हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

साम्राज्यवाद के निशाने पर ईरान

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/06/2012 06:22:00 PM

सुभाष गाताड़े का यह आलेख ईरान पर बढ़ते मौजूदा साम्राज्यवादी हमले का एक लेखा-जोखा पेश करता है. हालांकि हाशिया का यह मानना है कि साम्राज्यवादी हमले के शिकार देशों के शासकों और उसकी जनता के बीच के विरोधों को अलग से रेखांकित करना और शासकों की आलोचना करना अंतत: साम्राज्यवाद को ही फायदा पहुंचाता है और औपनिवेशीकरण के क्लासिक दौर से लेकर आज तक साम्राज्यवादी बुद्धिजीवी साम्राज्यवाद के हमलों और औपनिवेशिक अभियानों को जायज ठहराने के लिए इस नीति का सहारा लेते आए हैं. इसलिए इस दौर में जरूरत ईरान के शासकों और जनता के साथ अटूट रूप से खड़े होने की है, न कि उनके बीच के कथित अंतर को बढ़ाने की.

अगर खतरनाक जनसंहारक हथियारों का सबसे बड़ा जखीरा अपने पास एकत्रित रखने वाला कोई मुल्क शेष दुनिया के मुल्कों के खिलाफ इसी बात पर कार्रवाई करने के लिए अड़ जाए कि उनके पास ऐसे हथियार नजर नहीं आने चाहिए और अगर ऐसा उसने किया तो उसे युद्ध के लिए तैयार रहना पड़ेगा, तो आप क्या कहेंगे? अमेरिका, जो फिलवक्त न केवल सबसे बड़ी नाभिकीय शक्ति है तथा जिसका नाम इतिहास में इस बात के लिए दर्ज है कि उसने इन हथियारों का प्रयोग किया और हिरोशिमा एवं नागासाकी की अवाम के लिए तबाही रच डाली थी, उसके द्वारा इस्राइल के जरिए मध्यपूर्व में जो कदम उठाए जा रहे हैं, वे इसी बात का संकेत दे रहे हैं। गौरतलब है कि इस बार अमेरिका के निशाने पर ईरान है, जो नाभिकीय ऊर्जा के विकास में कदम उठा रहा है और अमेरिका का दावा है कि वह नाभिकीय हथियार बनाने में लगा हुआ है। दुनिया में नाभिकीय हथियारों को लेकर व्याप्त दोहरे मापदंड की बात किसी से छिपी नहीं है। हिरोशिमा-नागासाकी में अमेरिका द्वारा प्रयुक्त नाभिकीय हथियारों के बाद के 65 साल से अधिक के अंतराल में रूस, ब्रिटेन, फ्रांस, चीन, भारत, पाकिस्तान, इस्राइल जैसे कुछ देशों द्वारा नाभिकीय हथियारों को विकसित किया गया है। यह भी स्पष्ट है कि इसके चलते इनमें से किसी भी मुल्क को बाहरी आक्रमण का सामना नहीं करना पड़ा। यहां तक कि मध्यपूर्व के अपने बेहद सहयोगी मुल्क इस्राइल को नाभिकीय कार्यक्रम को विकसित करने में अमेरिका ने आगे बढ़ कर मदद की और उसे नाभिकीय हथियारों से भी संपन्न बनाया, यहां तक कि इस्राइल ने आज तक नॉन प्रोलिफरेशन ट्रीटी अर्थात ऐसे हथियारों के विस्तार को रोकने के लिए अंतर्राष्ट्रीय समझौते पर हस्ताक्षर तक नहीं किए हैं।
 
