हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

हरेक मुद्दा महिलाओं का मुद्दा है...

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/11/2012 06:54:00 PM

...और कोई भी मुद्दा केवल महिलाओं का मुद्दा नहीं है

जेएनयू में GSCASH को यौन उत्पीड़न के दोषी पाए गए छात्रों, कर्मचारियों या फैकल्टी मेंबरों को सजा देने के अधिकार की मांग करता हुआ एक पर्चा आप पहले पढ़ चुके हैं. यह दूसरा पर्चा DSU का है, जो 8 अप्रैल को वितरित हुआ था. कल 12 अप्रैल को GSCASH का चुनाव होना है.







जेएनयू में GSCASH की स्थापना सुप्रीम कोर्ट के विशाखा फैसले के दिशा-निर्देशों की रोशनी में हुई थी. यह छात्रों के संघर्षों का नतीजा था और प्रगतिशील छात्र आंदोलन ने इसमें छात्रों के प्रतिनिधियों के साथ-साथ कैंपस के दूसरे तबकों का प्रतिनिधित्व भी सुनिश्चित किया. इस कमेटी का मकसद था कि वह लैंगिक न्याय पर आधारित कैंपस के लिए यौन उत्पीड़न और पितृसत्ता के सारे रूपों के खिलाफ आंदोलन खड़ा करे और उसे मजबूत करे. पर पिछले कुछ वर्षों में कमेटी आंदोलन से कट गई है. कमेटी के इर्द-गिर्द किसी छात्र या महिला आंदोलन की गैरमौजूदगी के नतीजे में यह कमजोर हुई है और इस पर प्रशासन के हमले बढ़े हैं. जेएनयूएसयू के जिम्मेदार पदों पर रहते हुए SFI-AISA जैसे कथित प्रगतिशील संगठनों ने भी GSCASH को कमजोर करने में अहम भूमिका निभाई है. GSCASH द्वारा यौन उत्पीड़न का दोषी पाए जाने के बावजूद वे लगातार उन अपराधियों को बचाते रहे हैं. हाल ही में वे GSCASH चुनाव लिंगदोह सिफारिशों के तरह कराने को राजी हो गए थे. DSU समेत छात्र समुदाय द्वारा सही समय पर किए गए हस्तक्षेप की वजह से GSCASH चुनाव लिंगदोह के दायरे में आने से बच गए और अब ये ब्राह्मणवादी-प्रतिक्रियावादी लिंगदोह सिफारिशों से मुक्त होकर कराए जा रहे हैं.


GSCASH पिछले कुछ समय में महज लैंगिक मुद्दों पर ‘संवेदनशीलता’ लाने की भूमिका तक सिमट गई है. बेशक लैंगिक मुद्दों पर और लैंगिक भेदभाव के मामलों में ‘संवेदनशीलता लाने’ या चेतना को बदलने का अपना महत्व है. लेकिन हमें ठोस रूप से एक योजनाबद्ध कार्रवाई के साथ पितृसत्ता को चुनौती देने पर भी जरूर सोचना चाहिए. जो पितृसत्ता सामंती सामाजिक संबंधों और उपभोक्तावादी संस्कृति द्वारा मजबूत बनाई जा रही है, वह केवल विनम्र आग्रहों के जरिए पराजित नहीं की जा सकती. महिलाओं के लिए स्पेस को बढ़ाने और लैंगिक मुद्दों पर एक संवेदनशील कैंपस के निर्माण के लिए यौन उत्पीड़कों को सजा सुनिश्चित किया जाना पहली शर्त है. लेकिन GSCASH को अब तक सजा देने का अधिकार नहीं है. यह सिर्फ प्रशासन से सिफारिश कर सकती है और वीसी को इन सिफारिशों को मानने-न मानने का अधिकार है. हम जानते हैं कि किस तरह पितृसत्तात्मक प्रशासन लगातार यौन उत्पीड़कों और आवारा तत्वों को बचाता है. खास तौर से ऐसा तब देखने को मिलता है जब अपराधी कोई फैकल्टी मेंबर हो. इसलिए GSCASH को अपने फैसले लागू करने और सजा देने का आधिकार दिलाना छात्र समुदाय के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है, जिसे अभी जीतना जरूरी है.


