हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

भ्रष्टाचार की गंगा का मुहाना बंद करना होगा

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/03/2011 11:31:00 AM

पी. साईनाथ
अनुवाद: मनीष शांडिल्य

मनमोहनॉमिक्स के करीब 20 साल पूरे हो रहे हैं, अतः उस कोरस को याद करना बहुत वाजिब होगा, जिसका राग मुखर वर्ग पहले तो खूब गर्व से और फिर खुद को दिलासा देने के लिए अलापता रहा हैः 'आप चाहे जो भी कहें, हमारे पास डॉ मनमोहन सिंह के रूप में सबसे ईमानदार आदमी हैं. उनके खिलाफ एक शब्द भी नहीं बोला जा सकता'. लेकिन ऐसा अब कम सुनने को मिलता है - ऐसे उद्गार अब ईमानदारी का झंडा बुलंद करनेवाले दूसरे चालबाजों की स्तुति में ज्यादा व्यक्त होते हैं. लेकिन बड़ी तादाद में लोग अब रोज यह कहते फिर रहे हैं : 'ईमानदार प्रधानमंत्री निर्विवाद रूप से हमारे इतिहास में अब तक के सबसे भ्रष्ट सरकार की मुखियागिरी कर रहे हैं.' और निश्चय ही इस कथन में कई सबक छुपे हुए हैं.

डॉ सिंह द्वारा संपादकों के साथ साप्ताहिक मुलाकात का फैसला हमें बताता है कि उन्होंने इन घोटालों से क्या सबक सीखा है. अब उन्हें यह लगने लगा है कि सरकार के लिए भ्रष्टाचार जन संपर्क से जुड़ा एक मामला है. हालांकि कुछ ऐसा ही मीडिया के साथ भी है, जो 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में राजनेताओं पर लगातार भौंकता रहा लेकिन इस घोटाले के आरोपी प्रमुख कॉरपोरेट्‌स को बरी कर दिया. डॉ सिंह अक्सर मीडिया को 'अभियोक्ता, अभियोजक और न्यायाधीश' तीनों ही रूपों में एक साथ देखते हैं. (हो सकता है वो इस मामले में सही हों). इसके बावजूद वो प्रमुख संपादकों के साथ बैठकी लगाना चाहते हैं. तो क्या यह जन संपर्क से जुड़ा मामला भर है? या वह यह मानते हैं कि भारत के संपादकों के पास ही ऐसा कोई नुस्खा है, जो सभी क्षेत्रों में व्याप्त भ्रष्टाचार (मीडिया के भ्रष्टाचार को छोड़कर) समाप्त कर देगा? मुझे पहले की उम्मीद है.

उनकी सरकार के घोटालों का हिसाब-किताब रखना जनगणना करने की कवायद जैसा है. एक बड़ी और जटिल गणना की तरह. कुछ ऐसे घोटाले हुए जिन्हें दफन कर दिया गया और लेकिन कुछ अभी भी ठंडे नही हुए हैं. आने वाले दिनों में और घोटालों का खुलासा होने वाला है. कुछ का पता चल चुका है, बस भंडाफोड़ बाकी है. साथ ही कई ऐसे हैं जिनपर मीडिया जान-बूझकर चुप्पी बरत रहा है. बहुतेरे के बारे में तथ्य जुटाये जा रहे हैं. हमारा वर्तमान केंद्रीय कैबिनेट संभवतः अब तक का सबसे धनवान मंत्रिमंडल है, जिनके सदस्यों के पास 500 करोड़ रुपयों से अधिक की संपत्ति है. पहले के सभी पूर्ववर्ती मंत्रिमंडल सदस्यों की कुल संपत्ति को जोड़ दें तो  भी यह ज्यादा ही होगा.

जाहिर है भ्रष्टाचार के कई कारण हैं और हर किसी के पास इससे जुड़ी अपनी-अपनी पसंदीदा कहानी है. लेकिन तीन ऐसे मूल कारण हैं जिन्हें नजरअंदाज करने से कोई भी विश्लेषण निरर्थक रहेगा. पहला कारण है : भारतीय समाज की संरचनात्मक असमानताएं, जिसमें संपत्ति और सत्ता का बड़े पैमाने पर संकेंद्रण, वर्ग और जाति, लिंग और इनसे जुड़े दूसरे भेदभाव शामिल हैं.

दूसरा पहलू आर्थिक नीतियों का पूरा ढांचा है जिसने इन असमानताओं की खाई पैदा की एवं उसे और ज्यादा गहरा किया है, साथ ही इन्हें एक किस्म की वैधता भी प्रदान की है. पिछले 20 वर्षों में ऐसा तेजी से घटित हुआ है. उदाहरण के तौर पर हम देख सकते हैं कि संविधान का मजाक उड़ाते हुए कॉरपोरेटों को नागरिकों से अधिक महत्वपूर्ण बना दिया गया है.