ध्यान रहे कि अमेरिका के इन प्रयासों को पश्चिमी जगत का पूरा समर्थन हासिल है, जो सभी ईरान के नाभिकीय ऊर्जा कार्यक्रम को लेकर परेशान बताये जाते हैं। ईरान की हुकूमत को दी गयी अपनी ताजा धमकी में राष्ट्रपति ओबामा ने ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरून के साथ आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि ईरान की कथित नाभिकीय गतिविधियों के राजनयिक हल की संभावनाएं ‘सिमटती’ जा रही हैं। अभी ज्यादा दिन नहीं हुए जब उन्होंने ईरान के बहाने ‘सभी विकल्प खुले रखने’ की बात की थी, जिसमें युद्ध की संभावना से इनकार नहीं किया था। कुछ समय पहले इस्राइल के प्रधनमंत्री नेतनयाहू की अमेरिका की यात्रा के दौरान ओबामा द्वारा उन्हें इस मामले में ‘संयम बरतने’ की सलाह दी थी, जबकि इतिहास गवाह है कि मध्यपूर्व में कोई भी कदम उठाने के पहले इस्राइल अमेरिका से सलाह मशविरा करता है। अमेरिका के अंदर भी इस्राइल समर्थक एक सशक्त लॉबी विकसित हुई है, जो समय-समय पर अमेरिकी शासन पर दबाव डालने का काम करती रहती है। वहां सीनेटर जान मैकैन जैसे लोग भी हैं, जो न्यूयार्क टाइम्स के अपने आलेख (10 मार्च, 2012) में ईरान पर बमबारी की अपनी मांग के साथ एक दूसरी मांग भी जोड़ते दिख रहे हैं- सीरियाई विद्रोहियों एवं नागरिकों को बचाने के लिए सीरिया पर भी बमबारी हो। स्पष्ट है कि अमेरिका के मुख्यधारा के अखबारों की तरफ से भी जनमानस को युद्ध के लिए तैयार किया जा रहा है। मध्यपूर्व की विस्फोटक होती स्थिति दुनिया भर के अमनपसंद एवं इंसाफपसंद लोगों एवं ताकतों के सामने खड़ी चुनौतियों में इजाफा करती दिखती है क्योंकि हम यह पा रहे हैं कि अमेरिकी राजनय में इसी बहाने नया पन्ना खुलता दिख रहा है।
 
अपने एक महत्वपूर्ण आलेख ‘द जीरो परसेंट डॉक्ट्रिन’ में अमेरिकी पत्रकार एवं अमेरिका एम्पायर प्रोजेक्ट के सह-संस्थापक टॉम इंगलहार्ट ईरान प्रसंग के बहाने इस नये खेल की तरफ इशारा करते हैं। उनका मानना है कि अमेरिका की शह पर ईरान पर प्रस्तावित इस्राइली आक्रमण - जो हो सकता है कि महज बंदरघुड़की ही निकले- को रोकने के नाम पर राष्ट्रपति ओबामा ने किसी देशविशेष द्वारा नाभिकीय हथियार विकसित करने को ही अमेरिका के खिलाफ एक नये किस्म के आक्रमण के तौर पर संबोधित किया है। और कल अगर अमेरिका ईरान पर हमला करता भी है तो महज उसका मकसद अमेरिका पर आक्रमण रोकना नहीं बल्कि मध्यपूर्व में नाभिकीय हथियारों की दौड़ को रोकना होगा। उनके मुताबिक इसके जरिए एक नजीर कायम की जा रही है, जिस तरह जार्ज बुश के राष्ट्रपतिकाल में वर्ष 2003 में इराक पर हमले की भूमिका बनायी गयी थी। अगस्त 2002 में तो बुश ने इराकी हुकूमत पर यह आरोप भी लगाया था कि वह नाभिकीय कार्यक्रम चला रहा है। उस वक्त भी यही कहा गया था कि इराक पर आक्रमण इसलिए जरूरी है क्योंकि ‘सद्दाम हुसैन का इराक जनसंहारक हथियारों को तैयार कर रहा है और वह कभी भी अमेरिका पर हमला कर सकता है।’
 
ईरान पर प्रस्तावित हमले को लेकर औपचारिक तौर पर यही कारण दिया जा रहा है कि वह नाभिकीय हथियार विकसित करने में लगा है, जिसकी वजह से समूचे मध्यपूर्व में अशांति पैदा हो सकती है। इसके लिए इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एसोसिएशन की ताजा रिपोर्ट का हवाला दिया जा रहा है, जो खुद अभी बहुत स्पष्ट नहीं दिखती है। मगर इराक पर प्रस्तावित इस्राइली-अमेरिकी हमले के असली कारण किसी से छिपे नहीं हैं। अगर हम मार्च, 2010 को ओबामा प्रशासन के सलाहकार ब्रेजिंस्की के वक्तव्य को देखें कि ‘हम नाभिकीय ईरान के साथ रह सकते हैं’ (वाइनस्टीन, 2010) तो यह बात स्पष्ट होती है कि अमेरिका का नाभिकीय ईरान के साथ कोई बुनियादी मतभेद नहीं है। जाहिर है उसे वह बहाने के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है।
 
