हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

राज्य, बुद्धिजीवी और हमारे कार्यभार

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/08/2012 06:57:00 PM

आनंद स्वरूप वर्मा का यह लेख एक ऐसे देश में बुद्धिजीवियों के सामने मौजूद जिम्मेदारियों, दायित्वों, जनता की तरफ से उसके जिम्मे आए कार्यों की पड़ताल करता है, जहां साम्राज्यवाद के भयंकर शोषण के आधार के रूप में सामंतवाद बरकरार हो. अर्धसामंती-अर्धऔपनिवेशिक समाज व्यवस्थाओं में बुद्धिजीवियों की भूमिकाओं पर बात करते हुए वे इसी से मिलते-जुलते दूसरे समाजों के बुद्धिजीवियों की भूमिकाओं के साथ भारत के और खास कर हिंदी के बुद्धिजीवियों की तुलना करते हैं और पाते हैं कि यहां स्थिति बेहद निराशाजनक है. एक तरफ यहां की सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था भीषण शोषण और उत्पीड़न को दिनोदिन तेज कर रही है तो दूसरी तरफ इस शोषण से मुक्ति के लिए संघर्षरत तबकों- दलित, आदिवासी, किसान, मजदूर, महिलाओं, मुसलिम अल्पसंख्यक और उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं- पर फौजी हमले भी तेज किए जा रहे हैं. लेकिन हिंदी का बुद्धिजीवी चुप है. वह पुरस्कारों और पदों को पाकर संतुष्ट है और आनेवाली नई सुबह की हवाई कल्पनाओं में मगन है. इधर ऐसे बुद्धिजीवियों की एक दूसरी फसल भी भरपूर हुई है, जिनके लिए साम्राज्यवाद के पक्ष में हो रहे हर बदलाव को ‘लोकतंत्रीकरण’ के रूप में प्रचारित कर रही है. ऐसे में वर्मा दिखाते हैं कि समाज को बदलनेवाले जुझारू संघर्षों के साथ जुड़ कर ही बुद्धिजीवी अपने को प्रासंगिक और जनता में लोकप्रिय बनाए रख सकते हैं. वरना वे एक दूसरे को कालजयी घोषित करते रहेंगे और जनता के संर्घषों से निर्धारित हो रहा काल उनको निगलता रहेगा. यह लेख समकालीन देशज में प्रकाशित हुआ है.

हमारे समय के एक महत्वपूर्ण विचारक एडवर्ड सईद का मानना है कि एक बुद्धिजीवी की भूमिका जड़ता को तोड़ने, सवाल उठाने तथा ऐसी बातें कहने की होती है जिसे दूसरे लोग नहीं कहेंगे। जो स्थितियां हैं जानी समझी जिनके साथ तालमेल बैठाकर हममें से ज्यादातर लोग जीते हैं उनके आगे जाने की हिम्मत बुद्धिजीवी दिखाते हैं। अपनी इस धरणा को थोड़ा और विस्तार देते हुए उन्होंने एक बुद्धिजीवी से यह अपेक्षा की है कि वह यथास्थिति पर प्रश्न उठाए, सत्ता को चुनौती दे, खबरों की, सरकारी रिपोर्टों की तह तक पहुंचने की कोशिश करे, विद्वता और ज्ञान के रूप में जो प्रदान किया जा रहा है उसकी सतह के नीचे तक पहुंचने का प्रयास करे। एडवर्ड सईद ने बुद्धिजीवी की भूमिका पर 1998 में एक भाषण दिया था और वह दौर ईराक युद्ध का दौर था। उस समय की स्थिति को ध्यान में रखते हुए उन्होंने अपने भाषण में कहा कि ऐसे माहौल में, जब मीडिया तक पर युद्धोन्माद छाया हो और कहा जा रहा हो कि हमें युद्ध करना है, हमें सच्चाई के लिए लड़ना है, बुद्धिजीवी की भूमिका यह होनी चाहिए-भले ही इसे निभाना बहुत मुश्किल हो- कि आप लोगों को याद दिलाएं कि दुनिया में कई दूसरे स्थान ऐसे भी हैं जहां पिछले 30 वर्षों से दूसरे की जमीन पर नाजायज कब्जा बरकरार है जैसा कि इस्राइल ने पिफलीस्तीन, सीरिया, जार्डन, लेबनान, मिस्र की भूमि पर कब्जा कर रखा है। क्या इस नाजायज कब्जे को लेकर अमेरिका ने इस्राइल से युद्ध किया?

तीसरी दुनिया के देशों और खास तौर पर भारत के संदर्भ में जब हम बुद्धिजीवी की भूमिका पर विचार करते हैं तो हमें एक ऐसी विशिष्ट स्थिति से गुजरना पड़ता है जिसका एहसास पश्चिमी देशों के बुद्धिजीवियों को कभी नहीं हो सकता। तीसरी दुनिया के अधिकांश देश, जिनमें एशिया, अफ्रीका और लातिन अमेरिका के देश शामिल हैं, सैकड़ों वर्षों तक किसी न किसी साम्राज्यवादी देश के अधीन रहे हैं। इस अधीनता ने उनके अंदर जो औपनिवेशिक मानसिकता पैदा की उसकी वजह से उनके बौद्धिक कर्म में ढेर सारी रुकावटें दिखाई देती हैं। उनका एक खास तरह का माइंडसेट है जिससे जो नजरिया पैदा होता है वह उन्हीं लोगों के लिए ज्यादा उपयोगी है जिन्होंने शासन के मामले में पूर्व उपनिवेशवादियों का स्थान लिया। ध्यान देने की बात है कि आम तौर पर इन देशों में कोई ऐसी क्रांति नहीं हुई जिसने सामाजिक संरचना में आमूल परिवर्तन कर दिया हो। सामाजिक संरचना पहले जैसी ही रही और उपनिवेशवादी शासकों ने अपने दूरगामी हितों को देखते हुए सत्ता का हस्तांतरण किया। जाहिर है कि सत्ता का यह हस्तांतरण एक अभिजात वर्ग को किया गया जिसे पहले से ही उपनिवेशवादियों ने ऊपरी स्तर पर न सही पर मानसिक तौर पर अपने अनुकूल ढाल लिया था। यह स्थिति हमने पुर्तगाल शासित अफ्रीकी देशों अंगोला, मोजांबीक और गिनी बिसाउ तथा ब्रिटेन शासित केन्या, नाइजीरिया, उगांडा आदि देशों में देखा। केन्या के संदर्भ में अगर आप गौर करेंगे तो पाएंगे कि माऊ-माऊ आंदोलन नाम से विख्यात सामंतवाद विरोधी किसान आंदोलन में जिन लोगों ने शहादत दी उनके परिवार और इस संघर्ष में लगे गांव के गांव तथाकथित आजादी के बाद पूरी तरह उपेक्षित और प्रताड़ित रहे जबकि ब्रिटिश शासकों की दलाली करने वाले सामंतों के परिवार सत्ता का सुख भोगने लगे। पुर्तगाल शासित उपनिवेशों में एक सजग बुद्धिजीवी की भूमिका जहां अमिल्कर कबराल जैसे लोगों ने निभायी वहीं केन्या और नाइजीरिया के हालात की तस्वीर हम न्गुगी वा थ्योंगो और चीनुआ एचेबे या वोले सोइंका जैसे लेखकों-बुद्धिजीवियों की रचनाओं में देख सकते हैं।

