हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

पत्थरों के मकान और लोहे के दिल

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/13/2012 07:34:00 PM


रॉजर मूडी का वेदांता पर एक लंबा लेख आप हाशिया पर पहले पढ़ चुके हैं. प्रस्तुत है खनन और धातुओं के रिसाकल किए जाने संबंधी विभिन्न मुद्दों को समेटता मूडी का यह एक और आलेख. इसे भी हमने पैनोस साउथ एशिया द्वारा प्रकाशित पुस्तक बुलडोजर और महुआ के फूल से साभार लिया है. यह लेख लेखक की पुस्तक Rocks and Hard Places : The Globalization of Mining की प्रस्तावना पर आधारित है।


खनन परियोजनाओं के मानवीय और पर्यावरणीय फलाफलों को तौलने के बाद यह स्पष्ट निष्कर्ष निकलता है कि इस अपूरणीय खनिज सम्पदा का दोहन कौन, कब, कहाँ और कैसे करेगा, इसका निर्णय कभी भी ‘इस उद्योग’ के हाथ में नहीं दिया जाना चाहिए। हम अपनी नदियों, झीलों और समुद्रों को निजी हाथों में सौंप दिये जाने पर चैंक कर उठ खड़े होते हैं लेकिन इतनी ही जरूरत इस बात की घोषणा करने की है कि दुनिया के खनिज भी मानव जाति की साझा धरोहर हैं।

आज से बीस साल पहले जब मैं उस समय की दुनिया की सबसे बड़ी कम्पनी रियो टिन्टो-जिंक (आर.टी.जेड) पर शोध कर रहा था तब मेरा ध्यान एक अजीब विसंगति की ओर गया। 1954 से 1980 के दशक के अन्त तक रहे कम्पनी के तीनों प्रणेताओं ने इंगलैण्ड की आत्मकथाओं के शब्दकोश में अपनी पसन्दीदा चीज़ों में बागवानी का नाम लिया था। एक बहुत ही ख़तरनाक और विध्वंसकारी उद्योग के ये तीनों पुरोधा अवकाश प्राप्त करने के बाद नियमित रूप से गुलाब की खेती की ओर आकर्षित हुए (मैं इस बात को अच्छी तरह से जानता था) जबकि उनकी कम्पनी दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद को प्रश्रय देने वाली तथा पिनोशे की सरकारों के साथ षडयंत्र करके संयुक्त राष्ट्र संघ के फैसले के ख़िलाफ नामीबिया के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर रही थी। इस कम्पनी ने आस्ट्रेलिया के आदि बाशिन्दों की ज़मीन को खुरच कर चन्द्रमा की सतह जैसा बना दिया था।

ऐसे लोगों को नींद कैसे आती थी? क्या उनको मजबूर किया जा सकता था कि वे एक दिन उन लोगों के सामने अपने पापों को क़बूल करेंगे जो उनके उत्पीड़न के शिकार हुए थे या फिर उन्होंने अपने हाथों में बागवानी के लिए खुरपी और कुदाल इसलिए पकड़ रखी थी कि अगर उन पर दबाव डाला जाए तो वे यह कह सकें कि जो कुछ हो रहा था उसके बारे में उन्हें कुछ भी मालूम नहीं था?

1991 में यह शोध पूरा होने के बाद से अब तक नदियों में बहुत सा पानी बह चुका है और उसके साथ ही बहा है बहुत सा जहरीला कूड़ा-करकट। पश्चिमी पपुआ की ग्रासबर्ग सोना खदान से दो लाख टन शहरीला कचरा आज भी वहाँ की अजीक्वा नदी प्रणाली में बह रहा है जिसके लिए रियो टिन्टो (आजकल इसे आर.टी.ज़ेड के नाम से जाना जाता है) और अमेरिका की फ्रीपोर्ट कम्पनियाँ बराबर की जिम्मेदार हैं। इस शताब्दी के प्रारम्भ तक लगभग 120 सामाजिक कार्यकर्ता और स्वयंसेवी संगठनों के प्रतिनिधि रियो टिन्टो के शेयर धारकों के वार्षिक सम्मेलन में सारे दस्तावेज़ों और सबूतों के साथ कम्पनी की कोताही और धोखाधड़ी की दास्तान सुनाने के लिए गये होंगे मगर वे सब के सब बुरी तरह मायूस होकर लौटे।

