हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

‘हिंदुस्तान में हिंदुओं का राज है, मुसलमानों का कौन है?’

Posted by Reyaz-ul-haque on 9/27/2011 01:15:00 AM

भरतपुर हत्याकांड: प्राथमिक रिपोर्ट

जेएनयू और दिल्ली विश्वविद्यालय के 11 छात्रों की एक फैक्ट फाइंडिंग टीम राजस्थान के भरतपुर जिले में हुए गोपालगढ़ हत्याकांड के कारणों और घटनाक्रम का पता लगाने के लिए 25 सितंबर को गोपालगढ़ और आसपास के गांवों में गई. इस टीम में शामिल थे: अनिर्बान (डीएसयू, जेएनयू), अनुभव (डीएसयू, जेएनयू), आनंद के राज (जेएनयू), गोगोल (डीएसयू, जेएनयू), रेयाज (डीएसयू, जेएनयू), श्रीरूपा (जेएनयू), श्रिया (डीएसयू, जेएनयू), अदीद (सीएफआई), शोभन (डीएसयू, डीयू) और सुशील (डीएसयू, डीयू). इस दौरान हम चार गांवों में गए और हमने तीन दर्जन से अधिक लोगों से बात की. इस हत्याकांड में मारे गए लोगों के परिजनों, घटनास्थल पर मौजूद चश्मदीद गवाहों और हत्याकांड में जीवित बच गए लोगों, घायलों और पीड़ित समुदाय के दूसरे अनेक सदस्यों से हुई बातों के आधार पर हम मुसलिम समुदाय पर प्रशासन के पूरे संरक्षण में हुए इस सांप्रदायिक फासीवादी हमले की आरंभिक रिपोर्ट प्रस्तुत कर रहे हैं. आगे हम एक विस्तृत रिपोर्ट भी जारी करेंगे.

गोपालगढ़ के लिए रवाना होते समय हमारे पास इस हत्याकांड से जुड़ी जानकारियां सीमित थीं. अखबारों और दूसरे समाचार माध्यमों को देखते हुए लगा कि इस हत्याकांड के खबरों को जान-बूझ कर छुपाया जा रहा है. जिन कुछेक अखबारों में इसकी खबरें आईं भी, वो आधी-अधूरी ही नहीं थीं, बल्कि उनमें घटनाओं को पुलिस और सरकार के नजरिए से पेश किया गया था. इसने पीड़ितों को अपराधियों के रूप में और अपराधियों को पीड़ितों के रूप में लोगों के सामने रखा. केवल एक अंगरेजी अखबार ने कुछ खबरें प्रकाशित की थीं, जिनमें पीड़ित मुसलिम समुदाय का पक्ष जानने की कोशिश की गई थी और इस हत्याकांड के पीछे की असली ताकतों के संकेत दिए गए थे.

ये संकेत तब नामों और चेहरों में बदल गए जब हम भरतपुर जिले में दाखिल हुए. जिले के पापरा, जोतरू हल्ला (अंधवाड़ी), ठेकरी, हुजरा, पिपरौली आदि गांवों और गोपालगढ़ कस्बे के पीड़ित मुसलिम समुदाय के लोगों ने एक के बाद एक जो कहानियां बताईं वो एक बार फिर भारतीय राज्य के फासीवादी चरित्र को सामने ले आती हैं और राज्य के साथ गुर्जर तबके की सामंती ताकतों तथा आरएसएस, विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के तालमेल को साबित करती हैं.

घटनाक्रम की शुरुआत 13 सितंबर से हुई. गोपालगढ़ कस्बे में करीब 50 घर मुसलिम परिवारों के हैं, जिनमें से अधिकतर मेव हैं. इस समुदाय की लगभग साढ़े ग्यारह बीघे जमीन के एक टुकड़े पर आपस में लगी हुई एक मसजिद है, ईदगाह है और कब्रिस्तान की जमीन है. मसजिद और ईदगाह पर पक्का निर्माण है, जबकि कब्रिस्तान की जमीन पर फिलहाल कोई निर्माण नहीं है. 1928 से यह वक्फ की संपत्ति है और कम से कम 40 साल पहले इस जमीन के एक टुकड़े को कब्रिस्तान घोषित किया गया था. लेकिन इस जमीन पर स्थानीय गुर्जर समुदाय के एक सदस्य और गोपालगढ़ के सरपंच ने बार-बार गैरकानूनी रूप से कब्जा करने की कोशिश की है. मेव मुसलिमों की तरफ से यह मामला दो बार स्थानीय एसडीएम अदालत में ले जाया गया, जहां से दोनों बार फैसला मुसलिम समुदाय के पक्ष में आया है. 12 सितंबर को एसडीएम अदालत ने सरपंच को यह जमीन खाली करने का नोटिस दिया था, जिसके बाद मसजिद के इमाम हाफिज अब्दुल राशीद और मसजिद कमेटी के दो और सदस्य सरपंच के पास इस जमीन को खाली करने के लिए कहने गए. इस पर सरपंच और दूसरे स्थानीय गुर्जरों ने मिल कर तीनों को बुरी तरह पीटा.

इमाम और कमेटी पर हमले की इस खबर से मुसलिम समुदाय में आक्रोश की लहर दौड़ गई. उस रात को जब मेव मुसलिम इस विवाद को अगले दिन की पंचायत में बातचीत के जरिए सुलझाने की तैयारियां कर रहे थे, उस रात गोपालगढ़ में भरतपुर से कम से कम दो सौ आरएसएस, विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के कार्यकर्ता गुर्जरों के जमा हो रहे थे. उन्होंने आसपास के अनेक गांवों से गुर्जरों को अगले दिन गोपालगढ़ आने के निर्देश दिए. अगले दिन 14 सितंबर को जब इस मामले के निबटाने के लिए स्थानीय थाने में दो विधायक और दोनों समुदायों के लोग जमा हुए तो केरवा, भैंसोड़ा, बुराना, बुरानी, पहाड़ी, पांडे का बयाना, बरखेड़ा, बौड़ोली और नावदा के गुर्जर आरएसएस कार्यकर्ताओं के नेतृत्व में गोपालगढ़ को एक तरह से अपने कब्जे में कर चुके थे. उन्होंने सड़कों पर पहरे लगा दिए थे और लोगों को कस्बे में आना-जाना रोकने लगे थे. उधर बैठक में दोनों समुदायों के जिन दो प्रतिनिधियों के ऊपर फैसला लेने की जिम्मेदारी दी गई थी, उन्होंने यह फैसला किया कि जमीन पर उसी समुदाय का अधिकार है, जिसके नाम रेकार्ड में यह जमीन दर्ज है. इस पर भी सहमति बनती दिखी कि कब्रिस्तान की जमीन पर कब्जे के लिए दोषी व्यक्ति मेवों से माफी मांगें. लेकिन यहीं कुछ गुर्जरों और आरएसएस के लोगों ने इस फैसले को मानने से इनकार कर दिया. उन्होंने थाने की कुरसियों और दूसरे सामान की तोड़फोड़ शुरू कर दी. मीटिंग में मौजूद अनेक प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि आरएसएस के लोगों और गुर्जरों ने मीटिंग में मौजूद भरतपुर के डीएम और एसपी के साथ धक्का-मुक्की की और कॉलर पकड़ कर पुलिस को मुसलिमों के ऊपर फायरिंग का आदेश दिलवाया.

मीटिंग आखिरी दौर में थी, जब पूरे गोपालगढ़ कस्बे में फैले आरएसएस, विहिप, बजरंग दल और गुर्जर समुदाय के हथियारबंद लोग मुसलिम मुहल्ले पर हमला कर रहे थे. चुन-चुन कर मुसलिमों की दुकानों को लूट कर आग लगा दिया गया. उनके घरों के ताले तोड़ कर सामान लूट लिए गए. इस वक्त सारे मर्द या तो थाने में चल रही मीटिंग में थे या मसजिद में, इसलिए महिलाएं भीतर के घरों में एक जगह जमा हो गई थीं. इस घर से लगी छत पर चढ़ कर हमलावरों ने महिलाओं के ऊपर भारी पथराव किया. इस घर में 11 दिन बाद भी बिखरे हुए पत्थर पड़े थे और पथराव के निशान मौजूद थे. हमलावर भीड़ एक-एक करके मुसलिम घरों से सामान लूटती रही और उनकी संपत्ति बरबाद करती रही. यह लूट अभी अगले तीन दिनों तक चलनेवाली थी और इसमें इमाम अब्दुल रशीद, अली शेर, अली हुसैम, डॉ खुर्शीद, नूर मुहम्मद, इसहाक और उम्मी समेत तमाम मुसलिम घरों को तबाह कर दिया जानेवाला था.

दोपहर ढल रही थी और असर की नमाज का वक्त हो रहा था. आस-पास के गांवों के लोग गोपालगढ़ में सामान खरीदने के लिए आते हैं. नमाज का वक्त होते ही स्थानीय मुसलिम बाशिंदे और खरीदारी करने आए लोग मसजिद में जमा हुए. पिछले दो दिनों की घटनाओं की वजह से मसजिद में भीड़ थोड़ी ज्यादा ही थी. पिपरौली गांव के इलियास इसकी एक और वजह बताते हैं. उनके मुताबिक कस्बे में तब यह खबर भी थी कि गुर्जर और आरएसएस-विहिप-बजरंग दल के लोग पुलिस के साथ मिल कर मसजिद तोड़ने आनेवाले हैं. मसजिद में उस वक्त कम से कम 200 लोग मौजूद थे (कुछ लोग यह संख्या 500 से हजार तक बता रहे थे). जोतरू हल्ला के 35 वर्षीय सपात खान उनमें से एक थे. उन्हें याद है कि उन्होंने नमाज पढ़नी शुरू ही की थी कि मसजिद पर फायरिंग शुरू हुई.

पुलिस का दंगा नियंत्रण वाहन मसजिद के ठीक सामने खड़ा हुआ और उसने मसजिद पर फायरिंग शुरू की. मसजिद से बाहर निकलने के दोनों दरवाजों पर गुर्जर और आरएसएस के लोग हथियारों के साथ खड़े थे. इसलिए मसजिद के भीतर घिरे लोग पीछे की तरफ की एक पतली दीवार तोड़ कर भागने लगे. सपात खान को भागने के क्रम में पांव में गोली लगी और वे गिर पड़े. उन्होंने करीब दस लोगों को गोलियों से जख्मी होकर दम तोड़ते देखा. फर्श पर पड़े हुए उन्होंने देखा कि गुर्जर और आरएसएस के लोग पुलिस की गोलियों से जख्मी लोगों के पेट में लाठी और फरसा मार कर लोगों की जान ले रहे थे. फायरिंग रुकने के बाद जब दर्जनों लोग मसजिद की फर्श पर घायल और मरे हुए पड़े थे, तो उनके शरीर पर से गोलियों के निशान हटाने के लिए उनके हाथ-पांव काटे गए. घायलों को और लाशों को गुर्जर और आरएसएस के लोग पुलिस की गाड़ी में लाद रहे थे. सपात खान भी उनमें से एक थे. गाड़ी में लादे जाने के बाद वे बेहोश हो गए. पांचवें दिन जब उन्हें होश आया तो उन्होंने खुद को भरतपुर हॉस्पीटल में पाया. वे खुशकिस्मत रहे कि वे जिंदा जलाए जाने से बच गए. लेकिन पथरौली के शब्बीर, लिवाशने के इस्माइल, पिलसु के हमीद, ठेकरी के उमर, खटकरा के कालू खां, जोतरू हल्ला के ईसा खां उतने खुशकिस्मत नहीं थे. उनमें से कइयों को तेल छिड़क कर जिंदा जलाने की कोशिश की गई. ये सारे लोग जयपुर के सवाई मान सिंह हॉस्पीटल में अब तक भरती हैं. घायलों में से हत्याकांड के 11 दिन बाद 25 सितंबर को दम तोड़ा, जिस दिन हम गोपालगढ़ में मौजूद थे.

लेकिन मसजिद में मारे गए और घायल हुए कई लोगों को जला दिया गया. उन्हें मसजिद की सीढ़ियों से महज दस कदम दूर सरसों की सूखी लकड़ी पर रख कर जलाया गया. वहां अधजली हड्डियां, जूते और कपड़ों के टुकड़े पड़े हुए हैं. यहां से एक-डेढ़ किमी दूर एक जंगल में भी अधजली हड्डियां मिली हैं. मसजिद से सटी ईदगाह में एक कुआं है, जिसमें से घटना के तीन दिनों बाद तीन अधजली लाशें मिली थीं. कुएं के पत्थर पर जली हुई लाशों को घसीटने के निशान बारिश और 11 दिन बीत जाने के बावजूद बने हुए हैं. ईदगाह में लाशों को जलाने के लिए लाए गए डीजल से भरा एक टिन रखा हुआ है. आसपास के इलाके पर पुलिस का पहरा है. जिस मसजिद में यह हत्याकांड हुआ, उसमें पुलिस किसी को जाने की इजाजत नहीं दे रही है. लेकिन बाहर से भी साफ दिखता है कि मसजिद में कितनी तबाही हुई है. सारी चीजें टूटी हुई हैं और फर्श पर बिखरी पड़ी हैं. खून के निशानों को मिटाने की कोशिश की गई है. दीवार पर गोलियों के कम से कम 50 निशान मौजूद हैं, जिन्हें सीमेंट लगा कर भरा गया है. जाहिर है कि यह काम पुलिस या उसकी मरजी से किसी आदमी ने किए हैं. गौर करने की बात यह भी है कि घटना के बाद से मसजिद में मुसलमानों को घुसने नहीं दिया जा रहा है. 

जिन्होंने पूरी घटना अपनी आंखों से देखी और मारे जाने से बच गए उनके मुताबिक हमले की सारी कार्रवाई इतनी व्यवस्थित और संगठित थी कि इससे साबित होता है कि इसकी योजना पहले से बनाई गई थी. गुर्जरों और आरएसएस की हत्यारी भीड़ का नेतृत्व गोपालगढ़ के आरएसएस नेता केशऋषि मास्टर, जवाहर सिंह (बेडम) और भोला गूजर (पहाड़ी) कर रहे थे. इसमें आरएसएस द्वारा संचालित एक ‘आदर्श विद्यालय’ के शिक्षक भी लुटेरों के साथ शामिल थे, जिनकी पहचान उसी विद्यालय में पढ़नेवाले एक मुसलिम छात्र ने की. छठी कक्षा में पढ़ने वाले सखावत की नई साइकिल इस लुटेरी भीड़ ने छीन ली. वह उस शिक्षक को ‘गुरुजी’ के नाम से जानता है.

घटना के बाद गोपालगढ़ के मुसलिम परिवार घर छोड़ कर अपने रिश्तेदारों के यहां रह रहे हैं. अधिकतर घरों में कोई नहीं है. कुछ में ताला लगा है, लेकिन बाकी घरों के दरवाजे और कुंडियां गुर्जर-संघी लुटेरों ने उखाड़ ली हैं. जिस दिन हम गोपालगढ़ में थे, एकाध लोग अपने घरों की खबर लेने के लिए कस्बे में लौटे थे. गोपालगढ़ में कर्फ्यू रहता है लेकिन पिपरौली के इलियास बताते हैं कि यह कर्फ्यू सिर्फ मुसलमानों पर ही लागू होता है. कर्फ्यू के दौरान भी गुर्जर और आरएसएस के लोग खुलेआम कस्बे में घूमते हैं. वे यह देख कर इतने हताश थे कि वे पूछते हैं, ‘हिंदुस्तान में हिंदुओं का राज है. मुसलमानों का कौन है?’

सरकार दावा कर रही है कि इस घटना में महज तीन लोग मारे गए हैं. लेकिन लोग बताते हैं कि कम से कम 20 लोग इस हमले में मारे गए हैं. उनमें से सारे मुसलिम हैं. जख्मी लोगों की संख्या भी लगभग इतनी ही है और वे सारे लोग भी मुसलिम हैं. इसके अलावा कम से कम तीन लोग लापता हैं. इनमें से दो हैं: ढौड़ कलां (फिरोजपुर झिरका) के मुहम्मद शौकीन और चुल्हौरा के अज्जू. इतने बड़े हत्याकांड को दो समुदायों के दंगा कह कर असली अपराधियों को बचाने की कोशिश की जा रही है. लोग पूछते हैं कि अगर यह दंगा था तो गुर्जरों और पुलिस की तरफ से कोई घायल तक क्यों नहीं हुआ. वे लोग जानते हैं कि हमलावरों में कौन लोग थे, लेकिन किसी के खिलाफ एफआईआर तक दर्ज नहीं हुआ है. उल्टे, लोगों की शिकायत है कि 600 मुसलमानों के खिलाफ पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है. हालांकि डीएम और एसपी का तबादला हो गया है, लेकिन लोग तबादलों से संतुष्ट नहीं हैं. उनकी साफ मांग है कि मुसलमानों पर गोलियां चलाने वालों पर हत्या के मुकदमे दर्ज किए जाएं. इसको लेकर अंधवाड़ी में पिछले छह दिनों से धरना चल रहा है, जिसमें रोज लगभग आठ सौ से एक हजार लोग शामिल होते हैं.

मुसलिमों पर गुर्जरों का यह हमला कोई नई बात नहीं है. छोटे-मोटे हमले लगातार होते रहे हैं. यहां खेती आजीविका का मुख्य साधन है. मेव मुसलमानों की यहां खासी आबादी है, लेकिन उनमें से आधे से भी कम लोगों के पास जमीन है. जमीन का आकार भी औसतन दो से तीन बीघे है, जिसमें सिंचाई निजी बोरवेल से होती है. बाकी के मेव छोटे मोटे धंधे करते हैं, दुकान चलाते हैं और पहाड़ों पर पत्थर काटते हैं. गुर्जर यहां पारंपरिक रूप से जमीन के मालिक रहे हैं. उनके पास न केवल बड़ी जोतें हैं, बल्कि दूसरे कारोबारों पर भी उनका वर्चस्व है. खेती, इलाज और शादी वगैरह के खर्चों के लिए मेव अक्सर गुर्जरों से कर्ज लेते हैं, जिस पर उन्हें भारी ब्याज चुकाना पड़ता है (गांववालों ने बताया कि उन्हें चौगुनी रकम लौटानी पड़ती है). देर होने या नहीं चुका पाने पर अक्सर मुसलिमों-मेवों पर हमले किए जाते हैं- इसमें धमकाने, गाली देने से लेकर मार-पीट तक शामिल है. इस तरह जमीन का सवाल यहां एक अहम सवाल है. 

इस नजरिए से गोपालगढ़ का हत्याकांड नया नहीं है. कानपुर, मेरठ, बंबई, सूरत...हर जगह अल्पसंख्यकों, मुसलमानों को उनके नाममात्र के संसाधनों से भी उजाड़ने और उनकी संपत्तियों पर कब्जा करने के लिए प्रशासन, पुलिस और संघ गिरोह की तरफ से मिले-जुले हमले किए जाते रहे हैं, गोपालगढ़ उनमें सबसे ताजा हमला है. इसी जून में बिहार के फारबिसगंज में अपनी जमीन पर एक कंपनी के कब्जे का विरोध कर रहे मुसलमानों पर गोली चलाकर पुलिस ने चार मुसलिमों की हत्या कर दी थी और नीतीश सरकार के इशारों पर कारपोरेट मीडिया ने इस खबर को दबाने की भरपूर कोशिश की.