और तीसरा पहलू है न्यूनतम जवाबदेही के साथ हरेक तरह का अपराध कर बचने और स्वेच्छाचारिता की संस्कृति का पैर जमाना. ऐसा होना रसूखवालों को अपराध कर बच निकलने का कोई-न-कोई रास्ता निकाल ही देता है. हद तो यह है कि एक राज्य का कोई जज सिर्फ इस कारण कार्यदिवसों पर सभी तरह की विरोध रैलियों पर रोक लगा देता है क्योंकि उसकी कार कोर्ट जाते वक्त एक रैली में फंस गयी थी. ऐसे निजाम में भांति-भांति के बाबा उस समय तक हरेक कर कानून को तोड़ सकते हैं जब तक कि वे सत्तारूढ़ शासन को चुनौती नहीं देते.

भ्रष्टाचार की गंगोत्री का मुहाना बंद किये बगैर, उससे निपटने की कोशिशें कुछ वैसी ही होंगी कि हम नल खुला छोड़ दें, उससे पानी भी बहता रहे और फर्श को सूखा रखने की कोशिशों में भी लगे रहें. ये स्रोत बहुत पुराने हैं. आज इन स्रोतों का दायरा, आकार और नुकसान नई-नई हदें तय कर रहे हैं.

बीते 20 वर्ष धन के अभूतपूर्व संकेंद्रण के साक्षी रहे हैं, इस धन को अक्सर गलत तरीके से आर्थिक नीति की आड़ में इकट्‌ठा किया गया है. राज्य की भूमिका कॉरपोरेट समृद्धि लाने वाले एक उपकरण मात्र की रह गयी है. वह निजी निवेश के लिए उचित माहौल उपलब्ध कराने भर के लिए रह गया है. प्रत्येक बजट कॉरपोरेट जगत के लिए (और आंशिक रूप से उसके द्वारा भी) तैयार किया जाता है. पिछले छह बजट में सिर्फ प्रत्यक्ष कॉरपोरेट आय कर, सीमा और उत्पाद शुल्क में छूट के रूप में कॉरपोरेट जगत को 21 लाख करोड़ रुपयों का उपहार दिया गया है. और इसी अवधि में खाद्य सब्सिडी और कृषि क्षेत्र को कटौती का सामना करना पड़ा है.
नव-उदारवादी आर्थिक ढांचे के अंतर्गत राज्य आम लोगों की कीमत पर कॉरपोरेट क्षेत्र के लिए खाद-पानी मुहैया करता है. यही कारण है कि हम उस दौर में जी रहे हैं जहां सब कुछ का निजीकरण किया जा रहा है. कॉरपोरेट मुनाफे को और बढ़ाने के लिए जमीन, पानी, स्पेक्ट्रम जैसे सभी दुर्लभ राष्ट्रीय संसाधनों को निजी हाथों में सौंप देना अब राज्य का मिशन बन गया है. यह प्रक्रिया और कुछ नहीं निजी क्षेत्र को उन्हीं को तरजीह देने वाले शर्तों के आधार पर राष्ट्र के संसाधनों को सौंपना है जो कि हमारे समय में भ्रष्टाचार का मुख्य स्रोत है. घोटाले तो लक्षण मात्र हैं, रोग यह है कि भारतीय राज्य, नागरिकों की जगह कॉरपोरेट निगमों के हित साधता है.

चुनाव खर्च के बारे में चिंता करनेवालों को दूसरी चीजों पर भी ध्यान देना चाहिए. आज एक ऐसा वर्ग पैदा ले चुका है जिसके पास खर्च करने के लिए बहुत अधिक पैसा है, काली कमाई है. वो इतना पैसा उड़ाते हैं, जिसकी कल्पना तक 1947 में संभव नहीं थी. कई राज्यों में, आप करोड़पति हुए बिना चुनाव लड़ने के बारे में सोच भी नहीं सकते.

इस साल मई में चार राज्यों, एक केंद्र शासित प्रदेश (और कडप्पा उपचुनाव) में निर्वाचित 825 विधायकों का उदाहरण लें. उनकी घोषित संपत्तियां देखें. हमें इन चुनावों से संबंधित आंकड़े उपलब्ध कराने के लिए नेशनल इलेक्शन वाच (एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म -एडीआर) का शुक्रगुजार होना चाहिए. इन आंकड़ों का विश्लेषण करना एक मज़ेदार काम है.

एडीआर के आंकड़े बताते हैं कि इन 825 विधायकों की घोषित संपत्ति का कुल मूल्य 2,128 करोड़ रुपयों के आसपास है. इनमें से 231 दूसरी बार विधायक बने हैं. 2006 से 2011 के बीच इन्होंने अपनी संपत्ति में 169 प्रतिशत की औसत वृद्धि की है. इसका मतलब यह है कि विधायक बनने के पहले इन्होंने जितनी संपत्ति अर्जित की थी, उससे भी अधिक 'वैध' संपत्ति इन्होंने बतौर विधायक अपने पहले पांच साल के दौरान इकट्‌ठी कर ली.