आजकल रियो टिन्टो एक दूसरे किस्म के श्रोता समूहों के बीच अपनी एक अलग छवि के साथ सामने आ रही है। पर्यावरण के मुद्दे पर काम करने वाले बहुत से जाने-माने समूह भी यह मानने लगे हैं कि कम्पनी की परियोजनाओं द्वारा अलग-अलग तरीफों से प्रभावित होने वाले लोगों से ‘साझेदारी’ का प्रस्ताव करके और अपने आलोचकों के साथ लगातार बातचीत करके यह कम्पनी अब ‘प्राकृतिक संसाधनों के दोहन’ के क्षेत्र में (यह एक अपूर्ण शब्द-जाल है मगर इसका व्यावहारिक अर्थ खनन और खनिज शोधन ही है) अगुआ बन कर सामने आ रही है। संयुक्त राष्ट्र संघ के भूतपूर्व महासचिव कोफी अन्नान ने जब 1999 में ‘सारी दुनिया में व्यापारिक निगमों के सामाजिक उत्तरदायित्व को बढ़ावा देने के लिए ग्लोबल कॉम्पैक्ट को हरी झंडी दिखाई थी तब वह रियो टिन्टो से मिले सहयोग और समर्थन से काफी गदगद थे। इसके तीन साल बाद ब्रिटिश प्रधान मंत्री ने रियो टिन्टो के अध्यक्ष रॉबर्ट विल्सन की भूरि-भूरि प्रशंसा की कि उन्होंने टिकाऊ विकास के दूसरे विश्व सम्मेलन में एक्सट्रैक्टिव इन्डस्ट्रीज़ ट्रान्सपेरेन्सी इनीशिएटिव (खनन उद्योग में पारदर्शिता) की स्थापना में पहल करके हाथ बंटाया। ये सारे प्रयास अपनी जगह थे पर रियो टिन्टो को अपने जन सम्पर्क अभियान की सबसे बड़ी सफलता तब मिली जब उसने 1999 में ग्लोबल माइनिंग इनीशिएटिव (वैश्विक खनन पर पहल) की स्थापना की। इसी पहल से पैदा हुई माइनिंग-मिनरल्स एण्ड सस्टेनेबल डेवलपमेन्ट (खनन-खनिज और टिकाऊ विकास) की अध्ययन परियोजना की रिपोर्ट के बारे में कहा जाता है कि यह औद्योगिक प्रक्षेत्र का अब तक का सबसे विषद् आलोचनात्मक दस्तावेज़ है। जब माइनिंग-मिनरल्स एण्ड सस्टेनेबल डेवलपमेन्ट ने अक्टूबर, 2001 में इन्टरनेशनल काउन्सिल ऑन माइनिंग एण्ड मेटल्स (खनन और धातु सम्बन्धी अन्तर्राष्ट्रीय काउन्सिल) में शिरकत की तो कम्पनी और ख़ासकर रॉबर्ट विल्सन के सितारे बुलन्दी पर थे। इसका नतीजा होना ही था कि वह खनन उद्योग की इस अलम्बरदार संस्था के अध्यक्ष बन बैठे।

परेशानी पैदा करने वाली सच्चाई यह है कि रियो टिन्टो ने पिछले 130 वर्षों में अपने किये गये कुकर्मों में से एक के लिए भी कभी माफी नहीं मांगी जिनके दुष्पराक्रम की बुनियाद पर सबसे अधिक विविधता वाला यह वैश्विक खनन तंत्र आज खड़ा है। इस कम्पनी को थोड़ा-सा पश्चाताप तब होता-सा दिखाई पड़ा था जब इसने पापुआ न्यू गिनी के एक द्वीप बूगेनविल की एक सोने और ताम्बे की बहुत बड़ी खदान को भद्दे औपनिवेशिक तरीके से नोचने-खसोटने के लिए अस्पष्ट-सा अफसोस जाहिर किया था। 1966 में जब यह जगह ऑस्ट्रेलिया के कब्ज़े में थी तब इसकी लीज़ इस कम्पनी को मिली थी और अगले 6 वर्षों के अन्दर यह पैनगुना खदान व्यापारिक रूप से उसकी सबसे सफल खदान बन गई। कम्पनी ने अपने खर्चों में भारी कटौती की थी और इस खदान से जो भी कचरा निकलता था उसे पास की नदी में बहा दिया जाता था। 1988 आते-आते पैनगुना के आदिवासी भूमिधारक रियो टिन्टो के एक भूतपूर्व खनिक फ्रांसिस ओना के नेतृत्व में संगठित हुए और उन्होंने अपने बागानों, जंगलों और नदियों का नाश पीट देने के लिए कम्पनी से 10 अरब डॉलर का मुआवजा मांगा। कम्पनी ने उनके इस दावे का मखौल बनाया और बातचीत करने से भी मना कर दिया। ओना ने स्थानीय बूगेनविल क्रान्ति सेना का गठन किया और पापुआ न्यू गिनी से आज़ादी का एलान कर दिया। ऑस्ट्रेलियाई हेलिकॉप्टरवाही जहाज़ों की मदद से मुख्य भूमि की सेना ने द्वीप पर हमला बोल दिया और तब जो खूनी गृह-युद्ध की शुरुआत हुई उसमें द्वीप की आबादी का पाँचवा हिस्सा (लगभग 15,000 से 20,000 ग्रामीण जिनमें अधिकांश महिलाएँ तथा बच्चे थे) खेत रहे और तब जाकर 1998 में एक शान्ति समझौता हो सका।

बाद में रियो टिन्टो ने यह स्वीकार किया कि वह बूगेनविल में अन्य तरीके से दख़ल दे सकती थी और बाद के 8 वर्षों में उसने आम तौर पर यह इशारा किया कि वह इस द्वीप में फिर कभी खनन नहीं करेगी। मगर 2006 में जब सोने और ताँबे के दाम आसमान में चढ़े तब खनन क्षेत्रों में फिर यह आहट सुनाई पड़ने लगी कि कम्पनी नये सिरे से अपना धन्धा शुरू करने का मन बना रही है। रियो टिन्टो ने जिस तरह से अपने आप को सजा-धजा कर खनन उद्योग में टिकाऊ विकास के मानक के रूप में पेश किया है उस वजह से उसकी बहुत से सम्मेलनों, खासकर यूरोपीय सम्मेलनों में रुसवार्इ हुर्इ है जहाँ 'नैतिक निवेश पर चर्चा होती है और उसकी ये बातें हमारे माथे पर गुलाल छिड़कने का सा मज़ा देती हैं। लेकिन आस्ट्रेलिया से लेकर जि़म्बाबवे तक बहुत से स्थानीय समाजों और ट्रेड यूनियनों का इस कम्पनी का मूल्यांकन एक दम अलग किस्म का है और ये लोग इसे पूरी तरह से शक की नज़र से देखते हैं।

