हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

कश्मीर-मणिपुर के बलात्कारों पर चुप क्यों रहते हैं आप: अरुंधति रॉय

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/22/2012 05:33:00 PM

मैं नहीं मानती कि दिल्ली रेप कैपिटल है. ये रेप तो वर्षों से चला आ रहा है. ये मानसिकता में समाया हुआ है. गुजरात में मुसलमानों के साथ हुआ, कश्मीर में सुरक्षा बल करते हैं बलात्कार, मणिपुर में भी ऐसा होता है लेकिन तब तो कोई आवाज़ नहीं उठाता है.

खैरलांजी में दलित महिला और उसकी बेटी का रेप कर के उन्हें जला दिया गया था. तब तो ऐसी आवाज़ नहीं उठी थी.

एक सामंती मानसिकता है लोगों की जो तभी आवाज़ उठाती है जब बड़ी जाति के, प्रभुत्व वाले लोगों के साथ दिल्ली में कुछ होता है.

आवाज़ उठनी चाहिए. जो हुआ है दिल्ली में उसके लिए हल्ला तो मचना चाहिए लेकिन ये हल्ला सिर्फ मिडिल क्लास लोगों को बचाने के लिए नहीं होना चाहिए.

छत्तीसगढ़ में आदिवासी महिला सोनी सोरी के साथ भी कुछ हुआ था आपको याद होगा तो. उनके जननांगो में पत्थर डाले गए थे.पुलिस ने ऐसा किया लेकिन तब तो किसी ने आवाज़ नहीं उठाई थी. उस पुलिस अधिकारी को तो साहस का अवार्ड मिला.

कश्मीर में जब सुरक्षा बल गरीब कश्मीरियों का रेप करते हैं तब सुरक्षा बलों के खिलाफ़ कोई फांसी की मांग नहीं करता.

जब कोई ऊंची जाति का आदमी दलित का रेप करता है तब तो कोई ऐसी मांग नहीं करता.

इस बार जब सौ सौ लोग इकट्ठा हुए थे दिल्ली में जब लड़की को नंगा फेका गया था बस से बाहर तो लोग खड़े थे. किसी ने अपना कपड़ा दिया उसको. सब लोग खड़े रहे.

दिल्ली में अमीर-गरीब के बीच भेद तो पहले भी था. अब भी है लेकिन अब वो भी निशाना बन रहे हैं. रेप मुद्दा नहीं है. जब देश का विभाजन हुआ था तब कितने रेप हुए थे अंदाज़ा भी नहीं लगा सकते हम.

एक सामंती मानसिकता है हम लोगों के अंदर.

बलात्कार एक भयंकर अपराध है लेकिन लोग क्या करते हैं. जिस लड़की का रेप होता है उसे कोई स्वीकार क्यों नहीं करता. कैसे समाज में रहते हैं हम. कई मामलों में जिसका बलात्कार होता है उसी को परिवार के लोग घर से निकाल देते हैं.

मेरे पास कोई जवाब नहीं है कि ये सब कैसे ठीक होगा लेकिन मानसिकता की एक बड़ी समस्या है. समाज में बहुत अधिक हिंसा है.

विरोध होना चाहिए लेकिन चुन चुन के विरोध नहीं होना चाहिए. हर औरत के रेप का विरोध होना चाहिए. ये दोहरी मानसिकता है कि आप दिल्ली के रेप के लिए आवाज़ उठाएंगे लेकिन मणिपुर की औरतों के लिए, कश्मीर की औरतों के लिए और खैरलांजी की दलितों के लिए आप आवाज़ क्यों नहीं उठाते हैं.

रेप का विरोध कीजिए इस आधार पर नहीं कि वो दिल्ली में हुआ है या मणिपुर में या किसी और जगह. मैं बस यही कह सकती हूं.  (बीबीसी हिंदी से साभार)

धरती के अभागो, उठो: फ्रांज फैनन

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/06/2012 10:25:00 PM


आप इसमें मार्क्स को सुन सुकते हैं. इन पंक्तियों में लेनिन बोल रहे हैं और माओ त्से तुंग और हो ची मिन्ह. ये आंबेडकर की आवाज भी है और अमिल्कर काबराल की भी. इसे लिखा है फ्रांज फैनन ने और किताब का नाम है द रेचेड ऑफ द अर्थ. ये इस किताब का आखिरी अध्याय है, जिसे निष्कर्ष के नाम से जाना जाता है.

1961 में आज के दिन ही फैनन का निधन हुआ था. फैनन ने अश्वेतों समेत पूरी दुनिया के वंचित मेहनतकशों, आदिवासियों, उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं की अनेक पीढ़ियों को लड़ना सिखाया, उनको लड़ने की ऊर्जा, जरूरत, औचित्य और विचारधारा दी. वे पीड़ा और व्यथा के बुद्धिजीवी नहीं थे. उन्होंने धरती के अभागों की व्यथाओं को क्रांतिकारी व्यवहार की रोशनी में समझा, उनकी गलतियों को भी और उनकी कमजोरियों को भी. और फिर लड़ने की एक क्रुद्ध, गंभीर और सचेत की विचारधारा दी जिसे और हिंसक संघर्ष से कोई परहेज नहीं है. माओ की तरह ही वे भी जटिल और अबूझ शब्दावलियों से बचते हैं और सीधे अपनी जनता को संबोधित करते हैं. उनकी किताबें द रेचेड ऑफ द अर्थ, ब्लैक स्किन व्हाइट मास्क्स, टुवर्ड्स द अफ्रीकन रिवॉल्यूशन और अ डाइंग कोलोनियलिज्म हर तरह के उपनिवेशवाद के खिलाफ जनता के हाथ में मौजूद सबसे धारदार हथियारों में से हैं और उनको भारत की दलित और आदिवासी जनता की स्थिति और उनकी मुक्ति के संघर्षों की रोशनी में जरूर ही पढ़ा जाना चाहिए.

पेशे से मनोचिकित्सक रहे फैनन ने अपना अधिकतर लेखन अल्जीरियाई मुक्ति आंदोलन की हिमायत में लिखा. और अल्जीरिया की क्रांतिकारी पार्टी एफएलएन (नेशनल लिबरेशन फ्रंट) के साथ मिल कर काम भी किया. पार्टियों की सदस्यता को अपनी व्यक्तिगत ख्याति की राह में बाधा समझने वाले बुद्धिजीवियों के बरअक्स फैनन एक शानदार मिसाल थे, जिन्होंने अपना जीवन अल्जीरियाई जनता की मुक्ति के कठिन संघर्ष को सौंप दिया और फ्रंट के साथ मिलकर उसकी क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लेते रहे. वे पार्टी और संगठन से नफरत करने वाले बुद्धिजीवी नहीं थे. उन्होंने फ्रंट पर होनेवाले हमलों के जवाब दिए, अल्जीरियाई मुसलिम जनता पर लगाए जानेवाले ‘पिछड़ेपन’ और ‘मजहबपरस्ती’ के आरोपों को बेमानी बताते हुए औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ संघर्ष में इस ‘पिछड़ेपन’ और ‘मजहबपरस्ती’ की हिमायत की, फ्रंट को एक मजबूत वैचारिक आधार दिया. वे 1954 में फ्रंट से जुड़े और 1956 में इसके अखबार अल मुजाहिद के संपादक बने. चार साल बाद जब अल्जीरिया में एक बागी क्रांतिकारियों ने प्रोविजनल सरकार बनाई तो फैनन को उन्होंने घाना में अपना राजदूत बना कर भेजा. अपने आखिरी दिनों में बीमार फैनन ने मृत्यु शय्या पर बोल कर अपनी प्रख्यात कृति द रेचेड ऑफ द अर्थ लिखवाई थी, जो अपने प्रकाशन के बाद से दुनिया भर की उत्पीड़ित जनता को राह दिखा रही है.

बाबा साहेब का निधन उनसे बस चार साल पहले हुआ. दुनिया के सबसे दबे और कुचले लोगों के रहनुमाओं में से एक बाबा साहेब ने जाति व्यवस्था के उन्मूलन के एजेंडे को समाज के बदलाव की अगली कतार में स्थापित किया. आज जिस तरह कुछ दलितवादी बुद्धिजीवियों और आंदोलनों ने जाति उन्मूलन के एजेंडे को दरकिनार कर दिया है वह बाबा साहेब के सपनों और दलित-पिछड़े तबके की आकांक्षाओं के साथ गद्दारी है.

और आज ही के दिन बीस साल पहले बाबरी मस्जिद गिरा दी गई. पेश है, 6 दिसंबर की, संयोगों और दुर्योगों से भरी इस तारीख के नाम, फैनन की, दिलों में आग लगा देने वाली यह रचना.
इसका अनुवाद मनीष शांडिल्य ने किया है.

निष्कर्ष



इसलिए कामरेडों आओ; एक झटके से हमें अपनी राह बदलनी होगी और ऐसा करना बेहतर भी होगा. हमें उस घोर उदासी को पीछे छोड़ कर आगे बढ़ना चाहिए जिसमें हम डूबे हुए हैं. जो नई सुबह आ चुकी है, उसकी नजरों में हम अटल, विवेकी और कृतसंकल्प रहें.

हमें अपने सपनों को पीछे छोड़ देना चाहिए और पुरानी मान्यताओं एवं जीवन के प्रारंभ के पहले के समय से अपनी मित्रता का परित्याग कर देना चाहिए. आइए लितानीज (ईसाइयों में एक साधारण प्रार्थना की रीति) और घृणास्पद नकल को बांझ बनाने में बिल्कुल भी समय न गंवाएं. आइए उस यूरोप को अलविदा कह दें जहां वे कभी इंसान को इंसान नहीं समझते हैं, लेकिन वे जहां भी इंसानों को पाते हैं उनकी हत्या करते हैं. ऐसा वे अपनी गलियों में आने वाले हरेक के साथ करते हैं और दुनिया के सभी हिस्सों में भी. सदियों से इन्होंने लगभग पूरी दुनिया को तथाकथित आध्यात्मिक अनुभवों के नाम पर दबाया हुआ है. आज देखें इनको, ये परमाणु और आध्यात्मिक विघटन के बीच झूल रहे हैं.

और, इसके बावजूद यह कहा जा सकता है कि यूरोप बहुत हद तक अपने हरेक प्रयास में सफल रहा हैं.

यूरोप जोश, सनक और हिंसा के जरिए दुनिया का रहनुमा बना. देखिए कैसे उसके महलों की काली छाया लगातार लंबी होती जा रही है! उसका हर एक कदम समय और सोच के विस्तार की राह में अचानक आ कर खड़ा हो जाता है. यूरोप ने मानवता और विनम्रता को न सिर्फ पूरी तरह से अस्वीकार किया है; बल्कि उसने हरेक तरह की चिंता और करूणा से भी मुख मोड़ लिया है.

वह मानवता के प्रति कंजूस रही है; उसने सिर्फ इंसानों की हत्या ही की है और उन्हें निगला है.

इसलिए, मेरे भाइयों, हमें क्यों यह समझ नहीं आता कि यूरोप का अनुसरण करने के अलावा भी हमारे पास दूसरा बेहतर रास्ता है?

यूरोप, जहां कभी इंसान की बात नहीं की जाती थी और जो कभी इसका ढिंढोरा पीटने से भी नहीं चूका कि सिर्फ वही इंसान की भलाई के लिए चिंतित है. लेकिन आज हम जानते हैं कि उनके विचारों की हर एक जीत की क्या कीमत मानवता ने चुकाई है.

इसलिए कामरेड्स आओ; यूरोप का खेल अंततः खत्म हो चुका है. हमें कुछ नया तलाशना चाहिए. हम हर मंजिल पा सकते हैं, अगर हम यूरोप की नकल न करें, अगर हम यूरोप की बराबरी करने के लिए पागल नहीं हैं.

आज यूरोप ने अपनी उन्मत्त और लापरवाह विकास के कारण हर तरह के नेतृत्व और बहस से पीछा छुड़ा लिया है और वह बड़ी तेजी से रसातल में जा रहा है. हमें पूरी मुस्तैदी से इससे बचना होगा.

साथ ही यह भी सच है कि हमें एक मॉडल की जरूरत है और हमें योजना और आदर्श चाहिए. हम में से बहुतों को यूरोपीय मॉडल आकर्षित नहीं करता है. पिछले पन्नों में हमने देखा है कि नकल के कारण हमें कैसे शर्मनाक झटके लगे हैं. यूरोपीय उपलब्धियां, यूरोपीय तकनीक और यूरोपीय शैली के प्रति अब हमें आकर्षित नहीं होना चाहिए और ऐसा करना हमें डगमगा देगा.

मैं जब यूरोप की तकनीक और शैली में ढले इंसानों की खोज करता हूं तो सिर्फ झूठे इंसानों की पीढ़ी और सफेदपोश हत्यारों को ही पाता हूं.

इंसानों के हालात, मानव जाति की योजनाएं और मानवता के संपूर्ण उत्थान को अंजाम देने वाले कार्यों में इंसानों के बीच सहयोग जैसी नई चुनौतियां हैं, जो नए तदबीरों की मांग करती हैं.

आइए यूरोप की नकल न करने का फैसला करें; आइए अपने श्रम और सोच को एक नई दिशा में लगाएं. आइए ऐसे संपूर्ण मानव का निर्माण करने की कोशिश करें जिसमें यूरोप सफलता का जश्न मनाने का भाव पैदा करने में नाकामयाब रहा था.

दो सदी पहले, यूरोप के एक पुराने उपनिवेश ने यूरोप की बराबरी करने का फैसला किया. वह इतना ‘सफल’ रहा कि संयुक्त राज्य अमेरिका एक ऐसा दैत्य बन गया और उसमें यूरोप के कलंक, रोग और क्रूरता को भयावह विस्तार मिला है.

कामरेडों, क्या हमारे पास तीसरा यूरोप बनाने के अलावे और कोई दूसरा काम नहीं है? पश्चिम खुद को आध्यात्मिक अभियानी के रूप में देखता है. विचारधारा के नाम पर, यूरोप की विचारधारा के नाम पर ही यूरोप ने अतिक्रमण किए हैं, उसने अपने अपराधों को उचित ठहराया है और उस गुलामी को वैधता प्रदान किया है जिसमें उसमें अस्सी प्रतिशत मानवता को कैद कर रखा है.

हां, यूरोपीय विचारधारा की जड़ें विचित्र जगहों पर धंसी हुई हैं. सभी यूरोपीय विचारों ने ऐसे जगहों पर आकार लिया जो बहुत ही उजाड़ थे और संकटों से बुरी तरह घिरे हुए थे. और इस तरह रीति-रिवाज ऐसी जगहों पर फूले-फले जहां इंसानों की आवाजाही बहुत कम थी.

खुद से निरंतर संवाद और बहुत ही अश्लील अहंकार किसी अर्द्ध उन्मादी राज्य के लिए तैयार किए जाने वाले रास्ते में रोड़ा नहीं बनता है, जहां बौद्धिक काम पीड़ा बन जाता है और वास्तविकता वैसी नहीं होती जैसी एक जीवित मनुष्य, उसके कार्य और सृजन की होनी चाहिए, बल्कि इसके उलट वास्तविकता शब्दों, शब्दों के विभिन्न संसर्गों और शब्दों में छिपे अर्थ से फूटने वाले विस्तार में अभिव्यक्त होती है. इसके बावजूद यूरोप के कुछ लोगों ने यूरोपीय श्रमिकों को इसके लिए प्रेरित किया कि वे इस अहंकार को तोड़ें और इस काल्पनिकता से पीछा छुड़ाएं.

लेकिन आम तौर पर, यूरोप के श्रमिकों ने उन आवाजों को अनसुना कर दिया. श्रमिकों की भी मान्यता है कि वे भी यूरोपीय विचारधारा के भयंकर अभियानों का हिस्सा रहे हैं.

विभिन्न काल खंडों में, मानवता की जटिल समस्याओं के समाधान के सभी तत्व यूरोपीय विचारधारा में मौजूद रहे हैं. लेकिन यूरोप के लोगों की कार्रवाइयों ने उन लक्ष्यों को पूरा नहीं किया जो उनकी जिम्मेवारी थी और जिसमें इन तत्वों को लागू करने के लिए हिंसक तरीके से अपना पूरा जोर लगाना, उनके बनावट और प्रक्रिया को रूपांतरित करना, उनको बदलना और अंततः मानव जाति के समस्याओं को बहुद हद तक ऊंचे स्तर पर ले जाना शामिल था.

आज हम यूरोप की जड़ता के बीच उपस्थित हैं. कामरेडों, आइए उस गतिहीन आंदोलन से बचें जिसमें धीरे-धीरे तर्कशास्त्र संतुलन के तर्क में तब्दील होता जा रहा है. आइए मानव जाति के प्रश्नों पर फिर से विचार करें. आइए दिमागी वास्तविकताओं और मानवता के सभी चिंतनशील समूहों, जिनके बीच संबंधों को मजबूत करना, जिनके रास्तों को रंग-बिरंगा करना और जिनके संदेशों को फिर से मानवीय बनाना जरूरी है, के प्रश्नों पर फिर से विचार करें.

साथियों आओ, चंदावल या रीयरगार्ड (लौटती फौज की अंतिम पंक्ति की रक्षा हेतु भेजी गयी सेना) की भूमिका निभाने के लिए हमें अभी बहुत कुछ करना है. यूरोप ने वही किया है जिसका बीड़ा उसने उठाया था और कुल मिलाकर उसने अपने काम को अच्छे से अंजाम दिया है. आइए उसे कोसना बंद करें. लेकिन साथ ही उसे दृढ़तापूर्वक यह भी बता दें कि वह अपने कृत्यों को महिमा-मंडित न करे. अब हमें कोई डर नहीं है, इसलिए आइए उससे ईष्र्या करना बंद करें.

तीसरी दुनिया आज उस विशाल जनसमूह की तरह यूरोप का सामना कर रही है, जिसका मकसद उन समस्याओं को हल ढूंढना है यूरोप जिन सवालों के उत्तर ढूंढने में विफल रहा था.

लेकिन यह साफ कर लेना जरूरी है कि प्रयास के परिणाम, तीव्रता और लय के बारे में चर्चा बंद करना भी महत्त्व रखता है.

नहीं, प्रकृति की ओर वापस लौटने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता है. इंसानों को विकृति की ओर नहीं घसीटने, तेजी से दिलो-दिमाग से स्मृतियों को मिटाने वाले और मस्तिष्क को विनष्ट करने वाले विचारों को न थोपने का सवाल बहुत ही महत्त्वपूर्ण है. बराबरी के बहाने इंसानों पर धौंस जमाने या उन्हें उनके वजूद या उनकी निजता से दूर करने की कोशिश नहीं की जानी चाहिए. न ही इस बहाने उन्हें वश में करना चाहिए और न ही उनकी हत्या की जानी चाहिए.

नहीं, हम किसी की बराबरी नहीं करना चाहते हैं. हम हमेशा, रात और दिन, आगे बढ़ना चाहते हैं. इंसानों के साथ और सभी इंसानों को साथ लेकर. कारवां इतना लंबा भी नहीं होना चाहिए कि हरेक पंक्ति मुश्किल से यह देख सकें कि उसके आगे कौन है और अपरिचित लोग आपस में कम-से-कम मिलें और बातें करें.

यह तीसरी दुनिया के नए इतिहास की शुरूआत से जुड़ा सवाल है. यह इतिहास उन अजीब शोधों का भी सम्मान करेगा जो कभी यूरोप द्वारा प्रस्तुत किए गए थे, लेकिन यह यूरोप के अपराधों को नहीं भूलेगा. इन अपराधों में सबसे भयावह वे हैं जिसे लोगों ने मानसिक स्तर पर अंजाम दिया है. साथ ही ये अपराध यूरोपीय कृत्यों के तर्कहीन आलोचना और उनकी एकता के ढह कर बिखरने का नतीजा थे. और जहां सामूहिकता के दायरे में सामाजिक विभेदन और स्तरण था एवं वर्गों के बीच खूनी तनाव था. इतना ही नहीं मानवता के विशाल पैमाने पर नस्लीय घृणा, गुलामी, शोषण था और इन सबसे ऊपर वह रक्तहीन नरसंहार था जिसमें करोड़ों लोगों को उपेक्षित छोड़ दिया गया था.