दरअसल इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में मध्यपूर्व तथा आसपास के इलाकों में अपने प्रभावक्षेत्रों का विस्तार बढ़ाने की जिन कोशिशों को अमेरिका ने अंजाम दिया- फिर वह चाहे ‘आतंकवाद के खिलाफ युद्ध’ के नाम पर अफगानिस्तान पर हमला करने के रूप में हो या इराक पर हमले तथा अपनी पिट्ठू शक्तियों को वहां सत्तासीन बनाने के रूप में हो- उसका सबसे अध्कि अप्रत्यक्ष लाभ ईरान को ही मिला है। एक क्षेत्रीय शक्ति के तौर पर उसकी ताकत बढ़ी है, इतना ही नहीं शिया बहुल इराक में सद्दाम के हटाए जाने से भी वहां की राजनीति में उसके हस्तक्षेप के अवसर बढ़े हैं। लोग जानते हैं कि कई सारे इराकी मूल के शिया नेताओं को सद्दाम हुसैन के शासनकाल में ईरान ने पनाह दी थी। ईरान में नाभिकीय हथियार तैयार हो रहे हैं, यह हौवा खड़ा करके वह उसे सबक सिखाना चाह रहा है। दूसरी अहम बात र्इरान के तेल के कुओं से जुड़ी है। र्इरान, जो आबादी के मामले में ही नहीं बलिक तेल के उत्पादन के मामले में भी इराक से बेहतर स्थिति में है, उसकी आय का अच्छा खासा हिस्सा इसी तेल एवं प्राकृतिक गैस के निर्यात से प्राप्त होता है। र्इरान के इस संसाधन की विपुलता का अंदाजा हम इस तरह भी लगा सकते हैं कि भारत के लिए जरूरी 12 फीसदी तेल एवं प्राकृतिक गैस र्इरान से ही प्राप्त होती है। 21 वीं सदी के इस पूर्वार्द्ध में भूराजनीतिक परिदृश्य में तेल के कुओं पर नियंत्रण कितना मायने रखता है, यह बात अमेरिका से बेहतर कौन जानता है। तीसरी अहम बात वहां के हथियार उधोग से जुड़ी हुर्इ है (जिसके लिए वही समृद्धि का समय हो सकता है जब उसके हथियार बिकें, भले ही इस दौरान हजारों-लाखों लोग मरें, तबाह हों)। इन दिनों स्थानीय युद्धों को छोड़ दिया जाए तो ऐसा कोर्इ बड़ा युद्ध नहीं चल रहा है। ऐसे में अगर र्इरान पर इस्राइल-अमेरिकी हमला हो जाता है तो वह मद्धिम पड़ रहे इस उधोग को भी समृद्धि की स्थिति में ला सकता है। और जब हथियार एवं अन्य संबंधित उधोगों के खरबपति कारपोरेट सम्राटों के हितों की रक्षा करनी हो तो उसके सामने युद्ध में मारे जाने वाले कुछ हजार अमेरिकी नागरिक या सुदूर मुल्कों में भुखमरी एवं युद्ध के मिलेजुले प्रभावों से कालकवलित होने वाले लाखों नागरिकों की जान आखिर क्या मायने रखती है। विदित हो कि इराक पर लंबे समय तक चले अमेरिकी प्रतिबंधों से वहां जीवन के लिए आवश्यक दवाइयों की कमी के चलते हजारों बच्चों के मरने की खबर आयी तब तत्कालीन अमेरिकी विदेश सचिव ने निर्लिप्तता से उत्तर दिया था 'इट हैपंस अर्थात ऐसी चीजें होती रहती हैं। अब जबकि ओबामा अपने राष्ट्रपति कार्यकाल के अंतिम वर्ष में हैं तथा प्रथम अश्वेत राष्ट्रपति के तौर पर जनता के बड़े हिस्से में दिखा उत्साह ठंडा पड़ चुका है, तब यह कयास लगाए जा रहे है कि इस साल र्इरान पर हमला किया जाएगा। जाहिर है कि अमेरिका की सत्ताधारी पार्टियों में- फिर वह चाहे 'ग्रैंड ओल्ड पार्टी कही जाने वाली रिपबिलकन पार्टी हो या डेमोक्रेट पार्टी -एक समानता अवश्य दिखती है। अपनी आंतरिक सामाजिक-आर्थिक नीतियों में भले ही वह थोड़ी बहुत भिन्न प्रतीत होती हों, मगर अपने आंतरिक मामलों से निजात पाने के लिए, तथा अपनी इलाकार्इ 'दादा की इमेज चमकाने के लिए, छोटे बड़े मुल्कों पर हमला करने में दोनों एक ही तरीके से सोचती हैं। वे यह भी जानती हैं कि आसन्न राष्ट्रपति पद के चुनावों के पहले उठाए जाने वाले ऐसे कदम मतदाताओं को प्रभावित करने का अच्छा जरिया बनते हैं।
 