रियो टिन्टो अकेली ऐसी कम्पनी नहीं है जिसके लिए स्थानीय समाजों में इतना आक्रोश है यधपि हाल के वर्षों में कम्पनी ने इस बिन्दु पर बाकी कम्पनियों को पीछे छोड़ दिया है। आजकल हर बड़ी खनन कम्पनी 'बेहतर कार्य पद्धति और 'पारदर्शिता का जामा पहन कर अपने आप को आगे बढ़ाती है जबकि इन सभी के ऊपर यह गंभीर आरोप लगता है कि ये कम्पनियाँ न तो संस्कृतियों की रक्षा कर पाती हैं, न ही यह पर्यावरण को सुरक्षित रखती हैं और न ही ये अपने मुनाफे का एक वाजिब हिस्सा उन देशों को देती हैं जहाँ यह खनन किया जाता है। यह लेख लिखते समय मेरी टेबल पर बहुत-सी चेतावनियां और अलार्म आपस में गड्ड-मड्ड हो रहे हैं। ब्राज़ील की एक विशाल लौह-खनिज कम्पनी सी.वी.आर.डी. जिक्रिन नाम की आदिवासी जन-जाति पर मुकदमा दायर करने जा रही है कि उन्होंने कम्पनी की ज़मीन का अतिक्रमण किया है जबकि यह ज़मीन इन आदिवासियों की पुश्तैनी ज़मीन थी जिसे कम्पनी ने 20 साल पहले उनसे झपट लिया था। कनाडा की सरकार अब खनन कम्पनियों को यह इज़ाजत देने जा रही है कि वे आदिवासियों की मीठे पानी की झीलों में जहरीला कचरा फेंकें। इन्को, जो दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी निकेल उत्पादक कम्पनी है, न्यू कैलिडोनिया में एक स्मेल्टर बैठाने जा रही है बावजूद इसके कि स्थानीय कनक लोगों ने कम्पनी को ऐसा करने से रोकने के लिए न्यायालय से निषेधाज्ञा ले रखी है।

तो फिर यह जो आये दिन उधोगों के सुधार की बातें सुन-सुन कर हम मुग्ध होते रहते हैं, क्या वह एक छलावा है? इसका उत्तर हाँ और नहीं, दोनों ही हैं। बी.एच.पी. बिलिटन ने यह वायदा किया है कि वह कभी भी नदियों या समुद्र में अपने कचरे को नहीं डालेगी।

उम्मीद की जाती है कि वह ऐसा नहीं करेगी। (यहाँ अंतर्राष्ट्रीय शोर-शराबा बहरा कर देने वाला होगा और स्थानीय प्रतिक्रिया का मतलब तोड़-फोड़ समझा जायेगा)। लेकिन दुनिया की अग्रणी 'संसाधन विविधता वाली कम्पनी बी.एच.पी. बिलिटन जब यह कहती है कि वह 'संरक्षित क्षेत्रों में खनन नहीं करेगी तब उसके इस कथन पर गहरा शक होता है। कम-से-कम उड़ीसा के कर्लापाट इलाके में जो उसे लीज़ मिली हुर्इ है, वहाँ तो वह अपना वायदा पूरा नहीं करेगी।

तीन साल पहले उत्तरी आस्ट्रेलिया की मिर्रर आदिम जन-जाति के अंतर्राष्ट्रीय अभियान के चलते, उन्होंने अपनी एक महिला प्रवक्ता को रियो टिन्टो की वार्षिक आम सभा में भी भेजा था, जिसमें कम्पनी ने वायदा किया था कि वह उनकी पारम्परिक सीमा में बिना उनकी अनुमति के प्रवेश नहीं करेगी। अगर मिर्रर लोग संगठित और मजबूत बने रहते हैं तो कम्पनी की हिम्मत नहीं पड़ेगी कि वह इस अनुबन्ध को तोड़े। फिर भी, कर्इ साल पहले रियो टिन्टो ने यह वायदा किया था कि वह बर्मा में कोर्इ निवेश नहीं करेगी। यह उस समय की बात है जब देश की अनैतिक सरकार वहाँ सत्ता में थी। अमेरिका की सोना खनन करने वाली कम्पनी ने अमेरिका द्वारा इस देश पर प्रतिबन्ध लगाए जाने के डर से वहाँ से हाथ खींच लिया था।

लेकिन तभी 2006 के अक्टूबर महीने में रियो ने एक जूनियर खनन कम्पनी इवान्हो में 1.7 अरब डालर का निवेश किया ताकि वह मंगोलिया में ताँबे के बड़े कारोबार पर हाथ साफ कर सके। इवान्हो कम्पनी बर्मा में मिलिटरी से आधे-आधे की साझेदारी में ताँबे का खनन करती थी। इस तरह से इंग्लैण्ड की इस कम्पनी ने वायदा खिलाफी की।

टिकाऊपन की परिभाषा

इन सब के बावजूद कुछ बुनियादी तथ्यों पर कोर्इ विवाद नहीं है। सभी खनिजों और धातुओं की मात्रा निश्चित है जिनमें से बहुतों का निर्माण पृथ्वी की सतह के नीचे चल रही अरबों वर्षों की भू-वैज्ञानिक प्रक्रिया के अधीन हुआ है और ऐसी घटना दुबारा नहीं होती।