गोपालगढ़ में भी कारपोरेट मीडिया और सरकार ने तथ्यों को दबाने की कोशिश की. मिसाल के तौर पर इस तथ्य का जिक्र कहीं नहीं किया गया कि डीएम और दूसरे अधिकारियों द्वारा आरएसएस नेताओं के कहने पर गोली चलाने का आदेश दिए जाने के बाद पुलिस के शस्त्रागार को खोल दिया गया और पुलिस के साथ-साथ गुर्जरों और आरएसएस कार्यकर्ताओं को भी पुलिस के शस्त्रागार से आधुनिक हथियार दिए गए. मसजिद पर हुई गोलीबारी में पुलिस के हथियारों का उपयोग ही हुआ, लेकिन उन हथियारों को चलानेवालों में गुर्जर और आरएसएस के लोग भी शामिल थे. यह दिखाता है कि इन तीनों ताकतों की आपस में कितनी मिलीभगत थी. इलाके के मेव शिक्षा और रोजगार में बहुत पिछड़े हुए हैं. सरकारी-गैर सरकारी नौकरियों में भी उनका हिस्सा नगण्य है. इसके उलट गुर्जर समुदाय के लौगों की नौकरियों में भरमार है. जिस पुलिस ने मेव लोगों पर हमला किया, उसमें बहुसंख्या गुर्जरों की ही थी और उसमें एक भी मुसलिम नहीं था. गुर्जरों के बीच आरएसएस और उसके सहयोगी संगठनों का काफी काम है और इसका असर पुलिसबलों पर भी साफ दिखता है. इसीलिए जब पुलिस मसजिद पर फायरिंग करने पहुंची तो उसकी कतारों में गुर्जर और आरएसएस के लोग भी शामिल थे. जाहिर है कि यह दो समुदायों के बीच कोई दंगा का मामला नहीं है, जैसा कि इसे बताया जा रहा है, बल्कि गोपालगढ़ में हुई हत्याएं एक सुनियोजित हत्याकांड हैं.


डीएसयू की तरफ से जारी

जेएनयू में लिंगदोह को लागू करवाने की साजिशें और इसका विरोध

Posted by Reyaz-ul-haque on 9/19/2011 01:09:00 AM

सीपीएम के छात्र संगठन एसएफआई ने जेएनयू में आजकल एक उन्माद का माहौल पैदा किया हुआ है- चुनाव कराने का. उनका नारा है कि वे किसी भी हालत में चुनाव कराएंगे. यानी लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों को कबूल करके भी चुनाव कराएंगे. पिछले तीन सालों से जेएनयू के छात्रों ने एक आवाज में लिंगदोह को नकारा है और इसीलिए यहां चुनावों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक लगी हुई है. लेकिन अब इस उन्माद की लहरों पर सवार होकर लिंगदोह को जेएनयू में लाने की तैयारी चल रही है. छात्रों के हितों के खिलाफ और देश भर के कैंपसों के कारपोरेटीकरण, निजीकरण, ब्राह्मणीकरण और अ-राजनीतिकरण की तरफ ले जाने वाले इस कदम में एसएफआई के साथ अब आइसा भी शामिल हो गया है. आइसा उसी भाकपा माले लिबरेशन का छात्र संगठन है, जो अन्ना के फासीवादी आंदोलन के लिए लोगों को जुटाते हुए देखा गया था. बल्कि उसने वर्ल्ड बैंक और आरएसएस समर्थिक अन्ना आंदोलन को साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन तक साबित करने की कोशिश की. यह भी याद रखना जरूरी है कि लिबरेशन की सांस्कृति ईकाई जसम के एक हिस्से ने नया ज्ञानोदय में विवादित इंटरव्यू के मामले में विभूतिनारायण राय का भरपूर समर्थन किया था. दोनों संगठनों द्वारा लिंगदोह को लाने की इस कोशिश का जेएनयू के कई संगठन और छात्र मजबूती से विरोध कर रहे हैं. इसी क्रम में आज कई जगह लिंगदोह के खिलाफ नाटक किए गए और कुछ छात्रों ने यह पर्चा वितरित किया. आप भी पढ़िए. यह मुद्दा इसलिए भी जरूरी है कि यह पूरे देश में चल रहे निजीकरण और कारपोरेटीकरण की प्रक्रिया से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है.

एसएफआई से आई आवाज, आईसा जिंदाबाद

( यहां विरोध ही वाजिब कदम है/हम समझते हैं/हम कदम कदम पर समझौता करते हैं/हम समझते हैं/हम समझौते के लिए तर्क गढ़ते हैं/ हर तर्क को गोल-मटोल भाषा में पेश करते हैं/ हम समझते हैं/हम गोल-मटोल भाषा का तर्क भी समझते हैं-गोरख पाण्डेय, ‘ समझदारों [आइसा-एसएफआई] का गीत’)

परसों मंगलवार को एक ऐतिहासिक UGBM है. हम दूर-दराज के गांवों, छोटे कस्बों और शहरों से, मुसहरी और मुस्लिम बस्तियों से, जंगलों और घाटियों से आनेवाले छात्रों के लिए एक ऐतिहासिक मौका है, जब हम यह तय करने जा रहे हैं कि हमारे छात्रसंघ का चुनाव किस तरीके से होगा. यह एक ऐतिहासिक मौका है क्योंकि UGBM में शामिल होकर वोट डाल कर जब हम यह तय करेंगे कि रेफरेंडम किन विकल्पों के साथ होनेवाला है तो साथ में हम यह भी तय करेंगे कि यूनिवर्सिटी में हमारी फीस सस्ती रहेगी या महंगी हो जाएगी. हमें हॉस्टल और मेस की सब्सीडियां मिलती रहेंगी या बंद हो जाएंगी. हम यह भी तय करेंगे कि हमारे कैंपस में छात्रों को हासिल जनवादी अधिकार, असहमति व्यक्त करने और संघर्ष करने का अधिकार, पब्लिक मीटिंग करने, परचा लाने और पोस्टर लगाने का अधिकार रहेगा या नहीं. क्योंकि ये सारे मामले इस बात से जुड़े हुए हैं कि हम रेफरेंडम के लिए कौन-से विकल्प चुनते हैं और अपना छात्र संघ चुनाव किस तरीके से कराते हैं. पिछले तीन सालों से इस कैंपस के छात्रों ने लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों को एक आवाज में नकारा है. लिंगदोह का मकसद निजीकरण को बढ़ावा देना और फीस बढ़ाना है. यह हमारे संघर्षों और छात्रसंघ संविधान द्वारा हासिल हमारे अधिकारों को कुचल देगा. साथ ही लिंगदोह कमेटी का एजेंडा यह भी है कि छात्र अपने आस-पास में क्या हो रहा है, इससे कट जाएं, सारी दुनिया में क्या हो रहा है इससे वो मतलब नहीं रखें. वे कैंपस से बाहर की राजनीति से कोई संबंध नहीं रखें और कारपोरेट कंपनियों के चाकर बन जाएं. साथियो, यह ऐतिहासिक मौका इसलिए भी है कि तीन साल तक लगातार लिंगदोह को बाहर रखने की कोशिशों को नाकाम करते हुए इस कैंपस के दो संगठन AISA और SFI लिंगदोह को एक विकल्प के रूप में पेश कर रहे हैं.

इस कैंपस में लिंगदोह की हिमायत में पहली आवाज ब्राह्मणवादी Youth For Equality ने उठाई थी. लेकिन लिंगदोह और ब्राह्मणवाद के खिलाफ संघर्ष करते हुए छात्रों ने YFE की कमर तोड़ दी है. वह उठ नहीं पा रहा है. इसलिए उसका जिम्मा पहले SFI ने अपने कंधे पर उठाया और पिछले दो महीनों से वह कैंपस में लगातार लिंगदोह को एक विकल्प के रूप में प्रचारित कर रहा है. इसे वो हर हालत में चुनाव चाहिए के नारे की ओट में पेश कर रहा है. यह लिंगदोह के खिलाफ छात्रों के लतागार जारी संघर्षों और जनमत का ही नतीजा है कि एसएफआई खुल कर लिंगदोह का समर्थन नहीं कर पा रहा है.

लेकिन लिंगदोह को मान कर चुनाव कराने की SFI की कोशिशों को AISA ने पछाड़ दिया है. वो छात्रों में भ्रम फैलाने वाली अपनी ‘ग्रे एरिया’ (बीच के रास्ते वाली) राजनीति को लेकर छात्रों के सामने आया है. मजे की बात यह है कि उसका बीच का रास्ता लिंगदोह की दलदल से होकर गुजरता है. छात्रों को पता होगा कि रेफरेंडम के लिए  SFI के दो विकल्पों की जगह DSU ने एक दूसरा प्रस्ताव सामने रखा है, जिसमें लिंगदोह के लिए कोई जगह नहीं है. AISA ने इन दोनों विकल्पों की एक खिचड़ी बनाई है और रेफरेंडम के लिए तीन विकल्पों को लेकर सामने आया है. उसके विकल्प हैं: कोर्ट ऑर्डर को नकारते हुए JNUSU संविधान के तहत चुनाव कराना, Joint Struggle Committee का चुनाव कराना और लिंगदोह को मानकर चुनाव कराना. अपनी इस चालाकी भरी तरकीब के जरिए AISA ने लिंगदोह के लिए रास्ता साफ करने की कोशिश की है. इन तीन विकल्पों में पहले दोनों विकल्प लिंगदोह को नकारते हैं और अगर AISA के प्रस्ताव के मुताबिक रेफरेंडम होता है तो लिंगदोह विरोधी वोट बंट जाएंगे और इस तरह लिंगदोह के तहत चुनाव कराना और आसान हो जाएगा. AISA ने अपनी धूर्तता में SFI को बहुत पीछे छोड़ दिया है. इस तरह कैंपस में लिंगदोह को लाने का सेहरा अपने सिर बांधने के लिए AISA और SFI में जो होड़ चल रही है, उसमें AISA फिलहाल SFI से बहुत आगे निकलता दिख रहा है. वह अपने कंधे पर लिंगदोह की पालकी ढोने को बेकरार है.
 
साथियो, हमें AISA और SFI के लिंगदोह के विकल्प वाले प्रस्तावों के पीछे की राजनीति समझनी होगी. ये दोनों कह रहे हैं कि वे चुनाव कराने के तरीकों पर एक विचार-विमर्श के तहत ऐसा कर रहे हैं. लेकिन विचार-विमर्श तो तब होता है, जब सभी पक्ष अपना स्टैंड साफ-साफ रखें. AISA और SFI सिर्फ चुनाव कराने का नारा दे रहे हैं. वे लिंगदोह को मंजूर करने या न करने पर अपनी कोई राय नहीं रख रहे हैं. लेकिन साथ ही वे लिंगदोह के खिलाफ विकल्पों पर छात्रों को धमका भी रहे हैं. इस तरह वे ऐसी स्थितियां बना रहे हैं कि लिंगदोह को लाने का इलजाम उनके सिर न आए और बाद में वो इसका ठीकरा आम छात्रों के सिर पर फोड़ सकें. यहां तक कि AISA ने कल अपने पर्चे में लिंगदोह के तहत चुनाव कराने के फायदे भी गिनाए हैं. उन्हें अब लिंगदोह में फायदे भी नजर आने लगे हैं. चालाकी देखिए कि वे झूठ बोलने और छात्रों को बरगलाने से भी नहीं चूकते. AISA ने एक फायदा यह बताया है कि लिंगदोह को मान कर अभी चुनाव करा लेने से लिंगदोह के खिलाफ हमारे संघर्ष और कोर्ट में केस पर कोई उल्टा असर नहीं पड़ेगा. लेकिन सच तो यह है कि एक बार लिंगदोह को मान कर चुनाव करा लेने के बाद कोर्ट में हमारा केस खत्म हो जाएगा. सुप्रीम कोर्ट में हमारा केस लड़ रहे वकील का भी यही कहना है.
 
साथियो, AISA आइसा का धोखेबाजी और गद्दारी भरा असली चरित्र बार-बार सामने आता रहा है. इसकी पैरेंट पार्टी भाकपा माले लिबरेशन को संघर्षरत किसान-मजदूर जनता ने खदेड़ कर भगा दिया है. वे अब इतिहास के कूड़ेदान में फेंके जाने का इंतजार कर रहे हैं. यह वही थकी, बिखरी, पतित और पराजित ताकत है, जो संघर्ष के मोर्चे के बजाय हमेशा बीच का रास्ता अपनाती है. जब जनता आर-पार की लड़ाई लड़ रही होती है तो वे ग्रे एरिया खोजते हैं और लोगों में कन्फयूजन फैलाते हैं. इस तरह वे जनता के दुश्मनों का पलड़ा ही भारी करते हैं. लड़ाई के मोर्चों पर वे कहीं नहीं दिखते. इसके बजाय वे समझौते के हर मंच पर दिखते हैं. उन्होंने रामलीला मैदान में वर्ल्ड बैंक और RSS द्वारा प्रायोजित अन्ना के फासीवादी आंदोलन के लिए लोगों को जुटाया. कारपोरेट लूट से लड़ने के नाम पर वे कारपोरेट फंडेड आंदोलनों में शामिल होते हैं और ब्राह्मणवाद से लड़ने के नाम पर ब्राह्मणवादी चालबाजियों को जगह देते हैं. कारपोरेट समर्थित ब्राह्मणवादी लिंगदोह आयोग की सिफारिशों के पक्ष में खड़ा होना इसकी सबसे ताजा मिसाल है. साथियो, संघर्ष में ही लोगों के चेहरे पहचाने जाते हैं, रंगे सियारों का भेद खुलता है. AISA बेनकाब हो चुका है. लिंगदोह को लाकर चुनाव कराने की उनकी बेकरारी को हम समझते हैं. वे लिंगदोह को मंजूर कर सकते हैं क्योंकि उनको संघर्ष और संघर्ष की राजनीति से कोई मतलब नहीं है. वे एनजीओ फंडेड ‘क्रांतिकारियों’ का गिरोह हैं, जिन्हें समझौतों और सौदेबाजियों की मलाई से मतलब है. लिंगदोह आ जाने से उनका काम आसान हो जाएगा.
 
इसलिए साथियों दांव पर बहुत कुछ लगा है. चालीस साल के हमारे संघर्षों से हासिल अधिकारों और तीन साल से लिंगदोह के खिलाफ हमारी कामयाबियां दांव पर हैं. हमारा डेमोक्रेटिक स्पेस और राजनीतिक बहस-मुबाहिसे और देश-दुनिया की राजनीति से हमारा जुड़ाव दांव पर है. संघर्ष की हमारी विरासत दांव पर है. यह हमें तय करना है कि अपनी राजनीति को हम खुद तय करेंगे या ब्राह्मणवादी और कारपोरेटों के दलाल प्रशासन और गृह मंत्रालय. AISA और SFI हमारे कैंपस की राजनीति और छात्रों के अधिकारों को इनके हाथ बंधक रखने को बेकरार हैं. क्या हम उन्हें ऐसा करने देंगे? हमारे सामने कोई बीच का रास्ता नहीं है. बस दो ही रास्ते हैं: या तो लिंगदोह को मंजूर करना या उसे पूरी तरह खारिज करना. अब तक हमने अपने संघर्षों से इसे खारिज किया है. इसे कैंपस में दाखिल न होने दें.
 
