हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

बिहार में गरीबी उर्फ सौ साल का सफरनामा

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/09/2012 05:37:00 PM

जाने-माने पत्रकार श्रीकांत का यह लेख दिखता है कि बदलते बिहार की चकाचौंध के नीचे की हकीकत क्या है. बिहार में बदलाव का यह शोर दरअसल जमीनी बदलाव की जरूरत और उसके लिए चल रहे संघर्षों को छुपाने-ढंकने की कोशिशों का एक हिस्सा हैं. इनकी ओट में उन सारे सवालों को दरकिनार करने की कोशिश की जा रही है, जिनको हल किया जाना बिहार में किसी भी बदलाव के लिए सबसे पहली और जरूरी शर्त हैं. इनमें सबसे अहम सवाल जमीन का बंटवारा यानी भूमि सुधार है, जिसके बिना जातीय उत्पीड़न और ब्राह्मणवाद का खात्मा अंतिम तौर पर मुमकिन नहीं है. इसी के साथ श्रीकांत यह भी दिखाते हैं कि बिहार में बड़ी आबादी की जीवन स्थितियां दिन ब दिन दयनीय होती जा रही हैं. इसके लिए वे औपनिवेशिक दौर तथा उसके पहले की स्थितियों से आज के हालात की तुलना करते हैं. एक जरूरी रिपोर्ट.


बिहार की आबादी 10 करोड़ 38 लाख हो गई है। भारत में रहने वाले छह गरीबों में से एक बिहारी है। यदि ग्रामीण निर्धनता की बात करें तो यह अनुपात पांच में से एक होता है। कुल ग्रामीण आबादी की एक बटा पांच से ज्यादा आबादी अनुसूचित जाति और जनजाति की है। ये बेहद निर्धन हैं। इनका औसत मासिक प्रति व्यक्ति खर्च 390 रुपए है जबकि राज्य के अन्य ग्रामीण गरीबों के लिए खर्च की माहवारी रकम 451 रुपए है।

सौ साल पहले बिहार की आबादी (उड़ीसा और छोटा नागपुर को छोड़कर) सिर्फ 2.15 करोड़ थी। बिहार के बंगाल से अलग होने के लगभग 20 साल पहले बिहार की गरीबी और रैयतों की हालत के बारे में बंगाल के कार्यकारी गवर्नर जनरल ए.पी.मैक्डोनेल ने 1893 में कहा कि बिहार के रैयत अति दरिद्रता में जी रहे हैं। (मैक्डोलियल ए.पी., 21 सितंबर 1893, बंगाल अंडर लेफ्रिटनेंट गवर्नर, पेज 893) बिहार की गरीबी के बारे में 19 फरवरी, 2012 को प्रो.अभिजीत सेन ने कहा-‘‘बिहार में पिछले कुछ सालों में विकास के बावजूद गरीबी में कमी नहीं आई है।’’ (19-22, फरवरी 2012 को पटना में दिया गया वक्तव्य, हिन्दुस्तान व जागरण)। यूएनडीपी की 2011 की रिपोर्ट के अनुसार मानव संसाधन विकास के मामले में बिहार 132वें नंबर पर है। बिहार, छत्तीसगढ़ से नीचे और ओडिशा से ऊपर है (यूएनडीपी रिपोर्ट 2011 पेज 23)।

बिहार में सौ सालों का यह सबसे दुखद पहलू है कि गरीबी घट नहीं रही अथवा गरीबों की हालत खराब होती गई है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कहते हैं कि बिहार की प्रति व्यक्ति आय दिल्ली से एक तिहाई है। ... मुख्यमंत्री ने ग्लोबल मीट में कहा कि हमारे विकास का असली मकसद अंतिम आदमी का विकास है। बिहार की हालत के बारे में 18वीं सदी की बात करें तो जेम्स ग्रांट के बिहार के बारे में 1786 में दिये विवरण से गुजरेंगे, जिसने बिहार की कृषि, उद्योग और व्यापार की उन्नति की चर्चा की थी। इसकी तुलना अगर (19वीं सदी) 1873 में स्टुअर्ट चार्ल्सोली के विवरण से करेंगें तो उससे उलट पाएंगे-बिहार में रैयतों को गरीबी, दुखदायी और उत्पीड़न के शिकार पाएंगे। इसी हालत में पूरी आबादी गुजारा कर रही है। (फाईनकेन का बिहार के रैयतों के बारे में बयान, रेंट क्वेश्चन इन बंगाल, पार्वती चरण राय पेज 151, 1883)।