एक मर्तबा अगर इन्हें उखाड़ कर निकाल लिया जाय और उनका शोधन कर दिया जाय तो इन्हें वापस अपनी जगह पर नहीं पहुँचाया जा सकता। हम मिटटी, शिलाओं, बालू, नदियों और समुद्रों को भी वापस पैदा नहीं कर सकते जहाँ इन खनिजों का मूल स्थान था। यह सच है कि धातुओं का उपयोग एक के बाद एक कर्इ बार किया जा सकता है और ऐसा होता भी है मगर उस हालत में इनकी पूरी क्षमता का उपयोग नहीं होता। (यह अजीब बात है कि न्यूयार्क और टोक्यो के मुकाबले साओ पालो या कोलकाता की गलियों और कूड़ेदानों में से ज्यादा अल्युमिनियम स्क्रैप निकाला जा सकता है।) रोजमर्रा के जीवन में काम आने वाली धातु से बनी बहुत-सी चीज़ें हम लोगों के बीच में लगभग अनंत काल तक चल सकती हैं मगर ऐसा बिरले ही होता है। वर्ल्डगोल्ड काउंसिल नाम की एक औधोगिक संस्था अपने नये ट्रस्ट गोल्ड कैम्पेन (सोने की विश्वसनीयता अभियान) के माध्यम से हमें बताना चाहती है कि यह इलेक्ट्रॉनिक्स, कम्प्यूटर, मोबाइल फोन, दन्त चिकित्सा और कुछ यौगिकों के निर्माण के लिए अपरिहार्य है। काउंसिल यह बताने में जरूर संकोच करती है कि अब तक जितने सोने का खनन हुआ है उसका 90 प्रतिशत सैद्धांतिक रूप से दुबारा इस्तेमाल के लिए उपलब्ध है। सैद्धांतिक रूप से ही जहाँ तक इस्तेमाल किये जाने का प्रश्न है वहीं एक भी आउन्स अतिरिक्त सोने का खनन करने की कोर्इ वजह ही नहीं है। लेकिन यह धातु या तो बैंकों के लॉकरों में बन्द है या निजी हाथों में आराम कर रही है। केवल वैश्विक अर्थ-व्यवस्था में परिवर्तन और सोने के बारे में प्रचलित मिथकों जैसे कि सोने का संग्रह 'सम्पत्ति का संग्रह है या फिर सोना मुद्रास्फीति के खिलाफ दीवार बन कर खड़ा होता है, आदि का भण्डा-फोड़ ही परिस्थिति को बदल सकते हैं।

हमें 'दुबारा और बार-बार इस्तेमाल करने’ का मंत्र-जाप भी नहीं करना चाहिए जैसे उसी से मोक्ष मिलने वाला है। स्क्रैप धातु को दुबारा गलाने की अपनी पर्यावरणीय कीमत है क्योंकि ऐसा करने से सल्फर-डार्इऑक्साइड और कार्बन-डार्इऑक्साइड का उत्सर्जन होता है और बहुत-सा रासायनिक कचरा भी पैदा होता है। पहली बात तो यह है कि बार-बार इस्तेमाल की जाने वाली चीज़ें बिरले ही उन लोगों तक वापस पहुँचती हैं जिनकी ज़मीन से कच्चे माल की शक्ल में ये चीज़ें बाहर आर्इ थीं। और अगर ऐसा हो भी जाये तो पुनर्शोधन से जो आमदनी होती है उससे आमतौर पर विदेशी जेबें ही गरम होती हैं जैसा कि पहली बार के खनन में होता है। दुबारा किये गये शोधन की वजह से जो मजदूरी और ऊर्जा की बचत होती है उसका लाभ भी दक्षिणी गोलार्ध में रहने वाले उपभोक्ता को नहीं मिलता।

खनिजों के ज्यादा से ज्यादा उत्खनन का जो भी औचित्य बताया जाए पर सच यह है कि उनकी मात्रा दिनों-दिन घटती जा रही है और पिछली कर्इ दशाब्दियों में कमी की यह दर बढ़ती जा रही है। यह भी तय है कि प्राकृतिक संसाधनों के खनन और लम्बी अवधि के टिकाऊपन में कोर्इ तादात्म्य नहीं हो सकता। जब उधोगों के प्रवक्ता यह दावा करते हैं (और ऐसा वह अक्सर करते हैं) कि टिकाऊ खनन जैसी कोर्इ चीज़ होती है तो उनकी बातों में विरोधाभास साफ झलकता है। यह प्रश्न एकदम अलग है कि क्या खनन से 'टिकाऊ विकास’ में कोर्इ मदद मिल सकती है क्योंकि इससे लोगों को रोज़गार मिलता है, टैक्स की वज़ह से रेवेन्यू में वृद्धि होती है, इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार होता है और साथ में सामाजिक सेवाओं को आर्थिक संसाधन उपलब्ध होते हैं।

हम सभी लोग विभिन्न रूपों में ऊर्जा, परिवहन, गृह निर्माण, इन्फ्रास्ट्रक्चर, हर प्रकार की उपभोक्ता सामग्री के लिए खनिजों और धातुओं पर निर्भर हैं। जब तक हम सहज भाव से 'बढ़ती हुर्इ सामाजिक अपेक्षाओं का वास्ता देते रहेंगे इनके बार-बार या चक्रीय उपयोग से भी हमारी जरूरतें कभी पूरी नहीं होंगी। चीन और भारत में जो मध्यम वर्ग का उदय हुआ है उसने कच्चे माल की मांग को काफी बढ़ा दिया है और ऐसे लोगों की तादाद अब 75 करोड़ तक जा पहुँची है। इसी मांग की बदौलत आज की औधोगिक योजनाओं में आर्कटिक के नीचे गहरे समुद्र में पहुँच कर उन्हें खंगालने की बात सोची जाने लगी है। यही नहीं, खनिजों की तलाश चन्द्रमा और दूसरे ग्रहों पर भी लोगों के ज़ेहन में है। इसलिए अहम सवाल यह नहीं है कि हम 'खनन करें या न करें?’ कुछ खनिज जिनका उपयोग निर्माण आदि जैसे कार्यों में होता है उनकी जरूरत तो हमें हमेशा पड़ेगी और इसलिए कुछ न कुछ खनन तो अनन्त काल तक चलता रहेगा। बेहतर होगा कि हम खुद से यह सवाल पूछें कि हमें क्या, कैसे, कब, कहाँ और किसके द्वारा (खनन) कबूल है?