उमर, हेम, शाश्वती, रूबीना, रेयाज, गोगोल, अंजली, मनभंजन

भ्रष्टाचार के खिलाफ टीम अन्ना का आन्दोलन : एक विश्लेषण

Posted by Reyaz-ul-haque on 9/16/2011 02:14:00 AM

दिगंबर

टीम अन्ना के नेतृत्व में भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए एक सशक्त लोकपाल पद का सृजन करने और जन लोकपाल कानून बनाने को लेकर चल रहा आंदोलन 28 अगस्त की सुबह 10 बजे अन्ना हजारे द्वारा ‘आमरण अनशन’ तोड़ने के साथ समाप्त हो गया. आंदोलन के नेतृत्व ने यह घोषणा की थी कि प्रधानमंत्री और न्यायपालिका को लोकपाल के दायरे में लाने सहित अपनी किसी भी मांग से वे पीछे नहीं हटेंगे और जन लोकपाल बिल संसद में पारित होने तक अन्ना का अनशन जारी रहेगा. इसके लिए सरकार को 1 सितम्बर तक का समय दिया गया था. लेकिन सुलह-समझौते और नाटकीय घटनाक्रम के बाद आखिरकार कम महत्व वाली तीन मांगो पर सहमति को आधार बनाकर एक भव्य आयोजन के साथ अनशन समाप्त हो गया. अपने जन लोकपाल बिल के समर्थन में अन्ना हजारे ने 16 अगस्त से दिल्ली में आमरण अनशन करने कि घोषणा की थी. सरकार ने इसकी इजाजत नहीं दी और 16 अगस्त की सुबह अनशन शुरू करने से पहले ही अन्ना हजारे और उनके समर्थकों को गिरफ्तार कर लिया. इस घटना ने आग में घी का काम किया. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोटने की इस कुकृत्य ने सरकार के प्रति लोगों में व्याप्त आक्रोश को और अधिक तीव्र कर दिया. टीवी चैनलों ने इस पूरे प्रकरण का सीधा प्रसारण किया. छोटी से छोटी घटना को लगातार दिखाने और आन्दोलन का बढ़-चढकर प्रचार-प्रसार करने से शहरी मध्यम वर्ग प्रभावित हुआ. लोग उद्वेलित होकर खुद-ब-खुद सड़कों पर उतरने लगे. इस घटना में जल्दी ही एक नाटकीय मोड़ आया जब कुछ ही घंटो के भीतर अन्ना टीम और उनके समर्थकों को सरकार ने रिहा कर दिया. लेकिन तिहाड़ जेल से बाहर आने के बजाय अन्ना ने जेल के अंदर ही अनशन शुरू कर दिया. 16 अगस्त कि रात और 17 अगस्त को दिनभर दिल्ली पुलिस के अधिकारियों के साथ अन्ना टीम की समझौता वार्ता चलती रही. आखिरकार सरकार ने 21 दिन के लिए रामलीला मैदान में अनशन और प्रदर्शन की इजाजत भी दे दी. दिल्ली नगर निगम ने दिन-रात एक करके रामलीला मैदान की सफाई और अस्थायी शौचालय की व्यवस्था की और वहाँ सुरक्षा का भी विशेष इंतजाम किया. (याद रहे कि इसी रामलीला मैदान में अपने खर्चे पर भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे स्वामी रामदेव और उनके समर्थकों पर पुलिस ने आधी रात को अचानक हमला किया था.) बाद की हर एक घटना से अधिकांश परिचित हैं क्योंकि अन्ना की गिरफ़्तारी के बाद से ही सारे के सारे समाचार चैनल पूरे देश की बाकी ख़बरों को किनारे लगते हुए अन्ना आन्दोलन की हर छोटी-बड़ी घटना का 24*7 घन्टे सीधा प्रसारण करते रहे. इस आन्दोलन को ‘आजादी की दूसरी लड़ाई’, ‘व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई’, और ऐसे ही प्रचंड और पाखंडपूर्ण उद्घोष करने के लिए टीवी चैंनलों और अखबारों में होड़ लग गयी. रामलीला मैदान के मंच पर नामी-गिरामी लोगों, फ़िल्मी सितारों, खिलाड़ियों, गायकों, कवियों, धर्मगुरुओं और समाज सेवियों का जमावड़ा तथा उत्तेजनापरक, अतिशयोक्तिपूर्ण और लोकलुभावन भाषण का क्रम अविरल जारी था. उधर सरकार और अन्ना टीम के बीच समझौता वार्ता और कई स्तर पर मंत्रणाएं चलती रहीं. कई मध्यस्थ आये और गए जिनमें धर्मगुरु, पार्टियों के नेता, एनजीओ मठाधीश और यहाँ तक कि आदर्श घोटाले के आरोपी विलास राव देशमुख जैसे लोग प्रमुख भूमिका में रहे. और जैसा कि पहले ही तय था कि आन्दोलन का पटाक्षेप भ्रष्टाचार विरोधी कानून और एक पद सृजन के लिए आपसी समझौते में होगा, अंततः हुआ भी वही. इस बीच आन्दोलन के नेतृत्व की संरचना और उसके समर्थकों की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि, भ्रष्टाचार के प्रति नेतृत्वकारी लोगों का दृष्टिकोण, आन्दोलन का तौर-तरीका और यहाँ तक कि उनके आर्थिक स्रोत, राजनीतिक पार्टियों के साथ उनके सम्बन्ध और प्रतिक्रियावादी ताकतों के साथ संश्रय को लेकर भी बहुत सारे प्रश्न उठे. लेकिन जनता के एक खास तबके की स्वतःस्फूर्त पहलकदमी देखकर कई संगठन और व्यक्ति इतने अभिभूत और भाव विह्वल हो गए कि उन्होंने उपरोक्त सवालों को जनता से कटे निष्क्रिय बुद्धिजीवियों का प्रलाप कहकर ख़ारिज कर दिया. कारपोरेट मीडिया के अहर्निश प्रचार-प्रसार से जो बवंडर उठा, उसने कई विवेकशील, विचारवान और जनपक्षधर बुद्धिजीवियों, संगठनों को भी असमंजस में डाल दिया. अब, जबकि यह तूफ़ान थम गया है और अन्ना आन्दोलन ‘आधी जीत’ की अपनी चरम परिणति तक पहुँच गया है, इस पूरी परिघटना पर विचार करना जरूरी है ताकि भविष्य के लिए जरूरी सबक और कार्यभार निकाले जा सकें. अन्ना टीम की मुहिम यदि केवल एक कानून बनवाने और एक लोकपाल पद के सृजन तक ही सीमित होती तो इसे गंभीरता से लेने की जरुरत नहीं थी. पूंजीवादी लोकतंत्र में ऐसे दबाव समूह और पैरोकार (लौबिस्ट) होते हैं जो किसी खास मामले में सरकार पर दबाव बनाते रहते हैं. उनके उद्देश्य बहुत सीमित होते हैं. लेकिन रामलीला मैदान के मंच से जिस तरह ‘व्यवस्था परिवर्तन’, ’संपूर्ण क्रांति’, ’लोकतंत्र की पुनर्बहाली’ और ‘दूसरी आजादी’ का शब्द-जाल फैलाया गया, उसने कई सारे लोगों के मन में फर्जी उम्मीद जगायी और भ्रम फैलाया है. लोग इस व्यवस्था से त्रस्त हैं और अपनी रोज-बरोज की समस्याओं से मुक्ति चाहते हैं. अपनी इन्हीं आकांक्षाओं और भावनाओं के साथ लोग अन्ना की ओर आकर्षित हुए. और अब अन्ना आन्दोलन को महिमामंडित करके उसे जनांदोलनों के एक आदर्श नमूने के रूप में स्थापित करने का प्रयास चल रहा है. ऐसी स्थिति में यह जरूरी है कि इस पूरे प्रकरण का तथ्यपरक विश्लेषण किया जाय और देखा जाय कि यह समूह अपने बड़े-बड़े दावों को पूरा करने लायक है भी या नहीं. इसके लिए हम मुख्यतः छ: मानदंडों पर अन्ना टीम और उसके लोकपाल आन्दोलन को जांचने कि कोशिश करेंगे. (1- विचारधारा और राजनीति (2- उद्देश्य, कार्यक्रम और मांग (3- सांगठनिक उसूल और कार्य प्रणाली (4- नेतृत्व की संरचना (5- समर्थक और जनाधार (6- मीडिया की भूमिका और (7- आर्थिक स्रोत. शब्दाडम्बरों से नहीं बल्कि इन्हीं मानदंडों से हम किसी भी संगठन या आन्दोलन को परख सकते हैं कि वह वास्तव में किन वर्गों या तबकों की नुमाइंदगी करता है.

विचारधारा और राजनीति

अन्ना टीम कि कोई सुसंगत, सुनिश्चित और समान विचारधारा नहीं है. इसमें परम्परावादी और आधुनिकतावादी, धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष, तरह-तरह के विचारों वाले लोग शामिल हैं. एक बात सबमें साझा है कि इनमें से कोई भी बुनियादी बदलाव (रेडिकल चेंज) का समर्थक नहीं है. अधिक से अधिक इन्हें सुधारवादी माना जा सकता है. इसमें परस्पर विरोधी आस्थाओं वाले धार्मिक समूह हैं, सीमित उद्देश्य के लिए काम करने वाले गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) हैं और कुछ महत्वाकांक्षी लोग हैं जिनकी कोई सुसंगत सोच नहीं है. मुस्लिम समाज के प्रति विष-वमन करने वाले वरुण गाँधी और सुब्रमण्यम स्वामी जैसे लोगों से इस टीम को कोई गुरेज नहीं है. आरक्षण विरोधी ‘यूथ फॉर इक्वेलिटी’ से भी इन्हें कोई परहेज नहीं है. खुद अन्ना हजारे गुजरात नरसंहार के आरोपी नरेन्द्र मोदी और गैरमराठी ‘बाहरी लोगों’ के विरुद्ध नफरत फ़ैलाने वाले राज ठाकरे के प्रसंशक हैं. वे ‘नोट के बदले वोट’ के आरोपियों को फांसी देने कि मांग करते हैं, लेकिन यह साजिश किसने और क्यों की, इस पर वह मौन रहते हैं . अन्ना हजारे ने अपने गाँव रालेगण सिद्धि में जो आदर्श गाँव का मॉडल बनाया है, वह प्रतिगामी विचारों पर आधारित है. वहाँ जातिगत पेशे में लगे लोगों को अपना-अपना काम निष्ठापूर्वक करना जरुरी है. उनका मानना है कि हर आदर्श गाँव में एक लोहार, एक सुनार, एक कुम्हार और एक चमार परिवार का होना जरूरी है, ताकि गाँव आत्मनिर्भर बने. वहाँ पंचायत और कॉपरेटिव का चुनाव नहीं होता. दारू पीने और अन्य सामाजिक बुराइयां करने वालों की सार्वजनिक रूप से पिटाई की जाती है. जहिर है कि इन सब के पीछे अलोकतांत्रिक, वर्णाश्रम आधारित, ब्राह्मणवादी, सामंती सोच है. जन लोकपाल आन्दोलन की व्यावहारिक कार्यवाहियों के दौरान भी विभिन्न रूपों में इसका इजहार हुआ.. नवउदारवादी आर्थिक ‘सुधार’ हमारे देश का सबसे बुनियादी मसला है. इसने भारतीय समाज में पहले से मौजूद समस्याओं को तीखा किया है और नयी-नयी समस्याओं को जन्म दिया है (विराट और बेलगाम भ्रष्टाचार भी इनमें से एक है). उदारीकरण-निजीकरण की इन नीतियों के परिणामस्वरूप लाखों मजदूरों-किसानों ने आत्महत्या की है और अधिकांश जनता की जिंदगी नरक से भी बदतर हो गयी है. लेकिन अन्ना टीम का इन नीतियों से कोई विरोध नहीं है. कोई भी विचार या नीति यदि बहुसंख्य मेहनतकश जनता के हित में नहीं है, उनके जीवन में खुशहाली लाने वाली नहीं है तो वह ‘व्यवस्था परिवर्तन’ का वाहक नहीं हो सकती. अन्ना टीम मेहनतकश जनता के प्रति पक्षधर और प्रतिबद्ध नहीं है. जिन राजनीतिक पार्टियों ने जनविरोधी, नवउदारवादी नीतियों को बढ़-चढ़ कर लागू किया, उनके सहयोग और समर्थन से ही वे जन लोकपाल कि मुहिम को आगे बढ़ा रहे हैं. अनशन की समाप्ति और ‘आधी जीत’ के लिए उन्होंने उन सबका आभार भी व्यक्त किया. विचारों की इस पंचमेल खिचड़ी के भरोसे सरकारी सहयोग से कोई कानून तो बनवाया जा सकता है, लेकिन क्या इसके दम पर ‘व्यवस्था परिवर्तन’ और ‘आजादी की दूसरी लड़ाई’ लड़ना संभव है?

सांगठनिक उसूल और कार्य-प्रणाली

अन्ना टीम के जनलोकपाल आन्दोलन का संचालन कई ढीले-ढाले संगठनों और व्यक्तियों के तदर्थ गठबंधन द्वारा किया गया जिसमें शुरू से आखिर तक मतभेद और कलह मौजूद रहे हैं. इसके नेतृत्व का करिश्माई और मसीहाई अंदाज ही इसकी सामर्थ्य और सीमा थी, जिसके केंद्र में अन्ना हजारे थे. इसमें कर्ता अन्ना और उनकी टीम थी, आन्दोलन में शामिल भीड़ का काम उनकी हौसला अफजाई करना, उनकी ताकत बढ़ाना था ताकि सरकार उनके साथ समझौता करने पर राजी हो जाये. मध्यम वर्ग को हमेशा ही किसी महानायक या मसीहा का इन्तजार रहता है जो अपने चमत्कारी प्रभाव से बड़ा से बड़ा बदलाव लाने में समर्थ हो. अपनी पहल पर अनुशासित और योजनाबद्ध सांगठनिक कार्रवाई से उसे एलर्जी होती है. जन लोकपाल ने इस मध्यम वर्गीय प्रवृत्ति का भरपूर लाभ उठाया. आज का दौर सचेत रूप से इतिहास निर्माण का दौर है जहाँ समाज की हर गतिविधि संगठित शक्तियां संचालित करती हैं. राज्य खुद ही ऊपर से नीचे तक पूरी तरह सुसंगठित और वर्गीय शासन को चलाने वाले हर तरह के अश्त्र-शस्त्र से सुसज्जित है. इसका सामना करने के लिए एक केंद्रीकृत, अनुशासित और मजबूत संगठन का होना अनिवार्य है. यह किसी की व्यक्तिगत इच्छा से स्वतंत्र, एक ऐतिहासिक तथ्य है. भीड़ के सामने इस हवाई घोषणा का कोई मतलब नहीं कि ‘हम लोग’ संप्रभु हैं और सरकार जनता की नौकर है. ‘हम लोग’ अपनी संप्रभुता का इजहार और उसकी दावेदारी संगठन और अनुशासन के माध्यम से ही करते हैं. अगर ऐसा न हो तो ‘हम लोग’ किन्हीं खास लोगों को सत्ता के गलियारे तक पहुंचाने का जरिया हो सकते हैं, चाहे मतदान से या किसी अभियान से. ‘जनतंत्र के आदर्शों का आनंदोत्सव’ और लोकतंत्र के क्रियान्वयन में जमीन-आसमान का फर्क है. विभिन्न तबकों और वर्गों के जन संगठनों में रोज-बरोज के व्यावहारिक कामों के दौरान उससे जुड़े लोगों का जनवादीकरण और लोकतंत्र का क्रियान्वयन होता है. ऐसे संगठनों में समूह की इच्छा और बहुमत की राय सर्वोपरि होती है और व्यक्ति समूह के अधीन होता है, चाहे वह कितने भी अलौकिक गुणों और विलक्षण प्रतिभा से संपन्न क्यों न हो. नेता का कर्त्तव्य आन्दोलन और संगठन के उद्देश्य और कार्यक्रम से अपनी कतारों को परिचित कराना, उनकी चेतना बढ़ाना, उनके माध्यम से जनगण को गोलबंद और संगठित करना तथा आन्दोलन को सही दिशा में संचालित करना होता है. लेकिन जनता ही वास्तविक कर्ता होती है. अन्ना कि मुहिम जिन एनजीओ के हाथों में थी उनमें इस प्रकार का कोई संगठन नहीं है. वहाँ कार्यकारी टीम और वेतनभोगी कर्मचारी होते हैं जो निश्चित अवधि और इलाके के लिए निर्धारित और वित्तपोषित, सुधारात्मक परियोजनाओं का संचालन करते हैं. ऐसे संगठन अपने दानकर्ताओं की मदद से जनता के कल्याण और भलाई के लिए काम करते हैं, उन्हें गोलबंद और संगठित नहीं करते. इतिहास का निर्माण कोटि-कोटि जनता के सचेत प्रयासों से होता है, किसी मसीहा या महानायक के चमत्कार से नहीं. लेकिन हमारे समाज में लोकतान्त्रिक चेतना के आभाव तथा अतीत से चली आ रही नायक-पूजा और अंधश्रद्धा के गहरे प्रभाव के कारण अक्सर किसी उद्धारक के पीछे भीड़ उमड़ पड़ती है. अन्ना कि मुहिम के दौरान भी ऐसा ही हुआ. रामलीला मैदान में उपस्थित जनसमूह की चेतना बढ़ाने के बजाय उनकी भावनाओं को उकसाने और अंधभक्ति को बढ़ावा देने के लिए आपातकाल के दौरान दिए गए ‘इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा’ की पैरोडी बनाकर ‘अन्ना इज इंडिया, इंडिया इज अन्ना’ का नारा दिया गया. अन्ना टीम कि मुहिम में शामिल नाना प्रकार के सुधारवादियों का ढीला-ढाला मोर्चा जन लोकपाल कानून बनवाले, वही बहुत है. इतिहास का सबक है कि बुनियादी बदलाव के लिए वर्गों और तबकों के संगठित, सचेतन और धैर्यपूर्व संघर्ष कि जरूरत होती है.

अन्ना टीम का उद्देश्य और उनकी मांग

लोकपाल बिल के लिए आंदोलन चलाने वाली टीम अन्ना का उद्देश्य भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मजबूत और स्वतंत्र कानून बनवाना, विदेशों से काले धन की वापसी तथा चुनाव प्रणाली और न्याय व्यवस्था में सुधार लाना है. अन्ना टीम भ्रष्टाचार को देश कि सबसे बड़ी समस्या मानती है. और इस समस्या के समाधान के लिए वह एक कठोर कानून और शक्तिशाली लोकपाल के गठन को अनिवार्य मानती है. अप्रैल 2011 में अन्ना हजारे के पहले अनशन के बाद सरकार ने अन्ना टीम के 5 प्रतिनिधियों को मिला कर लोकपाल कानून की ड्राफ्टिंग कमेटी बनायी, भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम चलाने वाले कई दूसरे एनजीओ और रामदेव जैसे लोगों को उससे अलग ही रखा गया. बाद में सरकार ने अन्ना टीम के कई सुझावों को उसमें शामिल नहीं किया. उसने एक बेहद कमजोर लोकपाल का मसौदा तैयार किया जिसमे भ्रष्टाचारी के लिए न्यूनतम 6 माह और अधिकतम 10 वर्ष कि सजा तथा भ्रष्टाचार का आरोप गलत साबित होने पर शिकायतकर्ता को दो साल की सजा का प्रावधान है. अन्ना टीम की मांग थी कि प्रधानमंत्री, न्यायपालिका और नौकरशाही को लोकपाल के दायरे में लाया जाय. साथ ही लोकपाल कानून को क्रियान्वित करने के लिए 10 लोगों की ऐसी टीम बनायी जाय जो पुलिस, जांच एजेंसी और न्यायाधीश तीनों की भूमिका निभाने के लिए अधिकृत हो और सर्वशक्तिमान हो. अन्ना टीम का मानना है कि अगर उनके मसौदे के आधार पर लोकपाल बिल बन गया तो देश में 60 प्रतिशत भ्रष्टाचार कम हो जाएगा. दरअसल भ्रष्टाचार के प्रति अन्ना टीम का नजरिया सतही और भ्रामक है. उनकी निगाह में देश कि सारी समस्याओं के मूल में भ्रष्टाचार है जिसके खत्म होते ही सभी मुसीबतें दूर हों जाएँगी. इस तरह वे लक्षण को रोग बताते हैं और उसे जड़ से मिटाने के बजाय निमहकीमी इलाज तजबीज करते हैं तथा महंगाई, बेरोजगारी, शोषण और लूट-खसोट से लोगों का ध्यान हटाने का प्रयास करते हैं. दूसरे, वे केवल कानून का उलंघन करके कला धन कमाने को ही भ्रष्टाचार मानते हैं. पिछले 20 वर्षों से सरकार कानून में फेर-बदल कर के श्रम और सार्वजनिक संपत्ति की लूट को बेलगाम करती जा रही है, 1991 के पहले जो जो भ्रष्टाचार था उन सब को शिष्टाचार में बदलती जा रही है, उससे उन्हें कोई उज्र नहीं. जो लोग बेलगाम लूट-खसोट से निजात पाने के लिए अन्ना टीम के समर्थन में बड़ी संख्या में सड़कों पर उतरे, उनकी चाहत जायज है, लेकिन सवाल यह है कि क्या इस सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक व्यवस्था के बने रहते हुए एक कानून, एक संस्था और एक सर्वसत्ता सम्पन्न लोकपाल पद का सृजन कर देने से भ्रष्टाचार पर रोक लग जायेगा? आजादी के बाद से अब तक भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के लिए पांच दर्जन से ज्यादा कानून बने और कई जांच समितियों का गठन किया गया जिनमें से एक है केन्द्रीय सतर्कता आयोग जिसे 1998 और 2004 में कानून बनाकर पहले से ज्यादा अधिकार दे दिये गये. लेकिन कहावत है कि कानून बनते ही तोड़ने के लिए हैं. हर नये कानून के साथ भ्रष्टाचार पहले से कहीं अधिक विकराल रूप धारण करता गया. यही हाल दूसरे कानूनों का भी है. क्या कठोर कानून के बावजूद दहेज उत्पीडन आज भी जारी नहीं है? क्या भ्रूण हत्या के विरुद्ध कानून बना दिए जाने से भ्रूण हत्या बंद हो गयी? क्या बाल श्रम कानून बनने से बच्चों से काम लेने पर लगाम लगी? क्या दलित उत्पीडन के खिलाफ कानून बन जाने से दलितों का उत्पीडन समाप्त हुआ? सच तो यह है कि जब भी किसी समस्या के प्रति लोगों का आक्रोश और असंतोष बढ़ता है तो सरकार खुद ही उसके लिए कानून बना कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेती है. भ्रष्टाचार के मामले में भी वह यही कर रही है. क्या अन्ना टीम अपने इस कानूनवादी, सुधारवादी मांग के जरिये सरकार के इसी पुराने, आजमाए हुए पैंतरे में सहयोगी भूमिका नहीं निभा रही है? कहावत है ‘प्रभुता पाई काहि मद नाहीं.’ अंग्रेजी कहावत है कि ‘पावर करप्ट्स एंड एब्सलूट पावर करप्ट्स एब्सलूटली’. सर्वाधिकार संपन्न लोकपाल भी भ्रष्ट नहीं होगा इसकी क्या गारंटी है? मजेदार बात यह है कि अन्ना टीम ने पूंजीपतियों, व्यापारियों, सटोरियों, काला बाजारियों, एनजीओ चलाने वालों, धार्मिक संस्थाओं और मीडिया को अपने लोकपाल की गिरफ्त से बाहर रखा है. ए. राजा आज बिना लोकपाल के भी जेल में हैं, जबकि 1,75,000 करोड़ डकार जाने वाले मोबाइल कंपनियों के मालिक देशी-विदेशी पूंजीपतियों का लोकपाल कानून भी कुछ नहीं बिगाड़ पायेगा. पिछले दिनों नीरा राडिया कांड ने पूंजीपति और मीडिया के अपवित्र गठबंधन को सामने ला दिया था. लेकिन प्रधानमंत्री से लेकर राज्य के छोटे कर्मचारियों तक को लोकपाल के दायरे में लाने पर बजिद अन्ना टीम ने अपने जन लोकपाल से उन्हें बेलाग रखा. क्या अन्ना टीम की मांग पूरी हो गयी! अनशन समाप्ति के बाद के विजयोल्लास और मीडिया के अन्धाधुंध प्रचार से तो ऐसा ही जान पड़ता है, लेकिन हकीकत कुछ और है. रामलीला मैदान के मंच से अन्ना ने घोषणा की थी कि सरकार लोकपाल का अपना मसौदा वापस ले और उसकी जगह जन लोकपाल बिल संसद में पेश करे. कानून बनाने के लिए अन्ना टीम ने सरकार को 30 अगस्त तक का समय दिया था और उदघोष किया था कि कानून बनने तक अन्ना का अनशन और आंदोलन जारी रहेगा. लगातार वार्तालापों का जोर चला और अंततः अन्ना टीम ने प्रधानमंत्री और न्यायपालिका को जन लोकपाल के दायरे में लाने सहित कई मांगों को छोड़ते हुए केवल कम महत्व वाले तीन मुद्दों पर संसद में प्रस्ताव पेश करने की शर्त रखी – 1. राज्यों में लोकायुक्त की नियुक्ति, 2. सिटिजन चार्टर के जरिये सरकारी दफ्तरों में हर काम के लिए निश्चित समय का निर्धारण और 3. राज्य के सभी कर्मचारियों को लोकपाल के अधीन लाना. सरकार ने न तो संसद में कोई प्रस्ताव पास किया और न ही कानून बनाने के लिए कोई समय सीमा तय की. केवल संसद की भावना व्यक्त करते हुए कांग्रेस और भाजपा के नेताओं ने एक संयुक्त वक्तव्य दिया. अन्ना टीम ने सम्मानपूर्वक पीछे हटने के लिए उसी वक्तव्य को आधार बना कर आंदोलन वापस ले लिया और इसे ‘आधी जीत’ बताते हुए अपनी पीठ थपथपा ली. जन लोकपाल आंदोलन ने एक बार फिर यह दिखा दिया कि वैचारिक उहापोह और सांगठनिक अफरातफरी के बल पर मामूली सुधारवादी और सतही मांगों को पूरा करवाना भी सम्भव नहीं.