अब 825 भूमिहीन श्रमिक परिवारों के बारे में सोचें. हम उनकी 'संपत्ति' की तुलना विधायकों की संपत्ति से नहीं कर सकते क्योंकि इन भूमिहीन श्रमिक परिवारों के पास कुछ नहीं है और वो लगातार कर्ज में डूब रहे हैं. इसका हिसाब लगाना बहुत ही दिलचस्प होगा कि मनरेगा जैसी योजना के सहारे कमाते हुए उन्हें 825 विधायकों के बराबर संपत्ति बनाने में कितना वक्त लगेगा?

मनरेगा में मिलने वाले 100 दिन के काम के जरिये वो राष्ट्रीय औसत पर 12 हजार 6 सौ रुपये के आस-पास कमा सकते हैं. इस तरह 825 भूमिहीन परिवारों को 2128 करोड़ रुपये अर्जित करने में 2,000 साल से अधिक लगेंगे. और साथ ही इसके लिए उन्हें भोजन जैसी तुच्छ आदतें छोड़नी पड़ेंगी. अगर श्रमिक परिवारों की संख्या 10 हजार कर दी जाये तो इस जैकपॉट को पाने में 170 साल के करीब का समय लगेगा. यहां तक कि दस लाख घरों को भी ऐसा करने में एक साल से अधिक का ही समय लग जाएगा. (याद रखें कि उन 231 विधायकों ने 60 महीने में अपनी संपत्ति दोगुनी से भी अधिक कर ली.)

इन गहरी असमानताओं के बीच ऐसी कोई संभावना ही नहीं दिखाई देती कि मजदूर परिवारों के पास भी कभी किसी भी तरह की संपत्ति होगी, 2,128 करोड़ रुपयों का तो जिक्र करना ही बेकार है. वे कर्ज के बोझ तले दबे रहेंगे. और वे इन कर्जों के एवज में जो सूद भेरेंगे वो शायद उन विधायकों की तिजोरी में भी जमा होगा जो साहूकार भी हैं. इसके बावजूद उन विधायकों की संपत्ति कॉरपोरेट जगत की उस विशाल संपत्ति की तुलना में मामूली है जो राज्य के सहयोग से जमा की गयी है. एक ओर मनरेगा की कमाई के सहारे दस लाख मजदूर परिवारों को 3.5 लाख करोड़ जमा करने में 275 साल के आसपास लगेंगे और दूसरी ओर पिछले छह साल से लगातार सरकार हर साल इतनी ही राशि कॉरपोरेट सेक्टर को बतौर छूट बांट रही है.

और फिर यहां बस अपराध करने की छूट है, दण्ड का कोई प्रावधान नहीं. डॉ सिंह अपने मंत्रिमंडल में उलटफेर कर सकते हैं, लेकिन क्या इससे बहुत कुछ बदल जाएगा? एक कृषि मंत्री हैं, जो क्रिकेट पर अधिक समय बिताते हैं और राष्ट्रीय जुनून को फूहड़ता के भद्दे, कारोबारी दलदल में बदलने में मददगार रहे हैं. कपड़ा मंत्री इस शासन की लड़खड़ाती दूसरी पारी में मैदान छोड़ने को मजबूर होने वाले सबसे हालिया 'बल्लेबाज' है. एक दूसरे भारी उद्योग मंत्री हैं जो साहूकारों को मदद करने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा शर्मिंदा किये जाने के तुरंत बाद ग्रामीण विकास मंत्री के रूप में पदोन्नत कर दिये गये. अगर उन्हें कैबिनेट से बाहर का रास्ता दिखा भी दिया जाता है तो उनका विकल्प युवा होने के बावजूद हालात बदल नहीं पायेगा. ऐसे में क्या यह सिर्फ सुस्त प्रशासन या लचर नियमों से जुड़ा मामला भर है? नहीं, यह भ्रष्ट नीतियों से जुड़ा मामला है.

क्या आप आज के समय में भ्रष्टाचार से लड़ना चाहते हैं? तो आप संरचनात्मक असमानता को ढाहने के लिए कदम बढ़ायें, जो नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों से उपजा रोग और जवाबदेही के बिना स्वेच्छाचारिता की संस्कृति है. क्या हमें एक लोकपाल की जरूरत है? हां. क्या यह सरकार से भी शक्तिशाली हो सकती है? संवैधानिक ढांचे से ऊपर और जवाबदेही के बिना? अगर हम ऐसा ही लोकपाल चाहते हैं तो हम मुसीबत मोल ले रहे हैं. क्या यह असमानता, आर्थिक नीति और स्वेच्छाचारिता पर काबू पा सकता है? नहीं, लोकपाल का वर्तमान स्वरूप ऐसा करने में सक्षम नहीं. यह समग्र रूप से आम लोगों और उनके संस्थानों के लिए एक बड़ी लड़ाई है. जैसा कि एक पुरानी कहावत है, आपके अधिकार उस प्रक्रिया जितने ही सुरक्षित होते हैं, जिसके द्वारा आप अपने अधिकारों को सुरक्षित रखते हैं.