खनन किस चीज़ का?

कुछ धातुएँ ऐसी हैं जिनका आश्चर्यजनक उपयोग होता है। सोना इतना लचीला होता है कि एक ग्राम सोने को तीन किलोमीटर से ज्यादा दूर तक खींचा जा सकता है लेकिन ऐसा करने की जरूरत बिरले मौकों पर ही पड़ती है। यूरेनियम का उपयोग नाभिकीय ईंधन के उत्पादन में किया जाता है मगर इस काम में आने वाली यह अकेली धातु नहीं है। इसकी जगह पर समुद्र के किनारे बालू में पाये जाने वाले थोरियम का भी उपयोग हो सकता है। प्लैटिनम कैटेलिक कनवर्टर्स में आमतौर पर उपयोग में आने वाली धातु है जिसका काम इन्टरनल कम्बशन इंजनों से निकलने वाले ज़हरीले धुएं की मात्रा को सीमित करना होता है। इसके स्थान पर मैंगनीज़, निकेल और लोहे के उपयोग की भी सम्भावनाएँ हैं।

इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि आधुनिक तरीकों से युद्ध छेड़ने और बहुत ही तेज़ रफ्र्तार से लम्बी दूरी तय करने जैसे उपक्रमों को छोड़ कर मानव जाति की अधिकांश जरूरतों को पूरा करने के लिए दूसरी धातुओं और उत्खनित सामग्रियों के विकल्प की सम्भावनाएँ मौजूद हैं। हमारे पूर्वजों ने इस दिशा में जो 'तरक्की’ की थी वह अपने समय के अनुसार अपरिहार्य रही होगी। मसलन खाना बनाने वाले बर्तनों का लोहे से ताँबे और ताँबे से अल्युमिनियम तक की यात्रा का नाम लिया जा सकता है। लेकिन इसके पीछे दो कारण रहे होंगे-कच्चे माल की उपलब्धता और उसे शोधित करने की तकनीक। यह दोनों ही चीज़ें जरूरी नहीं है कि आज भी मौजूद हों। अब यह बात धीरे-धीरे ही सही मगर हम लोगों के समझ में आने लगी है कि पहले के विकल्पों का चयन करने में समाज को एक बड़ा सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय दण्ड भुगतना पड़ा होगा, खासकर भारी धातुओं को गलाने में कोयले के उपयोग में तो जरूर ऐसा हुआ होगा। किसी भी उत्खनित कच्चे माल को तैयार माल में बदलने के लिए की गर्इ 'जीवन-चक्र’ की कीमत की गणना (ऊर्जा की खपत, कचरे का उत्पादन और प्रदूषण की सृष्टि) को अन्तत: एक गम्भीर और महत्वपूर्ण विज्ञान के रूप में मान्यता मिल रही है। अब यह अलग-थलग पड़े रहने वाले निराश आदर्शवादियों का अधिकार क्षेत्र नहीं रहा है। इस बात पर भी आम सहमति बन रही है कि कुछ उत्खनित पदार्थ तो इतने खतरनाक हैं कि उनको कभी ज़मीन के अन्दर से निकालना ही नहीं चाहिए। अपने किसी भी रूप में एसबेस्टस पर संयुक्त राष्ट्र अमेरिका और पूरे यूरोपीय संगठन के देशों में पाबन्दी लगी हुर्इ है । लेकिन कनाडा और रूस कैन्सर पैदा करने वाले इस पदार्थ के ढेर के ढेर अक्षम्य तरीके से दूसरे देशों को निर्यात करने में लगे हुए हैं। दक्षिणी दुनिया के कुछ देश (खासकर भारत) मुख्यत: सीमेन्ट के लिए एसबेस्टस की खपत को बढ़ाये जा रहे हैं। पारा, जिसका उपयोग यूरोपीय संगठन के देशों ने थर्मामीटर में 2006 में ही बन्द कर दिया था, इन्हीं यूरोपीय देशों द्वारा धड़ल्ले से एशिया और अफ्रीका के देशों में इलेक्ट्रानिक कचरे की शक्ल (आमतौर पर बेकार कम्प्यूटरों और मोबाइल फोन) में भेजा जा रहा है। सीमेन्ट की भटिटयों और ऊर्जा संयंत्रों के द्वारा काफी मात्रा में पारा हवा में मिलाया जाता है और यह अमेरिका में भी कम नहीं होता। साफ बात यह है कि वैश्विक व्यापार में इन दोनों चीज़ों पर पाबन्दी लग ही जानी चाहिए। लेकिन हम दूसरी ज़हरीली धातुओं के उपयोग (या दुरुपयोग) का मूल्यांकन कैसे करें? इनमें सीसा, कैडमियम और निकेल शामिल हैं। यद्यपि सीसे का उपयोग बहुत पहले से रंगों और पाइपों के उत्पादन में बन्द हो गया था फिर भी पिछले साल बाज़ार में इसकी मांग घटने के बजाय बढ़ गर्इ। धातुओं में बहुत ही ज़्यादा ज़हरीली माने जाने वाली धातु निकेल का उपयोग तथाकथित 'हरित कारों’ की बैटरी में होता है। मोटर गाड़ियों में इस्पात के स्थान पर अल्युमिनियम के उपयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है ताकि ईंधन की खपत को कम किया जा सके और उसी अनुपात में ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन कम किया जा सके। परन्तु अल्युमिनियम के परिष्करण और गलाने वाली इकाइयाँ खुद बहुत बड़ी मात्रा में कार्बन डार्इआक्साइड वायुमण्डल में छोड़ती हैं और उनमें सर्वाधिक बिजली की खपत होती है। तब क्या हमारे द्वारा दिये गये टैक्सों का उपयोग केवल नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देने और उसके निर्यात पर किया जाना चाहिए? या फिर हमें एक 'स्वच्छ कोयला यंत्रावली’ का अभियान चलाना चाहिये क्योंकि यह कोयला ही है जो कि बहुत सी विकासशील अर्थव्यवस्थाओं का तारणहार बना हुआ है, भले ही यह अलग बात है कि इसके दक्षतापूर्ण उपयोग पर प्रश्न चिह्न लगा हुआ है। पिछले साल के माइनिंग जरनल में इशारा किया गया था कि, ‘इस समय तक कोर्इ भी (तकनीक) इसका फटाफट वाला समाधान नहीं दे पा रही है जिसकी अपेक्षा क्योटो प्रोटोकोल से संबंधित बहुत-सी पार्टियाँ कर रही हैं।’ चीन के खुद का ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन और सल्फर न केवल चीन की मुख्य भूमि के लाखों बाशिन्दों के लिए खतरा बना हुआ है वरन उसने पूरे के पूरे पूर्वी एशिया और यहाँ तक कि उत्तरी अमेरिका के पश्चिमी तट को भी अपने घेरे में लिया हुआ है। 