20 वीं सदी के अंतिम वर्षों में (1998) में जाने-माने अर्थशास्त्री डॉ. प्रधान हरिशंकर प्रसाद ने कहा-बिहार के अधिकांश लोग आज भी गरीबी में जन्म लेते हैं, गरीबी में पलते हैं और गरीबी में मर जाते हैं (आर्थिक विकास, बिहार की त्रासदी पेज 30)। अलख एन. शर्मा बताते हैं कि (1900-2000) में जहां बिहार के कुल 26 प्रतिशत लोगों को ठीक से खाना नहीं मिलता है वहीं बिहार के 45 प्रतिशत भूमिहीन परिवारों को ठीक से खाना नहीं मिलता। फूड सिक्यूरिटी एटलस के अनुसार नरेगा के तहत काम पाने वाली सभी जातियों के 67 प्रतिशत श्रमिक अपनी कमाई का अधिकांश हिस्सा खाने और खाने के सामान खरीदने पर खर्च कर देते हैं। यह ग्रामीण गरीबी को दर्शाता है।

और गरीबी के बारे में अर्जुन सेनगुप्ता समिति की रिपोर्ट में बताया गया कि देश में 77 प्रतिशत लोगों की हालत अत्यंत दयनीय है और सिर्फ 23 प्रतिशत लोग ही सुखी हैं। जब देश के 77 प्रतिशत की हालत को अत्यंत खराब कहा जाएगा तो उस आधार पर बिहार में (21वीं सदी में) गरीबी से अभिशप्त लोगों की संख्या 80 प्रतिशत से अधिक हो जाएगी।

सौ साल पहले बिहार में गरीबी

पटना के कलक्टर टॉयनबी ने 1878 में ग्रामीण क्षेत्रों में अपने भ्रमण के दौरान पाया कि अधिकांश खेतिहर और रैयत भुखमरी की हालत में हैं। उन्हें दो जून भरपेट भोजन नसीब होने की बात तो दूर, इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि उन्हें खाना मिल ही जाएगा? मुझे उनकी निर्धनता की असलियत का वाकई पता नहीं चलता, यदि मैंने उनके रहने और खाने-पीने की हालत को अपनी आंखों से नहीं देखा होता। इनके भीतर पेट भरने के सिवा किसी तरह की महत्वाकांक्षा नहीं है। बढ़ती आबादी और मंहगाई ने उनकी गरीबी में कोढ़ में खाज की तरह स्थिति पैदा कर दी है। (एनुअल जनरल रिपोर्ट, पटना डिवीजन-1878-79,नंबर-203 जे, बांकीपुर 23 जून, 1879, पेज 8)।

फोर्ब्स ने 1891 में अपनी जिला जनगणना रिपोर्ट में लिखा कि मजदूरों की संख्या में गिरावट फसलों की पैदावार में लगातार गिरावट के कारण आई है। रोजी-रोटी की तलाश में वे राज्यों खास कर पूर्वी बंगाल तथा पूर्वोत्तर असम में गए हैं। इन राज्यों में मजदूरों की ज्यादा मांग रही है (फाइनल रिपोर्ट ऑन द सर्वे ऐंड सेटलमेंट ऑपरेशंस इन द मुजफ्फरपुर डिस्ट्रिक्ट 1892-99, पेज 23)।

बिहार के सारण, शाहाबाद, पटना, मुंगेर, गया और भागलपुर के 2,19,135 लोग बंगाल में काम कर रहे थे। (रिपोर्ट ऑन द मेटीरियल कंडीशन ऑफ दि लोअर क्लासेज ऑफ पापुलेशन इन बंगाल, 1888 पेज 9)।