आंदोलन के नेतृत्व की संरचना

अन्ना टीम की भ्रष्टाचार मुहिम के साथ ही सिविल सोसाइटी (भद्रलोक समाज) एक बहुचर्चित शब्द हो गया है, जिसका शाब्दिक अर्थ है- भद्र, शिष्ट, सुसभ्य, परिष्कृत, नगरवासी. जाहिर है कि 70 प्रतिशत ग्रामीण आबादी और शहरों की आधी गरीब आबादी इस श्रेणी में नहीं आती. जन लोकपाल आन्दोलन का नेतृत्व और उनके समर्थक इसी ‘सिविल सोसायटी’ के लोग हैं. सिविल सोसाइटी या भद्रलोक की अवधारणा कोई नयी नहीं है. प्राचीन रोमन साम्राज्य में गुलामों को मनुष्य की श्रेणी में नहीं माना जाता था. गुलामों के मालिक अभिजात वर्ग के अलावा स्वतंत्र नागरिकों का समूह इसी श्रेणी में आता था जो अपनी सामाजिक हैसियत और पक्षधरता में कुलीन वर्ग के करीब था. आधुनिक युग में यह सभ्य, सुसंस्कृत और खुशहाल भद्रलोक पूंजीपति वर्ग और पूंजीवादी व्यवस्था का परम हितैषी है. विश्व बैंक की परिभाषा के अनुसार ‘‘सिविल सोसाइटी पद का सम्बन्ध गैर-सरकारी संगठन और बिना मुनाफे वाले संगठनों के व्यापक विन्यास से है जो अपने सदस्यों तथा दूसरों के हितों एवं मूल्यों को नैतिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, वैज्ञानिक, धार्मिक या लोकोपकारी विचारों के आधार पर अभिव्यक्त करने वाले के रूप में सार्वजानिक जीवन में अपनी उपस्थिती दर्ज करा चुके हैं. इस तरह सिविल सोसाइटी संगठन, संगठनों के एक व्यापक विन्यास को दिखाते हैं- सामुदायिक समूह, गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ), श्रमिक संघ, मूल निवासी समूह, दानकर्ता संगठन, धार्मिक संगठन, पेशेवर लोगों के ट्रस्ट.’’ विश्व बैंक सिविल सोसाइटी शब्द का प्रयोग एनजीओ के स्थान पर करता है जिन्हें अपनी योजनाओं में शामिल करने के लिए वह 70 के दशक से ही प्रयासरत रहा है और 1990 के बाद उसने इस प्रयास को तेज किया है. उसका मानना है कि “वैश्वीकरण की प्रक्रिया तथा लोकतान्त्रिक शासन, संचार माध्यम और आर्थिक एकीकरण के विस्तृत होने की सहायता से पिछले दशक में विश्व स्तर पर सिविल सोसाइटी के आकार, कार्य क्षेत्र और क्षमता में नाटकीय विस्तार हुआ है. अंतर्राष्ट्रीय संगठनों की वार्षिकी के अनुसार अंतर्राष्ट्रीय एनजीओ की संख्या 1990 में 6000 से बढ़कर 2006 में 50,000 हो गयी. सिविल सोसाइटी संगठन आज वैश्विक विकास सहायता कार्यक्रमों में महत्त्वपूर्ण खिलाड़ी हो चुके हैं. ओईसीडी का अनुमान है कि 2006 में इन संगठनों ने 15 अरब डॉलर की सहायता उपलब्ध करने में सहयोग किया. विश्व बैंक के मुताबिक इन संगठनों ने दुनिया भर में अपने विभिन्न हिमायती अभियानों (एडवोकेसी कैम्पेन) के दौरान हजारों समर्थकों को गोलबंद किया. ‘वैश्विक सिविल सोसाइटी की अनुगूँज’ की ताजा अभिव्यक्ति विश्व सामाजिक मंच (डब्लूएसएफ) है जिसका वार्षिक आयोजन 2001 से विभिन्न महाद्वीपों में किया जा रहा है और जिसने वैश्विक विकास के मुद्दों पर विचार विमर्श के लिए अपने हजारों कार्यकर्ताओं को एक साथ ला खड़ा किया. दूसरा उदाहरण ‘गरीबी के खिलाफ कार्रवाई का वैश्विक आह्वान’ (जीसीएपी) के तहत गरीब देशों की कर्ज माफ़ी और ज्यादा बड़ी सहायता की हिमायत करने के लिए चलाया गया अभियान है I 2008 में दुनिया भर के शहरों में आयोजित कार्यक्रमों में 1.6 करोड़ नागरिकों ने भाग लिया.’’ भ्रष्टाचार के खिलाफ विश्वव्यापी अभियान भी विश्व बैंक की कार्यसूची में शामिल है. 1990 में बर्लिन की दीवार गिराए जाने और रूसी खेमे के विघटन के साथ विश्व शक्ति संतुलन में भरी बदलाव आया. अमेरिका के नेतृत्व में ‘वाशिंगटन आम सहमति’ के आधार पर पूरी दुनिया में नवउदारवादी, नग्न पूंजीवादी विश्व साम्राज्यवादी अर्थव्यवस्था को सुदृढ बनाने का अभियान शुरू हुआ. पूरी दुनिया में पूंजीवादी शोषण के सम्बन्ध कायम किये गए. पूंजी की निर्मम लूट और मुनाफाखोरी के रास्ते से सारे अवरोध हटा दिए गए. पूंजीवाद के इस नए बर्बर दौर को एक मात्र विकल्प बताने और न्यायसंगत ठहराने के लिए विचारों की आंधी चलाई गयी, मीडिया द्वारा लोगों के मन-मस्तिष्क को पूंजीवाद के अनुरूप ढालने का चौतरफा और अधाधुंध प्रयास शुरू हुआ. इस अंधी लूट-खसोट का विनाशकारी प्रभाव होना तय था. इन चौतरफा दुष्परिणामों पर पर्दा डालने के लिए साम्राज्यवादी समूह ने तरह-तरह के उपाय किये. साथ ही, ‘सिविल सोसाइटी’ और एनजीओ को भरपूर भौतिक मदद देकर खड़ा किया. नवउदारवादी पूंजीवाद अपने अन्तर्निहित कारणों से जो नयी-नयी सामाजिक बीमारियां उत्पन्न करता है. उनके खिलाफ आन्दोलन चलाकर उनमें कुछ हद तक सुधार लाने का काम इन संगठनों को सौंपा गया. गरीबी, पर्यावरण विनाश, कर्ज संकट, तानाशाही और भुखमरी से लेकर वैश्वीकरण के घातक परिणामों तक, तरह-तरह के मुद्दों पर एनजीओ ने दुनिया भर में हिमायत अभियान (एड्वोकेसी कम्पेन) चलाये, जिनका उपरोक्त उद्धरण में विश्व बैंक ने जिक्र किया है. इस पूरी परिघटना का सार है-- राजनीतिक आन्दोलन की जगह सामाजिक आन्दोलन, वर्गों और तबकों के संगठनों की जगह एनजीओ के सामाजिक अभियान और सुधारवादी-कानूनवादी-वर्गेतर संगठन, आम तौर पर हर तरह की राजनीति का विरोध, पूंजीवाद का विकल्प प्रस्तुत करने की जगह उससे पल-प्रतिपल पैदा होने वाली समस्याओं को लेकर मुद्देवार, स्थानीय और तात्कालिक आन्दोलन. जुझारू संघर्ष की जगह जनहित याचिका, मोमबत्ती जुलूस, मानव श्रृंखला, भूख हड़ताल और गांधीगिरी जैसे नये ढंग के आन्दोलन, लोगों की व्यापक गोलबंदी और दीर्घकालिक निर्णायक लड़ाई की जगह भद्रजनों, मीडिया, एनजीओ कर्मियों द्वारा प्रतीकात्मक आन्दोलन, यानी रोग को मिटाने की जगह लक्षण को दबाना. साम्राज्यवादी समूह ने रूस और पूर्वी यूरोप में राजकीय पूंजीवाद की जगह नग्न पूंजीवादी व्यवस्था की स्थापना के लिए गुलाबी, बैंगनी, नारंगी और चमेली क्रांतियों में सहयोग करने के लिए ‘नागरिक समाज’ और एनजीओ को एक रणनीति के रूप में सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया था. इसके लिए अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और फंडिंग एजेंसियों के जरिये उन्हें भरपूर धन मुहैया कराया गया था. अब तो यह नवउदारवाद का आजमाया हुआ राजनीतिक उपकरण बन गया है. 1990 के बाद दुनिया भर में एनजीओ परिघटना और उनकी संख्या में तेजी से विकास हुआ है. साम्राज्यवादी देशों में तो इसे अर्थव्यवस्था के तीसरे क्षेत्र के रूप में स्थापित किया गया है. सरकार द्वारा सामाजिक सेवाओं का निजीकरण करके उनसे हाँथ खीचने के बाद, जब निजी पूंजीपतियों ने शिक्षा-चिकित्सा जैसी सरकारी सेवाओं को मुनाफे का धंधा बनाकर गरीब जनता को उनसे वंचित किया तो अभावग्रस्त लोगों के लिए एनजीओ को मानवतावादी चेहरे के साथ मैदान में उतारा गया. इस परिघटना को आगे बढ़ाने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ ने नागरिक समाज के लिए एक पैनल का गठन किया. विश्व बैंक ने भी इस दिशा में कई परियोजनाएं शुरू की और हर देश में एनजीओ और नागरिक समाज का भरपूर सहयोग लिया. भारत में 1991 में नवउदारवादी नीतियां लागू होने के बाद एनजीओ का तेजी से विस्तार हुआ है. मजदूर आन्दोलन की कमजोरी और बिखराव ने एनजीओ के लिए अनुकूल अवसर प्रदान किया. वामपंथ के खिलाफ पूंजीवादी मीडिया के विश्वव्यापी अधाधुंध प्रचार से उन्हें वैचारिक आधार मिला जिसने हर तरह के प्रतिगामी मूल्यों का महिमामंडन किया और मुक्त बाजारवाद को एक मात्र विकल्प के रूप में स्थापित किया. आज भारत में 15 लाख नागरिक समाज संगठन या एनजीओ हैं जिनमें 1.9 करोड़ स्वयंसेवकों को रोजगार मिला हुआ है. ये संगठन पूंजीवादी व्यवस्था के पैरोकार और सहयोगी हैं और उसी के दायरे में काम करते हैं. इनका काम पूंजीवाद को दीर्घायु बनाने के लिए उसकी बुराइयों से लड़ना है. भ्रष्टाचार भी पूंजीवाद की ऐसी ही एक अन्तर्निहित बुराई है जिसके खिलाफ टीम अन्ना ने मुहिम छेड़ी है. पूंजीवादी लोकतंत्र के मौजूदा दौर में जब संसद और विधान सभाओं में नीतिगत मुद्दों पर पक्ष-विपक्ष जैसा कोई बंटवारा रह नहीं गया है और नवउदारवादी नीतियों के चलते जनता का आक्रोश सभी हदें पर करता जा रहा है, तब नागरिक समाज संगठनों को सुरक्षा कवच के रूप में सामने लाया जा रहा है. जन भागीदारी, समावेशी विकास, जनता की जागरूकता, सरकार की जवाबदेही, विकास में सहभागिता, प्रशासनिक सुधार जैसे मनभावन नारों का निहितार्थ यही है. पूंजीवादी लोकतंत्र को कारगार बनाने और जनाक्रोश को नियंत्रित रखने के लिए नागरिक समाज के आन्दोलन और प्रतिपक्ष की छद्म रचना जरुरी है. नागरिक समाज के कुछ अभिजात लोग किसी मुद्दे पर इकठ्ठा होते हैं और किसी लोकतांतिक प्रक्रिया के बिना ही वे राजनीतिक शक्ति सम्पन्न, स्वयंभू जन प्रतिनिधि और ‘जनता की आवाज’ बन जाते हैं. साम्राज्यवादी संस्थाएं उन्हें पुरुस्कृत करके जल पुरुष, थल पुरुष या नभ पुरुष बनाती हैं, अंतर्राष्ट्रीय फंडिंग एजेंसियां उनका खर्चा उठाती हैं, मीडिया उनके लिए सहमति गढ़ता है, उन्हें स्थापित करता है और सरकार उन्हें स्वीकार कर लेती है. यह जन आंदोलनों के भावी तूफानों से बचने की तमाम तैयारियों में से एक है. विश्व बैंक के एक अधिकारी ने पिछले दिनों अपने एक साक्षात्कार में नागरिक संगठनों के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा था कि “मंदी का सामना कर रही वर्त्तमान विश्व अर्थव्यवस्था और अरब देशों में उथल-पुथल को देखते हुए विभिन्न देशों में ऐसे सगठनों को अपनी ओर आकर्षित करना जरुरी है. विश्व बैंक ने इसके लिए एक मुक्कमिल योजना तैयार की है जिसमें विभिन्न स्तरों पर संपर्क, सम्मलेन, शिक्षण-प्रशिक्षण और वित्तपोषण सब शामिल है.” भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान भी विश्व बैंक की एक परियोजना है जिसमें हेरिटेज फाउन्डेशन, फोर्ड फाउन्डेशन, ट्रांसपिरेन्सी इंटरनेशनल सहित कई अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं और फंडिंग एजेंसियां सहयोगी भूमिका निभा रही हैं. कैसी विडंबना है कि तीसरी दुनिया के शासकों के साथ मिली-भगत करके उन्हें भ्रष्ट बनाने के लिए जिम्मेदार अंतर्राष्ट्रीय साम्राज्यवादी संस्थाएं ही भद्रलोक को साथ लेकर भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम छेड़ रही हैं. कुछ साल पहले विश्व बैंक से इस्तीफा देने वाले उसके एक उच्च अधिकारी डेविसन एल. बुधु ने एक किताब लिखी थी- एनफ इज एनफ जिसमें उसने विश्व बैंक द्वारा दुनिया भर में भ्रष्टाचार फ़ैलाने वाले अभियानों का कच्चा चिट्ठा खोला था. उसका कहना था कि हमारे हाथ से इतने अपराध हुए हैं कि उनके खून के धब्बे सात समुन्दर के पानी से भी नहीं धुल पाएंगे. अन्ना टीम में शामिल सभी भद्रलोक किसी न किसी एनजीओ का संचालन करते हैं. वे इस नवउदारवादी पूँजीवादी व्यवस्था के समर्थक हैं तथा उसे कारगर और बेहतर बनाने के लिए उसकी बुराइयों को दूर करना चाहते हैं. जनता से पूरी तरह कटा हुआ यह भद्रलोक यदि चाहे भी तो किसी सही जनान्दोलन का नेतृत्व करने, राज्य का दमन झेलने और कष्ट सहने में असमर्थ है. कानून-व्यवस्था के दायरे में रहकर यह प्रतीकात्मक, प्रायोजित आन्दोलन या जनहित याचिका दायर कर सकता है. इससे आगे जाना इस समूह के लिए सम्भव नहीं है.

भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन के अनुयायी कौन और क्यों?