इसलिए कामरेड्स, ऐसे राज्यों, संस्थानों और समाजों का निर्माण कर यूरोप को श्रद्धांजलि अर्पित न करें जो उससे ही प्रेरणा ग्रहण करते हैं.

ऐसे अनुकरण, जो कि बहुत हद तक घृणित भोंडा नकल होगा, से इतर मानवता को हमसे कुछ और अपेक्षित है.

अगर हम अफ्रीका और अमेरिका को नए यूरोप में तब्दील करना चाहते हैं तो बेहतर होगा कि आइए अपना भविष्य यूरोपीय देशों के भरोसे ही छोड़ दें. हममें से सबसे योग्य व्यक्ति के मकाबले वे इस काम को ज्यादा बेहतर तरीके से अंजाम देंगे.

लेकिन अगर हम चाहते हैं कि मानवता एक कदम आगे बढ़े, अगर हम यूरोप के मुकाबले मानवता को एक नई ऊंचाई पर ले जाना चाहते हैं तो हमें आविष्कार और नए खोज करने चाहिए.

अगर हमारा सपना यह है कि हम अपने लोगों की अपेक्षाओं पर खरे उतरें, तो हमें निश्चय ही यूरोप से इतर दूसरी जगह जवाब तलाशने होंगे.

इसके अलावा, अगर हम यूरोप के लोगों की अपेक्षाओं पर भी खरा उतरना चाहते हैं तो कहीं से भी उनके समाज के विचारों, आदर्श विचारों को भी, और उनकी सोच जिससे समय-समय पर वे बहुत हद तक ग्रसित रहे हैं, को वापस थोपना श्रेयस्कर नहीं है.

यूरोप के लिए, खुद अपने लिए और मानवता के लिए, कॉमरेडों, आइए हम एक नया इतिहास लिखें, हम नये विचारों की खोज करें और नये लोगों को सक्रिय करें.

बाबरी का पुनर्निर्माण इंसाफ का तकाजा है

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/06/2012 01:33:00 AM



बनोज्योत्स्ना की अंग्रेजी कविता का हिंदी अनुवाद. यह उस वादे की याददिहानी के रूप में कि जालिम सल्तनतों ने जनता का अब तक जो कुछ भी तबाह किया है, उसे दलित, आदिवासी, मुस्लिम जनता की नई जनवादी क्रांति फिर से बनाएगी. बाबरी मस्जिद भी उनमें से एक है...तो बूनो की यह कविता. मूल अंग्रेजी कविता यहां पढ़ सकते हैं.


बीस साल
धूल में मिला दिए जाने के बीस साल
मगर अपनी सांसें रोक लो और देखो
यह अब भी वहीं है...
उसकी गुंबदों को धूप अब भी चूमती है

खामोशी को भेदते हुए अजान
उठता है अब भी

बीस साल
लेकिन मुंबई की सड़कों पर
खून के निशान अब भी ताजा हैं

कहते हैं कि वक्त भर देता है घावों को
पर हर गुजरते साल के साथ
हर कत्लेआम के साथ
हर पाखंड
और हर तमाशे के साथ
इंसाफ के चेहरे पर जख्म गहरे होते जाते हैं...
खून की बू तेज होती जाती है

लेकिन अपनी ये मुट्ठियां
बदले और प्रतिरोध की जिद में कसे हुए
हम लड़ेंगे कॉमरेड
क्योंकि इसको छोड़ कोई दूसरा रास्ता नहीं है
और हम लड़ेंगे
आसमान की चादर को बाबरी की गुंबदों से फिर से सजाने के लिए
सफेद कबूतरों की परवाज को बाबरी का आंगन लौटाने के लिए

और इन्कलाब
बनाएगा फिर से
इंसानियत के हर उस टुकड़े को
उन सारी चीजों को
जिन्हें तोड़ दिया गया है

तुम कैसे कैद रह सकती हो दयामनी दी

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/02/2012 08:51:00 PM

रणेन्द्र की ये कविताएं संघर्षरत आदिवासियों की आवाज नहीं हैं, उस संघर्ष का हिस्सा हैं.


समझिए साहब


कैसे समझाए साहब
ये खतियान में दर्ज
जमीन के टुकड़े भर नहीं हैं,
हमारे खेत
हमारी भूख का विस्तार हैं
हमारे होने के सबूत।

यहाँ की हवा में
हमारे पूर्वजों की साँसें धुली हैं,
उनकी देह का ताप शेष है
इस पीली धूप में अब भी ।

सब जानते हैं साहब
विश्वविजयी हैं
आपके यज्ञ के अश्व,
आपकी चतुरंगिणी सेना,
अरज बस इतनी
यहाँ आहिस्ता धरिएगा पाँव,
यह मिट्टी,
हमारे पूर्वजों की राख से बनी है,
उनके पसीने की नमकीन गंध
और हमारे बच्चों की किलकारियाँ
उठंग कर सोई हैं वहीं ।

हरीतिमा की गहरी जड़ों से
जुड़ी हैं हमारी सभ्यता की जड़ें
पहाड़, नदी, पेड़ों में
हमारे देवताओं का वास है ।

और इस साखू का क्या करेंगे
जिसकी जड़ें मरती ही नहीं
हर चट्टान फोड़ कर फुनगती हैं ।

हर गरजन पर भारी हैं
महुआ के टपकने
गुलईंची के खिलने
और धान में दूध भरने की ध्वनियाँ
और आपको
कैसे समझाए साहब?



आज्ञा


1
आज्ञाकारी सेवक
आज्ञाकारी शिष्य
आज्ञाकारी पुत्र
आज्ञाकारी भाई
आज्ञाकारिणी पत्नी
आज्ञाकारिणी जनता
आज्ञाकारी होना
सुखी होना है
बिना सुख को जाने

2
आज्ञाएँ
ऊँची जगहों से बरसती हैं
पालन करवाने के आवेश,
आवृत हिंसा के आवेग से भरी
आज्ञाकारी होना
अपना सम्मान बचाना है
बिना सम्मान के भाव को जाने

3
आज्ञा देने वालों की
गरदने तनी होती हैं
शीश पर मुकुट का आभास
आज्ञाकारी की गरदन झुकी
पीठ पर कोड़ों का अहसास
आज्ञाकारी होना
दंडधारियों से बच निकलना है
आजादी और बराबरी से नजरें चुराये


दयामनी दी कैद में


1
जंगल पहाड़ की बेटी की राह में
वे पहाड़ खड़ा करना चाहते हैं
और घना जंगल भरना
उनकी इस सादगी पर
वह ठठा कर हँस रही है

2
भूख से मजबूत
कोई जंजीर नहीं
गरीबी से बढ़कर
नहीं कोई ऊँची दीवार
वे जेल की दीवार ऊँची कर रहे
इस मासूमियत पर
वह मुस्कुरा रही है।

3
वनों की हरीतिमा
तुम्हारी निगाहों में,
छोटानागपुर का पठार
तुम्हारे कांधे का विस्तार,
साँसों में सारंडा-नेतरहाट की हवा,
धमनियों में
स्वर्णरेखा, शंख, कोयल, दामोदर की धारा,
जैसे
क्षिति, जल, पावक, गगन, समीर के अंशों से
बनी तुम, तुम्हारी देह
वैसे ही
तुम्हारे भी अंश उन पाँच तत्वो में
अब वनों की हरीतिमा
जल की शीतलता
मिट्टी की कोख
धूप की ताप को
कैसे कैद कर सकता है कोई
तुम कैसे कैद रह सकती हो
दयामनी दी।

एदुआर्दो गालेआनो: आज की भाषा की उलटबांसियां

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/29/2012 06:11:00 PM


लातिन अमेरिकी पत्रकार और लेखक एदुआर्दो गालेआनो ने सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक जीवन के विभिन्न पहलुओं की असंगतियों, विडंबनाओं और विद्रूपों को अपनी चर्चित किताब वर्ल्ड अपसाइड डाउन में दिए गए बॉक्सों में सूत्रबद्ध करने की कोशिश की है. जेएनयू में स्पेनी भाषा से शोध कर रहे पी. कुमार मंगलम इस किताब का अनुवाद कर रहे हैं और इसे उन्होंने नाम दिया है: उलटबांसियां: उल्टी दुनिया की पाठशाला. पेश है इसी किताब का एक अंश जिसमें भाषा की मदद से हमारी दुनिया में किए गए उलटफेरों का जिक्र किया गया है. इसी किताब का एक और अंश यहां पढ़ा जा सकता है.

आज की भाषा


इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया के राज में किसी जवान लड़की के सामने अपनी पैंट दिखाना सख्त मना था। आजकल भी कुछ बातें ऐसी हैं जिन्हें खुले रूप में कहना और पेश करना अच्छा नहीं समझा जाता है।

पूंजीवाद को बाजार का लुभावना चेहरा और नाम दिया जाता है।

उपनिवेशवाद को ग्लोबलाइजेशन (वैश्वीकरण) कहा जाता है।

विकसित देशों का उपनिवेशवाद झेलते देशों को विकासशील कहा जाता है। यह वैसे ही है जैसे कि बौने रह गए लोगों को बच्चा कहा जाए।

सिर्फ़ अपने बारे में सोचने को अवसरवाद नहीं बल्कि व्यावहारिकता कहा जाता है। धोखेबाजी को समय का तकाजा बताया जाता है।

गरीबों को कम  आय वर्ग के लोग कहा जाता है।

गैरबराबरी बढ़ाने वाली शिक्षा व्यवस्था जब गरीब बच्चों को  शिक्षा से बेदखल करती है तो इसे उनका पढ़ाई-लिखाई छोड़ना बता दिया जाता है।

मजदूरों को बिना किसी कारण और मुआवजे के काम से बेदखल किये जाने को श्रम बाजार का उदारीकरण बताया जाता है।

सरकारी दस्तावेजों की भाषा औरतों के अधिकार को अल्पसंख्यक अधिकारों में गिनती है  मानो  पुरुषों का आधा हिस्सा ही सबकुछ हो।

तानाशाही को अखबारों में सामान्य उठापटक की तरह पेश किया जाता है।

व्यवस्था जब लोगों को यातनाएं देती है तो इसे पुलिसिया प्रक्रिया की गलती या शारीरिक-मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की कोशिश बता दिया जाता है।

जब धनी परिवार का कोई चोर पकड़ा जाता है तो इसे चोरी नहीं बल्कि एक बुरी लत बताया जाता है।

भ्रष्ट नेता जब जनता का पैसा हड़प जाते हैं तो इसे उनकी अवैध कमाई बताया जाता है।

मोटरकारों से सड़क पर बरसती मौत को दुर्घटना कहा जाता है।

नेत्रहीनों को दृष्टिहीन कहा जाता है। काले लोगों को अश्वेत कहा जाता है।

कैंसर और एड्स न कहकर लंबी और कष्टदायी बीमारी कहा जाता है। हृदयाघात को अचानक जोर से पैदा होने वाला दर्द बताया जाता है।

कभी भी लोगों का मार दिया जाना नहीं बताया जाता, वे तो गायब बताए जाते हैं। मरने वाले उन इंसानों को भी नहीं गिना जाता जिनकी हत्या सेना की  कार्यवार्ईयों में होती है।

युद्ध में मारे गए लोग युद्ध से हुए नुकसान में गिन लिए जाते हैं। जो आम जनता इन युद्धों का शिकार होती है, वह तो महज टाली जा सकने वाली मौतें होती है।

1995 में फ्रांस ने दक्षिणी प्रशांत महासागर में परमाणु विस्फोट किये। तब न्यूजीलैंड में फ्रांस के राजदूत ने आलोचनाओं को खारिज करते हुए कहा ‘‘मुझे यह बम शब्द अच्छा नहीं लगता, ये फटने वाले कुछ उपकरण ही तो हैं।’’

कोलंबिया में सुरक्षा के नाम पर लोगों की हत्या करने वाले सैन्य बलों का नाम ‘सहअस्तित्व’ था।

चिली की तानाशाह सरकार द्वारा चलाए गए यातना शिविरों में से एक का नाम ‘सम्मान’ था। उरुग्वे में तानाशाही की सबसे बड़ी जेल को ‘स्वतंत्रता’ का नाम दिया गया था।

मेक्सिको के चियापास क्षेत्र के आक्तेआल में प्रार्थना कर रहे 45 किसानों, ज्यादातर महिलाएं और बच्चे, की हत्या करने वाले अर्धसैन्य बल का नाम ‘शांति और न्याय’ था। उन सभी को पीठ में गोली मारी गई थी।

अच्छे लोगों का मिथक

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/09/2012 01:33:00 PM

 
इन दिनों आईआईटी, खड़गपुर में पढ़ा रहे आनंद तेलतुंबड़े यहां अरविंद केजरीवाल के अपने विश्लेषण के जरिए भारतीय व्यवस्था, इसके क्रांतिकारी विरोध और नव उदारवादी अर्थव्यवस्था में भ्रष्टाचार की जगह पर रोशनी डाल रहे हैं. तेलतुंबड़े अपने ब्राह्मणवाद और साम्राज्यवाद विरोधी क्रांतिकारी लेखन और अपनी राजनीतिक-सामाजिक सक्रियता के लिए जाने जाते हैं. खैरलांजी पर उनकी किताब को देश और दुनिया में बेहद सराहना मिली है. मूल अंग्रेजी लेख हार्डन्यूज में प्रकाशित. हाशिया पर साभार. अनुवाद: रेयाज
 
आप बस अरविंद केजरीवाल की तारीफ कर सकते हैं. जिस उत्साह के साथ उन्होंने भ्रष्टाचार के मुद्दे के आगे सारे मुद्दों को फीका कर दिया है, जिस रणनीति के तहत उन्होंने लोगों को जुटाने के लिए अन्ना हजारे के नैतिक प्रभुत्व का इस्तेमाल किया, जिस कौशल से वो हजारे और उनकी टीम के साथ तकरार से निबटे, जिस खूबी के साथ वो राजनीति में दाखिल हुए, जिस फुर्ती के साथ उन्होंने जाहिर विरोधाभासों को छुपाया, और जिस अनथक उत्साह के साथ वो अपने आप को आगे बढ़ा रहे हैं, ऐसी कोई दूसरी मिसाल आसानी से नहीं मिलती. इन दिनों किसी सार्वजनिक हित के मुद्दे का इस्तेमाल करते हुए, नवउदारवादी चक्कियों में पिसते हुए, बिखर रहे अलग-अलग व्यक्तियों को आकर्षित करना आसान नहीं है, और इसे एक साल से ज्यादा वक्त तक बरकरार रखना एक औसत उपलब्धि नहीं है. भले उनसे सहमत हों या नहीं, उन्होंने इस देश के राजनीतिक क्षितिज पर एक निशान छोड़ दिया है और व्यवस्था के इस अहम पहलू को उजागर किया है कि यह जनवादविहीन है.

ऐसा उन्होंने कैसे किया? वो जिस राजनीति में कूद पड़े हैं, क्या वो उसे आगे बढ़ा पाने में कामयाब हो पाएंगे? ये कुछ सवाल हैं जो इस संदर्भ में प्रासंगिक रूप से उठ खड़े हुए हैं.

भारत अनेक गंभीर समस्याओं से ग्रस्त है जैसे कि गरीबी, तेजी से बढ़ती असमानता, कुपोषण, अल्पपोषण, नवजात मृत्यु दर, बीमारियां, साफ-सफाई, पेयजल, भोजन, शिक्षा, किसानों की आत्महत्याएं, बढ़ती आपराधिकता और इसी तरह की समस्याएं. सीधे-सीधे आबादी के पांच में से चार हिस्से इससे पीड़ित हैं. हालांकि संभवत: इनमें से एक भी समस्या केजरीवाल के लोगों को नहीं सूझी होती. असल में एक समस्या के बतौर भ्रष्टाचार को और उसके समाधान के बतौर जन लोकपाल को चुनना एक गहरी चाल थी.

ऐसा इसलिए नहीं कि भ्रष्टाचार कम आमदनी वाले तबकों को सबसे ज्यादा परेशान करने वाली व्यापक समस्या है. बल्कि इसलिए क्योंकि भ्रष्टाचार राजनीतिक वर्ग और राज्य की संरचना के साथ जुड़ा हुआ है, जिनसे नव उदारवाद के दौर का बाजार-प्रेमी मध्यवर्ग खास तौर से नफरत करता है. अगर इस मुद्दे को महज भ्रष्टाचार तक छोड़ दिया जाता तो यह उतना आकर्षक नहीं रहा होता. इसलिए इसमें संतुलन लाने के लिए जन लोकपाल के रूप में एक एकांगी समाधान भी पेश किया गया.


नवउदारवाद की खासियत है कि उसके पास किसी भी समस्या का फौरी समाधान
मौजूद होता है. यह हर चीज को अलग-थलग संबंधों में देखता है और उन्हें इसके व्यवस्थागत संबंधों से अलग कर देता है. विभिन्न संस्थाएं जिस जटिल तानेबाने का हिस्सा होती हैं, उसे इसकी वजह से  स्वाभाविक रूप से नजरअंदाज कर दिया जाता है. जब मार्ग्रेट थैचर ने कहा था कि समाज जैसी कोई चीज नहीं होती, कि सिर्फ व्यक्ति और उनकी समस्याएं होती हैं, तो वो मूल रूप से नवउदारवादी विचारधारा की ही व्याख्या कर रही थीं. एक अलग-थलग व्यक्ति की किसी समस्या की वजह उसके भीतर प्रतिस्पर्धात्मकता की कमी बता दी जाती है, इसका समाधान ये है कि वो ज्यादा कड़ी कोशिश कर सकता है.

जन लोकपाल का समाधान मौजूदा ढांचे के भीतर भ्रष्टाचार का एक फौरी समाधान है. इस तरह केजरीवाल के पास दोनों हैं, समस्या भी और समाधान भी. और दोनों ही फलते-फूलते नवउदारवादी मध्य वर्ग को सीधे-सीधे आकर्षित करते हैं.

भ्रष्टाचार की समस्या के प्रति आकर्षण का दूसरा पहलू ये है कि इसे बाजार के तर्क की एक विकृति के रूप में देखा गया है. यह वैश्विक बाजार में ‘ब्रांड इंडिया’ पर एक कलंक है और भारत के एक ‘महाशक्ति’ बनने की राह में एक गंभीर बाधा है. पहले के चार दशकों के दौरान अपमानजनक हिंदू वृद्धि दरों से परे जीडीपी वृद्धि में बढोतरी ने भारत में इन लोगों को उत्साह से भर दिया है. वो भ्रष्टाचार को अपनी संभावनाओं को नुकसान पहुंचाते देखने से नफरत करेंगे. जो भी हो, एक वर्ग के बतौर उनके अपने हित तो इसके उभार से ही जुड़े हैं. मौजूदा ढांचे के भीतर ही समस्या और समाधान की इस समझ ने, जिसने उनकी अपनी दुनिया पर ही तबाही का खतरा पैदा कर दिया है, शहरी मध्यम वर्गों का ध्यान इसकी तरफ खींचा है और उनको केजरीवाल के आसपास जमा होने को मजबूर किया है. उनको भरोसा है कि एक बार जन लोकपाल लागू हो जाए, फिर भ्रष्टाचार की ज्यादातर समस्या हल हो जाएगी.