बिहार में पांच व्यक्तियों के एक परिवार की न्यूनतम जरूरतों को पूरा करने के लिए ढाई एकड़ जमीन कम थी। इसकी पूर्ति के लिए मजदूरों को अतिरिक्त आमदनी की जरूरत होती थी। ऐसे में खेत मजदूरों के सामने बाहर जाने (पलायन) के सिवा कोई रास्ता नहीं होता था। (आनंद ए. यांग, ‘लिमिटेड राजः एग्रेरियन रिलेशंस इन कोलोनियल इंडिया, सारण डिस्ट्रिक्ट 1793-1920’ पेज-194)।

बिहार में बड़ी आबादी की गरीबी के बारे में पहली रिपोर्ट ग्रियर्सन की थी। 8 जून, 1893 को गया के खेत मजदूरों की दयनीय स्थिति के बारे में ब्रिटेन के हाउस ऑफ कॉमन्स में एक सवाल पूछा गया था। प्रश्न था ‘क्या भारत मंत्री ने बंगाल सिविल सर्विस के मि. ग्रियर्सन द्वारा लिखित ‘नोट्स आन डिस्ट्रिक्ट ऑफ गया’ देखी है?’ 1881 की जनगणना के अनुसार गया जिले की आबादी 21 लाख 25 हजार है। नोट में यह दिखाया गया है कि किस प्रकार 12.5 एकड़ के एक काश्तकार की प्रति व्यक्ति सालाना औसत आमदनी मात्र 12 रुपए चार आना है। एक खेत मजदूर और उसकी पत्नी अगर पूरे साल मजूरी करे तो वे सालाना 41 रुपए बारह आने ही कमा सकते हैं। यदि चार जनों का परिवार हो तो प्रति व्यक्ति आमदनी हुई दस रुपए सात आने। यह राशि 15 रुपए की उस सीमा से 4 रुपए नौ आने कम है जो मि. ग्रियर्सन के अनुमान के अनुसार (आवश्यक धार्मिक और सामाजिक खर्च को छोड़कर) सिर्फ जीवन की जरूरतों को पूरा करने के लिए चाहिए। क्या वे इस बात से अवगत हैं कि गया जिले में मजदूर वर्ग के लगभग सभी जनों तथा काश्तकार और कारीगर वर्ग के दस फीसदी लोगों (यानी जिले की कुल आबादी के 45 फीसदी) को न तो पर्याप्त कपड़ा उपलब्ध है और न ही खाना? और क्या मंत्री भारत सरकार से इस बात की अनुशंसा करेंगे कि वह गया जिले के छोटे काश्तकारों और मजदूरों की आम दशा की जांच-पड़ताल कर रिपोर्ट देने के लिए एक सक्षम आयोग नियुक्त करे? साथ ही बंगाल सूबे के अन्य जिलों में इसी तरह की स्थिति की जांच के लिए कदम उठाए? सांसद मि. केन के इस प्रश्न के उत्तर में अंडर सेक्रेट्री ने कहा-भारत-मंत्री भारत की जनता की स्थिति के बारे में किसी भी सूचना को काफी महत्व देते हैं और प्रश्नों की एक प्रति भारत सरकार को पर्यवेक्षण के लिए अग्रसारित की जाएगी। (प्रसंगवश, 1888 में पटना के दो गांवों के सर्वेक्षण से पाया गया कि पांच व्यक्ति के परिवार के भरण-पोषण के लिए ढाई एकड़ यानी सात बीघा जमीन का होना जरूरी है। लेकिन 40 प्रतिशत रैयतों के पास चार बीघे से कम जमीन थी। गया में पांच प्रतिशत परिवारों के पास पांच बीघा जमीन नहीं थी।)