इस समय देश भर में विस्थापन, जबरन भूमि अधिग्रहण, संसाधनों की लूट के खिलाफ और वन व अन्य अधिकारों की बहाली के लिए लड़ाई तेज हो रही है. ये 'स्थानीय' संघर्ष हो सकते हैं, लेकिन वे बड़े पैमाने पर, यहां तक कि वैश्विक फलक पर भ्रष्टाचार को चुनौती देते हैं. वे असमानता और भेदभाव से लड़ रहे हैं. वे खुली छूट, लालच और मुनाफाखोरी का विरोध करते हैं. वे अपने शासकों को जवाबदेह बनाने की कोशिश करते हैं. इरोम शर्मिला जैसे कुछ लोग काले कानूनों की वापसी के लिए संघर्ष कर रहे हैं. दूसरे कई केवल वन अधिकार कानून जैसे मौजूदा कानूनों को जमीन पर उतारने के लिए सड़क पर उतर चुके हैं. लेकिन इनमें से कोई भी खुद को राष्ट्र से ऊपर नहीं मानता. ये लोग यह घोषित नहीं करते कि वे कानून बनायेंगे जिसका दूसरों को पालन करना ही होगा. न ही इस पर जोर देते हैं कि वे किसी के प्रति जवाबदेह नहीं हैं. फिर भी, वे अपने और हमारे अधिकारों के लिए लड़ते हैं और दमनकारी संरचनाओं को और अधिक जवाबदेह बनाने में मदद करते हैं.
इस मामले में अतीत को थोड़ा भुला दिया जा रहा है. मगर एक भ्रष्ट व कमजोर सरकार और बेशक कांग्रेस पार्टी को सब कुछ अच्छी तरह से पता है. बमुश्किल 36 साल पहले, एक व्यक्ति ने खुद को सभी संवैधानिक संस्थाओं से ऊपर रख लिया था- बिलकुल बेलगाम. यह याद करना वाकई दुखद है कि कितने संगठनों, मध्यमवर्गीय लोगों और यहां तक कि कुछ बुद्धिजीवियों ने उस व्यक्ति और उसके युग के पक्ष में बढ़-चढ़ कर जयकार लगाया था. उस व्यक्ति का नाम था संजय गांधी और उस युग को आपातकाल कहा जाता था.

बाकी सब इतिहास है.

दि हिंदू, 8 जुलाई, 2011 से साभार.

भारत में मुर्दे बोलने लगे हैं: अरुंधति रॉय

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/02/2011 12:50:00 PM

भारत में मुर्दे बोलने लगे हैं
  • अरुंधति रॉय, अनुवाद: रेयाज उल हक
कश्मीर भारत के दो युद्ध क्षेत्रों में से एक है, जहां से कोई खबर बाहर नहीं निकल सकती. लेकिन गुमनाम कब्रों में दबी लाशें खामोश नहीं रहेंगी

23 सितंबर की सुबह 3 बजे दिल्ली हवाई अड्डे पर पहुंचने के कुछ ही घंटों के भीतर अमेरिकी रेडियो पत्रकार डेविड बार्सामियन को वापस भेज दिया गया. पब्लिक रेडियो पर प्रसारण के लिए स्वतंत्र रूप से मुफ्त कार्यक्रम बनाने वाला यह खतरनाक आदमी चालीस वर्षों से भारत आता रहा है और उर्दू सीखने और सितार बजाने जैसे खतरनाक काम कर रहा है.
बार्सामियन की एडवर्ड सईद, नोम चोम्स्की, हॉवर्ड जिन, एजाज अहमद और तारिक अली के साथ इंटरव्यू की किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं (वे जब नौजवान थे तो चोम्स्की और एडवर्ड हर्मेन की किताब मैन्यूफैक्चरिंग कन्सेंट पर पीटर विंटॉनिक की डॉक्यूमेंटरी फिल्म में बेल-बॉटम पहने हुए एक साक्षात्कारकर्ता के रूप में दिखे थे).
भारत के अपने हालिया दौरों के दौरान उन्होंने कार्यकर्ताओं, अकादमिशियनों, फिल्म निर्माताओं, पत्रकारों और लेखकों (जिनमें मैं भी शामिल हूं) से रेडियो इंटरव्यू की शृंखला पर काम किया है. बार्सामियन का काम उनको तुर्की, ईरान, सीरिया, लेबनान और पाकिस्तान ले गया है. वे इनमें से किसी भी देश से वापस नहीं लौटाए गए हैं. तो आखिर दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र इस अकेले, सितार बजाने वाले, उर्दू बोलने वाले, वाम रुझान वाले रेडियो कार्यक्रम निर्माता से इतना डर क्यों गया? बार्सामियन खुद इसका खुलासा इस तरह करते हैं:
‘इसकी वजह कश्मीर है. मैंने झारखंड, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, नर्मदा बांध, किसानों की आत्महत्याओं, गुजरात जनसंहार और विनायक सेन के मुकदमे पर काम किया है. लेकिन यह कश्मीर है जो भारतीय राज्य की चिंताओं के केंद्र में है. इस मुद्दे पर सरकारी कहानी को चुनौती नहीं दी जा सकती.’