अन्ना टीम की भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम में शहरी मध्यम वर्ग ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया. इस आन्दोलन का समर्थक और जनाधार यही वर्ग था. समाज का मुखर तबका होने के कारण यह किसी मुद्दे पर राय बनाने में आम तौर पर सबसे प्रभावी भूमिका निभाता है. मीडियाकर्मी जब भी किसी विचार पर मत संग्रह करते हैं या पैनल डिसकशन आयोजित करते हैं तो वे ‘सिविल सोसाइटी’ यानी मध्यम वर्ग की ही राय लेते हैं, जैसे- एनजीओ चलाने वाले, पत्रकार, खिलाड़ी, अभिनेता, विभिन्न पेशों से जुड़े लोग, प्रतिष्ठित संस्थानों के छात्र, बुद्धिजीवी, मानवाधिकार कार्यकर्ता और अन्य लोग. मध्यम वर्ग के अधिकांश लोग सक्रिय राजनीति से दूर रहना ही पसंद करते हैं. ‘नो पोलिटिक्स प्लीज’, ‘विचार और जूते दरवाजे पर उतार कर आयें’ और ‘पोलिटिक्स इज लास्ट रिफ्यूज ऑफ स्काउनड्रेल्स’ उनके प्रिय नारे हैं. इसीलिए अन्ना के मीडिया प्रेरित आन्दोलन में मध्यम वर्ग की भारी पैमाने पर हिस्सेदारी ने बहुतेरे लोगों को चकित, भ्रमित और भाव विह्वल किया. इसे अभूतपूर्व और ऐतिहासिक महत्व की घटना बताया गया जो काफी हद तक सही भी है. इस मुहिम में मध्यम वर्ग की अति सक्रियता को पिछले बीस वर्षों के दौरान उसके आकार, सामाजिक, आर्थिक स्थिति और चारित्रिक बदलाव से अलग करके नहीं समझा जा सकता है. 1991 में नवउदारवादी आर्थिक नीति लागू होने के बाद से ही आर्थिक विमर्श में मध्यम वर्ग को काफी महत्व दिया जाने लगा था. विदेशी निवेशकों को रिझाने के लिए सरकार और मीडिया ने मध्यम वर्ग की संख्या को बढ़ा-चढ़ा कर बताना शुरू किया था. सही संख्या का पता लगाने के लिए कई देशी-विदेशी संस्थाओं ने सर्वेक्षण किये और एक ही साथ 5 करोड़ से लेकर 30 करोड़ तक के आँकडे सामने आये. इन प्रयासों के पीछे क्रय-शक्ति और उपभोग-क्षमता का पता लगाना था ताकि बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ अपने माल और सेवाओं के उपभोक्ताओं का सही-सही अंदाजा लगा सकें. यह काफी कठिन काम था क्योंकि उस दौरान सीमित आमदनी के चलते मध्यम वर्ग के जीवन स्तर और उपभोग पैटर्न में काफी भिन्नता थी.I 25 साल पहले वास्तविक जीवन में और फिल्मों में भी ठेठ मध्यम वर्गीय चरित्र (अमोल पालेकर या संजीव कुमार) का जीवनस्तर आज की तुलना में भला क्या था? कितने मध्यम वर्गीय परिवार वाशिंग मशीन, माइक्रोवेव ओवन, कार और होली डे पैकेज का उपभोग करते थे? लेकिन आज स्थिति भिन्न है. मध्यम वर्ग की संख्या में वृद्धि और उनकी खुशहाली के लिए शासक वर्ग अपनी पीठ थपथपाते हैं और इसे अपनी नीतियों की सफलता का प्रमाण बताते हैं तो यह ठीक ही है. विजय सुपर स्कूटर से लेकर नए मॉडल की गाड़ियों तक, पलस्तर झड़ते किराये के मकान से आलीशान अपार्टमेंट के मालिकाने तक तथा सरकारी स्कूलों-अस्पतालों से संपन्न पांच सितारा स्कूलों-अस्पतालों तक की यात्रा जितनी तेजी से पूरी हुई, उसके बारे में 1990 से पहले किसी ने कल्पना भी नहीं की थी. बाजार अर्थव्यवस्था को गतिशील बनाने के लिए थोड़ी संख्या वाले पहले से मौजूद मध्यम वर्ग की तादाद और आमदनी बढ़ाना जरूरी था. साथ ही अगर शासकों ने अपनी नीतियों के समर्थक और सहयोगी तथा अपने जनाधार का विस्तार नहीं किया होता तो समाज का मुखर तबका होने के नाते मध्यम वर्ग इन नीतियों के खिलाफ निरंतर जारी जनांदोलनों को तेज करने में भूमिका निभाता रहता. मध्यम वर्ग के विभिन्न हिस्सों ने ‘90 के दशक के पूर्वार्ध में नयी आर्थिक नीतियों का प्रबल विरोध किया था, जिनमें सार्वजनिक क्षेत्र और सरकारी विभागों के कर्मचारी, व्यापारी, शिक्षक, छात्र तथा पत्रकारों, बुद्धिजीवियों और पेशेवरों का एक हिस्सा शामिल था. आज मध्यम वर्ग में विरोध का वह स्वर कहीं दूर-दूर तक सुनाई नहीं पड़ता है. उसकी जगह अब वहाँ से ‘शाइनिंग इंडिया’, ’अतुल्य भारत’, ‘मेरा भारत महान’, ‘आई लव माई इंडिया’, ‘जय हो’ की अनुगूँज आ रही है. पिछले बीस वर्षों के दौरान देश कि कुल आय का बंटवारा इस तरह पुनर्गठित किया गया कि शारीरिक श्रम और मानसिक श्रम के बीच, वास्तविक उत्पादन और उस पर निर्भर सेवा क्षेत्र के बीच की तथा गाँव और शहर के बीच खाई लगातार चौड़ी होती गयी. पांचवें और छठे वेतन आयोग ने केंद्र, राज्य और सार्वजनिक क्षेत्र में कार्यरत लोगों के वेतन भत्तों में भारी वृद्धि की तथा न्यूनतम तथा अधिकतम वेतनमान में भारी अंतर पैदा किया. निजी क्षेत्र के प्रबंधकों और मानसिक श्रम करने वालों के वेतन में तो काफी तेजी से वृद्धि हुई, लेकिन वहाँ प्रत्यक्ष उत्पादन और शारीरिक श्रम करने वालों की न्यूनतम मजदूरी भी तय नहीं है. इन सभी उपायों से ऊँची आय और क्रय-शक्ति वाला माध्यम वर्ग का एक छोटा तबका पैदा हुआ जबकि बड़ी संख्या में लोगों को बाजार से बहिष्कृत कर दिया गया. यह यात्रा उतनी ही विकृतिपूर्ण और असंगत रही है जितनी वास्तविक उत्पादन वाले कृषि और उद्योग की कीमत पर सेवा क्षेत्र का असमान्य और गैर अनुपातिक विस्तार. निश्चय ही यह सहज स्वाभाविक प्रक्रिया में नहीं बल्कि सरकार के सचेत प्रयास और उदारीकरण-निजीकरण की उन्हीं नीतियों के चलते घटित हुआ है जिनके कारण देश की बहुसंख्य मेहनतकश जनता आज तबाही की चपेट में आकर कराह रही है. उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों के चलते सेवा क्षेत्र- आईटी, कम्युनिकेशन, इलेक्ट्रोनिक मीडिया, रियल इस्टेट, फाइनांस, शेयर बाजार, बीपीओ, केपीओ तथा निजी अस्पतालों और शिक्षण संस्थानों में रोजगार के नए अवसर पैदा हुए जिससे आबादी के एक छोटे से हिस्से की आय में काफी वृद्धि हुई. देश की अर्थव्यवस्था में बहुराष्ट्रीय कंपनियों की घुसपैठ से भी शहरों में खास तरह के रोजगार और मध्यम वर्ग कि एक नयी जमात तैयार हुई. इस तरह निजीकरण, बाजारवादी अर्थव्यवस्था और नवउदारवादी नीतियों के परिणामस्वरूप मध्यम वर्ग की आमदनी और तादाद में इजाफा हुआ. इसका ऊपरी हिस्सा आम तौर पर इन नीतियों का प्रबल समर्थक है और आर्थिक नवउपनिवेशवादी मौजूदा ढांचे का सामाजिक अवलंब है. भारत में नवउदारवादी नीतियों के प्रस्तोता और प्रवर्तक पूंजीपति वर्ग और उसके राजनीतिक नुमाइंदे थे लेकिन उच्च मध्यम वर्ग भी शुरू से ही इसका प्रबल समर्थक था. इस वर्ग का सपना था कि वैश्वीकरण-उदारीकरण भारत को विकसित देशों कि क़तार में ला खड़ा करेगा, भारत को महाशक्ति बना देगा, यहाँ की हर चीज विश्वस्तरीय हो जायेगी और भारत स्वर्ग बन जायेगा. भारत को महाशक्ति बनाने में यह वर्ग कैसे अपना योगदान कर सकता है, इसकी झलक स्वदेश और रंग दे बसंती जैसी फिल्मों में दिखाई गयी है. लेकिन उच्च मध्यम वर्ग जब वर्तमान यथार्थ पर निगाह डालता है तो उसे नवउदारवादी सपना साकार होते नहीं दीखता. उन नीतियों का अन्धभक्त होने के कारण वह उनमें कोई कमी नहीं देखता. उसे लगता है कि सारी बुराई भ्रष्ट नेताओं और नौकरशाहों, यानी सरकार में है जो अपना काम ठीक से नहीं करती. ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’, आरक्षण, गरीबों के लिए सस्ता अनाज, रोजगार गारंटी जैसी नीतियों को वह नेताओं की वोट बैंक की राजनीति और नवउदारवादी/बाजारवादी नीतियों के रास्ते का रोड़ा मानकर आलोचना करता है. भ्रष्टाचार को भी वह ऐसी ही बाधा मानता है जो कुछ भ्रष्ट और स्वार्थी नेताओं द्वारा खड़ी की गयी है. उसका मानना है कि भ्रष्टाचार ही सारी समस्याओं की जड़ है जिसे दूर करना कोई मुश्किल काम नहीं है. इसका एक ही सरल उपाय है कि कठोर कानून बनाओ. उधर सरकार की मज़बूरी यह है कि उसे वोट लेने के लिए कुछ लोक-लुभावन कार्यक्रम बनाने पड़ते हैं व्यवस्था को चलाने और चुनाव जीतने के लिए भ्रष्टाचार को बनाए रखना होता है जबकि भद्रलोक के सामने ऐसी कोई मज़बूरी नहीं. अन्ना टीम के आन्दोलन का आधार यही उच्च मध्यम वर्ग है. ऊपर से देखने पर ऐसा लग सकता है कि सरकार के खिलाफ आवाज उठाकर यह उसी थाली में छेद कर रहा है जिसमें खाता है. लेकिन वास्तव में यह मुहिम शासक वर्गों के विरुद्ध नहीं बल्कि भ्रष्टाचार मिटा कर नवउदारवादी बाजार अर्थव्यवस्था को दीर्घायु बनाने के लिए है. अन्ना आन्दोलन ने यह साबित कर दिया है कि सरकार और भद्रलोक के बीच का टकराव मित्रवत है. यह आन्दोलन सरकार की नीतियों के खिलाफ नहीं, मूल ढांचे के खिलाफ नहीं. भद्रलोक इस भ्रष्टतंत्र को समाप्त करने की बातें नहीं करता, बल्कि भ्रष्टाचार मुक्त करके उसे और बेहतर बनाने में मदद करना चाहता है. वह इस सड़ते, बदबू फैलाते लोकतंत्र की सफाई करना चाहता है ताकि देशी-विदेशी पूंजीपति कारगर तरीके अपना कर लूटतंत्र जारी रखें और भद्रलोक के स्वर्ग का वैभव बढ़ाते रहें.

अन्ना आंदोलन और मुख्यधारा की मीडिया

अन्ना टीम के जनलोकपाल आन्दोलन में मीडिया की भूमिका को लेकर भी काफी सवाल उठे. इसमें संदेह नहीं कि दिन-रात सीधा प्रसारण के लिए अपने क्रेन और क्रू के साथ अगर टीवी चैनल सक्रिय नहीं होते, तो इस आन्दोलन में स्वतःस्फूर्त तरीके से इतने लोग शामिल नहीं होते. जन आंदोलनों के प्रति मीडिया के परंपरागत रवैये को देखते हुए यह सक्रियता भले ही अचम्भे में डालने वाली लगती हो लेकिन आन्दोलन के चरित्र और मीडिया की प्राथमिकता पर गौर करें तो उसकी भूमिका अस्वाभाविक नहीं लगेगी. अपने एक अध्ययन में पत्रकार विपुल मुदगल (सीएसडीएस) ने सर्वाधिक प्रसार वाले अंग्रेजी और हिंदी के तीन-तीन अख़बारों के 48 अंकों का विश्लेषण किया. इन अख़बारों ने अपने सम्पादकीय पन्ने का केवल 2 प्रतिशत ग्रामीण इलाकों में रहने वाली दो तिहाई जनता की समस्यों पर खर्च किया. इन अख़बारों में छपने वाली 100 से 200 सामग्री में से औसतन तीन सामग्री ग्रामीण मुद्दों पर थी. इनमें भी अधिकांश सामग्री अपराध, हिंसा और दुर्घटनाओं से सम्बंधित थी. समाचारों के चुनाव के मामलों में हिंदी और अंग्रेजी अख़बारों के चरित्र में कोई खास फर्क नहीं पाया था, जबकि हिंदी अख़बारों के अधिकांश पाठक ग्रामीण क्षेत्र के लोग होते हैं. इन अख़बारों का झुकाव उपभोक्ता केंद्रित होता है और उनकी निगाह ऊपर उठते पढ़े-लिखे शहरी उपभोक्ताओं पर होती है जिनकी दुनिया में गरीबी और पिछड़ेपन के लिए कोई जगह नहीं होती. इस मामले में टीवी चैनलों का रिकॉर्ड तो और भी खराब है. वहाँ तो सब कुछ नवधनाड्य उपभोक्ता वर्ग के लोगों के मनोरंजन के लिए है. मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है. नवउदारवादी दौर में लोकतंत्र के अन्य स्तंभों की तरह मीडिया भी बुरी तरह भ्रष्टाचार में लिप्त है. नीरा राडिया प्रकरण ने पूंजीपति, नेता और मीडिया के अपवित्र गठबंधन को उजागर किया. इसके पहले नोट के बदले समाचार लिखने का मामला देश भर में चर्चा का विषय बना था. पहले भी सरकार और पूंजीपतियों से प्राप्त होने वाले विज्ञापन और सुविधाओं से मीडिया का चरित्र प्रभावित होता था. लेकिन मौजूदा दौर में देशी-विदेशी पूंजीपतियों द्वारा भारी पूंजी निवेश ने मीडिया को विराट पूंजी प्रतिष्ठानों में बदल दिया. इसकी प्राथमिकता पूंजीवाद की हिफाजत करना और साथ ही अपनी पूंजी का विस्तार करना रह गया है. ‘स्वतंत्र’ और ‘निष्पक्ष’ होने का मुखौटा भी अब नहीं रहा. उसने अपने आप को जनता से पूरी तरह काट लिया है. ख्यातिलब्ध पत्रकार पी. साईनाथ ने इग्नू में एक व्याख्यान देते हुए मीडिया के इस बदले चरित्र को सारगर्भित रूप में प्रस्तुत किया – ‘‘“आज अख़बारों में कोई श्रमिक संवाददाता नहीं है, आवास और प्राथमिक शिक्षा का कोई संवाददाता नहीं है. इस देश की 70 प्रतिशत आबादी से हम साफ़ कह रहे हैं कि हमें उनसे कोई लेना-देना नहीं है.’’ उनका कहना था कि ““ निजी सुलहनामों के खंडहर पर जरखरीद खबरें उठ खड़ी हुई हैं. निजी सुलहनामों ने मीडिया कंपनियों को अपनी कंपनियों में शेयर दिए थे जो 2008-09 के शेयर बाजार के डूबने के साथ ही रद्दी में बदल गए. जरखरीद ख़बरों ने इन भ्रष्ट कंपनियों और राजनेताओं को विधानसभा और आम चुनावों के दौरान इस लायक बनाया कि वे मीडिया के साथ बेनामी लेन-देन कर सकें.’’ मीडिया के चरित्र पर इस संक्षिप्त चर्चा की पृष्ठभूमि में यह समझना कठिन नहीं कि अन्ना के जन लोकपाल आन्दोलन के दौरान मीडिया ने इतनी सक्रियता क्यों दिखाई और क्यों सातों दिन चौबीस घंटे हर छोटी-छोटी बातों का भी ग्राफिक चित्रण करती रही. यह अकारण नहीं कि प्रधानमंत्री को जन लोकपाल बिल के दायरे में लाने के लिए बजिद टीम अन्ना मीडिया को उससे अछूता रखने का हामी है. मीडिया के मालिकों, पत्रकारों, विज्ञापन दाताओं और लक्षित दर्शकों-पाठकों तथा अन्ना आंदोलन के नेताओं-समर्थकों के बीच अद्भुत वैचारिक और वर्गीय एकरूपता है. दलित, पिछड़े, आदिवासी और मुस्लिम संगठनों का यह आरोप बिलकुल सही है कि भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन के नेतृत्व पर सवर्ण हिंदू मानसिकता के लोग हावी हैं. मीडिया पर भी इसी तबके का वर्चस्व है जो काफी हद तक मीडिया की प्राथमिकता और पक्षधरता तय करता है. अन्ना आन्दोलन के समानांतर उसी समय दिल्ली में दलित, पिछडों, अल्पसंख्यकों की एक रैली हुई थी जिसे मीडिया ने तरजीह नहीं दी. इससे पहले आरक्षण विरोधी आन्दोलन के समर्थन में भी मीडिया ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था. दिल्ली में मजदूरों-किसानों और अन्य मेहनतकश तबकों की रैलियों और प्रदर्शनों के प्रति मीडिया का रुख या तो अनदेखी करने का या उसे बदनाम करने का ही रहा है. इसी वर्ष फरवरी में देश की 9 प्रमुख ट्रेड यूनियनों की रैली के प्रति मीडिया ने ऐसा ही रवैया अपनाया. उसने आन्दोलन को अपेक्षित स्थान नहीं दिया और कहीं चर्चा भी की तो इस रूप में कि इसके चलते दिल्ली में यातायात को कितना व्यवधान पहुंचा और दिल्लीवासियों को कितनी परेशानी झेलनी पड़ी. मीडिया का मुख्य उद्देश्य अब भव्य आयोजनों की दिलचस्प और ब्योरेवार रिपोर्टिंग करके लोगों को रिझाना और अपनी टीआरपी बढ़ाना ही रह गया है. अन्ना आन्दोलन की रिपोर्टिंग के साथ भी ऐसा ही हुआ. मीडिया ने रोचक और चटपटे ब्योरे, उत्सुकता और सनसनी जगाने वाले तथ्यों तथा उत्सव, उमंग और छिछली भावुकता वाले दृश्यों को खूब बढ़-चढ़ कर प्रस्तुत किया. लेकिन भ्रष्टाचार के मुद्दे को गंभीरता से सामने लाने, उसके कारणों का विश्लेषण करने, लोकपाल बिल के अलग-अलग मसौदों की तुलनात्मक रूप से व्याख्या करने, लोकपाल के लाभ-हानि पर विभिन्न पक्षों की राय बताने, कुल मिलाकर दर्शकों-पाठकों को शिक्षित करने की जहमत मोल नहीं ली. इसके बजाय किसने अपने नवजात बच्चे का नाम अन्ना रखा, कौन नंगे पैर चलकर अन्ना के चरण छूने पहुंचा, किसने कितने आकर्षक गोदने-टैटू रचाए, लोगों में कितना उमंग था, जैसी बातों पर ही ध्यान केंद्रित किया, बीच-बीच में उच्च मध्यवर्गीय वस्तुओं और सेवाओं का विज्ञापन भी चलता रहा. आन्दोलन को तेज करने और उसका टेम्पो ऊँचा रखने और अन्ना को शोहरत दिलाने में मीडिया की भूमिका असंधिग्ध है. अप्रैल में आन्दोलन की घोषणा करने से पहले अन्ना के नाम के साथ गूगल सर्च में अन्ना कोर्निकोवा का सन्दर्भ आता था और अन्ना हजारे के नाम पर केवल चार या पांच परिणाम दिखते थे, जबकि प्रधानमंत्री द्वारा ड्राफ्टिंग कमिटी में उन्हें शामिल किये जाने के बाद उनके हजारों संदर्भ आने लगे. 28 अगस्त को एनडीटीवी ने घोषणा की कि यह संख्या 2 करोड़ 90 लाख से भी ज्यादा हो गयी है और भारत के वेब जगत में उनकी लोकप्रियता लेडी गागा से तो कम, लेकिन प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति से अधिक है. अन्ना हजारे और उनकी लोकपाल मुहिम की छवि बनाने के अलावा मीडिया ने 13 दिनों के इस आन्दोलन के दौरान यह प्रयोग भी सफलतापूर्वक आजमाया कि शासक वर्गों द्वारा किस हद तक मीडिया का इस्तेमाल किया जा सकता है. नोम चोम्श्की ने तो मीडिया द्वारा सहमति गढ़े जाने का ही विश्लेषण किया था. आज मीडिया उससे आगे बढ़कर ‘असहमति गढ़ने’ में भी सफल रहा है. यानि वह मन चाहे मुद्दे गढ़ सकता है और उन्हें लोगों के मष्तिस्क में रोप कर उन्हें उद्वेलित कर सकता है तथा उस उद्वेलित समूह को मनचाहे तरीके से नियंत्रित और संचालित कर सकता है. इस घटना चक्र के दौरान इसे आजमाया जा चुका है. निश्चय ही यह अन्य सभी बातों से कहीं अधिक गम्भीर और विचारणीय मामला है.