हाउस ऑफ कामंस में उठे सवालों के बाद हालांकि 19 मार्च, 1894 को खेत मजदूरों की दशा की जांच-पड़ताल करने का निर्देश दिया गया, लेकिन प्रशासन ने ग्रियर्सन रिपोर्ट की अच्छी तरह लीपा-पोती करने की कोशिश की। इस लीपापोती की जिम्मेदारी दी उत्तर बिहार के सेटलमेंट ऑफिसर सी.जे.स्टीवेंसन मूर को। उनके निष्कर्ष कुछ इस प्रकार थे: गया के रैयत उत्तर बिहार के रैयतों की तुलना में ज्यादा सुखी हैं। हां, दोनों अंचलों में मजदूर वर्ग की स्थिति सचमुच दयनीय है। जहां तक कमिया प्रथा का सवाल है, तो यह कोई नई प्रथा नहीं है। आर्यों के आगमन के समय से ही क्षत्रिय राजन्य वर्ग ने आदिवासी निम्न जातियों का इस्तेमाल इस रूप में किया है...बिहार की स्थितियां भिन्न हैं। यहां अनाज सस्ता है और यहां के लोग थोडे़ में गुजारा कर लेते हैं, इसीलिए ठीक-ठाक जीवन यापन के लिए 15 रुपए प्रति व्यक्ति सालाना आय बिहारी रैयत के लिए पर्याप्त माना जाना चाहिए। हां, बंगाली रैयत के लिए यह राशि काफी कम होगी। मूर ने खेत मजदूरों की सालाना आमदनी का एक आकलन भी प्रस्तुत किया। इस आकलन की खासियत यह थी कि इसमें यह मान लिया गया कि गया के खेत मजदूर चोर होते हैं और चोरी किए गए और कटनी के बाद चुन-बिछ कर लाए अनाज को भी उनकी आमदनी का एक स्थायी स्रोत माना गया। उन दिनों एक पुरुष मजदूर को चार सेर कच्चा अनाज मिलता था। साल में 9 महीने काम मिल जाया करता था। इस तरह मूर ने यह भी दिखलाया कि महिला मजदूर और 12 साल से ऊपर के लड़के की सालाना आमदनी भी (चोरी और चुनने-बिछने को मिलाकर) करीब 20 रुपए हो ही जाती थी। इस तरह उन्होंने प्रति खेत मजदूर की औसत सालाना आमदनी के डॉ ग्रियर्सन के आकलन (11 रुपए 1 आना) को गलत ठहराया और बताया कि उनकी हालत उतनी बुरी नहीं है। (‘बिहार में सामाजिक परिवर्तन के कुछ आयाम’, प्रसन्न कुमार चैधरी/श्रीकांत)

1912 के बाद गरीबों की हालत

बिहार में 1921 से 1941 के बीच आबादी बढ़कर 2 करोड़ से 3.6 करोड़ हो गई । (1936 में बिहार से उड़ीसा के निकलने के बाद जमीन पर दबाव और बढ़ गया।) 1937 में पहली कांग्रेसी सरकार के गठन के समय जमीन से जुड़ी घटनाओं को लेकर जमींदारों और बटाईदारों के बीच 77 झड़पें हुईं। 23 मार्च, 1938 को सैयद मोबारक अली ने काउंसिल में कहा कि खेतिहरों की दयनीय हालत के कारण ऐसा हो रहा है....क्योंकि हंग्री मैन इज ऐन एंग्री मैन। (काउंसिल डिबेट पेज 112)

बिहार में 1938 में खेत मजदूरों की दयनीय हालत को लेकर एक जांच समिति गठित करने के मकसद से गोरख प्रसाद ने एक प्रस्ताव विधानसभा में पेश किया था। इस प्रस्ताव में खेत मजदूरों की संख्या और उनकी हालत पर चर्चा हुई। श्याम नंदन सिंह ने कहा कि... वे दिन-रात कमाते-कमाते मर कर भी भर पेट खाना नहीं पाते। द्वारिकानाथ तिवारी ने कहा कि खेत मजदूरों की संख्या एक करोड़ से अधिक है। वे खाना के बिना, कपडे़ के बिना मरते हैं। प्रभुनाथ सिंह ने गया जिले के किसानों-खेत मजदूरों की हालत पर प्रकाश डालते हुए कहा कि परिश्रम करने के बावजूद उन्हें दोनों वक्त भोजन नहीं मिलता। राम प्रसाद ने कहा कि जो बेचारे खेतों में दिन-रात खटते हैं तो भी वे भूखों मरते हैं। उनकी हालत की जांच गवर्नमेंट को जरूर करानी चाहिए। यमुना कार्यी ने 1931 की जनगणना का हवाला देते हुए कहा कि जब से आर्थिक मंदी हुई है तब से लाखों-लाख किसान इस सूबे में खेतिहर मजदूर हो गए हैं। उनकी हालत की जांच होनी चाहिए। सरकार की ओर से पहले जगतनारायण लाल ने छह महीने के अंदर मजदूरों की हालत की जांच की बात कही। लेकिन जमींदार प्रतिनिधियों के दबाव में वोटिंग के जरिए इस प्रस्ताव को गिरा दिया गया। जांच के पक्ष में 23 और विपक्ष में 78 मत पडे़। इस तरह अंग्रेजी राज में ही देसी सरकार ने खेत मजदूरों की हालत की जांच नहीं होने दी (देखें विधानसभा में वाद-विवाद 13 अप्रैल 1938)।