और यह होगा कैसे? 

उत्खनन के सबसे अच्छे तरीके के चुनाव का मतलब होता है कि हम घटिया तकनीकों और अपेक्षाकृत कम नुकसान पहुँचाने वाली तकनीकों के बीच अन्तर किस तरह से करते हैं। आप बहुत से ऐसे लोगों से सहमति जता सकते हैं जो यह मानते हैं कि खनन से निकलने वाले जहरीले कचरे को नदी या समुद्र में फेंकने या खनिज से सोना अलग करने के लिए उस पर साइनाइड के छिड़काव का कोर्इ औचित्य नहीं है। लेकिन खनन से प्रभावित होने वाले बहुत से समुदायों और कर्मियों के लिए उतना ही महत्वपूर्ण सवाल यह है कि कच्चे माल को उत्खनित करने के लिए ज़मीन के अन्दर कुएँ नुमा रचना बनाई जाये, खुले गड्ढे खोद कर यह काम हो या फिर ज़मीन को सीधे खुरच लिया जाय। पहले विकल्प में ज्यादा मजदूरों को रोज़गार मिलता है मगर उसमें जानलेवा दुर्घटनाओं तथा उस परिवेश में काम करने सम्बन्धी बीमारियों की सम्भावनाएँ अधिक होती हैं। दूसरी ओर खुले गडढों या ज़मीन को खुरच लेने वाले विकल्पों में बड़े पैमाने पर खेती की ज़मीन की क्षति होती है। सीमेन्ट बनाने वाले कारखानों की भट्टियों में हर सम्भव औधोगिक, रासायनिक या कृषि से उत्पन्न कचरा जलाया जाता है ताकि चूने और जिप्सम में चिपकने का वह गुण पैदा किया जा सके जिससे वह भवन निर्माण और इन्फ्रास्ट्रक्चर में काम आ सके। क्या यह सब, जैसा कि दावा किया जाता है, ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के नुकसानों को कम कर रहा है या फिर यह नये खतरे पैदा कर रहा है? 

खनन कब किया जाये? 

पिछले कुछ वर्षों से इस बात के ज्यादा सबूत मिल रहे हैं कि यदि कोर्इ 'अल्प-विकसित’ देश अपनी आमदनी के लिए खनिजों के विक्रय पर बहुत ज्यादा निर्भर करता है तो उस परिस्थिति में उस देश के बहुत से नागरिकों की गरीबी घटने के बजाय बढ़ने लगती है। इस तथाकथित 'खनिज अभिशाप’ का मूल कारण क्या हो सकता है? क्या इसके पीछे स्थापित संस्थाओं का पतन (भाई-भतीजावाद, भ्रष्टाचार और आन्तरिक राजस्व का असमान वितरण) एक कारण है जिसको बेहतर गवर्नेंस से ठीक किया जा सकता है? क्या यह रायल्टी और कर निर्धारण करने वाले प्रशासन की निर्लज्ज नपुंसकता है, या फिर यह विश्व बैंक अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा तय की हुर्इ नीतियों का नतीजा है अथवा यह विश्वस्तरीय विक्रय योग्य वस्तु व्यवस्था का आंतरिक स्वभाव है जिसमें खनिजों के निर्यात की कीमत किसी दूसरे उत्पादित माल से श्यादा लगाई जाती है?