उनको लौटा देने के बारे में आयी खबरों में आधिकारिक ‘स्रोतों’ का हवाला दिया गया था, जिनका कहना था कि बार्सामियन ने ‘2009-10 के अपने दौरे के दौरान वीजा नियमों का उल्लंघन करते हुए पेशेवर रूप से काम किया था, जबकि उनके पास पर्यटक वीसा था.’ भारत में वीजा नियमों के जरिए सरकार की चिंताओं और पूर्वाग्रहों का अंदाजा लगाया जा सकता है. ‘आतंक के खिलाफ युद्ध’ के फटे हुए पुराने बैनर का इस्तेमाल करते हुए गृह मंत्रालय ने आदेश जारी किया है कि सम्मेलनों में बुलाए गए विद्वानों और अकादमीशियनों को वीजा जारी करने से पहले सुरक्षा क्लियरेंस जरूरी है. इस क्लियरेंस की जरूरत कॉरपोरेट एक्जीक्यूटिवों और बिजनेसमैनों को नहीं होगी.
तो जो आदमी बांध निर्माण में निवेश करना चाहता है, या एक स्टील प्लांट बनाना चाहता है या एक बॉक्साइट की खान खरीदना चाहता है वह सुरक्षा के लिए खतरा नहीं माना जाता. लेकिन एक विद्वान जो शायद विस्थापन या सांप्रदायिकता या इस वैश्विक अर्थव्यवस्था में बढ़ते कुपोषण के बारे में एक सेमिनार में हिस्सा लेना चाहता है, वह सुरक्षा के लिए खतरा है. बुरे इरादों वाले आतंकवादियों ने शायद यह अंदाजा लगा लिया होगा कि किसी सेमिनार में हिस्सा लेने की तरकीब अपनाने के बजाय कामकाजी पोशाक में सज-धज कर कोई खान खरीदने का नाटक करना ज्यादा कारगर होगा.
डेविड बार्सामियन कोई खान खरीदने या किसी सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए भारत नहीं आए थे. वे बस लोगों से बातें करने आए थे. ‘आधिकारिक सूत्रों’ के मुताबिक उनके खिलाफ जो शिकायत की गई है, वह यह है कि भारत के अपने पिछले दौरे के दौरान उन्होंने जम्मू और कश्मीर की घटनाओं के बारे में रिपोर्टिंग की थी और वह रिपोर्टिंग ‘तथ्यों पर आधारित नहीं थी’. याद रखें कि बार्सामियन रिपोर्टर नहीं हैं. वे लोगों से बातें करने वाले आदमी हैं. वे अधिकतर असहमत लोगों से उस समाज के बारे में बातचीत करते हैं, जिनमें वो लोग रहते हैं.
क्या पर्यटक जिस देश में जाते हैं, वहां के लोगों से बातें करना गैर कानूनी है? क्या यह मेरे लिए गैर कानूनी होगा कि मैं अमेरिका या यूरोप जाऊं और वहां मिले लोगों के बारे में लिखूं? भले ही मेरा लेखन ‘तथ्यों पर आधारित नहीं हो?’ कौन तय करेगा कि कौन ‘तथ्य’ सही है और कौन नहीं? क्या बार्सामियन तब भी लौटा दिए जाते अगर उन्होंने दुनिया के सबसे सघन फौजी कब्जे में (कश्मीर में अंदाजन एक करोड़ की आबादी पर छह लाख सक्रिय फौजी जवान तैनात हैं) रोजमर्रा की जिंदगी के बारे में बातचीत रिकॉर्ड करने के बजाय कश्मीर चुनावों में भारी मतदान की तारीफ करने वाली बातचीत रिकॉर्ड की होती?
डेविड बार्सामियन पहले आदमी नहीं हैं, जिन्हें कश्मीर की संवेदनशीलता के नाम पर भारत सरकार ने वापस लौटा दिया है. सान फ्रांसिस्को के एक नृतत्वशास्त्री प्रोफेसर रिचर्ड शापिरो नवंबर, 2010 में दिल्ली हवाई अड्डे से बिना कोई वजह बताए वापस लौटा दिए गए थे. शायद यह उनकी सहयोगी अंगना चटर्जी पर दबाव डालने का एक तरीका था. अंगना इंटरनेशनल पीपुल्स ट्रिब्यूनल ऑन ह्युमन राइट्स एंड जस्टिस की सह-संयोजक है, जिसने सबसे पहले कश्मीर के गुमनाम सामूहिक कब्रों की मौजूदगी को दर्ज किया था.
सितंबर, 2011 में मनीला स्थित एशियन फेडरेशन अगेंस्ट इनवॉल्यूंटरी डिसएपियरेंस (अफाद) के मायो आकिनो को दिल्ली हवाई अड्डे से वापस लौटा दिया गया. इस साल के शुरू में 28 मई को एक मुखर भारतीय जनवादी अधिकार कार्यकर्ता गौतम नवलखा को श्रीनगर हवाई अड्डे से दिल्ली लौटा दिया गया था. कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने उनको लौटा देने को जायज ठहराते हुए कहा था कि नवलखा और मुझ जैसे लेखकों को कश्मीर के मामले में दखल देने की जरूरत नहीं है, क्योंकि ‘कश्मीर जलने के लिए नहीं है.’