इसके पहले दिसंबर 1922 में जब काउंसिल में डिप्रेस्ड क्लास के लोगों के जीवन स्तर की जांच के संबंध में एक प्रस्ताव लाया गया तो उस प्रस्ताव को पास नहीं होने दिया गया। (मेमोरेंडम फॉर स्टेट्यूटरी कमीशन पेज-147) बहरहाल, 1945 में फेमिन कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि आबादी के अनुपात में प्रति व्यक्ति आधा एकड़ कृषि योग्य जमीन है। उस समय बिहार में कृषि योग्य लगभग साढे़ 19 मिलियन एकड़ जमीन थी। आयोग ने बिहार कृषि को विकसित करने तथा औद्योगिकीकरण पर जोर देने की वकालत की । आयोग के समक्ष कुछ लोगों ने बिहार में जनसंख्या नियंत्रण और माइग्रेशन को बढ़ावा देने का सुझाव दिया। (दि फेमिन इंक्वायरी कमीशन फाइनल रिपोर्ट 1945, मद्रास पेज 427-28)

बिहार के गरीब - 1947-2000

1950-51 के अक्तूबर महीने में हथिया नहीं बरसा और पूरा बिहार अनाज के लिए परेशान हो गया। यह पहली पंचवर्षीय योजना और आजादी के बाद का पहला साल था। लगभग ढाई करोड़ रुपए का कर्जा बांटा गया और भुखमरी से मजदूरों को बचाने के लिए इतनी राशि खर्च की गई। बिहार के खेत मजदूरों के संबंध में 1949-50 के दौरान 80 गांवों की जांच की गई। पाया गया कि खेत मजदूरों की प्रतिदिन की आमदनी एक रुपए दो आना नौ पाई है। एक मजदूर की सालाना आमदनी 363 रुपए थी। (एस.आर. बोस, इंडियन जर्नल ऑफ एग्रीकल्चर इकोनॉमिक्स 1953, पेज 33-43) प्रसिद्ध किसान नेता रामनंदन मिश्र ने हिसाब लगाया कि औसत खेतिहरों के खेत से सालाना आमदनी 300 रुपए से 150 रुपए से अधिक नहीं थी। 1949 में एक सरकारी जांच के अनुसार, एक खेतिहर मजदूर परिवार की औसत सालाना आमदनी 444.4 रुपए और खर्च था 615.8 रुपए। खर्च का ब्योरा इस प्रकार था-
भोजन: 521.7 रु
वस्त्र/जूता: 30.0 रु
जलावन/रोशनी: 10.1 रु
घर का किराया: 3.0 रु
विविध: 51.0 रु
कुल: 615.8 रु

बिहार में 1950-51 में प्रति व्यक्ति आय देश की प्रति व्यक्ति आय से 38 प्रतिशत कम थी। 1960-61 में बिहार, भारत का दूसरा सबसे गरीब राज्य था। 1966-67 में में बिहार प्रति व्यक्ति आय के मामले में सबसे नीचे आ गया था। (आर्थिक विकास, बिहार की त्रासदी पेज 118)