सिविल सोसायटी और एनजीओ के आर्थिक स्रोत

अन्ना के जन लोकपाल का नेतृत्व करने वाले सिविल सोसायटी के लोग किसी न किसी एनजीओ से जुड़े हुए हैं. आम तौर पर गैर-सरकारी संगठनों का काम ग़रीबों की सहायता, जिन जिम्मेदारियों से सरकार ने हाथ खींच लिया है उन कल्याणकारी कार्यक्रमों का संचालन और सरकारी योजनाओं को लागू करवाने में मदद करना होता है. लेकिन आज राजनीतिक गतिविधियों में भी वे बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने लगे हैं. विश्व सामाजिक मंच के माध्यम से वैश्वीकरण और विश्व व्यापार संगठन का विरोध इसका एक प्रमुख उदाहरण है. अन्ना का आंदोलन भी इसी श्रेणी में आता है.राजनीतिक और आंदोलनात्मक कार्रवाइयों में लगे किसी भी संगठन के लिए आर्थिक स्रोत का सवाल एक नीतिगत सवाल है. हमारे समाज में अलग-अलग वर्गों की पार्टियाँ और संगठन हैं. जो संगठन जिनके लिए काम करते हैं, उनसे आर्थिक सहयोग लेते हैं. किसी संगठन के मददगार उसे आर्थिक सहयोग तभी देती हैं जब उसके उद्देश्य और कार्यक्रम उसके हित में हों. यदि ऐसा न हो तो वे उल्टे उसका हर तरह से विरोध करेंगे. संगठन भी अपने आर्थिक सहयोगियों के प्रति जवाबदेह होते हैं. कहावत है जिसका खायेंगे, उसका गायेंगे. चुनाव लड़ने वाली पार्टियाँ पूंजीपतियों से चन्दा लेती हैं और उनके लिए काम करती हैं. यह एक खुली सच्चाई है. इसी तरह ट्रेड यूनियन अपने सदस्यों और समर्थकों से चंदा लेते हैं. सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक संगठन भी अपने उदेश्यों से सहमति रखने वाले समर्थकों के आर्थिक सहयोग से संचालित होते हैं. संगठनों के सहयोगी उसकी गतिविधियों पर नजर रखते हैं और यदि संतुष्ट न हों तो वे संगठन को सहयोग देना बंद कर देते हैं. यही बात एनजीओ पर भी लागू होती है. पैसा देने वाली संस्थाओं के स्वार्थ और गैर-सरकारी संगठनों के उद्देश्य और कार्यक्रम में मेल होना जरूरी है. विश्व बैंक, फोर्ड फाउंडेशन (जिसके अमरीकी गुप्तचर संस्था सीआईए से सम्बन्ध जगजाहिर हैं) या औक्सफेम जैसी संस्थाएं जिन संगठनों को पैसा देती हैं उन्हें अपनी ओर से कार्यक्रम भी देती हैं, जैसे- विश्व बैंक द्वारा दुनिया भर में भ्रष्टाचार विरोधी अभियान की योजना. यही नहीं, वे उन संगठनों की पारदर्शिता और जवाबदेही का भी लेखा-जोखा लेती हैं. वर्ग विभाजित समाज में वर्गेतर बातें करना, सबके हित कि बात करना केवल लोगों को बेवकूफ बनाने का जरिया है. हर वर्ग अपने हितों को सर्वोपरि रखता है. यहाँ तक कि तटस्थता और सर्वजन हिताय की आड़ में राज्य भी कुछ वर्गों की कीमत पर किन्हीं दूसरे वर्गों के स्वार्थों की पूर्ति करता है और इस पर पर्दा डालने के लिए उसके कर्ताधर्ता झूठ का अम्बार खड़ा करते रहते हैं. अन्ना हजारे, अरविन्द केजरीवाल और अरुणा रॉय आदि ने सूचना के अधिकार की लड़ाई लड़ी. सिविल सोसायटी के शीर्षस्थ लोगों ने ‘अहिंसक’ प्रयासों से कानून बनवाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली. लेकिन वर्ग समाज में शक्तिशाली, सम्पत्तिवान लोग अपना नुकसान होने पर हिंसा का सहारा लेना बंद नहीं करेंगे. अब तक सूचना अधिकार से जुड़े दो दर्जन एनजीओ कार्यकर्ताओं कि हत्या हो चुकी है. 16 अगस्त को अन्ना मुहिम के पहले ही दिन भोपाल में सूचना अधिकार और भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से जुड़ी एक महिला कार्यकर्त्ता सेहला मसूद की दिन दहाड़े हत्या हुई. अन्ना टीम के अहिंसक आंदोलन के शोर-सराबे में जघन्य हिंसा की यह घटना गुम हो गयी. सच तो यह है कि इस कानून से सबसे अधिक लाभ देशी-विदेशी पूँजीपतियों को हुआ है जो घर बैठे इन्टरनेट के जरिये सही समय पर वे सभी सरकारी सूचनायें प्राप्त कर लेते हैं, जिनके लिए पहले उन्हें महीनों चक्कर काटना पड़ता था. लेकिन ऐसी धारणा फैलायी जाती है, जैसे कि सूचना अधिकार कानून आम जनता की भलाई के लिए है, ताकि वर्ग-भेद पर पर्दा पड़ा रहे. क्या लोकपाल कानून इस वर्ग-भेद से ऊपर काम कर पायेगा? आर्थिक-सामाजिक विषमता के रहते क्या यह सम्भव है?एनजीओ परिघटना का उद्भव सहज स्वाभाविक रूप से या खुद ब खुद नहीं हुआ है. इसके तार साम्राज्यवाद से जुड़े हैं. साम्राज्यवादी संस्थाएं सचेत रूप से इन्हें बढ़ावा दे रही हैं. विश्व बैंक की विकास रिपोर्ट 2000-2001 में बताया गया है कि 1999 में विश्व बैंक द्वारा स्वीकृत योजनाओं में से 70 प्रतिशत एनजीओ और सिविल सोसायटी के प्रतिनिधियों की भागीदारी से पूरी हुई. इनमें से केवल एक प्रोजेक्ट 4500 करोड़ रुपये का था जो नौ देशों में एनजीओ और सिविल सोसायटी के मार्फ़त लागू करवाया गया. यह कोई खैरात नहीं है, क्योंकि इस नवउदारवादी दौर में साम्राज्यवादी संस्थाएं और विदेशी फंडिंग एजेन्सियां जितना धन खर्च कर रही, बहुराष्ट्रीय हैं कम्पनियां उससे कई गुना अधिक लूट रही हैं. निजीकरण के चलते सरकार ने जिन सामाजिक सेवाओं की जिम्मेदारी त्याग दी, उन्हें पूरा करने के लिए एनजीओ अब निजी ठेकेदारों की भूमिका में उतर आये हैं. इसके चलते सरकार अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाती है और जनता का सारा ध्यान एनजीओ पर टिक जाता है, वह भी अपने अधिकार के रूप में नहीं, बल्कि दानी की कृपा-दृष्टि पाने के लिए. जो जनता का अधिकार है वह उसे दान में आधा-अधूरा दिया जाता है. एनजीओ के जरिये 2000-2001 में 970 करोड़ रूपये का विदेशी फंड सार्वजानिक सेवाओं की मद में खर्च किया गया जो सरकार की जिम्मेदारी है साथ ही निजी पूंजीपति अब इन सेवाओं का व्यापार करके भरपूर मुनाफा कमा रहे हैं. विश्व बैंक और मुद्रा कोष के इशारे पर ही सरकार ने सार्वजनिक सेवाओं की मद में बजट कटौती की थी, जिसके कारण गरीबी, भुखमरी और महामारी तेजी से बढ़ी. 1985-90 में राज्य और केंद्र सरकार द्वारा ग्रामीण विकास पर सकल घरेलू उत्पाद का 14.5 प्रतिशत खर्च किया गया था जो 2000-2001 में घटकर 5.9 प्रतिशत रह गया. यदि सरकार पहले के बराबर खर्च करती तो यह राशि वर्तमान बजट से 2,30,000 करोड़ रूपए अधिक होती, जबकि एनजीओ के मार्फत इसका हजारवां हिस्सा खर्च करके सरकार निश्चिन्त है. समझना कठिन नहीं कि एनजीओ वास्तव में किसकी सेवा करते हैं. एनजीओ का कार्यक्षेत्र अब केवल लोक कल्याण कार्यक्रम तक ही सीमित नहीं है. वे स्थानीय और राष्ट्रीय राजनीति में भी एक खास तरह का हस्तक्षेप करते हैं जिसका मकसद जाहिरा तौर पर अपने दानदाताओं के स्वार्थों की पूर्ति करना होता है. इसके लिए वे स्थानीय लोगों के बीच से अपने कर्मचारियों की भर्ती करते हैं. हालाँकि उन्हें अपेक्षतया बहुत कम वेतन दिया जाता है लेकिन बेरोजगारी की हालत को देखते हुए यह भी उनके लिए बड़ी चीज होती है. उनके एहसान से दबे ऐसे ही लोग स्थानीय स्तर पर उनका राजनीतिक प्रभाव ज़माने में मदद करते हैं और जलसे-जुलूसों में भीड़ जुटाते हैं. जिन मुद्दों पर रेडिकल बदलाव के लिए जुझारू आन्दोलन होने की सम्भावना होती है, व्यवस्थापोषक एनजीओ उन पर सुधारवादी, समझौतावादी और नरमपंथी मुहिम छेड़ देते हैं. यथास्थितिवादी राजनीतिक पार्टियाँ और मीडिया उनके इस काम में भरपूर मदद करते हैं. विश्व बैंक ने एनजीओ को बढ़ावा देने के पीछे अपना राजनीतिक उद्देश्य स्पष्ट करते हुए विकास रिपोर्ट 2000-2001 में कहा था कि ““औपचारिक या अनौपचारिक तरीकों से सभी राजनीतिक विरोधियों को एक ही मंच पर लाकर तथा उनकी ऊर्जा को राजनीतिक प्रक्रियाओं की ओर मोड़कर सामाजिक तनाव और बंटवारों को काफी शांत किया जा सकता है, बजाय इसके कि उस आक्रोश का शमन करने के लिए टकराव को ही एकमात्र रास्ता मान लिया जाय.” यही कारण है कि जन आंदोलनों के इलाकों में ही एनजीओ का फैलाव ज्यादा है. पारम्परिक जनसंगठन और जनआंदोलन अपने खुद के आर्थिक स्रोतों के ऊपर निर्भर होते हैं और उनके नेता और कार्यकर्ता आम जनता के बीच से आने वाले जनसामान्य होते हैं, जो जनता के प्रति सीधे जवाबदेह होते हैं. जनता के साथ उनका सम्बन्ध पानी और मछली की तरह होता है. ऐसे कार्यकर्ताओं की जगह एनजीओ के जिन विशेषज्ञों और प्रशिक्षित (सोशल वर्क और मैनेजमेंट की डिग्री लिए) स्वयंसेवकों को उतारा गया है वे अपने अधिकारियों और दानदाताओं के द्वारा ऊपर से नियंत्रित होते हैं. उनके लिए जनता की सहमति या असहमति कोई मायने नहीं रखती. वे मुलाजिम की तरह काम करते हैं और उनका किसी भी समय तबादला हो सकता है. उनके आर्थिक स्रोत भी जनता से नहीं बल्कि बाहर से आते हैं और वे अपने दान दाताओं के प्रति ही जवाबदेह होते हैं. जनता के साथ उनका सम्बन्ध पानी और मछली की तरह नहीं, बल्कि कल्याण करने के लिए आये हुए महापुरुष जैसा होता है. उनकी परनिर्भरता का आलम यह है कि जिस दिन सरकारी-गैर-सरकारी, देशी-विदेशी फंडिंग बंद हो जाए उसी दिन सारे एनजीओ ध्वस्त हो जायेंगे. मजदूर आंदोलन में ठहराव, बिखराव और भटकावों के कारण जनता के जुझारू जनसंगठनों की परम्परा और निरंतरता बाधित हुई है. इससे एनजीओ के लिए खुला मैदान मिल गया. अब कई एनजीओ आदीवासियों, दलितों, महिलाओं और खेत मजदूरों का संगठन, मानवाधिकार संगठन और सांस्कृतिक संगठन चलाते हैं, सबसे पहले आगे बढ़कर वे ही किसी राजनीतिक सामाजिक मुद्दे को भी उठाते हैं. देश की राजनीतिक पार्टियाँ भी इसी संस्कृति में ढल चुकी है. उनका नेतृत्व जनता से पूरी तरह कटा हुआ है और वे जनता के ऊपर सवारी गाँठने वाले लाटसाहब में बदल गए हैं. पक्ष-विपक्ष की राजनीतिक पार्टियों में जनता का कोई प्रतिनिधित्व या हिस्सेदारी नहीं है. इसीलिए उनके नेतागण एनजीओ के साथ सांठ-गांठ करते हैं और उन्हें बढ़ावा देते हैं. इस विकट स्थिति से बाहर निकलने का एक ही रास्ता है, मेहनतकश वर्गों और तबकों की चेतना बढ़ाना और सही उसूलों पर आधारित उनके अपने संगठन बनाना, जिनकी गहरी जड़ें अपने लोगों के बीच हों और उन्हीं से वे जीवनी शक्ति ग्रहण करते हों।

ऑपरेशन ग्रीन हंट और राजकीय दमन: सुनिए दयामनि बारला को

Posted by Reyaz-ul-haque on 9/15/2011 12:25:00 AM

ऑपरेशन ग्रीन हंट के नाम से शुरू हुए अभियान को दो साल से अधिक का समय हो रहा है. इस दौरान छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखंड, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र के साथ-साथ दूसरे कई राज्यों में अर्धसैनिक बलों और सेना की तैनाती की गई है. ये बल खनिज संपदा से समृद्ध इलाकों को टाटा, जिंदल, मित्तल, एस्सार, रिलायंस, वेदांता जैसी कारपोरेट कंपनियों के लिए दलितों-आदिवासियों के गांवों खाली कराने और जनता के प्रतिरोध आंदोलनों को कुचलने के मकसद से भेजे गए हैं. प्रतिरोध के लिए संगठित जनता के बीच से लोगों को फर्जी मुठभेड़ों में मारा जा रहा है, उनके गांव जलाए जा रहे हैं, उनकी महिलाओं का उत्पीड़न हो रहा है. देशी-विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों की सेवा में जुटा भारत का शासक वर्ग खनिज और वन संपदा की खुली लूट के लिए अधिक से अधिक फौजी ताकत और काले कानूनों का सहारा ले रहा है. कारपोरेट मीडिया में इस युद्ध की कोई खबर आप तब तक नहीं पाएंगे, जब तक इसमें कारपोरेट कंपनियों की तरफ से लड़ रही भारतीय सेना, अर्धसैनिक बलों और हरमाद वाहिनी, सलवा जुडूम, कोबरा जैसे हत्यारे गिरोहों का कोई जवान नहीं मारा जाता. इसके बाद शुरू होता है टीवी चैनलों पर राष्ट्र, लोकतंत्र और विकास के नाम पर उन्मादी आह्वानों का दौर. लेकिन सदियों से सताए जा रहे मेहनत कशों की न तो पीड़ा वहां कभी जगह पाती है और न उनका संघर्ष.

कठोर दमन और शानदार संघर्षों के इस दौर में उन मेहनतकशों, दलितों, आदिवासियों की पीड़ा को और उनके संघर्षों को आवाज देने वाले लोगों और संगठनों को खामोश करने की लगातार कोशिश सत्ता द्वारा की जा रही है. जो लेखक, पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता कारपोरेट लूट और राजकीय दमन के खिलाफ बोलते हैं, उन्हें गिरफ्तार कर जेलों में डाला जा रहा है. संगठनों पर पाबंदियां लगाई जा रही हैं. डॉ विनायक सेन, लेखक- संपादक सुधीर ढवले, पत्रकार सीमा आजाद, पत्रकार प्रशांत राही उनमें से कुछ उदाहरण भर है. इसी तरह पीयूसीएल, पीयूडीआर जैसे संगठनों पर निशाना साधने की भी कोशिश बार बार होती रही है.

सबसे हालिया उदाहरण जेएनयू में ग्रीन हंट के खिलाफ ढाई साल पहले बने एक फोरम ‘जेएनयू फोरम अगेंस्ट वार ऑन पीपुल’ की गतिविधियों पर प्रशासन द्वारा रोक लगाए जाने का है. ‘विकास की अवधारणा और भारतीय लोकतंत्र की हकीकत’ के विषय पर अप्रैल में हुए एक कार्यक्रम की सूचना देने के लिए बंटी एक पर्ची में छपे चित्र का बहाना बना कर इस संगठन की गतिविधि पर मई के तीसरे हफ्ते में रोक लगा दी गई. यह चित्र कई वर्षों से इंटरनेट पर मौजूद है और यह भारत में चल रहे राजकीय दमन और जनता के प्रतिरोध का कलात्मक चित्रण करता है. इस रोक को छात्रों ने मानने से इनकार किया. वे छुट्टियों के दिन थे, इसके बावजूद 1100 से अधिक छात्रों ने अपने जनवादी अधिकारों पर हुए इस हमले के खिलाफ हस्ताक्षर किया और इस रोक को हटाने की मांग की. इसके अलावा जेएनयू 40 से अधिक प्राध्यापकों और देश के सैकड़ों बुद्धिजीवियों ने भी इस रोक को हटाने की मांग की. लेकिन जेएनयू प्रशासन ने अब तक रोक नहीं हटाई है. खुद वीसी एसके सोपोरी का कहना है कि उन्हें छात्रों की लोकतांत्रिक गतिविधियों पर नजर और नियंत्रण रखने के निर्देश गृह मंत्रालय से मिले हैं.

फोरम को निशाना बनाने के निहितार्थ साफ हैं. फोरम पिछले ढाई सालों से ग्रीन हंट का विरोध करने के अपने मकसद पर मजबूती से खड़ा है. उसने लगातार शासक वर्ग के कारपोरेटपरस्त चरित्र को उजागर किया है और उसकी मुखालिफत की है. उसने हमेशा दमन का प्रतिरोध करते हुए और अपना जल, जंगल, जमीन बचाने के लिए लड़ रही जनता की हिमायत की है. पूरे देश में असहमति और प्रतिरोध की आवाजों को दबाने की प्रक्रिया के तहत ही फोरम पर भी प्रतिबंध लगाया गया है. लेकिन छात्रों के पूरे समर्थन से फोरम अपनी गतिविधियां जारी रखे हुए है और उसने मई के बाद से कई कार्यक्रम किए हैं.