कश्मीर को सारी चीजों से काटा जा रहा है. उसे दो सीमाओं पर सख्त गश्ती के जरिए बाहर की बाकी दुनिया से काटा जा रहा है. ये सीमाएं हैं दिल्ली और श्रीनगर. मानों कश्मीर आजाद हो चुका हो और जिसके पास वीजा देने की अपनी अलग व्यवस्था हो. इसकी सीमा के भीतर सरकार और फौज के लिए शिकार का अनवरत सिलसिला चलता रहता है. कश्मीरी पत्रकारों और आम लोगों को काबू में करने की कला के तहत रिश्वत, धमकियां, ब्लैकमेल और बयान न की जा सकने वाली क्रूरता की मदद ली जाती है.
जिस वक्त सरकार जिंदा लोगों को खामोश करने की कोशिशें कर रही है, लाशों ने बोलना शुरू कर दिया है. शायद यह बार्सामियन की निष्ठुरता थी कि उन्होंने कश्मीर जाने की योजना तब बनाई जब राज्य मानवाधिकार आयोग ने आखिरकार आधिकारिक रूप से कश्मीर के तीन जिलों में 2700 गुमनाम कब्रों की मौजूदगी को स्वीकार करने का पाखंड किया. दूसरे जिलों से हजारों कब्रों की रिपोर्टें भी आ रही हैं. शायद यह उन गुमनाम कब्रों की निष्ठुरता है जिन्होंने ठीक उस समय भारत सरकार को परेशानी में डाल दिया है जब संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में भारत के रिकॉर्ड की समीक्षा होनी है.
खतरनाक डेविड के अलावा दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र और किन लोगों से डरता है? छत्तीसगढ़ राज्य में दंतेवाड़ा से आनेवाले एक आदिवासी नौजवान लिंगाराम कोडोपी से, जिन्हें 9 सितंबर को गिरफ्तार कर लिया गया. पुलिस का कहना है कि उसने उन्हें बाजार में रंगे हाथों तब पकड़ा तब वे एक लौह-अयस्क खनन कंपनी एस्सार से सुरक्षा राशि (प्रोटेक्शन मनी) लेकर प्रतिबंधित कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) को दे रहे थे. उनकी चाची सोनी सोरी कहती हैं कि सादी वर्दी में आई पुलिस उन्हें पालनार गांव में उनके दादा के घर से सफेद बोलेरो कार में ले गई.
दिलचस्प है कि अगर पुलिस की कहानी सही है, तो उन्होंने लिंगाराम को गिरफ्तार कर लिया और माओवादियों को भाग जाने दिया. यह उन बेतुकी बातों के सिलसिले की सबसे ताजा कड़ी है, जिसके तहत उन्होंने लिंगाराम के खिलाफ सनक भरे आरोप लगाए और वापस लिए थे. उनका असली कसूर यह है कि वो स्थानीय गोंडी भाषा जानने वाले अकेले पत्रकार हैं और वे यह भी जानते हैं दंतेवाड़ा के दूर-दराज के जंगली इलाकों में कैसे बात करनी है. दंतेवाड़ा भारत का एक दूसरा युद्ध क्षेत्र है, जहां से किसी भी हालत में कोई खबर बाहर नहीं आनी चाहिए.
सरकार ने मध्य भारत में आदिवासी समुदायों की जमीन के बड़े बड़े टुकड़े बहुराष्ट्रीय खनन और आधारभूत संरचना कारपोरेशनों को एक के बाद एक गोपनीय करारों के जरिए सौंप दिया है. इसके बाद उसने इन जंगलों को लाखों सुरक्षा बलों से भर दिया. हथियारबंद और गैर हथियारबंद, सारे प्रतिरोधों को ‘माओवादी’ के रूप में चिह्नित कर दिया गया है (जैसे कि कश्मीर में सब ‘जिहादी तत्व’ हैं).
गृह युद्ध के तेज होने के साथ सैकड़ों घर जलाए जा रहे हैं. हजारों आदिवासियों ने भाग कर पड़ोसी राज्यों में पनाह ली है. लाखों डरे हुए लोग जंगलों में छिपे हुए हैं. अर्धसैनिक बलों ने जंगल को घेर लिया है, जिससे गांववालों के लिए जरूरी चीजों और दवाओं के लिए बाजार जाना एक दु:स्वप्न हो गया है. अनगिनत गुमनाम लोग जेलों में हैं जिन पर देशद्रोह और राज्य के खिलाफ युद्ध छेड़ने के आरोप हैं. उनके बचाव के लिए कोई वकील तक नहीं है. उन जंगलों से बहुत थोड़ी खबरें आ पाती हैं और वहां तो लाशों की कोई गिनती नहीं है.