1965 में बिहार विधानसभा में कर्पूरी ठाकुर ने कहा- हमारे यहां जो सबसे नीचे के गरीब हैं, उनमें दस प्रतिशत से ज्यादा की आमदनी सात रुपए मासिक से अधिक नहीं है। हिंदुस्तान के अन्य राज्यों से गरीबों की आमदनी सबसे कम है, क्योंकि बिहार राज्य बराबर से गरीब सूबा रहा है।.. सन 1880 के पहले लोगों को प्रतिदिन 27.2 औंस प्रति व्यक्ति अनाज मिल रहा था...बिहार के लोगों को 27 औंस कौन कहे प्रति बिहारी को 13-14 औंस मिल रहा है (बिहार विधानसभा में 28 जुलाई 1965 को अविश्वास प्रस्ताव पर कर्पूरी ठाकुर का वक्तव्य, ‘कर्पूरी ठाकुर का संसदीय जीवन’ खंड 1, पेज 483)।

बिहार के 32 जिलों में नक्सली और माओवादियों ने अपने जनाधार का विस्तार किया है। 1967 के बाद साठ साल से अधिक गुजर गए और भूमि समस्या का समाधान नहीं हो सका। विकास की ढेर सारी योजनाएं चलीं, मगर गरीबों की हालत में बदलाव नहीं हुआ। राज्य में 1970 के दशक में शुरू हुए नक्सली आंदोलन के बारे में सरकारें विकास की बातें जरूर करती रहीं, लेकिन उन्होंने सैनिक अभियानों पर जोर दिया। नक्सली आंदोलन के जड़ जमाने के पीछे जमीन थी और जमीन का मसला हल नहीं हुआ। बिहार के मुसहरी में हिंसा की घटना के बाद जयप्रकाश नारायण ने वहां कैंप किया था और पांच सवाल उठाए थे। ये लंदन के ‘रिसर्जेन्स’ में यह ‘फेस-टु-फेस’ शीर्षक से प्रकाशित हुए थे। जेपी ने ये पांच मुद्दे तब उठाए थे।

1. गरीबों को आर्थिक अधिकार नहीं है।
2. गरीबों के लिए इंसाफ उनकी पहुंच से बाहर है।
3. भूमिसुधार जमीन पर नहीं उतर सका।
4. नेता और जनता के बीच भारी गैप है।
5. शोषण।

जयप्रकाश नारायण ने साफ कहा- ‘ग्रामीण हिंसा में यह वृद्धि जो हम देख रहे हैं वह इतने लंबे अरसे तक इन कानूनों को कार्यान्वित न कर सकने का ही अनिवार्य परिणाम है। इस हिंसा के जनक तथाकथित नक्सलवादी नहीं हैं, बल्कि वे हैं जिन्होंने लगातार इतने वर्षों तक उक्त कानूनों की अवज्ञा की है और उनके उद्देश्यों को निरर्थक कर दिया है- चाहे राजनेता हों, प्रशासक हों, भूमिपति हों या महाजन हों। वे बडे़ किसान, जिन्होंने हदबंदी कानून को बेनामी तथा फर्जी बंदोबस्तियों के जरिए धोखा दिया है, वे भद्र लोग जिन्होंने सरकारी जमीन और गांव की सामूहिक भूमि हड़प रखी है, वे भूपति जिन्होंने अपने बटाईदारों को कानूनी हक देने से हमेशा इनकार किया है और उन्हें अपनी जमीन से बेदखल किया है... जो अपने मजदूरों को कम मजदूरी देते रहे हैं और उन्हें बसगीत भूमि से भी वंचित कर रखा है। उन व्यक्तियों ने धोखाधड़ी से या जबर्दस्ती कमजोर वर्ग के लोगों की जमीन छीन ली है। वे तथाकथित ऊंची जाति के लोग जो हरिजन भाइयों को हमेशा घृणा की नजर से देखते रहे हैं, उनके साथ बुरा बर्ताव करते रहे हैं तथा उनके साथ सामाजिक भेदभाव बरतते रहे हैं, वे महाजन जिन्होंने अत्यधिक ब्याज वसूल करते हुए गरीबों तथा कमजोर की जमीन हथिया ली है। वे राजनेता, प्रशासक और सभी अन्य लोग जिन्होंने इन अन्यायपूर्ण कार्यों में मदद पहुंचायी है या उन्हें प्रोत्साहित किया है- ये लोग हैं जो आज गरीबों और दलितों के मन में जमा हुए अन्याय, दुख और उत्पीड़न के लिए जिम्मेवार हैं जो अब हिंसा के रूप में बाहर निकलने का मार्ग ढूंढ रहा है। इस स्थिति के लिए जिम्मेवार हैं कानून की अदालतें, न्याय पाने की पद्धतियां तथा उनके लिए चुकाए जाने वाले मूल्य जिन्होंने हमारे समाज के दुर्बल वर्गों के साथ षड्यंत्रपूर्वक न्याय नहीं होने दिया है।... (आमने-सामने, जयप्रकाश नारायण पेज 12-13, सर्वसेवा संघ, वाराणसी से प्रकाशित)