जेएनयू जैसे एक प्रगतिशील विश्वविद्यालय में भी पितृसत्ता के हमले एक कड़वी सच्चाई हैं, जिनको महिलाएं रोज-ब-रोज बरदाश्त करती हैं. इस विश्वविद्यालय में जो थोड़ा-बहुत जनवादी स्पेस महिलाओं को मिला हुआ है, वह इस कैंपस के जुझारू महिला आंदोलनों, छात्र समुदाय और फैकल्टी के एक हिस्से द्वारा हासिल किया गया है. जेएनयू उन गिनी-चुनी जगहों में से है, जहां महिलाएं देर रात तक बिना किसी छेड़छाड़ या उत्पीड़न के डर के बाहर घूम सकती हैं. लेकिन यह आजादी प्रशासन द्वारा दी गई किसी सुरक्षा का नतीजा नहीं है, बल्कि जेएनयू के सचेत छात्र आंदोलनों और खास कर प्रगतिशील महिला आंदोलनों की देन है. GSCASH आंदोलनों की देन है. लेकिन इसकी स्थापना के बाद से इसे आंदोलनों से काट दिया गया और यह उम्मीद की गई कि यह अकेले काम कर सकता है. इसका नतीजा यह निकला कि एक संस्था के रूप में GSCASH कमजोर होती गयी. इसे सिर्फ प्रगतिशील छात्र आंदोलनों के सामूहिक आंदोलन के जरिए ही मजबूती दी जा सकती है. अगर यह नहीं किया गया तो यह भी अधिकारविहीन कमेटियों की तरह यथास्थितिवादी, छात्र विरोधी, पितृसत्तात्मक प्रशासन की मनमानी और मरजी पर निर्भर बनी रहेगी.


GSCASH को मजबूत बनाने का एक ही तरीका है: इसके गिर्द एक सामूहिक और सचेत छात्र आंदोलन खड़ा किया जाए. ऐसा आंदोलन जो सामूहिक रूप से यह सुनिश्चित करे कि महिलाएं भरोसे के साथ यौन उत्पीड़न के मामले दर्ज करा सकें और बढ़ते सामाजिक दबावों में आकर पीछे न हट जाएं. ऐसा सचेत आंदोलन जो महिलाओं के हर तरह के उत्पीड़न की संस्कृति का प्रतिरोध कर सके. जहां औरतों को पुरुषों के मुताबिक एडजस्ट होने को मजबूर न किया जा सके. जहां औरतों को मानसिक-शारीरिक रूप से सुंदरता और सुघड़ता के सामंती-उपभोक्तावादी कायदों को मानने पर मजबूर न होना पड़े. फासीवादी-सामंतवादी दक्षिणपंथी तत्व पितृसत्ता के उत्पीड़क हमलों को कायम रखने में मददगार होते हैं. और SFI-AISA जैसे कथित ‘वाम’ संगठन यौन उत्पीड़कों को बचा कर प्रतिक्रियावाद और महिलाविरोधी यथास्थिति को मजबूत ही करते हैं.


हरेक मुद्दा महिलाओं का मुद्दा है और कोई भी मुद्दा केवल महिलाओं का मुद्दा नहीं है. एक महिला मजदूर की वाजिब मजदूरी की मांग साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष से मिल जाती है. दलित महिलाओं द्वारा अपने सम्मान का संघर्ष जाति के उन्मूलन और सामंतवाद के नाश का अभिन्न हिस्सा है. मणिपुर-नागालिम से कश्मीर तक पितृसत्ता और राज्य के दमन के खिलाफ संगठित प्रतिरोध कर रही महिलाएं हों या और छत्तीसगढ़ से पश्चिम बंगाल तक सलवा जुडूम, हरमाद वाहिनी और भारतीय राजसत्ता के खिलाफ संगठित महिलाएं. महिलाओं के अधिकारों के लिए संघर्ष सभी तरह के उत्पीड़नों के खिलाफ साझे संघर्षों के जरिए ही चलाया जा सकता है, उनसे कट कर नहीं. हमारे कैंपस के छात्र आंदोलनों का भी यही सबक रहा है और देश में क्रांतिकारी महिला आंदोलनों का भी चाहे वो बस्तर का क्रांतिकारी आदिवासी महिला संगठन हो, बिहार-झारखंड का नारी मुक्ति संघ हो या जंगल महल का नारी इज्जत बचाओ समिति हो. GSCASH को मजबूत बनाने और इसका विस्तार करने के लिए तथा कैंपस में महिलाओं के आंदोलन को फिर से खड़ा करने के लिए हमें शिक्षा के जनवादी करण के आंदोलनों और कैंपस के बाहर के इन आंदोलनों को एक सिलसिले में जोड़ने की जरूरत है.