उनकी लामबंदी में सबसे पहले तो हजारे के मसीहाई शुभंकर ने उत्प्रेरक की भूमिका निभाई. भ्रष्टाचार के मुद्दों पर महाराष्ट्र में ताकतवर नेताओं से भिड़ने के साहस, कठोर अनुशासित जीवन और सीधी बातों ने पहले ही नैतिक रूप से उनका कद बढ़ा दिया था. हजारे गांधी नहीं है लेकिन लोगों को आकर्षित करने के गांधी के करिश्मे की याद दिलाते हैं. सरकार को अपेक्षा थी कि मध्यवर्ग का सब्र चुक जाएगा और इसने एक नपी-तुली प्रतिक्रिया जताई, शुरू में तो उसने नजरअंदाज किया, फिर इसे भाजपा की बी टीम का कह कर उसकी निंदा की और फिर उससे बातचीत में मशगूल हुई.

भ्रष्टाचार से नफरत करनेवाले नवउदारवादी मध्यम वर्गों और बाजार के लेन-देन के लिए भ्रष्टाचार को एक स्नेहक या लुब्रिकेंट के रूप में लेने वाले नवउदारवादी शासकीय वर्गों के नजरिए में टकराव पैदा हुआ. बहसें बीच में रुक गईं. सरकार ने शर्मिंदगी छुपाने के लिए संसदीय शुद्धता का अपना वही पुराना राग अलापा और टीम अन्ना को जनादेश हासिल करने की चुनौती दी. राजनीति की गंदगी को सरेआम भला-बुरा करने के बाद टीम अन्ना के लिए इसके जरिए जनादेश हासिल करने के विकल्प का तो सवाल ही नहीं पैदा होता था.

कुछ विराम के बाद जब आंदोलन को फिर से शुरू किया गया तो बिखराव और थकान के विभिन्न संकेत दिखे. बेसब्र मध्य वर्ग एक समाधान न दिखने से निराश था. केजरीवाल ने इसे महसूस किया और चुनावी राजनीति में शामिल होने का एलान करके अपने समर्थकों की जमात को नए उत्साह से भरा. हजारे हिचके और फिर नाराज हो गए.

केजरीवाल सम्मानजनक तरीके से उनसे अलग हुए और रॉबर्ट वाड्रा, सलमान खुर्शीद और नितिन गडकरी जैसे नामचीन लोगों के भ्रष्टाचार को उजागर करते हुए हरकत में आए. गडकरी को शायद उन्होंने भाजपा के प्रति नरम पड़ने के आरोपों का खंडन करने के लिए शामिल किया. उन्होंने यह पेशकश रखी कि उनकी पार्टी ‘जनता’ को केंद्रीय रंगमंच पर लाएगी और विस्तार से ये बताया कि उम्मीदवार खुद जनता द्वारा ही तय किए जाएंगे. हजारे तक ने कहा कि वो उनका समर्थन करेंगे.

इस पेशकश के तौर-तरीकों संबंधी अव्यावहारिकता के बावजूद कोई पूछ सकता है कि केजरीवाल को उम्मीदवारों के लिए अच्छे आदमी कहां से मिलेंगे? क्या चीज यह सुनिश्चित करेगी कि सत्ता मिल जाने के बाद भी वो अच्छे बने रहेंगे? हो सकता है कि उनके चुनाव लड़ने का पैसा खुद मतदाताओं से ही आने से इस क्षेत्र में भ्रष्टाचार का सांस्थानिक आधार, कम से कम उसूली तौर पर, गायब हो जाए, लेकिन अनगिनत दूसरे मुद्दे गायब नहीं होंगे.

कोई पूछ सकता है अगर इस देश की तीन चौथाई आबादी 20 रुपए रोज से कम पर गुजर कर रही है तो क्या वो सचमुच केजरीवाल की चुनावी मशीन का खर्च उठा सकने के काबिल होगी?

हालांकि केजरीवाल ने एक सामाजिक आंदोलन खड़ा करके एक घाघ रणनीतिकार के बतौर अपना कौशल साबित किया है, लेकिन वो चुनावी राजनीति की जटिलताओं को समझने में अपना बचकानापन भी जाहिर कर चुके हैं. वो नहीं महसूस कर पाए कि वो विरोधी द्वारा बिछाए गए फंदे में फंस चुके हैं, जो उनके आगे अपने में मिला लिए जाने या फिर कूड़े की तरह फेंक दिए जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं छोड़ेगा. हो सकता है कि भ्रष्ट लोगों के मामलों को उजागर करने का मौजूदा दौर, धरना या नारेबाजियों का शोर लोगों को तब तक रोमांचित करे जब तक वो अनोखे बने रहें, टीवी के पर्दों पर उन्हें जगह मिलती रहे, लेकिन जल्दी ही वो यह अनोखापन खोने लगेंगे. वो राजनीतिक वर्ग को परेशान कर सकते हैं, उसे सचमुच सजा नहीं दे सकते.

क्या कोई वाड्रा या खुर्शीद या गडकरी के जेल जाने की कल्पना कर सकता है? केजरीवाल को यह समझना होगा कि वो इस व्यवस्था की उपज हैं, जो ताकत के बल पर उनकी हिफाजत करेगी. जिन लोगों पर केजरीवाल ने उम्मीदें टिका रखी हैं, उनकी इस व्यवस्था में कोई जगह नहीं है. वो यहां इस जारी लूट की प्रक्रिया को जायज बनाने के लिए हैं. चुनावों के आते ही उन्हें यह समझ में आ जाएगा कि उनका सारा भंडाफोड़ और उनका विरोध धनबल और बाहुबल की घिनौनी दलीलों से पार पाने में नाकाम होंगे. इसके परे यह व्यवस्था की दलील है जो आपको अपने भीतर खींच लेती है या फिर आपको हाशिए पर फेंक देती है.

क्या केजरीवाल इतने भोले हैं कि वो यह सब समझ नहीं सकते? जो व्यक्ति आईआईटी, खड़गपुर से पढ़ा हुआ हो, जिसने भारतीय राजस्व सेवा में बरसों अपनी सेवा दी हो, और जिसका बरसों तक एक कार्यकर्ता के बतौर भी लोगों से खासा जुड़ाव रहा हो, यकीनन उससे इतने भोले होने की उम्मीद नहीं की जा सकती. चाहे बात भ्रष्टाचार की प्रक्रियाओं के बारे में हो या चुनावी राजनीति की गतिकी की. मिसाल के लिए, जब वो भ्रष्टाचार पर ध्यान केंद्रित करते हैं तो क्या वो ये नहीं जान रहे होते हैं कि यह महज एक लक्षण है, बीमारी नहीं?

ऐसा हो सकता है कि हमारे राजनीति वर्ग की सड़न को एक ऐसी बात के रूप में लिया जाए जो अपने आप में ही सिद्ध हो. लेकिन तब हमारी प्रातिनिधिक लोकतंत्र की संस्थागत संरचना इसकी जड़ में है. और उस कॉरपोरेट भ्रष्टाचार के बारे में क्या, जो इस संरचना को कायम रखे हुए है?

तथ्य ये है कि 1991 के बाद का ‘खुले दरवाजे वाला’ भारत वैश्विक पूंजी के विशाल नेटवर्क का एक सिरा है, जिसे भ्रष्टाचार से कोई नैतिक परहेज नहीं है. केवल भारत में ही नहीं पूरी दुनिया में पिछले दो दशकों में भ्रष्टाचार की तेजी से बढ़ती हुई दर इस तथ्य की पुष्टि करती है. क्या केजरीवाल की लफ्फाजी इस दैत्य को रोक सकती है? जिस हद तक उनका अभियान नव उदारवादी उसूलों का पूरक रहा है, उसे देखते हुए उसे इस दैत्य का पालन-पोषण करनेवाले के रूप में ही देखा जा सकता है.

राजनीतिक केजरीवाल का नया आदर्श वाक्य है ‘मैं आम आदमी हूं’ (विडंबना यह है कि यह नवउदारवादी मनमोहन सिंह और कांग्रेस पार्टी का शगूफा है) जो टीम अन्ना में टूट के बाद सामने आया है. यह ‘मैं अन्ना हूं’ से बेहतर है जो कुछ कुछ 1970 के दशक के शुरुआती बरसों में कोलकाता की दीवारों पर ‘चीन का चेयरमैन हमारा चेयरमैन’ जैसा लगता था. टूट ने लोगों को असमंजस में डाल दिया, जिन्हें अन्ना की बातों और रामदेव की लफ्फाजियों में एक भगवा धमक सुनाई देती थी. क्या केजरीवाल ने उनसे खुद को अलग कर लिया है?

शायद, हां. वैसे भगवा ताकतों द्वारा अपनी पकड़ में सभी संभावित विकल्पों के निर्माण की रणनीति को नजर में रखें तो कोई बहुत यकीन से कुछ नहीं कह सकता. यकीनन एक चीज जो जाहिर तौर पर दोनों में समान है वो है देश पर शासन करने के लिए ‘अच्छे लोगों’ को हासिल करने पर उनका जोर: एक लोकपाल बनने के लिए एक अच्छा आदमी, चुनाव लड़ने के लिए अच्छे उम्मीदवार, नौकरशाही के लिए अच्छे आदमी और इसी तरह. कोई पूछ सकता है कि एक सड़ी हुई व्यवस्था में अच्छा आदमी कहां खोजा जाए?

इस सवाल का तर्कसंगत जवाब सिर्फ भारतीय जेलें हो सकती हैं, क्योंकि यही वो जगह है जहां वे लोग रखे जाते हैं जो मौजूदा व्यवस्था के लिए अस्वीकार्य साबित हुए हैं. असल में उन लोगों का देशद्रोह के आरोपो में भारतीय जेलों में दिन गुजारना इस बात का संकेत है कि उन्होंने इस व्यवस्था से नफरत किया था और इसे पूरे तौर पर बदलना चाहते थे. सिर्फ यही लोग भारत में बचे रह गए अच्छे लोग हो सकते हैं.

क्या केजरीवाल और उनके ‘लोग’ उनके बारे में सोचेंगे?

भारत एक हिंदू फासीवादी राज्य है

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/02/2012 01:42:00 PM

छात्र संगठन डेमोक्रेटिक स्टूडेंट्स यूनियन (डीएसयू) ने जेएनयू में कल रात में 'Anti-National', 'Seditionist', 'Terrorist', 'Separatist', Maoist: Branding, Persecution and witch-hunt of political voices of the oppressed by the fascist Indian state विषय पर एक पब्लिक मीटिंग आयोजित की. इसमें दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर शम्सुल इस्लाम, वकील और जनवादी अधिकार कार्यकर्ता बोज्जा तारकम और जानेमाने पत्रकार मोहम्मद अहमद काजमी ने बातें रखीं. वक्ताओं ने हिंदू फासीवादी भारतीय राज्य के सांप्रदायिक, फासीवादी, जन विरोधी, दलित-मुस्लिम-पिछड़ा-स्त्री-आदिवासी विरोधी चरित्र के विभिन्न पहलुओं पर अपनी बात रखी. प्रो इस्लाम ने आरएसएस और भारतीय राज्य के गहरे और नजदीकी संबंधों पर रोशनी डालते हुए भारतीय राज्य के हिंदू फासीवादी चरित्र को उजागर किया. बोज्जा तारकम ने कहा कि इस जन विरोधी, ब्राह्मणवादी, फासीवादी राज्य से मुक्ति पाने का उपाय यही है कि दलित, पिछड़े, मुसलिम और आदिवासी अपने जुझारू संघर्षों के जरिए राजनीतिक सत्ता पर कब्जा कर लें.

कार्यक्रम में मुख्य वक्ता मो. अहमद काजमी थे, जिनको अपनी बेबाक रिपोर्टों और विश्लेषणों की कीमत इस रूप में चुकानी पड़ी है कि उन्हें आतंकवादियों से संबंधों के झूठे आरोप में सात महीनों तक जेल में गुजारने पड़े. वे हाल ही में जमानत पर रिहा हुए हैं. उन्होंने अपने कुछ अनुभव रखे और देश-दुनिया के हालात पर टिप्पणी की. प्रस्तुत है काजमी के भाषण की रिकॉर्डिंग. इसके शुरुआती कुछ सेकेंड रिकॉर्ड नहीं हो पाए हैं.

बिहार में लैंगिक उत्पीड़न और प्रतिरोध

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/02/2012 11:40:00 AM


पिछले दिनों हरियाणा, आंध्र प्रदेश से लेकर बिहार तक में जिस तरह महिलाओं के खिलाफ हिंसा और लैंगिक उत्पीड़न की घटनाओं में तेजी आई है, वह किस चीज की ओर संकेत करता है. इसके तार कैसे भारतीय राज्य के सामाजिक चरित्र से जुड़ते हैं. क्या इसका मौजूदा शासक वर्ग के संकट से भी कुछ लेना-देना है. इन घटनाओं  पर अक्सर सामने आने वाली प्रतिक्रियाओं का वर्गीय चरित्र क्या होता है? जनवादी और प्रगतिशील ताकतों के लिए रास्ते क्या हैं? सुष्मिता ने अपने इस आलेख में इन्हीं सबको तलाशने की कोशिश की है. हालांकि यह लेख बिहार के विशेष संदर्भ में लिखा गया है, लेकिन यह विभिन्न राज्यों मे महिलाओं के खिलाफ उत्पीड़न में वृद्धि को समझने का एक साफ नजरिया भी देता है. साथ ही, उससे मुक्ति पाने के रास्ते की बात भी करता है.

लैंगिक उत्पीड़न के नए-नए सिद्धांत गढ़े जा रहे हैं. हरियाणा की खाप पंचायतों का कहना है कि इसके लिए चाउमिन जवाबदेह है. चाउमिन खाने से लोगों के हारमोन में असंतुलन हो रहा है. ममता बनर्जी का मानना है कि लड़के-लड़कियों का ज्यादा खुले रूप से मिलना इसके लिए जवाबदेह है. लड़कियों के पहनावे को तो बहुत पहले से ही जिम्मेदार ठहराया जाता रहा है. इन तमाम तर्कों में पहनावे वाले तर्क ने तो एक हद तक जगह भी बना ली है और इसको आधार बनाकर ड्रेस कोड की प्रक्रिया शुरू हुई है. इस तरह जो बातें की जा रही हैं, कुल मिलाकर उनका सार यह निकलता है कि पुरुष बलात्कार करने को बाध्य हो जाते हैं और ऐसे में बलात्कार की घटनाएं बढ़ रही हैं.

हाल के दिनों में पूरे देश में लैंगिक उत्पीड़न के मामलों में काफी वृद्धि हुई है. यदि क्राइम ब्यूरो के आँकड़ों पर नजर डालें तो 2011 में बलात्कार के मामलों में 2010 की तुलना में 9.2 फीसदी की वृद्धि हुई और कुल 24,206 मामले सामने आए. 2010 में 2009 की तुलना में मामलों में 3.6 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई थी. 2011 में सामने आए मामलों में 934 मामले बिहार के थे. 2010 में बिहार में 795 मामले सामने आए थे. बिहार में 2010 की तुलना में 2011 में आए मामले 17.84 फीसदी अधिक थे, जो अखिल भारतीय स्तर से करीब 8.2 फीसदी अधिक है. 2012 के आँकड़े तो और भी डरावने हैं. 2012 के महज 8 महीनों में यानी अगस्त तक ऐसे 645 मामले सामने आए हैं. इस तरह इन सरकारी आँकड़ों पर ही विश्वास किया जाए तो पता चलता है कि हाल में बलात्कार के मामलों में तेज वृद्धि हुई है. हालांकि दलितों के मामलों में स्थिति और वीभत्स है. दलित महिलाओं के साथ बलात्कार के मामले देष में 2010 में 1,349 से बढ़कर 2011 में 1,557 हो गए. ये 2010 के मुकाबले 15.4 फीसदी अधिक है. बलात्कार के सामान्य मामलों में जहाँ वृद्धि दर 9.2 फीसदी है, वहीं दलितों के मामलों में यह 15.4 फीसदी है. इसका मतलब है कि हाल के दिनों में दलित महिलाओं के उत्पीड़न में भारी वृद्धि हुई है. यहीं इस बात को याद रखा जाना जरूरी है कि दलित उत्पीड़न के तहत उन्हीं मामलों को दर्ज किया जाता है जिनमें उत्पीड़न का आधार जाति होता है. हालांकि हम यह भी जानते हैं कि दलित समुदाय के जातीय आधार पर बलात्कार के अधिकतर मामलों को भी सामान्य आईपीसी के तहत दर्ज किया जाता है या फिर कई मामले दर्ज ही नहीं किए जाते. यानी यदि आईपीसी के तहत दर्ज मामलों में से भी दलित उत्पीड़न के मामलों को अलग से देखा जाए तो दलित महिलाओं के साथ उत्पीड़न के मामले इससे कहीं ज्यादा निकलेंगे.

बिहार तो पहले से ही महिला उत्पीड़न और सामंती उत्पीड़न के मामले में कुख्यात रहा है. 1980 में कल्याण मुखर्जी द्वारा भोजपुर के नक्सलवादी आंदोलन पर लिखी किताब की शुरूआत ही एक दलित महिला लाखो द्वारा शारीरिक संबंध बनाने से इनकार करने पर उसकी हत्या कर दिए जाने की घटना से होती है. 1973 के मई महीने में सहार प्रखंड के चबरी गांव में जब लालमोहर की पत्नी के साथ जमींदार के बेटे ने खेत में काम करते हुए छेड़खानी की तो गांव की महिलाओं ने जमींदार के खेत में काम करने से मना कर दिया और लालमोहर ने हथियार उठा लिया. बिहार में जनसंहारों के दौरान महिलाओं के साथ बलात्कार के मामले जगजाहिर हैं. इतना ही नहीं जनसंहारों के दौरान गर्भवती महिलाओं के पेट से बच्चा निकालने की क्रूर घटनाएं भी किसी से छिपी हुई नहीं है. दलित महिलाओं को तो सामंत अपनी निजी संपति समझते रहे हैं. अभी हाल में फिर से महिला उत्पीड़न और उसमें भी दलित महिलाओं के उत्पीड़न में तेज वृद्धि हुई है.

पिछले 19 मई को मुजफ्फरपुर के धनौर गाँव की स्वयं सहायता समूह की संचालिका मीरा सहनी के बलात्कार के बाद उनकी हत्या स्थानीय दबंगों ने कर दी. यहाँ तक कि पीएमसीएच लाने के बाद डॉक्टरों ने कोई प्राथमिकी भी दर्ज नहीं करवाई. फिर काफी हंगामे और एक रिटायर्ड अधिकारी के हस्तक्षेप के बाद ही प्राथमिकी दर्ज की गई. कुछ ही दिनों बाद इसी गांव के बगल के ही कोपी गाँव की नौंवी की छात्रा खुशबू की बलात्कार के बाद हत्या कर दी गई. 7 जुलाई को वैशाली के सराय थाने के प्रबोधिचक रोशन गाँव की छात्रा कविता की बलात्कार के बाद हत्या कर दी गई. सीतामढ़ी जेल में एक महिला को माओवादी बताकर उसके साथ बलात्कार किया गया. इस तरह उत्तर बिहार में दलित महिलाओं पर दबंगों और सामंतों के अत्याचार बढ़ गया है. यह बलात्कार तो है ही, सामंती ताकतों द्वारा दलितों के मनोबल और संघर्ष को तोड़ने के औजार के बतौर भी इसका इस्तेमाल किया जा रहा है.

आँकड़ों और घटनाओं को देखकर लगता है कि उत्पीड़न में अचानक उछाल आ गया है. अब कुछ लोग कानून व्यवस्था की दुहाई देकर सारा दोष सरकार के ऊपर मढ़ रहे हैं तो कुछ लोग बाजार द्वारा रचे गए एक नए आवरण को जवाबदेह ठहरा रहे हैं. कुछ लोग इसे केवल पितृसत्ता का मामला बताकर कुछ प्रतीकात्मक कार्यक्रमों को संपन्न कर अपनी भूमिका की इतिश्री कर रहे हैं. लेकिन क्या मामला बस इतना भर ही है?