21वीं सदी में बिहार के गरीब

बिहार में गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर कर रहे परिवारों में पिछड़ी, अति पिछड़ी और दलित जातियों की तादाद लगभग 82 प्रतिशत है। समाज में हाशिए पर रहने वाली जातियों में ही सबसे अधिक गरीबी है। हिन्दुओं में पिछड़ी जातियों को छोड़कर अन्य जातियों में सिर्फ 3.6 प्रतिशत परिवार ही गरीबी रेखा से नीचे हैं। बिहार में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाली जातियों में एनेक्सर- एक वाली अति पिछड़ी जातियों की तादाद सर्वाधिक 37 प्रतिशत है, जबकि पिछड़ी जातियों- एनेक्सर टू की तादाद 12 प्रतिशत है। कुल मिला कर उनकी तादाद लगभग 49 प्रतिशत है। इसमें दलित और अति पिछड़ी जातियों को मिला देने पर इनकी आबादी 70 प्रतिशत हो जाती है।

बिहार सरकार की राज्य ह्यूमन डेवलपेंट ड्राफ्ट रिपोर्ट में इसका उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार अनुसूचित जाति और जनजाति की तादाद 33 प्रतिशत है। बिहार में गरीब और जातियों से संबंधित आंकडे़ एनएसएसओ के 50वें और 61वें राउंड (1993-94 और 2004-05) के हैं। बीपीएल आबादी में अन्य का अनुपात 3.6 प्रतिशत है।

मुसलमानों में दो श्रेणियां की गई हैं। मुसलमानों में एक श्रेणी में 9.9 प्रतिशत तथा दूसरी श्रेणी में 4.5 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा से नीचे है। मुसलमानों की कुल आबादी में 14.4 प्रतिशत गरीबी रेखा से नीचे है वहीं, हिन्दुओं में 85.5 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा से नीचे है। इस प्रकार सूबे में सामाजिक समूहों की निर्धनता का जहां तक सवाल है, रिपोर्ट के अनुसार कुल बीपीएल आबादी में एक तिहाई जनसंख्या निर्धनतम सीमांत वर्गों की है। मुसलमानों में यह असंतुलन हिंदुओं की बनिस्बत कहीं ज्यादा है। एक बात और। हिन्दू जातियों में ग्रामीण निर्धनता का प्रतिशत वर्ष 1993-94 की तुलना में 82.2 से बढ़ कर 2004-05 में 85.5 हो गया। बिहार में गरीबी राष्ट्रीय औसत की तुलना में काफी अधिक है। बिहार में ग्रामीण गरीबी 2004-05 में 55.7 प्रतिशत थी, जबकि देश का औसत 41.8 प्रतिशत था। शहरी गरीबी बिहार में 43.7 प्रतिशत थी, जबकि राष्ट्रीय औसत 25.7 थी। बिहार की कुल जनसंख्या में गरीबी का अनुपात 54.4 था, जबकि राष्ट्रीय औसत 37.2 प्रतिशत था। (आर्थिक सर्वेक्षण, बिहार सरकार 2010-11 पेज 234) मोंटेक सिंह अहलूवालिया के अनुसार बिहार में गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों की अनुमानित संख्या 2009-10 में बढ़ कर 54.8 प्रतिशत हो गई (ईपीडल्यू 21 मई 2011, पेज 89)।