हमारे देश भारत के बुद्धिजीवियों को सबसे पहले यह समझने की जरूरत है कि उनके देश की स्थितियां अमेरिका और योरोप से नहीं बल्कि एशिया, अफ्रीका और लातिन अमेरिका के देशों से मिलती-जुलती हैं। मीडिया हो या संस्कृति का कोई भी क्षेत्र, हमारे अंदर पश्चिमी देशों की जीवन पद्धति को अपनाने की एक ललक दिखाई देती है। इसकी खास वजह यह है कि हमने औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त होने का कभी सचेत प्रयास नहीं किया। अर्थात डीकोलोनाइजेशन ऑफ माइंड पर हमने कभी जोर नहीं दिया। भारत के बुद्धिजीवियों की यह एक प्रमुख समस्या है। हमारे यहां औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति का क्रम नहीं चला-यह तो एक अलग बात है लेकिन उल्टे 1990 के बाद भूमंडलीकरण के साथ ही हमारा पुनर्निवेशीकरण यानी ‘रीकोलोनाइजेशन’ भी शुरू हो गया। इसी वजह से हम उन समस्याओं को नहीं देख सके जो राज्य की मौजूदा संरचना के कारण पैदा हुईं और जिसे हम ठेठ भारतीय समस्या कह सकते हैं। मसलन विकसित देशों में जनतंत्रा को स्थापित हुए 200 से ज्यादा वर्ष हो रहे हैं जबकि भारत में इसे मात्र 60 वर्ष हुए हैं। राज्य के स्तर पर भ्रष्टाचार से लेकर दमन के स्वरूप तक में जो अंतर है वह भारत में बहुत ज्यादा है। भारत जैसे बहुभाषी, बहुधार्मिक और अतुलनीय विविधता वाले देश की समस्याएं निश्चित तौर पर पश्चिमी देशों की समस्याओं से भिन्न होंगी तो भी हम अपनी इस मानसिकता के कारण लगातार पश्चिमोन्मुखी बने रहते हैं। इस पर हमारे बुद्धिजीवियों को गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है।
हमारे देश में सत्ता का दमनकारी चरित्र दिनों-दिन गहरा होता जा रहा है। आजादी के शुरुआती वर्षों में जिसे हम सुविधा के लिए नेहरू युग कह सकते हैं, हमारे शासकों का घोषित उद्देश्य एक कल्याणकारी राज्य की स्थापना करना था। कल्याणकारी राज्य से तात्पर्य एक ऐसे राज्य से था जो अपनी संरचना में समाजवादी न होते हुए भी समाज के दबे-कुचले लोगों के लिए जीवन की मूलभूत सुविधएं शिक्षा, चिकित्सा, आवास, भोजन आदि मुहैया करा सके। एक गरीब व्यक्ति को अगर इलाज की जरूरत है तो वह सरकारी अस्पताल से निःशुल्क अथवा नाममात्र का पैसा खर्च कर इलाज करा सके। इसी तरह शिक्षा, यातायात आदि के मामले में भी सरकार से यही अपेक्षा की जाती थी। इन सेवाओं को लाभ-हानि के आधर पर नहीं तौला जा सकता। इसका सारा खर्च सरकार वहन करती। शुरुआती वर्षों में एक हद तक ऐसा ही हुआ भी। हमने मिश्रित अर्थव्यवस्था की नीति अपनायी जिसमें निजी क्षेत्र और सरकारी क्षेत्र दोनों को फलने-फूलने का मौका दिया गया। कब और किस तरह निजी क्षेत्र ने सरकारी क्षेत्रा को निगल लिया यह हम समझ नहीं सके। यहां मैं अफ्रीकी देश घना के प्रखर बुद्धिजीवी और वहां के प्रथम राष्ट्रपति क्वामे न्क्रूमा को उद्धृत करना चाहूंगा जिन्होंने बुद्धिजीवयों का बहुत शानदार वर्गीकरण किया था उनका कहना था कि औपनिवेशिक शासन के बुद्धिजीवी मोटे तौर पर तीन प्रमुख श्रेणियों में बांटे जा सकते हैं-पहली श्रेणी उनकी होती है जो साम्राज्यवाद और नवउपनिवेशवाद का खुला समर्थन करने वाले बुर्जुआ वर्गों का साथ देते हैं। ये लोग समाजवाद एवं साम्यवाद की विचारधरा के विरोधी होते हैं। दूसरी श्रेणी उन बुद्धिजीवियों की है जो समाजवाद की मंजिल तक पहुंचने के लिए प्रथम चरण के रूप में दुनिया के कम और औद्योगीकृत देशों में मिश्रित अर्थव्यवस्था के गैर पूंजीवादी रास्ते की हिमायत करते हैं। आजादी के बाद बुद्धिजीवियों की जो तीसरी श्रेणी आयी वह है क्रांतिकारी बुद्धिजीवियों की श्रेणी। ये लोग मजदूर किसान संघर्षों को सीधे-सीधे समाजवाद के लक्ष्य की दिशा में अग्रसर होने की प्रेरणा तो देते ही हैं उनका नेतृत्व भी करते हैं। जिन दिनों मिश्रित अर्थव्यवस्था को अपनाने की प्रक्रिया चल रही थी हमारे बुद्धिजीवियों का कर्तव्य था कि वे सतह के नीचे चल रही इन साजिशों को जनता के सामने लाते और इनके खिलाफ आंदोलन का एक बौद्धिक आधर तैयार करते जिसे वे नहीं निभा सके। न्क्रूमा ने अपने देश के संदर्भ में मिश्रित अर्थव्यवस्था का जिक्र करते हुए कहा था कि ‘यह अवधारणा अफ्रीका में समाजवादी क्रांति के लिए स्पष्टतः पूंजीवादी विकास की अवधारणा से भी अधिक खतरनाक हो सकती है क्योंकि इससे समाजवादी विकास का भ्रम होता है। दरअसल यह क्रांतिकारी प्रक्रिया में अवरोधक साबित होगा। यह गैर पूंजीवादी चरण यदि अत्यंत अस्थायी नहीं हुआ तो अंततः यह समाजवादी विकास के रास्ते को अवरुद्ध ही करता है। समाजवाद के प्रति प्रतिबद्ध राजनीति में पूंजीवाद और निजी स्वामित्व को इजाजत देने का अर्थ सत्ता पर प्रतिक्रियावादी वर्चस्व की भूमिका तैयार करना है।’ जवाहरलाल नेहरु ने मिश्रित अर्थव्यवस्था की नीति अपनाई और हमने देखा कि किस तरह हम समाजवादी विकास के रास्ते से लगातार दूर होते गए। मुझे नहीं लगता कि हमारे किसी बुद्धिजीवी ने उन दिनों इस मुद्दे पर किसी आंदोलन का सूत्रापात किया। हमसे 13 साल बाद आजाद हुए घना के एक बुद्धिजीवी को यह बात समझ में आ गयी लेकिन हम इसे क्यों नहीं समझ सके? नतीजा यह हुआ कि हम निरंतर पूंजीवाद के रास्ते पर ही बढ़ते चले गए।