पितृसत्ता और उत्पीड़न

दुनिया की सारी निजी संपत्तियों में महिला सबसे ज्यादा निजी संपति रही है. अतिरिक्त उत्पादन और फिर उस पर मालिकाने की प्रक्रिया में महिला की आजादी पुरुषों के अधीन हुई और महिलाओं का काम इस निजी संपति के लिए उत्तराधिकारी पैदा करना रह गया. इस दौर में लैंगिक आधार पर श्रम विभाजन की प्रक्रिया भी शुरू हुई और महिलाओं को सामाजिक उत्पादन प्रक्रिया से बेदखल करके उन्हें घरेलू उत्पादन प्रक्रिया में बंधक बनाया गया. इस तरह से घरेलू उत्पादन तक बंधे रहने की प्रक्रिया ने उनकी गुलामी को और मजबूत किया. भारत में तो महिलाओं की स्थिति को मनुस्मृति के आधार पर निर्धारित किया गया. यहाँ महिलाओं को न केवल पुरुषों की निजी संपत्ति माना गया बल्कि उन्हें उनके शरीर तक ही सीमित कर दिया गया. इतना ही नहीं पुरूषों के इतर महिलाओं का कोई वजूद ब्राह्मणवाद ने स्वीकार ही नहीं किया. इसलिए हिंदू धर्म में तमाम व्रत अनुष्ठान महिलाएं पुरुषों के लिए या फिर एक बढि़या गृहस्थ जीवन के लिए करती है. इसका मतलब यह है कि धर्म, संस्कृति को भी एक ऐसे बंधन के रूप में तब्दील कर दिया गया जो महिलाओं को घरेलू जीवन के दायरे में ही बांध कर रखता है. महिलाएं पुरुषों की यौन तुष्टि और उत्तराधिकारी जनने का जरिया भर बना दी गईं हैं. निजी संपति को दूसरों के हवाले जाने से बचाने के लिए विधवा महिलाओं को सती करने, उनके बाल मुंड देने या फिर उन पर विभिन्न पाबंदियां थोपकर पुनर्विवाह की संभावनाओं को समाप्त कर दिया जाता है. घरेलू और छोटे स्तर का उत्पादन समाज में महिलाओं की इस स्थिति को बरकरार रखता है. इस तरह एक महिला का खुद अपने शरीर पर भी अपना हक नहीं होता. इतना ही नहीं जो महिलाएं निजी संपति के लिए उत्तराधिकारी पैदा करने में विफल रहीं उन्हें तो इंसान भी नहीं समझा जाता. भाषा में भी महिलाओं को हमेशा नीचा ही समझा गया. मसलन बाँझ, बदचलन, कुलटा जैसे तमाम शब्द महिलाओं को गाली देने के लिए गढ़े गए. इस तरह उत्पादन प्रक्रिया से लेकर धर्म, संस्कृति और भाषा तमाम स्तर पर महिलाओं को गुलाम बनाकर रखा गया. यह सामाजिक उपरिरचना महिलाओं को उत्पादन और उसके साधनों के मालिकाने से महरूम करती है और उनकी दयनीय स्थिति को बरकरार रखती है. यह उत्पीड़न तो तमाम महिलाओं को झेलना पड़ता है लेकिन भारत में ब्राह्मणवाद इस उत्पीड़न में भी वर्गीकरण का आधार तैयार करता है. इसमें ऊँची जाति की महिलाओं को जहाँ महज पितृसत्ता का शिकार होना पड़ता है वहीं दलित महिलाओं को वीभत्स जातीय उत्पीड़न का भी शिकार होना पड़ता है. इस तरह दलित महिलाओं की जिंदगी और भी जलालत भरी होती है. वह जहाँ घरेलू जीवन में उत्पीड़न का शिकार होती है वहीं वह सामंतों और दबंगों की भी निजी संपत्ति बन जाती है.

इस तरह दलित महिलाओं के जीवन को सामंती समाज और दूभर बना देता है. सामंती ताकतें इनको नीचा दिखाने के लिए बलात्कार को एक औजार के रूप में इस्तेमाल करती हैं. ठीक वैसे ही जैसे शासक वर्ग द्वारा बगावत विरोधी तरीके के रूप में बलात्कार को मजबूत औजार के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है. जाति आधारित समाज दलित महिलाओं के लिए समाज में सबसे नीचे के स्थान की गारंटी करता है. दलित महिलाएं ग्रामीण इलाकों में यौन उत्पीड़न के सबसे भद्दे रूप बलात्कार का सबसे ज्यादा शिकार होती हैं. दलित महिलाओं की बहुसंख्या संपत्तिहीन है और मूलतः दूसरे के जमीन पर काम करती हैं. ऐसे में एक ब्राह्मणवादी अर्धसामंती समाज में लैंगिक उत्पीड़न का खतरा उनके लिए काफी ज्यादा होता है. दबंगों की यौन कुंठा का सबसे अधिक शिकार भी इन्हें ही होना पड़ता है. इसकी बड़ी वजह यह है कि नौकरशाही में मौजूद सामंती प्रभुत्व दलित महिलाओं के साथ किए गए उत्पीड़न के मामलों को आसानी से रफा-दफा से कराने में सहायक होता है.

यह लगातार देखने में आया है कि मजबूत जातियाँ दलितों के प्रतिरोध के मनोबल को तोड़ने के लिए बलात्कार का इस्तेमाल करती है. बिहार में विभिन्न निजी सेनाओं द्वारा महिलाओं के खिलाफ अत्याचारों की घटनाओं से हम इसे समझ सकते हैं. सामान्य महिलाओं की बनिस्बत दलित महिलाएं इस अत्याचार का सबसे आसान शिकार बनती हैं. इस तरह भारतीय समाज में महिलाओं के एक बड़े हिस्से पर जारी अत्याचार महज पितृसत्तात्मक नहीं है बल्कि वह पितृसत्ता के साथ-साथ ब्राह्मणवाद से बंधा हुआ अर्धसामंती उत्पीड़न भी है.

लैंगिक उत्पीड़न और प्रतिरोध

भारतीय समाज में महिला मेहनतकशों के उत्पीड़न की एक बड़ी वजह जातीय आधारित अर्धसामंती उत्पीड़न है. इसलिए इस उत्पीड़न से राहत के लिए अर्धसामंती ताकतों के खिलाफ संघर्ष भी एक प्रमुख मुद्दा है. भारतीय समाज में दलित दासों की तरह जीने को अभिशप्त रहे हैं. ऐसे में कानून व्यवस्था और सरकार, सब दबंगों और मजबूत वर्गों के साथ खड़े होते हैं. इसकी बड़ी वजह यह भी है कि राजसत्ता पर अर्धसामंती प्रभुत्व इन्हें उत्पीड़न से मुक्ति दिलाने की किसी भी कोशिश को विफल करता है. देश में दलितों और महिलाओं की रक्षा के नाम पर अनगिनत कानून बने लेकिन इसका कोई भी परिणाम नहीं निकला बल्कि अत्याचार लगातार बढ़ते गए.

नक्सलवादी आंदोलन ने देश में सबसे पहले ब्राह्मणवाद से जुड़े हुए इस अर्धसामंती चरित्र को ठीक से समझा और इसे अपने आंदोलन का पहला निशाना बनाया. ग्रामीण इलाकों में अर्धसामंती प्रभुत्व के खिलाफ एक मजबूत संघर्ष शुरू हो गया. इस संघर्ष ने दलितों को शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न से तात्कालिक राहत दी और इन लोगों ने खुली हवा में सांस लेने का साहस किया. ऐसे में यह संघर्ष ग्रामीण इलाके में सामंती ताकतों के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया. इस संघर्ष ने समाज में दोहरा काम किया. एक तरफ इसने तात्कालिक राहत दी तो दूसरी तरफ दलितों के अंदर इज्जत के साथ जीने की एक नई चेतना का विस्तार भी किया. सामंती दबंग ग्रामीण इलाकों से भाग खड़े होने के लिए मजबूर हुए. अब दलित महिलाएं केवल पीडि़त नहीं रह गई थीं बल्कि उन्होंने प्रतिरोध करना सीख लिया था और वे अब योद्धा के रूप में तब्दील हो गई थीं. मध्य बिहार और भोजपुर में सामंतवाद विरोधी संघर्ष में महिलाओं का काफी उल्लेखनीय योगदान रहा है और उन्होंने सामंती उत्पीड़न के खिलाफ अपनी लड़ाई को पित्तृसत्ता के खिलाफ विस्तारित किया और शराबबंदी के लिए आंदोलन एक प्रमुख आंदोलन के रूप में तब्दील हुआ. इस तरह संघर्ष के इलाकों में महिलाओं को तात्कालिक राहत हासिल हुई

लेकिन कई इलाकों में संघर्षरत ताकतों के शासक वर्ग के साथ समझौते एवं उनके द्वारा तमाम आंदोलनों को बस कानूनी दायरों में समेटने तथा कई इलाकों में शासक वर्ग द्वारा इन आंदोलनों को कुचलने के लिए बर्बर संगठित दमन चलाए जाने से सामंतवाद विरोधी जनता की संगठित शक्ति कमजोर हुई. अब सामंती प्रभुत्व और जनशक्ति के बीच संतुलन थोड़ा कमजोर हुआ. मेहनतकश महिलाओं की व्यापक बदहाली के लिए जवाबदेह यह अर्धसामंती उत्पादन व्यवस्था है जो ब्राह्मणवाद से जुड़ी हुई है. इसलिए बगैर इसके खात्मे के महिलाओं की मुक्ति असंभव है. ऐसे में जनता की शक्ति के कमजोर होने से सामंती प्रभुत्व को फिर से मौका मिला है और ग्रामीण इलाकों में इन्होंने फिर से अपनी गुंडागर्दी शुरू कर दी है. ऐसे में फिर से महिलाओं खासकर दलित महिलाओं के खिलाफ उत्पीड़न में तेज वृद्धि हुई है.

इसके अलावा बिहार में नीतीश सरकार ने विकास के नाम पर विश्व बैंक की नीतियों को बेरोक-टोक लागू किया है. विश्व बैंक और एशिया विकास बैंक के भारी कर्जों के जरिए सड़क, पुल इत्यादि क्षेत्रों में भारी मात्रा में निवेश हुआ है. इस सरकारी पैसे ने ठेकेदारों और नौकरशाही की आमदनी में भारी इजाफा कर दिया. अब कुल मिलाकर विकास के नाम पर गैर उत्पादक क्षेत्रों में भारी निवेश ने रोजगार के क्षेत्र में तो कुछ खास नहीं किया लेकिन संभ्रांत किस्म की उपभोक्ता सामग्री के लिए बिहार एक ट्रेडिंग सेंटर जरूर बन गया. अब इस निवेश और तथाकथित विकास दर को बरकरार रखने तथा कर्जों का सूद चुकाने के लिए सरकार के लिए राजस्व बढ़ाना एक बड़ा काम था इसलिए हरेक पंचायत में शराब के ठेके आवंटित किए गए. अब शराब सरकार के राजस्व का सबसे प्रधान स्रोत हो गई. इस तरह अब ग्रामीण इलाकों में गुंडागर्दी के लिए शराब को कानूनी बना दिया गया है. जहाँ सामंती समाज या फिर दास समाज में महिलाओं की भूमिका उत्पादन के एक औजार के रूप मंे थी, चाहे स्वरूप जो भी हो, वहीं बाजार महिलाओं को एक उपभोग की इकाई बना देता है. इस तरह अब महिला केवल महिला नहीं रह जाती, बल्कि ‘माल’ बन जाती है. अब बिहार में एक तरफ सामंती-अर्धसामंती उत्पीड़न तो दूसरी तरफ महिलाओं के वस्तुकरण ने महिलाओं के लिए एक घिनौना माहौल तैयार किया है. उपभोग की एक इकाई के रूप में तब्दील करने के क्रम में महिलाओं को घर से निकालना बाजार के लिए एक प्रमुख काम है. इस क्रम में वह महिलाओं के सस्ते श्रम का दोहन भी करता है. वह महिलाओं के सशक्तीकरण के नाम पर उनके पुराने कुछ बंधन तोड़ता जरूर है लेकिन वह फिर एक नया बंधन बनाता है और इस तरह पित्तृसत्ता को तोड़ने के बजाए और मजबूत करता है. इसके आलावा चूंकि सामंतों को तोड़ने के बजाए बाजार उनके साथ गठजोड़ बनाता है इसलिए वो सामंती उत्पीड़न झेल रही महिलाओं के लिए शोषण के एक नए आयाम को जन्म देता है. टीवी चैनल फिल्में, महिलाओं के लिए मॉडलिंग के गुर के साथ-साथ अच्छी बहू और पत्नी बनने के गुर भी दिखाते हैं. हमारे देश में महिलाओं को इसी ‘मॉडलिंग के गुर’ और ‘अच्छी बहू बनने के गुर’ की चक्की के बीच पिसना पड़ रहा है. इसलिए शासक वर्ग एक तरफ लड़कियों के लिए सशक्तीकरण की बात करता है ठीक वहीं उनके लिए ‘ड्रेस कोड’ भी तय करता है. आज बाजार का यह अंतर्द्वंद्व बिहार में भी तेजी से बढ़ा है. एक तरफ इसने महिलाओं को चारदीवारी से निकलने की चेतना तो दी है लेकिन दूसरी तरफ पुरुष मानसिकता का लोकतंत्रीकरण नहीं हुआ है. बाजार भी इस विकृत मानसिकता को अपने लिए इस्तेमाल करता है. इसके अलावा वह यौन बाजार और कामुकता का एक नया बाजार बनाता है. ऐसे में पहले से ही यौन जीवन के इर्द-गिर्द बांध दी गई महिलाओं के व्यक्तिगत जीवन को यह और भी यौन केंद्रित कर देता है. पहले पुरुष समाज अपनी सामाजिक स्थिति की बदौलत खुद के मन मुताबिक रहने के लिए उसे बाध्य करता था. बाजार इसका इस्तेमाल कर एक ऐसा माहौल तैयार करता है जिसमें महिलाएं अब खुद को वैसा ही बनाती हैं जैसा पुरुष समाज उन्हें देखना चाहता है. ऐसे में बाजार घर से निकली महिलाओं को बाहर और कार्यस्थलों पर उत्पीड़न के लिए और असुरक्षित बना देता है. अब वह और अधिक लैंगिक उत्पीड़न की शिकार होती हैं. इसलिए हाल के दिनों में आम महिलाओं के बलात्कार में भी भारी इजाफा हुआ है. अर्धसामंती समाज में ब्राह्मणवादी ऊपरी रचना के साथ-साथ अर्धसामंती उत्पादन पद्धति और पुरुषसत्ता, तमाम चीजें बरकरार रहती हैं और यह अधिक ज्यादा प्रतिगामी हो जाती हैं. ऐसे में पुरुष मानसिकता के लोकतंत्रीकरण की कोई भी बात बेमानी है.

ऐसे में महिला उत्पीड़न के खिलाफ संघर्षों को भी दोहरे स्तर से गुजरना होता है. इसमें जहाँ अर्धसामंती समाज के जनवादी लोकतंत्रीकरण का संघर्ष जहाँ प्रधान है वहीं पित्तृसत्ता के खिलाफ संघर्ष भी साथ-साथ चलता है. जहाँ पहला संघर्ष दो दुश्मन वर्गों के बीच संपन्न होता है वहीं दूसरे संघर्ष को दोस्ताना संघर्ष के जरिए हल होना है. लेकिन पहले संघर्ष के बिना दूसरे लक्ष्य को हासिल करना नामुमकिन है. ऐसे में जो भी लोग संघर्ष को बस पितृसत्ता के दायरे में समेट रहे हैं असल में वे महिला मुक्ति के संघर्ष के बजाए महिलाओं को बाजार में आजादी के साथ महज खड़े होने के अधिकार की ही बात कर रहे हैं. असल में ये नारीवादी ताकतें महिलाओं को अपने शरीर तक सीमित रखकर पुरुष सत्ता को कमजोर करने के बजाए मजबूत ही करती हैं.

लैंगिक उत्पीड़न और इसके खिलाफ प्रतिक्रिया

हाल के दिनों में बढ़े लैंगिक उत्पीड़न पर कई तरह की प्रतिक्रियाएँ सामने आ रही हैं. इसमें सबसे प्रमुख माँग है कानून व्यवस्था को ठीक करने की माँग. कुछ लोग पितृसत्ता को जिम्मेवार बताकर अपने काम की इतिश्री कर ले रहे हैं. हाल में शहरों में छात्राओं के साथ बलात्कार में भारी वृद्धि हुई है. इसमें भी ‘गैंग रेप’ जैसी काफी घटनाएं सामने आई हैं. रेप के बाद हत्या कर देना या फिर उसे मार देने की कोशिश करने की घटनाओं में भी तेजी से वृद्धि हुई है. लेकिन ग्रामीण इलाकों में तो इसने और वीभत्स रूप ले लिया है. बिहार में इन घटनाओं पर बिहार के तथाकथित सभ्य समाज और प्रगतिशील तबकों से अलग-अलग प्रतिक्रिया हो रही है. जब लैंगिक उत्पीड़न समाज के एक तबके को दबाकर रखने और उत्पीडि़त करने का एक औजार बन जाए तो उस समाज को समझे बगैर उस समाज में किसी भी उत्पीड़न के खिलाफ होनेवाली प्रतिक्रियाओं को समझना मुश्किल है. ऐसे समाज में किसी भी उत्पीड़न के खिलाफ होनेवाली प्रतिक्रिया भी उस समाज के विभिन्न अंतर्विरोधों से तय होती है और यह प्रतिक्रिया हमेशा समान घटनाओं में समान नहीं होती. चूँकि ऐसे समाज में एक वर्ग या जाति (बिहार में) का प्रभुत्व होता है ऐसे में संभ्रांत लोगों के साथ होने वाली घटनाएं तो व्यापक रूप से सामने आती हैं और उसपर प्रतिक्रिया व्यक्त की जाती है लेकिन वहीं दलितों और कमजोर वर्गों की महिलाओं के साथ होने वाले अत्याचार को  स्वाभाविक मान लिया जाता है. या यह कहना मुनासिब होगा कि शासक वर्ग हमेशा समान मामलों में भी जाति और वर्ग के आधार पर ही अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करता है.

वैशाली में 7 जुलाई को एक दलित छात्रा के साथ एक स्थानीय दबंग ने बलात्कार कर उसकी हत्या कर दी. डेढ़ महीने तक इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं हुई बल्कि दबंगों ने पीड़िता के परिवार पर मुकदमा वापस करने का लगातार दबाव डाला. जाहिर तौर पर इन दबंगों को सत्ता का संरक्षण हासिल था. करीब सवा महीने बाद 16 अगस्त को लोगों ने सराय में मामले में कार्रवाई के लिए सड़क जाम किया. स्थानीय मुखिया के नेतृत्व में उन पर पुलिस ने हमला किया और फिर फायरिंग की. पुलिस फायरिंग में एक व्यक्ति की हत्या से आक्रोशित लोगों ने स्थानीय थाना जला दिया. सीतामढ़ी जेल में एक महिला को माओवादी बताकर जिला प्रशासन के लोगों ने उसके साथ बलात्कार किया. उत्तर बिहार में दलित और कमजोर वर्गों की महिलाओं पर कहर जारी है. शराबबंदी के लिए आंदोलन कर रही महिलाओं पर मुजफ्फरपुर मंे सरकारी कार्यालय में दबंगों और माफियाओं ने बर्बर हमला किया. लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी है कि वैशाली, मुजफ्फरपुर, मोतिहारी के इन इलाकों में इस उत्पीड़न के खिलाफ एक मजबूत जन संघर्ष का निर्माण भी हुआ है. मुजफ्फरपुर में शराबबंदी को लेकर बढ़ता आंदोलन भी इसका एक उदाहरण है. इन्हीं आंदोलनों के दौरान एक महिला नेता भारती की बुरी तरह पिटाई और गिरफ्तारी की खबरें भी अखबारों में आई. इन आंदोलनों पर सरकार और दबंगों का हमला भी तेज हुआ है. पटना जिले के मनेर थाना में दलित परिवार से आनेवाली, नौवीं और दसवीं में पढ़ रही दो बहनों के शादी से इनकार करने पर उनके चेहरों को तेजाब फेंककर जला दिया गया. यह घटना 21 अक्टूबर को शहर से मात्र 20-25 किमी की दूरी पर हुई है. लेकिन उत्तर बिहार में दमन और प्रतिरोध तथा अन्य इलाकों में दलितों पर होने वाले अत्याचारों के खिलाफ बिहार के इस तथाकथित सभ्य समाज ने कोई प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त की. सराय से लेकर मोतिहारी तक मेहनतकश महिलाएं हरेक दमन का प्रतिरोध करती रहीं लेकिन उनके पक्ष में कोई भी खड़ा नहीं होने आया. खुद को प्रगतिशील कहने वाले लोग महिला उत्पीड़न के खिलाफ बोलते रहे लेकिन उत्तर बिहार में महिला उत्पीड़न के खिलाफ होने वाले प्रतिरोध पर बर्बर दमन पर सबने चुप्पी साध ली. इन महिला आंदोलनों को नेतृत्व देने वाली महिला भारती की अमानवीय पिटाई और गिरफ्तारी पर भी सबने चुप्पी साध ली. इस तरह शहरों में घटनेवाली घटनाएं तो चर्चा में आईं लेकिन ग्रामीण इलाकों में होने वाले बलात्कार कभी मुद्दा भी नहीं बन पाए.