कहा यही जा रहा है कि मध्यपूर्व में अमेरिका का सबसे भरोसेमंद साथी इस्राइल अप्रैल माह में इस हमले को अमली जामा पहना देगा। इसकी पृष्ठभूमि तैयार करने के लिए अमेरिका के नेतृत्व में पशिचमी देशों ने र्इरान पर दमनकारी इकतरफा पाबंदियों का भी एलान किया है। र्इरान पर नकेल डालने के अपने इरादों को पूरा करने के लिए अमेरिका की तरफ से र्इरान के अंदर आतंकी गतिविधियों को भी अंजाम दिया जा रहा है। विगत दो सालों में र्इरान के चार मशहूर वैज्ञानिक, जो उसके नाभिकीय कार्यक्रम से जुड़े थे, उनकी हत्या कर दी गयी है।
अपनी तरफ से र्इरान भी तैयारी में लगा है। विगत 11 फरवरी को र्इरानी क्रांति की 33 वीं वर्षगांठ पर र्इरान की राजधनी तेहरान में ही देश के तमाम हिस्सों में रैलियां निकाली गयीं। तेहरान में लाखों लोगों के जनसमूह को संबोधित करते हुए र्इरान के राष्ट्रपति अहमेदीनेजाद ने एक तरफ इस मसले पर वार्ता को आगे बढ़ाने की भी बात कही, मगर यह भी कहा कि हम हर तरह की परिसिथति के लिए तैयार हैं। मालूम हो कि र्इरान के सैन्य नेताओं ने यह चेतावनी दी है कि अगर पश्चिमी देश अपनी पाबंदियों को सख्त करते हैं तो र्इरान के पास भी यह विकल्प रहेगा कि वह फारस की खाड़ी में स्थित हर्मुज जलडमरूमध्य को बंद कर दे जिससे होकर तेल का बड़ा हिस्सा (एक तिहार्इ से अधिक) अंतर्राष्ट्रीय बाजार में पहुंचता है। अगर ऐसा हुआ तो तेल की कीमतें फिर आसमान छू सकती हैं।
 