नवउदारवादी आर्थिक नीतियों ने निजीकरण की इस प्रक्रिया को पूरा कर दिया और अचानक हमने देखा कि राज्य अपनी 80 प्रतिशत आबादी से विमुख हो गया। वह केवल 15-20 प्रतिशत लोगों के लिए जवाबदेह बना रहा। यही वजह है कि आज जो संसद है, जिसमें जनता के निर्वाचित प्रतिनिधि बैठकर जनता के लिए कानून बनाते हैं, उनमें करोड़पति सांसदों की संख्या लगभग दो-तिहाई हो गयी है। मौजूदा 15वीं लोकसभा में 300 से भी ज्यादा सांसद ऐसे हैं जिनकी घोषित परिसंपत्ति एक करोड़ रुपए से ज्यादा है। इससे पहले 14वीं लोकसभा में ऐसे सांसदों की संख्या 154 थी। संसद में इतनी बड़ी संख्या में धनकुबेरों की मौजूदगी से जाहिर हो जाता है कि बुर्जुआ लोकतंत्र की इस प्रमुख संस्था पर पूंजी का कितना दबदबा है और किस तरह इसने देश को एक पूंजीवादी गणराज्य का रूप दे दिया है। गौर करने वाली बात है कि हर चुनाव के बाद ‘जनतंत्र’ के गले में पूंजी का फंदा कसता चला गया। इनके पास जो अपार संपत्ति है उसका उपयोग इन्होंने मीडिया के जरिए अपने पक्ष में जनमत तैयार करने के लिए किया है। जिस संसद में 543 सदस्यों में से तकरीबन 350 करोड़पति होंगे उससे यह कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वह गरीबों के हित में कोई कानून बनाएगी। यह ऐसे देश की संसद का हाल है जहां खुद सरकारी आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार तकरीबन 80 प्रतिशत लोग 20 रुपए प्रतिदिन की आय पर जिन्दगी गुजारने के लिए मजबूर हैं। यह स्थिति पश्चिमी देशों से सर्वथा भिन्न है और यही वह स्थिति है जिसमें हम पश्चिमी देशों के मुकाबले भारत के बुद्धिजीवियों की सर्वथा भिन्न भूमिका देखते हैं।

जैसा कि मैंने शुरू में ही एडवर्ड सईद के हवाले से कहा था कि बुद्धिजीवी के अंदर वह साहस होना चाहिए कि सत्ता की खामियों की ओर खुलकर उंगली उठा सके। मेरी निगाह में इस तरह की भूमिका निभाने वाले बुद्धिजीवियों को भी दो श्रेणी में बांटा जा सकता है-निष्क्रिय बुद्धिजीवी और सक्रिय बुद्धिजीवी। पहली श्रेणी में वे बुद्धिजीवी आते हैं जो सरकार की नीतियों की खुल कर चीर-फाड़ करते हैं और इसके लिए विभिन्न प्रकाशनों, समाचार माध्यमों का सहारा लेते हैं। वे अपने को बस इसी भूमिका तक सीमित रखते हैं। दूसरी श्रेणी के बुद्धिजीवी वे हैं जो पहली श्रेणी के बुद्धिजीवियों का दायित्व निभाते हुए समाज में बदलाव लाने वाली शक्तियों के साथ किसी न किसी रूप में खुद को जोड़ने का प्रयास करते हैं ताकि उनके विश्लेषण की धार और भी ज्यादा पैनी तथा असरदार हो। इन दोनों श्रेणी के बुद्धिजीवियों के लिए जरूरी है कि वे अपने को सत्ता से दूर रखें। यह एक कठिन काम है क्योंकि सत्ता ऐसे लोगों को और खास तौर पर ‘निष्क्रिय बुद्धिजीवियों’ को किसी न किसी तरह अपने में समाहित (कोऑप्ट) करने का प्रयास करती है। ऐसा हमने भारत के आधुनिक इतिहास में कई मौकों पर देखा है।