वहीं दूसरी तरफ मधुबनी में एक सिरकटी लाश (उसे जिस व्यक्ति की लाश होने का दावा किया जा रहा था, बाद में वह जिंदा निकला) को हासिल करने के लिए हुए बवाल पर पुलिस फायरिंग के खिलाफ वामपंथी से लेकर दक्षिणपंथी तक एकजुट हो गए. इस बार राज्य में विरोध की एक संगठित अभिव्यक्ति सामने आई. यहाँ दो उदाहरणों को सामने रखने का मतलब यह कहना नहीं है कि मधुबनी गोलीकांड के खिलाफ कोई प्रतिरोध नहीं होना चाहिए बल्कि यह कहना है कि तथाकथित सभ्य समाज और वामपंथी ताकतें यह दोहरा मानदंड कैसे अपना सकती है? क्या यह महज संयोग है कि यह तथाकथित जनाक्रोश ब्रह्मेश्वर मुखिया की हत्या या फिर मधुबनी में एक गुमनाम लाश को हासिल करने के लिए सामने आता है? क्या यह भी महज संयोग है कि ग्रामीण इलाकों में दलित महिलाओं के साथ घटने वाली इससे भी वीभत्स घटनाओं से किसी का दिल नहीं दुखता? जवाब बिल्कुल साफ है कि आज भी शासक वर्ग पर सामंती प्रभुत्व मजबूत है. ऐसे में जाति आधारित समाज में शासक वर्ग की प्रतिक्रिया भी इस जातीय मानसिकता अलग नहीं होती. एक तरफ कमजोर वर्ग और दलितों के प्रतिरोध को एकदम शुरू से दमन का शिकार बनाया जाता है वहीं दबंगों और सामंती ताकतों के तथाकथित जनाक्रोश को निकलने की खुली छूट दी जाती है. अब जाहिर तौर पर समाज में आगे बढ़े हुए तबके से एक स्वतः स्फूर्त अभिव्यक्ति सामने आती है. संसदीय राजनीति में इस तथाकथित जनाक्रोश का इस्तेमाल करने के लिए तमाम शासक वर्गीय पार्टियों से लेकर वामपंथी पार्टियां तक इसके पीछे दौड़ पड़ती हैं. क्या कविता पासवान, मीरा सहनी और खुशबू जैसी महिलाओं की माँओं का दर्द यह सभ्य समाज कभी नहीं समझेगा जिस तरह इसने मधुबनी में प्रशांत की माँ के दर्द को समझा था? शायद तब तक नहीं जब तक इस सामंती प्रभुत्व को चकनाचूर नहीं कर दिया जाता.

महिला आंदोलन की दिशा

बिहार में हाल में बढ़ी घटनाओं पर अलग-अलग महिला संगठनों ने राय जाहिर की है और कानून व्यवस्था सुधारने की माँग की है. कुछ संगठनों ने पितृसत्ता की मुखालिफत की बात की है. लेकिन यहीं यह सवाल बनता है कि अबतक के कानूनों ने महिलाओं और दलितों की कितनी मदद की है? बल्कि सच तो यह है कि दलित उत्पीड़न के तहत दर्ज किए गए अधिकतर मामलों को फर्जी करार दिया जाता है. ऐसे में इन उत्पीड़नों के खिलाफ संघर्ष का रास्ता क्या हो?

हमारे समाज में लैंगिक उत्पीड़न की जड़ समाज की ब्राह्मणवादी जातीय व्यवस्था और अर्धसामंती उत्पादन प्रक्रिया में निहित है. इसलिए इसका खात्मा भी इस आधार के खात्मे के साथ ही होगा. इस आर्थिक आधार को बदले बगैर और जातीय उन्मूलन के लिए संघर्ष के बगैर इस उत्पीड़न का खात्मा भी संभव नहीं है. कई महिला संगठन महिला आरक्षण को लैंगिक उत्पीड़न के खात्मे के एक महत्वपूर्ण औजार के रूप में प्रचारित कर रहे हैं. ऐसे में उन्हें इस बात का भी जबाव देना चाहिए कि बिहार में पंचायतों में 50 फीसदी महिला आरक्षण ने महिला उत्पीड़न को कम करने में कितनी और कैसी भूमिका अदा की है.

बिहार में अलग-अलग संगठन अलग-अलग तरीकों से इस उत्पीड़न के खिलाफ दिशा अपना रहे हैं. कुछ महिला संगठन इसमें सरकार से हस्तक्षेप की बात कर रही हैं. एक महिला संगठन की राष्ट्रीय महासचिव ने राजधानी में घोषित कर दिया कि उत्पीड़न के खिलाफ इस संघर्ष में रूपम पाठक उनके लिए प्रेरणा स्रोत हैं. मालूम हो कि रूपम पाठक ने एक विधायक की हत्या कर दी थी और कहा था कि उक्त विधायक लंबे समय से उसका यौन शोषण कर रहा था और उसकी नजर उसकी बेटी पर था. क्या सच में रूपम पाठक बिहार में महिलाओं के संघर्ष के लिए प्रेरणा स्रोत हो सकती है? शायद हो सकती है लेकिन उनके लिए जिनका जनता और उसके संघर्षों से विष्वास खत्म हो गया हो. इसके अलावा बात यह भी है कि रुपम पाठक का आवरण कुछ लोगों के लिए ज्यादा सुविधाजनक है.

इन संगठनों की दिशा के साथ मूल दिक्कत यह है कि वे जमीनी स्तर से उत्पीड़न के खिलाफ संघर्ष के निर्माण की अनदेखी करते हैं और तमाम संघर्ष को महज प्रतीकात्मक प्रतिरोध तक सीमित करके इसे सरकार विरोधी संसदीय और कानूनी दायरों तक सीमित रखते हैं. बिहार में परिवर्तनकामी महिला आंदोलन की मजबूत परंपरा रही है. सैकड़ों दलित और मेहनतकश महिलाओं ने तमाम तरह के दमन और उत्पीड़न के बावजूद आंदोलनों को नेतृत्व दिया है. उन्होंने कुर्बानियों की मिसालें कायम की हैं. इतिहास भी गवाह है कि महिला उत्पीड़न के खिलाफ समानता के अधिकार के लिए संघर्ष का नेतृत्व भी मेहनतकश महिलाओं ने ही किया. मेहनतकश महिलाओं के संघर्ष ने ही अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के लिए रास्ता प्रशस्त किया. भले ही उदारवादी और बुर्जुआ नारीवादी ताकतों ने इस अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस को मेहनतकशों के संघर्षों से जुदा करके इसे एक महज एक सेलिब्रेशन दिवस में बदल दिया. आज के हालात में बाजार की ताकतों और काॅरपोरेट घरानांे के लिए यह फायदेमंद भी था.

लेकिन महिलाओं का संघर्ष इन सबके बावजूद जारी है. बिहार में भी महिला आंदोलन की सुगबुगाहट दिख रही है. उत्तर बिहार में लैंगिक सामंती उत्पीड़न के खिलाफ मेहनतकश महिलाएं लगातार संघर्षरत हैं. महज सामंती उत्पीड़न ही नहीं बल्कि शराबबंदी के लिए आंदोलन का निर्माण भी मुजफ्फरपुर के इलाके में हो रहा है. इसकी नेतृत्वकारी महिलाओं पर भारी राजकीय दमन जारी है, इसके बावजूद आंदोलन आगे बढ़ रहा है और शराबबंदी के लिए आंदोलन तो एक अभियान के रूप में तब्दील हो चुका है. इस आंदोलन ने बिहार में महिलाओं के लैंगिक उत्पीड़न के खिलाफ एक आशा की किरण जगाई है. आज जरूरत है कि नारी आंदोलन में इन तमाम बुर्जुआ नारीवादी और उदारवादियों को खारिज किया जाए जो समूचे महिला आंदोलन को देह और पितृसत्ता के दायरे में केंद्रित करती है. लेनिन ने महिला आंदोलन की दिशा पर बात करते हुए कहा था, ‘‘मेहनतकश औरतों के आंदोलन का मुख्य उद्देश्य औरतों के केवल औपचारिक समता के लिए नहीं, बल्कि आर्थिक और राजनीतिक समता के लिए लड़ना है. मुख्य काम औरतों को उत्पादक सामाजिक श्रम में खींचना है, उन्हें घरेलू गुलामी से निकालना है, रसोईदारी और धायगीरी के चिंतन तथा एकांतिक वातावरण की हतबुद्धिकर और अपमानजनक गुलामी से मुक्त करना है. यह एक लंबा संघर्ष है जिसके लिए सामाजिक तकनीक तथा रिवाज दोनों का ही आमूल पुनर्निमाण आवश्यक है.’’ (मेहनतकश औरतों के अंतर्राष्ट्रीय दिवस के उपलक्ष्य में, 4 मार्च, 1920). यानी राजनीतिक-आर्थिक परिवर्तन के लिए संघर्ष के साथ कदमताल करके ही लैंगिक उत्पीड़न का खात्मा हो सकता है और जाहिर तौर पर इस लड़ाई का नेतृत्व देह की सिद्धांत की व्याख्या करने वाली बुर्जुआ नारीवादी नहीं बल्कि मेहनतकश महिलाएं ही करेंगी.

रास्ता जटिल और दुर्गम है, लेकिन हम जानते हैं कि मेहनतकशों ने ही जटिल और दुर्गम रास्ते को सुगम बनाया है. आइए, हम मेहनतकश महिलाओं की अगुवाई में खड़े होने वाले सामंतवाद विरोधी आंदोलन के साथ एकजुटता जाहिर करें और उनको सलाम करें. यही वह रास्ता है जो इन तमाम दबंगों और उत्पीड़कों से मुक्ति दिलाकर पितृसत्ता को ध्वस्त करेगा. अब वक्त है अपने कंधे पर उठाए आधे आसमान पर कब्जे के लिए आगे बढ़ने की और इसका रास्ता सामंतवाद विरोधी संघर्षों के निर्माण और फिर परिवर्तन से ही संभव है न कि संसदीय दायरों तक सीमित होने वाले सुधारवादी और कानूनी आंदोलनों से.

फैजाबाद दंगा पूर्वनियोजित था

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/29/2012 08:04:00 PM

फैजाबाद 29 अक्टूबर 2012/ फैजाबाद में हुए दंगों की जांच के लिए रिहाई मंच के एक जांच दल ने 28 अक्टूबर को फैजाबाद के कर्फ्यूग्रस्त इलाकों का दौरा किया। जांच दल ने पाया कि दंगा पूर्वनियोजित था, जिसकी तस्दीक यह बात करती है कि बहुत कम समय में फैजाबाद के कई स्थानों पर टकराव, व तनाव का होना है। 21-22 सितंबर की रात देवकाली मंदिर की मूर्ती के चोरी होने और 23 अक्टूबर को उसके मिलने का प्रकरण और उस पर हुई सांप्रदयिक राजनीति इस दंगे की प्रमुख वजहों में से एक थी। हिन्दुत्वादी समूहों के अफवाह तंत्र ने आमजनमानस के भीतर इस बात को भड़काया कि देवकाली की प्रतिमा को मुसलमानों ने चोरी किया। केंद्रिय दुर्गा पूजा समिति फैजाबाद ने भी कहा था कि वो पूजा पांडालों पर विरोध स्वरुप पांडालों को कुछ घंटों तक दर्शन के लिए बंद रखा जाएगा। यहां गौरतलब है कि केंद्रीय दुर्गा पूजा समिति फैजाबाद के अध्यक्ष मनोज जायसवाल समाजवादी पार्टी के भी नेता हैं। पर ऐन वक्त 23 अक्टूबर को मूर्तियों के बरामद होने के बाद हिन्दुत्वादी शक्तियों के मंसूबे पस्त हुए। क्योंकि मूर्ति की चोरी में पकड़े गए लोग हिंदू निकले ऐसे में ऐन वक्त में पहले से प्रायोजित दंगों के लिए अफवाहों का बाजार गर्म करके जगह-जगह पथराव करके दंगे की शुरुआत की गई। पहले से तैयार भीड़ ने प्रायोजित तरीके से सैकड़ो साल पुरानी मस्जिद हसन रजा खां पर हमला बोला ओर उसके आस-पास की तकरीबन तीन दर्जन से ज्यादा दुकानों में लूटपाट व आगजनी की और पूरे फैजाबाद को दंगे की आग में झोक दिया।

पुलिस की निष्क्रियता का यह आलम रहा कि चैक इलाके की साकेत स्टेशनरी मार्ट को दंगे के दूसरे दिन 25 अक्टूबर को पुलिस की मौजूदगी में फूंका गया। बाद में जब दुकान के मालिक खलीक खां ने प्रशासन से एफआईआर दर्ज करने की मांग की तो यह कहकर पुलिस ने हिला हवाली की कि बिजली की शार्ट शर्किट की वजह से आग लगी।

जांच दल के आलोक अग्निहोत्री, राजीव यादव और सुब्रत गुप्ता ने कहा कि प्रथम दृष्ट्या प्रयोजित दंगों में अफवाह तंत्र के सक्रिय होने और फैजाबाद प्रशासन की निष्क्रियता के चलते दंगाइयों का मनोबल बढ़ा और कुछ घंटों में उन्होंने प्रायोजित तरीके से आगजनी और लूट-पाट की। जांच दल के सामने यह तथ्य आये, कि दंगे को दशहरा-ईद-दीपावली के ऐन वक्त कराने के पीछे दंगाइयों की यह मानसिकता भी सामने आई की ज्यादा से ज्यादा लूट और आगजनी करके मुस्लिम समुदाय को नुकसान पहुंचाना।

रिहाई मंच द्वारा फैजाबाद दंगों के तथ्य संकलन का काम जारी है। मंच ने प्रथम दृष्टया तथ्यों के आधार पर यह वक्तव्य जारी करते हुए देश के विभिन्न मानवाधिकार सामाजिक व राजनीतिक संगठनों से अपील की है कि वो फैजाबाद के उक्त घटनाक्रम का संज्ञान लेते हुए अपनी जनपक्षीय प्रतिबद्धताओं व सरोकारों के साथ साम्प्रदायिक ताकतों का प्रतिरोध करें।

राजीव यादव द्वारा जारी
संपर्क:09452800752, 09415254919

रंगभेद की पहली सीख: एदुआर्दो गालेआनो का लेख

Posted by Reyaz-ul-haque on 9/18/2012 12:29:00 PM


उरुग्वे में जन्मे एदुआर्दो गालेआनो अभी के सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले लातिन अमेरिकी लेखकों में शुमार किए जाते हैं। लेखन और व्यापक जनसरोकारों के संवाद के अपने अनुभव को साझा करते हुए गालेआनो इस बात पर जोर देते हैं कि ‘लिखना यों ही नहीं होता बल्कि इसने कइयों को बहुत गहरे प्रभावित किया है।’ यह अनुवाद उनकी किताब Patas arriba: la escuela del mundo al revés (1998) (पातास आरिबा: ला एस्कुएला देल मुन्दो आल रेबेस । उलटबांसियां: उल्टी दुनिया की पाठशाला) का एक हिस्सा है। यह किताब ‘ग्लोबलाइज्ड’ समय के क्रूर अंतर्विरोधों और विडंबनाओं का खाका  है जो भारत सहित तथाकथित ’तीसरी दुनिया’ के देशों के लिए बहुत मौजूं है। इस किताब का अनुवाद जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के लातिन अमेरिकी साहित्य के शोधार्थी पी. कुमार मंगलम कर रहे हैं। समयांतर के अक्टूबर, 2011 के अंक में गालेआनो के एक लेख का उनका किया हिंदी अनुवाद छप चुका है, जिसे बाद में हाशिया पर भी प्रकाशित किया गया।


किसी जगह काम करने वाले लोगों को हमेशा ऊपर के बाबुओं की जी हुजूरी करनी चाहिए, उसी तरह जैसे औरतों को पुरुषों की बात माननी ही चाहिए। कुछ लोगों का जन्म ही हुक्म देने के लिए होता है।

जिस तरह किसी व्यक्ति के पुरुष होने भर से उसे महिलाओं पर हुक्म चलाने का अधिकार मिल जाता है, उसी तरह रंगभेद भी किसी खास रंगवाले परिवार में जन्म लेने भर से किसी का जीवन भर औरों से नीचे और कमतर रहना तय कर देता है। यह वैसे ही है जैसे गरीबी के लिए शोषण की ऐतिहासिक प्रक्रिया को नहीं, बल्कि गरीबों को ही जिम्मेवार ठहरा दिया जाता है। यह बताया-सिखाया जाता है कि गरीबी और रंगभेद के मारे लोग तो अपना यही नसीब लेकर पैदा होते हैं। यह सब कुछ यहीं नहीं रुकता। यह भी मान लिया गया है कि समाज के हाशिए पर फेंके गए ये लोग स्वभाव से ही अपराधी होते हैं। ऐसे में काली चमड़ी के किसी गरीब के दिखते ही अपराध और डर का भयानक माहौल बना दिया जाता है।

भ्रम, मान्यताएं और इतिहास के सबक

दोनों अमेरिकी महादेशों और यूरोप में भी पुलिस की कार्रवाई अपने रंग के खिलाफ थोपे गये पूर्वाग्रहों के शिकार लोगों को ही निशाना बनाती है। पुलिसिया शक के घेरे में आया हर वह व्यक्ति जो गोरा नहीं है, सबके दिलो-दिमाग में दर्ज इस भ्रम को किसी भी कानून से कहीं ज्यादा कठोर बना देता है कि अपराध का रंग हर हाल में काला, भूरा या कम से कम पीला तो होता ही है।

इस तरह कुछ लोगों को अपराधी बता देने वाली यह सोच दरअसल इतिहास की सच्चाइयों को जान-बूझकर नजरअंदाज करती है। और ज्यादा नहीं तो सिर्फ पिछले पांच सौ सालों की बात करें तो यह मानना पड़ेगा कि गोरी चमड़ी के अत्याचार कम नहीं हैं। पुनर्जागरण के दौर में गोरे दुनिया की कुल आबादी का मुश्किल से पांचवां हिस्सा थे, तब भी वे इसका ‘दैवीय’ संदेश दुनिया भर में फैलाते (या कहें कि थोपते) टूटे पड़ रहे थे। इसी ‘दैवीय’ इच्छा की गोरी करतूतों ने अमेरिकी महाद्वीपों में जितने मूलवासियों को मारा उनकी गिनती तो फिर भी की जा सकती है (लेखक के अनुसार यह संख्या लाखों में है-अनु.) लेकिन अफ्रीका में ऐसे ही लोगों  का आंकड़ा कहीं नहीं मिलता ।