अमेरिका की इन युद्धलोलुप भंगिमाओं के बीच एक रेखांकित करने वाली बात यह है कि भारत सरकार ने अपना विकल्प खुला रखा है और उसने र्इरान के साथ रिश्ते खत्म करने की अमेरिकी मांग का अभी तक प्रतिरोध किया है। निश्चित ही यह बात अमेरिकी विदेश नीति निर्धारकों को उचित नहीं जान पड़ रही है। इन पंक्तियों के लिखे जाते वक्त भी भारत की तरफ से व्यापारियों का एक बड़ा शिष्टमंडल व्यापार की संभावनाएं तलाशने के लिए र्इरान की यात्रा पर गया है। यह देखना समीचीन होगा कि मध्यपूर्व में ही नहीं दुनिया के तमाम अन्य हिस्सों में अमेरिकी चौधराहट का अपना अलग इतिहास है। अभी पिछले साल ट्यूनीशिया में हुए जनविप्लव के बाद मिस्र तथा कर्इ अन्य अरब मुल्कों में तानाशाहियों या राजशाही के खिलाफ जनता की सरगर्मी अपने चरम पर थी तब अमेरिका के चर्चित विचारक एवं भाषाविद प्रोफेसर नोम चोम्स्की द्वारा 'डेमोक्रेसी नाऊ को दिया गया साक्षात्कार काफी चर्चित रहा था। अपने वक्त के सबसे व्यापक 'क्षेत्रीय जनविद्रोहों की हिमायत करते हुए प्रोफेसर चोम्स्की ने लगभग पचास साल के दौरान अरब जगत मध्यपूर्व के अमेरिका संबंधित जनमत की समीक्षा की थी। उनका कहना था कि किस तरह अरब-मध्यपूर्व की जनता अमेरिकी शासकों से लगातार घृणा करती आयी है, जो उनके हिसाब से उन क्षेत्रों में जनतंत्र विकसित होने देने में या जनता के वास्तविक विकास में सबसे बड़ी बाधा रहा है। इसमें उन्होंने 1958 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति आइसनहावर द्वारा दिए गए व्याख्यान के हवाले से शुरुआत की थी। आइसनहावर के व्याख्यान का समय भी ध्यान देने लायक था। इसके महज दो साल पहले वह स्वेज नहर के बहाने अरब राष्ट्रवाद के प्रतीक बन कर उभरे नासेर पर नकेल डालने की बर्तानवी-फ्रांसीसी एवं इस्राइली कोशिशों का विरोध कर चुके हैं।
 
दिलचस्प है कि जिस वक्त आइसनहावर अपनी तकरीर दे रहे थे, अमेरिका की सर्वोच्च योजना निर्धारक इकार्इ नेशनल सिक्युरिटी काउंसिल की रिपोर्ट आ चुकी थी, जिसके वही निष्कर्ष थे कि किस तरह अमेरिका जालिम तानाशाहों को समर्थन करता है या ऊर्जा स्रोतों पर अधिकाधिक नियंत्रण हासिल करना चाहता है। चोम्स्की अपने साक्षात्कार में 9-11 के बाद 'वाल स्ट्रीट जर्नल जैसे अखबार द्वारा अरब अभिजनों के बीच किए गए सर्वेक्षण की भी यहां तक कि अगस्त 2010 में ब्रुकलिंग इंसिट्टयूट जैसी सम्मानित संस्था द्वारा किए उसी किस्म के सर्वेक्षण का हवाला देते हैं, जिनके निष्कर्ष यही हैं कि अरब जगत में मध्यपूर्व में अमेरिका के प्रति जबरदस्त विरोध है।
एक तरफ मध्यपूर्व के अवाम में व्याप्त अमेरिकी घृणाविरोध और दूसरी तरफ, वहां के शासकों की अमेरिका दोस्ती, जो कहीं तानाशाही के रूप में या कहीं राजे-रजवाड़ों के रूप में अपने देश में राज करते आए हैं, और एक तरह से अमेरिका की कृपा दृष्टि पाने के लिए लालायित रहे हैं, यह विरोधाभास तभी तक संभव है जब तक जनता निष्क्रिय है। अरब मुल्कों में कट्टरपंथी इस्लाम के हावी होने का डर अक्सर अमेरिका एवं पश्चिमी यूरोप के मुल्कों की चर्चाओं में नजर आता है। याद रहे जब मिस्र में जनता सड़कों पर थी, तब अमेरिकी नीति-निर्माता इसी पर चिंता प्रकट कर रहे थे कि कहीं मुसलिम ब्रदरहुड सत्ता में न आ जाए। सोवियत रूस के साथ लंबे चले शीत-युद्ध की समाप्ति के बाद हटिंग्टन के माध्यम से 'सभ्यताओं के जिस टकराहट की थीसिस पेश की गयी थी, उसमें भी कट्टरपंथी इस्लाम को खतरा बताया गया था। आखिर उसमें कितनी सच्चार्इ है, यह देखना भी जरूरी है।
 