भारतीय बुद्धिजीवियों के सामने एक और भी बड़ी समस्या संस्कृति से संबंधित है। हमने संस्कृति के सवाल को हमेशा अधिरचना यानी सुपरस्ट्रक्चर से जुड़ा सवाल माना और यह सोच कर निश्चिंत बने रहे कि जब समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन होगा तो यह सवाल अपने आप हल हो जाएगा। हम यह भूल गए कि संस्कृति का सवाल हमारे उस संघर्ष से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है जिस संघर्ष के निशाने पर सामाजिक बदलाव प्रमुख एजेंडा है। यही वजह है कि भाषा के मुद्दे पर बातचीत करने से हम कतराते रहे और आप खुद देखें कि पिछले 25 वर्षों में किस तरह अंग्रेजी ने तमाम भारतीय भाषाओं को एक दोयम दर्जे की भाषा का रूप दे दिया। औपनिवेशिक मानसिकता से ग्रस्त हमारे बुद्धिजीवी भी यह मान बैठे कि भाषा कोई भी हो वह हमें ज्ञान प्रदान करती है। वे यह भूल गए कि हर भाषा एक संस्कृति की वाहक होती है। जिस भी देश में साम्राज्यवाद ने अपने को टिकाना चाहा उसने युद्ध के मैदान से फुर्सत पाने के बाद सबसे पहले भाषा और शिक्षा पर ध्यान दिया। एक अफ्रीकी लेखक ने अपने एक लेख में कहा भी था कि अफ्रीका के बंटवारे के लिए चले युद्ध के फलस्वरूप जो बर्लिन समझौता हुआ उसके बाद इन देशों में तोपों और गोलों का स्थान ब्लैकबोर्ड और चॉक ने ले लिया। जब हम यानी सजग बुद्धिजीवी इन मुद्दों को छोड़ देंगे तो जाहिर है कि इन्हें समाज की प्रतिगामी शक्तियां अपना प्रमुख एजेंडा बना लेंगी और भारत में यही हुआ। गिनी बिसाउ के बुद्धिजीवी अमिल्कर कबराल ने राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन में संस्कृति की भूमिका को रेखांकित करते हुए बताया था कि जिस तरह साम्राज्यवादी शासन को अपने को टिकाए रखने के लिए जरूरी है कि वह सांस्कृतिक उत्पीड़न करे उसी तरह राष्ट्रीय मुक्ति के काम में लगे लोगों के लिए भी जरूरी है कि वे मुक्ति आंदोलन को एक सांस्कृतिक कर्म समझें। उनका कहना था कि ‘राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन संघर्ष कर रही जनता की संस्कृति की संगठित राजनीतिक अभिव्यक्ति है।’ राम जन्मभूमि विवाद से लेकर सांप्रदायिकता और अंधविश्वास के लगातार फैलने के पीछे संस्कृति जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे पर सजग बुद्धिजीवियों की उपेक्षा को मैं प्रमुख कारण मानता हूं। इस पर कभी विस्तार से बात की जा सकती है लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि इस वजह से यानी संस्कृति के सवाल पर हमारी उपेक्षा की वजह से बहुत सारे मसले पैदा हुए हैं।

भारत की विभिन्न भाषाओं के मुकाबले हिन्दी में जो बौद्धिक दरिद्रता है उसे देखकर हैरानी होती है। पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल, महाराष्ट्र जैसे राज्यों में जनसंघर्षों के साथ-साथ जनता के लेखकों-कवियों की संख्या बढ़ती गयी और समाज में उनका हस्तक्षेप भी समय-समय पर दिखाई देता रहा। हिन्दी में ऐसी स्थिति नहीं रही। हो सकता है कि इसके मूल में समूचे उत्तर भारत में सदियों से किसी सामाजिक आंदोलन का न होना हो। मैंने शुरू में ही कहा था कि बहुत सारे मामलों में हमारी समानता तीसरी दुनिया के देशों और खास तौर पर एशिया तथा अफ्रीका के देशों से है न कि यूरोप से। अफ्रीकी देशों में राजनीतिक और सांस्कृतिक दृष्टि से नाइजीरिया एक ऐसा देश है जिसकी बहुत सारी बातों को जानना हमारे लिए जरूरी है। भारत और नाइजीरिया दोनों ब्रिटेन के उपनिवेश थे और दोनों अभी भी औपनिवेशिक मानसिकता से ग्रस्त हैं। भारत आबादी की दृष्टि से बहुत बड़ा देश है और नाइजीरिया भी अफ्रीका का सबसे ज्यादा आबादी वाला देश है हालांकि इसकी आबादी साढ़े बारह करोड़ है जो भारत के मुकाबले बहुत ही कम है। भारत में विभिन्न धर्मों के लोग रहते हैं और यहां सांप्रदायिकता के कारण एक तनाव की स्थिति पैदा हो जाती है। नाइजीरिया में विभिन्न जातीय समूह के लोग हैं और यहां भी इन जातीय समूहों के कारण एक खास तरह की सांप्रदायिकता है जो समाज को बांटने का काम करती है और विकास की गति में बाधा पहुंचाती है। भारत में 1947 के बाद जनतांत्रिक व्यवस्था की शुरुआत हुई जो यद्यपि अभी बरकरार है पर यहां की राजनीति में आपराधिक तत्वों के बड़े पैमाने पर प्रवेश के कारण राजनीति का अपराधीकरण होता जा रहा है। नाइजीरिया में भी 1960 में आजादी मिली लेकिन 1966 में पहली सैनिक क्रांति के बाद सैनिक क्रांतियों का सिलसिला जारी रहा। 1966 से 1999 तक के 33 वर्षों में लगभग 24 वर्ष देश सैनिक तानाशाही के अंतर्गत रहा। इसका नतीजा यह हुआ कि यद्यपि वहां आज औपचारिक तौर पर जनतांत्रिक व्यवस्था है लेकिन वहां राजनीति का पूरी तरह सैनिकीकरण हो चुका है जो जनतंत्र के मार्ग में बहुत बड़ी रुकावट है। यहां प्रायः सेना के अवकाश प्राप्त जनरल अपने राजनीतिक दल बनाकर चुनाव लड़ते हैं और सत्ता पर काबिज रहते हैं। भारत में अनेक भाषाएं हैं और इन भाषाओं के विकास में अंग्रेजी का वर्चस्व बहुत बड़ा बाधक है। नाइजीरिया में भी विभिन्न भाषाएं हैं लेकिन वहां की देशज भाषाओं की लगभग हत्या करते हुए अंग्रेजी ने अपना वर्चस्व कायम कर लिया है। दोनों देश कृषि प्रधान हैं और हमारे यहां के जनजीवन तथा लोकजीवन में प्रचलित मुहावरे और मिथक नाइजीरियाई समाज के मुहावरों और प्रतीकों से काफी हद तक मिलते-जुलते हैं जो कि तीसरी दुनिया के देशों की एक खास विशिष्टता है।