अमेरिका और अफ्रीका के मूलवासियों का भयंकर शोषण करने वाले, उनकी खरीद-बिक्री करने वाले और उनकी आगे की पीढ़ियों तक को वहां के कारखानों व बागानों में बंधुआ मजदूर बना देने वाले यूरोप के राजा गोरे ही थे। ‘सभ्यता’ की आड़ में पूरी दुनिया पर हावी साम्राज्यवाद के अनगिनत क्रूर कानून गोरों ने ही बनाए थे। पिछली सदी के दो विश्व युद्धों में चौंसठ लाख से भी ज्यादा हत्याओं, जिनमें ज्यादातर आम लोग ही थे, के अगुआ गोरी चमड़ी वाले यूरोपीय और जापानी थे। और यहूदियों सहित कम्युनिस्टों, बंजारों व समलैंगिकों को यातना शिविरों में मारने वाले नाजी भी गोरे ही थे।

दुनिया में आज तक कायम हुए सभी साम्राज्यों की कोशिश यह साबित करने की रही है कि कुछ लोग तो पैदा ही आजाद रहने के लिए हुए हैं क्योंकि बाकियों की किस्मत में सिर्फ़ गुलामी बदी है। वैसे यूरोपीय लालच को पूरा करते पुनर्जागरण और अमेरिका पर कब्जे के साथ ही यह मान्यता अपने सबसे घिनौने रूप में सामने आई। तब से ही दूसरे देशों पर कब्जा करने और बनाए रखने के लिए रंगभेद का इस्तेमाल होता आया है। तभी तो गुलामी झेलते समाजों के ज्यादातर लोग अपना ही देश चलाने लायक नहीं समझे जाते और गोरे खुद-ब-खुद उनके भाग्यविधाता हो जाते हैं। कब्जा करने वाले देशों में भी शासन प्रक्रिया में गोरों की ही चलती है जहां अन्य समुदाय हाशिए पर फेंक दिए गए हैं। देखा जाए तो साम्राज्यवाद को जितनी जरूरत बारूद की पड़ी उतना ही रंगभेद भी उसके काम आया। तब रोम में बैठे पोप का काम ही इस तरह चले लूटखसोट को ‘दैवीय’ इच्छा ठहराना हो गया था। कब्जे और लूट को कानूनी हैसियत देते तथाकथित ‘अंतर्राष्ट्रीय कानून’ भी उसी दौर में आए, तभी जब रंगभेद गुलाम समाजों के दमन और उनके संसाधनों की लूट का रास्ता बना रहा था।

स्पेनी कब्जे में रहे दक्षिण अमेरिका में तो व्यक्तियों की सामाजिक हैसियत उनके खून में मिले नस्लों के हिसाब से तय कर दी गई। इस तरह बनी सामाजिक सीढ़ी की पहचान कराती एक पूरी शब्दावली ही गढ़ ली गई। उदाहरण के लिए, गोरी और अश्वेत नस्लों का मेल बताता शब्द ‘(Mulato-मुलातो )’ दरअसल ‘ (mula- मूला)’ से बना है जिसका अर्थ है खच्चर, यानी गधे और घोड़ी की पैदाइश। ‘नई दुनिया’ में यूरोपीयनों, अमेरिकीयों व अफ्रीकीयों के पंचमेल से निकली हजारों पहचानों को अलगाता व उनके बीच ऊँच-नीच भरता यह कोई अकेला शब्द नहीं था। इनमें से कई तो सीधे-सादे हैं जैसे कि (castizo-कास्तिशो- पुराना), (cuarteron- क्वारतेरोन- नस्ल का चौथाई हिस्सा), (quinteron-किंतेरोन- नस्ल का पांचवा हिस्सा), (morisco-मोरिस्को- इस्लाम से धर्मांतरित ईसाई)’ (lobo-लोबो- असभ्य) आदि। कई और दो-तीन शब्दों को जोड़कर बनाए गए हैं जैसे कि (torna atras- तोर्ना आत्रास- पीछे जाओ) (ahi te estas-आइ ते एस्तास- तुम वहां हो)  और (no te entiendo- नो ते एन्तिएन्दो- मैं तुम्हें नहीं समझा)।

इन सभी नामों में नो ते एन्तिएन्दो (मैं तुम्हें नहीं समझा) इतिहास की सच्चाइयों को सबसे सही ढंग से बयान करता है। अमेरिकी महाद्वीप को ‘खोज’ लिए जाने से लेकर अब तक के पांच सौ साल ऐसे ही ‘नहीं समझे’ गए लोगों का सिलसिला है। कोलम्बस ने अमेरिकी मूलवासियों को हिन्दुस्तानी, क्यूबा के लोगों को चीनी व हैती के बाशिंदो को जापानी समझा और पेश किया था। कोलम्बस के भाई बार्तोलोमे ने ही अमेरिकी महादेशों में मौत की सजा देने की शुरुआत की थी। नए ईसाई धर्म के प्रतीकों को शुभ मानकर उन्हें बीजों के साथ बोने के ‘महापाप’ में उसने छ्ह मूलवासियों को जिंदा जला दिया था। Conquistadores (कोन्किस्तादोरेस - विजेता) कहलाए हमलावरों ने मेक्सिको के पूर्वी तट के आस-पास बसने वालों से वहां का नाम पूछा। उनकी भाषा से बिल्कुल अनजान मूलवासियों ने यह  कहा कि “वे(मूलवासी) उन्हें समझ नहीं पा रहे” और अपनी माया संस्कृति की भाषा के युकातान  शब्द का प्रयोग किया। तब से इस जगह का नाम ही युकातान  पड़ गया। दक्षिण अमेरिका के बिल्कुल बीच में मौजूद एक झील का नाम पूछने पर वहां के लोगों ने उन्हें पानी के लिए पूछा और इपाकाराई  जैसा कुछ कहा। यही आज के पराग्वे की राजधानी आसुन्सियोन से सटे इस झील का नाम भी बन चुका है। मूलवासियों के शरीर पर कभी भी ज्यादा बाल नहीं थे, लेकिन 1694 में दिक्सिओनारे उनिवर्सल (विश्वकोश) लिखने वाले आंतोइने फुरेतिएरे ने उन्हें बालों से भरे शरीर वाला बतलाया। वह दरअसल बाहर के ‘जंगलियों’ को बालों से भरे बंदर की तरह दिखाती रही यूरोपीय समझदारी को ही दुहरा रहे थे। 1774 में  ग्वातेमाला के गांव सान आंद्रेस इत्जापान  में एक ईसाई धर्मगुरु ने  यह देखा कि वहां के मूलवासी वर्जिन मेरी  नहीं, बल्कि उसके पांवों के पास पड़े सांप को पूजते थे। वह उनके लिए पुराने दिनों की साथी और माया संस्कृति की देवी का रूप था। धर्मगुरू यह देख भी अचकचाए कि मूलवासी ईसाई सलीब भी इसीलिए पूजते थे कि यह धरती और वर्षा के मिलने का भान देता है। ठीक उसी वक्त,  सुदूर जर्मनी के कानिग्सबर्ग में  बैठे दार्शनिक इमैनुएल कांट अमेरिका का भविष्य बता रहे थे। वे यह फरमान सुना रहे थे कि “अमेरिका के मूलवासी तो सभ्य जीवन के बिल्कुल अयोग्य थे और आज नहीं तो कल खत्म होने वाले थे”। यह बात और है कि कांट ने कभी  अमेरिका देखा भी नहीं था। जो भी हो, मूलवासियों के जीवन का सच यही था, भले ही यह उनकी अपनी वजह से बिल्कुल नहीं रहा हो। ‘सभ्य’ यूरोपियनों की मार-काट, उनके साथ आए जानलेवा रोगों और बागानों तथा सोने-चांदी की खदानों में हाड़तोड़ बेगार से बहुत कम ही मूलवासी जिंदा बच पाए थे।

पहचान

“मेरे पूर्वज कहां हैं? मैं किन्हें याद करूं और अपना मानूं? मेरी जड़ें कहां है? मेरा सबसे पहला पूर्वज बहुत सालों पहले अमेरिका का एक मूल निवासी था। आप गोरे लोगों के पूर्वजों ने तो उसके जीते-जी ही उसपर अपनी ‘सभ्यता’ थोप दी। वो खत्म हो गया। और मैं अब उसका ही एक अनाथ अंश हूं।’’
- मार्क ट्वेन के शब्द जो एक गोरे थे। (न्यूयार्क टाइम्स को 26 दिसम्बर 1891 में प्रकाशित)


कितनों को तो सिर्फ़ इसलिए कोड़े मारे गए, जिंदा जलाया या फांसी चढ़ाया गया क्योंकि वे मूर्तिपूजा का ‘पाप’ कर रहे थे। गोरी ‘सभ्यता’ के लिए बिल्कुल अयोग्य मूलवासी प्रकृति के साथ पूरे ताल-मेल की जिंदगी जीते थे। वे और उनके मौजूदा वंशज इसी विश्वास को जीते रहें हैं कि धरती और उस पर चलने वाली या उससे निकलने वाली हर चीज पवित्र और इसीलिए बचाए जाने लायक है।

सदियां बीत गईं, लेकिन ‘सभ्यता’ की गलतियां नहीं सुधारी गईं। अठारहवीं सदी के आखिर में अर्जेंटीना के दक्षिणी भाग में ‘रेगिस्तान-विकास’ के सैन्य अभियान ने वहां के मूलवासियों को खतम कर डाला था। यह बात है और कि तब पातागोनिया का यह क्षेत्र आज के मुकाबले कहीं ज्यादा हरा-भरा था। अभी कुछ साल पहले तक अर्जेंटीना में मूलवासी समुदायों में प्रचलित नाम रखने की मनाही थी। और तो और ऐसे सभी नामों को विदेशी घोषित कर दिया गया था।

मानवशास्त्री कातालिना बुलिउबासिच बताती हैं कि देश के उत्तरी साल्ता पहाड़ी इलाके के मूलवासियों को सरकारी रिकार्डों का हिस्सा बना देने का नायाब तरीका ढूंढ़ लिया गया था। अपने समुदायों के नामों की जगह उन्हें जो नाम दिए गए थे वास्तव में वे सभी विदेशों से आए थे। जैसे कि शेवरलेट, फोर्ड (दोनों मशहूर उत्तर अमेरिकी कार कंपनियां), वेइंतिसीएते (स्पेनी भाषा का सत्ताइस), त्रेसे (स्पेनी भाषा का तेरह) आदि। यहां तक कि कुछ को  मूलवासियों को हाशिए पर डाले रखने के बड़े हिमायती रहे देश के पूर्व राष्ट्रपति दोमिंगो  फौस्तिनो सारमिएंतो का नाम भी दे दिया गया।

न्याय प्रक्रिया

1986 में मैक्सिको की संसद के एक सदस्य चियापास क्षेत्र के सेर्रो उएको जेल के दौरे पर गए। वहां उनकी मुलाकात त्सोत्सिल नामक मूलवासी समुदाय के एक कैदी से हुई जिसे अपने पिता की हत्या के जुर्म में तीस साल की सजा सुनाई गई थी। लेकिन उन्हें यह मालूम हुआ कि उसका मृत पिता तो रोज ही उसके लिए ऑमलेट और सोयाबीन ले आता था।
दरअसल उस कैदी का पाला एक ऐसी न्याय व्यवस्था से पड़ा था जहां मुजरिम से सवाल-जवाब करने और सजा सुनाने की भाषा स्पेनी थी जो कि उसकी समझ के लगभग बाहर ही थी। कानून के डंडे ने उससे  Parricidio –पार्रिसीदियो  (पितृहत्या) जैसा कुछ कुबुलवा ही लिया था ।

आजकल, काफी हद तक मूलवासियों की ही मेहनत पर बाजारी ‘विकास’ के लिए मचलती अर्थ्व्यवस्थाओं के लिए ये समुदाय एक बोझ से ज्यादा कुछ भी नहीं हैं। मिटा दिए जाने की तमाम कोशिशों के बावजूद मूलवासी बहुल रह गए देशों में एक ग्वातेमाला में भी ये समुदाय सबसे सताए हुए लोग हैं। वहीं खुद को मिश्रित और गोरी नस्लों का बताते लोग मायामी के रईसों के पहनावे और खाने की नकल में मूलवासीयों से अलग दिखने की खामख्याली पाले रहते हैं। इस सबके बीच हजारों विदेशी सैलानी देश के चीचीकास्तेनांगो  बाजार का रुख करते हैं, जहां वे कल्पना शक्ति और कला का अद्भुत मेल बनी इन्हीं मूलवासियों की हस्तकारी खरीदते हैं।

1954 में सत्ता हथियाने वाले कर्नल कार्लोस कास्तिल्यो आरमास की ख्वाहिश ग्वातेमाला को डिज्नीलैंड बनाए देने की थी। मूलवासियों को ‘अज्ञान’ और ‘पिछड़ेपन’ से उबार लेने के लिए वह उन्हें सुंदरता की पहचान कराना चाहते थे। सरकारी प्रचार मूलवासियों को बुनाई और कढ़ाई सिखाने के फायदे बताते नहीं थकते थे। खैर, आरमास अपने महान लक्ष्य को पूरा करने से पहले ही स्वर्ग सिधार गए।

मूलवासी और अश्वेत बहुल देशों में भी नहाना न चाहे रहे बच्चे मांओं से ये ताने सुना करते हैं कि “तू आदिवासी दिख रहा है या किसी काले आदमी की तरह दुर्गंध कर रहा है”। लेकिन औपनिवेशिक इतिहासों में मूलवासियों की नहाने की आदत से हमलावरों का अंचभित रह जाना बार-बार दर्ज हुआ है। तब से ही इन्हीं मूलवासियों और फिर अफ्रीकी गुलामों ने लातिन अमेरिका के बाकी लोगों को सफाई की आदतें दी हैं। यह सब भुला दिया गया है और इन समुदायों को धन्यवाद का एक छोटा शब्द भी नसीब नहीं है।

शरीर को आनंद देने की वजह से ईसाई धर्म शुरू से ही नहाने को पाप मानता रहा है। स्पेन में धार्मिक अदालतों के दौर में कोई भी नहाने की आदत भर से ही इस्लामी तौर-तरीकों वाला अधर्मी मान लिया जाता था और इसीलिए जिंदा जला दिया जा सकता था। आज भी यहां गर्मियों में समुद्र किनारे मौज-मस्ती करते शेख ही असली अरब हैं, वहां का एक गरीब तो फिर एक साधारण और रंगभेदियों के लिए गंदगी से बजबजाता मुसलमान ही है। वैसे बावड़ियों और बागों से लकदक ग्रानादा के ला आलांब्रा महल को देखने वाला यह जानता है कि इस्लामी सभ्यता में पानी का महत्व तब से रहा है, जब ईसाई धर्म में पीने के अलावा पानी के किसी भी अन्य उपयोग की मनाही थी। वास्तव में यूरोप में नहाना बहुत बाद में लोकप्रिय हुआ, लगभग उसी वक्त जब टी.वी. पहले-पहल आया।

देवी

इएमान्या की पूजा वाली रात सारा समुद्र तट त्यौहार की खुशी में डूब जाता है। बाहिया, रियो डी जानेईरो, मोंतेवीदियो जैसे शहर समुद्र की इस देवी का उत्सव मनाते हैं। लोगों की भारी भीड़ बालू पर मोमबत्तियों की लड़ियां लगाती है और साथ लाए सफेद फूल, इत्र, गले के हार, केक, मिठाइयां और देवी को पसंद अन्य भेंटें भेजती है। इसके बाद देवी से मन्नतें मांगने का सिलसिला शुरू होता है।

किसी को दबा हुआ खजाना चाहिए, किसी को अब तक नहीं मिला प्यार, कोई बिछड़ गए लोगों की वापसी मांगता है और कोई दुनिया छोड़ चुके अपनों को फिर पाना चाहता है। मन्नतों और दुआओं के इन चंद लम्हों में ही शायद इन लोगों को यह जादुई एहसास होता है कि देवी उन्हें सुन रही हैं और उनकी असंभव-सी लगने वाली दुआएं कबूल भी कर रही हैं। इन चंद पलों का जादुई एहसास इनके पूरे वजूद को रात में भी रोशनी से भर देता है।

समुद्री लहरें जब इनकी भेंट अपने साथ बहा कर ले जा चुकी होती हैं तब ये लोग समुद्र की तरफ मुंह किए, इस सावधानी से कि देवी की तरफ उनकी पीठ न पड़े, धीरे-धीरे वापस शहर की ओर लौटते हैं।


यह मान लिया गया है कि आदिवासी और अश्वेत कायर तथा डरपोक होते हैं। लेकिन यही लोग  कभी औपनिवेशिक युद्धों में, कभी आजादी की लड़ाई और आजादी के बाद लातिन अमेरिकी गृह युद्धों में हथियार की तरह इस्तेमाल भी हुए हैं। वे सिपाही मूलवासी ही थे जिनका इस्तेमाल स्पेनी हमलावरों ने उन्हीं के लोगों को मारने के लिS किया। अठारहवीं सदी में छिड़ने वाली आजादी की लड़ाइयां हमेशा पहली पंक्ति में झोंक दिए गए अर्जेंटीना के अश्वेतों के लिए बरबादी ही लाईं। वहीं आजादी मिलने के बाद हुए पराग्वे युद्ध के मैदान ब्राजील के अश्वेतों की लाशों से अटे पड़े थे।

मूलवासी ही चिली के खिलाफ पेरू और बोलिविया की संयुक्त सेना के अगुआ दस्ते बने। ये लोग जिन्हें पेरू के लेखक रिकार्दो पाल्मा बिल्कुल ही गया-गुजरा मानते थे,  मारकाट के सबसे ज्यादा शिकार बने। वहां का शासक वर्ग तो देशभक्ति का झंडा बुलंद कर खुद भाग खड़ा होता था। हाल के दौर में एक्वाडोर और पेरू के बीच हुए युद्ध में मरने वाले मूलवासी थे और ग्वातेमाला की पहाड़ियों में बसे उनके गांव के गांव उजाड़ने वाले सरकारी फौजों के सिपाही भी मूलवासी ही थे। मूलवासी और गोरी नस्ल की पैदाइश फौजी अफसरान ऐसे हर अपराध से अपने ही खून के आधे हिस्से की बरबादी लिख रहे थे।

मूलवासियों के बारे में और भी तमाम तरह की भ्रांतियां हैं। जैसे कि लोग कहते हैं कि ‘‘तुम तो किसी काले आदमी की तरह काम कर रहे हो’’। ये कहने वाले वही लोग हैं  जो यह भी कहते हैं कि काले तो आलसी और कामचोर हैं। वे कहते हैं ‘‘गोरा आदमी दौड़ता है और काला आदमी भागता है’’। यह काले आदमी की बड़ाई करने के लिए नहीं, बल्कि यह बताने के लिए होता है कि गोरा जो दौड़ता है वह एक सामान्य इंसान है, जो कभी कुछ भी गलत नहीं करता तथा काला इंसान जो भागता है, वह तो दरअसल चोर है, जो गोरे को लूट कर भाग रहा होता है। यहां तक कि गरीब और कानून के सताए चरवाहों की पीड़ा बयान करता मार्तिन फिएर्रो (इसी नाम की किताब का मुख्य पात्र) भी इसी सोच का शिकार है। उसे यह कहने में कोई गुरेज नहीं होता कि काले और मूलवासी तो चोर ही होते हैं और दुनिया भर के कष्ट झेलने के लिए ही पैदा होते हैं। उसका यह मानना है कि ‘‘एक मूलवासी जैसा है वैसा ही रहना चाहता है। वह तो पैदा ही चोर बनने के लिए हुआ है और चोर रहकर ही मर जाता है।’’