अगर अमेरिका को कट्टरपंथी इस्लाम से इतना गुरेज होता तो क्या अमेरिका एवं सऊदी अरब के लंबे मधुर रिश्ते कायम रह पाते? कट्टरपंथी इस्लाम के एक बड़े हिमायती के तौर पर सऊदी अरब की भूमिका से सभी वाकिफ हैं। इस्लाम के दो प्रमुख धर्मस्थान मक्का एवं मदीना के वहां स्थित होने के नाते दुनिया भर के इस्लाम को मानने वाले वहां आते रहते हैं। वहां जिस वहाबी इस्लाम को मानने वालों का जोर है, उसका असर विगत कुछ दशकों में पेट्रोडालर के प्रभाव में तमाम अन्य मुसलिम बहुल मुल्कों में भी फैला है। दूसरी तरफ दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से मध्यपूर्व के मुल्कों में अगर अमेरिका का साथ जिस अरब मुल्क ने निरंतर दिया तो उसमें हम सऊदी अरब को नंबर वन पर रख सकते हैं। इस्लाम की एक कट्टर छवि पेश करने वाले, स्त्रियों को सभी जनतांत्रिक अधिकारों से वंचित रखने वाले सऊदी अरब को इस्राइल की दोस्ती से भी कोर्इ चिंता नहीं है।
 
अरब जगत एवं उत्तरी अफ्रीका के मुल्कों में तेजी से बदलते हालात में जनतंत्र के रास्ते धर्माधारित पार्टियां सत्ता में आ रही हैं, जिन्होंने अपने प्रतिक्रियावादी सामाजिक एजेंडे को स्पष्ट किया है और जो आने वाले दिनों में धार्मिक अल्पसंख्यकों, स्त्रियों, असहमति रखने वाले बुद्धिजीवियों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं सभी पर कहर बरपा कर सकती हैं। कइयों के लिए अरब दुनिया के मौजूदा हालात एवं र्इरानी क्रांति के बाद के हालात में बहुत समानता दिखती है। जब 1979 में आयतुल्ला हुकूमत में आए, तब तक तेहरान, इस्ताम्बुल, बेरुत, काहिरा, अमान, दमिश्क, बगदाद, अल्जीयर्स और मोरक्को के कर्इ शहरों की आबादी में सेक्युलर अभिजनों, बुद्धिजीवियों की अच्छी खासी तादाद थी। और तीन दशकों के अंदर ही इन सभी समाजों से धर्मनिरपेक्षता की निशानी को मिटा दिया गया। इस्लामिक ताकतों ने एक ही रास्ता अपनाया 'आतंक का, असहमति रखने वाले लोगों को आतंकित करने का।
 
यह अकारण नहीं कि कुछ माह पहले अरब जगत मध्यपूर्व के 76 अग्रणी मानवाधिकारकर्मियों, लेखकों ने 'सेक्युलर एवं आजाद मध्यपूर्व एवं उत्तरी अफ्रीका के लिए अपना घोषणा-पत्र जारी किया था। यह वही वक्त था जब लीबिया के नए शासकों ने अपने राजनीतिक-सामाजिक एजेंडे को स्पष्ट किया था और 'अरब बसंत के नाम से शुरू हुए विप्लवी जनता के आलोड़नों के इस्लामिक ताकतों द्वारा या अमेरिकी सैन्यवाद द्वारा अपहरण किए जाने की संभावना प्रबल होती दिख रही थी। प्रस्तुत घोषणा-पत्र में धर्म-निरपेक्षता को सभी नागरिकों की आजादी एवं समानता की पूर्वशर्त बताते हुए राज्य एवं धर्म से पूर्ण अलगाव, परिवार, नागरिक एवं आपराधिक संहिताओं से धर्मिक कानूनों की समाप्ति, शिक्षा प्रणाली से धर्म का अलगाव, आस्था एवं नास्तिकता को निजी विश्वासों के तौर पर मानने की आजादी, लिंग पर आधरित भेदभाव पर तथा जबरन बुर्का पहनाये जाने पर पाबंदी आदि पर जोर दिया गया था। अब जबकि समूचे परिदृश्य में बदलावके संकेत मिल रहे हैं तब प्रस्तुत घोषणा-पत्र की बातें फिलवक्त बहुत दूर की कौड़ी सुनार्इ देती हैं।
 