इन समानताओं को ध्यान में रखते हुए जब मैं नाइजीरिया की पुरानी और नयी पीढ़ी के लेखकों से हिन्दी के लेखकों की तुलना करता हूं तो आश्चर्य होता है कि हमारा हिन्दी का बुद्धिजीवी इस कदर पिछड़ेपन का शिकार क्यों है। 2004 में मैं कुछ महीनों के लिए नाइजीरिया गया था और वहां जनता के बीच लेखकों के सम्मान को देखकर मैं हैरान रह गया। जिन दिनों मैं वहां था उन्हीं दिनों नोबेल पुरस्कार विजेता वोले सोयिंका की पुस्तक ‘क्लाइमेट ऑफ फीयर’ (भय का माहौल) रिलीज हुई जो एक बड़ी घटना थी। यह बीबीसी से प्रसारित उनकी एक व्याख्यानमाला का संकलन है जिसमें उन्होंने भय के विविध रूपों और पहलुओं पर प्रकाश डाला है। यह भय ओसामा बिन लादेन और जॉर्ज डब्ल्यू बुश से लेकर रेडिकल और कट्टरपंथी दोनों विचारधाराओं के प्रवर्तकों द्वारा जनित है। पुस्तक बाजार में आते ही हाथों-हाथ बिक गयी और प्रकाशन द्वारा जगह-जगह ऐसे आयोजन किए गए जिनमें लेखक के हस्ताक्षर के साथ पाठक पुस्तक खरीद सकें। उन्हीं दिनों लेगोस में सोयिंका के बचपन से लेकर अब तक के दुर्लभ चित्रों की एक प्रदर्शन भी लोगों के आकर्षण का केन्द्र बनी रही। क्या सोयिंका की लोकप्रियता इसलिए थी कि वह नोबेल पुरस्कार विजेता हैं? क्या एक सेलेब्रेटी होने की वजह से लोगों की भीड़ उनके आस-पास जुट जाती है? पहली नजर में ऐसा लग सकता है। लेकिन वामपंथ विरोधी होने के बावजूद राजनेताओं के भ्रष्टाचार और उनकी गुंडागर्दी के खिलाफ पिछले लगभग 40 वर्षों से लेखन के ही जरिए नहीं बल्कि एक एक्टिविस्ट के रूप में भी देश की राजनीति में वह जिस तरह जुझारू हस्तक्षेप करते रहे हैं उसने उन्हें इतना लोकप्रिय बनाया है। (हमारे यहां भी अरुंधति राय को बुकर पुरस्कार मिलने के कारण नहीं बल्कि जन सरोकारों से जुड़े होने के कारण इतनी लोकप्रियता मिली है।) 1964 में वह पहली बार तब गिरफ्तार हुए थे जब इबादान के एक रेडियो स्टेशन में वह बंदूक लेकर घुस गए थे और चुनाव नतीजों से संबंधित सरकार प्रवर्तित झूठे समाचार को पढ़ रहे समाचार-वाचक से उन्होंने माइक छीन लिया था और अपनी बात कही थी। जिन दिनों देश के अंदर एक गृहयुद्ध चल रहा था उन्होंने इसका विरोध किया और फिर 27 महीने तक वह जेल में रहे। 1995-96 में तानाशाह सानी अबाचा के दमनकारी शासनतंत्र के खिलाफ सोयिंका ने बुद्धिजीवियों को संगठित किया और एक गुप्त रेडियो स्टेशन की स्थापना की। इस कारण उन्हें भूमिगत रहकर सरकारी नीतियों के खिलाफ जनता को जागृत करने का काम किया। कहने का अर्थ यह कि 1964 से लेकर 1996 के 30 वर्षों में उनकी प्रतिबद्धता में किसी तरह की कमी नहीं दिखाई दी। शायद यही वजह है जिसने उन्हें जनता में इतना लोकप्रिय बना दिया है। क्या हमारे पास हिन्दी में ऐसा कोई लेखक है? हमारे यहां कितने लेखक ऐसे हैं जिन्होंने सरकारी पुरस्कारों और सम्मानों को यह कहकर ठुकरा दिया हो कि दमनकारी सत्ता के हाथों वे कोई सम्मान नहीं लेंगे। नाइजीरिया के ही 75 वर्षीय उपन्यासकार चीनुआ एचेबे को नवंबर, 2004 में सरकार ने देश का सर्वोच्च सम्मान ‘कमांडर ऑफ दि फेडरेल रिपब्लिक’ देने की घोषणा की, जिसे एचेबे ने यह कहकर ठुकरा दिया कि सत्ता में बैठे लोगों ने देश की जो दुर्दशा कर रखी है उसे देखते हुए वह सरकार से कोई सम्मान नहीं ले सकते। पुरस्कार की सूचना मिलते ही उन्होंने राष्ट्रपति ओबसांजो के नाम एक पत्र में लिखा कि ‘पिछले कुछ समय से मैं बहुत हताशा और पीड़ा के साथ नाइजीरिया की हालत देख रहा हूं... खास तौर पर अपने राज्य अनाम्ब्रा को जहां मुट्ठी भर गुंडे सत्ता के साथ अपने संबंधों की दुहाई देते हुए कहर बरपा रहे हैं। मैं इन गुंडों की उद्दंडता से और राष्ट्रपति कार्यालय की खामोशी (अगर सहयोग नहीं तो भी) से हतप्रभ हूं... आपकी देख-रेख में नाइजीरिया की हालत आज इतनी खतरनाक हो गयी है कि अब खामोश नहीं रहा जा सकता... यह जो सर्वोच्च सम्मान मुझे दिया गया है उसे अस्वीकार कर मुझे अपनी हताशा और विरोध व्यक्त करना ही चाहिए।’