काले और  मूलवासी चोर होते हैं। ये पूरी बात यह साबित करती है कि जिनके साथ सबसे ज्यादा अन्याय हुआ है और जो सबसे ज्यादा लूटे गए हैं, वे ही चोर भी ठहराए गए हैं।

खुफिया एजेंसियां, साम्राज्यवाद, संघ परिवार और अन्ना आंदोलन

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/29/2012 01:21:00 AM

यह खबर इंडियन एक्‍सप्रेस में 20 अगस्त 2012 को मुख्य पृष्ठ पर छपी थी। इस खबर को उस समय छापा गया जब अन्ना की विदाई खुद अन्ना ने ही तय कर दी और रामदेव पीछे-पीछे घिसटते हुए इस आंदोलन के जीवित रहने का संकेत दे रहे थे। सच्चाई सबको मालूम थी कि रामलीला मैदान में चल रही उठापटक कब का खत्म हो चुकी है। 2014 की तैयारी में इस उठापटक की ज़रूरत ही नहीं रह गई थी। यह जो हुआ, सिर्फ धींगामुश्ती नहीं थी। यह देश की सत्ता पर काबिज होने के खूनी खेल के प्रयोग की एक नई पृष्‍ठभूमि थी। यह 1990 के बाद उभरकर आए नौकरशाहों और नव-जमींदारों का फासीवादी प्रयोग था जिसका पाठ आए दिनों में और भी अधिक खूनी तथा राजनीतिक तौर पर और अधिक जनद्रोही होगा। यह देश के प्रशासनिक, न्यायिक और राजनीतिक संरचना के पुनर्गठन के एक प्रस्ताव का देशव्यापी प्रयोग था जिससे ‘देश के प्रगतिशील दिमाग’ को और अधिक चौड़ा कर फासीवादी घोड़े को पूरी रफ्तार से दौड़ाया जा सके।

इस खबर में जिस विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन का जिक्र है उसने नेपाल के वर्तमान प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टराई की भारत यात्रा का 2010 में खर्च वहन किया था। इस काम को संगठित कराने में कश्मीर से लेकर माओवाद पर अपनी पकड़ बनाने का दावा करने वाले एक वामपंथी पत्रकार ने सक्रिय भूमिका का निर्वाह किया, इस बात की चर्चा उस समय हुई थी। साथ ही एक अन्य वामपंथी पत्रकार ने इस मुद्दे पर बाबूराम को चेताया भी था। उस यात्रा में वामपंथी मंचों से अपनी साम्राज्यवाद परस्त लाइन को खूब रखा। प्रचंड व बाबूराम के नेतृत्व में सीपीएन-माओवादी ने नेपाल में राजशाही के खिलाफ चल रहे जनयुद्ध के समय 2002 में ‘अंतर्राष्ट्रीय पटल पर हो रही बेइज्जती’ को ठीक करने के लिए यूरोप व अमेरिका से अपील की थी। यह पत्र भारत के लिए भी था। खुला भी और हाथों हाथ पहुंचाने का भी जिसका एस.डी. मुनी ने अभी हाल ही में खुलासा किया। बहरहाल, प्रो. एस.डी. मुनी के माध्यम से उस समय भारत की केंद्र में बैठी भाजपा सरकार के साथ संपर्क साध कर अपने बारे में बनी धारणा को ठीक करने का आग्रह किया गया था। यह पिछले दिनों अखबार की सुर्खियों में बना रहा। शायद इस कारण भी कि इस आग्रह व संपर्क के बाद सीपीएन-माओवादी के नेतृत्व का भारत सरकार के अंदरूनी हिस्सों से रिश्ता मजबूत बनता गया और बाद में एक दूसरे पर रॉ का एजेंट होने का आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी चला। यहां यह बताने की जरूरत नहीं कि सबसे अधिक इस तरह के आरोप बाबूराम भट्टाराई पर ही लगे। यह एकीकृत सीपीएन-माओवादी पार्टी में विवाद और आलोचना-आत्मालोचना का एक महत्वपूर्ण मुद्दा भी बना। बहरहाल, आइए, इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर का अनुवाद पढ़ें. -अंजनी कुमार


सी जी मनोज, नई दिल्ली, 19 अगस्त:
नई दिल्ली की कूटनीति का हृदयस्थल माने जाने वाले इलाके चाणक्‍यपुरी में एक आला दर्जे का संस्थान जो थिंकटैंक भी है, स्थित है। इसके लिए जमीन नरसिंहराव की सरकार ने मुहैया करवाई। इस पर भूतपूर्व गुप्तचर अधिकारी और आरएसएस के प्रसिद्ध स्वयंसेवकों के एक समूह की पकड़ है। ये हाल में देश में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन, खासकर बाबा रामदेव के नेतृत्व वाले आंदोलन के पीछे काम करने वाली गुपचुप ताकतें हैं।

वास्तव में यह विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन ही था जहां बाबा रामदेव के नेतृत्व में भ्रष्टाचार विरोधी मोर्चा बनाने का निर्णय लिया गया। यह अन्ना हजारे के पहले भूख हड़ताल पर बैठने के एक दिन पहले की बात है। इस फाउंडेशन के निदेशक अजीत डोभाल हैं। ये इंटेलिजेंस ब्‍यूरो के भूतपूर्व निदेशक हैं। यह फाउंडेशन ही था जिसने रामदेव और टीम अन्ना के सदस्यों को एक साथ लाने का पहली बार गंभीर प्रयास किया।


विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन का उद्घाटन 2009 में हुआ। यह 1970 के शुरुआती दिनों में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के भूतपूर्व महासचिव एकनाथ रानाडे और इसी के प्रचारक पी. परमेश्वरन की अध्यक्ष्यता में स्थापित एक परियोजना है।

पिछले साल के अप्रैल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चिंतक के एन गोविंदाचार्य के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन और फाउंडेशन ने मिलकर भ्रष्टाचार व ब्लैक मनी पर सेमिनार किया। इसमें रामदेव व टीम अन्ना के सदस्य अरविंद केजरीवाल व किरण बेदी ने हिस्सा लिया।

1 व 2 अप्रैल को दो दिवसीय इस सेमिनार के अंत में ‘भ्रष्टाचार विरोधी मोर्चा’ बनाया गया। इसके संरक्षक बने रामदेव और गोविंदाचार्य बने संयोजक। इसमें डोभाल के साथ अन्य सदस्य थे: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एस गुरुमुर्ति, एनडीए सरकार में भारत के राजदूत का प्रभार संभालने वाले भीष्म अग्निहोत्री, प्रोफेसर आर. वैद्यनाथन, जो इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ बेंगलोर में हैं और भाजपा के ब्लैक मनी पर बने टास्क फोर्स के अजीत डोभाल व वेद प्रताप वैदिक।

इस दो दिवसीय सेमिनार के अंत में जारी किये गए पत्र में यह बताया गया कि रामदेव ने ‘भ्रष्टाचार के खिलाफ चौतरफा युद्ध करने का फैसला लिया है और लोगों का ध्यान खींचने वाले एक्शन कार्यक्रम व समानधर्मा भ्रष्टाचार विरोधी संगठन, संस्थान और व्यक्तियों तक पहुंचने के कार्यक्रम के लिए तत्काल ही इस मोर्चे की घोषणा की गई।
इस सेमिनार के तुरंत बाद ही हजारे की भूख हड़ताल शुरु हो गई और अप्रैल के अंत में रामदेव ने रामलीला मैदान में 4 जून से विरोध कार्यक्रम की घोषणा कर दी। यह यूपीए सरकार के खिलाफ पहला सार्वजनिक प्रदर्शन था।

इस सच्चाई के बावजूद कि यह संस्थान सरकार द्वारा दी गई जमीन पर है, इस फाउंडेशन के सलाहकार बोर्ड में गुप्तचर विभाग के भूतपूर्व अधिकारी, रिटायर प्रशासक, कूटनीतिज्ञ और सेवानिवृत्त सेना के लोग बैठते हैं। इसमें रॉ के भूतपूर्व मुखिया ए.के. वर्मा, भूतपूर्व सेना प्रमुख विजय सिंह शेखावत, भूतपूर्व वायुसेना प्रमुख एस. कृष्णास्वामी व एस.पी. त्यागी, भूतपूर्व सीमा सेना बल के प्रमुख प्रकाश सिंह, भूतपूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल, भूतपूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा उपसलाहकार सतीश चंद्रा और भूतपूर्व गृह सचिव अनिल बैजल शामिल हैं।

उक्त सेमिनार के बारे में पूछने पर डोभाल ने बताया कि यह मुद्दा राष्ट्रीय महत्व का है और इसमें बहुत से लोगों के साथ सुब्रमण्‍यम स्वामी, न्यायमूर्ति एम.एन. वेंकटचलैया, न्यायमूर्ति जे.एस. वर्मा, लोक सभा के भूतपूर्व मुख्य सचिव सुभाष कश्यप और भूतपूर्व मुख्य चुनाव आयुक्‍त एन. गोपालस्वामी भी शामिल हुए थे।

यद्यपि डोभाल ने इन बातों के साथ कि वह भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों को समर्थन देते हैं, यह भी कहा कि विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन की इन विरोध प्रदर्शनों में कोई भूमिका नहीं है। उनके अनुसार- ‘हम इस बात को शिद्दत से महसूस करते हैं कि यह समय है जब मजबूत, स्थिर, सुरक्षित और विकासमान भारत दुनिया के मामले में तय हुए चुकी नियति में अपनी भूमिका का निर्वाह करे और राष्ट्रों के सौहार्द में अपने आकांक्षित स्थान को हासिल करे। भ्रष्टाचार और ब्लैक मनी भारत को बर्बाद कर रहे हैं। हम लोगों को इस मुद्दे पर आत्मरक्षात्मक होने की जरूरत नहीं है।’

रामदेव और अन्ना के अलावा एक और शख्स थे जिन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मोर्चा गठित करने का एलान किया। वह थे सुब्रमण्‍यम स्वामी जिन्होंने भारत में भ्रष्टाचार विरोधी एक्शन कमेटी बनाई। हालांकि इस कमेटी की पहली बैठक में मुख्य अतिथि थे रामदेव और गोविंदाचार्य, गुरुमुर्ति, डोभाल और बैद्यनाथन भी यहां उपस्थित थे।

गोविंदाचार्य से फाउंडेशन के रिश्ते के बारे में पूछने पर गोविंदाचार्य ने यह बताया कि वह ‘बहुधा आते ही रहने वालों’ में हैं। ''रामदेव और मैं अगस्त 2010 से लगातार एक दूसरे से संपर्क में हैं (रामदेव दिसंबर 2010 में गुलबर्ग गए थे और गोविंदाचार्य के भारत विकास संगम में हिस्सा लिया था)। वह अक्सर विवेकानंद फाउंडेशन में आते हैं। उनके लिए दिल्ली में ऐसे तो कुछ जगहें हैं पर फाउंडेशन आना उनके लिए सबसे आसान है और दूसरों के लिए भी यहां एक दूसरे से मिलना आसान है।’’

गोविंदाचार्य ने यह भी स्वीकार किया कि सेमिनार रामदेव और अन्ना कैंप को साथ लाने में ‘कुछ हद तक नजदीकी संचालन का काम’ करेगा, यह भी उम्मीद की गई थी।
संघ चिंतक ने इस सूत्रबद्धता को किसी भी तरह से नकारा नहीं। यह पूछने पर कि इससे तो यह बात बनना तय है कि विवेकानंद केंद्र और फाउंडेशन आरएसएस से जुड़े हुए हैं, उन्होंने कहा, ‘कोई इस हद तक पहुंच सकता है... सांगठनिक तौर पर आरएसएस इसमें शामिल नहीं होता है। स्वयंसेवक ही पहलकदमी लेते हैं।’
हालांकि डोभाल के अनुसार फाउंडेशन स्वतंत्र है और इसका आरएसएस से कोई संबंध नहीं है। ‘हमारी उनके (रामदेव) के आंदोलन में कोई भूमिका नहीं है। हम में से वहां कोई गया भी नहीं। यह स्वतंत्र और पंजीकृत इकाई है। हम लोग सरकारी फंड नहीं लेते हैं।’

मुकुल कनितकर जो पहले इस फाउंडेशन से जुड़े हुए थे, उन्‍होंने बताया कि फाउंडेशन द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर आयोजित सेमिनारों में प्रशासकीय अधिकारी व साथ ही प्रधानमंत्री कार्यालय के अधिकारी भी भागीदारी करते रहते हैं। सच्चाई तो यह है कि इसी हफ्ते फाउंडेशन में केंद्रीय संस्कृति मंत्री कुमारी शैलजा ‘द हिस्टॉरिसिटी ऑफ वैदिक एंड रामायण एरा: साइंटिफिक एविडेंस फ्रॉम द डेप्थ ऑफ ओशियन टू द हाइट ऑफ स्काई’ नामक पुस्तक का विमोचन करने वाली हैं।

रामदेव के अभियान के साथ अपने जुड़ाव के बावजूद गोविंदाचार्य यह महसूस करते हैं यह आंदोलन अब खत्म हो चुका है। उन्होंने कहा कि ‘दोनों (अन्ना और रामदेव) का आंदोलन सत्ता और पार्टी राजनीति के ब्लैक होल में घुस कर खत्म हो गया... रामदेव अब भाजपा के एजेंडे को आगे बढ़ाने वाले या उसका हिस्सेदार बन गए हैं।’

देशभक्ति का स्वांग बंद करो, जनद्रोही क़ानून रद्द करो

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/11/2012 04:23:00 PM

दख़ल, लखनऊ की पहल पर 9 अगस्त से 15 अगस्त 2012 तक लखनऊ में विभिन्न संगठनों द्वारा जनद्रोही क़ानूनों और राज्य दमन के ख़िलाफ़ सात दिवसीय साझा दस्तक का आयोजन किया जा रहा है। जन संवाद के इस कार्यक्रम में जनपक्षधर कलाकार और क़लमकार अपनी रचनाओं के साथ हिस्सेदारी बंटायेंगे। लखनऊ में आयोजित प्रेस वार्ता में जारी इस साझे आयोजन का परचा पेश है.

इक़बालिया बयान

पूरे होशो-हवास में और बिना किसी दबाव के हम एलान करते हैं कि हां, हम भी देशद्रोही हैं और हमें इस पर गर्व है। सरकार चाहे तो हमें गिरफ़्तार करे, जेल में ठूंसें, मुक़दमा ठोंके और जज साहेबान बामशक़्क़्त उम्र क़ैद की सज़ा सुनायें।

साथियों,

हम सफ़ाई नहीं देना चाहते। जिरह करना चाहते हैं कि यह देश आख़िर किसका है? कारपोरेट घरानों का, बिल्डरों का, थैलीशाहों का, सेज़ के शहंशाहों का, मुनाफ़े के लुटेरों का, माफ़िया और बिचौलियों का, संसद और विधानसभाओं में कांव-कांव करनेवालों का, नक़ली मुद्दों पर आग लगानेवालों का... अपराध, उद्योग और राजनीति के नापाक गठबंधन का, बाज़ार की दादागिरी का? या कि देश के आम नागरिकों का जिनके सामने जीने का संकट दिनोंदिन गहराता जा रहा है? शर्म की बात है कि आज़ादी के 64 बरस गुज़र गये लेकिन देश की मेहनतकश जनता को दुख-मुसीबतों और अभावों की गठरी से आज़ादी नहीं मिल सकी। नाइनसाफ़ी का पहाड़ और ऊंचा हो गया, ग़ैर बराबरी की खाई और चौड़ी हो गयी।

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में इतना अधिक विकास हुआ कि मछलियां बूंद-बूंद को तरसें और मगरमच्छ भरा समुंदर पी जायें, कि बस्ती-बस्ती आफ़त बरसे और महलों की रौनक़ बढ़ जाये। यह निजीकरण, उदारीकरण उर्फ़ लूट के खगोलीकरण का नतीज़ा है- लोकतंत्र और मानवता की हत्या है, अधर्म और महापाप है।

ग़ुलाम भारत में बिरसा मुंडा और भगत सिंह सरीखे क्रांतिवीरों को, कला और क़लम के निर्भीक सिपाहियों को और यहां तक कि गांधीजी जैसे अहिंसा के पुजारियों को भी देशद्रोही होने का तमग़ा मिला था। आज़ाद हिंदुस्तान में भी यह सिलसिला बदस्तूर जारी है। जो जनता पर निशाना साध रही नीतियों और योजनाओं की मक्कारियों को नंगा करे, सच बोले, इनसाफ़ की तरफ़दारी करे, देश की इज़्ज़त-आबरू को लुटने से बचाने की क़सम खाये- राजद्रोही उर्फ़ देशद्रोही कहलाये। जो विकास के देवताओं पर अपनी धरती, नदी, पहाड़ और जंगल को, क़ुदरत के बेशक़ीमती ख़ज़ाने को, अपनी आजीविका, आत्मनिर्भरता, परिवेश, संस्कृति और स्वाभिमान को न्यौछावर करने से इनकार करे- विकास का दुश्मन उर्फ़ माओवादी कहलाये, देश की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा ख़तरा हो जाये।

मशहूर कवि रघुवीर सहाय की पंक्तियां हैं ‘राष्ट्रहान में भला कौन वह भारत भाग्य विधाता है? डरा हुआ मन बेमन जिसका बाजा रोज़ बजाता है।‘ भारत भाग्य विधाता कई भेस में है- हिंदुस्तान के बाहर भी है, अमरीका और इज़रायल में भी है। वह विकास का मसीहा है, इतना बड़ा देशभक्त है कि हर क़ीमत पर हिंदुस्तान को महाबली देशों की जमात में शामिल कराने पर आमादा है। वह आतंकवाद का शोर मचा कर, सभ्यताओं के संघर्ष का बिगुल बजा कर लूट का अश्वमेघ यज्ञ कराता है। उसे सरहदों की हिफ़ाज़त की चिंता है, देशवासियों के जीवन की नहीं।

सीमा आज़ाद और उनके पति विश्वविजय का यह संगीन जुर्म था कि उन्होंने इस बदसूरत, फूहड़ और अश्लील तसवीर को बदलने की ठानी। क़लम थामी और संघर्ष की राह चुनी। हज़ारों लोगों को उजाड़नेवाली गंगा एक्सप्रेस वे जैसी परियोजनाओं और अपनी ही जनता के ख़िलाफ़ युद्ध का मोर्चा खोलने जैसे सरकारी धतकरमों को कटघरे में खड़ा करने की ज़ुर्रत की। यह ख़तरनाक़ काम उनके माओवादी होने का पक्का सबूत बना। ढाई साल पहले दोनों क़ानून के हत्थे चढ़े, सीधे जेल पहुंचे और गुज़री 8 जून को निचली अदालत ने उन्हें उम्र क़ैद की सज़ा सुना दी। राहत की बात है कि इसी 6 अगस्त को ज़मानत पर उनकी रिहाई हो चुकी है लेकिन याद रहे कि अभी जोकरी इल्ज़ामों से रिहाई बाक़ी है। यह अकेला मामला नहीं है। आज हिंदुस्तान की जेलें ऐसे हज़ारों क़ैदियों से आबाद हैं जिन्होंने ज़ुबान खोलने का गुनाह किया। अपना भारत महान- जय हे, जय हे, भारत भाग्य विधाता...