फोरम की गतिविधियों पर लगी रोक हटाने के संघर्ष के तहत फोरम ने कल शाम को जेएनयू में सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार दयामनि बारला को आमंत्रित किया. ऑपरेशन ग्रीन हंट और राजकीय दमन के मुद्दे पर बोलते हुए बारला ने झारखंड समेत देश भर के आदिवासी इलाकों में संसाधनों की कारपोरेट लूट और जनता के उत्पीड़न-दमन के ब्योरे पेश किए. आप भी सुनिए.


वैकल्पिक फाइल


लड़ाई शुरू हो चुकी है सभी सेनानी तैयार हो जाएं

Posted by Reyaz-ul-haque on 9/12/2011 09:59:00 PM

दिलीप खान

पिछले 14 दिनों से लगातार (लगातार को लगातार ही पढ़ें) चल रहे भाषणों के बीच जब एकरसता-सी आ रही थी तो सड़क के उस पार एक बस से ज़ोर-ज़ोर से आ रही क्रांतिकारी नारों की आवाज़ ने मज़दूरों में कौतूहल जगा दी. पहले बस से उतरते कुछ पैर नीचे दिखे, फिर दो-एक चेहरे और फिर 50 से ज़्यादा ऐसे चेहरे जिसे देखकर मज़दूरों ने किलकारी मारनी शुरू कर दी. उनके हाथ में तख़्तियां थीं जिनमें मज़दूरों के समर्थन वाले हर्फ़ लिखे थे. सड़क के इस पार अब यह साफ़ हो गया था कि जेएनयू से यह बस आई है और मज़दूरों के इस सवाल पर वे उनका साथ देने आए हैं. बहुत देर तक तालियां बजती रही. फिर छात्र-मज़दूर एकता ज़िदाबाद के नारे. डीयू और जामिया से भी छात्र-छात्राओं के कुछ समूह वहां मौजूद थे. नौजवान से दिखने वाले मज़दूरों के उत्साही नेता सोनू गुज्जर ने लोगों को संबोधित करते हुए कहा, ‘जिस आंदोलन में स्टूडेंट घुस जाए. समझो वो लड़ाई जीत ली गई.’ मानेसर और गुड़गांव के बाकी कंपनियों के मज़दूर यूनियनों से मिलने वाले समर्थन के बाद दिल्ली के विश्वविद्यालयों से आ रहे विद्यार्थियों ने सबके भीतर उत्साह और जीत की नई उमंग भर दी.

सफ़ेद और लाल रंग के पंडाल के नीचे पिछले 14 दिनों से जमा मज़दूरों के लिए दिन के मायने ख़त्म हो गए हैं. 15, 16 या 17 महज एक संख्या है और वे इन्हें जीत के रास्ते में आने वाले पड़ाव की तरह देख रहे हैं. आईएमटी मानेसर में 750 एकड़ में फैले मारुति-सुजुकी के प्लांट के गेट संख्या 2 के ठीक सामने मज़दूरों के जमावड़े के बीच आप जाएंगे तो यक़ीन मानिए आप अपनी उस दकियानूसी धारणा से मुक्त हो जाएंगे कि दिन गुजरने के साथ उत्साह में गिरावट आती है. कंपनियों और सत्ता प्रतिष्ठानों ने पिछले कुछ वर्षों में ‘इग्नोर’ करने को बड़े हथियार के तहत भांजा है. मारुति-सुजुकी भी उसी रास्ते मज़दूरों को हतोत्साहित करने की फिराक़ में है. प्रबंधन की तरफ़ से अब तक बातचीत की कोई पहल नहीं हुई है. लेकिन आईटीआई करने के बाद ऑटोमोबाइल कारखाना में नौकरी बजाने वाले सारे मज़दूर यह अच्छी तरह जानते हैं कि उन्हें ‘इग्नोर’ नहीं किया जा रहा. वे ब्रांड, विज्ञापन और मार्केटिंग के फंडे को समझते हैं. पिछले चार सालों से कंपनी में काम करने वाले अजय कहते हैं, ‘हां यह ज़रूर है कि वो (प्रबंधन) सीधे-सीधे हमसे बात करने अब तक नहीं आए हैं, लेकिन अख़बारों में वो लगातार अपना विज्ञापन बढ़ा रहे हैं. इससे यह साबित होता है कि उन पर दबाव है.’

अजय की बात को बीच में ही काटते हुए विजय कहते हैं, ‘ज़्यादातर मीडिया के जरिए ही हम कंपनी का पक्ष जान पाते हैं. दैनिक जागरण ने हमे बताया है कि सोमवार तक यदि हम लोगों ने प्रबंधन की मांग नहीं मानी तो स्थाई तौर पर हमें अंदर जाने से रोक दिया जाएगा.’ प्रबंधन की इन धमकियों से कोई ख़ास फ़र्क नहीं पड़ रहा और मज़दूरों के बीच तक़रीबन एक तयशुदा सहमति है कि यदि उनकी मौजूदा एकता क़ायम रही तो प्रबंधन उनका कुछ नहीं कर सकता. वे यह जानते हैं कि मालिक सिर्फ़ पूंजी के बदौलत उत्पादन नहीं कर सकते. उत्पादन के लिए सबसे ज़रूरी चीज़ मेहनत और मज़दूरी होती है और वो मज़दूरों के पास है.

अगर आप कई सारे अख़बारों में आ रही ख़बरों के सहारे मानेसर को समझने की कोशिश कर रहे हैं तो मानेसर को समझना छोड़ दीजिए. अख़बारों ने तो बड़े-बड़े अक्षरों में यह लिखा है कि मारूति-सुजुकी प्लांट में मज़दूरों का हड़ताल चल रहा है, लेकिन यह ख़बर पूरी तरह झूठी है. यहां कोई हड़ताल नहीं चल रहा. मज़दूर अपने लोकतांत्रिक शर्तों के साथ काम करने को तैयार हैं, लेकिन मारूति ने ख़ुद तालाबंदी कर रखी है. मारूति का कहना है कि ‘गुड कंडक्ट फॉर्म’ को जो-जो मज़दूर भरेगा वो अंदर आकर काम शुरू करें और जो नहीं भरेगा उनके लिए यह दरवाज़ा बंद है. मज़दूर प्राथमिक तौर पर इसी ‘गुड कंडक्ट फॉर्म’ के ख़िलाफ़ है और सड़क पर डटे हुए हैं.

इस ‘गुड कंडक्ट फॉर्म’ के साथ-साथ मारूति-सुजुकी मज़दूर आंदोलन की संक्षिप्त कहानी से पहले मज़दूरों के उन मांगों को आप देख लीजिए जिनको पूरी करवाने के लिए वो आधे महीने से कंपनी के सामने विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं और जिनको तोड़ने-मरोड़ने के लिए कंपनी मालिक से लेकर ज़िला प्रशासन और राज्य सरकार तक के सुर एक हैं. ये चार मांगें हैं.-

1.       मारुति सुजुकी इंप्लाइज यूनियन बहाल की जाए

2.       निकाले गए मज़दूरों को वापस लिया जाए

3.       सभी चार्ज शीट वापस लिए जाए

4.       ग़ैरक़ानूनी तालाबंदी ख़त्म की जाए

पहली मांग काफी पुरानी है और मौजूदा गतिरोध की सबसे मज़बूत वजह है. दूसरी, तीसरी और चौथी मांग कंपनी द्वारा पहली मांग को ध्वस्त करने के लिए की गई कार्रवाई से उपजी हुई है. जून में जब यूनियन बनाने के लिए मज़दूरों ने अपनी मांग शुरू की तो मारुति सुजुकी प्रबंधन के कान खड़े हो गए. प्रबंधन एक-एक मज़दूर को अलग-अलग बुलाकर अनुशासन के नाम पर नौकरी छीनने की धमकी देने लगा. मज़दूरों से प्रबंधन का कहना था कि वो पहले से मौजूद यूनियन को ही वास्तविक यूनियन माने. असल में प्रबंधन चालित एक यूनियन कंपनी में पहले से अस्तित्व में थी/है, जिसमें चुनिंदा मज़दूरों को शामिल किया गया था और वे मज़दूर नीतियों का कम और प्रबंधन की नीतियों का ज़्यादा प्रचार करते है. फ़िलवक़्त चल रहे आंदोलन के बारे में भी मलाई काट रहे ‘वास्तविक यूनियन’ से जुड़े नेताओं का मानना है कि कंपनी में “अनुशासनहीनता’ नहीं चल सकती.

रेवाड़ी के रहने वाले मज़दूर आनंद हमें बताते हैं, ‘उस वक़्त मज़दूरों से एक पेपर पर हस्ताक्षर करने कहा गया जिसमें यह लिखा था कि मज़दूरों की तरफ़ से किसी नई यूनियन की कोई मांग नहीं है और भविष्य में भी उनकी इस तरह की कोई मांग नहीं होगी.’ प्रबंधन के उस बाध्यकारी हस्ताक्षर अभियान के ख़िलाफ़ मारूति कामगारों ने मोर्चा खोल दिया. मज़दूरों ने सोनू गुज्जर को अपना नेता मानते हुए प्रबंधन की नीतियों का विरोध किया. परिणामस्वरूप कंपनी ने 11 लोगों को नौकरी से बाहर निकाल दिया. मज़दूरों के इस दमनकारी निष्काषण के विरोध में मज़दूरों ने बेहतरीन एकता का प्रमाण देते हुए हड़ताल पर जाने का फ़ैसला किया और 13 दिनों तक चली उस हड़ताल के बाद समझौता हुआ. सभी 11 लोगों को वापस लिया गया. कंपनी ने उस समय यह भरोसा दिलाया कि अब वो किसी मज़दूर को नहीं धमकाएगी और न ही किसी को बाहर का रास्ता दिखाएगी. ये सब जून की कहानी है. एक तरह से शुरुआती लड़ाई में मज़दूर जीत चुके थे, लेकिन सवाल जहां से शुरू हुआ था वह वहीं पर ठहरा हुआ था. सवाल था- मज़दूर हितों की वास्तविक लड़ाई लड़ने वाली यूनियन का निर्माण! जून की टकराहट का नतीजा यह हुआ कि अब तक मशीन से बनी जली-कच्ची रोटियों और पतली दाल पहले के मुकाबले कुछ बेहतर हुई. हालांकि जेएनयू के एक छात्र से मज़दूर दिनेश सेठी का कहना था, ‘आप विद्यार्थी लोग आज भी उस रोटी को ताकेंगे नहीं. आपके कॉलेज (विश्वविद्यालय) में उस तरह की रोटियां एक दिन भी बन जाए तो आप लोग ऐसी कैंटीन वाले को बाहर कर देंगे.’

यूनियन की मांग जारी रही और साथ में कंपनी प्रबंधन की तरफ से मिलने वाली धौंस भी. हमेशा की तरह एक दिन 7 बजे जब मज़दूर काम करने कंपनी पहुंचे तो कंपनी पूरी तरह बदली हुई दिख रही थी. भीतर-बाहर पुलिस और निजी सुरक्षा गार्ड से अटी हुई कंपनी. बाहर गेट पर एक फॉर्म के साथ तैनात सुरक्षा गार्ड- जो मज़दूरों को यह हिदायत दे रहा है कि जो इस “गुड कंडक्ट फॉर्म’ को भरेगा वही काम करने अंदर जाएगा. मज़दूरों ने वह फॉर्म भरने से इंकार कर दिया. बैठक हुई और सोनू गुज्जर के नेतृत्व में सबने यह फैसला किया कि न तो यूनियन की मांग छोड़ेंगे और न ही यह फॉर्म भरेंगे और न ही कंपनी छोड़ के जाएंगे. यशवंत प्रजापति कहते हैं, ‘वह फॉर्म मज़दूर हितों के साथ बड़ा धोखा है. उसमें कंपनी कहती है कि मज़दूर कोई कंपनी विरोधी काम नहीं करेगा. प्रबंधन के साथ सही आचरण रखेगा......हां सही आचरण क्या है यह कंपनी ही तय करेगी.’

मारुति सुज़ुकी इस तालाबंदी के लिए पहले से माहौल बना रही थी. कुछ दिन पहले से ही वह लगातार मज़दूरों को धमका रही थी कि वो जानबूझकर काम ठीक से नहीं कर रहे हैं और सुपरवाइजर उनके कामों में लगातार खोट निकाल रहे थे. मज़दूरों का दावा है कि कंपनी जान-बूझ कर मैटिरियल में कमी लाई और मज़दूरों पर यह आरोप लगाया कि वे सुस्त गति से और सोच-समझकर ख़राब उत्पादन कर रहे हैं. इसी को आधार बनाते हुए कंपनी धीरे-धीरे मज़दूरों को बाहर करने लगी. निकाले गए मज़दूरों की संख्या अब तक 57 हो गई है. तालाबंदी के बाद भी कंपनी द्वारा मज़दूरों का निकाला जाना जारी है.

प्रदर्शन स्थल पर जिला प्रशासन और लेबर कमीशन के लोग स्थिति का जायजा लेने आए, लेकिन उनकी पक्षधरता साफ़ थी. सोनू गुज्जर ने लेबर कमिश्नर के साथ हुई बातचीत का मजमून रखते हुए कहा कि उन्होंने निकाले गए 57 मज़दूरों को पहले बिल्कुल भूल जाने को कहा, लेकिन बाद में कहा कि छह माह बाद निकाले गए मज़दूरों को वापस लिए जाने पर विचार किया जाएगा. उन्होंने यह भी समझाइश दी कि यूनियन बनाकर क्या होगा, पहले से मौजूद यूनियन के बैनर तले ही वे अपनी मांगों को मज़बूती से रखे. सोनू गुज्जर के साथ बातचीत से पहले लेबर कमिश्नर को शायद यह तथ्य पता नहीं होगा कि बीते 16 जुलाई को पुरानी यूनियन का चुनाव हुआ था और 2500 मज़दूर संख्या वाली इस कंपनी में 20 से भी कम लोगों ने मतदान प्रक्रिया में हिस्सा लिया. प्रबंधन वाली यूनियन की असलियत ऊघर के सामने आ गई है.

राज्य सरकार को मारुति ने धमकाया है कि अगर समाधान उनके पक्ष में नहीं रहता है तो वे प्लांट को उठाकर गुजरात ले जाएंगे. मुख्यमंत्री हुड्डा साहब इस धमकी से घबराए हुए हैं. लेकिन, मारुति सुज़ुकी की पिछली कुछ घोषणाओं और कामों पर नज़र दौड़ाए तो यह साफ़ हो जाएगा कि उनकी धमकी में बहुत दम नहीं है. मारुति ने मानेसर में इस प्लांट के अलावा दो और नए प्लांट पर काम करना शुरू कर दिया है. कुछ दिन पहले तक गुड़गांव वाले प्लांट को भी वे मानेसर लाने की बात कह रहे थे. वह सिर्फ मज़दूर हड़ताल की वजह से गुजरात नहीं भाग सकती. यह दबाव बनाने का प्रोपगैंडा है. सोनू गुज्जर इस प्रचार की असलियत जानते हैं, ‘कंपनी कोई थाली नहीं है कि हाथ में उठाए और बस में सवार होकर गुजरात चल दिए. कंपनी कंपनी होती है.’

यूनियन बनाना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन मारुति के भीतर जो स्थिति थी उससे निजात पाने के लिए इसका गठन होना बहुत ज़रूरी हो चला था. चार्ली चैपलिन की ‘मॉडर्न टाइम्स’ जिसने देखी है वो कंपनी के भीतर काम करने के तरीके को बेहतर समझ पाएंगे. एक मज़दूर अपना पसीना पोछने के लिए हाथ उठाए तो चलती पट्टी के दो नट-वोल्ट कसने बच जाएंगे और उस दो-तीन सेकेंड की भरपाई में उसे तेजी से हाथ-पैर मारने होंगे. मारुति सुजुकी हर 45 सेकेंड में एक कार तैयार करती है. दिनभर में यहां 1200 कारें बनती हैं. मज़दूरों को दो बार चाय पीने के लिए 7-7 मिनट का वक़्त मिलता है, जिसमें उन्हें हेलमेट, गॉगल्स, दस्ताने और मशीनी औज़ार स्टोर में रखने भी होते हैं, फिर पंचिंग कार्ड के जरिए कैंटीन भी जाना होता है फिर कतार में खड़े होकर चाय भी लेनी होती है, पीनी भी होती है और फिर हेलमेट, गॉगल्स, दस्ताने और तमाम लाव-लश्कर से लैश होकर काम शुरू कर देना होता है. इसमे एक सेकेंड की भी देरी बर्दाश्त नहीं है. याद कीजिए कि ‘मॉडर्न टाइम्स’ में जब चार्ली को बीड़ी पीने की तलब होती है और वो छुपकर बीड़ी सुलगाता है तो सामने स्क्रीन पर उसका मैनेजर उसे रंगे हाथों पकड़ लेता है और ज़ोर से फटकारता है. बिल्कुल यही माहौल मारुति के भीतर भी है. लंच के लिए आधा घंटा दिया जाता है.

काम दो शिफ्ट में होता है. सुबह 7.30 से शाम 3.45 तक पहला शिफ्ट और शाम 3.45 से लेकर रात 12.30 तक दूसरा शिफ्ट. अगर मज़दूर 7.31 बजे सुबह पहुंचा तो उसका ‘हाफ डे’ लग जाएगा. रिसेप्शन पर बैठा व्यक्ति मज़दूरों को बताता है कि चूंकि पंचिंग कार्ड के जरिए अंदर आने और जाने का वक़्त नोट किया जाता है इसलिए एक सेकेंड की भी देरी होने पर कंप्यूटर उसे पकड़ लेता है और देरी से आने का खामियाजा मज़दूरों को भुगतना पड़ता है. कितनी मासूम दलील है! मशीन का अपने पक्ष में इस्तेमाल की इस बानगी के क्या कहने! एक दूसरा पक्ष सोचते हैं. पिछले कुछ महीनों की लड़ाई के बाद कंपनी में यह नियम बना कि मज़दूरों को ला रही बस में अगर देरी होती है तो उस देरी को ‘कन्सीडर’ नहीं किया जाएगा. बस लेट होने पर भी मज़दूर पंचिंग कार्ड के जरिए ही अंदर जाते हैं और कंप्यूटर में ही वो समय भी दर्ज होता है. कंप्यूटर इस देरी को नहीं पकड़ता? प्रबंधन की बेईमान व्याख्या की यह एक नज़ीर मात्र है. बस में होने वाली देरी का भी कंपनी खामियाजा वसूलती है, लेकिन भुक्तभोगी पहले शिफ्ट में काम कर रहे मज़दूर बनते हैं. अगर बस लेट हो गई तो पहले वाली शिफ्ट को उस समय तक काम करना पड़ेगा जब तक बस नहीं आ जाती और इसका कोई ओवरटाइम नहीं मिलेगा. ओवरटाइम सिर्फ तब मिलेगा जब बस आने के बाद भी मज़दूरों से कंपनी काम जारी रखे.

एक छुट्टी पर मज़दूरों के 1200 रुपए कट जाते हैं और तीन-चार छुट्टियों पर आधे महीने का पैसा. कोई सिक लिव नहीं. बीमार होने पर कुछ अस्पताल तय किए गए है सिर्फ उन्हीं में इलाज कराने के एवज में कुछ फ़ीसदी भुगतान किए जाते हैं. बाक़ी अस्पतालों में ईलाज पर कोई भुगतान नहीं होता. फिर अस्पताल बिल की गहरी जांच होती है कि बिल का पैसा कितना वास्तविक है कितना नहीं. मारुति को अगर लगे कि टायफाइड 1500 रुपए में ठीक हो सकता है तो डॉक्टरी चक्कर में 15,000 लुटाने के बावज़ूद मज़दूरों को 1500 रुपए का ही आधा या आधे से ज़्यादा पैसों का भुगतान किया जाएगा.