बुनियादी चुनौती, मैं मानता हूँ, यह है कि इसके पहले कि खनिज सम्पदा पर ड्रिलों या बुलडोज़रों को लगा कर उसे उलट-पलट किया जाय और निर्यात के लिए समुद्र तट पर भेज दिया जाय, यह जरूरी है कि इसकी कीमत का मूल्यांकन करने के लिए एक मानवीय पद्धति विकसित की जाय। हमें खनन के दूरगामी सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय प्रभावों के मुकाबले वर्तमान में उससे मिलने वाले किराये या आमदनी की आपस में तुलना करके देखना पड़ेगा। बहुत से अल्पविकसित देशों के लिए इस कच्चे माल को ज़मीन के अन्दर पड़े रहने देना ही एक मात्रा रास्ता सिद्ध हो सकता है जिससे उनकी असली सम्पत्ति की विविधता भी बनी रहेगी और उनके सामने कभी भी खनन कर लेने का विकल्प भी खुला रहेगा। पिछली जुलाई में भारत के एक समाचार पत्र 'दि फाइनेनिशयल एक्सप्रेस’ ने देश की मौजूदा 'आइरन-ओर भागम-भाग’ के सम्भावित आर्थिक परिणामों की समीक्षा की थी जिसका बहुत ज्यादा बोझ उड़ीसा, झारखण्ड और छत्तीसगढ़ के आदिवासियों पर पड़ने जा रहा है। समाचार पत्र इस नतीजे पर पहुँचा कि ज्यादातर विदेशी उधमों को यहाँ आमंत्रित इसलिए नहीं किया जा रहा है कि भारत के आन्तरिक विकास के लिए इसकी जरूरत है बल्कि ऐसा सारी दुनिया के इस्पात निर्माताओं की दखलंदाज़ी से हो रहा है जिनकी सवारी अपने तटवर्ती और मध्यवर्ती कारखानों के लिए सस्ते कच्चे माल के शिकार पर निकली है। समाचार पत्र ने चेतावनी दी कि ‘अगर प्रस्तावित उत्पादन की देश में ही खपत की योजना है तो आज से लेकर 2020 तक घरेलू मांग को प्रति वर्ष 13 प्रतिशत से अधिक की दर से बढ़ाना होगा।’ वे सारे करार जिन पर बातचीत चल रही है अगर लागू हो जायें तो ‘देश का आयरन ओर आने वाले मात्र 50 वर्षो में समाप्त हो सकता है।’ इस बात की सम्भावना तो बहुत कम है कि सारी खनन परियोजनाएँ जिन पर भारत में बातचीत चल रही है, वे सब की सब उत्पादन के स्तर पर पहुँच पायेंगी मगर इतना तय है कि सैकड़ों ग्रामीण समाजों की ज़मीन पर दखलंदाज़ी नहीं रुक पायेगी। केवल दो पीढि़यों के बीच जीविका के बहुत से टिकाऊ मगर भंगुर स्रोतों की कुर्बानी हो जायेगी। यह नुकसान उनका अकेले का नहीं पूरे भारत का होगा।

कहाँ नहीं जाना चाहिये?

इस पृथ्वी पर जहाँ भी खनिजों की सबसे समृद्ध धरोहर दबी पड़ी है वहाँ के आदिवासी लोग ही इसके संरक्षक हैं। उन्हीं के संरक्षित अधिकार क्षेत्र के अन्दर जो संसाधन सुरक्षित हैं वही कम्पनियों और सरकारों के निशाने पर हैं जबकि इनमें से बहुत से स्थान संरक्षित क्षेत्र हैं और जीव-मण्डलों की तरह सुरक्षित माने गये हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा जल्दी ही 'आदिम जातियों के अधिकारों की उदघोषणा स्वीकृत और नियमित किये जाने’ पर विचार करने वाली है। अगर यह अंतिम उद्घोषणा के रूप में स्वीकार कर ली जाती है तो इससे उन प्रावधानों की ओर के दरवाजे खुल जायेंगे जिनके लिए ये लोग वर्षों से संघर्ष कर रहे हैं। ऐसा हो जाने पर उन्हें अपने बारे में खुद निर्णय लेने का अधिकार मिल जायेगा और उनके 'व्यक्तिगत और सामूहिक भू-स्वामित्व और संसाधनों पर अधिकार को भी संरक्षण मिलेगा। जो राष्ट्र इसका अनुमोदन करेंगे वे इस बात के लिए बाध्य होंगे कि ''वे सम्बद्ध आदिम जन-जाति समूहों की प्रतिनिधि संस्थाओं से पूरी निष्ठा और विश्वास के साथ सहयोग और परामर्श करें ताकि ऐसी किसी भी परियोजना के, जिससे उनकी ज़मीन या इलाके और दूसरे संसाधनों पर असर पड़ता हो, अनुमोदन से पहले उनसे सारी सूचनाओं के आदान-प्रदान के आधार पर किसी भी प्रकार के बन्धन से मुक्त सहमति प्राप्त कर सकें...।’ कनाडा और रूस ने इस ड्राफ्ट के विरोध में मत दिया जबकि अर्जेन्टीना, घाना और फिलिपींस ने, जहाँ काफी मात्रा में खनिज मौजूद हैं और जिनमें काफी संख्या में ऐसे लोग बसे हुए हैं, मतदान में भाग ही नहीं लिया।’ संयुक्त राष्ट्र संघ की कोशिशों का चाहे जो भी परिणाम निकले मगर इतना तय है कि जिन समुदायों के इलाके में ये खनिज उपलब्ध हैं उन तक किसी की भी पहुँच बनने से पहले वर्तमान या भविष्य में कभी भी, कम्पनियों, सरकारों तथा स्थानीय समुदायों के बीच 'पूरी सूचना के आदान-प्रदान के आधार पर किसी भी प्रकार के बन्धन से मुक्त सहमति’ का मुद्दा अब बहस के केन्द्र में अपनी जगह बना चुका है। आज की तारीख में प्राय: सारी दुनिया का खनिज उधोग लोगों के इस अधिकार को मानने में असफल रहा है। ठीक इसी तरह से सामयिक बहस के और दूसरे मुद्दे जैसे सशक्तीकरण, प्रजातांत्रिक प्रक्रियाओं का पालन, और अन्तत: हमारी पृथ्वी की निरन्तरता के प्रश्न बहस के केन्द्र में मौजूद रहते हैं।

खनन किसको करना चाहिये?