तो गिरफ़्तारी, मुक़दमा, जेल उन सिरफिरों को सबक़ सिखाने के लिए है जो झूठी आज़ादी से देश और देश के लोगों की रिहाई चाहते हैं। समझदारी की अलख जगाते हैं कि घुट-घुट कर मरने से तो अच्छी है लड़ाई... सबके साथ, सबके भले के लिए। यह लड़ाई आसान नहीं- शिक़ायत और सुनवाई के तमाम संवैधानिक रास्तों की नाकेबंदी है। फ़रमान है कि उफ़ न करो, नज़र झुका के चलो, हदों में रहो। वरना भुगतो, क़ानून का बेरहम डंडा झेलो। यह शर्मनाक है कि विलायती हुक़ूमत की यह ज़ालिमाना विरासत आज़ाद हिंदुस्तान में भी बाअदब जारी है बल्कि और ज़हरीली हो गयी है। अदालतें बेचारी क्या करें? क़ानून तो शहंशाहों का चलता है।

आज़ादी और जम्हूरियत को घायल करनेवाले, सच को सज़ा और झूठ को बाइज़्ज़त बरी करनेवाले, इनसाफ़ की आवाज़ों को बेड़ियों में जकड़ने और गिद्ध इरादों को पूरा आसमान सौंप देनेवाले ऐसे बेहया, भ्रष्ट और शातिर क़ानूनों पर हमारी हज़ार बार आक्थू-आक्थू... ।

यह समय की मांग है कि हम बेहतर भविष्य का साझा सपना बुनें, चुप्पी तोड़ें और गर्व से कहें कि सच की पैरवी करना, दुखियारों के साथ खड़े होना, इनसानी हैसियत में और अपनी हंसी-ख़ुशी से जीने का अधिकार मांगना अगर देशद्रोह है तो बेशक़, हम भी देशद्रोही हैं। सच्चे हिंदुस्तानी का यही धर्म है- देश के ज़िम्मेदार नागरिक होने का यही तक़ाज़ा है, बदहालियों को अंगूठा दिखाने का यही रास्ता है, अंधेरा मिटाने का यही अचूक मंत्र है।

इसी कड़ी में दख़ल, लखनऊ की पहल पर भारत छोड़ो आंदोलन की 70वीं सालगिरह, 9 अगस्त से 65वें स्वाधीनता दिवस, 15 अगस्त 2012 तक लखनऊ में सात दिवसीय साझा दस्तक का आयोजन किया जा रहा है। कार्यक्रम का समापन पड़ाव धरना स्थल होगा- शाम 3 से 5 बजे तक। आपसे अपील है कि कार्यक्रम के हमसफ़र बनें, इस परचे को जन-जन तक पहुंचायें और मिल कर आवाज़ उठायें कि-

देशभक्ति का स्वांग बंद करो, जनद्रोही क़ानून रद्द करो

पिंजरा खोलो, जनता को आज़ादी दो

साझीदार:

काला क़ानून एवं दमन विरोधी मंच, सीमा-विश्वविजय रिहाई मंच, अमुक आर्टिस्ट ग्रुप, भारतीय जन संसद, इंडियन वर्कर्स कौंसिल, इनसानी बिरादरी, जन संस्कृति मंच, क्रांतिकारी सांस्कृतिक मंच, मज़दूर परिषद

दख़ल, लखनऊ द्वारा जारी


संपर्क: 9453682439 , 9335556115 , 9335223922 , 9415011487 dakhalgroup@gmail.com

खुफिया एजेंसियां और उत्पीड़क व्यवस्था

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/04/2012 03:40:00 PM


राजीव यादव का लेख

फसीह महमूद? खुद एक सवाल बनकर रह गया है। सरकार के तमाम ओहदेदारों ने पहले तो फसीह के बारे में कोई जानकारी न होने की बात कही। फसीह की पत्नी निकहत परवीन ने जब 24 मई को सुप्रिम कोर्ट में हैबियस कार्पस दाखिल किया तो उसके बाद 28 मई को फसीह के खिलाफ वारंट और 31 मई को रेड कार्नर नोटिस जारी किया गया। ऐसे दौर में जब सरकार कुछ न बता पाने की स्थिति में हो और खुफिया एजेंसियों के दबाव में रेड कार्नर नोटिस जारी की जा रही हो तो इस बात को समझना चाहिए कि सरकार के समानान्तर खुफिया द्वारा संचालित एक व्यवस्था है जिसकी सरकार के प्रति कोई जवाबदेही नहीं है।

सवाल यह है कि 17 मई को ही निकहत ने विदेश मंत्रालय को ईमेल द्वारा सूचित किया था कि उनके पति को 13 मई को सउदी के अल जुबैल से उठाया गया और भारत ले आने की बात कही गई। जिस पर विदेश मंत्रालय के जिम्मेदार ने कहा कि उन्हें नहीं मालूम की फसीह महमूद कौन है और भारत की कोई भी एजेंसी फसीह को किसी भी आरोप में नहीं ढूंढ़ रही है।

यहां सवाल उठता है कि किसी नागरिक के लापता होने पर यलो कार्नर नोटिस जारी की जाती है, तो ऐसे में फसीह के लापता होने पर यलो कार्नर नोटिस क्यों नहीं जारी की गई? आखिर किस आधार पर रेड कार्नर नोटिस जारी करके कह दिया गया कि उसकी तलाश 2010 से थी? अगर 2010 से फसीह महमूद की तलाश थी तो क्यों निकहत परवीन के सवाल पर देश के गृह मंत्री पी चिदंबरम और विदेश मंत्री झूठ बोल रहे थे। सुशासन वाली नीतीश सरकार ने भी आज तक निकहत के सवालों का जवाब नहीं दिया। ऐसे बहुत से सवाल पिछले दो महीने से गायब फसीह महमूद को लेकर हैं। निकहत के सवाल और फसीह के गायब होने की दास्तान कुछ इस तरह है।

13 मई को खुफिया एजेंसियों के लोग फसीह महमूद के सउदी स्थित आवास पर आए और कहा कि भारतीय विदेश मंत्रालय के निवेदन पर फसीह को तात्कालिक रुप से भारत ले जाना है। पूछने पर बताया कि फसीह को किसी आरोप में भारत भेजा जा रहा है। निकहत बताती हैं कि इसके बाद उन्होंने सउदी के भारतीय दूतावास से सम्पर्क किया तो उन्होंने मुझे कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

16 मई की सुबह निकहत भी भारत आ गईं पर उन्हें अपने पति की कोई खबर नहीं मिली। इस दरम्यान उन्हें द हिंदू समाचार पत्र की एक रिपोर्ट से मालूम चला कि भारत के गृह मंत्री, विदेश मंत्री ने यह कहा कि उनके पास फसीह के बारे में कोई सूचना नहीं है। सीबीआई कमिश्नर, एनआईए और दिल्ली पुलिस का भी यह बयान था कि फसीह पर कोई चार्ज नहीं है।

निकहत ने समाचार पढ़ कर अपने पति की जानकारी के लिए विदेश मंत्रालय के संयुक्त सचिव को 17 मई को ईमेल किया। 18 मई को ईमेल द्वारा उन्हें सूचना दी गई कि उनके मेल को खाड़ी सेक्सन में भेज दिया गया है और जानकारी मिलते ही उन्हें सूचित किया जाएगा। निकहत आगे कहती हैं कि खाड़ी सेक्सन का जो नम्बर और ईमेल आईडी उन्हें मिली उस पर उन्होंने मेल और बात की, पर उन्होंने कहा कि उनके पास फसीह के बारे में कोई सूचना नहीं है, दो दिन बाद बताएंगे। फिर मैंने विदेश मंत्रालय, गृह मंत्रालय, एनआईए, सीबीआई कमीश्नर, दिल्ली, कर्नाटक, बिहार, आंध्र प्रदेश और मुंबई सरकार, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री बिहार बहुतों को मेल और फैक्स किया। सब ने यही कहा कि कोई चार्ज नहीं है।

निकहत बताती हैं कि विदेश मंत्री से जब एक पत्रकार ने फसीह के बारे में पूछा तो उन्होंने ये कहा कि क्या फसीह ‘डिप्लोमेट’ है? बहरहाल, विदेश मंत्रालय के अंडर सेक्रेटरी श्री रेड्डी ने कहा कि वे लोग नहीं जानते कि फसीह महमूद कौन है और भारत की कोई भी एजेंसी फसीह को किसी भी आरोप में नहीं ढूंढ़ रही है। हम इसलिए फसीह को ढूंढ रहे हैं, क्योंकि उनकी पत्नी ने हमें पत्र लिखा है।

निकहत का सवाल लाजिमी है कि मेरे पति भारतीय हैं, इसलिए उनका फर्ज था कि वे सउदी सरकार से पूछें कि हमारे देश का यह नागरिक कहां है। सरकार अगर नहीं जानती थी तो उसे गुमशुदा व्यक्ति की तलाश के लिए यलो कार्नर नोटिस जारी करनी चाहिए थी?

मीडिया में आ रही रिपोर्टों से निकहत को यह अंदाजा हो गया था कि उनके पति को किसी गंभीर साजिश में फंसाने की कोशिश हो रही है। अरब न्यूज ने 19 मई को उनकी कम्पनी के मैनेजर को कोड करते हुए लिखा कि अल जुबैल पुलिस और भारतीय दूतावास के कुछ अधिकारियों ने बताया है कि महमूद की तलाश भारत में कुछ असामाजिक गतिविधियों में है, इसलिए उसे तत्काल पुलिस को सौंप दिया जाय। इस खबर में यह भी लिखा है कि महमूद को सउदी पुलिस को सौंपने के बाद सउदी के आंतरिक मंत्रालय ने भारतीय दूतावास के अधिकारियों को महमूद के भेजे जाने व फ्लाइट का विवरण बता दिया। जहां पर पहुंचने पर उसे पकड़ लिया गया। (http://www.arabnews.com/ksa-deports-%E2%80%98bangalore-blast-suspect%E2%80%99s-aide%E2%80%99) सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हैबियस कार्पस में भी इस खबर की कापी संलग्न है।

सवाल दर सवाल से उलझती निकहत ने सुप्रिम कोर्ट में 24 मई को हैबियस कार्पस दाखिल किया और विदेश मंत्रालय, गृह मंत्रालय, एनआईए, दिल्ली, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, मुंबई और बिहार सरकार को पक्षकार बनाया। 30 को सुप्रिम कोर्ट ने नोटिस जारी की।

पहली जून को कोर्ट की सुनवाई में एक तरफ सरकार दूसरी तरफ निकहत। सरकार अब संविधान द्वारा दिए गए मूल अधिकारों को अपने गैरकानूरी दांव-पेंचों से कतरने की कोशिश करने लगी थी। सुनवाई से एक दिन पहले 31 मई को ही रेड कार्नर नोटिस जारी कर दिया कि आतंकवाद, हथियार और विस्फोटकों के मामले में महमूद की तलाश है। निकहत कहती हैं कि रेड कार्नर नोटिस अपराधियों के लिए होता है। मगर जैसा कि यह लोग जानकारी न होने की बात कह रहे थे, उन्हें यलो कार्नर नोटिस जारी करनी चाहिए थी, वारंट भी 28 मई को निकाला गया लेकिन हमें कोई भी आधिकारिक दस्तावेज या जानकारी नहीं दी गई। सरकार पर आरोप लगाते हुए कहती हैं कि 13 मई को जो उठाया गया वो गैरकानूनी था, इसलिए ये लोग अपनी गलती छुपाने के लिए यह सब कर रहे थे।

यहां सवाल यह उठता है कि जब लापता होने पर यलो कार्नर नोटिस जारी की जाती है तो सरकार ने बार-बार सवाल उठने पर भी क्यों नहीं जारी किया? इसका साफ मतलब है कि सरकार जानती थी कि फसीह कहां हैं और जब वह खुद के गैरकानूनी जाल में फसती नजर आई तो उसने आनन-फानन में 28 मई को वारंट और 31 मई को रेड कार्नर नोटिस जारी किया।

यहां सवाल न्यायालय पर भी हैं कि स्वतः सज्ञान लेने वाले न्यायालय के सामने सरकार द्वारा मूल अधिकारों को गला घोंटा जा रहा था। यह पूरी परिघटना बताती है कि किस तरह हमारे देश की खुफिया एजेंसियां न्यायालयों और सरकारों पर हाबी हो गई हैं और उनकी हर काली करतूत को छुपाने के लिए मूल अधिकार क्या संविधान का भी हनन किया जा सकता है। जैसा कि फसीह मामले में हुआ।

पहली जून की सुनवाई में विदेश मंत्रालय, गृह मंत्रालय और दिल्ली पुलिस की तरफ से अपर महाधिवक्ता आए थे, मगर कर्नाटक और किसी अन्य पक्षकार की तरफ से कोई नहीं आया। जब न्यायाधीश महोदय ने पूछा कि फसीह कहां है और उस पर क्या आरोप हैं तो वे समाचार रिपोर्ट पढ़ने लगे। तब न्यायालय ने उनको न्यूज क्लीप पढ़ने से मना करते हुए कहा कि इतना संवेदनशील मामला है और आप न्यूज क्लीप पढ़ रहे हैं, जो बार-बार बदलती रहती हैं, आप बताएं कि फसीह पर आरोप क्या है और क्यों उठाया है? इस पर पक्षकारोंने कहा कि वे तैयारी में नहीं हैं।

निकहत कहती हैं कि मुझे यह समझ में नहीं आ रहा है कि अगर कोई रेड कार्नर नोटिस जारी करता है, तो इसका मतलब उसे मालूम नहीं कि सन्दिग्ध कहां छुपा है? जबकि एजेंसीज को मालूम था। मगर कोर्ट में उन्होंने आरोप बताने के लिए वक्त लिया। इसका मतलब है कि उन्हें आरोप फर्जी तरीके से गढ़ने थे। 6 जून को सुप्रिम कोर्ट के समक्ष गृह मंत्रालय और विदेश मंत्रालय ने संयुक्त रुप से कहा कि फसीह उनकी हिरासत में नहीं है, और न ही अल जुबैल, उनके आवास से 13 मई को उठाने में उनकी कोई भूमिका है। (http://www.firstpost.com/india/saudi-press-says-govt-deported-missing-indian-engineer-335298.html) इस बात का भी खंडन किया कि उन्हें भारत लाया गया है। उन्होंने 10 दिन का वक्त मांगा। अगली सुनवाई की तारीख 9 जुलाई को थी।

गृह मंत्री पी चिदम्बरम ने उन मीडिया रिपोर्ट को खारिज किया जिसमें महमूद के बारे में बताया गया था कि भारतीय अधिकारियों द्वारा 2010 के चिन्नास्वामी स्टेडियम मामले में उन्हें पकड़ा गया है। आरोपों और तथ्यों को बेबुनियाद बताया। (http://www.firstpost.com/india/missing-engineers-wife-seeks-answers-from-govt-333956.html)

दरअसल गौर से देखा जाय तो यह एक बड़ी खतरनाक स्थिति हैं। एक तरफ गृह मंत्री कह रहे हैं कि उन्हें मालूम नहीं दूसरी तरफ उस आदमी पर आतंकवाद के नाम पर रेड कार्नर नोटिस जारी की जाती है। दरअसल सरकार के समानान्तर एक व्यवस्था खुफिया एजेंसियों द्वारा संचालित की जा रही है। जिसकी सरकार के प्रति कोई जवाबदेही नहीं है। यह एक महत्वपूर्ण चिंता और जांच का विषय है। क्योंकि एक तरह से देखा जाय तो यह खुफिया द्वारा सरकार टेक ओवर है।

सरकार की भूमिका पर वे कहती हैं कि विदेश मंत्रालय या गृह मंत्रालय को पता करना होता तो उनका एक फोन ही काफी था। बाद में उनका यह बयान अखबारों में आने लगा कि फसीह सउदी में छुपा हुआ है। जबकि जो पहले ही उठा लिया गया हो, वो छुपा कैसे हो सकता है? 9 की सुनवाई में सरकार ने कहा कि सउदी सरकार से बात हुई है और उन्होंने 26 जून को यह बताया है कि फसीह वहां है, मगर इसमें उनका कोई हाथ नहीं है।

भारत सरकार ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए अब तक नहीं बताया है कि फसीह को सउदी में कब उठाया गया। यहां सवाल यह है कि एक भारतीय नागरिक जिसका पूरा परिवार और समाज पिछले दो महीनों से परेशान है उसको यह बताना कहां से सुरक्षा की दृष्टि से  खतरनाक है? खतरनाक तो पिछले दो महीनों से उसका गायब होना हैं। क्या सुरक्षा का हवाला देने वाली सरकार अपने नागरिक का अपहरण करने वाली खुफिया एजेंसियों के खिलाफ कार्यवाई करने की जहमत उठाएगी।

निकहत का सवाल है कि जब फसीह को 13 मई को उठाया तो उसके खिलाफ रेड कार्नर नोटिस भी जारी नहीं था, तो आखिर सउदी सरकार को कैसे पता चला कि फसीह को उठाना है? भारत में किस आरोप के कारण उसे डिपोर्ट करना है? या तो भारतीय सरकार ने वहां के आंतरिक मत्रालय से बात की और फसीह को उठवाया या फिर सउदी ने पहले ही भविष्यवाणी कर ली थी? फसीह को उठाने की बात जैसा कि सरकार ने अंतिम सुनवाई में बताया तो फिर यह कैसे हो सकता है कि वो कहे कि उठाने में उनका कोई हाथ नहीं है? दोनों सरकारों के सलाह-मशवरे के बगैर फसीह को उठाया तो नहीं जा सकता था? प्रत्यर्पण संधि के कुछ नियम कायदे होते है और उनके तहत ही यह सब हुआ होगा, सउदी सरकार किसी भारतीय मामले में बिना भारत सरकार की किसी सूचना या बातचीत के ऐसा नहीं कर सकती है?

आश्चर्य से निकहत कहती है कि जो रेड कार्नर नोटिस जारी हुआ है, उसमें बताया गया है कि फसीह 2010 से गायब है। जबकि फसीह 2010 में भी भारत आए हैं, और 2011 में जो हमारी शादी हुई उसमें भी वो आए हैं और हमेशा दिल्ली हवाई अड्डे से ही आए और गए भी हैं। निकहत सवालिया जवाब देते हुए कहती हैं कि तो क्या इन एजेंसियों ने जानते हुए रेड कार्नर नोटिस में उनके भागे होने की बात कही है, ताकी वो केस बना सकें? 11 जून को कर्नाटक ने काउंटर एफीडेविड कोर्ट में दाखिल की। उसमें उन्होंने फसीह का पूरा कैरियर डिटेल डाला। जिसमें सउदी में उन्होंने अब तक कहां और किस-किस पोजेक्ट पर काम किया है, पूरे तथ्यों और कम्पनी के नाम के साथ। फिर निकहत का सवाल कि अगर उनसे कोई पूछताछ नहीं की गई तो ये सारी बातें कर्नाटक पुलिस को कैसे पता चलीं?

खुफिया एजेंसियों द्वारा फसीह महमूद के अपहरण और उन पर आतंकवाद के फर्जी आरोपों को चस्पा करने के कुछ सवालों का जवाब भारत सरकार को देना ही होगा और उन सवालों के भी जवाब देने होंगे जिनके उसने नहीं दिए। क्योंकि इन सवालों ने पिछले दो महीने से निकहत परवीन और उनके पूरे परिवार के होश उड़ा दिए हैं। देश के गृह मंत्री पी चिदंबरम को भी अपने गैर जिम्मेदाराना आपराधिक रवैए पर जवाब देना ही होगा। सुशासन वाले नितीश जी निकहत को न जानते हों तो आपको जानना चाहिए क्योंकि निकहत का सवाल इस लोकतंत्र का सवाल हैं कि क्या वो अपने देश के नागरिकों को जीने का अधिकार भी अब नहीं देना चाहता?

निकहत बहुत दिलेरी से कहती हैं कि अब वो वक्त गया कि झूठे आरोपों में दस-दस साल तक लोग जेलों में सड़ते थे। हमारे सवालों का जवाब सरकार को देना ही होगा?

देखते हैं निकहत दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतत्र में कब तक अपने सवालों का जवाब खुद ब खुद ढूढंती हैं? और उस दिन का इंतजार कब पूरा होगा जब सरकार उनके सवालों का जवाब देते हुए उनके पति को उनकी आखों के सामने लाती है?

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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