मज़दूरों को शुरुआती तीन साल प्रशिक्षण में गुजारने होते हैं और इस दौरान क्रमश: 7, 8 और 9 हज़ार का वेतन दिया जाता है. प्रशिक्षण ख़त्म होने पर वेतन 16,000 रुपए है. इसके बाद ही मज़दूरों को मतदान का अधिकार मिल पाता है. मौजूदा प्रतिरोध को हतोत्साहित करने के लिए मारुति ने यह दावा किया है कि यदि सोमवार तक सारे मज़दूर ‘गुड कंडक्ट फॉर्म’ भरने को तैयार नहीं होते तो सारे मज़दूरों को बर्खास्त कर दिया जाएगा और कंपनी नए मज़दूरों को बहाल करेगी. 2500 मज़दूरों में से अब तक सिर्फ 20-30 लोगों ने ही यह फॉर्म भरा है और अंदर जाने के हक़दार बने हैं. जाति-धर्म के आधार पर भी मज़दूरों को बांटने की कोशिश हो रही है. प्रबंधन के लोग ऐसे मज़दूरों की तलाश में रहते हैं जो समान जाति और धर्म वाले हों. उन्हें जाति का हवाला देकर पक्ष में करने की कोशिश भी हो रही है, लेकिन मज़दूरों ने नारा बुलंद किया है कि वे ऐसी हर कोशिश को नाकाम करेंगे. उनका मानना है कि उनकी एक ही जाति और धर्म है और वो है उनका मज़दूर होना. मारुति ने दावा किया है कि बीते 1 सितंबर को उसने कुछ नए लोगों के सहारे 80 कार बनाकर बाज़ार में उतारा है. मज़दूरों का मानना है कि अव्वल तो यह मुश्किल है कि बिना ट्रेंड मज़दूरों के सहारे कंपनी इतनी कारें बना लें. दूसरा अगर कंपनी ने रिस्क लेते हुए यह काम किया भी है तो सड़क पर वे गाड़ियां दुर्घटना की बारंबारता को और बढ़ाने में मदद करेगी क्योंकि सही गुणवत्ता को परख पाना नए लोगों के लिए टेढ़ी खीर है. सड़क दुर्घटना की गंभीरता को दिखाती एक रिपोर्ट का मैं ज़िक्र करना चाहूंगा जिसमें कहा गया है कि बीती सदी में सबसे ज़्यादा मौत ऑटोमोबाइल से होने वाली दुर्घटनाओं से हुई है (रिपोर्ट मिलने पर उपलब्ध कराउंगा).

इस समय मानेसर का यह पंडाल मज़दूर आंदोलन का सबसे गरम पंडाल है. यहां के मज़दूरों में ग़ज़ब की ऊर्जा है. जब नारे लगते हैं और सड़क के उस पार मारुति-सुजुकी के प्लांट की भीतरी दीवारों से टकराकर आवाज़ वापस लौटती है तो उस गूंज को सुनकर मज़दूर और ज़ोर का हुंकार भरते हैं. एक थकता है तो दूसरा माइक थाम लेता है. इस तरह दो शिफ्ट में लोग लगातार जमे रहते हैं. कंपनी की तरह यहां भी एटैंडेंस लगता है ताकि मज़दूरों को पता चल सके कि कितने लोग सक्रिय तौर पर उनके साथ हैं और कितने टूट रहे हैं और कितने दलाल बन रहे हैं, बिक रहे हैं. यहां सुबह 7 बजे से शाम 7 बजे तक एक शिफ्ट और शाम 7 से सुबह 7 तक दूसरी शिफ्ट में मज़दूर मोर्चा संभाले रहते हैं. यहां सोनू नाम के कई मज़दूर हैं. कम से कम तीन से तो मैं ही मिला. जो दूसरा सोनू है वह सोनू गुज्जर के भाषणों के बीच में लोगों के बीच जोश भरने के लिए जोरदार नारे लगाता रहता है. लगातार. बिना थके.

सोनू गुज्जर ने बताया है कि मानेसर और गुड़गांव के 40-50 कंपनियों की लीडरशिप ने इस आंदोलन को समर्थन दिया है और गुड़गांव चक्का जाम में वे उनके साथ आएंगे. कुछ सांसदों का भी उन्हें समर्थन हासिल है. सोनू ने कहा कि उन लोगों ने 14 दिनों तक गांधी बन कर देख लिया है, अब ज़रूरत पड़ेगी तो भगत सिंह भी बनेगे. मज़दूरों को उन्होंने याद दिलाया कि भगत सिंह को 23 साल की उम्र में फांसी हो गई थी और उनके यहां तक़रीबन सारे मज़दूर 23 वर्ष से ज़्यादा के हैं. इसलिए इतिहास को यदि दोहराना होगा तो दोहराएंगे. झुकेंगे नहीं.

सोनू गुज्जर ने मज़दूरों और मज़दूर हित में रहने वाले सभी लोगों से यह आह्वान किया है - लड़ाई शुरू हो चुकी है सभी सेनानी तैयार हो जाएं.

भ्रष्ट्राचार विरोधी राष्ट्रवाद चाहिए

Posted by Reyaz-ul-haque on 9/12/2011 12:41:00 PM

अनिल चमड़िया

दो दिनों पहले जहानाबाद में एक थोक व्यापारी ने तीसी का भाव अट्ठाईस रुपये किलो बताया था और कल मैंने दिल्ली में रोहिणी के एक दुकानदार के यहां तीसी सत्तर रुपये खरीदी। संसद में महंगाई पर जो बहस हुई उसमें सासंदों ने अपने-अपने हिस्से के अनुभव सुनाए। संसद में बताया गया कि किसान तीन हजार रुपये प्रति क्विंटल दाल बेचता है और वह व्यापारी के यहां से होकर दुकानदार के यहां नब्बे रुपये किलो बिकता है। किसान के यहां का सात सौ रुपये का चावल दो हजार रुपये में बिकता है। बिहार के गांवों में दो रुपये किलो की सब्जी पटना के बाजार में 15 रुपये किलो और दिल्ली के बाजार में 15 रुपये पाव बिकती है।
मौजूदा सरकार के कार्यकाल में संसद में बारह बार महंगाई पर बहस हो चुकी है और सरकार ने मंहगाई को रोकने में अपनी लाचारी जाहिर कर दी है। अन्ना हजारे के आंदोलन के जवाब में सरकार का यह कहना कि यह संसद और संविधान की सर्वोच्चता को चुनौती है, तो शायद ये लोकतंत्र का सबसे बड़ा झूठ है। कई ऐसे विषयों की गिनती करायी जा सकती है जिसमें सरकार ने संसद की प्रासंगिकता को कटघरे में खड़ा किया है। परमाणु समझौते के खिलाफ पिछले सदन की आम राय थी। जातिवार गणना को लेकर सदन की आम राय थी। नागरिकों पर एक पहचान पत्र लादने के फैसले को बिना सदन की अनुमति के लागू की कर दिया गया। संसद और संविधान को चुनौती अंदर से है। प्रधानमंत्री की यह सफाई कि मैं कमजोर नहीं हूं, यह लाचारी कि वे ज्योतिषी नहीं होने की वजह से महंगाई को रोकने की अवधि नहीं बता सकते और लाचारी के तौर पर यह प्रस्तुति कि भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए जादू की छड़ी नहीं बना सकते ये संसद की ताकत के कमजोर होने की ही घोषणाएं हैं। लोकतंत्र में मतदान का ऊपरी ढांचा ही संविधान की समाजवादी भावनाओं की रक्षा को सुनिश्चित नहीं करता है। चुनाव के आवरण के अलावा पूरी प्रक्रिया में क्या बचा है जहां संसद कमजोर नहीं की गई है। जिस देश में 20 रुपये से आठ रुपये तक रोजाना की कमाई पर 77 प्रतिशत आबादी जीवन काटती हो वहां सांसद को चुनाव लड़ने के लिए वैधानिक तौर पर कम से कम पच्चीस लाख रुपये चाहिए। सांसद दलबदल कानून से बंधा है उसे अभिव्यक्ति की आजादी नहीं है। भ्रष्टाचार को खत्म करने के नाम पर ही यह कानून बना था। संसद की राजनीति बुरी तरह कुंठित हुई है। दरअसल सरकार और संसदीय पार्टियों ने अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार के विरोध में जन लोकपाल को एक मात्र हथियार बनाने के आंदोलन के खिलाफ जो रास्ते तैयार किए उनमें तो कोई दम नहीं है।
इसमें भी दो राय नहीं होनी चाहिए कि गांधीवादी छवि के अन्ना हजारे के नेतृत्व वाले भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने देश में के एक तरह की सोच वाले लोगों को एकजुट किया है। जो वर्ग अपने आप में सिमटा हुआ था और रात को इंडिया गेट पर टहलने निकलता था वह रामलीला मैदान में भी दिखा। युवाओं तक आंदोलनों की जरूरत पहुंची। भूमंडलीकरण के दौर में पहले के मुकाबले बेहतर जीवन जीने वाले वर्ग ने इस आंदोलन में बढ़-चढ़ कर भागीदारी की है। एक चेतना का विस्फोट हुआ है। उसने समाज के दूसरे वर्गों को भी प्रभावित किया है। वैसे भी भूमंडलीकरण का दौर शुरू होने के बाद अलग अलग मुद्दों के प्रति जागरूक करने का ही अभियान चला है। शायद ही कोई ऐसा मुद्दा होगा जिसे लेकर सिविल सोसाइटी के सदस्यों ने अलग अलग आंदोलन नहीं किया होगा और जन समर्थन नहीं बटोरा हो। भ्रष्टाचार के खिलाफ यह इस किस्म का पहला ऐसा आंदोलन है लिहाजा उसने भी सत्ता के स्तंभों के भ्रष्टाचार की तरफ लोगों को जागरूक किया है। समाज के प्रति समग्रता में जागरूकता मुक्कमल राजनीतिक चेतना विकसित करती है। उपनिवेशवाद का विरोध एक मुक्कमल राजनीतिक चेतना का विस्तार करता है। लेकिन भ्रष्टाचार उपनिवेशवाद नहीं है। अन्ना केवल भ्रष्टाचार के विरोधी नेता के रूप में उभरे हैं। यह ध्यान रखना होगा।
इस अभियान ने आंदोलनों के लिए कई सवालों को हल किया है। मसलन आंदोलन का रूप महत्वपूर्ण नहीं होता है। आंदोलन के मुद्दे और उसके समर्थक शक्तियां महत्वपूर्ण होती हैं। मणिपुर में इरोम शर्मिला दस वर्षों से ज्यादा समय से बंदूकधारी सैनिकों को यमराज जैसे प्राप्त अधिकारों के खिलाफ सत्याग्रह कर रही है। लेकिन प्रधानमंत्री के आश्वासन के बावजूद सैनिकों के अधिकार बने हुए हैं। दूसरा कि भगवा लिबास में भूमंडलीकरण के दौर के राष्ट्रवाद को खड़ा नहीं किया जा सकता है। योग व्यापारी बाबा रामदेव को उनके आंदोलन के दमन के बाद वह समर्थन हासिल नहीं हुआ जो अन्ना को हुआ। यह स्थापित हुआ है कि उपनिवेशवाद के दौर में गांधी की जो वेशभूषा प्रतिष्ठित हुई उसी रंग-रोगन में ही भूमंडलीकरण के दौर का नया राष्ट्रवाद खड़ा किया जा सकता है। भूमंडलीकरण की नीतियों के आधार में जो समर्थक वर्ग रहा है वही प्रभावशाली रूप में दिल्ली में अन्ना के आंदोलन के समर्थन में उतरा इसीलिए सरकार का रूख दुविधाग्रस्त दिखाई देता रहा। मीडिया को दुविधा नहीं हुई क्योंकि हर लिहाज से अन्ना का आंदोलन उसके हित में रहा। मीडिया की इस समय बहुत बड़ी भूमिका हो गई है। महंगाई के खिलाफ कई बार विभिन्न राजनीतिक पार्टियों ने आंदोलन करने की कोशिश की। भ्रष्टाचार के खिलाफ भी विभिन्न राजनीतिक संगठनों ने आंदोलन करने की कोशिश की है। लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ गैर राजनीतिक नेतृत्व के आंदोलन को ही समर्थन हासिल होते क्यों देखा जा रहा है? क्या यह माना जाए कि किसी मुद्दे पर अब राजनीतिक आंदोलन का समय चला गया? या फिर यह माना जाए कि देश की राजनीति एक नई शक्ल अख्तियार कर रही है ?
दुनिया भर में शासन चलाने के लिए आधुनिक राजनीतिक व्यवस्थाएं ही बनी हुई हैं। इसीलिए राजनीतिक रास्तों से ही इन व्यवस्थाओं में सुधार किया जा सकता है। राजनीतिक पार्टियां संसदीय व्यवस्था में चाहें सत्ता में हो या विरोध में रही हो वे कमोबेश भूमंडलीकरण की व्यवस्था की पक्षधर रही हैं। संसद अब शायद उसी के लिए चलने का एहसास कराती है। अमेरिका के साथ परमाणु समझौते को लेकर तो सरकार जाने के जोखिम से ज्यादा इस बात को लेकर ज्यादा भरोसा दिखा कि संसदीय परंपराएं और मर्यादाएं नहीं भूमंडलीकरण की पक्षधर शक्तियां सरकार को बचा ले जाएंगी। यह भरोसा इसीलिए बना क्योंकि अपनी अंतर्धारा में संसद भूमंडलीकरण की हो चुकी है। यह अंतर्धारा कैसे मजबूत होती चली गई है, इसे समझने की कोशिश की जा सकती है। क्या आंदोलन, मीडिया और पार्टियों के भीतर एक ऐसी अंतरधारा विस्तारित हुई है जो विभिन्न रूपों में अलग-अलग या विरोधी दिखने के बावजूद एक होती है? नई आर्थिक नीतियों को लागू करने वाली सरकारों पर यह दबाव बढ़ रहा है कि वह देश में बड़ी-बड़ी कंपनियों के लिए दरवाजे और खोल दें। सरकार में वैसे लोग बड़ी तादाद में है जो इस किस्म का बहाना ढूंढ़ रहे हैं कि वे उसकी आड़ में कंपनी राज के हितों में फैसले लेने की मजबूरी जाहिर कर दें। अभी योजना आयोग ने भविष्य के लिए अपने नजरिये को इसी तरह पेश किया है। योजना आयोग का ये कहना है कि लाइसेंस परमिट राज खत्म करने से भ्रष्टाचार खत्म हो गया। जबकि हकीकत तो यह है कि जिन अफसरों और विभागों और राजनीतिक नेताओं को परमिट लाइसेंस देने के लिए घूस देना पड़ता था वे बिना परमिट लाइसेंस के समाज को ज्यादा लूट रहे हैं। उन पर किसी तरह का कोई नियंत्रण नहीं है। वे लोग ज्यादा लूट के लिए पहले के मुकाबले विभाग, अफसर और राजनीतिक नेताओं को ज्यादा घूस दे रहे हैं। यही वजह है कि भ्रष्टाचार का दायरा बढ़ा है। ज्यादा से ज्यादा लूटने के लाइसेंस खरीदने की होड़ मची है और वह विकास का मानक बना हुआ है।
एक तरफ अन्ना हजारे का अभियान इस बात को लेकर ही अड़ा हुआ है कि लोकपाल बिल में प्रधानमंत्री, संसद सदस्यों और न्यायपालिका को भी शामिल किया जाना चाहिए। ये राजनीतिक व्यवस्था को चलाने वाले तंत्र के हिस्से हैं। दूसरी तरफ भ्रष्टाचार से निपटने के लिए लोकपाल का जो तंत्र बनाने की वकालत की जा रही है उसका जनता से कोई सरोकार नहीं होगा। भ्रष्टाचार के अर्थ आंदोलन में खुल नहीं रहे हैं। बड़ी बड़ी कंपनियों के मालिक बीसेक वर्षों में हजारों हजार करोड़ के मालिक बन गए है। यह सही बात है कि इन कंपनियों का राज बनाने वाली यही संसद और उसके नेतागण रहे हैं। दरअसल राजनीति जब एक बार पूंजीवाद की गिरफ्त में चली जाती है तो फिर राजनीति को उसके दबाव में ही रहना पड़ता है। जनता की भलाई करने वाली राजनीति को परछाई और पूंजीवाद की शक्ल अख्तियार करनी पड़ती है। अभी पूंजीवाद की राजनीति पर गिरफ्त इतनी ज्यादा है कि उसके समर्थक ही सरकार के कर्ताधर्ता बने हुए हैं। देश में आम लोगों की भलाई के लिए चलने वाली राजनीति दोराहे पर खड़ी हो गई है।
अन्ना हजारे का अभियान इस रूप में जागरूक करने की कोशिश रहा है कि उनके द्वारा बनाया गया लोकपाल बिल यदि संसद से पारित कर दिया गया तो भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा। दूसरा कोई नारा भी नहीं है। वंदे मातरम, भारत माता की जय और अन्ना का करिश्मा ही नारे की शक्ल में सामने आ रहा है। यह बहुत संभव है कि अन्ना पैसे-कौड़ी के मामले में ईमानदार व्यक्ति हों। मनमोहन सिंह के बारे में भी कहा जाता रहा है कि वे बेहद ईमानदार प्रधानमंत्री है। अटल बिहारी वाजपेयी के बारे में भी यही बात कहीं जाती रही है। ईमानदार व्यक्ति ईमानदार के अलावा वो बहुत कुछ हो सकता है जो समाज और लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं हो। सवाल यह है कि ईमानदार व्यक्ति की ऊर्जा कहां लग रही है। ईमानदारी और व्यक्तिगत त्याग किसके काम आ रहा है। दरअसल किसी आंदोलन में मुद्दा ही महत्वपूर्ण नहीं होता है बल्कि किसी भी आंदोलन की अंतरधारा में क्या है वह बहुत महत्वपूर्ण होता है। अन्ना के आंदोलन में जो अंतरधाराएं हैं वे वंदे मातरम, भारत माता की जय की शक्ल में भी हैं। जय प्रकाश ने जब आंदोलन शुरू किया था तो ऊपर से वह दूसरी आजादी की लड़ाई दिख रही थी। लेकिन अंदर जाति, धर्म, पूंजीवादी , धार्मिक राष्ट्रवाद, भ्रष्टाचार आदि भी बने हुए थे। इसीलिए उस आंदोलन के बाद ये सारी धाराएं बहुत मजबूती से उभरकर सामने आईं। इतिहास में कई बार होता है कि जब राजनीतिक तौर पर अपनी ताकत बढ़ाना संभव नहीं होता है तो विभिन्न तरह की धाराएं किसी मुद्दे के जरिये अपनी हैसियत बढ़ाने की कोशिश करती है। भूमंडलीकरण के शुरू होने के बाद जिस तरह की धाराएं राजनीतिक तौर पर कमजोर व पराजित हुई है, वे लगातार अपनी जमीन को मजबूत करने की कोशिश में लगी है। अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी धारा में कितनी तरह की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक धाराएं सक्रिय हैं, इसका अध्ययन किया जाना चाहिए। यह सच है कि समाज का हर हिस्सा भ्रष्टाचार की एक धारा के दमन का शिकार है लेकिन केवल वही एका का आधार बन सकता है?

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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