बिहार में ग्रामीण गरीबी का प्रतिशत 2400 कैलोरी पर 79.5 प्रतिशत होता है (डी.एम.दिवाकराढ़ती, खेतिहर चुनौतियां, तलाश, 1 नवंबर, 2010 पेज 8)।

अमर्त्य सेन कहते हैं कि विषमता सामाजिक तनाव का कारण बन सकती है-ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, संयुक्त राज्य अमेरिका और भारत के बिहार प्रांत में हिंसा के बहुत ऊंचे स्तर का यह एक कारण है कि सभी क्षेत्रों में विषमता की पैठ बनी हुई है (आर्थिक विकास की दिशाएं, पेज 91)।




(तसवीर बड़ी करके देखने के लिए उस पर क्लिक करें)
ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2008 के अनुसार बिहार 74वें नंबर पर था। बिहार माली से ऊपर और पड़ोसी राज्य झारखंड दक्षिण अफ्रीकी गणराज्य के नीचे 78वें नंबर पर था (ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2008 ,पेज 11)। इंडिया क्रॉनिक पावर्टी रिपोर्ट के अनुसार बिहार सहित बीमारू कहे जाने वाले राज्यों में निम्न आर्थिक विकास के कारण गरीबी की दर ऊंची है (इंडिया क्रॉनिक पावर्टी रिपोर्ट 2011, पेज 136)।

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच

बीच सफ़हे की लड़ाई

गरीब वह है, जो हमेशा से संघर्ष करता आ रहा है. जिन्हें आतंकवादी कहा जा रहा है. संघर्ष के अंत में ऐसी स्थिति बन गई कि किसी को हथियार उठाना पड़ा. लेकिन हमने पूरी स्थिति को नजरअंदाज करते हुए इस स्थिति को उलझा दिया और सीधे आतंकवाद का मुद्दा सामने खड़ा कर दिया. ये जो पूरी प्रक्रिया है, उन्हें हाशिये पर डाल देने की, उसे भूल गये और सीधा आतंकवाद, ‘वो बनाम हम ’ की प्रक्रिया को सामने खड़ा कर दिया गया. ये जो पूरी प्रक्रिया है, उसे हमें समझना होगा. इस देश में जो आंदोलन थे, जो अहिंसक आंदोलन थे, उनकी क्या हालत हमने बना कर रखी है ? हमने ऐसे आंदोलन को मजाक बना कर रख दिया है. इसीलिए तो लोगों ने हथियार उठाया है न?

अरुंधति राय से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत.

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कॉरपोरेट जगत के हित में देश की आम जनता के संहार की योजना रोकें

हम महसूस करते हैं कि यह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक विध्वंसक कदम होगा, यदि सरकार ने अपने लोगों को, बजाय उनके शिकायतों को निबटाने के उनका सैन्य रूप से दमन करने की कोशिश की. ऐसे किसी अभियान की अल्पकालिक सफलता तक पर संदेह है, लेकिन आम जनता की भयानक दुर्गति में कोई संदेह नहीं है, जैसा कि दुनिया में अनगिनत विद्रोह आंदोलनों के मामलों में देखा गया है. हमारा भारत सरकार से कहना है कि वह तत्काल सशस्त्र बलों को वापस बुलाये और ऐसे किसी भी सैन्य हमले की योजनाओं को रोके, जो गृहयुद्ध में बदल जा सकते हैं और जो भारतीय आबादी के निर्धनतम और सर्वाधिक कमजोर हिस्से को व्यापक तौर पर क्रूर विपदा में धकेल देगा तथा उनके संसाधनों की कॉरपोरेशनों द्वारा लूट का रास्ता साफ कर देगा. इसलिए सभी जनवादी लोगों से हम आह्वान करते हैं कि वे हमारे साथ जुड़ें और इस अपील में शामिल हों.
-अरुंधति रॉय, नोम चोम्स्की, आनंद पटवर्धन, मीरा नायर, सुमित सरकार, डीएन झा, सुभाष गाताडे, प्रशांत भूषण, गौतम नवलखा, हावर्ड जिन व अन्य

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