन सारी पेचीदगियों को सुलझाना चाहा तो स्टर्लाइट से जवाब मिलता है कि ऐसी बातों के लिए स्टर्लाइट ग्रुप में किसी के पास समय नहीं है। इस तरह के सवाल अगर कोई स्थानीय आदमी उठाये तो उसका अगला पड़ाव जेल में ही होगा। यादव, जो बिना बात जेल काट आये, धूर्तों के चक्कर में पड़ने वाली कहानी के अच्छे उदाहरण हैं।

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ कितना हरा भरा था मेरा पहाड़ ”

  2. By Randhir Singh Suman on April 20, 2012 at 9:40 PM

    nice

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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