इसलिए यह देखना मुश्किल नहीं है कि क्यों लिंगाराम कोडोपी से इतना बड़ा खतरा है. पत्रकार के रूप में प्रशिक्षित होने के पहले वे दंतेवाड़ा में एक ड्राइवर थे. 2009 में पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर उनकी जीप को जब्त कर लिया. उन्हें 40 दिनों तक एक छोटे से शौचालय में बंद कर के रखा गया जहां उऩ पर सलवा जुडूम में शामिल होने और विशेष पुलिस अधिकारी (एसपीओ) बनने के लिए दबाव डाला गया. सलवा जुडूम सरकार पोषित एक हत्यारी सेना है जिसे लोगों को उनके गांवों से निकाल बाहर करने के लिए बनाया गया था (सलवा जुडूम को सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक घोषित कर दिया है).
पुलिस ने लिंगाराम को तब छोड़ा जब गांधीवादी कार्यकर्ता हिमांशु कुमार ने अदालत में बंदी को अदालत में पेश करने की याचिका दायर की. लेकिन पुलिस ने लिंगाराम के बूढ़े पिता और परिवार के दूसरे पांच लोगों को गिरफ्तार कर लिया. उन्होंने उनके गांव पर हमला किया और गांववालों को धमकाया कि वे उन लोगों को शरण न दें. आखिरकार लिंगाराम दिल्ली भाग आए जहां उनके दोस्तों और शुभचिंतकों ने उनका दाखिला एक पत्रकारिता स्कूल में करा दिया. अप्रैल, 2010 में उन्होंने दंतेवाड़ा का दौरा किया और गांववालों को दिल्ली तक लाए ताकि वे इंडिपेंडेंट पीपुल्स ट्रिब्यूनल के सामने सलवा जुडूम, पुलिस और अर्धसैनिक बलों की बर्बरता की गवाही दे सकें. खुद अपनी गवाही में लिंगाराम ने माओवादियों की भी तीखी आलोचना की थी.
लेकिन छत्तीसगढ़ पुलिस इससे भी बाज नहीं आई. 2 जुलाई, 2010 को माओवादी पार्टी के आधिकारिक प्रवक्ता कॉमरेड आजाद आंध्र प्रदेश पुलिस द्वारा पकड़ कर मार दिए गए. छत्तीसगढ़ पुलिस के उप महा निरीक्षक केल्लुरी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में एलान किया कि लिंगाराम कोडोपी को माओवादी पार्टी द्वारा कॉमरेड आजाद की भूमिका के लिए चुना गया है (यह ऐसा ही था मानो 1936 के येनान में एक छोटे स्कूली बच्चे को चाऊ एन लाई कहा जाए). इस आरोप का इतना मजाक उड़ा कि पुलिस को इसे वापस लेना पड़ा. इसके फौरन बाद उन्होंने लिंगाराम पर दंतेवाड़ा में एक कांग्रेस विधायक पर हुए माओवादी हमले का मास्टरमाइंड होने का आरोप लगाया. लेकिन यह इतनी बकवास बात थी कि वे उन्हें गिरफ्तार नहीं कर पाए.
लिंगाराम दिल्ली में बने रहे और उन्होंने अपना कोर्स पूरा करके पत्रकारिता में डिप्लोमा हासिल किया. मार्च, 2011 में अर्धसैनिक बलों ने दंतेवाड़ा में ताड़मेटला, तिम्मापुरम और मोरापल्ली नामक तीन गांवों को जला दिया. छत्तीसगढ़ सरकार ने इसका इल्जाम माओवादियों पर मढ़ा. सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को इसकी जांच करने का जिम्मा दिया. लिंगाराम एक वीडियो कैमरे के साथ दंतेवाड़ा लौटे और गांव-गांव जाकर गांव वालों से गवाहियां जमा करते रहे, जिन्होंने पुलिस को कसूरवार ठहराया. ऐसा करके उन्होंने खुद को दंतेवाड़ा के मोस्ट वांटेड लोगों में शामिल करा दिया. आखिरकार 9 सितंबर को पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया.
लिंगाराम छत्तीसगढ़ में खबरें जुटाने और उन्हें दूसरों तक पहुंचाने वाले तकलीफदेह लोगों की जमात में शामिल हो गए हैं. सबसे शुरू-शुरू में एक मशहूर डॉक्टर विनायक सेन को खामोश करने की कोशिश की गयी, जिन्होंने सबसे पहले 2005 में सलवा जुडूम के अपराधों के खिलाफ आवाज उठाई थी. उन्हें एक माओवादी होने का आरोप लगा कर 2007 में गिरफ्तार कर लिया गया और आजीवन कारावास की सजा दे दी गई. कई साल जेल में बिताने के बाद वे अभी जमानत पर बाहर हैं.