आम धारणा है कि जो लोग खनन उधोग में लगे हुए हैं वे बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मुलाजि़म हैं, यह ठीक नहीं है। इसके विपरीत इनमें बड़ी संख्या में आदिम जन-जातियों समेत लाखों औरत-मर्द शामिल हैं जिनके काम की सीमाएँ लैटिन अमेरिका के उष्ण-कटिबन्धीय क्षेत्रों की नदियों से हीरे के कन छानने से लेकर बोलीविया के खनन उधोग में बड़ी सरकारी संस्थाओं के माध्यम से उत्खनन या फिर दुनिया के सबसे खतरनाक इलाकों, खासकर भारत में भवन-निर्माण सामग्री की चिरार्इ तथा ढुलार्इ तक फैली हुर्इ हैं। इस तथाकथित 'छोटे खनन समूह और मिस्त्री टाइप’ लोगों पर अक्सर यह इल्ज़ाम लगता है, और यह खबर कभी-कभी अखबारों की सुर्खी बन जाती है, कि ये लोग मध्य या पशिचमी अफ्रीका में हीरे की हेरा-फेरी करते हैं या वे सोना निकालने के लिए पारा जला कर खुद को और पर्यावरण को ज़हरीला बना रहे हैं। मगर हम शायद ही कभी इस बात पर ध्यान दे पाते हों कि दक्षिण एशिया के लाखों पत्थर तोड़ने वालों या चीन की हज़ारों ग़ैर-कानूनी कोयले की खदानों में काम करने वालों की जिन्दगी किन मुश्किलों के दौर से गुजरती है। ये सभी अपनी जीविका कमाने की कोशिश में लगे हैं मगर वे एक तरह से, अनजाने में ही सही, यूनियन से संबद्ध खनिकों की रोज़ी-रोटी छीनने का भी काम करते हैं क्योंकि आजकल बड़ी खनन कम्पनियाँ अपना लागत खर्च कम करने के चक्कर में ज़्यादातर काम कैजुअल मज़दूरों से करवाने लगी हैं। यह कह पाना तो नामुमकिन है कि विश्व स्तर पर कितनी मात्रा में खनिज का उत्पादन इन छोटे पैमाने पर काम करने वाले खनिकों द्वारा किया जाता है लेकिन इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि हज़ारों खनिक समुदायों के बीच पल रही प्रजातांत्रिक स्वयं-संगठन की संभावना को व्यर्थ जाने दिया जा रहा है। यह दुनिया के बड़े-बड़े खनन उधोगों के हाथों में आर्थिक और राजनैतिक ताकत का निर्दयतापूर्ण केन्द्रीकरण है जो दिखार्इ तो नहीं पड़ता मगर उसकी कपटपूर्ण परिणति है।

अंत में, इस सच्चाई की मानवीय और पर्यावरणीय परिणामों की वास्तविकता का मूल्यांकन करने के बाद हम इस नतीजे पर पहुँच सकते हैं कि अपूरणीय खनिज सम्पदा के उत्खनन के मामले में क्या, कब, कहाँ, कैसे और किसके द्वारा प्रश्नों के उत्तर कम से कम अब से इस 'उधोग’ के हाथ में नहीं छोड़ने चाहिए। हम अपनी नदियों, झीलों और समुद्रों के निजीकरण के सवाल पर व्यग्र होकर उठ खड़े होते हैं। इस बात की लगभग वैसी ही बाध्यता है कि हम दुनिया की खनिज सम्पदा को भी मानव जाति की साझा विरासत घोषित कर दें।

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच

बीच सफ़हे की लड़ाई

गरीब वह है, जो हमेशा से संघर्ष करता आ रहा है. जिन्हें आतंकवादी कहा जा रहा है. संघर्ष के अंत में ऐसी स्थिति बन गई कि किसी को हथियार उठाना पड़ा. लेकिन हमने पूरी स्थिति को नजरअंदाज करते हुए इस स्थिति को उलझा दिया और सीधे आतंकवाद का मुद्दा सामने खड़ा कर दिया. ये जो पूरी प्रक्रिया है, उन्हें हाशिये पर डाल देने की, उसे भूल गये और सीधा आतंकवाद, ‘वो बनाम हम ’ की प्रक्रिया को सामने खड़ा कर दिया गया. ये जो पूरी प्रक्रिया है, उसे हमें समझना होगा. इस देश में जो आंदोलन थे, जो अहिंसक आंदोलन थे, उनकी क्या हालत हमने बना कर रखी है ? हमने ऐसे आंदोलन को मजाक बना कर रख दिया है. इसीलिए तो लोगों ने हथियार उठाया है न?

अरुंधति राय से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत.

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कॉरपोरेट जगत के हित में देश की आम जनता के संहार की योजना रोकें

हम महसूस करते हैं कि यह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक विध्वंसक कदम होगा, यदि सरकार ने अपने लोगों को, बजाय उनके शिकायतों को निबटाने के उनका सैन्य रूप से दमन करने की कोशिश की. ऐसे किसी अभियान की अल्पकालिक सफलता तक पर संदेह है, लेकिन आम जनता की भयानक दुर्गति में कोई संदेह नहीं है, जैसा कि दुनिया में अनगिनत विद्रोह आंदोलनों के मामलों में देखा गया है. हमारा भारत सरकार से कहना है कि वह तत्काल सशस्त्र बलों को वापस बुलाये और ऐसे किसी भी सैन्य हमले की योजनाओं को रोके, जो गृहयुद्ध में बदल जा सकते हैं और जो भारतीय आबादी के निर्धनतम और सर्वाधिक कमजोर हिस्से को व्यापक तौर पर क्रूर विपदा में धकेल देगा तथा उनके संसाधनों की कॉरपोरेशनों द्वारा लूट का रास्ता साफ कर देगा. इसलिए सभी जनवादी लोगों से हम आह्वान करते हैं कि वे हमारे साथ जुड़ें और इस अपील में शामिल हों.
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