सामाजिक बदलाव के सवाल पर, क्रांति के सवाल पर, पूंजीवाद और समाजवाद के सवाल पर हिन्दी के किसी लेखक से अगर आप बात करें तो उसके अध्ययन की सीमा देखकर आम तौर पर निराशा ही होगी। वरिष्ठ साहित्यकारों में मैंने निर्विवाद रूप से डॉक्टर रामविलास शर्मा (स्वर्गीय) के विश्लेषण में यह पाया है कि साहित्य और संस्कृति के सवाल को उन्होंने प्रायः सामाजिक क्रांति के परिप्रेक्ष्य में रखकर देखा है। एक इंटरव्यू में उनसे जब पूछा गया कि भारत में क्रांति के संबंध में आपके क्या विचार हैं तो इसके जवाब में उन्होंने जो कुछ कहा उससे उनके सरोकारों का पता चलता है। उन्होंने कहा कि ‘इस बात का ध्यान रखें कि पूंजीवाद में पूंजीपतियों ने कभी भी पूरी जनवादी क्रांति नहीं की। उन्होंने हमेशा जमींदारों से समझौता किया है। लोगों में यह बहुत बड़ा भ्रम है कि भारत में पूंजीवाद दुर्बल रहा है, प्रतिक्रियावादी रहा है और देशों में पूंजीवादी क्रांति पूरी सामंत विरोधी रही है। यह बात बिल्कुल झूठ है। पश्चिमी देशों में, यहां तक कि फ्रांस में, सामंती अवशेष कभी खत्म नहीं हुए। लेनिन ने कहा कि हमने सामंती अवशेष का सफाया जिस ढंग से किया, पूरी तरह किया, कोई भी पूंजीपति वर्ग किसी भी देश में नहीं कर सका। ये बात हम ध्यान में रखें तो हिन्दुस्तान में जो क्रांति होगी वो पूंजीवादी क्रांति नहीं होगी, वो जनवादी क्रांति होगी। जनवादी क्रांति में नेतृत्व किसका होगा? मजदूर वर्ग के हाथ में होगा। क्यों होगा? इसलिए कि हम पूंजीपतियों को देख चुके हैं कि ये समझौते करते हैं। मुख्य सहयोगी कौन-कौन होगा? किसान होगा। किसान-मजदूर क्रांति की मुख्य शक्ति होंगे और नेतृत्व सर्वहारा का होगा तो पूंजीवाद का एक हिस्सा कट जाएगा। यह विशुद्ध समाजवादी क्रांति भले न हो लेकिन यह समाजवाद के लिए जमीन तैयार करने वाली क्रांति होगी। यानी नयी जनवादी क्रांति होगी। इस नयी जनवादी क्रांति को राष्ट्रीय जनवादी क्रांति कहें तो मुझे कोई आपत्ति नहीं, इसलिए कि राष्ट्र का ठेका पूंजीपतियों ने नहीं लिया। राष्ट्र की असली शक्ति हम हैं-किसान और मजदूर।’

नयी आर्थिक नीति के बाद से अर्थात 1990 के दशक से ही मजदूरों और किसानों की लगातार बदहाल हो रही स्थिति पर क्या देश के-खास तौर पर हिन्दी के बुद्धिजीवियों के अंदर किसी तरह की बेचैनी देखने को मिली? श्रम कानून में मजदूरों के पक्ष में जितने भी प्रावधन थे, भूमंडलीकरण की नीति अपनाए जाने के बाद एक-एक कर उनमें कटौती की जाने लगी और आज हालत यह है कि उन्हें कानूनी तौर पर नाममात्र की सुरक्षा प्राप्त है। दूसरा मोर्चा किसानों का है। इस मोर्चे पर नयी आर्थिक नीति ने जो कहर ढाया है उसकी तुलना नहीं की जा सकती। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में अगर 1995 से 2010 के अंत तक अर्थात 15 साल के अंदर ढाई लाख से अधिक किसान आत्महत्या करने पर मजबूर हों तो इसे आप क्या कहेंगे। क्या हमारे बुद्धिजीवियों ने कभी इसको अपना एजेंडा बनाया? यहां तक कि आम तौर पर साहित्य में भी इसकी कुछ खास अभिव्यक्ति नहीं देखने को मिली। मैंने इस लेख में ऊपर जिक्र किया था कि एशिया और अफ्रीका के जिन देशों में ब्रिटेन का उपनिवेशवाद था वहां की स्थितियों में कापफी समानता दिखायी देती है और इसीलिए जरूरी है कि हम इन देशों के बौद्धिक संसार से न केवल परिचय बढ़ाएं बल्कि उनको अच्छी तरह समझने की कोशिश करें। नाइजीरिया के कुछ साहित्यकारों से जब मेरी बातचीत हुई तो उनके अंदर यह जानने की उत्सुकता थी कि ब्रिटिश उपनिवेशवाद की समाप्ति के बाद भारत का शासनतंत्र किस तरह अपने यहां सैनिक तानाशाही को आने से रोक सका और जनतंत्र को बनाए रख सका। उनकी यह चिंता वाजिब थी क्योंकि सत्ता हस्तांतरण के बाद उनके देश में कुछ वर्षों के लिए ही जनतंत्र काम कर सका और उसके बाद सैनिक तानाशाही का दौर शुरू हो गया। केन्या भी ब्रिटिश उपनिवेश था लेकिन वहां उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष में किसानों और मजदूरों की महत्वपूर्ण भूमिका थी। केन्या का ‘माऊ-माऊ आंदोलन’ मूलतः किसान आंदोलन था। भारत में भी किसान आंदोलन की एक समृद्ध परंपरा रही है। हमारे बुद्धिजीवियों को इस बात का अध्ययन करना चाहिए कि अंग्रेजों के जाने के बाद भारत या केन्या में सैनिक शासन स्थापित नहीं हो सका लेकिन नाइजीरिया में यह बहुत आसानी से हो गया तो इसके पीछे कहीं किसान आंदोलन की मौजूदगी की भूमिका तो नहीं है। यहां ध्यान देने की बात है कि नाइजीरिया में कोई किसान आंदोलन नहीं विकसित हो सका था। इसे विषयांतर न समझा जाए क्योंकि मैं यह बताना चाहता हूं कि भाषा, संस्कृति और राष्ट्रीय अस्मिता के सवाल पर उन बुद्धिजीवियों में मुझे एक अदभुत साम्यता दिखायी देती है जिनकी चिंता के केन्द्र में किसान रहे हैं। केन्या के उपन्यासकार न्गुगी वा थ्योंगो के उपन्यास ‘पेटल्स ऑफ ब्लड’ पढ़ते समय हमें बार-बार दलाल बुर्जुआ की परोपजीविता के खिलाफ जमींदारों और कबीला सरदारों, विदेशी व्यापारिक हितों के साथ नापाक गठबंधन से बंधे अफ्रीका के बड़े घरानों के खिलाफ सर्वहारा तथा गरीब किसानों के संघर्ष को मजबूत बनाने की छटपटाहट दिखाई देती है। इसी उपन्यास का एक पात्र अब्दुल्ला एक नेता से बातचीत में कहता है-‘तुमने इस देश को राजनीतिक आजादी दिलाने के लिए संघर्ष किया-मैं इस देश की जनता को मुक्ति दिलाने के लिए काम करूंगा।’ चूंकि न्गुगी माऊ-माऊ आंदोलन से बहुत ज्यादा प्रभावित थे इसलिए उनकी अधिकांश रचनाओं के केन्द्र में किसान है। अगर ठेठ रूप में किसान न कहें तो कम से कम किसान क्रांति के प्रति एक चिंता तो है ही।
न्गुगी को पढ़ते समय हिन्दी पाठकों को निश्चय ही मुंशी प्रेमचंद याद आएंगे। प्रेमचंद के उपन्यास ‘प्रेमाश्रम’ तथा उनकी असंख्य कहानियों में किसानों के संघर्ष का चित्रण मिलता है और उनकी यह सोच बहुत स्पष्ट रूप से सामने आती है कि साम्राज्यवादी शक्तियों का आधर यहां की सामंती व्यवस्था है। वह यह भी मानते थे कि इस व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष करने वाली ताकतों की अगली पांत में किसान और मजदूर ही रहेंगे। डॉक्टर रामविलास शर्मा जब प्रेमचंद को ‘अद्वितीय उपन्यासकार’ कहते हैं तो इसलिए क्योंकि किसान को साहित्य में किसी ने इतने बड़े पैमाने पर प्रतिष्ठित नहीं किया। रामविलास जी का कहना है कि-टॉल्स्टाय एक बड़े कलाकार थे लेकिन उनके उपन्यासों में किसान पार्श्वभूमि के रूप में आता है। प्रेमचंद की एक बहुत बड़ी विशेषता है कि किसान को वह रंगमंच के केन्द्र में रखते हैं और यह बहुत कठिन काम है। मैं प्रेमचंद को हिन्दी का अब भी सबसे बड़ा उपन्यासकार मानता हूं और वे अपने ढंग के अद्वितीय उपन्यासकार हैं।’ अपने उपन्यास ‘प्रेमाश्रम’ में राय साहब कमलानंद से प्रेमचंद ने कहलवाया-‘‘यह जायदाद नहीं है, इसे रियासत कहना भूल है। यह निरी दलाली है। इस भूमि पर मेरा क्या अध्किार है। मैंने इसे बाहुबल से नहीं लिया। नवाबों के जमाने में किसी सूबेदार ने इलाके की आमदनी वसूल करने के लिए मेरे दादा को नियुक्त किया था। मेरे पिता पर भी नवाबों की बड़ी कृपा दृष्टि रही। इसके बाद अंग्रेजों का जमाना आया और यह अधिकार पिताजी के हाथ से निकल गया। लेकिन विद्रोह के समय पिताजी ने तन-मन से अंग्रेजों की सहायता की। शक्ति स्थापित होने पर हमें वही पुराना अधिकार मिल गया। यही इस रियासत की हकीकत है।’