कोपा कुंजम दंतेवाड़ा के जंगल के गांवों में मेरे पहले गाइड थे. जब वे हिमांशु कुमार के वनवासी चेतना आश्रम के साथ काम करते थे तो उन्होंने ठीक वही काम किए थे, जिन्हें बाद में लिंगाराम करने की कोशिश कर रहे थे. वे दूर-दराज के गांवों में यात्राएं करते थे, खबरें लाते थे और लोगों पर हावी खौफ को दर्ज करते थे. दंतेवाड़ा के दौरे पर गए पत्रकारों, लेखकों और अकादमिशियनों की आखिरी तटस्थ पनाह वह आश्रम 2009 के मई में छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा तोड़ दिया गया.
कोपा को सितंबर, 2009 में मानवाधिकार दिवस के दिन गिरफ्तार किया गया. उन पर एक आदमी की हत्या और एक दूसरे के अपहरण के मामले में माओवादियों से मिलीभगत का आरोप लगाया गया. कोपा के खिलाफ मामला तब बिखरने लगा जब पुलिस के गवाह उस बयान से मुकर गए, जिसे उन्होंने कथित रूप से पुलिस के सामने दिया था. उनमें वह आदमी भी शामिल था, जिसका अपहरण हुआ था. वास्तव में इससे कोई फर्क नहीं पड़ा क्योंकि भारत में तो प्रक्रिया ही सजा है.
कोपा को बेगुनाह साबित होने में कई साल लग गए. जिन लोगों ने कोपा से प्रेरणा लेकर पुलिस के खिलाफ शिकायतें दर्ज कराई थीं उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया. उनमें महिलाएं भी शामिल थीं, जिनका अपराध यह था कि उनका बलात्कार हुआ था. कोपा की गिरफ्तारी के ठीक बाद हिमांशु कुमार को दंतेवाड़ा से खदेड़ दिया गया.
आखिरकार यहां भी मुर्दे बोलेंगे. और केवल मारे गए लोग ही नहीं बोलेंगे, मारी गई जमीन, मारी गयी नदियां, मारे गये पहाड़ और मारे गए जंगलों के मारे गए जीव सुनने पर मजबूर कर देंगे.
निगरानी, इंटरनेट पुलिसिंग और फोन टेपिंग के इस दौर में जब हर गुजरते दिन के साथ बोलने वालों पर हमलों की कठोरता बढ़ती जा रही है, यह बहुत अटपटा है कि भारत साहित्यिक महोत्सवों की सपनीली मंजिल बनता जा रहा है. इनमें से अनेक महोत्सव उन्हीं कारपोरेशनों के पैसों पर आयोजित होते हैं, जिनकी तरफ से पुलिस ने आतंक का राज कायम कर रखा है.
श्रीनगर में हारुद साहित्यिक महोत्सव (जिसे कुछ समय के लिए स्थगित किया गया है) उनमें सबसे नया था. यह भारत का सबसे रोमांचक साहित्यिक महोत्सव था- ‘जब शरद पत्तियों का रंग बदल रहा होगा तो कश्मीर वादी शायरी, अदबी गुफ्तगू, बहसों-मुबाहिसों से गूंज उठेगी...’
इसके आयोजकों ने इसे एक ‘अराजनीतिक’ आयोजन के रूप में प्रचारित किया था. लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि शासक और दसियों हजार लोगों की हत्याएं करने वाला क्रूर फौजी कब्जा कैसे ‘अराजनीतिक’ हो सकता है. मुझे जानने की इच्छा है- क्या मेहमान पर्यटक वीजाओं पर आएंगे? क्या श्रीनगर और दिल्ली के लिए अलग-अलग वीजाएं होगीं? क्या उन्हें सेक्योरिटी क्लियरेंस की जरूरत होगी?
इस सारी झूठी आजादी के महोत्सव का यह शोर-शराबा हवाई अड्डों के गलियारों में बजते उन लोगों को कदमों की आवाजों को घोंटने में मदद करने के लिए है, जिन्हें टांग कर वापस लौटते जहाजों पर चढ़ाया जा रहा है. यह हथकड़ियों की उन खनखनाहटों को खामोश करने के लिए है जो मजबूत, गर्म कलाइयों में लगी हुई हैं. यह जेल के दरवाजों के ठंडे लोहे की खनक को दबाने के लिए है.
हमारे फेफड़ों से ऑक्सीजन धीरे-धीरे खत्म हो रहा है. शायद यह वह वक्त है कि हम अपनी देह में जो भी सांस बची रह गई है उसका इस्तेमाल करें और कहें: ‘खूनी दरवाजों को खोल दो.’
गार्जियन में प्रकाशित मूल आलेख से साभार. लेखक द्वारा दिए गए मूल लिंकों को पोस्ट में बरकरार रखा गया है. डेविड बार्सामियन के बारे में और जानने के लिए इस अंग्रेजी लिंक पर जाया जा सकता है.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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