दिलचस्प है कि र्इरान पर हमले की आशंकाओं के बीच इस्राइली राजनीतिक स्पेक्ट्रम के दो विपरीत छोरों पर मौजूद दो शख्सियतों ने इस संदर्भ में अपना आकलन पेश किया है। और यह बात रेखांकित करने वाली है कि दोनों के निष्कर्षों में बहुत अंतर नहीं हैं। प्रख्यात इस्राइली अखबार 'हारेत्ज’ की वेबसाइट पर छपे साक्षात्कार में इस्राइल की कुख्यात जासूसी संस्था 'मोसाद’ के पूर्व प्रमुख दागान ने र्इरान के नाभिकीय अड्डों पर इस्राइली हमले की प्रभावोत्पादकता पर प्रश्नचिह्न खड़े किए हैं। उनके मुताबिक र्इरान पर इस्राइल अगर हमला करता है तो उसकी प्रतिक्रिया यही होगी कि र्इरान इस्राइल पर मिसाइल हमला कर देगा जिसका बहुत 'विपरीत’ असर पड़ेगा। र्इरान पर हमला इलाकार्इ युद्ध की शुरुआत करेगा। वे आगे कहते हैं कि 'युद्ध के बारे में आप जानते ही हैं कि वे कैसे शुरू होते हैं, लेकिन आप यह नहीं बता सकते हैं कि आप उनका अंत कैसे कर सकते हैं। मालूम हो कि जनाब दागान का यह साक्षात्कार सीबीएस टेलीविजन द्वारा रविवार (11 मार्च 2012) को पेश कार्यक्रम में भी जारी किया गया। 

दूसरी तरफ इस्राइल के अंदर सक्रिय शांतिवादी आंदोलन के अग्रणी कार्यकर्ता एवं पूर्व सांसद यूरी एवनेरी भी दावे के साथ कहते हैं कि र्इरान पर न इस्राइल हमला करेगा और न ही अमेरिका हमला करेगा। न आज करेगा और न ही आने वाले वर्षों में करेगा (आउटलुक, 13 मार्च 2012)। उनके मुताबिक इसके पीछे चुनावी दबावों या सैनिक सीमाओं का मामला नहीं है, जिसकी वजह यही है कि अगर अमेरिका हमला करता है तो वह न केवल राष्ट्रीय विपदा की घड़ी होगी बल्कि समूची दुनिया के लिए तबाही का मंजर होगा।
 
'इरान पर हमले के कुछ ही मिनटों के अंदर इरान हर्मुज की खाड़ी का मार्ग बंद कर देगा जिसमें से सऊदी अरब का लगभग समूचा तेल, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, कतर, बहरीन और इराक एवं र्इरान का कापफी तेल- जिसकी मात्रा समुद्र मार्ग से भेजे जाने वाले तेल का लगभग 40 फीसदी होगी- जगह जगह पहुंचाया जाता है। इसके चंद मिनटों के अंदर ही दुनिया में तेल की कीमतें बढ़ती जाएंगी- दुगुनी होंगी, तिगुनी होंगी और अमेरिका एवं विश्व अर्थव्यवस्था तबाही के कगार पर होगी। उनके मुताबिक 'ऐसे छोटे छोटे मसले फौजी कमांडरों के दिमाग में नहीं आते। होमरुज की खाड़ी बंद करना सबसे आसान फौजी कार्रवार्इ होगी। चंद मिसाइलें, जिन्हें समुद्र या जमीन से दागा जाए, तो यह काम पूरा होगा। और उसे खोलना हो तो मात्रा यह काफी नहीं होगा कि अमेरिका अपनी नौसेना का विमानवाहक बेड़ा वहां पहुंचाए। अमेरिका को र्इरान के बड़े भू-भाग पर कब्जा जमाना होगा ताकि होमरुज की खाड़ी र्इरानी मिसाइलों के दायरे में न आए। र्इरान के आकार को देखते हुए कि वह जर्मनी, फ्रांस, स्पेन और इटली को मिला कर भी बड़ा है, अमेरिका को वियतनाम युद्ध के स्तर का युद्ध शुरू करना होगा।
 