राय साहब कमलानंद के इस संवाद को पढ़ते समय ‘पेटल्स ऑफ ब्लड’ के म्जीगो, चुई और किमेरिया जैसे जनविरोधी सामंती और पूंजीवादी चरित्रों की याद आ जाती है। न्गुगी का कहना है कि ‘अफ्रीका में आज बुनियादी तौर पर जिन दो परस्पर विरोधी शक्तियों के बीच संघर्ष है उनमें एक तरफ तो साम्राज्यवाद और पूंजीवाद है और दूसरी तरफ राष्ट्रीय मुक्ति और समाजवाद है। एक तरफ देशी रईसों का छोटा-सा समूह है जो अंतर्राष्ट्रीय महाजनी पूंजी के साथ बंध हुआ है और दूसरी तरफ आम जन समुदाय है।’ अब जरा इसी के बरक्स डॉक्टर रामविलास शर्मा के इस कथन पर गौर करें-‘भारत की जो परिस्थिति है उसमें मुख्य अंतर्विरोध साम्राज्यवाद और भारतीय जनता के बीच है। इसी के चौखटे में सारा सांस्कृतिक उहापोह मैं देखता हूं। साम्राज्यवाद का मुख्य आधर यहां का सामंतवाद है... आज के प्रगतिशील लेखक यह समझ लें कि साहित्य को प्रेमचंद जहां तक आगे ले गए, उसके आगे अगर हम ले जाते हैं तब तो प्रगतिशील हैं नहीं तो प्रेमचंद के पीछे हैं। ये ऐसी मानववादी धरा है जो सामंत विरोधी है। जो सामंतवाद से जितना ही ज्यादा समझौता नहीं करता है उसे मैं उतना ही बड़ा व्यक्तित्व मानता हूं।’

संक्षेप में कहें तो जिन लेखकों या संस्कृतिकर्मियों ने-वह चाहे प्रेमचंद हों या नागार्जुन, केन्या के न्गुगी वा थ्योंगो हों अथवा उगांडा के ओकोट पी बीटेक या सेनेगल के सेम्बेन ओस्मान-इन्होंने हमेशा जनआंदोलनों के साथ चलने की कोशिश की है अथवा कृषि आधरित अर्थव्यवस्था वाले देशों में किसानों और मजदूरों को अपनी रचना के केन्द्र में रखा है। यही वजह है कि उनके बीच भाषा, संस्कृति अथवा राष्ट्रीय अस्मिता जैसे विभिन्न सवालों पर एक समानता दिखायी पड़ती है। इस समानता का अन्वेषण हमारे बौद्धिक कर्म का एक प्रमुख हिस्सा होना चाहिए। भूमंडलीकरण ने अगर आर्थिक लुटेरों को विश्व स्तर पर एक मंच प्रदान किया है तो इस अवसर का लाभ तीसरी दुनिया के उत्पीडि़त देशों के बुद्धिजीवी क्यों नहीं उठाने की कोशिश कर रहे है। हमें इस पहलू पर भी गंभीरता के साथ विचार करना चाहिए क्योंकि यह भी हमारे बौद्धिक कर्म का एक महत्वपूर्ण एजेंडा होना चाहिए।
नाइजीरिया के प्रमुख बुद्धिजीवी, कवि और पर्यावरणविद् केन सारो वीवा को 10 नवंबर, 1995 को इसलिए फांसी पर लटका दिया गया क्योंकि उन्होंने अपने इलाके की जनता को बहुराष्ट्रीय तेल कंपनी ‘शेल’ के शोषण के खिलाफ संगठित किया। अदालत में दिए गए उनके बयान का यह अंश गौर करने लायक है जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘मी लॉर्ड, मैं उन लोगों में से नहीं हूं जो यह दलील देते हुए कि सैनिक सरकारें तो दमनकारी होती ही हैं, अन्याय और उत्पीड़न का विरोध करने से अपने को बचाता रहूं। कहीं भी सैनिक हुकूमत अकेले काम नहीं करती। उसे राजनीतिज्ञों, वकीलों, न्यायाधीशों, विद्वानों और व्यापारियों के एक गिरोह का समर्थन प्राप्त रहता है और यह गिरोह दावा करता है कि वह अपना कर्तव्य निभा रहा है। ये लोग पेशाब में तर-बतर पतलूनें पहने रहते हैं और धोने में डरते हैं। माई लॉर्ड, आज हम सभी कटघरे में खड़े हैं। हमने अपनी हरकतों से इस देश को दुर्दशा के कगार पर पहुंचा दिया है और इस देश के बच्चों का भविष्य तबाह कर दिया है।’