DSU का मानना है कि GSCASH के सामने खड़ी चुनौतियों को दूर करने में चुने हुए छात्र प्रतिनिधि की अहम भूमिका है. इसके लिए जरूरी है कि छात्र प्रतिनिधि राजनीतिक रूप से ‘तटस्थ’ होने का दिखावा न करें बल्कि हम GSCASH के लिए अपने प्रतिनिधियों को उनकी राजनीति के आधार पर ही चुनें.

Related Posts by Categories



Widget by Hoctro | Jack Book
  1. 0 टिप्पणियां: Responses to “ हरेक मुद्दा महिलाओं का मुद्दा है... ”

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच

बीच सफ़हे की लड़ाई

गरीब वह है, जो हमेशा से संघर्ष करता आ रहा है. जिन्हें आतंकवादी कहा जा रहा है. संघर्ष के अंत में ऐसी स्थिति बन गई कि किसी को हथियार उठाना पड़ा. लेकिन हमने पूरी स्थिति को नजरअंदाज करते हुए इस स्थिति को उलझा दिया और सीधे आतंकवाद का मुद्दा सामने खड़ा कर दिया. ये जो पूरी प्रक्रिया है, उन्हें हाशिये पर डाल देने की, उसे भूल गये और सीधा आतंकवाद, ‘वो बनाम हम ’ की प्रक्रिया को सामने खड़ा कर दिया गया. ये जो पूरी प्रक्रिया है, उसे हमें समझना होगा. इस देश में जो आंदोलन थे, जो अहिंसक आंदोलन थे, उनकी क्या हालत हमने बना कर रखी है ? हमने ऐसे आंदोलन को मजाक बना कर रख दिया है. इसीलिए तो लोगों ने हथियार उठाया है न?

अरुंधति राय से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत.

फीड पाएं

रीडर में पढें या ई मेल से पाएं:
अपना ई मेल लिखें :

कॉरपोरेट जगत के हित में देश की आम जनता के संहार की योजना रोकें

हम महसूस करते हैं कि यह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक विध्वंसक कदम होगा, यदि सरकार ने अपने लोगों को, बजाय उनके शिकायतों को निबटाने के उनका सैन्य रूप से दमन करने की कोशिश की. ऐसे किसी अभियान की अल्पकालिक सफलता तक पर संदेह है, लेकिन आम जनता की भयानक दुर्गति में कोई संदेह नहीं है, जैसा कि दुनिया में अनगिनत विद्रोह आंदोलनों के मामलों में देखा गया है. हमारा भारत सरकार से कहना है कि वह तत्काल सशस्त्र बलों को वापस बुलाये और ऐसे किसी भी सैन्य हमले की योजनाओं को रोके, जो गृहयुद्ध में बदल जा सकते हैं और जो भारतीय आबादी के निर्धनतम और सर्वाधिक कमजोर हिस्से को व्यापक तौर पर क्रूर विपदा में धकेल देगा तथा उनके संसाधनों की कॉरपोरेशनों द्वारा लूट का रास्ता साफ कर देगा. इसलिए सभी जनवादी लोगों से हम आह्वान करते हैं कि वे हमारे साथ जुड़ें और इस अपील में शामिल हों.
-अरुंधति रॉय, नोम चोम्स्की, आनंद पटवर्धन, मीरा नायर, सुमित सरकार, डीएन झा, सुभाष गाताडे, प्रशांत भूषण, गौतम नवलखा, हावर्ड जिन व अन्य

हाशिये में खोजें

Loading...