यह भी देखने लायक है कि र्इरान पर हमले का हंगामा करके इस्राइल फिलिस्तीन का सवाल या फिलिस्तीन के इलाकों में बसी जा रही बसितयों के सवाल से दुनिया के जनमानस का ध्यान बंटाने में कामयाब हुआ है। नाभिकीय हथियारों को विकसित करने के नाम पर र्इरान के खिलाफ खड़े किए जा रहे युद्ध के बादलों के बीच एक तरह से हम सभी 9-11 के बाद के दौर में विकसित विमर्श की पुनरावृत्ति को देख रहे हैं। 'हम’ बनाम 'वे’ के इस विमर्श में हमें या तो आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में बुश की हिमायत करनी थी या उसकी मुखालिफत करनी थी। समूची बहस को इस ढंग से पेश किया गया था कि कोर्इ तीसरा पक्ष न हो। र्इरान बनाम अमेरिका के बीच प्रस्तुत तनाव को लेकर जहां हम ओबामा प्रशासन की चौधराहट का साथ नहीं दे सकते हैं, हम किसी भी रूप में र्इरान पर प्रतिबंध लगाने या उसके खिलाफ युद्ध छेड़ने की पश्चिमी देशों की मंशा को सही नहीं ठहरा सकते हैं, वहीं क्या हम र्इरान की मौजूदा हुकूमत के हिमायती बनने का जोखिम उठा सकते हैं! निश्चित ही नहीं!
 
हमारी प्रतिबद्धता र्इरान के अवाम के प्रति होनी चाहिए, न कि वहां की शासक जमातों के साथ जिन्होंने इस्लामिक क्रांति के नाम पर विगत तैंतीस सालों में जनता की व्यापक आबादी के लिए तमाम किस्म की तबाही रची है। अपने एक आलेख 'वार एण्ड पीस’ इन र्इरान में अब्बास गोया (इकोनॉमिक एंड पोलिटिकल वीकली, 3 मार्च 2012) लिखते हैं कि किस तरह वहां 'इस दौर में जेंडर भेदभाव, बाल उत्पीड़न और अन्य नस्लवादी या अंधराष्ट्रवादी नीतियों को बढ़ावा मिला है, प्रतिवाद के राजनीतिक एवं बौद्धिक स्वरों को बुरी तरह कुचला गया है, लोगों पर -विशेषकर महिलाओं के खिलाफ- तमाम प्रतिक्रियावादी कानून लगाए गए हैं, सार्वजनिक तौर पर फांसी देने की प्रथा को कायम किया गया है, और यह सभी राजनीतिक इस्लाम के नाम पर किया गया है। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि वर्ष 2010 में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की सिफारिश के बाद इस्लामिक हुकूमत ने वहां की अवाम की तमाम सबिसडी में कटौती कर दी और पूंजी के लिए रास्ता सुगम किया। यह अकारण नहीं था कि र्इरानी हुकूमत के इन कदमों के चलते मुद्रा कोष के अर्थशास्त्रियों ने उसे दुनिया का एकमात्रा मुल्क घोषित किया जिसने उसकी सभी सिफारिशों को सफलतापूर्वक लागू किया (संदर्भ वही, इकोनामिक एंड पोलिटिकल वीकली, 3 मार्च, 2012)।  र्इरान पर हमला वहां की अलोकप्रिय हो चली हुकूमत को नयी वैधता प्रदान कर सकता है। राष्ट्रवाद के नाम पर तमाम लोग- जो उसके आंतरिक विरोधी भी हों- उन्हें उसका साथ देना पड़ सकता है।

यह बात रेखांकित करने लायक है कि चाहे र्इरान हो या इस्राइल, वहां की हुकूमतों के लिए यह बात बेहद मुफीद जान पड़ती है कि उन्हें किसी बाहरी दुश्मन का मुकाबला करना है और जिसके लिए उन्हें युद्ध की तैयारियां हमेशा जारी रखनी है।

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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