केन सारो वीवा ने यह बात सैनिक सरकारों के संदर्भ में कही थी लेकिन यह किसी भी दमनकारीतंत्र के लिए सही बैठती है। आप खुद देखिए कि अनेक अखबारों के संपादकों ने (जो वस्तुतः पत्रकार नहीं बल्कि सत्ता के दलाल हैं) किस तरह चिदंबरम का उस समय साथ दिया था जब वह छत्तीसगढ़ में माओवादी ठिकानों पर बम गिराने की योजना बना रहे थे। इन तथाकथित संपादकों को अच्छी तरह यह पता था कि यह योजना इसलिए तैयार की जा रही है ताकि टाटा, जिंदल, मित्तल, एस्सार, वेदांता आदि को आराम से वहां की खनिज संपदा लूटने की छूट मिल सके। उस समय निश्चय ही हमारे देश में बुद्धिजीवियों का एक तबका इस साजिश के खिलाफ मुखर हुआ था लेकिन सबसे बड़ी भाषा हिन्दी के बुद्धिजीवियों की सक्रियता नाम मात्र की थी।

हिन्दी के बुद्धिजीवियों की सक्रियता का एकमात्र उदाहरण 1992 में बाबरी मस्जिद के गिराए जाने के बाद देखने को मिला था जब दिल्ली से तकरीबन 85 लेखक, कवि, पत्रकार और संस्कृतिकर्मी एक संकल्प के साथ लखनऊ गए और उन्होंने लखनऊ की सड़कों पर इस फासीवादी हरकत के खिलाफ जुलूस निकाला और सभाएं कीं। जेपी आंदोलन के दिनों में पटना की सड़कों पर बाबा नागार्जुन और आलोकध्न्वा ने अपने गीतों से लोगों को जागरूक बनाया था लेकिन ऐसे उदाहरण बहुत कम देखने को मिलते हैं। गुजरात नरसंहार के समय भी बुद्धिजीवियों का एक तबका-जिसमें हिन्दी के बुद्धिजीवी भी शामिल थे-सक्रिय हुआ था लेकिन यह सक्रियता पानी में उठे बुलबुले की तरह क्षणभंगुर रही। जरूरत है इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की।

***

समग्र रूप से बुद्धिजीवियों की भूमिका पर चर्चा करते समय हम देखते हैं कि हमारे पास एक ऐसा भी उदाहरण है (जो संभवतः एकमात्र है) जहां बुद्धिजीवियों ने पहले सांस्कृतिक संगठनों की नींव रखी और उन्हीं सांस्कृतिक संगठनों का आगे चलकर मुक्ति आंदोलनों में विकास हुआ और इन आंदोलनों ने अपने-अपने देशों को औपनिवेशिक सत्ता से मुक्त कराया। मैं पुर्तगाल के तीन अफ्रीकी उपनिवेशों अंगोला, मोजाम्बीक और गिनी बिसाउ का जिक्र कर रहा हूं। दरअसल पुर्तगाली तानाशाह सालाजार के शासनकाल में दमन इतना तेज था कि राजनीतिक कार्यों की गुंजाइश ही खत्म हो गयी थी। 1948 में अंगोला के कुछ बुद्धिजीवियों ने एक संस्था बनायी-‘आओ अंगोला को ढूंढ़ें।’ (लेट अस डिस्कवर अंगोला) और 1951 के आस-पास एक आंदोलन विकसित हुआ-‘अंगोला के युवा बुद्धिजीवियों का आंदोलन।’ उन्हीं दिनों पुर्तगाल की राजधनी लिस्बन में पढ़ रहे अंगोला, मोजाम्बीक और गिनी बिसाउ के नौजवानों ने मिलकर एक साहित्यिक-सांस्कृतिक पत्रिका ‘मेसेज’ निकाली जिसमें अंगोलाई अस्मिता की चर्चा होती थी। यहीं अगोस्तीनो नेतो, मार्सेलिनो डॉस सेंतोस (अंगोला), एडुवॉर्डो मोंडालेन (मोजाम्बीक) और अमिल्कर कबराल (गिनी बिसाउ) की दोस्ती हुई। इन लोगों ने ही आगे चलकर अपने-अपने देशों के मुक्ति संगठनों-एमपीएलए (अंगोला जनमुक्ति आंदोलन), फ्रेलिमो (मोजाम्बीक मुक्ति मोर्चा) और पीएआईजीसी (गिनी बिसाउ और केप वर्डे की आजादी की पार्टी) की स्थापना की। इन आंदोलनों के स्थापित प्रवक्ताओं ने बार-बार संस्कृति के क्षेत्र में परिवर्तन की जरूरत को रेखांकित किया। इस संदर्भ में अमिल्कर कबराल ने मुक्ति और संस्कृति के सवालों पर अथवा मुक्ति आंदोलन में संस्कृति की भूमिका पर विस्तार के साथ जो कुछ लिखा है वह आज खास तौर से तीसरी दुनिया के देशों में रहने वाले बुद्धिजीवियों और संस्कृतिकर्मियों के लिए अत्यंत प्रासंगिक है। इस तरह की रचनाओं को प्रकाश में लाना भी हमारे एजेंडा का एक प्रमुख हिस्सा होना चाहिए।

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बांग्ला, तेलुगु, मलयालम सहित देश की विभिन्न भाषाओं में से उस साहित्य को अलग करना एक महत्वपूर्ण काम है जिनमें जनता के संघर्षों और नए समाज की उनकी आकांक्षाओं, अभिलाषाओं की अभिव्यक्ति हुई है। हमें एक ऐसा केन्द्र स्थापित करने पर ध्यान देना होगा जहां हम इस तरह का साहित्य और इस तरह के साहित्य को बढ़ावा देने वाले छोटे-बड़े संगठनों के बारे में जानकारी जुटा सकें। अनुवाद के माध्यम से एक-दूसरे तक इसको पहुंचाने और फिर अंग्रेजी अनुवाद के जरिए तीसरी दुनिया के देशों में सक्रिय समानधर्मी रचनाकारों के साथ संबंध विकसित करने का एक संयंत्र तैयार करना हमारे बौद्धिक कर्म का प्रमुख एजेंडा होना चाहिए।

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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